Thursday, February 28, 2013

आधी धरती अँधेरे में थी वहाँ


लगा तो नहीं था कि ये तुम हो 
लगा तो यह था कि यह तुम ही हो
अपनी आवारगी पर मैंने कभी
सोचा ही नहीं और सहजता से कह दिया 
तुमने  कि जो अपना नहीं हो सकता 
वो किसी का नहीं हो सकता 
और फ़िर तुमने वो सब याद दिलाया 
जो घटित हुआ था किसी कोने में 
इसी धरती के एक कोने में 
नि:शब्द था मै और भोथरा गया 
बेबस सा सोचता रहा क्या कहूँ 
यह एक प्रेम की शुरुआत थी या अंत 
मुझे नहीं पता पर उस सबको याद 
करते हुए मुझे सिर्फ यही लगता है 
जीवन में प्रेम कभी पूरा नहीं होता, 
होता तो प्रेम भी नहीं कभी पूरा 
पर एक आदत सी पड़ जाती है 
धरती, चाँद और सितारों के बीच से 
जिंदगी को निकालने की बगैर 
यह जाने कि सबकी अपनी अपनी 
कहानी होती है बगैर यह जाने कि
अक्सर वहाँ धरती आधी अँधेरे में थी

(जानती हो ना आज ये कविता तुम्हारे लिए है)

आपने सिक्कों की खनक सुनी है ?

वो सिक्के ही थे दस, पांच, तीन और दो पैसों के
जिन से दो चार होकर बड़ा हुआ मै
जवाहर चौक पे खडा होकर दिया था भाषण
जब तुतलाती जुबान से तो माँ ने
हाथ में धर दिया था तीन पैसे का सिक्का
सड़क पर जाते मैयत से उठाया था
एक पांच पैसे का सिक्का
उस्ताद रज्जब अली खां साहब मार्ग, देवास  के
किसी सेठ के मरने पर तो
बहुत मार खाई थी पिता से
महेश टाकीज़ में पतिता फिल्म के गाने पर भी
भर गई थी जेब सिक्कों से
जिन्हें बीन लिया था जमीन से
उस भीड़ भरे टाकीज़ में
और फ़िर घर आकर गर्व से बताया
तो फ़िर मार खाई पिता से
कितना कुछ आ जाता था उन छोटे सिक्कों में
चाय की पुड़िया, मीठा तेल, मेहमानों के लिए पर्याप्त शक्कर
दूध, हर इतवार की जलेबियाँ, एक पॉलिश की डिब्बी,
बुखार की गोली, भगवान के लिए हार
शायद पूरा संसार उन दिनों 
इन्ही छोटे सिक्कों से खरीदा जा सकता था
बात पुरानी तो जरुर है पर सच है
धीरे धीरे बड़े सिक्के आये 
चार आने, आठ आने के तो भाषा ने 
भी अपने अर्थ बदले और सिक्कों में ढली  
कहावतें बनी कि सोलह आना सच
चवन्नी की औकात वाला आदमी
आमदनी अठन्नी खर्चा रूपया
खरे सिक्के वाला आदमी 
खोटा सिक्का और ना जाने क्या-क्या
आज सोचता हूँ तो दिखाई नहीं पड़ते
वो पीतल के चमकते सिक्के
शुभ्र धातु में ढले दमकते सिक्के
वो सिक्के जिन्हें माँ चांदी के भुलावे में
हर लक्ष्मीपूजा के समय धर देती थी और
बुदबुदाती थी कि इस घर से और 
हमारे पुरे बाड़े में रहने वालों के घर से दलिदर का कलंक मिटें
और लक्ष्मी अपने वरद हस्त के साथ टिकी रहे
इस हजार रूपये के दौर में
उन सिक्कों की खनक कही नहीं सुनाई देती
जिनके होने पर मन शांत रहता था
और एक आश्वस्ति बनी रहती थी जीने की
जेब में सिक्के खनखनाते तो लगता कि
जीवन संगीत में बसंत - बहार है
और सारे सुर सधे हुए है
सिक्के बजते तो लगता कि जीवन की गाड़ी 
बिलकुल सीधी है और कही क्लेश नहीं 
आज जेब में नोटों के पुलिंदे होते है कई बार 
दुनिया की एक छोटी सी चीज़ भी नहीं खरीद पाता हूँ मै
कितना बेबस पाता हूँ कि इन ढेर सारे नोटों से 
एक छोटी सी चीज नहीं ले पा रहा किसी के लिए
बढती और विराट होती दुनिया के लिए 
भारी और बड़े नोट कितने छोटे हो गये है 
कोई कहता है नोटों की कीमत कम हो गई है 
यह  कोई नहीं कहता कि इन नोटों के नीचे दबा 
आदमी भी किसी लायक नहीं रहा बाजार में 
सब बिक रहा है, सब खरीद रहे है, सब बिकाऊ है 
कही से सुनाई नहीं देती गूँज उन सिक्कों की 
जिन्हें देखते ही मन प्रफुल्लित हो जाता था
इस समय में आज भी खोजता हूँ उन सिक्कों को
अनथक प्रयास जारी है , बहुत मन है एक बार फ़िर 
लौट जाऊं बचपन में और खोज लूं  अपने सारे सिक्के 
और फ़िर खरीद लूं चाँद सितारे आसमान और वो सब 
जो आज इन भारी नोटों से नहीं खरीदा जा सकता है.

Wednesday, February 27, 2013

नदी किनारे से अनन्तिम कथा ना बेचैनी की ना जीवन की..... फरवरी 26, 2013

                                               

ज़िंदगी में निर्णय लेना जरूरी हो जाता है कई बार खासकरके तब जब आपको कोई छल, प्रपंचना से बरगलाते हुए अपने स्वार्थ को पूरा करना चाहता हो बुरी तरह से तनाव देते हुए और जिद पर आकर आपको मजबूर करने की कोशिश करें, बेहतर है ठोस निर्णय ले और जवाब दें ना कि घिघियाते हुए कुछ क्षणिक तनावों की वजह से हर कुछ स्वीकार ले.
इस सुबह में हल्की-हल्की हवा चल रही है- इसमे कही फाग की आगत है, कही एक चुलबुलाहट और दिलों-दिमाग को मदहोश कर देने वाली खुश्बू.........
और अब समय आ गया है कि पुनः घर लौटा जाये......पन्द्रह साल की आवारगी के बाद एक अनुशासन में फ़िर लौटा जाये.........इन पन्द्रह सालों में बहुत कुछ देख लिया, कर लिया, जी लिया और सारी यारी दोस्ती देख,कर और भुगत ली. याद आ रहा है चल खुसरो घर आपने रैन भई चहूँ देस
जाना तो कही से कभी भी नहीं चाहा, परन्तु ना जाने क्यों अपने ही जाये दुःख आड़े आये हमेशा से, और बदलता रहा शहर दर शहर, सामान का बोझ ढोते हुए घूमता रहा दुनिया में और फ़िर एक दिन याद आया कि अब बहुत हो गया अपना साम्राज्य और अपनी शर्तों पर जीने की तमन्ना, अपनी दुनिया, अपने दोस्त, अपनेपन को खोजते हुए बार-बार अपने से ही टकराना और हर बार सिसकते हुए दर्प में अवसादों के साथ जीते हुए.....और अंत में कुल जमा शून्य बस लौट रहा हूँ . यह लौटना भी अजीब लौटना है यह अपने अंदर से अपने अंतरतम की एक अथक यात्रा है और बहुत बेबसी से भरी हुई एक विचित्र सी यात्रा जिसमे कोई शुरुआत नहीं कोई अंत नहीं कोई मंजिल नहीं कोई सार्थकता नहीं और कोई उद्देश्य नहीं बस लौटना है जहां से शुरू हुआ था एक दिग्विजयी स्वप्न लेकर, कुल मिलाकर लगा कि संसार में ऐसा कुछ नया नहीं कर रहा है कोई, यही मार्ग बुद्ध ने, महावीर ने और कईयों ने अपनाया था बस फर्क इतना था कि उस समय जंगल थे निर्वाण था और संन्यास था और आज घर है, कमरे है, एकाकीपन है, बेरुखी है, संताप, अवसाद और तनाव है और यह वर्चुअल वर्ल्ड है. जब आज सब बाँध रहा था तो लगा कि अब सब बाँध ही लिया है तो पोटली भी बाँध लें सफर शायद आसान हो जाये................यह नदी किनारे से बेचैनी की अंतिम कथा है और इसका कोई अंत भी नहीं है ना ही इसका कोई ओर-छोर बस............नदी को बहना है -यही शाश्वत सत्य ,है यही सत्य है, यही निर्वाण है, यही प्रारब्ध और यही अंत जो कहाँ है कब है किसी को नहीं पता.
और क्या कहू इतना तो कुछ कभी महसूसा भी नहीं था एक नदी से दूर होने के मायने तब समझ आते है जब आप सच में नदी के किनारों से दूर चले जाते है...............उन किनारों से दूर जिनका होना मायने रखता था, जिनके होने से जीवन में साँसों को लेते हुए हर क्षण भाप उड़ जाती थी, जिनके होने से गुनगुने से पछतावें भी कभी कभी साकार हो उठते थे...........बस

