Friday, September 30, 2011

अकेलापन क्या होता है. एक हथौड़ा ही न, जो पत्थर पर गिरता है, तो पत्थर टूटकर बिखर जाता है.
लोहे पर गिरता है, तो लोहा और मज़बूत हो जाता है.
किस घड़ी अकेले होते हैं हम ?
स्मृतियां अकेला होने देती हैं क्या?

महेश वर्मा की नई कविताएं (सबद से साभार)




पुराना दिन

तुम वहाँ कैसे हो गुज़रे हुए दिन और साल?
यह पूछते हुए पुरानी एलबम के भुरभुरे पन्ने नहीं पलट रहा हूँ

तुम्हारी आवाज़ आज के नए घर में गूंजती है
और हमारी आज की भाषा को बदल देती है

एक समकालीन वाक्य उतना भी तो समकालीन नहीं है
वह पुरानी लय का विस्तार है

और इतिहास की शिराओं का हमारी ओर खुलता घाव
वह तुम्हारे विचारों का निष्कर्ष है हमारी आज की मौलिकता
पुराने आंसुओं का नमक आज की हंसी का सौंदर्य

मरा नहीं है वह कोई भी पुराना दिन
राख, धूल और कुहासे के नीचे वह प्रतीक्षा की धडकन है
गवाही के दिन वह उठ खड़ा होगा
और खिलाफ गवाही के दस्तावेज के नीचे दस्तखत करेगा.
****

बाहर

...फिर क्या होता है कि तुम प्रतीक्षा के भ्रामक विचार से धीरे धीरे दूर होते जाते हो . यह दूर जाना इतने धीमे तुम्हारे अवचेतन में घटित होता है कि दांतों के क्षरण और त्वचा के ह्रास की तरह इसका पता ही नहीं चलता. किसी एक रोज थोड़ा दूर हटकर तुम संदेह करते हो कि वाकई तुम्हें प्रतीक्षा थी भी या नहीं . फिर होता यह है कि तुम प्रेम की घटना और अंततः प्रेम के विचार से ही एक उपहासात्मक दूरी बनाना चाहते हो अपने वीतराग में इस तरह कि कोई प्रेम नहीं था, प्रतीक्षा भी नहीं .

यहाँ ज़रा रूककर इस सुन्दर संतुलन को देखें कि ये तुम्हारे विचार नहीं थे , एक पुकार थी तुम्हारी ओर से अपने आप को यातना देती हुई कि प्रेम तुम्हें पुकारता हूँ इस तरह कि आज कह रहा हूँ कि तुम नहीं थे. धूल भरे मैदानों की दूरियों में अस्त होती तुम्हारी इस पुकार की कोई उदास प्रतिध्वनि गूंजती भी हो तो तुम्हारी आत्मा के एकांत में ही सुनाई देगी वह प्रतिध्वनि.

तुम्हारी इच्छा से बाहर थी तुम्हारी प्रतीक्षा .

तुम्हारी प्रतीक्षा से बाहर तुम्हारा प्रेम.
****

इतिवृत्त

घोड़े की पीठ पर सो लेते थे बाबा
एक बार ऐसे ही पार कर गए थे
पारिवारिक किम्वदंती की नदी
घोड़े की पीठ पर सोते-सोते

पुजारी पिता भोर में नहीं उठ पाते थे जिस रोज
देवी के स्वप्न से उठते थे हडबडाए
देवी ने लात मारकर जगाया कहते फिर
उस पदाघात को प्रणाम करते अमूर्त दिशा में

चाचा को बस में बैठते ही नींद आ जाती थी
चौंक-चौंक उठते थे सपने की दुर्घटना में
थोड़ी देर में पहचानते थे अपना आसपास

माँ गुडीमुडी होकर सो रही है रसोई के ही फर्श पर
कभी सोती है पूजाघर में

भाई सपने में अक्सर डांटता है किसी को
पहले कहाँ सोता था मेरे पेट पर घुटना दिए बगैर

कहानी या अपने रुदन के विस्तार में ही सोता है मेरा बेटा

अधूरे कामों के टुकड़ा वाक्यों में डूब रही है पत्नी
अपनी थकन में सोने से पहले

ऐसे में क्या कहा जा सकता है अपने सोने जागने के बारे में
****

चेहरा

पता नहीं तुम कितने अंतिम संस्कारों में शामिल हुए
कितनी लाशें देखीं लेकिन फिर जोर देता हूँ इसपर
कि मृत्यु इंसान का चेहरा अप्रतिम रूप से बदल देती है

