Friday, November 23, 2012

प्रदेश टू डे में प्रकाशित आज मेरा व्यंग्य ........


प्रदेश टू डे में प्रकाशित आज मेरा व्यंग्य ........

मिथिलेश राय की एक प्रभावी कविता "हम ही है"

 

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Mithilesh Ray की एक प्रभावी कविता. अच्छी बात यह है इस युवा कवि से मेरा बहुत पुराना परिचय है और इसी ने संभवतः मेरा नाम आज से पन्द्रह साल पहले चाचू रखा था, बचपन में इसकी कवितायें हमने चकमक में छापी है लगातार.........एक बार दिल्ली में मुझसे मिलने आया था, आजकल यह प्रभात खबर में संपादन डेस्क पर है और उम्दा काम कर रहा है. बधाई मिथिलेश कि यहाँ -वहाँ छप रहे हो......अब किताब की तैयारी करो. Ashok Kumar Pandey विश्वविद्यालय से असुविधा मिल ही चुकी है बस अब किताब ही आना चाहिए.......बहरहाल...बधाई....
"हम ही है"

हम ही तोडते हैं सांप के विष दंत


हम ही लडते हैं सांढ से
खदेडते हैं उसे खेत से बाहर

सूर्य के साथ-साथ हम ही चलते हैं

खेत को अगोरते हुये
निहारते हैं चांद को रात भर हम ही
हम ही बैल के साथ पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं
नंगे पैर चलते हैं हम ही अंगारों पर
हम ही रस्सी पर नाचते हैं

देवताओं को पानी पिलाते हैं हम ही

हम ही खिलाते हैं उन्हें पुष्प, अक्षत
चंदन हम ही लगाते हैं उनके ललाट पर

हम कौन हैं कि करते रहते हैं

सबकुछ सबके लिये
और मारे जाते हैं
विजेता चाहे जो बने हो
लेकिन लडाई में जिन सिरों को काटा गया तरबूजे की तरह
वे हमारे ही सिर हैं
परिचय 
24 अक्टूबर,1982 ई0 को बिहार राज्य के सुपौल जिले के छातापुर प्रखण्ड के लालपुर गांव में जन्म । वागर्थ, परिकथा, नया ज्ञानोदय, कथादेश, कादंबिनी, साहित्य अमृत, बया, जनपथ, विपाशा आदि में अबतक बीस-पच्चीस कविताएं प्रकाशित। गद्य साहित्य में भी लेखन। बाल साहित्य में भी सक्रिय। गद्य व पद्य के लिए क्रमषः वागर्थ व साहित्य अमृत द्वारा युवा प्रेरणा पुरस्कार। कहानी कनिया पुतरा व् स्वर टन पर डाकूमेंट्री फिल्म बनने कि तैयारी , आजकल  प्रभात खबर में संपादन डेस्क पर। 
संपर्क-द्वारा, श्री गोपीकान्त मिश्र,जिलास्कूल,सहरसा-852201, (बिहार) 
मोबाइल-09473050546
 

Thursday, November 22, 2012

एक आदमी का गुस्सा.....

अगर इस बार संसद में सांसद नहीं बैठे और काम नहीं किया तो इन्हें हम जैसे लोगों को नैतिकता के उपदेश देने का कोई हक नहीं है साथ ही देश के सुप्रीम कोर्ट से निवेदन है कि इनकी सदस्यता सदनो से समाप्त कर दे ......सबके सब चैनलों पर बैठ कर ज्ञान बघार रहे है परन्तु संसद में बैठकर काम नहीं करना चाहते...............हद है मक्कारी और राजनीति की और बकवास करने की चाहे फ़िर वो भाजपा हो कांग्रेस हो या सपा हो या तृणमूल
या बसपा.................सारे मक्कार रात में चैनलों पर बैठकर बकवास करते है और एंकर और मीडिया के लोग भी फ़ालतू के सवाल करते है बजाय इन्हें सदन में बिठाने के घेर-घार कर ले आते है. इनका चैनलों पर बहिष्कार किया जाये, मीडिया कवरेज देना बंद कर दे और सुप्रीम कोर्ट इनसे पूछे कि क्या किया, या फ़िर सदन की कार्यवाही में लगे हमारे श्रम के रूपयों को इनसे वसूला जाये ....... सब लाइन पर आ जायेंगें...........माननीय मुफ्तखोर............एफ डी आई आदि सब चुतियापा है हम ऐसे लोगों को बरगलाने के लिए, साले मुफ्तखोर, काम नहीं करते साल भर और दिल्ली में बैठकर हमपर राज करना चाहते है और जे मीडिया वाले कम है हर माह लाखों की तनख्वाह खाते है, रोज सारी फ़ोकट की सुविधाएँ भकोसते है, मुफ्त की दारु और मुर्गा खाते है और आम आदमी के सवाल पूछते है इन मुफ्तखोरों से ........इन औरतों को देखो जो सांसद बनी फिरती है उनके चश्मे देखो लाखों के है.................साडी देखो, लटके झटके देखो............
संसद तो अब इनको चलानी ही पड़ेगी वरना हम इन्हे बताएँगे कि वोट कैसे मिलते है................ना चने चबवा दिए तो देख लेना ..........
परधान मंत्री इनको पटाने के लिए घर बुलाकर खाना खिलाते है दस हजार रूपये की थाली, इनके संडास पैतीस लाख के है, इअनके पेट कभी भरेंगे और साले फ़िर भी साल में एक महीना संसद में बैठकर बातचीत करके निर्णय नहीं ले सकते, तो बदल दो यह परजातंत्र की व्यवस्था ..........मर तो हम रहे है महंगाई में और पीस रहे है सरकारी दफतरों में जहां हरामखोर अधिकारी बैठे है जो रूपया खाए बिना बाप को बाप भी नहीं कहते तो क्या फ़ायदा ऐसी व्यवस्था का.........

आओ कसाब को फांसी दे - अंशु मालवीय

उसे चौराहे पर फाँसी दें !
बल्कि उसे उस चौराहे पर फाँसी दें
जिस पर फ्लड लाईट लगाकर
विधर्मी औरतों से बलात्कार किया गया
गाजे-बाजे के साथ
कैमरे और करतबों के साथ
लोकतंत्र की जय बोलते हुए

उसे उस पेड़ की डाल पर फाँसी दें
जिस पर कुछ देर पहले खुदकुशी कर रहा था किसान
उसे पोखरन में फाँसी दें
और मरने से पहले उसके मुंह पर
एक मुट्ठी रेडियोएक्टिव धूल मल दें

उसे जादूगोड़ा में फाँसी दें
उसे अबूझमाड़ में फाँसी दें
उसे बाटला हाउस में फाँसी दें
उसे फाँसी दें.........कश्मीर में
गुमशुदा नौजवानों की कब्रों पर

उसे एफ.सी.आई. के गोदाम में फाँसी दें
उसे कोयले की खदान में फाँसी दें.
आओ कसाब को फाँसी दें !!

उसे खैरलांजी में फाँसी दें
उसे मानेसर में फाँसी दें
उसे बाबरी मस्जिद के खंडहरों पर फाँसी दें
जिससे मजबूत हो हमारी धर्मनिरपेक्षता
कानून का राज कायम हो

उसे सरहद पर फाँसी दें
ताकि तर्पण मिल सके बंटवारे के भटकते प्रेत को

उसे खदेड़ते जाएँ माँ की कोख तक......और पूछें
जमीनों को चबाते, नस्लों को लीलते
अजीयत देने की कोठरी जैसे इन मुल्कों में
क्यों भटकता था बेटा तेरा
किस घाव का लहू चाटने ....
जाने किस ज़माने से बहतें हैं
बेकारी, बीमारी और बदनसीबी के घाव.....