अब ना नदी है, ना किनारे, ना बेचैनी, ना कथ्य, ना भाषा, ना स्वरुप, ना विधा, ना शिल्प- बस है तो सिर्फ और सिर्फ........... दूर होने की व्यथा !!!

(नदी किनारे से अनन्तिम कथा ना बेचैनी की ना जीवन की..... फरवरी 26, 2013)

Monday, February 25, 2013

किस्सागोई करती आँखें - प्रदीप कान्त के पहले संग्रह पर बहादुर पटेल की टिपण्णी.

जैसा की प्रदीप कान्त का व्यक्तित्व सरल सहज है तथा वे अपने व्यवहार सभी का दिल जीत लेने में माहिर हैं. बेहद संवेदनशील हैं वे कविता में जीते है. उनका जीवन व्यवहार ही काव्य व्यवहार है यह उनकी कविताओं में सहज ही देखा जा सकता है. उन्होंने अपने अंदाजे बयां से एक अलग तरह की पहचान बनाई. जो उनकी गजलों को एक तरह की विशिष्टता प्रदान करती हैं.
लम्बे समय से गजल कहते रहे प्रदीप ने धेर्य से अपनी गजलों की पहली किताब परिपक्वता के साथ हमारे सामने प्रस्तुत की. जबकि हम लम्बे समय से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी गजलें पढ़ते रहे हैं. उनकी यह गजलों की किताब “किस्सागोई करती आँखें” आश्वस्त करती हैं. इस संग्रह की रचनाएँ हमें बहुत गहरे में ले जाती है एवं नए अर्थों, जीवनानुभवों और विषयो को परत दर परत खोलती है. तब हम स्थानीयता से जुड़ते हुए इस संसार से निस्पृह नहीं रह पाते हैं.
प्रदीप की इन गजलों को पढ़ते हुए हम इनमे कविताओं का आस्वाद पाते हैं. शायद इसीलिए यश मालवीय उनको किताब की भूमिका में कवि से ही संबोधित करते हैं. कविता और गजल के फार्म से बहार निकलकर हम देखें तो पाएंगे कि उनका सोंदर्य बोध कहन के साथ-साथ जनवादी और स्थानीयता के माध्यम से मालवा और यहाँ की परम्परा जिसमें कबीर, ग़ालिब से लगायत दुष्यंत कुमार से गजल का ककहरा सिखते हुए यहाँ तक आते हैं. जिसमे वे अपने लिए एक अलग जमीन तैयार करते हैं. इसीलिए वे गजलों के साथ-साथ कविता में भी स्वीकार्य हैं.
कविता और जीवन में एक जैसा व्यवहार उनके यहाँ देखने को मिलता है. याने जैसा जीवन वैसी बातें. संग्रह की पहली ही गजल में वे यह संकेत भी देते हैं-
मैं फ़रिश्ता नहीं न होगी मुझसे रोकर कभी भी हंसाने की बातें.
यही उनकी रचनात्मकता की सबसे बड़ी ताक़त हैं. सबसे बड़ी बात यह भी है की वे अपनी बातें गजलों के माध्यम से संवाद करते हुए किस्सागोई अंदाज में कहते हैं जो सीधे संप्रेषित होती है. जीवन और संसार की छोटी-छोटी बातो के बहाने वे गहरी और अर्थपूर्ण बातें कहते हैं. साम्प्रदायिकता, सामजिक विघटन हो या जातिवाद व पूंजीवाद की चमक से भरे पड़े चकाचौंध बाजार सब पर वे बहुत विरलता के साथ प्रहार करते हैं. सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व वे एक खास और बातचीत के अंदाज में करते हैं. समय के साथ मुठभेड़ करने के साथ-साथ सार्थक मुद्दों को सहलाते नजर आते हैं. बहुत कम शब्दों बड़ी बात कह देना एक खास अंदाज और लयात्मकता के साथ. शब्दों को बहुत किफ़ायत से वापरना इन गजलों की ताक़त है.
एक कलम का फ़र्ज़ था जो दिखा वैसा लिखा .
जो जैसा दिखा उसको लिखना बहुत जोखिम भरा काम है लेकिन यह जोखिम प्रदीप उठाते है क्योंकि वे प्रतिबद्ध है अपने लेखन, अपने सरोकारों के प्रति. ये सरोकार ही एक रचनाकार को बड़ा और प्रासंगिक बनाते हैं. अपने जीवन और लेखन में संघर्ष का संतुलन बनाये रखना रचनाकार को लम्बे समय तक जीवित रखता हैं. और मूल्याङ्कन का जहाँ तक सवाल है समय की छलनी करती है. लेकिन प्रदीप के भीतर किसी तरह का कोई भय नहीं है इसीलिए वे कहते हैं –
उनकी दुश्मन क्या हो सियाही रोशनी कभी जिनके घर न थी.
पाश ने कहा था कि सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना. प्रदीप उन सपनों मरने नहीं देना चाहते हैं. वे सपनों को देखते ही नहीं बल्कि उनके साकार होने की आकांक्षा भी रखते हैं. वे सपने जो कभी किसानों और मजदूरों ने देखे थे. वे आज भी बरक़रार हैं. चाहे हमारी सरकारें पूँजी के खेल में उनको कुचलने की भरसक कोशिशें करती रहें. पर हम लड़ेंगे साथी. यहाँ प्रदीप अंदाज देंखें.-
सूखे खेत के सपनों में तो बदल होंगे , बरसात होगी.
किस कदर सिकुड़ कर सोया है वो फटी चादर की औकात होगी.
कबीराना अंदाज भी उनकी गजलों में देखने को मिलता है. वे साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता को निशाना बनाते हैं और मनुष्य बने रहने की ताकीद भी करते हैं.
बस्तियां फूंकने की हवस में बसेरे अपने ही जलाते रहे .
खुद तो इन्सान बन नहीं पाए देव पत्थर के बनाते रहे.
प्रदीप अपनी गजलों में कई रंग और मिजाज के साथ अपनी बात कहते हैं. संवेदना के स्तर के साथ-साथ अपनी बात को प्रभावी बनाते हुए सीधे संवाद करते हैं. जो हमारे मर्म को झकझोरती तो है ही साथ ही उद्वेलित भी करती
हैं. पाठक के भीतर ऊर्जा का संचार घनीभूत रूप से करते हुए काल तुझसे होड़ है मेरी के अंदाज में अपने समय से दो-दो हाथ भी करते हैं.
अपने रंग में उतर अब तो जंग में उतर .
सलीका उनका क्यों अपने ढंग में उतर.
दर्द को लफ्ज यूं दे किसी के रंज में उतर .
बदतर हैं हालात ये कलम ले, जंग में उतर .
अपने में ही गुम है उस दिले तंग में उतर.
इसी तरह ऐतहासिक सन्दर्भों को वे इस्तेमाल करते हैं लेकिन वर्तमान समय और परिस्थियों से उनके अर्थों से एक ऐसा साम्य पैदा करते हैं जिससे उनकी प्रासंगिकता के मायने भी बदलते हैं और इसीसे बड़ी कविता की निर्मिती होती हैं. जैसे वे अपनी गजल में वे कहते हैं –
नहीं सहेगा मार दुबारा गाँधी जी का गाल नया है.
यह नयी कहन पद्धति उनकी कविता की पहचान बनती है और कविता के भीतर का संसार सर्वभोमिकता के संसार में परिणित होता है. लिखने का सच जीवन के सच में बदलता है यही सच लेखन में इच्छाशक्ति पैदा करते हुए एक ऐसे यथार्थ से रूबरू कराता है जिससे हमारा समय कोसो दूर है. फिर भी रचनाकार अपना भरोसा और साहस नहीं खोता है. वह एक उम्मीद के सहारे अपनी राह पर बैलोस चलता रहता है.
फूल को फूल, खार को खार लिक्खा सच को इसी तरह बार-बार लिक्खा.
सरकार और बाज़ार के गठजोड़ से जो स्थितियां निर्मित हुई जिसके फलस्वरूप किसान, मजदूर बदतर हालात में जीने को मजबूर है या फिर आत्महत्या का सहारा लेने को मजबूर है. गरीब और अमीर के बीच की खाई लगातार बढती जा रही है. इन हालातों से कवि बेखबर नहीं है वह इन पर नजर तो रखता ही है साथ ही प्रहार भी करता है.
पहले था जो, अब भी तो आसार वही है आ बैठी है, किस्मत से सरकार वही है
हुनर बेचने का सीखो अब नया आप भी मत सोचो कि अब तक भी बाजार वाही है.
इस संग्रह में ऐसी कई रचनाएँ शामिल हैं जो पाठक को आश्वस्त करती हैं. प्रदीप का पहला संग्रह होने के बावजूद परिपक्वता लिए हुए है. इस पड़ाव के बाद अगले संग्रह में हम इनसे आगे की कविताओं की उम्मीद जरूर करेंगे. बहरहाल उनके इस संग्रह के लिए उन्हें बहुत-बहुत बधाई.

