Wednesday, August 31, 2011

व्यवस्था के शस्त्रागार का एक नया हथियार(जनपक्ष से साभार)


(समकालीन तीसरी दुनिया का आनंद स्वरूप वर्मा द्वारा लिखा यह सम्पादकीय अन्ना परिघटना पर एक ज़रूरी और बहसतलब हस्तक्षेप है. चारों तरफ फैले समर्थन और विरोध के उन्मादी और कई बार अविवेकी धुंध के बीच यह टिप्पणी पूरी परिघटना के एक जनपक्षधर विवेचना की सार्थक कोशिश करती है)

जो लोग यह मानते रहे हैं और लोगों को बताते रहे हैं कि पूंजीवादी और साम्राज्यवादी लूट पर टिकी यह व्यवस्था सड़ गल चुकी है और इसे नष्ट किये बिना आम आदमी की बेहतरी संभव नहीं है उनके बरक्स अण्णा हजारे ने एक हद तक सफलतापूर्वक यह दिखाने की कोशिश की कि यह व्यवस्था ही आम आदमी को बदहाली से बचा सकती है बशर्ते इसमें कुछ सुधार कर दिया जाय। व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र से जिन लोगों का मोहभंग हो रहा था उस पर अण्णा ने एक ब्रेक लगाया है। अण्णा ने सत्ताधारी वर्ग के लिए आक्सीजन का काम किया है और उस आक्सीजन सिलेंडर को ढोने के लिए उन्हीं लोगों के कंधों का इस्तेमाल किया है जो सत्ताधारी वर्ग के शोषण के शिकार हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे उसी निजाम को बचाने की कवायद में तन-मन-धन से जुट गये जिसने उनकी जिंदगी को बदहाल किया। देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जुझारू संघर्षों की ताप से झुलस रहे सत्ताधारियों को अण्णा ने बहुत बड़ी राहत पहुंचाई है। शासन की बागडोर किसके हाथ में हो इस मुद्दे पर सत्ताधारी वर्ग के विभिन्न गुटों के बीच चलती खींचतान से आम जनता का भ्रमित होना स्वाभाविक है पर जहां तक इस वर्ग के उद्धारक की साख बनाये रखने की बात है, विभिन्न गुटों के बीच अद्भुत एकता है। यह एकता 27 अगस्त को छुट्टी के दिन लोकसभा की विशेष बैठक में देखने को मिली जब कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी और भाजपा की सुषमा स्वराज दोनों के सुर एक हो गये और उससे जो संगीत उपजा उसने रामलीला मैदान में एक नयी लहर पैदा कर दी। सदन में शरद यादव के भाषण से सबक लेते हुए अगले दिन अपना अनशन समाप्त करते समय अण्णा ने बाबा साहेब आंबेडकर को तो याद ही किया, अनशन तोड़ते समय जूस पिलाने के लिए दलित वर्ग और मुस्लिम समुदाय से दो बच्चों को चुना।

अण्णा हजारे का 13 दिनों का यह आंदोलन भारत के इतिहास की एक अभूतपूर्व और युगांतरकारी घटना के रूप में रेखांकित किया जाएगा। इसलिए नहीं कि उसमें लाखों लोगों की भागीदारी रही या टीवी चैनलों ने लगातार रात दिन इसका प्रसारण किया। किसी भी आंदोलन की ताकत या समाज पर पड़ने वाले उसके दूरगामी परिणामों का आकलन मात्र इस बात से नहीं किया जा सकता कि उसमें लाखों लोगों ने शिरकत की। अगर ऐसा होता तो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से लेकर रामजन्मभूमि आंदोलन, विश्वनाथ प्रताप सिंह का बोफोर्स को केंद्र में रखते हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, मंडल आयोग की रिपोर्ट पर आरक्षण विरोधी आंदोलन जैसे पिछले 30-35 वर्षों के दौरान हुए ऐसे आंदोलनों में लाखों की संख्या में लोगों की हिस्सेदारी रही। किसी भी आंदोलन का समाज को आगे ले जाने या पीछे ढकेलने में सफल/असफल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस आंदोलन को नेतृत्व देने वाले कौन लोग हैं और उनका ‘विजन’ क्या है? अब तक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बना कर जनभावनाओं का दोहन किया जाता रहा है। अण्णा के व्यक्तित्व की यह खूबी है कि इस खतरे से लोग निश्चिंत हैं। उन्हें पता है कि रालेगण सिद्धि के इस फकीरनुमा आदमी को सत्ता नहीं चाहिए।

अण्णा का आंदोलन अतीत के इन आंदोलनों से गुणात्मक तौर पर भिन्न है क्योंकि आने वाले दिनों में भारतीय समाज में बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों के बीच यह ध्रुवीकरण का काम करेगा। किसी भी हालत में इस आंदोलन के मुकाबले देश की वामपंथी क्रांतिकारी शक्तियां न तो लोगों को जुटा सकती हैं और न इतने लंबे समय तक टिका सकती हैं जितने लंबे समय तक अण्णा हजारे रामलीला मैदान में टिके रहे। इसकी सीधी वजह यह है कि यह व्यवस्था आंदोलन के मूल चरित्र के अनुसार तय करती है कि उसे उस आंदोलन के प्रति किस तरह का सुलूक करना है। मीडिया भी इसी आधार पर निर्णय लेता है। आप कल्पना करें कि क्या अगर किसी चैनल का मालिक न चाहे तो उसके पत्रकार या कैमरामेन लगातार अण्णा का कवरेज कर सकते थे? क्या कारपोरेट घराने अपनी जड़ खोदने वाले किसी आंदोलन को इस तरह मदद करते या समर्थन का संदेश देते जैसा अण्णा के साथ हुआ? भारत सरकार के गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन वर्षों में यहां के एनजीओ सेक्टर को 40 हजार करोड़ रुपये मिले हैं- उसी एनजीओ सेक्टर को जिससे टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, किरन बेदी, संदीप पांडे, स्वामी अग्निवेश जैसे लोग घनिष्ठ/अघनिष्ठ रूप से जुड़े/बिछड़े रहे हैं। इस सारी जमात को उस व्यवस्था से ही यह लाभ मिल रहा है जिसमें सडांध फैलती जा रही है, जो मृत्यु का इंतजार कर रही है और जिसे दफनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पीड़ित जनता संघर्षरत है। आज इस व्यवस्था का एक उद्धारक दिखायी दे रहा है। वह भले ही 74 साल का क्यों न हो, नायकविहीन दौर में उसे जिंदा रखना जरूरी है।