यह मुखमुद्रा तुमने इसके जीते जी कभी नहीं देखी थी

यह अपने मन का रहस्य लेकर जा रहा है और निश्चय ही नहीं लौटेगा

पता नहीं क्या करता इसका अगर कुछ और दिन रुकता कि
कौन-सा स्पर्श उसकी त्वचा में सिहरन भर देता था और उसकी सांसों में आग
कौन सी याद उसकी आत्मा को भर देती थी खालीपन से
किन कंदराओं से आता था उसका वीतराग मौन और उसकी धूल भरी आवाज़

यह उसका विनोद है, उसका असमंजस
उसकी पीड़ा है और उसका पापबोध
जो उस रहस्य से जुडा है निश्चय ही जिसे लेकर जा रहा है
या उसका क्षमाभाव है

और बदला न ले पाने को ऐंठती उसकी आत्मा की प्रतिछवि है उसके चेहरे पर
जो उसे बनाती है अभेद्य और अनिर्वचनीय

एक प्रेमनिवेदन जो किया नहीं गया
एक हत्यारी इच्छा , हिंसात्मक वासना
मौक़ा, चूकी दयालुताएं और प्रतिउत्तर के वाक्य

ये उसकी आत्मा की बेचैन तहों में सोते थे फिलवक्त
अब इन्हें एक अँधेरे बक्से में रख दिया जाएगा

प्रार्थना का कोई भी सफ़ेद फूल,
करुणा का कोई भी वाक्य इन तक नहीं पहुँच पायेगा

और तुम्हें यह तो मानना ही होगा कि
तुम्हारी काव्यात्मक उदासी से बड़ी चीज़ थी
उसके मन का रहस्य

बाकी संसार आज उससे छोटा ही रहेगा.
****

[ महेश वर्मा हिंदी के चर्चित युवा कवि हैं। सबद पर इनकी कविताएं इससे पहले यहां देखें।
कविताओं के साथ दी गई तस्वीर गूगल से। ]

मरम अल-मसरी : आज शाम मिलेंगे शिकार और शिकारी

मरम अल-मसरी की दो कविताएँ...


















मरम अल-मसरी की दो कविताएँ
(अनुवाद : मनोज पटेल)

सिर्फ इतना ही
चाहता था वह :
एक घर,
बच्चे
और प्यार करने वाली एक पत्नी.
मगर एक दिन जब वह जागा
तो पाया कि
बूढ़ी हो गई है है उसकी आत्मा.

सिर्फ इतना ही
चाहती थी वह :
एक घर, बच्चे
और प्यार करने वाला एक पति.
एक दिन
वह जागी
और पाया कि
एक खिड़की खोलकर
भाग निकली है उसकी आत्मा.
:: :: ::

आज शाम
एक पुरुष
बाहर निकलेगा
शिकार की तलाश में
अपनी दमित कामनाओं को शांत करने के लिए.

आज शाम
एक स्त्री बाहर निकलेगी
किसी पुरुष की तलाश में
जो उसे
हमबिस्तर बना सके.

आज शाम
मिलेंगे शिकार और शिकारी
और एक हो जाएंगे
और शायद
शायद
बदल लेंगे अपनी भूमिकाए







तुम्हारे लिए................सुन रहे हो..............कहाँ हो.............??????????

मुझे कौन पूछता था तेरी बंदगी से पहले
में बुझा हुआ दिया था तेरी रोशनी के पहले...........

तुम्हे याद करते हुए यहाँ

तुम्हे याद करते हुए यहाँ
ये झील का ठहरा हुआ पानी और डूबता सूरज और एक प्रतिमा जोह रही है बाट अपने होने की.............
तुम्हे याद करते हुए जीवन बीत रहा है यहाँ वहाँ अस्त व्यस्त और बदहाल.......लौट आओ बस अब नही होता इंतज़ार और अकेला........रहना मानो पानी के जैसा है बस बहते रहो....................लौट आओ अब लौट आओ...............

सुशील कृष्णेत के सौजन्य से

Had Sushil Krishnet would nt have published I would nt have been able to read such a nice work. Thanx a ton Sushil.............