सरहद की औलादों को ऐसे ही मरना होगा
चलो उसे रॉ और आई.एस.आई. के दफ्तरों पर फाँसी दें
आओ कसाब को फाँसी दें !!

यहाँ न्याय एक सामूहिक हिस्टीरिया है
आओ कसाब की फाँसी को राष्ट्रीय उत्सव बना दें

निकालें प्रभातफेरियां
शस्त्र-पूजा करें
युद्धोन्माद,
राष्ट्रोन्माद,
हर्षोन्माद
गर मिल जाए कोई पेप्सी-कोक जैसा प्रायोजक
तो राष्ट्रगान की प्रतियोगिताएं आयोजित करें
कंगलों को बाँटें भारतमाता की मूर्तियां
तैयारी करो कम्बख्तो ! फाँसी की तैयारी करो !

इस एक फाँसी से
कितने मसले होने हैं हल
निवेशकों में भरोसा जगना है
सेंसेक्स को उछलना है
ग्रोथ रेट को पहुँच जाना है दो अंको में

कितने काम बाकी हैं अभी
पंचवर्षीय योजना बनानी है
पढनी है विश्व बैंक की रपटें
करना है अमरीका के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास
हथियारों का बजट बढ़ाना है...
आओ कसाब को फाँसी दें !

उसे गांधी की समाधि पर फाँसी दें
इस एक काम से मिट जायेंगे हमारे कितने गुनाह

हे राम ! हे राम ! हे राम !..."

--अंशु मालवीय

Anshu Malviya

मैं एक आखिरी गीत अपनी धरती के लिये गाना चाहता हूँ ..अनुज लुगुन

भाई अनुज लुगुन  हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि है और बेहद संभावनाशील भी. उनकी  कवितायें एक नया मुहावरा और व्यापक संसार लेकर आती है जो हमें अपने आदिम जीवन से ना मात्र जोडती है बल्कि समाज में हो रहे बदलावों से इस पुरे सन्दर्भ पर क्या असर पड रहा है इसकी भी निष्पक्ष परीक्षा करती है. निश्चित ही यह नयापन, नया गढना, नया मुहावरा और नया विचार एक जटिल प्रक्रिया है जिसे स्वीकारने में अभी भी हिन्दी जगत  में कई प्रकार की दिक्कतें है. खासकरके हिन्दी की परम्परागत कविता के फलक पर कविता को तौलने की प्रवृति अभी  बहुत खुली नहीं है. पर समय को लगभग चुनौती देते हुए अनुज काल से होड ले रहे है और सारे दबावों के बावजूद अपनी सशक्त उपस्थिति से हम सबको चमत्कृत कर रहे है इन दिनों. बधाई भाई अनुज.....आपके लिए प्रस्तुत है अनुज लुगुन की एक नई कविता...

मैं घायल शिकारी हूँ
मेरे साथी मारे जा चुके हैं
हमने छापामारी की थी
जब हमारी फसलों पर जानवरों ने धावा बोला था

हमने कारवाई की उनके खिलाफ
जब उन्होंने मानने से इनकार कर दिया कि
फसल हमारी है और हमने ही उसे जोत – कोड कर उपजाया है
हमने उन्हें बताया कि
कैसे मुश्किल होता है बंजर जमीन को उपजाऊ बनाना
किसी बीज को अंकुरित करने मे कितना खून जलता है
हमने हाथ जोडे ,गुहार की
लेकिन वे अपनी जिद पर अडे रहे कि
फसल उनकी है,
फसल जिस जमीन पर खडी है वह उनकी है
और हमें उनकी दया पर रहना चाहिये

हमें गुरिल्ले और छापामार तरीके खूब आते हैं
लेकिन हमने पहले गीत गाये
माँदर और नगाडे बजाते हुए उन्हें बताया कि देखो
फसल की जडे हमारी रगों को पहचानती हैं ,
फिर हमने सिंगबोंगा से कहा कि
वह उनकी मति शुद्ध कर दे
उन्हें बताये कि फसलें खून से सिंचित हैं ,

और जब हम उनकी सबसे बडी अदालत में पहुँचे
तब तक हमारी फसलें रौंदी जा चुकी थीं
मेरा बेटा जिसका व्याह पिछ्ले ही पूरणिमा को हुआ था
वह अपने साथियों के साथ सेंदेरा के लिये निकल पडा

यह टूट्ता हुआ समय है
पुरखों की आत्मायें ,देवताओं की शक्ति छीन होती जा रही हैं
हमारी सिद्धियाँ समाप्त हो रही हैं
सेंदेरा से पहले हमने
शिकारी देवता का आह्वान किया था लेकिन
हम पर काली छायाऐं हावी रहीं
हमारे साथी शहीद होते गये

मैं यहाँ चट्टान के एक टीले पर बैठा
फसलों को देख रहा हूँ
फसलें रौन्दी जा चुकी हैं
मेरे बदन से लहू रिस रहा है
रात होने को है और
मेरे बच्चे , मेरी औरत
घर पर मेरा इंतजार कर रही हैं
मैं अपने शहीद साथियों को देखता हूँ
अपने भूखे बच्चे और औरतों को देखता हूँ
पर मुझे अफसोस नहीं होता
मुझे विश्वास है कि
वे भी मेरी खोज में इस टीले तक एक दिन जरुर पहुंचेंगे

मैं उस फसल का सम्मान लौटाना चाहता हूँ
जिसकी जडों में हमारी जडें हैं
उसकी टहनियों में लोटती पंछियों को घोंसला लौटाना चाहता हूँ
जिनके तिंनकों में हमारा घर है
उस धरती के लिये बलिदान चाहता हूँ
जिसने अपनी देह पर पेडों के उगने पर कभी आपत्ति नहीं की
नदियों को कभी दुखी नहीं किया
और जिसने हमें सिखाया कि
गीत चाहे पंछियों के हों या जंगल के
किसी के दुश्मन नहीं होते

मैं एक बूढा शिकारी
घायल और आहत
लेकिन हौसला मेरी मुठिट्यों मे है और
उम्मीद हर हमले में
मैं एक आखिरी गीत अपनी धरती के लिये गाना चाहता हूँ ..
 