क्या इस तथ्य को बार बार रेखांकित करने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार का मूल स्रोत सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियां हैं? इन नीतियों ने ही पिछले 20-22 वर्षों में इस देश में एक तरफ तो कुछ लोगों को अरबपति बनाया और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में मेहनतकश लोगों को लगातार हाशिये पर ठेल दिया। इन नीतियों ने कारपोरेट घरानों के लिए अपार संभावनाओं का द्वार खोल दिया और जल, जंगल, जमीन पर गुजर बसर करने वालों को अभूतपूर्व पैमाने पर विस्थापित किया और प्रतिरोध करने पर उनका सफाया कर दिया। इन नीतियों की ही बदौलत आज मीडिया को इतनी ताकत मिल गयी कि वह सत्ता समीकरण का एक मुख्य घटक हो गया। जिन लोगों को इन नीतियों से लगातार लाभ मिल रहा है वे भला क्यों चाहेंगे कि ये नीतियां समाप्त हों। इन नीतियों के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में जो उथल-पुथल चल रही है उससे सत्ताधारी वर्ग के होश उड़े हुए हैं। ऐसे में अगर कोई ऐसा व्यक्ति सामने आता है जिसका जीवन निष्कलंक हो, जिसके अंदर सत्ता का लोभ न दिखायी देता हो और जो ऐसे संघर्ष को नेतृत्व दे रहा हो जिसका मकसद समस्या की जड़ पर प्रहार करना न हो तो उसे यह व्यवस्था हाथों हाथ लेगी क्योंकि उसके लिए इससे बड़ा उद्धारक कोई नहीं हो सकता। अण्णा की गिरफ्तारी, रिहाई, अनशन स्थल को लेकर विवाद आदि राजनीतिक फायदे-नुकसान के आकलन में लगे सत्ताधारी वर्ग के आपसी अंतर्विरोध की वजह से सामने आते रहे हैं। इनकी वजह से मूल मुद्दे पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

अण्णा के आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गांधीजी द्वारा चलाये गये सत्याग्रहों और आंदोलनों की उन लोगों को याद दिला दी जिन्होंने तस्वीरों या फिल्मों के माध्यम से उस आंदोलन को देखा था। गांधी के समय भी एक दूसरी धारा थी जो गांधी के दर्शन का विरोध करती थी और जिसका नेतृत्व भगत सिंह करते थे। जहां तक विचारों का सवाल है भगत सिंह के विचार गांधी से काफी आगे थे। भगत सिंह ने 1928-30 में ही कह दिया था कि गांधी के तरीके से हम जो आजादी हासिल करेंगे उसमें गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज हो जायेंगे क्योंकि व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होगा। तकरीबन 80 साल बाद रामलीला मैदान से अण्णा हजारे को भी यही बात कहनी पड़ी कि गोरे अंग्रेज चले गये पर काले अंग्रेजों का शासन है। इन सबके बावजूद भगत सिंह के मुकाबले गांधी को उस समय के मीडिया ने और उस समय की व्यवस्था ने जबर्दस्त ‘स्पेस’ दिया। वह तो टीआरपी का जमाना भी नहीं था क्योंकि टेलीविजन का अभी आविष्कार ही नहीं हुआ था। तो भी शहीद सुखदेव ने चंद्रशेखर आजाद को लिखे एक पत्र में इस बात पर दुःख प्रकट किया है कि मीडिया हमारे बयानों को नहीं छापता है और हम अपनी आवाज जनता तक नहीं पहुंचा पाते हैं। जब भी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने वाली ताकतें सर उठाती हैं तो उन्हें वहीं खामोश करने की कोशिश होती है। अगर आप अंदर के रोग से मरणासन्न व्यवस्था को बचाने की कोई भी कोशिश करते हुए दिखायी देते हैं तो यह व्यवस्था आपके लिए हर सुविधा मुहैया करने को तत्पर मिलेगी।

अण्णा हजारे ने 28 अगस्त को दिन में साढ़े दस बजे अनशन तोड़ने के बाद रामलीला मैदान से जो भाषण दिया उससे आने वाले दिनों के उनके एजेंडा का पता चलता है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने उन सारे मुद्दों को भविष्य में उठाने की बात कही है जो सतही तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का आभास देंगे लेकिन बुनियादी तौर पर वे लड़ाइयां शासन प्रणाली को और चुस्त-दुरुस्त करके इस व्यवस्था को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा टिकाऊ, दमनकारी और मजबूत बना सकेंगी। अण्णा का आंदोलन 28 अगस्त को समाप्त नहीं हुआ बल्कि उस दिन से ही इसकी शुरुआत हुई है। रामलीला मैदान से गुड़गांव के अस्पताल जाते समय उनकी एंबुलेंस के आगे सुरक्षा में लगी पुलिस और पीछे पल पल की रिपोर्टिंग के लिए बेताब कैमरों से दीवाल पर लिखी इबारत को पढ़ा जा सकता है। व्यवस्था के शस्त्रागार से यह एक नया हथियार सामने आया है जो व्यवस्था बदलने की लड़ाई में लगे लोगों के लिए आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करेग

बूढ़े इंतजार नहीं करते

बूढ़े इंतज़ार नहीं करते
वे अपनी हड्डियों में बचे रह गए अनुभव के सफ़ेद कैल्सियम से
खींच देते हैं एक सफ़ेद और ख़तरनाक लकीर
और एक हिदायत
कि जो कोई भी पार करेगा उसे
वह बेरहमी से क़त्ल कर दिया जाएगा
अपनी ही हथेली की लकीरों की धार से
और उसके मन में सदियों से फेंटा मार कर बैठा
ईश्वर भी उसे बचा नहीं पाएगा

बूढ़े इंतज़ार नहीं करते
वे काँपते–हिलते उबाऊ समय को बुनते हैं
पूरे विश्वास और अनुभवी तन्मयता के साथ
शब्द-दर-शब्द देते हैं समय को आदमीनुमा ईश्वर का आकार
खड़ा कर देते हैं
उसे नगर के एक चहल-पहल भरे चौराहे पर
इस संकल्प और घोषणा के साथ
कि उसकी परिक्रमा किए बिना
जो क़दम बढ़ाएगा आगे की ओर
वह अंधा हो जाएगा एक पारंपरिक
और एक रहस्यमय श्राप से

यह कर चुकने के बाद
उस क्षण उनकी मोतियाबिंदी आँखों के आस-पास
थकान के कुछ तारे टिमटिमाते हैं
और बूढ़े घर लौट आते हैं
कर्तव्य निभा चुकने के सकून से अपने चेहरे की झुर्रियाँ पोंछते

बूढ़े इंतज़ार नहीं करते
वे धुँधुआते जा रहे खेतों के झुरमुटों को
तय करते हैं सधे क़दमों के साथ
जागती रातों की आँखों में आँखें डाल
बतियाते जाते हैं अँधेरे से अथक
रोज़-ब-रोज़ सिकुड़ती जा रही पृथ्वी के दुख पर करते हैं चर्चा
उजाड़ होते जा रहे अमगछियों के एकांत विलाप के साथ
वे खड़े हो जाते हैं प्रार्थना की मुद्रा में
टिकाए रहते हैं अपनी पारंपरिक बकुलियाँ
गठिया के दर्द भुलाकर भी
ढहते जा रहे संस्कार की दलानों को बचाने के लिए

बूढ़े इंतज़ार नहीं करते
हर रात बेसुध होकर सो जाने के पहले
वे बदल देना चाहते हैं अपने फटे लेवे की तरह
अजीब-सी लगने लगी पृथ्वी के नक्शे को
और खूँटियों पर टँगे कैलेण्डर से चुरा कर रख लेते हैं
एकादसी का व्रत
सतुआन और कार्तिक स्नान
अपनी बदबूदार तकिए के नीचे
अपने गाढ़े और बुरे वक़्त को याद करते हुए

बूढ़े इंतज़ार नहीं करते
अपने चिरकुट मन में दर-दर से समेट कर रक्खी
जवानी के दिनों की सपनीली चिट्ठियों
और रूमानी मंत्रों से भरे जादुई पिटारे को
मेज़ पर रखी हुई पृथ्वी के साथ सौंप जाते हैं
घर के सबसे अबोध
और गुमसुम रहने वाले एक शिशु को