तुम्हारी आंखों में कभी नहीं पड़ते
आसक्ति के लाल डोरे
फूंकते हुए चूल्हा, दहकाती हुई आग
तुम सीने में भर लेती हो
दो मुट्ठी चिंगारी
और सांसों में राख...
जलाकर अपना जीवन
हर दिन परोसती हो तुम चार रोटियां
नयनों में भरे आंसुओं से शायद
सान लेती हो आटा
...
तुम्हें नहीं चाहिए कभी कोई प्रेमगीत
नहीं कोई गवाही प्रेम के सच्चे होने की
कहां मांगी तुमने करधन या पायल
कमर में बंधे हाथों को ही जेवर समझ होती रहीं धन्य
स्त्री,
तुम्हारे होने में न वसंत है, न कविता
न ही कोई ललक
पर तुम्हारे बिना कोई मौसम हुआ है कभी मुकम्मल
पत्नी का प्रेयसी न होना
और प्रेमिका का पत्नी न बन पाना
नियति है इसी तरह की,
जैसे--अनिवार्य सत्य हमेशा फांसी झूलता है
और झूला झूलते हुए हम भुला देते हैं हर बार दंगों को
...
होने वाली पत्नी या न हो सकी प्रेमिका को याद करते हुए
कविता गढ़ना
धूप में खटाई सुखाने की तरह है
या फिर
बारिशों के डर से आनन-फानन लाज बिछाते हुए
नंगे पैर सारे पैरहन समेटना...
घर की औरत में अलंकार तलाशना
या फिर विक्षिप्त भाव से गुमशुदा प्रेम को अडीगना
हर जीवन मुकम्मल नहीं होता
न ही वसंत टिके रहते हैं
फिर भी हममें नाखुश रहने की बीमारी है
शुक्रिया कहते हुए दोष गिनाने
और खुशी में तुनक जाने की पारंपरिक आदतों की तरह...

प्रशासनिक पुराण 33

ये छोटी सी नगर पंचायत थी जो प्रदेश के बड़े आदमी की विधानसभा में आती थी इसलिए ये बड़ी महत्वपूर्ण थी यहाँ के मुख्य अधिकारी बड़े लोच वाले सज्जन थे प्रोटोकाल के तहत जो भी वीआईपी आते थे उनका बाकायदा फल फुल और काजू पिश्तो से स्वागत करते थे, बदले में सालो से टिके थे छोटी जगह पर ऐसा दफ्तर कि साला जिला शरमा जाए और पंचायत में चमचमाती गाडिया चाहे अग्निशमन वाहन हो या एम्बुलेंस या अपनी खुद की गाड़ी, सब सेट था. काम यही कि कोई भी मरे खपे या पैदा हो सबकी सेवा सुश्रुआ करना, ऊपर तक से लाभ दिला देना और चुने हुए प्रतिनिधियों के भी खास थे क्योकि कहा ना कि रीढ़ की हड्डी ही नहीं, खूब पुण्य कमा रहे थे बाकी तो सब जाहिर ही है और ऊपर से तुर्रा यह कि जिले के अधिकारियों के जेब में रखते थे क्योकि बड़े आदमी के छोटे से कारिंदे है (प्रशासनिक पुराण 33)

प्रशासनिक पुराण 32

जनपदों में इतना काम है कि एक मुख्य कार्यपालन अधिकारी नहीं ध्यान नहीं दे पाता खासकरके रोज़गार ग्यारंटी का काम.....प्रतिदिन उसे २०० से ३०० खतो आदेशो को पढना पडता है अब बताइये ऐसे में वो क्या तो गंभीरता से पढ़ता होगा और क्या उनका पालन करता होगा ऊपर से बहुत ही निठल्ले किस्म के अज्ञानी बाबूओ की फौज, कंप्यूटर से पूर्णतः अनभिज्ञ, रूपयों की लालसा में लगे ये अकर्मण्यो की टुकड़ी क्या पचायती राज को समझेगी और जनता जनार्दन को लाभ देगी. कल एक वरिष्ठ CEO जो प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति के इलाके में कार्यरत है की कार्यशैली को देखा और समझा कि ये भी मानव है और कितना करेंगे अकुशल लोगो के साथ. मुझे लगता है कि जनपदों पर प्रशासनिक ढाँचे को पुनः स्वरुप देने की आवश्यकता है.

एर्नेस्तो कार्देनाल : तुम्हें इस तरह कोई नहीं प्यार करेगा


एर्नेस्तो कार्देनाल की 'सुभाषित' श्रृंखला से कुछ कविताएँ...