बहादुर पटेल, 12-13, मार्तंड बाग़, तारानी कॉलोनी ; देवास (म.प्र.) 455001 मो. 09827340666

Monday, February 18, 2013

आधी रात यह पदचाप सड़क पर- आशुतोष दुबे





इसमें किसी विजेता की धमक नहीं
किसी चोर की सतर्कता भी नहीं--

इसमें एक आकुलता है वापसी की
एक संकोच सा है और एक उत्साह भी

यह सोचना भी कितनी राहत देता है
कि कहीं कोई लौट रहा है
और कोई दरवाज़ा उसके लिए
खुलने का इंतज़ार कर रहा है
- आशुतोष दुबे 


वीणा वादिनी वर दे, प्रिय स्वतंत्र भारत में ...........


भारत के उच्चतम न्यायालय में कुल छब्बीस जज साहेबान कार्यरत है हाल फिलहाल और उनमे से मात्र दो महिला जज है श्रीमती ज्ञान सुधा मिश्रा और श्रीमती रंजना प्रकाश देसाई.

अब कहिये कि महिला मुद्दों को लेकर महिला जज होना चाहिए, हर थाने में महिला पुलिस होना चाहिए, हर अस्पताल में महिला डाक्टर होना चाहिए और देश में महिलाओं को बराबरी मिलना चाहिए. दरअसल में पंचायतों में कुछ दम नहीं है जो थोड़ा बहुत था वो सरकारों ने कबाडा करके बर्बाद कर दिया इसलिए वहाँ पचास प्रतिशत आरक्षण देने से कुछ भला बुरा होने वाला नहीं है. पर जहां निर्णय है, जहां रणनिती बननी है, जहां योजना बननी है, जहां पैरोकारी होनी है, जहां बिल पास होने है या क़ानून बनने है वहाँ महिलाए क्यों हो??? होगी बुद्धिमान तो होगी पढ़ी लिखी या विदुषी- हमारे ठेंगे से, रहे घर - ड्योढी में रहे, चूल्हा चौका सम्हाले और बच्चे पैदा करके सम्हालें उन्हें. इन ससुरियों को यहाँ-वहाँ लाकर कलह ही बढ़ाना है, इससे बेहतर है पंचायत आदि में आरक्षण देकर लालीपॉप पकड़ा दो, सारे महिला संगठन और वृंदा करात जैसे कामरेड शांत हो जायेंगे और फ़िर सारा जहां हमारा है ही.

वीणा वादिनी वर दे, प्रिय स्वतंत्र भारत में ...........

http://supremecourtofindia.nic.in/judges/judges.htm

शिक्षा का क़ानून-एनजीओ, संस्थाएं और कार्पोरेट्स - मप्र में एक सवाल


मित्रों, शिक्षा का अधिकार क़ानून बन गया है सभी जगह इसे लागू  करने के भरसक प्रयास किये जा रहे है. नया सत्र चालू होने वाला है. शासन स्तर पर अतिरिक्त राशि जुटाकर माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गये निर्देशों के पालन हेतु भी राज्य दृढ संकल्पित है. सर्व शिक्षा अभियान के तहत सरकारें स्कूलों में कई प्रावधान कर रही है. शिक्षकों की भर्ती में बीएड की अनिवार्यता की जा रही है, छोटे-मोटे निजी विद्यालयों पर भी इसके शिकंजे कसे जा रहे है ताकि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किये जा सके. जो शिक्षक शासन में प्रशिक्षित नहीं है उन्हें सरकार क्रम से प्रशिक्षित कर रही है, और यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले तीन वर्षों में पुराने सभी शिक्षक प्रशिक्षित हो जायेंगे.

इस पुरे परिदृश्य में जो छोटे-मोटे एनजीओ, संस्थाएं और बड़े कार्पोरेट्स शिक्षा में काम कर रहे है यानी सरकारों के साथ विद्यालयों में एमओयु साईन करके शिक्षक प्रशिक्षण से लेकर पाठ्यक्रम बनाना, इसे पाईलेट स्तर पर देखना-परखना, फ़िर लागू करवाना, मूल्यांकन, अनुश्रवण, कक्षा में बच्चो के साथ गतिविधियाँ करना, समुदाय को शिक्षा से जोड़ना, पालक शिक्षा संघ के लिए मदद करना, यानी कुल मिलाकर स्कूल में सीधे-सीधे घुसकर काम करना और बीएड, एमएड, डीएड के पाठ्यक्रम बनाकर जिले में , ब्लाक में व्यापक स्तर पर एवं पुरे राज्य स्तर पर  काम करना. जाहिर है इस सबमे योग्यता लगती है. खासकरके शिक्षा की बात करें तो कम से कम डीएड या बीएड होना वांछनीय ही नहीं आवश्यक भी है, और शिक्षा के बड़े कामों में एमफिल या पीएचडी की योग्यता क्योकि एनसीईआरटी, नीपा, या क्षेत्रीय शिक्षा महाविद्यालयों में इसकी अनिवार्यता है. एक सीधा सा उदाहरण है यदि मै  एमबीबीएस डाक्टर को प्रशिक्षित कर रहा हूँ तो कम से कम मेरा एमएस या एमडी होना लाजमी है या कम से कम डाक्टरी की बेसिक डिग्री होना आवश्यक है. इस बात से आप सहमत होंगे.