और एक दिन बिना किसी से कुछ कहे
अपनी सारी बूढ़ी इच्छाओं को अधढही दलान की आलमारी में बंद कर
वे चुपचाप चले जाते हैं मानसरोवर की यात्रा पर
याकि अपने पसंद के किसी तीर्थ या धाम पर
और फिर लौट कर नहीं आते...
विमलेश त्रिपाठी { हम बचे रहेंगे संग्रह से }

स्त्री की प्रतिभा का लोहा मानने को कोई तैयार नहीं

हाय रे वो दिन क्यों न आये फिल्म अनुराधा का अनमोल गीत आपके लिए ओर "तुम्हारे लिए" सिर्फ फिल्म ही नहीं इसमे एक स्त्री की कुर्बानी ओर समर्पण की कहानी है जो बहुधा पुरुष देख नहीं पाते ओर अपने को सफल करने में वो किस तरह से प्रतिभा का गला घोट देते है ओर एक जीती जागती स्त्री को खत्म कर देते है यह गीत इसका प्रमाण भी है.........अदभुत है यह कथा ओर संसार........बहुत दुखद ओर गंदा स्त्री की प्रतिभा का लोहा मानने को कोई तैयार नहीं .................

लड़ झगडकर ईदी लेते थे

सबको ईद की ढेरो शुभकामनाएं.........................देवास की याद आ रही है जब दोस्तों के यहाँ धमाल करते थे ओर फ़िर आख़िरी में नईम जी से लड़ झगडकर ईदी लेते थे वो एक एक रूपये के सिक्के अभी भी सम्हाल कर रखे है मुसीबत के दिनों केलिए पर उनकी बरकत यह है कि इंशा अल्लाह मुसीबत कभी आयी ही नहीं अभी तक ओर खुदा करे कि कभी ना आयें.....आप सबको को भी एसी सुबह कभी ना देखना पड़े यही दुआ है..................कहते थे "सुल्ताना ये ईदी मांगने आये है दे दो इन्हें पता नहीं क्यों गरीब मास्टर से माँगने आ जाते है ओर खा पीकर चले जाते है ओर फ़िर बहुत प्यार से सिवाई, ओर ना ना प्रकार के व्यंजन लाते ओर अपने हाथो से खिलाते ओर कहते अब पेट भर खा लो घर जाकर खाना मत खाना समीरी ओर ले आ" ओर तनवीर बेचारा किचन से लाते रहता था........फ़िर अपने लखनवी कुर्ते की जेब से एक एक के सिक्के निकाल कर देते थे ओर पूछते कि क्या लिखा पढ़ा इन दिनों........दीदी भी खूब मजेदार खाना बनाती है यह हम ईद पर समझ पाते थे अब देवास में रौनक ही खत्म हो गयी है ना नायीम्जी रहे ना बाबा (कुमार जी) ओर बस.........मन ही उचाट हो जाता है तीज त्योहारों पर..........

जिन जोड़ी तिन तोडी

एक ज़िंदा शख्स जिसके साथ लंबे समय तक काम किया खूब लड़े झगड़े ओर लिखा पढ़ा, अपने ब्राह्मणत्व को छोडकर दलितो के बीच काम किया ओर समाज से भी भिडे वो अचानक कहा कब किधर कैसे चला गया, बिना पूछे बिना बताए एक फोन तो कर देते कि बुलावा आ गया है कहे कबीर सुनो भाई साधो जिन जोड़ी तिन तोडी, ज़रा हलके गाड़ी हांको मेरे राम गाड़ी वाले इस भजन को दिनेश के साथ प्रहलाद टीपान्या प्रोफ़ेसर लिंडा हेस(स्टेनफोर्ड विवि अमेरिका) कालूराम, नारायणजी के साथ गाते हुए एक उम्र गुजर गयी आज भी दोस्तों की फरमाईश पर यह भजन मैं चाव से गाता हूँ पर यह जिन जोड़ी तिन तोडी इतने जल्दी हो जाएगा पता नहीं था दिनेश

A POLITICALLY CORRECT ALPHABET-Courtesy- Alex M George

A is an Activist itching to fight.

B is a Beast with its animal rights.

C was a Cripple (now differently abled).

D is a Drunk who is “liquor-enabled.”

E is an Ecologist who saves spotted owls.

F was a Forester, now staffing McDonald’s.

G is a Glutton who says he’s “food-centered.’”

H is a Hermaphrodite skirting problems of gender.

I is an ‘’Ism” (you’d better believe it).

J is a Jingoist—love it or leave it!

K is a Kettle the pot can’t call black.

L is a Lifestyle not bound to the pack.

M is a Mindset with bias galore.

N was a Negro, but not anymore.

O is an Oppressor, devoid of self-love.

P is the Patriarchy (see “O” above).

Q is a Quip that costs someone a job.

R is the Reasoning done by a mob.

S is a Sexist, that slobbering menace.

T is a Teapot that’s brewing a tempest.

U is for Umbrage at the slightest transgression.

V is a Valentine, tool of oppression.

W is for “Woman,” however it’s spelled.

X is a chromosome we share in our cells.

Y is a Yogi for the easily led.

Z is a Zombie, the differently dead.

from JAMES FINN GARNER (via arvindguptatoys) .... esp useful in times when you are bombarded with ANNA or noANNA articles.......

but i add a correction N is for "nuanced-understanding" in the jargon of politically correct ppl

दिनेश शर्मा को श्रदांजलि

एकलव्य देवास के साथी जिसके साथ उम्र के लगभग एक दशक तक काम किया साक्षरता से लेकर कबीर ओर अम्बेडकर मंच तक का काम खूब घूमे फिरे ओर नाटक गाना ओर ढेरो काम किये ऐसे साथी दिनेश शर्मा का आज निधन हो गया, दिनेश लंबे समय से बीमार थे ओर आज उनके चले जाने से में बहुत अकेला महसूस कर रहा हूँ ओर रवि से बात करके तो ओर काँप गया हूँ , वो कह रहा था हम सब अब उम्र की ढलान पर है ओर एसी खबर कब किसकी मिल जाए पता नहीं, दिनेश को सच में श्रदांजलि ओर उसके कामो को सलाम.