एर्नेस्तो कार्देनाल की कविताएँ
(अनुवाद : मनोज पटेल)

हम दोनों ही हार गए जब मैनें खो दिया तुम्हें :
मैं इसलिए हारा क्यूंकि तुम ही थी जिसे मैं सबसे ज्यादा प्यार करता था
और तुम इसलिए हारी क्यूंकि मैं ही था तुम्हें सबसे ज्यादा प्यार करने वाला.
मगर हम दोनों में से तुमने, मुझसे ज्यादा खोया है :
क्यूंकि मैं किसी और को वैसे ही प्यार कर सकता हूँ जिस तरह तुम्हें किया करता था.
मगर तुम्हें उस तरह कोई नहीं प्यार करेगा जिस तरह मैं किया करता था.
:: :: ::

लड़कियों, तुम लोग जो किसी दिन पढ़ोगी इन कविताओं को आंदोलित होकर
और सपने देखोगी किसी कवि के :
जानना कि मैनें लिखा था इन्हें तुम्हारे जैसी ही एक लड़की के लिए
और व्यर्थ ही गया यह सब.
:: :: ::

यही प्रतिशोध होगा मेरा :
कि एक दिन तुम्हारे हाथों में होगा एक प्रसिद्द कवि का कविता-संग्रह
और तुम पढ़ोगी इन पंक्तियों को जिन्हें कवि ने तुम्हारे लिए लिक्खा था
और तुम इसे जान भी नहीं पाओगी.
:: :: ::

Wednesday, September 28, 2011

कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों हैं

कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों हैं
वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों हैं
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों हैं
यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों हैं

एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ लें दामन
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन
इतनी क़ुर्बत हैं तो फिर फ़ासला इतना क्यों हैं

दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
एक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई
आस जो टूट गयी फिर से बंधाता क्यों हैं

तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता
हैं जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों हैं
मप्र में पंचायती राज को मुझे लगता है दरकिनार किया जा रहा है सारी योजनाएं सरकार मूलक होती जा रही है और नियम कायदों को ताक में रखकर काम किये जा रहे है. लोगो की अपेक्षाओं को केंद्र में ना रखकर बहुत सारी गैरजरूरत की बातें थोपी जा रही है. आज एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मसलन गाँव में कीचड है पर हम उन्हें जलाभिषेक करने को कह रहे है, पंचायते अपनी अस्मिता खो रही है साथ ही लोगो का विश्वास इस महत्वपूर्ण व्यवस्था पर से भरोसा उठ रहा है ऐसे में विकेंद्रीकरण और जनता का राज या लोकसभा ना राज्यसभा सबसे बड़ी ग्राम सभा का क्या अर्थ रह जाता है.......?

जनभागीदारी के नाम पर ढेर सारा रूपया

आशीष कुमार अंशु की पोस्ट पर प्रतिक्रया
मेरा एनजीओ पुराण पढाने से बहुत जाले साफ़ हो सकते है और यह बिलकुल सच है कि विदेशी रूपयों का जितना बेदर्दी से इस्तेमाल हो रहा है और सिर्फ सुविधाएँ भकोसने में. आज ही में सीहोर जिले के नस्रुल्लाह्गंज ब्लाक में गया था वहाँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर के ५-६ लोग राज्य सरकार के बगैर अंग्रेजीदां लोगो को और नगर के चुने हुए मात्र ४ प्रतिनिधियों को "ज्ञान" बाँट रहे थे वो भी पावर पॉइंट पर और लोग कौतुहल से उस अंगरेजी भाषण को सुन रहे थे जो उनके नगर का भविष्य तय करेगा, बाहर कीचड में उनकी ऐसी गाडियों के ड्राईवर इस विकास की माँ भैन कर रहे थे .............अब कोई क्या बताएं इन अंतर्राष्ट्रीय स्तर के ५-६ लोगो को कि भैया कुछ भी पल्ले नहीं पडा पर हाँ आपका बढ़िया टी ए और डी ए बन् गया .....और काम भी निपट गया अब जनभागीदारी के नाम पर ढेर सारा रूपया और एंठ लेंगे फ़िर प्रशिक्षण और ना जाने क्या क्या और आख़िरी में IEC सामग्री के नाम पर गलत सलत हिन्दी में प्रकाशन फ़िर अनुवाद.........अंशु लिस्ट बहुत लंबी है सरकार को शीघ्र ही कार्यवाही करना चाहिए........
वो तेरा शहर और तुम् बहुत याद आते हो......................मेरा शहर तो मेरी नसों में दौडता है और रह रहकर कौंधता है ..बस फर्क इतना है कि इसे नसों में तुम ज़िंदा रहते हो !!! तुम्हारी याद और क्षणिक जुदाई कपकपा देती है...........इन सर्द होती सुबहो में बस अब.............यही तो है मेरे पास......

