Tuesday, July 31, 2018

प्रेमचंद जयंती, आत्म मुग्ध और बंगलादेशी शरणार्थी 27 to 31 July 2018 Posts



40 लाख लोग आपके देश मे घुस आते है और आपकी सेना, सीमा सुरक्षा बल, पुलिस, टोल नाके और स्थानीय प्रशासन चुप रहा, कमाल यह कि 70 साल हम सबको कुछ नही दिखा - अब जब 2024 में भव्य राज्याभिषेक की तैयारी चल रही है - पवित्र देव भूमि "भारत" को एक विशेषण से सुसज्जित करने की तैयारी वाया 2019 के चुनावों के चल रही है - तो रजिस्टर बन रहे है
बिल्कुल बनाओ - मोदी सरकार की यह मर्दानगी भरी कोशिश इतिहास में अमर होगी पर एक बार जो गांव - पंचायतों में पलायन रजिस्टर जिला प्रशासन बनवाता है उसका कोई फॉलोअप है कहीं दस्तावेज के रूप में
सबसे ज़्यादा बजट सेना, सीमा सुरक्षा बलों की टुकड़ियां गत 70 बरसों में खा गई सीमाओं की देखरेख करते और कर्तव्य परायणता के नाम ये जबर जनता देश मे घुस आई
कैंटीन में सस्ती दारू इसलिए मिलती है क्या मक्कारों
राहुल कह रहे है कि मनमोहन ने शुरू किया था ये तो कांग्रेस ने 56 बरसों में क्या किया
भाजपा ने आसाम से लेकर उत्तर पूर्व और प बंगाल में लगभग चुनाव हार जाने तक कि रिस्क लेकर ड्राफ्ट बनाया है जिसमे हिम्मत लगती है
अब दिक्कत यह है कि यह चुनावी मुद्दा बन गया बिहार, उप्र से लेकर इस वर्ष होने वाले चुनावों तक और कुल मिलाकर गेंद सुप्रीम कोर्ट में डल जाएगी और बतौलेबाज उस्ताद अपनी टोपी में पंख लगाकर मयूर नृत्य करते झूमेंगे
निर्वासन, विस्थापन और शरणार्थी शब्द ही डरावने है और बाकी तो है - सामने ही है
आगे देखिए कौन कौन इस आग में रोटी सेकता है और उन 40 लाख मनुष्य योनि में जन्में प्राणियों का क्या होता है , एक तरीका है कि सबको गैस चेम्बर में डालकर खत्म कर दो ताकि सबकी छाती ठंडी पड़ जाए
क्या मजाक लगा आपको, जी नही, मैं नही - बहुत लोग इसे ठीक दूसरे तरीके से लच्छेदार भाषा मे कह रहे है सुन लीजिये आपके 31 % चुने हुए प्रतिनिधि क्या बड़बड़ा रहे है , ना रोहिंग्या बोल पा रहे है - ना समझ है मुद्दों की, बग़ैर आसाम गए वो वहां के जनमानस की दुविधाएं बता रहे है यहां तक कि बेचारे नेशनल रजिस्टर फ़ॉर सिटीजन्स भी उच्चारित कर पा रहें
आईये विश्व बंधुत्व, जग सिरमौर , वसुधैव कुटुम्बकम , सर्वे संतु निरामय की व्याख्या कर अखण्ड भारत की नई संकल्पना बनाएं, 126 करोड़ में 126 लाख दीनानाथ बत्रा खोजें और किताबें लिखें और निशुल्क बांटें