Tuesday, August 30, 2011

इस दर से उठोगे तो कोई दर न मिलेगा

भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा
घर छोड़ के मत जाओ कहीं घर न मिलेगा

फिर याद बहुत आयेगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम
जब धूप में साया कोई सर पर न मिलेगा

आँसू को कभी ओस का क़तरा न समझना
ऐसा तुम्हें चाहत का समुंदर न मिलेगा

इस ख़्वाब के माहौल में बे-ख़्वाब हैं आँखें
बाज़ार में ऐसा कोई ज़ेवर न मिलेगा

ये सोच लो अब आख़िरी साया है मुहब्बत
इस दर से उठोगे तो कोई दर न मिलेगा
~बशीर बद्र

Monday, August 29, 2011

मन की गांठे

मुझे नहीं पता में सही था या गलत पर आज लग रहा है दोषी जरूर रहा हूँ हर उस कर्म का ओर लगाव का जो मैंने किया, यह माना कि पैदाईशी रिश्तों के अलावा अपने बनाए रिश्ते ज्यादा बड़े ओर निर्मल होते है, उन रिश्तों को बनाने ओर निभाने में एक उम्र गुजार दी पर अब सब पर से विश्वास ही उठ गया है, ओर बस कोसता हूँ अपने आप को कि क्यों किया यह सब, क्यों चलता चला गया में किसी ओर की जिंदगी में ओर फ़िर जब कोई अपना अंश ही नहीं तो कैसा नाता कैसा रिश्ता, इतना छलनी कभी नहीं हुआ, ठगुआ कौन नगरिया लूटल हो, कबीर कहते है, लड़ रहा हूँ अभी भी अपने आप से (मन की गांठे)

मन की गांठे

हम जब अपने आप को खोजने निकलते है तो पाते है कि अकेले है ओर पाते है वो सब भी, जिन्हें हमने सारे द्वंद ओर रिश्ते तोडकर अपना बनाया था, छोडकर चले गए है ओर यह एहसास बहुत ही कटु होता है ओर बस हम सिर्फ कोसते रहते है भाग्य, किस्मत ओर विधाता की लेखनी को पर इस सबमे ओर अकेले रह जाते है, शब्दों के उपयोग ओर हमारा व्यवहार ! हम यह जीवन की नैया से वैतरिणी पार करना तो चाहते है पर डूब जाते है बीच में ओर फ़िर बस खत्म होने लगता है सब, ओरअपने आप से विश्वास उठ जाये तो सबसे ज्यादा तकलीफ होती है(मन की गांठे)

मन की गांठे

जब कुछ खत्म होने लगता है तो आवाजे भी मंद पडने लगती है लगता है हम सिर्फ बोल रहे है ओर सुन नहीं पा रहे है ना खुद को ना अपने परिवेश को ना अपने लोगो को जिनको सुने बिना हम साँसे भी नहीं ले पाते थे पर कई बार अंदर से टूटन ही जोडती है ओर हम फ़िर से टूटते है ओर ज़िंदा रहने का स्वांग करते है जबकि हम मर चुके होते है, हम नहीं जानते कि आवाजो का शोर कहा से आता है कहा से ये भिनभिनाहट एक सुप्त सी जिंदगी में ढल जाती है बिलकुल मौत सी ओर फ़िर.बस अलविदा.......(मन की गांठे)

मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा?

अपने हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा भी नहीं
मैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊँगा

मुझ को चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा

सारी दुनिया की नज़र में है मेरी अह्द—ए—वफ़ा
इक तेरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा?

Wednesday, August 24, 2011

तुम कठिन हो

देख कर मंज़र बहुत हैरान हूँ मैं
कुछ परिंदो मे बची अब जान हूँ मैं

होगा कैसे अब मिलन मेरा तुम्हारा
तुम कठिन हो और बहुत आसान हूँ मैं

Tuesday, August 23, 2011

प्रशासन पुराण 23

जिला अधिकारी ने पूछा कि विद्युत विभाग को ट्रांसफार्मर लगाने के लिए जमीन देना पड़ेगी माननीय मंत्रीजी के आदेश है तो जमीन कहा से आयेगी, एस डी एम् बोला सर जमीन की तो दिक्कत नहीं है बस चक्कर सिर्फ वन जमीन का है ओर ये साली फोरेस्ट की जमीन लेने के लिए केंद्र सरकार से अनुमति लेना पडती है, वन अधिकारी जो अब सेवानिवृति के करीब थे बोले ले लो साब ले लो सबै भूमि गोपाल की, में तो निपट रहा हूँ आप दो साल में निकल लोगे यहाँ से जो आएगा भुगतेगा(प्रशासन पुराण 23)

प्रशासन पुराण 22

जिलाधिकारी ने पूछा कि जिले में कितने बच्चे है जिन्हें ह्रदय रोग है ओर जिनका आपरेशन शासकीय खर्च से करवाना पडेगा, जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने जवाब दिया "सर एक काम करते है एक बड़ा नसबंदी शिविर लगा देते है ताकि ना बच्चे पैदा होंगे ना साले ससुरो को ह्रदय रोग होगा" जिलाधिकारी को बात जम गयी बोला अभी तो बच्चे गिनो जिनके हार्ट खराब है ओर प्रदेश में इस जिले में सबसे ज्यादा नसबंदी होना चाहिए सुना सबने. सब बोले जी सर(प्रशासन पुराण 22)

मन की गांठे

सूर्यास्त के बाद दिन खत्म हो गया था ओर सांझ ने अपना आँचल पसराना शुरू कर दिया था जो गहरे तिमिर तक जाकर रूकी, स्तब्धता ओर नीरव सन्नाटे के बीच ये कैसा शोर था ये कैसी आवाजें थी जो बेचैन कर रही थी दूर से कही आता शोर- उथल पुथल मन को बहुत अशांत कर रही थी कही से भी एक पत्ता नहीं खटक रहा था कि उसका सहारा मिल जाए बस एक जुगनू अपनी तीव्र आवाज के साथ व्योम में घूम रहा था जैसे मन के किसी कोने में तुम रहते हो ओर हरदम राह दिखाते रहते हो, रात गहरा रही थी ओर विभावरी तक साँसे कैसे आई यह नहीं जानता(मन की गांठे)

मन की गांठे

ये ना खत्म होने वाली रात थी तुम्हारा फोन आया तो में जूझ रहा था एक गहन सन्नाटे से, अपने आप से ओर पूछ रहा था बार बार कि रात ओर दिन के इस खेल में कितना कुछ होना अभी बाकी है यह भी कि कोख से कब्र के सफर में रास्ता लंबा क्यों है, यह भी कि रास्ता स्थिर क्यों है हमें ही क्यों चलना पडता है ओर हम थक हार क्यों जाते है, तुम कहते हो कि मुश्किल हम ही बनाते है फ़िर क्यों हमें ही अपने दुखो का हल पता नहीं चलता, अब ये लो फ़िर में गूंथ ही रहा हूँ बार बार बिखरने से टूट ही रहा हूँ आखिर क्यों(मन की गांठे)

Monday, August 22, 2011

अन्ना के बहाने कुछ सवाल...............

बच्चे पूछ रहे है कि ये आंदोलन अगले साल इतिहास की किताब में तो नहीं होगा ना ???
ओर अन्ना, प्रशांत भूषण ओर अरविन्द केजरीवाल की जीवनी कोर्स में तो नहीं होगी ना.............????
बच्चो की चिंता भी बहुत वाजिब है दोस्तों............!!!!!!!!!!!!!!

भारत माता की जय, जय हिंद, वंदे मातरम ........क्या दक्षिण पंथी नारे है या देशभक्ति नारे क्या इनका इस्तेमाल हर प्रकार के आंदोलनों में किया जा सकता है मुझे नहीं पता दोस्तों मदद करो......., मेरी मोटी अक्ल में कुछ समझ नहीं आ रहा अभी बहस सुनकर भ्रमित हो गया हूँ... फ़िर सारे देशभक्ति गीत भी ओर सारे जनगीत जो हम २५ बरसो से गा रहे है..."इसलिए राह संघर्ष की हम चुने जिंदगी आंसूओ में नहाई ना हो........"
लो आखिर जिसका डर था वही हुआ अब अन्ना के आरती चालू हो गयी अब इंतज़ार है अन्ना की मुर्तिया मिलने का, मुझे नहीं पता कि रामलीला मैदान पर अन्ना ताबीज ओर गंडे-नाड़े मिल रहे है कि नहीं......थोड़े दिनों में अन्ना की जगह-जगह मुर्तिया भी स्थापित हो जायेगी......दरअसल आज के हिन्दू में अरुंधती का लेख बहुत सटीक है ओर विचारणीय है मेरे मित्रों को उसे पढना चाहिए ओर गुनना चाहिए.