-अनुज लुगुन 18/11/12

नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा 16

आज फ़िर वही नदी है वही पानी, वही उद्दाम वेग, वही धाराएं, वही बहाव, वही उठती-गिरती-पडती लहरें ........सब कुछ गुत्थम गुत्था, आपस में और ऐसे बिखरे और उलझे हुए मानो शब्दों का कोई जाल हो जहां हर कोण से एक नया अक्स उभरता हो.........चारों ओर रेत ही रेत है किनारे पर, किनारे पर पसरी आदमियत की गन्दगी और सदियों से बोझानुमा ढोती हुई ये रेवा कहाँ से इतनी शक्ति ले आई है कि इस सबको अपने अंदर समेट कर बहती जा रही है. दूर कही सूरज डूबने की पुरजोर कोशिश कर रहा है...........लालिमा भी कोने में जाकर दुबक गई है झुरमुट में. सब कुछ अँधेरे में होने को है और एक लाश आई है अपने जीवन की पूरी परिक्रमा करने के बाद और अब यह मनुष्य योनी भी खत्म हो गई आज. जो साथ आये है उसके परिजन है एक भाई है जो बेहद अशांत और उद्दीप्त है पता नहीं क्या बडबडा रहा है कह रहा है "बेबी को ऐसा नहीं करना था .............मालूम नहीं पड़ा किसी को, सामने रहता था और यह सब कैसे हो गया, यह घाट के उस छोर का मकान था जहां मोहल्ले की गली का कोना बंद हो जाता था और फ़िर शुरू होता था भय, जुगुप्सा और घृणा का विस्तार.....बस हमारी बेबी वही धंस गई उसके साथ इस सामने वाले कमीने ने कही का नहीं छोड़ा हमें......कब यह मोहल्ले के रिश्ते गले के उस बंद कोने में जाकर एकाकार हो गये और बेबी के भीतर एक जिंदगी जन्म लेने लगी......कल यानी उसके जीवन की आख़िरी रात को सबके साथ देर तक वो टीवी देख रही थी, पाँव से पायल उतार कर उसने भाभी को दे दी और कहा कि अब तो हो गई है दीवाली, छनछन से घर में कोहराम मचता है और मेरे कानों में कुछ और ही गूंजता है......."  लाश के साथ आये लोग लकड़ी जमा कर रहे थे घी, आटा, काले तिल, जौ, पूजा की सुपारी, हार-फूल, चन्दन, पान का बीड़ा, जैसी तैयारियां चल रही थी लाश के मुँह में पान का बीड़ा ठूंसा जा रहा था. भाई लगभग विक्षिप्त अवस्था में फ़िर तेज आवाज में सामने वाले को ललकार रहा था कि साले ने हमें कही का नहीं छोड़ा, सात भाईयों में यही सबसे घटिया निकला और हमारे खानदान पर ऐसा छींटा मारा है कि यह दाग सात पुश्तों तक नहीं धुलेगा....और बेबी उसे क्या पडी थी......कम से कम बता तो देती, कल रात जब अपनी पायल उतार रही थी तो कितनी गहरी हो गई थी उसकी आँखें और धंस गई थी गहरे भीतर, ना जाने कितने दिनों तक वो बर्दाश्त करती रही यह सब, हार गई होगी उसे समझाकर तब कही एक साथ दो जीव ह्त्या का पाप अपने सर लेना स्वीकार किया होगा........सब के सब बहरे हो गये थे ऊपर टीवी देखते हुए...क्या एक आह भी नहीं निकली होगी बेबी के मुँह से एकदम से झूल गई रस्सी पर और जब माँ ने खोला कमरा तो सीधे माँ की गोद में ही जा गिरी......यह एक वज्राघात था, सन्निपात था.... हम जैसे लोगों के लिए जो कभी अपनी इज्जत को ही सबसे ज्यादा मानते थे और आज भी मानते है, पर बेबी यह तूने क्या कर दिया.......कल तो मै भी पागल था और खूब गलियाता रहा उसकी देह को और आवेश में आकर एक लात भी जड़ दी थी उसके पेट पर तभी खून का स्रोता बह निकला था......एक मांस का लोथडा .........और यकीन मानो वह देखकर सारा माजरा समझ आया था....... ओह.........मै भी जानवर बन गया.....पर खेल तब समझ आया जब इसी बंद गली के आख़िरी कोने में बसे हमारे घर के सामने वाला वह गायब हो गया.......बेबी के पास से कुछ मिला था हाथ की मुठ्ठी में कुछ दबा सा पड़ा था.......आज सुबह पोस्टमार्टम के बाद यह मोहल्ले में हवा की तरह फ़ैल गया सब.......और अब सब कुछ करते- करते शाम हो आई है.........ये रेवा नदी ने कोई सुख नहीं दिया साहब, कोई सुख नही दिया, जब भी दिया आंसू और ग़म ही  दिए है .....लाश धू-धू कर जलने लगी है साथ आये लोग शांत होकर बीडी पीने लगे है और गप्प लगाने लगे है और कपाल क्रिया के बाद सब नर्मदा के जल में नहा रहे है भीगे बदन और फिजां में एक ही आवाज गूँज रही है नर्मदे हर, हर, हर..........(नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा 16)

नर्मदा के किनारे आख़िरी कुछ और दिन..............


 ये नर्मदा किनारे के आख़िरी कुछ दिन है और लगता है कि सब कुछ थम गया है...........पानी, रेत, हवा, भीड़, पूजा-पाठ, घाट, यहाँ तक कि भगवान भी ........लगता है एक सर्द सी जिंदगी इन घाटों पर काईनुमा जम गई है जहां पाँव रखते ही फिसल जायेंगे कदम और फ़िर अपरान्ह की इस चला-चली की बेला में सब कुछ शांत हो गया है.....अब पानी में फेंका पत्थर भी लहरों को पसराता नहीं है, कही कोई जादू होता नहीं दिखता......दूर कही रेतघाट
पर जब एक स्त्री की लाश जलती है तो धुएं के बादल देर तक पानी के ऊपर छाये रहते है और पूछते है कि ये क्यों........जब एक लाश और किसी दूर किनारे पर जलती है तो हवाएं बेचैन हो जाती है...........पर एक उन्माद में डूबा यह पन्द्रह साल का संतोष शर्मा गुनगुनाता है "चंद्रचूड एक राजा जिसकी विपदा हरी, ओम  सत्यनारायण स्वामी.............."
 

Monday, November 12, 2012

नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा 15

जब वह समय आया था और वह भी बिछडने का तो बस एक ऐसा तगड़ा झूठ बोला और नाटक किया कि सब कुछ वैसा ही होता गया जैसा मै चाह रहा था पर आज ना जाने क्यों...............वो सब कह देने को मन करता है और जी करता है कि कह दूँ कि वो सब एक झूठ था, नाटक था, ताकि वो वहाँ जब जाये तो मेरी स्मृतिया विलोपित हो जाये एकदम से और फ़िर दिमाग वही करें जो करने के लिए उसे वहाँ भेजा गया था क्या मै भूल पाया हूँ इन चार महीनों में पांच अगस्त और उसके पहले.............के समय को.......पर आज तो बारह नवंबर है कब तक चलेगा यह झूठ .............किशोरी ताई ने बचपन में सिखाया था कि सारी दुनिया को बेवक़ूफ़ बनाओ पर अपने आप से झूठ मत बोलो और आज यह कन्फेस करता हूँ कि वो सब नाटक था अपने आपको समझाने की झूठी तसल्ली और तुम्हे चैन से रहने देने के लिए एक नाटक.............ताकि उस मायावी दुनिया में रच बस जाओ और सब सीख लों...............नर्मदा में पानी बहुत तेजी से गुजरा है कई बार मैंने बाढ़ देखी है- अपने कमरे ही में, और शहर में चलती नाव भी-- पर जो जीवन का जोखिम मै उठा रहा हूँ तुम्हारे बगैर, वो कैसे किसी बाढ़ में बह जाने देता यह मेरे-तुम्हारे सांझे सुख थे , ये मेरे निजी  दुःख थे जो मैंने यहाँ-वहाँ जा-जाकर इकठ्ठा किये थे तुम्हारे साथ और उन्ही सभी यादों के घेरे में रहने को ताउम्र रहने को अभिशप्त मै कैसे रह रहा हूँ.............यह बूझ पाओगे कभी??? लौट आओ एक बार लौट आओ उस किनारे से हम सब जान रहे है कि एक बड़ा पुल बन गया है इस उद्दाम और वेगवती  नदी पर............दो पटरियोंनुमा हो गया है जीवन अब पर क्या कही कोई संभावना नहीं ............नहीं, नहीं, लौट आओ और कह लेने दो एक बार फ़िर मुझे नर्मदे हर, हर, हर............!!! (नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा 15)