Monday, September 26, 2011

मालवे का ओटला मनीष शर्मा की ज़ुबानी............

Manish Sharma की ज़ुबानी ओटला
ओटला`यानि वह ठोस धरातल
वह संगम जो जोड़ता है
घर को बाहर से
ओटला जहाँ बच्चे खेलते
अनेकों खेल
यानि वह उनका नदी और पहाड़
जिस पर बैठ कोई भूखा
खा लेता भिक्षा में मिला खाना
जिस पर दोनों पैर आगे रख
गाय भी बाट जोहती रोटी की
तपती गर्मी की दोपहर
जहाँ सुस्ता लेता कुत्ता भी
ओटले पर शाम को
जाजम पर बैठे बुजुर्ग
वो दोस्तों का जमघट
बे साख्ता ठहाके , वो ज्ञान चर्चा
वो जिस पर बैठ कर लेते
सर्दी की गुनगुनी धूप का मजा
बरसात में तैरातें नाव जहाँ से
गर्मी की शाम करते जहाँ हंसी -ठट्ठा
पता है तुम्हे ..अपने मोहल्ले में अब
ओटले दिए जाते है ..किराये पर
बिकते है जहाँ गणपति ,पटाखे
और होली के रंग ..
इन्ही त्योहारों पर जो होते थे आबाद
अब बिके-बिके नजर आते है ..
ये ओटले जीवन के अर्थ -शास्त्र में
समाजवाद व पूंजीवाद का अंतर बतलाते है
कहने वालों का कुछ नहीं जाता सहने वाले कमाल करते हैं
कौन ढूंढे जवाब ज़ख्मों के लोग तो बस सवाल करते हैं!

-गुलज़ार साब
कहने वालों का कुछ नहीं जाता सहने वाले कमाल करते हैं
कौन ढूंढे जवाब ज़ख्मों के लोग तो बस सवाल करते हैं!

-गुलज़ार साब


तुम्हारे लिए सुन रहे हो.....................कहाँ हो................???

तुम इतने सीधे लगे,जितने सीधे बांस..
रोम-रोम में फांस है और जोड़-जोड़ में गांठ......

Interesting Discussion on Face Book ref Modi Mullaa and Topi

हम कब आदिम युग के प्रतीकों को इस्तेमाल करते रहेंगे कितने ब्राहमण जनेऊ पहनते है या कितने मुस्लिम टोपी पहनते है अब जबकि हमारे सामने और भी मुद्दे लड़ाई के है तो ये छोडकर आगे बढे कुछ और करे उस आदमी की चिंता करे जो मात्र ३२ या २५ रूपये में जिंदगी से दो चार हो रहा है और जिसकी फिक्र ना मोदी को है ना मौलवी मुल्ला को है इनके पेट भरे हुए है और खा खाक्रर ये मदमस्त हो गए है इसलिए उपवास करना पड रहा है इनको ...........
Sanjay Jothe बिलकुल सही दादा... जिनके लिए मज़हब को थोड़ी देर भूल कर नयी दुनिया से रास्ता जोड़ने की जरूरत है वे जान बुझकर खुद को और अपने गरीब लोगों को टोपी और जनेऊ में उलझाए हुए हैं... इस सबमे सबसे ज्यादा नुक्सान बेशक टोपी को ही होता आया है और होता रहेगा... जनेऊ तो 'अन्दर की बात' है इसलिए खामोश है, टोपी जगजाहिर होती है इसलिए अनावश्यक रूप से मुखर है, इसीलिए राजनेताओं की पहली टार्गेट है, न सिर्फ इस मुल्क में बल्कि पूरी दुनिया में...