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हिंदी में क्या है आपके पास
प्रेमचंद
और
मुक्तिबोध, नागार्जुन, निर्मल वर्मा और थोड़े से नामवर !!!
तो फिर
कुछ नही जब तक आप लोग प्रेमचंद से और उसके लिखे से मुक्त नही होंगे तब तक ना नया कुछ रचा जाएगा ना स्मृतियों में कुछ रहेगा
प्रेमचंद के नाम पर भी दो चार पांच कहानियां,उपन्यास और वैचारिकी है जिसे प्रलेस और जलेस वाले अपने अपने हिसाब से घोल घोलकर पीते पिलाते रहते है बाकी ना किसी ने गम्भीरता से पूरा पढ़ा होगा ना हिम्मत होगी सिवाय पी एच डी घिसने वालों के और मास्टरों की एक खास जमात ने जो जन्म से जीवन खत्म होने तक प्रेमचंद को ओढ़ते बिछाते रहेंगे
हिंदी की दुविधा यह है कि एक आदमी इतना काम जीवन मे कर गया कि उसके बाद उसे सिर्फ ढोया ही जा सकता है और विश्व विद्यालयों से लेकर शिशु मंदिरों में सिर्फ जयंती ही मनाई जा सकती है बाकी इतना लिखा जा चुका है और शोध हो चुका है कि गंगा में डालें तो वह पलटकर भगीरथ की चोटी में पुनः समा जाएगी
प्रेमचंद ठीक राधाकृष्णन की तरह है या सी वी रमन की तरह जिन्हें हर बरस किसी धार्मिक अनुष्ठान की तरह से श्राद्ध कर निपटाया जाता है , वस्तुतः होना तो यह चाहिए था कि हमें 70 बरसों में अरबों प्रेमचंद, राधाकृष्णन या सी वी रमन जैसे लोग पैदा कर लेना थे पर इससे धंधे बन्द हो जाते
मुझे लगता है कि जितनी विकट परिस्थिति आज है किसानों से लेकर युवा, स्त्रियों या सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार की उतनी तो प्रेमचंद ने सोची भी नही होगी, मूल्यों के ह्रास में जितनी प्रवीणता से हमने पारंगतता हासिल की है वह कुल जमा अंग्रेज़ी शासन काल से निम्न और नीच है, जितना दलित उत्पीड़न और भेदभाव हमने शिक्षित समाज और सम्पूर्ण साक्षरता हासिल कर विचित्र समाज बना लिया है उतना तो प्रेमचंद की मेधा विचार भी नही कर सकती थी
इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि प्रेमचंद के नाम पर बनें अड्डों पर जातीय भेदभाव, दक्षिणपंथी और कट्टर ताकतों का कब्जा है , इतिहास को अपने स्वार्थवश गलत ढंग से व्याख्यित करने वाले आसीन है और प्रेमचन्द पर मौलिक रूप से काम करने वाले छात्र सड़कों पर भटक रहे है और आत्महत्या करने को आतुर है क्योंकि ये मठाधीश उन्हें ना आगे आने दे रहें ना रास्ता छोड़ रहें
पत्र पत्रिकाओं में कूढ़मगज लोगों का विशुद्ध कब्जा है और पत्रकारों के नाम पर हमने एक अराजक और घोर मूर्खों को लाकर लेखन और जनपक्षधरता को हाशिये पर डाल दिया है ऐसे में मुझे लगता है कि अब प्रेमचंद को विलोपित करने का समय है
यह समय की चुनौती है कि उस सबको खारिज़ कर हम नया रचें, सृजन करें और वास्तव में कुछ नया रचें , प्रेमचंद के मानकों को "अनलर्न कर पुनः लर्न " करने का जोखिम उठाना ही होगा क्योंकि नए लोगों के लिए उनके उपन्यास सिर्फ एक औपनिवेशिक संजाल के प्रतीक और घर मे एंटीक के मानिंद ही है अस्तु पढ़ने लिखने से तो रहें
खैर , अब प्रेमचंद जयंती मनाने का कोई अर्थ नही है सिवाय इसके कि फेसबुक पोस्ट, एक घटिया न्यूज जिसमे अपने चमकते थोबड़े, कुछ लोगों को बुलाकर सुनकर उपकृत कर दो ग्लूकोज के बिस्किट और चाय का पानी पीना हो क्योकि अब कहने सुनने को कुछ है नही और जो कह रहे है और आयोजना बना रहे है वे सिर्फ कर्मकांडी ब्राह्मण की तरह प्रेमचंद का प्रेत काँधे पर उठाए बजट खर्च कर इतिश्री कर रहे है
बेहतर है प्रेमचंद को जनश्रुतियों से लेकर पाठ्यपुस्तकों तक से खारिज किया जाए और नवसृजन के लिए कुछ अंकुरित बीज इस बांझ जमीन पर डाले जाए, दुकानें बंद हो , अनुदान, गढ़ और मठ बन्द हो , शिष्य वृत्तियों की बंदरबांट पर रोक हो और फिर देखें कि कैसे सृजनहार नया नए भारत के वर्तमान सन्दर्भों में लिखते है पूरी प्रतिबद्धता और निष्पक्षता से