Sunday, November 11, 2012

देवास के मोहल्ले-3

आज तों गजब हो गया बुला लिया उन्होने फोन करके और फ़िर पुरी दोपहरी निकल गई. हीरा थी हीरा...........वो सात-आठ भाई बहनों में सबसे छोटी और लाडली, पढ़ी लिखी तों खास नहीं थी पर उस जमाने में मेट्रिक पास हुई तों सरकार ने बुलाकर नौकरी दे दी उसे..........बाद में पढाई की एम ए तक पुरे लक्ष्मीपुरे में पहली औरत थी एम ए करने वाली.....पर किस्मत देखो अपना तों जीवन यूँही निकल गया उसका , नौकरी, फ़िर फूटबाल खेलने भाई का परिवार, छोटा बच्ची, बड़े विधुर भाई, मुम्बई और पूना में रह रहे भाई बहनों के बच्चों को यही इसी लक्ष्मीपुरे में पालती रही..... शादी की तों कोई उम्र होती है...... निकलती गई, जिनगी भर वो पास के एक गाँव में आती जाती रही, नजर के टेम्पो पर उसकी उम्र का आधा हिस्सा निकल गया.......नजर टेम्पो वाले का भगवान भला करे.......यही मोहसिन पुरे में रहता था उसके वालिद तों कुछ और काम धंधा करते थे पर नजर ने दो टेम्पो डाल दिए और अल्लाह कसम चल निकले.....हाँ तों वो कह रही थी कि उसने शादी ब्याह किया नहीं, गाँव से जब शहर में आई इसी देवास में, तों जिस स्कूल में बदली हुई थी वहाँ एक खुर्राट माताजी थी जो साधू संतों का भेष ओढकर बैठती थी उसने इसे हेड मास्टरनी का चार्ज नहीं दिया. बस एक कुर्सी और दो-दो हेड मास्टरनी........ पुरे सुतार बाखल के लोग ये तमाशा रोज देखते, पर एक दिन मर गई माताजी, बस फ़िर क्या बन गई वो हेड मास्टरनी. हाँ एक बड़ी मजेदार बात थी उसने पचास में शादी की थी और उस जमाने के अखबारों में खूब छपा था ये किस्सा. उसका दूल्हा कोई नहीं एक साधक था, वो क्या रजनीश का साधक.......खूब किताबें थी बाबू उसके घर में अकेला था दोनों बहनों की शादी हो गई थी और ये भी था तों मास्टर पर एकदम अकेला रहता था और शाम को उस रजनीश के फोटू के सामने अगरबत्ती लगाकर नाचता था और फ़िर देवास में आर्य समाज के पास भी ऐसे ही कुछ लोंग रहते थे जो ऐसा ही नाच करते थे ये अपने आप को साधना करने वाले बताते थे.....कोई कहता कि इसने प्रेम विवाह किया था उस मास्टर से, पर चेहरा देखकर तों लगा नहीं कि ये ऐसा कर सकती थी. शादी के बाद ये उसके पास रहने चली गई, जल्दी जल्दी में एक मकान बनवाया वहाँ दुर्गाबाग में..पर किस्मत देखो बाबू...... बुढापे की शादी कोई फलती है क्या ??? मर गया वो खसम और फ़िर ये अकेली रह गई ननद ने और उसके बच्चों ने कोर्ट-कचहरी में फंसा दिया और धमकी देकर इसे घर से निकाल दिया..... फ़िर आ गई पीहर में जहां अब जिम्मेदारियां थी और कुछ नहीं......बस घिसती रही अपने आप को लथडते हुए जैसे तैसे नौकरी की और यही से राजबाड़े से रिटायर्ड हो गई, तब से घर में बंद है.  इधर कुछ बाहर जाने लगी है- इंदौर, पूना, मुम्बई......अब खसम की पेंशन और उसकी खुद की पेंशन मिलती है...... आज तों रूपया है पैसा है पर कंजूस हो गई है.  भाई भी एक-एक करके मर गये, बस एक बचा है.......वो आ जाता है दो तीन साल में झाँक जाता है पर उसके मन में भी काला चोर है- उसे हिस्सा चाहिए इस बड़े मकान का और बाकी भाईयों के बच्चे भी चक्कर लगाते है, इसलिए पर जब तक ये बैठी है ना तब तक किसी में हिम्मत नहीं, क्योकि किया धरा तों इसका है सब.....आज ही देखा मैंने उसे जा रही थी- अपनी भांजियों  के साथ, दो की शादी नहीं हुई अभी तक....... बुढा गई है एकदम दोनों की दोनों, बहुत नखरे किये इन भांजियों ने जवानी में...... छोरे तों मिले थे पर....मुझे लगा कि अब फ़िर एक नई कहानी निकलने वाली है और मै धीरे से घने काले होते बादलों को देखकर उठ गया. चाय का प्याला कब ठंडा हो गया था मुझे नहीं पता पर कमरे में भाप के बादल तैर रहे थे और मुझे लगा कि ये भाप के बादल है या उन आंसूओं के जो कभी बह नहीं पाए......(देवास के मोहल्ले-3)