निखिल डे ओर प्रशांत भूषण एनडीटीवी पर कह रहे कि वे एनजीओ को इस दायरे में नहीं लेंगे उसके लिए तो सरकार ही काफी है यानी एनजीओ वालो खूब कमाओ ओर खाओ, लो ओर दो....लोकपाल तो मोटे माल वालो की कमाई वालो के लिए है...........

अन्ना दिल्ली भ्रष्टाचार के खिलाफ लडने आये थे या सरकार बनाने ,कि इन लोगो ने बिलकुल सही समय चुना है जब सोनिया बाहर है तो दबाव बना कर ये इस्तीफा देने को मजबूर करेंगे ओर फ़िर सत्ता पर काबीज हो जायंगे जिस तरह से रोज नए समीकरण बन् रहे है उसमे भ्रष्टाचार तो गौण हो गया है ओर सता पाना ओर मन मोहन सरकार को हटाना प्रमुख मुद्दा... पार्टनर तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है......???


चुप्पी सबसे बड़ा ख़तरा है ज़िंदा आदमी के लिए'...अपनों की बेरुखी भी मौत से कहाँ कम है? क्या करूँ? कौन सी मौत चुनुं?

-पाश

मैं अन्ना नहीं होना चाहूंगी : अरुंधती राय

अरुंधती राय : अन्ना की मांगें गांधीवादी नहीं हैं


अरुंधती राय का यह महत्वपूर्ण आलेख आज 21 अगस्त के हिन्दू में प्रकाशित हुआ है...















(अनुवाद : मनोज पटेल)

उनके तौर-तरीके भले ही गांधीवादी हों मगर उनकी मांगें निश्चित रूप से गांधीवादी नहीं हैं.

जो कुछ भी हम टी. वी. पर देख रहे हैं अगर वह सचमुच क्रान्ति है तो हाल फिलहाल यह सबसे शर्मनाक और समझ में न आने वाली क्रान्ति होगी. इस समय जन लोकपाल बिल के बारे में आपके जो भी सवाल हों उम्मीद है कि आपको ये जवाब मिलेंगे : किसी एक पर निशान लगा लीजिए - (अ) वन्दे मातरम, (ब) भारत माता की जय, (स) इंडिया इज अन्ना, अन्ना इज इंडिया, (द) जय हिंद.

आप यह कह सकते हैं कि, बिलकुल अलग वजहों से और बिलकुल अलग तरीके से, माओवादियों और जन लोकपाल बिल में एक बात सामान्य है. वे दोनों ही भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकना चाहते हैं. एक नीचे से ऊपर की ओर काम करते हुए, मुख्यतया सबसे गरीब लोगों से गठित आदिवासी सेना द्वारा छेड़े गए सशस्त्र संघर्ष के जरिए, तो दूसरा ऊपर से नीचे की तरफ काम करते हुए ताजा-ताजा गढ़े गए एक संत के नेतृत्व में, अहिंसक गांधीवादी तरीके से जिसकी सेना में मुख्यतया शहरी और निश्चित रूप से बेहतर ज़िंदगी जी रहे लोग शामिल हैं. (इस दूसरे वाले में सरकार भी खुद को उखाड़ फेंके जाने के लिए हर संभव सहयोग करती है.)

अप्रैल 2011 में, अन्ना हजारे के पहले "आमरण अनशन" के कुछ दिनों बाद भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े घोटालों से, जिसने सरकार की साख को चूर-चूर कर दिया था, जनता का ध्यान हटाने के लिए सरकार ने टीम अन्ना को ("सिविल सोसायटी" ग्रुप ने यही ब्रांड नाम चुना है) नए भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून की ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल होने का न्योता दिया. कुछ महीनों बाद ही इस कोशिश को धता बताते हुए उसने अपना खुद का विधेयक संसद में पेश कर दिया जिसमें इतनी कमियाँ थीं कि उसे गंभीरता से लिया ही नहीं जा सकता था.

फिर अपने दूसरे "आमरण अनशन" के लिए तय तारीख 16 अगस्त की सुबह, अनशन शुरू करने या किसी भी तरह का अपराध करने के पहले ही अन्ना हजारे को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया. जन लोकपाल बिल के लिए किया जाने वाला संघर्ष अब विरोध करने के अधिकार के लिए संघर्ष और खुद लोकतंत्र के लिए संघर्ष से जुड़ गया. इस 'आजादी की दूसरी लड़ाई' के कुछ ही घंटों के भीतर अन्ना को रिहा कर दिया गया. उन्होंने होशियारी से जेल छोड़ने से इन्कार कर दिया, बतौर एक सम्मानित मेहमान तिहाड़ जेल में बने रहे और किसी सार्वजनिक स्थान पर अनशन करने के अधिकार की मांग करते हुए वहीं पर अपना अनशन शुरू कर दिया. तीन दिनों तक जबकि तमाम लोग और टी.वी. चैनलों की वैन बाहर जमी हुई थीं, टीम अन्ना के सदस्य उच्च सुरक्षा वाली इस जेल में अन्दर-बाहर डोलते रहे और देश भर के टी.वी. चैनलों पर दिखाए जाने के लिए उनके वीडियो सन्देश लेकर आते रहे. (यह सुविधा क्या किसी और को मिल सकती है?) इस बीच दिल्ली नगर निगम के 250 कर्मचारी, 15 ट्रक और 6 जे सी बी मशीनें कीचड़ युक्त रामलीला मैदान को सप्ताहांत के बड़े तमाशे के लिए तैयार करने में दिन रात लगे रहे. अब कीर्तन करती भीड़ और क्रेन पर लगे कैमरों के सामने, भारत के सबसे महंगे डाक्टरों की देख रेख में, बहुप्रतीक्षित अन्ना के आमरण अनशन का तीसरा दौर शुरू हो चुका है. टी.वी. उद्घोषकों ने हमें बताया कि "कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है."

उनके तौर-तरीके गांधीवादी हो सकते हैं मगर अन्ना हजारे की मांगें कतई गांधीवादी नहीं हैं. सत्ता के विकेंद्रीकरण के गांधी जी के विचारों के विपरीत जन लोकपाल बिल एक कठोर भ्रष्टाचार निरोधी क़ानून है जिसमें सावधानीपूर्वक चुने गए लोगों का एक दल हजारों कर्मचारियों वाली एक बहुत बड़ी नौकरशाही के माध्यम से प्रधानमंत्री, न्यायपालिका, संसद सदस्य, और सबसे निचले सरकारी अधिकारी तक यानी पूरी नौकरशाही पर नियंत्रण रखेगा. लोकपाल को जांच करने, निगरानी करने और अभियोजन की शक्तियां प्राप्त होंगी. इस तथ्य के अतिरिक्त कि उसके पास खुद की जेलें नहीं होंगी यह एक स्वतंत्र निजाम की तरह कार्य करेगा, उस मुटाए, गैरजिम्मेदार और भ्रष्ट निजाम के जवाब में जो हमारे पास पहले से ही है. एक की बजाए, बहुत थोड़े से लोगों द्वारा शासित दो व्यवस्थाएं.