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कुछ महान लोगों के नुस्ख़े 
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आत्म मुग्ध रहिये
अपने फोटो चैंपते रहें
हर किसी की पोस्ट पर अपने कमेंट डालते रहिये
हर महिला को और उसकी हर पोस्ट को लाइक कर कमेंट करते रहें - बहुत खूब, अप्रतिम,अदभुत, बधाई, शुभकामनाएं जैसे शब्दों से
अपनी कहानी, कविता, आलोचना और किसी के भी लिखें कमेंट या निजी पत्राचार को भी बगैर सूचना के अधिकार का उपयोग किये सार्वजनिक करिये
हर कही भी छपिये और उस कूड़े को यहां पेलिये
हर गोष्ठी में जाईये चाहे वो आपके बस की हो या नही
हर किसी को चरण स्पर्श से लेकर शुभाशीर्वाद देते रहें
किसी के भी निजी संवादों या पोस्ट में जबरन घुसकर हड्डी बनिये
खुद के इतने फोटू डालो और इतनी पोस्ट डालो कि फेसबुक के अरबों यूजर्स आपको हगते - मूतते और सोते - जागते पहचान जाएं
संसार मे जितने मंच, पत्र पत्रिकाएं और उलजुलूल किस्म के प्रकाशन है उन पर चढ़ो और इतने नाचो कि वो बन्द ही हो जाएं
संवाद के नाम पर खूब बकर करो
जितने ईनाम, पुरस्कार, शिष्यवृत्ति, फेलोशिप और चाटुकारिता के नाम पर अवार्ड और धनराशि संसार मे उपलब्ध हो उसे बटोरने की कोशिश करो भले उसके पैमाने में हो या ना हो, औकात हो या ना हो, अपने नाम नही तो अपने कुत्ते , बिल्ली, उल्लू , लोमड़ी या पाले हुए गधों के नाम पर ही सही
किसी भी भाषा का कचरा या अपना कचरा किसी भी भाषा मे उठा लो और महान बनो
पूंजी , कुरआन, गुरुबाणी से लेकर दुर्गा सप्तशती के पाठ करो , कामरेडों के साथ से लेकर अपने समाज और जाति के झंडे भी उठाते रहो और हर किसी की प्रतिबद्धता पर सवाल करते हुए अपनी रीढ़ को मरोड़ दो
रिश्ते नाते, यारी दोस्ती को तिलांजलि देकर सबको अपने शब्दों की फ्रेम में पिरोकर बेचो क्योकि जो दिखेगा वही बिकेगा
गरीबी को खूब बेचो क्योकि यही साली दो कौड़ी की घटिया चीज़ है जो संसार को आज भी च च च च करके आकर्षित करती है और अपने बंगले आबाद होते है, खेती के रकबे बढ़ते है
सम्पादकों से लेकर मुहल्ले के गुंडे - मवाली की पाद पूजा कर स्थापित हो
हर पोस्ट पर हर लाईक करने वाले और कमेंट करने वाले को धौंक दो और दण्डवत हो जाओ मानो उसने सिर्फ आपको ही उपकृत किया बापडे ने
अमेरिका, वियतनाम से लेकर पुर्तगाली साहित्य और विश्व मंदी पर लिखो भले ही चोरी - चकारी कर कॉपी पेस्ट करना हो , विषय का कोई पैमाना नही जब धनलक्ष्मी से इश्क कर लिया तो लेखन और व्यवहार में नैतिकता के कोई मायने है
इनसे श्मशान घाट में भी आप किताब बिकवा सकते है और ये मिजाज पुर्सी में जाकर भी कालजयी रचना लिख सकते है, अनुवाद की शुचिता से परे जाकर ये कुछ भी संग्रहित कर अपने नाम का ठप्पा लगाकर बेच सकते है
आइए इन सब भाँडो और चारणों का इस आधुनिक समय मे इस्तकबाल करें और दुआएँ दें कि ये बनें रहें ताकि आप अपने आपको इनकी कमीनगियाँ देखकर कितना और गिरना है बार बार तय कर सकें
जितने बेशर्म, नीच, हलकट और घटिया रहेंगे आप -उतने ही पुरस्कारों और विशिष्टता के करीब होंगे
मैं मुतमइन हूँ कि आप एक बार जरा निगाह घुमाएंगे तो आपको ये बहुरूपिये दांत निपोरते मिल ही जायेंगे
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गुरु घण्टालों कितनों से कितना लूटा आज दिनभर में - पाद पूजा, चढ़ावे और गुरु भक्ति के नाटक में
कितने कपड़े लत्ते आये और जेवर
लम्बी लाईन में सजे धजे पवित्र भाव के मुखौटों से लबरेज मूर्खों की भीड़ को देखकर सिसकते अहम की तुष्टि हुई होगी ना, खूब ताड़ते रहें महिला भक्तों को और खूब हाथ फेरा होगा पीठ, काँधों पर आज तो
इंदौरी ठग भैय्यू महाराज का अंत याद आया कि नही और अपनी औकात टटोली की नही
मतलब गजबै कर दिए आज तो
मास्टरों को भी हार फूल , सड़ी गली शॉल और उबाऊ भाषण मिलें होंगे
सो जाओ , शिक्षक पंचमी में अभी बहुत समय है - कल हो ना हो !
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गुरुओं ख़ुश हो जाओ कि आज तुम्हारा दिन है
पर एक बार झांक भी लो गिरेबाँ में अपने कि क्या कर दिया इस देश का हाल तुमने विगत 70 वर्षों में
शिक्षा स्वास्थ्य से लेकर नैतिकता, धर्म , शर्म , आध्यात्म और मूल्यों का जितना ह्रास हुआ है वह और कोई नही कर सकता था सिवा तुम्हारे
लम्पट, ढोंगी , मोह माया में लिप्त और भ्रष्ट तुम सब इस पतन के लिए जिम्मेदार ही नही भागीदार भी हो
बहरहाल फिर भी बनाओ आज फिर बेवकूफ लोगों को, लूटो और बरगलाओ कि बने रहें अड्डे, मठ और चबूतरे तुम्हारे और तमाम कुकर्म ज़िंदा रहें आचार्य, आमात्य और महामात्यों