Saturday, November 10, 2012

देवास के मोहल्ले-2

जब जाता था एक नई कहानी और फ़िर कहानी से कहानी निकलती रहती थी, और वो अनथक  कहते रहती आज ही वो सुना रही थी सुहास की बात- जो उसी मोहल्ले के बाड़े में रहती थी, रणदिवे मास्टर की बहन जिसकी शादी इंदौर में एक बेंक वाले से हो गई, बाई ने ही तों बताया था रिश्ता...... हमारी बाई बड़ी मददगार थी सबकी और महाराज साब के ड्राईवर  को हमारी बाई ने ही सुझाया था कि जब महाराज का मूड ठीक हो तब जमीन की बात कर लेना और सच में एक दिन ड्राईवर साब ने महाराज को जमीन की बात में उलझाकर ये मोती बंगले का प्लाट अटका लिया, महाराज साब तों थे ही धूत नशे में, दे दिया प्लाट, पर बाद में जब महाराज साब नहीं रहे तों खूब जमके लड़ाई हुई, अब ड्राईवर साब तों नहीं रहे, छोरे यहाँ-वहाँ  फेक्ट्रियों में काम करते रहे एक दिन मालूम पड़ा कि ये प्लाट अपना है, तों ले देकर अपने नाम करवा लिया -दो पटवारियों को खूब खिलाया और बस रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली............वो सुहास......? अरे हाँ वही तों कह रही हूँ............सुहास की शादी में ये दोनों लड़कों ने खूब काम किया था--- बाड़े की लडकी की शादी और ये काम ना करें..... ऐसा हो ही नहीं सकता और ये पूरी रात लगे रहे हमारा बाबा, रमेश, मुक्कु, बब्या, अशोक और सब थे सुहास की शादी में, पर सुहास सब भूल गई, इन छोरों को ना कभी मदद की, ना पानी का एक प्याला पिलाया इंदौर में, जब देवास में मोहल्ले में आती तों फिएट कार से ही आती थी, उसकी खूब जोर से भोंगा बजाती और सबको बताती कि ये कार उसके पति ने तीस हजार में खरीदी है सेकेण्ड हेंड पर मजा आता है.........सुहास ड्राईवर साब के बच्चों को गलियाती और कहती इनके बाप ने महाराज साब को दारू पिलाकर जमीन हड़प ली, पर ये दोनों शरीफ चुप रहते क्योकि मोहल्ले की लडकी जमाई के साथ आती, बस खून का घूँट पीकर रह जाते ........अब देवास के बाड़े का जमाई तों सबका जमाई होता था, पुरे देवास का..... सुहास तों सबको बेवक़ूफ़ समझती थी उसे लगता था कि बेंक में काम  करने वाला उसका पति दुनिया का सम्राट है पर एक दिन जब इंदौर के "विश्व भ्रमण" में खबर छपी कि उसके पति का सहकारी बेंक घपलों के चलते बंद हो गया तों पुरे मोहल्ले के लोग देर रात तक सुहास और उसके पति के बारे में बात करते रहे और उसी भीड़ में हमारी इंदु भाग गई थी उसी रात को....... हमारी इंदु मतलब किसन  भैया की लडकी उस लंगड़े के भाई के साथ, बस क्या था पुरे मोहल्ले के लोगों ने उस घर की ओर से मुँह फेर लिया था, किसन भैया तों किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहे थे उस रात के बाद......... हाँ सुहास एक बार और आई थी और चली गई, फ़िर कभी पलट कर नहीं आई...........ड्राईवर के दोनों बच्चे आज खुशहाल है खूब बड़ा कारोबार है उनका, वे सुहास की मैय्यत में नहीं गये कह रहे थे क्या जाना ऐसी घमंडी औरत के यहाँ, जो शादी के बाद एक बच्चा भी पैदा नहीं कर सकी, पति साला नकली निकला, बेंक के काले कारनामों में पकड़ा गया, और हमें गाली देती थी, अरे थू है ऐसी औरतों पर .....सुहास कह रही थी.......कि वो नीला है ना अनिल की पत्नी....उनकी नई कहानी शुरू हो रही थी और मै सोच रहा था सुहास, ये दोनों बड़े उद्योगपति और संभ्रांत लोगों के बारे में, बाड़ा जो अब बाड़ा ही नहीं रहा बस एक याद है तबेले की जिसे पायगा कहते थे ...और महाराज तों सिर्फ अब ई एम फास्टर के उपन्यासों में ही दर्ज है ...... ( देवास के मोहल्ले-2)

देवास के मोहल्ले - 1

तराना के बड़े घर को छोड़कर वो आ गई थी यहाँ अपने दोनों लडको और एक बेटी के साथ, धीरे धीरे उसने दोनों बच्चों को पढ़ाया पर क्या हुआ इंटर करके भी नौकरी नहीं मिली, फ़िर उसका बचा-खुचा रूपया भी खत्म हो गया भैया, घर में मरद मर गया था कर्जा था खूब सारा सो घर बेचा और यहाँ माँ चामुंडा के कदमों तले आ गई थी पन्द्रह बरस पहले..............छोटी माई के घर में रही किराए की खोली में पचहत्तर रूपये  देती थी खोली के, ना बिजली ना पानी बस जैसे तैसे जी रही थी............इसी बजरंग पुरे में भिया क्या बताऊँ.......छोरी की शादी की और उस छोरी का भाग देखो बाबू लड़का मंडी में हम्माल था- सो निभा ले गया काली छोरी को भी वरना लडके मिलते कहा है ऐसे चरित्तर वाले और उस बुढिया के दोनों लडके इंटर करके भी कमा नहीं पाए यहाँ - वहाँ सिंधियों और बनियों की दुकानों पर काम करते रहे..... यही एक-डेढ़ हजार कमा लेते थे पर फ़िर भी बुदिया ने शादी कर दी दोनों की, बहुएं आई तों वो पुरे मोहल्ले में रोटी-पानी करने लगी फ़िर एक टिफिन सेंटर पर लग गई दो हजार नगद मिलते थे और खाना अलग.............फिरी में........हाँ बुढिया भी पुरे मोहल्ले में झाडू पोछा करती थी पर रूपये का लालच आ गया था उसके मन में पिछले कई दिनों से तीन सौ माँगने लगी थी ..........मैंने तों किच-किच  के कारण भगा दिया था कहती थी कि नाती पोते पढ़ रहे है, एवरेस्ट स्कूल की फीस बढ़ गई है, तों मै भी झाड़ू- पोछे के ज्यादा लूंगी....अरे फीस बढ़ने से हमें क्या हम क्यों ज्यादा दे रोज-रोज की किच-किच थी. पर थी भली औरत ये बात तों एकदम सई है बाबू........कल रात भी मैंने देखा कि घर का कोना कोना साफ़ कर रही थी वो अकेली और आज सुबह इन्होने, .ये सामने वाले उपाध्याय के देवर ने बताया कि वो रात को मर गई, सर फट गया भैया, सरकारी अस्पताल ले गये, अरे कोई पूछता है इन गरीबों को........... कोई मुआ डाक्टर भी नहीं था रात को अस्पताल में, सो, बस लाश ही लेकर वापिस आये दोनों लडके, बहुए रात भर  रोई तों नहीं हाँ सुबह बहुत नाटक किया रोने का........अब सई सांझ के मरया को कोई कद लक रोवे बाबू ? बस ले गये बुढिया को..... परतापी थी बहुत..... तराने से गाड़ी भर-भर के लोग आये थे. पहली बार मोहल्ले में इतनी गाडियां देखी हमने!!!!!! उस बुढिया में क्या था, पता नहीं, पर बहुत भीड़ थी उसकी मैय्यत में ......मुझे तों उसके मई महीने के डेढ़ सौ रूपये भी देना थे, बस पन्द्रह दिन काम किया था उसने बर्तन धोने  का, पर हम तों दे देंगे पुरे पैसे, ऐसे मरे हुए लोगों के पैसे थोड़े ही  रखेंगे..... हम भी संस्कारी लोग है.......और यही बजरंगपुरे में जिए है यही मरेंगे. हाँ छोटी माई का घर सुना हो गया है अब और चिंता है तों रज्जू की कि अब किराया कम हो जाएगा उसका..............नाम क्या था उस बुढिया का पता नहीं, हम तों तराने वाली बाई कहते थे, नाम क्या था ???  ये क्यों पूछ रहे हो बाबू.........अरे करना क्या है नाम जानकर उसका...... सिर्फ पन्द्रह बरसों से तों सामने रह रही थी अकेली अपने मरे हुए मर्द के बाद बचे परिवार को लेकर......उनका सिसकना और प्रलाप जारी था और मै सोच रहा था उस बुढिया के बारे में जो बगैर कोई कहानी कहे यूँही गुजर गई चुपचाप.............( देवास के मोहल्ले -1)

Wednesday, November 7, 2012

हम सबके दूलारे और प्यारे कसाब भैया- कांग्रेस और भाजपा के बीच सही का सेतु

 
कोई बताएगा कि हम सबके दूलारे और प्यारे कसाब भैया कैसे है.........मै थोड़ा कन्फ्यूज हो गया कसाब भिया लिखूं या कँवर साहब या जमाई राजा या कुछ और............