दुर्भाग्य से मप्र में जहां से मै देख रहा हूँ शिक्षा में काम करने वाले अधिकाँश एनजीओ, संस्थाओं और कार्पोरेट्स के पास जो कार्यकर्ता है वे शिक्षा की कोई भी मान्यता प्राप्त डिग्री नहीं रख रहे है- कम से वे मूल डिग्रीयां जिन्हें शिक्षा का क़ानून मान्यता देता है. हाँ, काम करने वाले पंचायत राज, पानी प्रबंधन, खिलौने बनाने- बेचने, समाज कार्य, पत्रकारिता, प्रौढ़ शिक्षा, लेखन-पठन-पाठन, स्वास्थ्य, प्रजनन स्वास्थय, जन आन्दोलनों, गैस त्रासदी, स्वच्छता अभियान, शहरी तंग बस्तियों में जन जागृति, ग्रामीण क्षेत्रों में जल-जंगल-जमीन, बाँध-जमीन हस्तांतरण, विस्थापन, कुपोषण, महिला सशक्तीकरण  आदि जैसे कार्यों में निष्णात जरुर है, पर क्या ये योग्यताएं "शिक्षाक्षेत्र"  में काम करने के लिए पर्याप्त है??? अगर यहाँ डिग्री की और पढाई की "शिक्षा के अधिकार के क़ानून" के दायरे में बात की जा रही है तो  छोटे-छोटे निजी विद्यालयों पर दबाव डाला जा रहा है, मान्यता बंद करने के प्रावधान किये जा रहे है, तो इन सारे एनजीओ, संस्थाओं और कार्पोरेट्स को भी किसी भी प्रकार की इंट्री स्कूल के दायरे में नहीं दी जाना चाहिए, जब तक कि वे शिक्षा के क़ानून के तहत यह मूल शर्तें पूरी नहीं करते.

मै इस पोस्ट को भारत के माननीय सुप्रीम कोर्ट को, मप्र के माननीय हाई कोर्ट को और मप्र शासन के शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव, संचालक- राज्य शिक्षा केन्द्र, और भारत सरकार के सचिव- स्कूल शिक्षा, को इस अर्जी के (PIL- जनहित में याचिका) रूप में देकर पूछना चाहता हूँ कि मप्र में ऐसी कितनी संस्थाएं, एनजीओ एवं कार्पोरेट्स है जो शासन से मान्यता लेकर या स्थानीय शिक्षा विभागों से जुगाड या सम्बन्ध बनाकर स्कूल की परिधि में काम कर रहें है और इन संस्थाओं में काम करने वाले सभी कर्मचारियों. कार्यकर्ताओं की शैक्षिक योग्यता क्या है, साथ ही क्या ये शिक्षा के अधिकार क़ानून के तहत शिक्षा या स्कूल में काम करने की वांछनीय योग्यता रखते है ??? यदि हाँ, तो उन सबकी योग्यताओं के मूल दस्तावेजों की छाया प्रति मुझे उपलब्ध करवाएं, साथ ही मप्र राज्य शासन के साथ हुए एमओयु- जिसमे किये जाने वाले कार्यों का विवरण, पद्धति, कार्यकर्ताओं के नाम मय योग्यता, और बजट की छाया प्रति भी मुझे उपलब्ध करवाए.  यदि ऐसा कोई कानूनी दस्तावेज नहीं हो तो ऐसे सारे एनजीओ, संस्थाओं और कार्पोरेट्स को कम से कम स्कूल में या पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण के काम से दूर रखा जाये, और अवैधानिक रूप से काम कर भारतीय संविधान में प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए बच्चों के अधिकारों से खिलवाड़ करने और उनका भविष्य बिगाडने के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाये. इसमे मै अंतर्राष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ और अन्य यु एन एजेंसियों को  भी इसी दायरे में लाने की मांग रखता हूँ जो पुरे प्रदेश में शिक्षा के लिए "कंसल्टेंट्स" की एक लंबी फौज रखता है और स्कूल में ज्यादातर मूल्यांकन और अनुश्रवण का कार्य करता है और बच्चों के मनोविज्ञान पर फोकस करता है. ये कंसल्टेंट्स बगैर शिक्षा की डिग्री लिए हुए यूनिसेफ का खौफ दिखाकर स्कूलों में घूस कर सिर्फ और सिर्फ आंकड़े भरते रहते है.

यह पत्र मै पृथक से सभी को भेज रहा हूँ. आप विद्वानों से निवेदन है कि अपने क्षेत्र में होने वाली ऐसी किसी भी गतिविधि की सूचना मुझे दे ताकि केस को मजबूत किया जा सके.

Saturday, February 16, 2013

जब अशोक कलिंग युद्ध के बाद व्यथित था, तो उसने सबसे पूछा कि जीवन का क्या उद्देश्य है और कौन विजेता है ?

एक भिक्षु ने उत्तर दिया "हे राजन सफल वो है जिसने अपनी यात्रा पूरी करली ..."

साभार Prakalpa Sharma

शायद समय आ गया है हम राजनों का और यात्राओं को पूरा करने का , यही शाश्वत सत्य है !!!