यह काम करेगी या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि भ्रष्टाचार के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या है? क्या भ्रष्टाचार सिर्फ एक कानूनी सवाल, वित्तीय अनियमितता या घूसखोरी का मामला है या एक बेहद असमान समाज में सामाजिक लेन-देन की व्यापकता है जिसमें सत्ता थोड़े से लोगों के हाथों में संकेंद्रित रहती है? मसलन शापिंग मालों के एक शहर की कल्पना करिए जिसकी सड़कों पर फेरी लगाकर सामान बेचना प्रतिबंधित हो. एक फेरी वाली, हल्के के गश्ती सिपाही और नगर पालिका वाले को एक छोटी सी रकम घूस में देती है ताकि वह क़ानून के खिलाफ उन लोगों को अपने सामान बेंच सके जिनकी हैसियत शापिंग मालों में खरीददारी करने की नहीं है. क्या यह बहुत बड़ी बात होगी? क्या भविष्य में उसे लोकपाल के प्रतिनिधियों को भी कुछ देना पड़ेगा? आम लोगों की समस्याओं के समाधान का रास्ता ढांचागत असमानता को दूर करने में है या एक और सत्ता केंद्र खड़ा कर देने में जिसके सामने लोगों को झुकना पड़े.

अन्ना की क्रान्ति का मंच और नाच, आक्रामक राष्ट्रवाद और झंडे लहराना सबकुछ आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों, विश्व कप जीत के जुलूसों और परमाणु परीक्षण के जश्नों से उधार लिया हुआ है. वे हमें इशारा करते हैं कि अगर हमने अनशन का समर्थन नहीं किया तो हम 'सच्चे भारतीय' नहीं हैं. चौबीसों घंटे चलने वाले चैनलों ने तय कर लिया है कि देश भर में और कोई खबर दिखाए जाने लायक नहीं है.

यहाँ अनशन का मतलब मणिपुर की सेना को केवल शक की बिना पर हत्या करने का अधिकार देने वाले क़ानून AFSPA के खिलाफ इरोम शर्मिला के अनशन से नहीं है जो दस साल तक चलता रहा (उन्हें अब जबरन भोजन दिया जा रहा है). अनशन का मतलब कोडनकुलम के दस हजार ग्रामीणों द्वारा परमाणु बिजली घर के खिलाफ किए जा रहे क्रमिक अनशन से भी नहीं है जो इस समय भी जारी है. 'जनता' का मतलब मणिपुर की जनता से नहीं है जो इरोम के अनशन का समर्थन करती है. वे हजारों लोग भी इसमें शामिल नहीं हैं जो जगतसिंहपुर या कलिंगनगर या नियमगिरि या बस्तर या जैतपुर में हथियारबंद पुलिसवालों और खनन माफियाओं से मुकाबला कर रहे हैं. 'जनता' से हमारा मतलब भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों और नर्मदा घाटी के बांधों के विस्थापितों से भी नहीं होता. अपनी जमीन के अधिग्रहण का प्रतिरोध कर रहे नोयडा या पुणे या हरियाणा या देश में कहीं के भी किसान 'जनता' नहीं हैं.

'जनता' का मतलब सिर्फ उन दर्शकों से है जो 74 साल के उस बुजुर्गवार का तमाशा देखने जुटी हुई है जो धमकी दे रहे हैं कि वे भूखे मर जाएंगे यदि उनका जन लोकपाल बिल संसद में पेश करके पास नहीं किया जाता. वे दसियों हजार लोग 'जनता' हैं जिन्हें हमारे टी.वी. चैनलों ने करिश्माई ढंग से लाखों में गुणित कर दिया है, ठीक वैसे ही जैसे ईसा मसीह ने भूखों को भोजन कराने के लिए मछलियों और रोटी को कई गुना कर दिया था. "एक अरब लोगों की आवाज़" हमें बताया गया. "इंडिया इज अन्ना."

वह सचमुच कौन हैं, यह नए संत, जनता की यह आवाज़? आश्चर्यजनक रूप से हमने उन्हें जरूरी मुद्दों पर कुछ भी बोलते हुए नहीं सुना है. अपने पड़ोस में किसानों की आत्महत्याओं के मामले पर या थोड़ा दूर आपरेशन ग्रीन हंट पर, सिंगूर, नंदीग्राम, लालगढ़ पर, पास्को, किसानों के आन्दोलन या सेज के अभिशाप पर, इनमें से किसी भी मुद्दे पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा है. शायद मध्य भारत के वनों में सेना उतारने की सरकार की योजना पर भी वे कोई राय नहीं रखते.

हालांकि वे राज ठाकरे के मराठी माणूस गैर-प्रान्तवासी द्वेष का समर्थन करते हैं और वे गुजरात के मुख्यमंत्री के विकास माडल की तारीफ़ भी कर चुके हैं जिन्होनें 2002 में मुस्लिमों की सामूहिक हत्याओं का इंतजाम किया था. (अन्ना ने लोगों के कड़े विरोध के बाद अपना वह बयान वापस ले लिया था मगर संभवतः अपनी वह सराहना नहीं.)

इतने हंगामे के बावजूद गंभीर पत्रकारों ने वह काम किया है जो पत्रकार किया करते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ अन्ना के पुराने रिश्तों की स्याह कहानी के बारे में अब हम जानते हैं. अन्ना के ग्राम समाज रालेगान सिद्धि का अध्ययन करने वाले मुकुल शर्मा से हमने सुना है कि पिछले 25 सालों से वहां ग्राम पंचायत या सहकारी समिति के चुनाव नहीं हुए हैं. 'हरिजनों' के प्रति अन्ना के रुख को हम जानते हैं : "महात्मा गांधी का विचार था कि हर गाँव में एक चमार, एक सुनार, एक लुहार होने चाहिए और इसी तरह से और लोग भी. उन सभी को अपना काम अपनी भूमिका और अपने पेशे के हिसाब से करना चाहिए, इस तरह से हर गाँव आत्म-निर्भर हो जाएगा. रालेगान सिद्धि में हम यही तरीका आजमा रहे हैं." क्या यह आश्चर्यजनक है कि टीम अन्ना के सदस्य आरक्षण विरोधी (और योग्यता समर्थक) आन्दोलन यूथ फार इक्वेलिटी से भी जुड़े रहे हैं? इस अभियान की बागडोर उनलोगों के हाथ में है जो ऐसे भारी आर्थिक अनुदान पाने वाले गैर सरकारी संगठनों को चलाते हैं जिनके दानदाताओं में कोका कोला और लेहमन ब्रदर्स भी शामिल हैं. टीम अन्ना के मुख्य सदस्यों में से अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया द्वारा चलाए जाने वाले कबीर को पिछले तीन सालों में फोर्ड फाउंडेशन से 400000 डालर मिल चुके हैं. इंडिया अगेंस्ट करप्शन अभियान के अंशदाताओं में ऎसी भारतीय कम्पनियां और संस्थान शामिल हैं जिनके पास अल्युमिनियम कारखाने हैं, जो बंदरगाह और सेज बनाते हैं, जिनके पास भू-संपदा के कारोबार हैं और जो करोड़ों करोड़ रूपए के वित्तीय साम्राज्य वाले राजनीतिकों से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध हैं. उनमें से कुछ के खिलाफ भ्रष्टाचार एवं अन्य अपराधों की जांच भी चल रही है. आखिर वे इतने उत्साह में क्यों हैं?