मुझे तों लगता है कि देश को इस समय एक तटस्थ और पंथ निरपेक्ष आदमी की जरुरत है जो कांग्रेस और भाजपा दोनों के बीच सही और लक्ष्य आधारित सेतु का काम कर पाए, और सबक्को समां दृष्टि से देखे........ तों क्यों ना ये काम अपने ही देश के रूपयों -पैसों पर पले और तंदुरुस्त हुए कसाब भैया को इतना महत्वपूर्ण दायित्व दे दिया जाये.........और सबसे बढ़िया है कि अन्ना, अरविंद, वी के सिंह, या बहन मायावती, मुलायम, अमर सिंह, राम जेठमलानी या ऐसे किसी भी पार्टी या नेता को आपत्ति नहीं होगी, यहाँ तक कि मीडिया को भी नहीं होगी. और तों और पाक से रिश्ते सुधरेंगे, अमेरिका से सम्बन्ध प्रगाढ़ होंगे और बाकी पूरी दुनिया के सामने एक बढ़िया वाले बोले तों झकास वाली छबि उभरेगी..हमारी... सई है कि नही भाई लोगों और बहन लोगों......??? और फ़िर चीन भी डर जाएगा........क्यों भिया .......


देखो एकदम कूटनीतिक सुझाव एकदम मुफ्त में दे रहा हूँ फ़िर मत कहना कि देश हित में मैंने कुछ किया नहीं.........खैर मै तों हर पल हर बखत "कसाब भिया" के लिए दुआएं करता रहता हूँ क्योकि जब तक वो सुरक्षित है हम सब महफूज है............

Tuesday, November 6, 2012

जितेन्द्र श्रीवास्तव की ये ताज़ा कवितायेँ

जितेन्द्र श्रीवास्तव की ये ताज़ा कवितायेँ कुछ दिनों पहले मेल से मिलीं. उनकी कविताओं से मेरा नाता पुराना है - गोरखपुर के दिनों का. बहुत जल्दी शुरू करके और लगातार बहुत अच्छा लिखते हुए वह अब उस मुकाम पर हैं जहाँ परिचय देने की आवश्यकता नहीं होती. स्मृति उनकी कविताओं का हमेशा से एक बड़ा स्रोत रही है. अपने गाँव-क़स्बे को लगातार अपनी कविताओं में संजोते हुए उन्होंने उनसे अपने समय की बड़ी और व्यापक विडम्बनाओं के पर्दाफ़ाश की कोशिश की है. यहाँ भी एक पूर्व राजघराने की कोठी के मैदान के सार्वजनिक स्थल से निजी संपत्ति में तब्दील होने का जो एक दृश्य उन्होंने खींचा है वह हमारी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का एक बड़ा बिम्ब प्रस्तुत करता है. 

चुप्पी का समाजशास्त्र
उम्मीद थी 
मिलोगे तुम इलाहाबाद में
पर नहीं मिले
गोरखपुर में भी ढूँढा
पर नहीं मिले
ढूँढा बनारस, जौनपुर, अयोध्या, उज्जैन, मथुरा, हरिद्वार
तुम नहीं मिले
किसी ने कहा
तुम मिल सकते हो ओरछा में
मैं वहां भी गया
पर तुम कहीं नहीं दिखे
मैंने बेतवा के पारदर्शी जल में
बार-बार देखा
आँखे डुबोकर देखा
तुम नहीं दिखे
तुम नहीं दिखे
गढ़ कुण्ढार के खँडहर में भी
मैं भटकता रहा
बार-बार लौटता रहा
तुमको खोजकर
अपने अँधेरे में
न जाने तुम किस चिड़िया के खाली खोते में
सब भूल-भाल, सब छोड़-छाड़
अलख जगाये बैठे हो
ताकता हूँ हर दिशा में
बारी-बारी चारो ओर
सब चमाचम है
कभी धूप कभी बदरी
कभी ठंढी हवा कभी लू
सब अपनी गति से चल रहा है
लोग भी खूब हैं धरती पर
एक नहीं दिख रहा है
इस ओर कहाँ ध्यान है किसी का
पैसा पैसा पैसा
पद प्रभाव पैसा
यही आचरण
दर्शन यही समय का
देखो न बहक गया मैं भी
अभी तो खोजने निकलना है तुमको
और मैं हूँ
कि बताने लगा दुनिया का चाल-चलन
पर किसे फुर्सत है
जो सुने मेरा अगड़म-बगड़म
किसी को क्या दिलचस्पी है इस बात में
कि दिल्ली से हज़ार किलोमीटर दूर
देवरिया जिले के एक गाँव में
सिर्फ एक कट्ठे ज़मीन के लिए
हो रहा है खून-खराबा पिछले कई वर्षों से
इन दिनों लोगों की खबरों में थोड़ी-बहुत दिलचस्पी है
वे चिंतित हैं अपनी सुरक्षा को लेकर
उन्हें चिंता है अपनी जान की
इज्ज़त, आबरू की
पर कोई नहीं सोच रहा उन स्त्रियों की
रक्षा और सम्मान के बारे में
जिनसे संभव है
इस जीवन में कभी कोई मुलाक़ात न हो
हमारे समय में निजता इतना बड़ा मूल्य है
कि कोई बाहर ही नहीं निकलना चाहता उसके दायरे से
वरना क्यों होता
कि आज़ाद घूमते बलात्कारी
दलितों-आदिवासियों के हत्यारे
शासन करते
किसानों के अपराधी
सब चुप हैं
अपनी चुप्पी में अपना भला ढूंढते
सबने आशय ढूंढ लिया है जनतंत्र में
अपनी-अपनी चुप्पी का
हमारे समय में
जितना आसान है उतना ही कठिन
चुप्पी का भाष्य
बहुत तेजी से बदल रहा है परिदृश्य
बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं निहितार्थ
वह दिन दूर नहीं
जब चुप्पी स्वीकृत हो जायेगी
एक धर्मनिरपेक्ष धार्मिक आचरण में
पर तुम कहाँ हों
मथुरा में अजमेर में
येरुशलम में मक्का मदीना में
हिन्दुस्तान से पाकिस्तान जाती किसी ट्रेन में
अमेरीकी राष्ट्रपति के घर में
कहीं तो नहीं हो
तुम ईश्वर भी नहीं हो
किसी धर्म के
जो हम स्वीकार लें तुम्हारी अदृश्यता
तुम्हें बाहर खोजता हूँ
भीतर डूबता हूँ
सूज गयी हैं आखें आत्मा की
नींद बार-बार पटकती है पुतलियों को
शिथिल होता है तन-मन-नयन
यदि सो गया तो
फिर उठना नहीं होगा
और मुझे तो खोजना है तुम्हें
इसीलिए हारकर बैठूंगा नहीं इस बार
नहीं होने दूंगा तिरोहित
अपनी उम्मीद को
मैं जानता हूँ
खूब अच्छी तरह जानता हूँ
एक दिन मिलोगे तुम ज़रूर मिलोगे
तुम्हारे बिना होना
बिना पुतलियों की आँख होना है
  
 तमकुही कोठी का मैदान 

 तमकुही कोठी निशानी होती 
महज सामन्तवाद की 
तो निश्चित तौर पर मैं उसे याद नहीं करता 

यदि वह महज आकांक्षा होती
 
अतृप्त दिनों में अघाए दिनों की 
तो यक़ीनन मैं उसे याद नहीं करता 

मैं उसे इसलिए भी याद नहीं करना चाहता
 
कि उसके खुले मैदान में खोई थी मेरी प्राणों से प्यारी मेरी साइकिल
सन उन्नीस सौ नवासी की एक हंगामेदार राजनीतिक सभा में 