नदी किनारे से बेचैनी की कथा


जानता तो मै नहीं था उसे, बस कल रात में डेढ़ बजे के आसपास मुझे वैभव ने एक एसएमएस किया था कि मेरे करीबी दोस्त पंकज अग्रवाल ने आत्महत्या कर ली. मैंने कोई जवाब नहीं दिया रात में और फ़िर सुबह भी- क्योकि सुबह से क्या मौत की बात सोचनी. दिन धीरे- धीरे जब चढ़ा और ठंडी हवाओं से बचने मै जब छत पर चढ़ा तो लगा कि एक बार फोन लगाकर पूछूं तो सही. कई बार वैभव को फोन लगाया दोनों नंबर पर, वो उठा नहीं रहा, फ़िर सिद्धार्थ को लगाया तो उसने कहा कि बस हम लोग आ ही रहे है. जब मैंने और खोदकर पूछा तो बोला कि भैया एम्बुलेंस में हूँ लाश के साथ, पंकज के परिजन भी है, सिर्फ बाईस साल का था, कर्जा हो गया था नौकरी थी नहीं और भोपाल में एक दूकान खोल ली थी, बस जब सब कुछ करने के बाद भी कुछ जमा नहीं तो जहर खा लिया थोड़ी देर में पहुँच रहे है, आप आ जाओ, वही नदी के किनारे अंतिम क्रिया होगी. बस बहुत ठन्डे भाव से सिद्धार्थ ने फोन काट दिया था. मै समझ सकता हूँ एक करीबी दोस्त की मौत खबर, संत्रास, और फ़िर उस दोस्त की लाश को दूर शहर से अपने उस शहर में लाना वहाँ - जहां साथ पढ़े, बड़े हुए, चुहलबाजियां की, साथ किशोरावस्था पार करके जवान हुए, सपने साथ देखे  और साथ ही मस्ती की कभी-कभी, फ़िर अचानक से ये क्या हो गया कि उसकी लाश को अपनी गोदी में लिटाकर एम्बुलेंस में लाना पड रहा है. वैभव का फोन ना उठाने का कारण भी समझ रहा हूँ. दिमाग सुन्न हो गया है मेरा, जबकि मै तो उस युवा को जानता ही नहीं था........पंकज आज अचानक इस शब्द का अर्थ याद आया !!! तो क्या इतना कीचड हमारे चहूँ ओर उग आया है कि कोई कमल खिल ही नहीं पा रहा और  मुरझा रहा है समय से पहले, क्या ये वाकई आत्महत्या है या सामूहिक ह्त्या??? हमारे समाज, बाजार और हम सबके  बनाए प्रपंच और अपेक्षाओं की वेदी पर एक तरुण की  ह्त्या और इस पर यह  क्यों बलि चढ गया.....आखिर कैसे निर्णय लिया होगा उसने, इतना जांबाज़ तो कोई होता नहीं इस उम्र में, कैसे सोचा होगा अपना भविष्य? सही है जब हर जगह निराशा हाथ लग रही हो, लोग आपको तौलने में कमतर आंकते हो, जिन्हें आपने एक समय में दिल खोलकर मदद की वे भी कोसने लगे और बात बंद कर दें तो क्या करें कोई, आपकी शिक्षा-दीक्षा और पढाई का कोई मौल ना हो, दोस्त आपसे कन्नी काटने लगे और परिजन आपको सिर्फ हताश देखकर ताने मारें, महत्वपूर्ण जीवन को जब कोई आपकी मजबूरी से जोडकर आपके मजे लेने लगता है तो शायद यही सबसे पहले सूझता है और फ़िर जीवन में जीने का कोई अर्थ नहीं रह जाता. मै समझ सकता हूँ पंकज तुम्हारा दर्द, समानुभूति शायद यही शब्द है ना जिसे अंग्रेजी में EMPATHY कहते है. सही किया तुमने बिलकुल सही किया. मौत को गले लगाना भी एक बड़ी बेखौफ बहादुरी का काम है और नपुंसक हो चुके खोखले समाज में, अड़े-सडो की दुनिया में उनके बताए उसूलों पर चलने से बेहतर है मौत को गले लगाना. जहां से मै देख रहा हूँ वहाँ पर तुम पहुँच चुके थे पंकज और आज सिर्फ दिल करता है कि तुम्हें सलाम करूँ, तुम्हारी हिम्मत और जज्बे को सलाम करूँ कि तुम इस समाज के परे होकर कुछ तो ठोस कर पाए कि सदियाँ तुम्हें याद रखेगी तुम्हारी हिम्मत, निर्णय और इस दूरंदेशी को  सलाम. क्या घिसट-घिसट कर जीना, ऐसे मनहूसी समाज में जो किसी को उसका मोल नही दे सकता, ना ही कद्र कर सकता है. एक राह जो तुम छोड़ गये हो वो निश्चित  ही आने वाले समय में कई लोगों को प्रशस्त करेगी कि इन दायरों में जीने से बेहतर है अपना जीवन मौत को सुपुर्द कर देना. यह अपनी माई, नर्मदा माई तुम्हें अपने में समा लेगी और लंबे समय तक इसका बहता पानी तुम्हारी हिम्मत और मर्दानगी की यश गाथा सदियों तक सुनाता रहेगा. फ़िर एक बार मन है कहने का पंकज तुम्हारे लिए दोस्त, जिसे मैंने कभी देखा नहीं, मिला भी नहीं, पर आज तुमसे गले मिलने को दिल करता है, तुम्हारे साथ इस लंबे अनजान सफर में निकल पडने को मन मचल रहा है, आज अपने बहुत करीब महसूस कर रहा हूँ सच में, लो कहता हूँ फ़िर से चिल्लाकर , गला फाडकर, सबको सुनाते हुए कि नर्मदे हर, हर, हर...(नदी किनारे से बेचैनी की कथा )

वृद्धाश्रम में नई भर्ती



आजकल वृद्धाश्रम में नई भर्ती चल रही है अपरिपक्व कौशल और दक्षताओं की जरुरत है. जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण पर काम करने वाले, फ्रॉड शिक्षा, समाज कार्य पर काम करके चुके हुए लोग, रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स और घर बैठे लोग इसमे अप्लाय कर सकते है........काम जरुर शिक्षा का है आप इसमे हाथ साफ़ कर सकते है और अगर आप में ज्यादा प्रतिभा हो तो आप कोई भी कुत्सित प्रयास कर इसमे घूस सकते है. बस दो चार लोगों को आपको जानना चाहिए और थोड़ी चाटुकारिता !!!

यदि आपको जरुरत हो तो कहिये. ये देश की उभरती हुई शिक्षा की मंडी है और जम के बिक रही है माँ सरस्वती और विकास गाथाएं......बड़ा नाम, बड़ा रूपया और बड़े बाजीगर है इस मंडी में यकीन ना हो तो एक बार साईट देखिये वृद्धाश्रम की !!!

क्या कहा काम क्या करना है जी वही जिसे हमारे श्रीलाल शुक्ल कहते थे भारतीय शिक्षा, जी हाँ ये कमबख्त अभी तक सड़क पर ही पडी है और देश में शिक्षा का क़ानून बनाने के बाद भी उसी कुतिया की तरह मिमिया रही है जिसे 1947 में मैकाले छोड़ गया था.

तो तैयार है आप........देश में बेरोजगारी बहुत है. आप क्यों चूक रहे है जनाब, आईये देश में सड़क पर पडी कुतिया को लात मारिये और अपना बैंक बेलेंस बढाईये......

Friday, February 15, 2013

रिश्ते बस रिश्ते होते है -गुलज़ार



तुम्हारे लिए.......... सुन रहे हो.................. कहाँ हो तुम.....

रिश्ते बस रिश्ते होते है
कुछ एक पल के
कुछ दो पल के

कुछ परों से हलके होते है
बरसों के तले चलते चलते
भारी भरकम हो जाते है

कुछ भारी भरकम बर्फ के से
बरसों के तले गलते गलते
हलके फुल्के हो जाते है

नाम होते है रिश्तों के
कुछ रिश्ते नाम के होते है
रिश्ता वह अगर मर भी जाए तो
बस नाम से जीना होता है

बस नाम से जीना होता है
रिश्ते बस रिश्ते होते है
-गुलज़ार


मोहित ढोली और अपूर्व दुबे के लिए

Thursday, February 14, 2013




आ जा री निंदिया
ले चल मोहे ऐसे देस
जहां वीराने हो
डरावने डेरे हो
सपने हो अधमूंदे
जीवन हो निस्तार
और फ़िर कहू एक बार
अपने आप से, धीमें से
हौले हौले से

शब्बा खैर


"कभी-कभी मुझे अपने आप से बड़ा डर लगता है, जब वे मुझमें झाँकते हैं और अपने जीवन का मतलब मुझसे पूछते हैं। हालांकि उन्होंने ही मेरा आकार तय किया है , मेरी क़ीमत तय की है। मुझ पर मोहर लगायी है और उस पर एक वादा अंकित किया है, और उसे एक सलीब की तरह समाज के गले में टाँग दिया है। और गोकि मेरा रंग-रूप, चेहरा-मोहरा, नाक-नक़्श , क़द-क़ीमत सब तय हैं, फिर भी वे मुझे देखते ही सबकुछ भूल जाते हैं। वे भूल जाते हैं तमाम नियम जो पुरानी बाइबिल के कड़े आदेशों की तरह उन्होंने ख़ुद ही मेरे माथे पर लिख दिए हैं और फिर भी तलाश करते हैं अपने जीवन के तमाम सपनों को काग़ज़ की छोटी-सी सीमा में, अपनी छोटी-बड़ी अभिलाषाओं के अनुसार वे कभी मेरी क़ीमत को घटाते हैं, कभी बढ़ाते हैं और एक मजहबी किताब की तरह मुझ में से अपने मतलब के मानी निकालने की हर कोशिश करते रहते हैं। शायद मैं काग़ज़ का एक पुर्जा नहीं हूँ। मैं इस युग का सबसे महान ग्रन्थ हूँ।"