Saturday, July 28, 2018

24/25 जुलाई 2018 के यादगार पल अजमेर में

24/25 जुलाई 2018 के यादगार पल अजमेर में 
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कुछ बे-ठिकाना करती रहीं हिजरतें मुदाम
कुछ मेरी वहशतों ने मुझे दर-ब-दर किया
-साबिर ज़फ़र

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अजमेर में हूँ एक प्रशिक्षण में
अचानक से फोन आता है कि आप कब तक रहेंगे - मैनें कहा क्यों , फिर थोड़ा सोचकर बोला कि अभी हूँ 2 दिन और
ठीक है शाम को मिलते है

कहां
अजमेर में, पता भर बता दीजिए
अबे ओ बिहारी, दिल्ली में पढ़े , केरल में नौकरी कर रहे ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता,सियाहत के लेखक - अजमेर राजस्थान में है केरल में नही , कहां से मिलेगा शाम को , दिमाग खराब है क्या
दादा शाम को मिलते है... फोन कट गया ! दिनभर व्यस्त रहा शाम को अचानक फोन आया 520 पर, बस दो मिनिट में पहुंच रहा हूँ - बाहर आइये
मैं कमरे से निकलकर बाहर आता हूँ तो देखता हूँ साक्षात आलोक बाबू सामने है , 8-9 साल बाद - सपना या सच अपने को चिकोटी काटता हूँ और गले लगा लियौ भींचकर तो यकायक आँसू निकल पड़े । संयोग ऐसे भी हो सकते है क्या, जीवन इतना सुखकर भी हो सकता है ?
थोड़ी देर में एक मोहतरमा आती है मिलने - जिन्हें आलोक ने बुलाया है और फिर एक और सज्जन, एक शोधार्थी दोपहर ही आ गया था मिलने - बस फिर क्या, खूबसूरत समां चाय और बातचीत । लम्बी बात साहित्य, शिक्षा, निंदा पुराण, लेखन, कविता , कहानी, उपन्यास, दिल्ली , किताब , प्रकाशक और राजस्थान के लेखक - मतलब डेढ़ दो घँटे बातचीत और दो खूबसूरत मेजबानों के साथ लज़ीज़ भोजन, मतलब जीवन मे इससे बेहतर और क्या हो सकता था!!! और यह सब सम्भव हुआ फेसबुक वाट्स एप्प की बदौलत - आप गलियाते रहिये इन माध्यमों को पर हम तो इश्क की दुनिया इन्ही प्लेटफॉर्म्स से आबाद करते रहेंगे जो जीवन को सुलभ बना रहे है और दोस्ती के दायरे बढ़ा रहे है
भोजन पश्चात दोनो मेजबानों द्वारा अपनी लिखी किताब भेंट करना मतलब सोने में सुहागा . सहज, सौम्य, विशुद्ध अकादमिक अध्येताद्वय डॉ विमलेश शर्मा जी, एक अच्छी कहानीकार - जो कमलेश्वर के साहित्य पर पी एच डी कर स्थानीय कन्या महाविद्यालय में प्राध्यापक है, डॉ किशना राम महिया जी - संस्कृत के प्रकांड विद्वान और प्राध्यापक - जो हिंदी साहित्य के गम्भीर अध्येता भी है, से मुलाकात , दोनो का स्नेहिल साथ और आतिथ्य मिला
सुबह ख्वाज़ा साहब की दरगाह शरीफ हो कर आया था पर रात को फिर सियाहत के लेखक Alok Ranjan के लिए टांग दुखाते हुए रात ग्यारह बजे पुनः दरगाह पहुँचे। इतनी भीड़ और रंगीन नज़ारे, कव्वाली का सुरूर और लोगों की श्रद्धा देखकर अभिभूत हुऐ दरगाह जो बन्द थी सिर्फ ज़ायरीन अंदर जा सकते थे पर कैम्पस में देर तक बैठकर सब निहारते रहें और रूहानी सुकून को महसूस किया, किसी शहर को सोते हुए देखना कितना सुकून देता है यह एहसास पुख्ता हुआ
खूब गप्प करते लौटे और फिर रात लगभग दो बजे सोए
कल सुबह दरगाह गया था तो पता नही था कि केरल से दिल्ली आया आलोक अचानक यूं मिलने आ जायेगा और जीवन की 25 जुलाई की शाम को इतने प्यारे दोस्तों के साथ अमर बना देगा - यह सब ख़्वाजा साहब की दुआओं के फ़लीभूत होने का असर है कि हम 8 साल बाद मिलें
सबका शुक्रिया , यह दिन धरोहर है और स्मृतियों में बने रहने वाली ताकत