लेकिन मैं उस सभा को नहीं भूलना चाहता
 
मैं उस जैसी तमाम सभाओं को नहीं भूलना चाहता
 
जिनमें एक साथ खड़े हो सकते थे हज़ारों पैर 
जुड़ सकते थे हजारों कंधे 
एक साथ निकल सकती थीं हज़ारों आवाजें 
बदल सकती थीं सरकारें 
कुछ हद तक ही सही 
पस्त हो सकते थे निजामों के मंसूबे

मैं जिस तरह नहीं भूल सकता अपना शहर 
उसी तरह नहीं भूल सकता
तमकुही कोठी का मैदान 
वह सामंतवाद की क़ैद से निकलकर 
कब जनतंत्र का पहरुआ बन गया 
शायद उसे भी पता न चला 
ठीक-ठीक कोई नहीं जानता 
किस दिन शहर की पहचान में बदल गया वह मैदान 
न जाने कितनी सभाएं हुईं वहां 
न जाने किन-किन लोगों ने की वहां रैलियाँ 
वह जंतर-मंतर था अपने शहर का 
आपके भी शहर में होगा या रहा होगा 
कोई न कोई तमकुही कोठी का मैदान 
एक जंतर-मंतर 
सायास हरा दिए गए लोगों का आक्रोश 
वहीँ आकार लेता होगा 
वहीँ रंग पाता होगा अपनी पसंद का 
मेरे शहर में 
जिलाधिकारी की नाक के ठीक नीचे 
इसी मैदान में रचा जाता था 
प्रतिरोध का सौन्दर्य शास्त्र 
वह ज़मीन जो कभी ऐशगाह थी सामंतों की 
धन्य-धन्य होती थी 
किसान-मजूरों की चरण धूलि पा 
समय बदलने का 
एक जीवंत प्रतीक था तमकुही कोठी का मैदान 
लेकिन समय फिर बदल गया 
सामंतों ने फिर चोला बदल लिया 
अब नामोनिशान तक नहीं है मैदान का 
वहां कोठियां हैं फ्लैट्स हैं 
वह आदमी वहीँ बगल की सडक से 
धीरे से निकल जाता है 
उस ओर 
जहाँ कचहरी है 
और अब आपको क्या बताना 
आप तो जानते ही हैं 
जनतंत्र में कचहरी मृगतृष्णा है गरीब की

Saturday, November 3, 2012

नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा 14

अकेला ही था वो उस भीड़ में घाट पर......बाकी लोग अपने काम कर रहे थे, दिए जलाकर पानी में बहा रहे थे, अगरबत्ती जलाकर माँ नर्मदा की आरती बुडबुडा रहे थे, सुहागिनें अपने सर पर एक लंबा सा पल्लू खींचकर फूल पत्ती  बहा रही थी, कुछ लडके और लडकियां एक कोने में प्रेम कर रहे थे, एक तरफ बूढी विधवा महिलायें भजन गाते हुए अपने परिजनों को घर से दूर रहकर सुख दे रही थी, पानी अपने निर्बाध वेग से बह रहा था नर्मदा का .........एक दूर कोने में वो जोर- जोर से बडबडा रहा था हाथों में ढोल, फटे कपडे, चेहरे पर बेतरतीब सी बढ़ी हुई दाढी, आँखे धंसी हुई, सर के बाल जो सदियों से सूखे हुए थे, शर्ट जो किसी पंद्रहवीं शताब्दी का वस्त्र होने का सबुत था, आवाज ऐसी थी जो लगता था कि किसी दूर ग्रह के किनारे से गूंजते हुए आई है जो पूरी मशक्कत के बाद भी निकल नहीं पाती थी. कह रहा था कि समाज में सबके लिए भोजन पानी की व्यवस्था है, कन्या पूजा है, लड़कों को ब्राहमण बनाकर भोजन दिया जा सकता है पर एक अकेले आदमी के लिए कही कोई व्यवस्था नहीं, उम्र निकल गई अकेले रहते हुए, एकाकी जीवन की सारी त्रासदियाँ भुगत ली पर कही कोई ठौर ठिकाना नहीं....और तों और मरने पर अकेले आदमी की लाश को भी लकडियों के गठ्ठे जला नहीं पाते...याद आया सही कह रहा था वो ...........देवास में मेरे सामने रहने वाले प्रभात के चाचा की मृत्यु के बाद भी वो दो दिन तक जल नहीं पाए थे और अंत में जब अस्थियां चुनी गई तों अधजले शरीर के हिस्से साथ आ गये थे....पर यह बुजुर्ग आदमी यह सब आज अचानक क्यों कह रहा है जब मै यहाँ शांति की तलाश में आया हूँ.........अपने आप से भागकर ........अब जब शाम का आसमान भी एक गहरी खामोशी के साथ उदास हो गया है, पानी का वेग स्थिर है, दिए जलते हुए बह रहे है, फूल पत्तियाँ कह रही है आखिर कुछ देर बहाने के बाद सड ही जाना है..... बस बह ले....पता नहीं यह सब क्या हो रहा है............वह आदमी फ़िर अपने ढोल की आवाज तेज कर रहा है ....एक भजन चारों ओर गूंजने लगा है ........और सारे लोग जो घाट पर मौजूद है एक अर्ध चैतन्य अवस्था में झूमने लगे है ..........यह माँ नर्मदा की जयकारे का वक्त है नर्मदे हर........हर........हर....( नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा 14)

Friday, November 2, 2012

करवा चौथ के बहाने

बात मजाक की नहीं है बल्कि यह है कि इस दौर में स्त्री शिक्षा और सशक्तिकरण के बावजूद भी आज तक हम करवा चौथ, छठ, हरितालिकातीज जैसे त्यौहार जो घोर अत्याचारी किस्म के है- महिलाओं के लिए,  मना रहे है. आज एक प्रिय मित्र की पत्नी से बातें हुई जो इस समय गर्भवती है और लगभग आठवें माह में है, आज वे भी उपवास पर है जब हम सबने उनसे आग्रह किया कि वे कुछ तो खा लें या फलों का रस पी लें तों उन्होने बहुत श्रद्धा से मना कर दिया उन्होने अपने परिवार के कुलगुरु की बातों को उद्धत करते हुए कहा कि हिन्दू संस्कारों के अनुरूप पेट में पल रहे बच्चे पर माँ के संस्कार बहुत महत्वपूर्ण होते है यदि होने वाली संतान कन्या है तो वह यह महान संस्कृति सीखेगी और अगर यह बालक है तों वह सीखेगा कि स्त्री कितनी महान होती है जो पति को परमेश्वर मानती है. बहुत समझाने के बाद भी वो मान नहीं रही है और अपना पत्नी धर्म निभा रही है. फ़िर मैंने गंभीरता से सोचा कि महिलायें और एक गर्भवती स्त्री कितने उपवास सप्ताह में करती है और खाती पीती नहीं है नतीजा सामने है गंभीर कुपोषण और शिशु मृत्यु और माताओं की जचकी के दौरान मृत्यु. अफसोस तो तब होता है कि पितृ सत्ता में कुलगुरु भी भी पुरुष ही है, और ज्ञान की सारी नदियाँ भी वही से आती है जो महिलाओं को अन्ततोगत्वा दोयम दर्जे का नागरिक बनाती है. यह बहुत ही दुखद और अन्यायपूर्ण व्यवस्था है. इस तरह के तीज-त्यौहार और लोक परम्पराओं को नए नजरिये से सोचने बिचारने की जरुरत है, मैंने खुद भी सुबह इसी व्यवस्था का मजाक उडाया था पर लगता है बहुत गंभीरता से सोचना चाहिए कि आखिर क्यों स्त्रियाँ, जो हमेशा से साफ्ट टारगेट रहती है, इस का निशाना बारम्बार बनती रहे??? मीडिया भी इस तरह के त्योहारों को  बहुत महिमा मंडित करता है एक दिन पहले से बाजार की रौनक, खरीदी, साक्षात्कार, और फ़िर इस तरह की कथाएं जो सिर्फ ढपोल शंखी ब्राह्मणों द्वारा अपने शुद्ध व्यवसाय को बढाने के लिए लिखी है, को प्रचारित करता है. दूसरा हिन्दी फिल्मों में इस तरह के प्रसंग और गाने डालकर अंध भक्ति, निष्ठा और विश्वास बढाने के दृश्य डाले जाते है. यह सब बेहद अमानवीय है. अब सही समय है जब इस पर सोचा जाये और ठोस कदम बढाए जाये.......या उलटा करें सारे देश के लोग सिवाय बच्चों के इन तीज त्योहारों पर भूखे रहे ताकि अन्न की बचत हो और जो इस दिन की बचत हो उसे गरीबों में बाँट दिया जाये.

