Saturday, October 1, 2011

मन की गाँठे

तुमसे बात करने की कितनी लंबी योजना होती है और एक सिरे से सिलसिलेवार सजाकर रखता हूँ शब्दों को, भाषा को और सारे रस उनके स्थायी भाव और अपनी आवाज के उतार चढ़ाव का भी बेहतरीन नट की तरह से अभ्यास कर लेता हूँ दिमाग में पूरी फिल्म बन् जाती है तुम्हारे चेहरे के भावो को भी अपने मन में बसा लेता हूँ कि मेरे किस शब्द पर कैसी प्रतिक्रया होगी और फ़िर में कौनसा शब्द वापररूंगा कि अपनी बात भी कह दू और तुम शुष्क भी ना हो या उत्तेजित और मुझसे बात करते लडखडाने लगो या नाराज़ ना हो जाओ, एक-एक विचार और एक-एक बात बहुत करीने से सजाकर रखने में बहुत समय लग जाता है इंतज़ार बढ़ने लगता है मन व्याकुल हो जाता है पसीने की नन्ही बुँदे मस्तक पर चहचहा उठती है और जब बहुत उम्मीदों और हिम्मत से फोन मिलाता हूँ तो सारा मामला उलट जाता है शब्द काफूर हो जाते है सिर्फ सांय सांय सुनाई देती है व्योम में गूंजते हुए शब्द जुबा पर उतरते ही नहीं बस लगता है सुनता रहू तुम्हारी आवाज और साँसों के उतार चढ़ाव की वो आवाजे जो मुझे हर दम ज़िंदा रखती है (मन की गाँठे)

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