Vishal Pandit I oppose...Janeu or cap are the symbols....and without these symbols we are nothing..........this is not a matter of religion...its a matter of class...........class war is going on........Marx was right

Sandip Naik Sam जनेऊ और टोपी यदि हमारे प्रतीक और अस्मिता है तो हमें पत्थर युग में जाने की आवश्यकता है नाकि इंटरनेट पर बैठकर रोना धोना करने की ....ये बर्बर प्रतीक है और मानव सभ्यताएं नष्ट हो गयी जो प्रतीकों के भरोसे रही चाहे वो बेबीलोन की हो सिंधु घाटी की या ग्रीक मिस्र की ......यदि हमारी जिंदगी प्रतीकों के सहारे ही है तो जीवन व्यर्थ है और हम कहा जी रहे है यह भी सवाल है, रहा सवाल संजय की बात का कि जनेऊ अंदर की बात है बाहर टोपिया दिखती है तो सर पर उगी चोटिया भी दिखती है इसी चोटी के लिए देवास में संघ के कार्यकर्ता की ह्त्या हुई थी और आडम्बर अंदर हो या बाहर वो सिर्फ एक कायरता है ना कि पहचान.....इन्ही आडम्बरो की वजह से इस देश के बड़े या यु कहू कि बहुसंख्यक समुदाय ने अपने आप को दलित, सवर्ण और अल्पसंख्यक में बाँट दिया है और यह सारी लड़ाई प्रतीकों और संस्कारों की है जो बेहद खतरनाक है. मुझे लगता है सबको अज़गर वजाहत का नाटक "सबसे सस्ता गोश्त" पढाना चाहिए ताकि थोड़े जले साफ़ हो सके.....जितना कबाडा इस देश में ब्राह्मणों ने किया है उतना कोई जल्लाद भी नहीं कर सकता अम्बेडकर पूरी जिंदगी यही भोगते रहे ......

Vishal Pandit mai fir bhi aapke kathan se sahmat nahi hu

Sandip Naik Sam Pandit, its Democracy you may and better you may nt but fact is fact we all know but due to our so called family and conservative values unable to accept publicly becoz we believe in maintaining statuesque, and this gives us RELIEF and keep us far from all muddles and Mess..............!!!!!!!!!!!

Vishal Pandit I proud of being a bramhin and I preserve symbols.........u also go through history and found in america or west...as traditional systems...symbols vanished....they are so called secular but from inside...they have another face....attacks in AUS for example.........sabhyatao ko jeevit rakhne ke madhyam hai prateek.....mai janeu pahan ke bhi moderate ho sakta hu aur janeu pahne bina kattar.....its my own choice
दुःख को कविता में रो देना
यह कविता की रात है
दुःख से लड़कर कविता लिखना
गुरिल्ला शुरुआत है.

-- कुमार विकल

Sunday, September 25, 2011

बेटियाँ कब माँ की भूमिका निभाना शुरु कर देती हैं

बिटिया दिवस पर पुरुषोत्तम अग्रवाल की एक अदभुत कविता........

"बारह बज गये, अब सो जाओ. सुबह छह बजे मुझे सोते नजर आना. यह नहीं कि मैं नीचे आऊं तो चार बजे सुबह पढ़ रहे हैं..... कोई बात हो तो मुझे बुला लेना, और हाँ, यह जो ली है, होम्योपैथिक दवा है, अब न कुछ खाना, न कुछ पीना....और सिगरेट तो....खबरदार..."

पता ही नहीं लगता, बेटियाँ कब माँ की भूमिका निभाना शुरु कर देती हैं....
Purushottam Agrawal धन्यवाद संदीप जी
Sandip Naik Sam आपकी कविता है या जीवन पुरुषोत्तम जी....................इतना सरल और सीधा अर्थ कि बस युही गुजर जाती दिल से कि बस!!!!
Purushottam Agrawal यह वाक्य जरूर कविता है- 'आपकी कविता है या जीवन...इतना सरल और सीधा अर्थ कि बस यूंही गुजर जाती दिल से...' एक बार फिर शुक्रिया संदीप ज

सब ठीक-ठाक ही दीखता है इस अल्लसुबह...


अपर्णा मनोज की कविताओं का मुहावरा एकदम अलग से पहचान में आता है. दुःख और उद्दाम भावनाओं के साथ एक गहरी बौद्धिकता उनकी कविताओं का एक अलग ही मुकाम बनाती हैं. कई-कई सवाल उठाने वाली ये कविताएँ मन में एक गहरी टीस छोड़ जाती हैं. आज प्रस्तुत हैं उनकी पांच कविताएँ- जानकी पुल.