याद रखिए कि विकीलीक्स द्वारा किए गए शर्मनाक खुलासों और एक के बाद दूसरे घोटालों के उजागर होने के समय ही जन लोकपाल बिल के अभियान ने भी जोर पकड़ा. इन घोटालों में 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला भी था जिसमें बड़े कारपोरेशनों, वरिष्ठ पत्रकारों, सरकार के मंत्रियों और कांग्रेस तथा भाजपा के नेताओं ने तमाम तरीके से साठ-गाँठ करके सरकारी खजाने का हजारों करोड़ रूपया चूस लिया. सालों में पहली बार पत्रकार और लाबीइंग करने वाले कलंकित हुए और ऐसा लगा कि कारपोरेट इंडिया के कुछ प्रमुख नायक जेल के सींखचों के पीछे होंगे. जनता के भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन के लिए बिल्कुल सटीक समय. मगर क्या सचमुच?

ऐसे समय में जब राज्य अपने परम्परागत कर्तव्यों से पीछे हटता जा रहा है और निगम और गैर सरकारी संगठन सरकार के क्रिया कलापों को अपने हाथ में ले रहे हैं (जल एवं विद्युत् आपूर्ति, परिवहन, दूरसंचार, खनन, स्वास्थ्य, शिक्षा); ऐसे समय में जब कारपोरेट के स्वामित्व वाली मीडिया की डरावनी ताकत और पहुँच लोगों की कल्पना शक्ति को नियंत्रित करने की कोशिश में लगी है; किसी को सोचना चाहिए कि ये संस्थान भी -- निगम, मीडिया और गैर सरकारी संगठन -- लोकपाल के अधिकार-क्षेत्र में शामिल किए जाने चाहिए. इसकी बजाए प्रस्तावित विधेयक उन्हें पूरी तरह से छोड़ देता है.

अब औरों से ज्यादा तेज चिल्लाने से, ऐसे अभियान को चलाने से जिसके निशाने पर सिर्फ दुष्ट नेता और सरकारी भ्रष्टाचार ही हो, बड़ी चालाकी से उन्होंने खुद को फंदे से निकाल लिया है. इससे भी बदतर यह कि केवल सरकार को राक्षस बताकर उन्होंने अपने लिए एक सिंहासन का निर्माण कर लिया है, जिसपर बैठकर वे सार्वजनिक क्षेत्र से राज्य के और पीछे हटने और दूसरे दौर के सुधारों को लागू करने की मांग कर सकते हैं -- और अधिक निजीकरण, आधारभूत संरचना और भारत के प्राकृतिक संसाधनों तक और अधिक पहुँच. ज्यादा समय नहीं लगेगा जब कारपोरेट भ्रष्टाचार को कानूनी दर्जा देकर उसका नाम लाबीइंग शुल्क कर दिया जाएगा.

क्या ऎसी नीतियों को मजबूत करने से जो उन्हें गरीब बनाती जा रही है और इस देश को गृह युद्ध की तरफ धकेल रही है, 20 रूपए प्रतिदिन पर गुजर कर रहे तिरासी करोड़ लोगों का वाकई कोई भला होगा?

यह डरावना संकट भारत के प्रतिनिधिक लोकतंत्र के पूरी तरह से असफल होने की वजह से पैदा हुआ है. इसमें विधायिका का गठन अपराधियों और धनाढ्य राजनीतिकों से हो रहा है जो जनता की नुमाइन्द्गी करना बंद कर चुके हैं. इसमें एक भी ऐसा लोकतांत्रिक संस्थान नहीं है जो आम जनता के लिए सुगम हो. झंडे लहराए जाने से बेवकूफ मत बनिए. हम भारत को आधिपत्य के लिए एक ऐसे युद्ध में बंटते देख रहे हैं जो उतना ही घातक है जितना अफगानिस्तान के युद्ध नेताओं में छिड़ने वाली कोई जंग. बस यहाँ दांव पर बहुत कुछ है, बहुत कुछ.
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I'd rather not be Anna-Arundhati Roy

Arundhati Roy. File photo

The Hindu Arundhati Roy. File photo

If what we're watching on TV is indeed a revolution, then it has to be one of the more embarrassing and unintelligible ones of recent times. For now, whatever questions you may have about the Jan Lokpal Bill, here are the answers you're likely to get: tick the box — (a) Vande Mataram (b) Bharat Mata ki Jai (c) India is Anna, Anna is India (d) Jai Hind.

For completely different reasons, and in completely different ways, you could say that the Maoists and the Jan Lokpal Bill have one thing in common — they both seek the overthrow of the Indian State. One working from the bottom up, by means of an armed struggle, waged by a largely adivasi army, made up of the poorest of the poor. The other, from the top down, by means of a bloodless Gandhian coup, led by a freshly minted saint, and an army of largely urban, and certainly better off people. (In this one, the Government collaborates by doing everything it possibly can to overthrow itself.)

In April 2011, a few days into Anna Hazare's first “fast unto death,” searching for some way of distracting attention from the massive corruption scams which had battered its credibility, the Government invited Team Anna, the brand name chosen by this “civil society” group, to be part of a joint drafting committee for a new anti-corruption law. A few months down the line it abandoned that effort and tabled its own bill in Parliament, a bill so flawed that it was impossible to take seriously.

Then, on August 16th, the morning of his second “fast unto death,” before he had begun his fast or committed any legal offence, Anna Hazare was arrested and jailed. The struggle for the implementation of the Jan Lokpal Bill now coalesced into a struggle for the right to protest, the struggle for democracy itself. Within hours of this ‘Second Freedom Struggle,' Anna was released. Cannily, he refused to leave prison, but remained in Tihar jail as an honoured guest, where he began a fast, demanding the right to fast in a public place. For three days, while crowds and television vans gathered outside, members of Team Anna whizzed in and out of the high security prison, carrying out his video messages, to be broadcast on national TV on all channels. (Which other person would be granted this luxury?) Meanwhile 250 employees of the Municipal Commission of Delhi, 15 trucks, and six earth movers worked around the clock to ready the slushy Ramlila grounds for the grand weekend spectacle. Now, waited upon hand and foot, watched over by chanting crowds and crane-mounted cameras, attended to by India's most expensive doctors, the third phase of Anna's fast to the death has begun. “From Kashmir to Kanyakumari, India is One,” the TV anchors tell us.

While his means may be Gandhian, Anna Hazare's demands are certainly not. Contrary to Gandhiji's ideas about the decentralisation of power, the Jan Lokpal Bill is a draconian, anti-corruption law, in which a panel of carefully chosen people will administer a giant bureaucracy, with thousands of employees, with the power to police everybody from the Prime Minister, the judiciary, members of Parliament, and all of the bureaucracy, down to the lowest government official. The Lokpal will have the powers of investigation, surveillance, and prosecution. Except for the fact that it won't have its own prisons, it will function as an independent administration, meant to counter the bloated, unaccountable, corrupt one that we already have. Two oligarchies, instead of just one.