Sunday, July 22, 2018

शापित गंधर्व का उदित होना - मुकुल शिवपुत्र का पुनः महफ़िल में आना 22 July 2018




शापित गंधर्व का उदित होना

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ये जज्बा कितने दिनों तक बना रहेगा यह देखना होगा

मुकुल तो खुद बाहर आना चाहता है इस सबसे पर मित्र और बाकी लोग चाहते है कि वो उसी मयखाने में डूबा रहें क्योकि उसके मैदान में आने से बहुत लोगों के संगीत की कलाईयाँ ही नही खुलेगी बल्कि धँधा भी चौपट हो जाएगा
बात निकलेगी तो हिसाब किताब होंगे और फिर संगीत की सत्ताएं भी हिलेंगी और खतरे बढ़ेंगे
यह दीगर बात है कि मुकुल का गायन समकालीन शास्त्रीय संगीत के परिदृश्य पर सबसे श्रेष्ठ, सशक्त और पूर्णतः अकादमिक है, मुकुल की गायकी में जो नूतनता और मौलिकता है वह कही से किसी कैसेट सुनकर घरानों की नकल नही लगती है और यही ठेठ पन, सादगी और रागों पर मजबूत पकड़ उन्हें महफ़िल में सम्मान भी देती है और शाश्वत पहचान भी
मेरी नजर में वर्तमान समय मे वे एकमात्र ऐसे गायक है जो शास्त्रीयता की बारीकी को समझते ही नही, पकड़ ही नही रखते बल्कि नए प्रयोग और अनुसंधान से राग विराग को एक प्रभावी उच्च दिशा में ले जाने का साहस भी जोखिम के साथ रखते है , कबीर की परंपरा को वे बेहद अख्खड़ पन से लगभग तीन दशकों से जीते आये है - एक धोती और एक कुर्ते में क्या तन माँजता रे एक दिन माटी में मिल जाना को जीने के साथ चरितार्थ भी कर रहे है और इस तरह से कबीर की असली परम्परा को निभा रहे है
दुनियादारी से दूर जीवन जी रहे माँ नर्मदा के पुल के नीचे हंडिया में लगभग बीस वर्ष बीता देने वाले मुकुल दा से परिचय बहुत पुराना है भोपाल में बीते दुखद समय फिर सीहोर के नशा मुक्ति केंद्र में तीन माह तक सम्पर्क आदि सबके बाद उनका पूना चले जाना और अब यह खबर बेहद आशा जगाती है
मुकुल शिवपुत्र को अगर यह सच में लग रहा है कि वे अब महफिलों को बेहतर आकार देकर शास्त्रीयता से संगीत को एक मकाम पर ले जा सकते है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए और उन्हें पर्याप्त समय, मौके भी दिए जाने की जरूरत है
देर से ही सही शास्त्रीय संगीत के मुरीदों को अपने प्रिय गायक को फिर जमुना किनारे के गांव को लय में सुनने देखने का प्रत्यक्ष मौका मिलेगा और हम , Navin Rangiyal Anirudh Umatतो इंतज़ार कर ही रहे है कि यह दशकों का सूनापन खत्म हो और कोई गायक आये और संगीत की सुर लहरियां बिछा कर आत्मा के पोर पोर पर रागों बरसात कर दें
आमीन