सब ठीक ही है :

कहाँ कुछ बिगड़ा है ?
यूँ तो सब ठीक ही लगता है.

पड़ोस से उठने वाला मर्सिया
कनेर के गुलाबी फूलों के बीच से गुज़रा है
ज्यादा फर्क कहाँ पड़ा है ?

हवाएं कई पनडुब्बियों में समुद्र को भेद रही हैं
थोड़े जहाज़ों का मलबा दबा है
इतिहास के सन्निपात में रोते हुए बेदम हो गया है बचा हुआ वर्तमान.

भविष्य तो पाला हुआ हरा तोता है
रट लेगा तुम्हारी पुरा -कथाओं के अक्षर
चोंच में जो भरोगे वही कहेगा.
गले में बाँध लेगा लाल पट्टी सुन्दर
और जनतंत्र की जय कहेगा.

कुछ अधिक नहीं घटा है.
एक छोटा -सा ईश्वर है
अभी आँख भी नहीं सधी है उसकी
माँ के स्तन को टटोल रहा है
हाथ पर लगा दिठौना उसने काबिज़ करने से पहले जान लिया है
कि कभी भी हो सकता है उसका क़त्ल


फिर भी बहुत सारे पते हैं जिंदा
ख़ुदा न तर्स दूसरों के घरों के दरवाज़े पर अपना नाम लिखते
रिसती हुई साँसों में गुमशुदा की तलाश ज़ारी है अब भी
आंकड़ों से भर गया है धुंआं.

शहर तो उसी तर्ज़ पर नाच रहा है रक्कासा -सा
उम्मीद की गलियाँ नुक्कड़ों पर चाय पी रही हैं छूटे कस्बे के साथ .
गौरतलब कहाँ कुछ बदला है!

सब ठीक-ठाक ही दीखता है इस अल्लसुबह.


प्रसव के बाद:

खूब रात है
नींद भी गहरी है खूब
और सम्भावना है कि कोई सपना जीवित रह जाए
तुम्हारी आँखों के कोटर में.

वैसे बाहर गश्त पर सपेरों ने औंधा दी हैं अपनी बेंत की टोकरियाँ
छोड़ दिए हैं सर्प सन्नाटों के
टूटे हुए विषदंत में
अभी भी शेष रह गए हैं
ज़हरीली सफ़ेद गैस के संवाद
जंगल में इससे अधिक और क्या हो सकता है?

सपनों के अण्डों पर बैठी मादा
क्रेंग-क्रेंग करती है
सुबह से पहले दरक जाए उसका खून
और चीखती जनता का काफ़िला उड़ जाए डैने फैलाये
सूरज गोल -गोल आँख लिए देख रहा है मादा को
प्रसव के बाद की उम्मीद भी क्या है!

खेल:

तुम अपनी बंद मुट्ठियों से
हर बार वही खेल खेलते हो
जो अकसर पापा खेलते थे मेरे साथ.

उनकी कसी उँगलियों को खोलने
मैं लगा देती थी नन्हा दम
जबकि जानती थी कि वहाँ सिवाय खाली लकीरों के
और कोई कुबेर नगरी नहीं.
एक जमा हुआ काला तिल उनकी हथेली का
मेरी जीत का साक्षी रहता
बड़ा जादू था इस खाली होने के खेल में

औरतें पता नहीं किस अलीबबाबा की गुफा में बैठी
यूँ ही खेलती हैं खालीपन से.
चालीस चोर -सी जिन्दगी
और एक तिल्लिस्म सुख का
न जाने किस डिब्बे में बंद
हर आवाज़ पर एक तलाश शुरू होती है
ख़त्म होती है जो खाली मुट्ठी पर.


रुदालियाँ:
मैंने उन्हें देखा है
कब से छुड़ाती रही हैं
कभी न छूटने वाला, जिस्म और आत्मा पर चिपका : सदियों का बकाहन -दुःख.

रुदालियाँ जीवन की.
कच्ची नागफनियाँ हरी
जिनकी देह के पानी को हो जाना है शूल
आँखों में भर लेना है खून
कि जब टपके तो दरकने लगे किसी पुख्ता दीवार का सीना
और भीग जाएँ सीलन से नींव के पुराने ज़ख्म और दरख्तों की गहरी जड़.