-काग़ज़ की नाव , कृश्न चंदर

साभार - Dheeraj Kumar

नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा


यह तो हुआ ही नहीं था... सिर्फ तुम ही दोषी थे, वरना मै क्या..करती. तुमने कभी किसी से प्यार किया ही नहीं, तुम डरपोक हो,  एक कावर्ड, पक्के डरपोक. कभी पलट के नहीं देखा मुझे और अब कहने से क्या होगा. इस बीच मुझे एक और छोटी बेटी हो गई है, बेटा तो था ही, सात मार्च को मै देर तक काम करती रही थी, फ़िर रात में डाक्टर को दिखाने गई तो उन्होने  वही एडमिट कर लिया, ये थे नहीं दौरे पर थे आठ दिन के, तुम मुम्बई में थे फ़िर मै क्या करती ?? भर्ती हो गई, अगली सुबह यह बेटी पैदा हुई. दर्द तो हुआ था, पर, क्या बस खुशी यह थी कि एक बेटा था पहले से,  और तुम आज यह सब प्रेम की बातें क्यों कर रहे हो, ज्यादा पी ली क्या? देखो तुम वैसे ही बीमार रहते हो- इतनी शुगर है, बीपी है और मै यह भी जानती हूँ कि तुम्हारी नौकरी छूट गई है. असल में वही बात है कि तुम डरपोक हो, एक भी जिम्मेदारी ठीक से कभी निभाई ही नहीं, हमेशा भागते रहते हो -अपने आपसे, नौकरी से, घर परिवार से और मुझसे भी भाग गये.....कितने साल मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया, फ़िर शादी करना ही पडी, मै तो कभी नहीं भागी. सब किया और आज भी कर रही हूँ.........तुम्हारे पास मेरा मोबाईल नंबर नहीं है, क्या करोगे बात करके, सुनो अमरकंटक से कब आओगे और ज्यादा पीना मत, मै भले ही अब प्यार ना करती हूँ तुमसे, पर एक समय था जब सिर्फ तुम्हारे लिये ही जीती थी और याद है ना अपने जीवन के सबसे हसीं लम्हें हमने साथ बीताये है यहाँ-वहाँ घूमते हुए और खिलखिलाकर हँसते हुए. मै जानती हूँ कि तुमने इधर अपने आपको खत्म कर लिया है शराब पी-पीकर, मै तो तैयार थी तुमसे शादी करने को और पापा को भी राजी कर लिया था, पर क्या यह तुम्हारा कांशस डिसीजन नहीं था, आज तुम्हारे बारे में सुनती हूँ कि पिछले पच्चीस बरसों में हजारों नौकरियां छोड़ चुके हो, सब जगह झगडते रहते हो, यहाँ भी देखती हूँ कि तुम्हें देश-जहां की चिंता है, समाज की चिंता है, पर ना अपनी चिंता है- ना मेरी.....बस यूँही घुट-घुटकर मै तो निकाल ही लूंगी जीवन पर तुम्हारा क्या..........हाँ, सही कह रहे हो- आत्महत्या कर लोगे....कर लो, मुझे कोई फर्क नहीं पडेगा तुम्हारी मौत से क्योकि मै तो वैसे ही मर चुकी हूँ इस जीवन में तुम्हारे बगैर, पर मेरी बात सच हो जायेगी कि तुम डरपोक हो और आख़िर में जीवन से भी पलायन करके भाग गये......देखो अब कुछ हो नहीं सकता, ना तुम मेरे, ना मै तुम्हारी, पर जीवन तो काटना ही पडेगा ना. सुनो साधू सन्यासियों के चक्कर में ज्यादा मत पीना, नहीं तो हमेशा की तरह रात भर पीते रहोगे फ़िर खून की उल्टियां, अस्पताल और फ़िर एक बार संसार में लाने की नाकाम कोशिशें, कितना तडफाओगे मुझे जीते जी तुम, ........कब आ रहे हो भोपाल, मुझसे मिल लो एक बार, बड़ा मन है तुमसे एक बार मिलने का.......मै अक्सर नदी को देखती हूँ सेठानी घाट से रेतघाट से और फ़िर लगता है कि यह नदी कहाँ जाकर बहना बंद करेगी, अच्छा रख रही हूँ.........कल वेलेंटाईन दिवस है ना........याद करोगे मुझे...वो तो है नहीं यहाँ, दौरे पर है काश कि तुम मेरे पास होते.......ओह वैष्णवी रो रही है उसे दूध पिलाने का समय हो रहा है.....तुम ज्यादा पीना मत और सुबह इसी नंबर पर बात कर लेना......सुनो......फोन मत काटो पूरी बात तो सुन लो..सुनो..सुनो......सुनो...(नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा)

Tuesday, February 12, 2013

An interesting discussion between me and Jitesh Rath on a Post I wrote today.


An interesting discussion between me and Jitesh Rath on a Post I wrote today.

Jitesh- I don't feel any problem in this,Frankly I appreciate the idea & innovation.As because ...1. more opportunity for dev professional 2.Its an art 3. fund raising should be specific dept for support for org and if it is systematically proposed better result will come ...And we can't denied the fact How much Fund is Imp to facilitate the program or Project
I-असली बात आ गई ना कि सोशल वर्क वालों को "काम" के ज्यादा मौके मिलेंगे, मेरे पूर्ववर्ती संस्थान में, जो एक अंतर्राष्ट्रीय संस्थान था और कई गिरगिट नुमा सोशल वर्कर काम करते थे वहाँ, एक माताजी को इसी काम के लिए रखा था उन्होंने साल भर में छः लाख इकठ्ठे किये और उनकी तनख्वाह बारह लाख प्रति वर्ष थी और उस पर से वो हवाई जहाज के नीचे कदम नहीं रखती थी और सौभाग्य या दुर्भाग्य से वो ISSW इंदौर की ही "प्रोडक्ट" थी तो कहते है "वा सोना का जारिये जा सो टूटे कान"
Jitesh- Dada bilkul........I am Professional social Worker,Really Happy to mention "professional" Yeah again its an Part of noble work But think my value dada.... Is MBBS is not a noble profession,then y Doctor charge soo much ???? Is B.E. is not a noble profession,then y engineers paid soo much???? So If they can paid,then as development professional, I haven't committed crime for growth of myself ....Issw ki jay......
I- no its nt a question of comparison and pay structure. See the competence and skills they have the kind of Language Proficiency they have, you guys will take lot of years to develop and just social work that too without any maturity and ideological understanding .you can nt be a real Professional Jitesh Rath , dont mind but ISSW has lost its image and nnow it is almost in vain and the kind of products are coming out are nt of worth you know this very well, all the works in MP is being done by mostly out siders and the kind of radical change is brought in vicinity, is only by these people and nt by ISSW product. They all are living a Pseudo world of Fantasies, which needs to be broken down now.....
Jitesh-Dada..I cant underestimate myself or my professional carrier .I can't ..And if it can be so called as an Pseudo world of fantasies..happy to accept it...
I-its nt you its the entire gang which is coming up and doing and creating lot of garbage in social field hence we see such types of advertizements and people sitting there are creating lot of nonsense type of things.
Jitesh-garbage ?? thanks ...

I- yes when you will enter in real field you will find some people who are creating a mess especially people who come from Big Insstt of Social Work and Branded ones, they have spoiled the soul of social work and due to their funny ideas, innovative techniques things are in worst conditions. People working in UN agencies, INGOs MNGOs, Bilateral Agencies, Socio-Govt Sector are also duffer and gone cases and unfortunately they are the Decision makers for poverty, child right, Dalit and other genuine issues..........and you will realize my words when you will see in real operations or implementations Jitesh Rath after completion of your MA in Social Work.


बादलों की गर्जन कह रही है तुम यही कही हो एकदम मेरे पास
ये पानी की बूँदें और ये कारे-कारे मेघा जो पानी की बूँदें भर लाये है आँचल में
खेतों में फसलें खड़ी है और सब चिंतित है
कहाँ हो तुम आ जाओ सामने और फ़िर थम जाओ मेरे पास हमेशा हमेशा के लिए...........
मत गरजो मत बरसो अभी समय नहीं है ठहरो थोड़ा तो ठहरो .....