Wednesday, July 18, 2018

तीन माह की बच्ची से चालीस साला औरतों के बीच मीडिया में चांटे , अग्निवेश की पिटाई Posts of 17 July 2018


सिर्फ मनुष्य होने का सपना भी खत्म हो गया और मैं, तुम, वो और हम - सब कुछ भी नही कर पाएं, हमारी एषणा हमें ही छलती रही - बस धीरे धीरे सब समाप्त हो गया
तीन माह की बच्ची से चालीस साला औरतों के बीच मीडिया में चांटे 


बहुत सालों से कह रहा हूँ कि जेंडर की बहस अब बराबरी, सिगरेट, शराब, सेक्स और वेतन की बराबरी या रसोई के काम तक सीमित नही है बल्कि मामला बहुत आगे जा चुका है

यह अब सीधे सीधे सत्ता के उपयोग, दुरुपयोग, मीडिया में ट्रोल बनने और बलात्कार के साथ अदालतों में खड़े होकर पीटने से लेकर लाइव प्रोग्राम में धर्म के तथाकथित अपढ़ कुपढ मुल्ला मौलवियों और पंडितों और रसूखदारों पर हाथ उठाकर चांटा मारने और खाने तक आ गया है
देश मे जो भी तनावग्रस्त, पति से हारी, सास - ससुर से तंग , तलाकशुदा , परित्यक्तताएँ , सेल्फ एस्टीम खोजती तितलियां है और एनजीओ में जेंडर की बहस में रुपया कमाने वाली और बहनापा जताकर घर बिगाड़ू औरतें है वे देख लें कि यह बहस कहां आ गई और अब रेडिकल एक्शन का समय है
हमारे नीति निर्धारक, चापलूस और समाज के ठेकेदार भी समझ लें कि आपको बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ से नही - कुछ और हथियारों से समाज की रचना प्रक्रिया में जोड़ना पड़ेगा
हिंदी की कवियित्रियों को सोलह साल से लेकर चालीस साला औरतें जैसी कविताओं, मासिक धर्म और चेहरे की झुर्रियों और बॉस को रिझाने के एक हजार उपाय या पुरस्कार के जुगाडमेन्ट के बजाय कुछ और सार्थक लिखना होगा, बहुत हो गया "मैं नीर भरी दुख की बदली" और " दफ्तर में आकर नाखूनों में गीले आटे को खुरचने" की अदायें - ये अब पत्थर युग की बातें है
अंजना ओम कश्यप जैसी कर्कश महिलाओं और प्रायोजित मुल्लों को लेकर सत्ता जो खेल करती है साथ ही कुछ प्रगतिशील कठमुल्ले लिख भी दें कि यह सत्ता का खेल है और हम इसमें एक समुदाय के स्तर पर शामिल नही तो बात अब बनेगी नही गुरु , ये वही भेड़िया भीड़ है जो सुषमा स्वराज को भी नही छोड़ती और कठुआ कांड में भी झंडा उठाकर सामने आती है
दुकानों के पर्दे नही - बरनी, तराजू और सामान बदलने का भी समय आ गया है और अब जो जेंडर और बराबरी की बात करें सोच समझकर करें और लिजलिजी भावनाओं में अब कुछ होने वाला नही है, बन्द करो बहस और आंकड़ों की बाजीगरी, महिला साक्षरता की तबला - पेटी और झांझ बजाकर महिलाओं ने ही और महिलाओं की दुकान उर्फ एनजीओ ने सरकार जैसी संस्था को चूतिया बना दिया एवम ताली पीटने लायक भी नही छोड़ा और इन जेंडरियों ने अपना घर भर लिया
अब नए हथियार , बहस के मुद्दे और तर्क ढूंढकर लाओ या वाट्स एप समूहों में या किटी पार्टी में बजबजाते रहो, जेंडर और स्त्री मुक्ति के नए सन्दर्भ है और नए प्रसंग - इनकी व्याख्या एनजीओ स्टाइल में या धार्मिक आख्यान से नही हो सकती