पता नहीं, छाती पीट कह देना चाहती हैं अपनी किस व्यथा को
काले घाघरे , उससे भी ज्यादा गहरे काले ओढ़ने
नाक में बिंधी लौंग, कभी अपनी न सुनने वाले कान -
जिनमें नुमाया हैं पहचान बनाते बुन्दके, वे जब सिहरते तो काँप जाती पछुआ.

और इन सबके बीच ठहरा है लम्बे समय का मौन
जिसमें वे टिकी रहती हैं
बरसों पुराना रुदन लिए
अपनी छोटी जात के साथ
कितनी छोटी औरत बनकर.

वे किसी मुहर्रम-सी
न जाने किस कर्बला का दुख हैं?
लौटा लाता है समय उन्हें अपने ताज़िए के साथ
न जाने कैसी आवाज़ आती है ज़मीन से
कुछ दफ़न होने की.

हुज़ून हैं .
जिनकी पीड़ा को अंतहीन हो जाना है
उस काले नेगेटिव की तरह
जिसकी दुखती रग से गुज़र जाती है रोशनी और खड़ा हो जाता है मिथ्या छायाचित्र औरत का.


करुणा की कौन-सी नदी
जहां अंत हो जाना है तुम्हारे दुखों का

कौनसा महाभिनिष्क्रमण जहां यशोधरा तक लौट आए कोई बुद्ध.

रुदालियाँ हैं औरत के भीतर की .
भीगती हुई झील में तहनशीन
सूखी आँखों का तहज्ज़ुन आंसू .



(अमृता शेरगिल की प्रसिद्ध पेंटिंग्स )


तैलचित्र:

भारत का वह कौनसा आसमान , कैसी ज़मीन
फूलों पर चिपके वे कौनसे रंग
कैसी आत्माएं तितलियों की
कौनसे तहखाने जिनमें लेटा बुद्ध सुनता रहा बाहर से आती सुगबुगाहटें
दुखांत छायाओं की
कि जब वे बनती रोशनी के खून से
तो आदतन कोई अँधेरा पसर जाता और दूर बैठी वह
घोलने लगती रंग अपनी आठ बरस की आँखों की कटोरियों में .


बनफशी , नीली उसकी आँखें
जिनमें तैरती सफ़ेद पुतलियाँ अकसर बुना करती अपने भीतर चलती उन आकृतियों को
जो बैठी रहती उसके अथाह में
बिछाए बरौनियों की चटाई


न जाने कौनसे फूल पिरोने होते थे उन्हें
कि सूई चलती रहती समय के झड़े दर्द में
और कोई उदास मौसम गुँथ जाता गिरे पत्तों के साथ.


उसके अभिजात्य में उनका आना कैसा था


जैसे पेड़ों का श्राप है उनपर
कि रहेंगे उनके दुःख में हरे ज्यूँ रहता है पत्तों का रंग


कि जड़ों को अपने गहरे भूरे के साथ धंसना होता है
तब तक जब तक ज़मीन की निचली परत का पानी खींच न लाये
और सौंप दे कोंपल को उसका स्वत्व


आकाश का बकाहन कैसे पकड़ लाती हैं उनकी लटकी छातियाँ
जहां दूध में चिपका होता है कोई चीखता पुराना ज़ख्म


वे हमेशा एक ही तरह से झुकी रहती हैं
ममता के कोण पर .


जैसे वे कुछ पकड़ रही हों दूर होता
जैसे कोई छूट गई हो कामनाओं की गेंद सूरज के हाथ से
और धंस गई हो भूमि के निर्जन कोने में
जहां सीता की जिन्दगी के टुकड़े लथपथ पड़े रहे सदियों .


कुछ नहीं होना है शेरगिल . कुछ नहीं होना है .
बुडापेस्ट की सुबह पर ऊँघती शिमला की वह सांझ
जिसके कोहरे में गीले रहे तुम्हारे कैनवास .


छूती हूँ इनकी नसें तो टपकने लगता है लाल रंग
और भर जाती हैं वे नामालूम सी आकृतियाँ अपने ऋतुस्राव के साथ
कमज़ोर , ढलती , निस्तेज
क्या कहूँ अमृता
मेरी सारी शक्तियां जवाब दे गई हैं
और कुँए पर तैरने लगे हैं तैलचित्र
कांपते हुए .
सूरज गिर गया है अंधकूप में धप्प से .