अदनान कफील की कवितायें - सरोकार और समय का जीवंत समावेश





अदनान कफील यही नाम था जब एक फेस बुक मित्र ने मुझे कहा कि इसे अपनी सूची में जोड़ ले और उसकी एक-दो गजल और कवितायें भी उन्होंने पोस्ट की थी. यह बात होगी तीन चार माह पूर्व की. मैंने कवितायें पढ़ी और लगभग हतप्रद रह गया था क्योकि सिर्फ अठारह साल का यह लड़का जो उत्तर प्रदेश के बलिया से दिल्ली आया है कंप्यूटर विज्ञान में पढाई कर रहा है और इतनी समझ और बहुत स्पष्ट विचारधारा कि क्या है समाज और क्या है कविता और क्या है अपना रोल. यह लगभग अचंभित करने वाला मामला था. फ़िर धीरे से अदनान से दोस्ती हुई और उसके संकोची स्वभाव को धीरे धीरे तोड़ा और फ़िर फेस बुक पर ही उसकी कवितायें पढ़ी बातचीत की और जब दिल्ली पुस्तक मेले में मिलने का तय किया तो यह बन्दा पुरे दो दिन हम लोगों के साथ रहा. आख़िरी दिन उसने अपनी कवितायें पढ़ी हम सबके सामने तो लगा कि इसकी कवितायें एकदम अलग जमीन पर व्यापक सरोकारों को इंगित ही नहीं करती बल्कि एक साफगोई के साथ समाज की हलचल को अपने सामने रखती है. अदनान की कवितायें ज्यादा प्रभाव डालती है सिर्फ इसलिए नहीं कि वे बेहद युवा है और एक सुलझी हुई कशिश के साथ अपनी बात रखते है बल्कि इसलिए कि वे जान रहे है समझ रहे है पक्ष और सरोकार क्या है, साहित्य और कविता का रोल क्या है. उन्होंने गजले भी लिखी है पर सिर्फ शब्दों की बाजीगरी से गजल नहीं बनती और जो बात कविता में वो जिस दम से कहते है वो गजल में नहीं आ पा रही है फिलवक्त, इसलिए हम सभी ने सुझाव दिया था कि वे कविता को अपना माध्यम बनाएँ और वो सब सामने लाये जो अंदर कही सुलग रहा है. भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने के कायल है पर मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है अगर वे इसी तर्ज और आग के साथ लिखते रहे तो शायद वे अपना इरादा बदलेंगे और एक अवाम के लिए कविता की जमीन पर नई क्रान्ति की बुनियाद रखकर बदलाव के सफर का आगाज़ करेंगे. बहरहाल अदनान की कवितायें एक आश्वस्ति देती है कि हिन्दी में अभी अच्छी कविता लिखी जा रही है और नए युवा तुर्क इस दिशा में बहुत महत्वपूर्ण काम कर रहे है. यहाँ पेश है अदनान की कुछ कवितायें यकीन है आपको ये पसंद आयेंगी.


बर्बरता और ईसा


प्रिये !
आज ये हृदय
अति व्याकुल है 
'
सदियों से खड़ी
ये हांड-मांस की प्रतिमा 
जर्जर हो चुकी है 
संसृति की इस 
बर्बरता से.
प्रिय ! मेरा रक्त 
जो शायद अब भी लाल है
रिस रहा है

संभवतः
मुक्ति की अभिलाषा में .
पैबंद लगे मेरे वस्त्रों से 
सड़े मांस की
बू आती है
और नीच भेड़िये
मेरा रक्त पी रहे हैं. 
क्या इस दंतेवाड़ा के दौर में

मेरा अस्तित्व संभव है?
और कितनी सदियों तक

मैं आहार बनता रहूँगा 
इन वहशी दरिंदों का ?
और आख़िर कब तक 
मरियम जनती रहेगी 
एक नए ईसा को ?

कब तब 
कील ठोंके जायेंगे 
मेरे इस वजूद में ?
कब तक ?
आखिर कब तक ?
लेकिन शायद 
ये इस बात से अनभिज्ञ हैं
कि मेरी 
उत्कट जिजीविषा
और मेरे 
बाग़ी तेवर 
कभी ठन्डे नहीं पड़ सकते.
             
     यूँ ही ईसा 

       
पैदा होता रहेगा 


       
चाहे हर बार उसे 


       
सूली ही क्यूँ चढ़ना पड़े.


       


अंतिम फैसला

हमारी मेहनत हमारे गहने हैं,
हम अपना श्रम बेचते हैं,
अपनी आत्मा नहीं,
और तुम क्या लगा पाओगे हमारी कीमत?
तुम हमें अपना हक़ नहीं देते,
क्योंकि तुम डरते हो,
तुम डरते हो हम निहत्थों से,
तुम मुफ्त खाने वाले हो,
तुम हमें लाठी और,
बन्दूक की नोक पे,
रखते हो-
लेकिन याद रक्खो,
हम अगर असलहे उठायें,
तो हम दमन नहीं,
फैसला करेंगे.


आवाज़

मैं तो आवाज़ था,
गूंजता ही रहा,
तुम दबाते रहे ,
हर घड़ी टेटुआ,
तुम सताते रहे ,
पर मिटा सके,
मैं निकलता रहा ,
इक अमिट स्रोत से,
तेरी हर चोट पे.
तुम कुचलते रहे ,
मैं उभरता रहा,
तुम सितम पे सितम ,
मुझपे ढाते रहे,
लब को सिलते रहे,
अश्क ढलते रहे.
मैं बदलता रहा ,
हर घड़ी रूप को,
तुम तो अनपढ़ रहे ,
मुझको पढ़ सके,
मेरी चुप्पी में भी ,
एक हुंकार थी ,
मुझमें वो आग थी ,
जो जला देती है,
नींव ऊँचे महल की ,
हिला देती है,
मुझमें वो राग है ,
मुझमें वो साज़ है,
जो जगा देती है ,
इक नया हौसला,
और बना देती है,
इक बड़ा क़ाफ़िला,
एक स्वर ही तो हूँ ,
देखने में मगर,
पर अजब चीज़ हूँ ,
तुम समझ सके.



खोज

मैं तुम्हारी खोज में,
युगों से रत रहा,
सुबह जब मैं आँख मलते हुए,
उठा ,
और देखा ,
सूरज की किरणों का जाल,
जिसने  मेरी अबोध दृष्टि,
उचकने का प्रयास किया,
मैं समझा तुम ,
प्रकाशपुंज हो.

जब भूख ने मुझे,
विचलित किया,
और मैं इसे ,
शांत करने हेतु,
जंगलों में फिरने लगा,
और मैंने नाना प्रकार के,
वृक्षों का अवलोकन किया,
जो सुदृढ़ और विशाल थे ,
मैं समझा तुम सर्वव्पापी,
और हर तरफ से मुझे,
घेरे हुए हो.

फिर मैंने अपने भोजन,
की व्यवस्थित संस्था का,
विकास किया,
कृषि की खोज की,
और एक दिन ओले और तूफ़ान ने,
मेरे फसल को बर्बाद ,
कर दिया ,
तब मैं समझा ये तुम हो,
जो सर्वशक्तिमान हो.

फिर रात ने दस्तक दी,
और मैं तुम्हारी बनाई भूमि पर,
एक फलसफी की भांति,
पसर गया,
और आकाश को,
असंख्य तारा मंडलों से,
सुसज्जित पाया,
मैं चींख उठा,
ये तुम हो,
जो धरती पर नहीं,
बल्कि आसमानों में रहते हो.

और युगों युगों तक,
इन्ही भ्रमों में ,
जीता रहा.
मेसोपोटामिया,मोहन-जोदड़ों,
मिस्र,फारस और यूनान ,
इत्यादि सभ्यताएं ,
मेरी गवाह बनीं.