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न्यूड इंडिया में युवाओं की भीड़ और जोश के बीच स्वागत है
सुप्रीम कोर्ट के आज के निर्णय के दिन ही कानून की धज्जियां उड़ाई गई है अर्थात अब जंगलराज है
किसी को किसी का डर नही है और यह सब कौन क्यों और किस ध्येय को लक्ष्य कर के कर रहा है हम सब जानते है पर ना तुम बोलो ना हम
कितना और गिरोगे , किस संस्कृति की पैदाइश हो, किस मॉडल के अनुयायी हो, किसकी संतति हो और किसकी नाजायज पैदाईश
शर्म हया है या बेच खाई है
देश है या मजाक और याद रखना कल ये भस्मासुर तुम्हे भी नही छोड़ेंगे, जब तुम इनके मन माफिक फ़ैसले नही लोगे तो और इस बात के लिए मुतमईन हूँ - अभी तुम्हारी ही विदुषी सुषमा स्वराज को ट्रोल किया था ना , सामने होती तो पीट पीटकर सड़क पर ही हत्या कर देते ये भारत माँ के सच्चे शेर
अरे मर्दों कश्मीर जाओ, बॉर्डर पर जाओ वहां असली दुश्मन सशरीर उपस्थित है - जाओ, मर्दानगी दिखाओ - एक 80 साल के बुजुर्ग को पीटकर कौनसे मर्द हो जाओगे
सीजेआई सुन रहे हो, देख रहे हो न - गलत परम्पराओं को अपनाने और प्रश्रय देने के निहितार्थ - आज तुम्हारे ही निर्णयों का मखौल उड़ाते ये न्यायप्रिय युवा नागरिक सड़क पर नंगा नाच कर रहें है
हो सकता है कल कुछ और निर्णय या कोई बड़ा निर्णय लो तो ये तुम्हे उसी क्षण चेम्बर से खींचकर मार दें , क्या उस दिन का इंतज़ार कर रहें हो , जस्टिस लोया की आत्मा सब देख रही होंगी - सब यही है - यही है - यही है पुण्य और पाप का हिसाब, कहते है ना समय बड़ा बलवान और ईश्वर के घर देर है अंधेर नही
याद रखना "सुख के सब साथी, दुख का ना कोई"
पत्रकार मित्र Kundan Pandey का कहना है कि " 2019 लोकसभा चुनाव में विपक्ष को यह तस्वीर हर गली-मोहल्ले में लगाना चाहिए" [ तस्वीर 2 ]

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19 July

कल का अविश्वास प्रस्ताव महज सदन का समय और हमारे धन को बर्बाद करने का एक और दिन है
यह करके विपक्ष बची खुची विश्वसनीयता भी गवां रहा है
एक भी ऐसा नही जो तर्कपूर्ण ढ़ंग से बोल सकेगा , फालतू में मीडिया को चिन्दी दे दी
राहुल तर्कपूर्ण बोलेंगे पर भाजपा और अमित शाह मोदी ने तो पूर्वाग्रह बना रखें है कि हंसी उड़ाना ही है तो कोई अर्थ नही , बाकी विपक्ष कुत्तों की तरह पूंछ ही हिलाएगा - सबके हित जुड़े ही है छुपा नही है
बेहतर है कि सुबह जाकर वापिस ले लें और कुछ बिल पर बहस कर लें, सरकार इस बहाने से बदमाशी कर 65 मनमाने ढंग से बिल चुपचाप पास कर लेगी और जनता को मालूम भी नही पड़ेगा, ये लोग इतने सीधे नही कि तुरन्त मान गए
यह षड्यंत्र है और कमाल यह है कि सारे शिरोमणि एक झटके में शिकार हो गए
इससे तो इनकी ही शक्ति बढ़ेगी और जनता में मोदी का फिर फेस लिफ्ट होगा और बचे एक साल में ये मनमानी कर और विध्वंस करेंगे