मप्र में षड्यंत्र और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के गिरगिट

मप्र में पिछले पांच बरसों में एक बहुत बड़ा षड्यंत्र हुआ आम लोगों के साथ कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के महामानवों और महामहिलाओं ने प्रशासन में बैठे गधाप्रसादों को देश विदेश घूमने का न्यौता देकर अपने कुत्सित दिमाग की गन्दगी परोसी और आम लोगों को समाज के हाशिए पर पड़े लोगों को टारगेट बनाकर सरकार को रूपया दिया हर जिले को प्रदेश में प्रति वर्ष पच्चीस लाख रूपये दिए गये जो जिला योजना और सांखियिकी अधिकारी को दिए गये. सोचिये पिछले पांच बरस से यह रूपया दिया गया यानी एक जिले को अभी तक सवा करोड दिया गया जिसे सिर्फ कलेक्टर एवं जिला योजना अधिकारी ने स्व विवेक से खर्च किया सिवाय समुदाय को बेवक़ूफ़ बनाने के और प्रशासन के लोग घूमते फिरे रहे देश विदेश. जन अपेक्षाओं को सही तरीके से वेब पेज पर दर्ज किया गया पर आजतक ये अपेक्षाएं कितनी पूरी हुई कोई भी जिला दम ठोंककर नहीं कह सकता कि एक भी पंचायत या गाँव की जन अपेक्षाएं पूरी हुई हो गत पांच बरसों में हर साल जिला योजना बनाई गई परन्तु राज्य योजना आयोग के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है कि वो बता सके कि इस प्रयोग से जिसमे कुछ सार्थक काम हुआ हो बारह करोड पचास लाख प्रतिवर्ष सिर्फ जिलों में खर्च हुए है और भोपाल में इस पुरे तामझाम के लिए लगभग इतने ही रूपये खर्च हुए होंगे सोचे कि यदि एक वर्ष में इतने तों गत पांच बरसों में कितने रूपये खर्च हुए होंगे और निकला क्या सिवाय एक बहुत बड़े कॉमेडी शो के अलावा.........बात बहुत गंभीर है. इस पुरे तंत्र को विकसित करने में कई लोगों, संस्थाओं और बुद्धिजीवियों ने अपना दिमाग और समय खर्च किया था परन्तु आज वे सब बेहद निराश और हतप्रद है मप्र शासन के कारण. इन सभी प्रयासों में जो भी प्रयास लोगों ने इमानदारी से किये उन्हें एक तरफ रखकर अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के गिरगिट तों निकल गये यहाँ-वहाँ प्रमोशन पर दूसरे देशों के प्रमुख बनकर, यहाँ के ब्यूरोक्रेट्स घूम लिए दुनियाभर में सरकारी खर्चों पर वो लोग जो इमानदारी से आम लोगों को, समुदाय के हाशिए पर पड़े लोगों और बूढ़े, विकलांग, महिलाओं को इस पूरी प्रक्रिया में भागीदार बनाकर काम कर रहे ठे, उनके सपनों को दर्ज कर एक सुहाने कल का सपना बता रहे थे उनका क्या होगा.....शर्मनाक है यह पूरा खेल और यहाँ तक कि बड़ी संस्थाओं की इस तरह की षड्यंत्रपूर्ण भागीदारी.......वैसे भी लोगों का सरकार पर से और राज्य नामक संस्था से भरोसा उठ ही गया है.

Thursday, November 1, 2012

मिल लेने से मिलना थोड़े ही हो जाता है

गया तों बहुत दूर था कि एक बहुत पुराना सा, बहुत मीठा सा, बहुत भावुक सा रिश्ता बन गया था इन छः बरसों में, कितने-कितने देर तक हम यूँही बोलते रहे थे, फोन पर, चेट पर, सब कुछ बाँट चुके थे... पर कुछ था जो रह गया था बांटने से, कुछ था जो रह गया था सुना-अनसुना, कुछ था जो कह नहीं पाए थे........बस इसलिए चला गया था अपने छोटे से जीवन के पुरे तीन दिन देने, गया तो था कि ये करूँगा, वो करूँगा पर जाकर पता चला कि एक पनौती ही हूँ बस यूँही लौट आया बगैर कुछ बोले, समझे जाने बूझे....अब लग रहा है कि जीवन के तीन दिन व्यर्थ चले गये और बस......खैर अब कुछ हो  नहीं सकता........ यह शरद पूर्णिमा की रात थी और वो असंख्य सुबहों का सूरज सारे वादे करके भी नहीं आया लिहाजा मन मसोज कर लौटना ही था बस सारे रास्ते पटरियों का दर्द देखता रहा और फ़िर सीखा कि साथ-साथ चलने से कोई साथ थोड़े  ही होता है, बात करने से कोई अपना थोड़े ही हो जाता है, भावनाएं बांटने से मन का मीत थोड़े ही हो जाता है, और मिल लेने से मिलना थोड़े ही हो जाता है, दूर तक यात्रा करके जाने से कोई पहुँच थोड़े ही जाता है. बावला है मन भी और मै भी बस- थोड़े ही में बहक जाता है, खैर विश्वास जो था वो टूट गया!!! यह सबसे बड़ी आश्वस्ति है और सीख जो मिल गई वो शायद कभी मेरे या किसी के काम आ जाये. उन जंगलों के सर्द सन्नाटों में गूंजती हुई आवाजों के घेरे अभी भी परेशाँ कर रहे है और उन पहाड़ों की चोटियाँ याद आ रही है अभी भी.........कि कोई कैसे कह दें कि सब कुछ खोकर लौटा था इन तीन दिनों में......

सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला

तुम्हारे लिए.............सुन रहे हो................कहाँ हो तुम.....................

अब खुशी है न कोई ग़म रुलाने वाला
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला

उसको रुखसत तो किया था मुझे मालूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला

इक मुसाफ़िर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया
कोई जल्दी में कोई देर में जाने वाला

-निदा फाजली.