मैंने तुम्हे प्रस्तर-खण्डों में खोजा,
तो कहीं घाटी की धुंध में,
कभी नार की लपटों में ,
तो कभी शंख-नाद में,
जैसे-जैसे मेरे मस्तिष्क का,
विकास हुआ ,
मैंने वैसे-वैसे तुम में
नए गुणों के दर्शन किये
और उनकी व्याख्या की
तुम्हारे लिए गगन-चुम्बी
प्रतिमाएं और मंदिर बनाए
तुमसे मिन्नतें,मुरादें की
अब तुम मेरी सभी सफलताओं
और असफलताओं के
पर्याय बन गए.
फिर मैं अपने विकास के उत्कर्ष
पर पहुंचा
और अब मैंने तेरी सत्ता
मानने से इनकार कर दिया
क्योंकि अब मैं
अत्याधुनिक हो चुका था .
फिर इस अंधी प्रगति में
मैंने अपनी ही कब्र खोदनी
शुरू की
और एक दिन मेरा ही
बनाया सूरज
मुझे लील गया .

और आज मेरी तुमसे भेंट
हुई
'हा-हा'-
तुम हँसते रहे
मुझ पर सदैव
शायद सोचते होगे
'मैंने भी एक अनोखे जीव की सृष्टि की'.
 
माफ़ करना


उर्वशी !!
आज तुम मेरी आँखों में
देखो
और मुझसे अपनी मासूम
स्वप्नों की दुनिया में
प्रविष्ट होने का आग्रह
करो.
और मुझसे
किसी गीत की आशा रखो.

तुम सोच रही होगी
आज मुझे ये क्या हो गया ?
हाँ, मुझे कुछ हो-सा गया है
आज मेरे सुर खो गए हैं
मेरे साज़ भग्न हैं
जहाँ मेरे स्वप्नों की बस्ती थी
वहां अब बस राख
और धुआं है.
मेरी आँखों में विभीषिका के
मंज़र हैं
मत देखो मेरी तरफ
शायद डर जाओगी
इन स्थिर नयनों में
डरावने दृश्य अंकित हैं-
कोई स्त्री चीत्कार और
रोदन कर रही है
तो कोई बच्चा भूख से व्याकुल
स्थिर तर नयनों से
जाने क्या सोच रहा है ?
जहाँ कोई तथाकथित रक्षक
भक्षक का नंगा भेस लिए
अपने शिकार की टोह में
घूम  रहा है.
तुम इन आँखों में
निरीह बेचारों को भी
देख सकती हो
जो एक मकड़-जाल में
उलझे
सहायता की गुहार
लगा रहे हैं.
यहाँ तुम उन मासूमों को भी
पाओगी जिन्हें
हक के बदले गोली देकर
हमेशा के लिए
सुला दिया गया
या कारे की तारीकियों में
फेंक दिया गया
असभ्य और जंगली कह कर.
तुम यहाँ उन बेबस माओं
को भी देख सकती हो
जिनके बेक़सूर चिरागों को
दहशतगर्द कह कर
हमेशा के लिए बुझा दिया गया.
तुम कुछ ऐसे भी दृश्य
देख सकती हो जो
अत्यंत धुधले हो चुके हैं
शायद उनपर समय की
गर्द बैठ गयी है.
क्या गीता,कुरान और
गुरु-ग्रन्थ की आयतें
नष्ट हो गयीं ?
क्या बुद्ध की शिक्षाएं
अपने अर्थ खो चुकीं ?
मालूम होता है उन्हें
दीमकों ने चाट लिया है
फिर बचा ही क्या है
यहाँ ?
मैं नहीं जानता
कहो प्रिये !
मैं कैसे इस कड़वे यथार्थ को
भूल कर
स्वप्नों में विचरण करूँ ?
कैसे प्रणय के गीत रचूं ?



तुम याद आए

तुम याद आए मुझे
जब कभी मैंने
स्वयं को
नितांत अकेले पाया.

तुम तब भी मुझे
याद आये
जब मैं ख़लाओं में
अकेला फिरा.

जब मैं लड़खड़ाया
सघन तिमिर में
मैंने तुम्हें वहां भी
याद किया.

तुम याद आये मुझे
हर उस क्षण
जब मैंने
बसंत और पतझर को
अकेले भोगा.

जब कभी मैं
डरा
सहमा
और टूटा
जीवन की कुरूपता से
तुम याद आये मुझे
वहां भी.

और आज मैं
चकित
अनुत्तरित
लाजवाब
तुम्हारा मुंह ताक रहा
खड़ा हूँ
जब तुम कहते हो
मैंने तुम्हें याद नहीं किया.



खुदा हाफ़िज़

सब सामान पैक कर लिया मैंने
अब बस सफ़र की तैयारी है
लेकिन मन में एक हूक-सी
उठ रही है
एक चिर-परिचित हूक.

ऐसा लगता है
मानो
ये नीम का पेड़
जिसने मेरा बचपन देखा है
उदास, पथराई आँखों से
अलविदा कह रहा है

ये बूढ़ा पीपल
जो हर मौसम में
हरा रहने की कला
बखूबी जानता है
आज, चुप
साकित
खड़ा है

ऐसा लग रहा है
मानो
कब्रिस्तान वाले
पोखरे के भूत ने
मेरी कमीज़ के पीछे
भौजाई की तरह
मज़ाक़ में
जैसे
खट्टी-मीठी यादों का
‘लपटा’
चुपके से
चिपका दिया हो
और
मुझ पर ठठा-ठठाकर
हंस रही हो
और मैं
बऊक, बुरबक बना
खड़ा अपना
उपहास देख रहा हूँ

और
पड़ोस की बुढ़िया ‘ईया’
का खँडहर मकान
मानो उन्हीं की आवाज़ में
सकुशल पहुँचने की दुआ
दे रहा हो
कि –
‘बबुआ ! नीके-नीक चंहु प’

बाहर वाले दालान से
गुज़रने पर यूँ लगता है
जैसे कि
अम्मा पास बुला रहीं हैं
और बुदबुदा रहीं हैं
शायद
‘आयत- अल -कुर्सी’
मुझ पर फूंकने के लिए
और उनके हाथों का स्पर्श
मुझ में एक रोमांच
भर रहा है.

गाड़ी चल पड़ी
और उसके साथ
उड़ रही
मेरे गाँव कि माटी
मानो
नंग-धडंग बच्चों कि तरह
पीछे-पीछे
दौड़ लगा रही है
और
खुदा हाफ़िज़ कह रही है
और
इस पूरे दृश्य को मैं
अपनी आँखों में
छिपा लेना चाहता हूँ
न जाने फिर कब
नसीब हो
ये सोंधी खुश्बू
ऐ मेरे गाँव,मेरी माटी
खुदा हाफ़िज़.



समय का तिलिस्म

समय के हाथ में 
एक अद्भुत तिलिस्म होता है 
ये जीवितों को मार भी देता है 
और मुर्दों को जिंदा भी कर देता है
समय और इतिहास के
आयामों में
चींखें,रोदन और नारे
हमेशा गूंजते रहते हैं
अनवरत,लगातार,बारम्बार.

राख हो चुकी ज्वाला में भी
चिंगारी दबी होती है
जो कब,कैसे और किस रूप में
भड़क उट्ठे
कोई नहीं जानता

समय का तिलिस्म
बहुत ही खतरनाक और
रोमांचक होता है
जिसकी पेचीदा गलियों में
मैं
अक्सर भटक जाता हूँ
जहाँ कुछ भी स्पर्श करता हूँ
तो सजीव हो उठता है
मेरी आँखों में आँखें डालकर
देखने लगतीं हैं
इतिहास के पन्नों पर दर्ज
तारीखें
जो मानो जवाब पाने
की ही
प्रतीक्षा में बैठीं हों
और मेरे पास उनका
कोई जवाब नहीं होता
और फिर यह तिलिस्म
छटने लगता है
और एक अजीब सी-ख़ामोशी
मुझसे लिपट जाती है.