Whether it works or not depends on how we view corruption. Is corruption just a matter of legality, of financial irregularity and bribery, or is it the currency of a social transaction in an egregiously unequal society, in which power continues to be concentrated in the hands of a smaller and smaller minority? Imagine, for example, a city of shopping malls, on whose streets hawking has been banned. A hawker pays the local beat cop and the man from the municipality a small bribe to break the law and sell her wares to those who cannot afford the prices in the malls. Is that such a terrible thing? In future will she have to pay the Lokpal representative too? Does the solution to the problems faced by ordinary people lie in addressing the structural inequality, or in creating yet another power structure that people will have to defer to?

Meanwhile the props and the choreography, the aggressive nationalism and flag waving of Anna's Revolution are all borrowed, from the anti-reservation protests, the world-cup victory parade, and the celebration of the nuclear tests. They signal to us that if we do not support The Fast, we are not ‘true Indians.' The 24-hour channels have decided that there is no other news in the country worth reporting.

‘The Fast' of course doesn't mean Irom Sharmila's fast that has lasted for more than ten years (she's being force fed now) against the AFSPA, which allows soldiers in Manipur to kill merely on suspicion. It does not mean the relay hunger fast that is going on right now by ten thousand villagers in Koodankulam protesting against the nuclear power plant. ‘The People' does not mean the Manipuris who support Irom Sharmila's fast. Nor does it mean the thousands who are facing down armed policemen and mining mafias in Jagatsinghpur, or Kalinganagar, or Niyamgiri, or Bastar, or Jaitapur. Nor do we mean the victims of the Bhopal gas leak, or the people displaced by dams in the Narmada Valley. Nor do we mean the farmers in NOIDA, or Pune or Haryana or elsewhere in the country, resisting the takeover of the land.

‘The People' only means the audience that has gathered to watch the spectacle of a 74-year-old man threatening to starve himself to death if his Jan Lokpal Bill is not tabled and passed by Parliament. ‘The People' are the tens of thousands who have been miraculously multiplied into millions by our TV channels, like Christ multiplied the fishes and loaves to feed the hungry. “A billion voices have spoken,” we're told. “India is Anna.”

Who is he really, this new saint, this Voice of the People? Oddly enough we've heard him say nothing about things of urgent concern. Nothing about the farmer's suicides in his neighbourhood, or about Operation Green Hunt further away. Nothing about Singur, Nandigram, Lalgarh, nothing about Posco, about farmer's agitations or the blight of SEZs. He doesn't seem to have a view about the Government's plans to deploy the Indian Army in the forests of Central India.

He does however support Raj Thackeray's Marathi Manoos xenophobia and has praised the ‘development model' of Gujarat's Chief Minister who oversaw the 2002 pogrom against Muslims. (Anna withdrew that statement after a public outcry, but presumably not his admiration.)

Despite the din, sober journalists have gone about doing what journalists do. We now have the back-story about Anna's old relationship with the RSS. We have heard from Mukul Sharma who has studied Anna's village community in Ralegan Siddhi, where there have been no Gram Panchayat or Co-operative society elections in the last 25 years. We know about Anna's attitude to ‘harijans': “It was Mahatma Gandhi's vision that every village should have one chamar, one sunar, one kumhar and so on. They should all do their work according to their role and occupation, and in this way, a village will be self-dependant. This is what we are practicing in Ralegan Siddhi.” Is it surprising that members of Team Anna have also been associated with Youth for Equality, the anti-reservation (pro-“merit”) movement? The campaign is being handled by people who run a clutch of generously funded NGOs whose donors include Coca-Cola and the Lehman Brothers. Kabir, run by Arvind Kejriwal and Manish Sisodia, key figures in Team Anna, has received $400,000 from the Ford Foundation in the last three years. Among contributors to the India Against Corruption campaign there are Indian companies and foundations that own aluminum plants, build ports and SEZs, and run Real Estate businesses and are closely connected to politicians who run financial empires that run into thousands of crores of rupees. Some of them are currently being investigated for corruption and other crimes. Why are they all so enthusiastic?

Remember the campaign for the Jan Lokpal Bill gathered steam around the same time as embarrassing revelations by Wikileaks and a series of scams, including the 2G spectrum scam, broke, in which major corporations, senior journalists, and government ministers and politicians from the Congress as well as the BJP seem to have colluded in various ways as hundreds of thousands of crores of rupees were being siphoned off from the public exchequer. For the first time in years, journalist-lobbyists were disgraced and it seemed as if some major Captains of Corporate India could actually end up in prison. Perfect timing for a people's anti-corruption agitation. Or was it?

At a time when the State is withdrawing from its traditional duties and Corporations and NGOs are taking over government functions (water supply, electricity, transport, telecommunication, mining, health, education); at a time when the terrifying power and reach of the corporate owned media is trying to control the public imagination, one would think that these institutions — the corporations, the media, and NGOs — would be included in the jurisdiction of a Lokpal bill. Instead, the proposed bill leaves them out completely.

Now, by shouting louder than everyone else, by pushing a campaign that is hammering away at the theme of evil politicians and government corruption, they have very cleverly let themselves off the hook. Worse, by demonising only the Government they have built themselves a pulpit from which to call for the further withdrawal of the State from the public sphere and for a second round of reforms — more privatisation, more access to public infrastructure and India's natural resources. It may not be long before Corporate Corruption is made legal and renamed a Lobbying Fee.

Will the 830 million people living on Rs.20 a day really benefit from the strengthening of a set of policies that is impoverishing them and driving this country to civil war?

This awful crisis has been forged out of the utter failure of India's representative democracy, in which the legislatures are made up of criminals and millionaire politicians who have ceased to represent its people. In which not a single democratic institution is accessible to ordinary people. Do not be fooled by the flag waving. We're watching India being carved up in war for suzerainty that is as deadly as any battle being waged by the warlords of Afghanistan, only with much, much more at stake.

Saturday, August 20, 2011

करार आ जाए

रात यूं दिल में तेरी खोई हुई सी याद आई
जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए
जैसे सहराओं में हौले से चले बादे नसीम
जैसे बीमार को बेवजह करार आ जाए

फैज़....

Friday, August 19, 2011

25 Nov 2009 Bhopal station............Platform No 1, 430 AM


तुम्हे विदा करने के बाद
तुम्हारे लिए.....................
उस दिन
में स्टेशन पर इस तरह बैठा रहा
कि दुनिया में कही ओर चले जाने की जगह ही नहीं बची
कोई............

अवतार सिंह पाश की एक बेहतरीन कविता

जीने का यही सलीका होता है

प्यार करना और जीना उन्हें कभी आएगा नहीं

जिन्हें जिन्दगी ने हिसाबी बना दिया

जिस्मों का रिश्ता समझ सकना-

ख़ुशी और नफरत में कभी लीक ना खींचना

जिन्दगी के फैले हुए आकार पर फिदा होना

सहम को चीर कर मिलना और विदा होना

बहुत बहादुरी का काम होता है मेरी दोस्त

मैं अब विदा होता हूं तू भूल जाना

मैंने तुम्हें किस तरह पलकों में पाल कर जवान किया

कि मेरी नजरों ने क्या कुछ नहीं किया

तेरे नक्शों की धार बांधने में

कि मेरे चुंबनों ने

कितना खूबसूरत कर दिया तेरा चेहरा कि मेरे आलिंगनों ने

तेरा मोम जैसा बदन कैसे सांचे में ढाला

तू यह सभी भूल जाना मेरी दोस्त

सिवा इसके कि मुझे जीने की बहुत इच्छा थी

कि मैं गले तक जिन्दगी में डूबना चाहता था

मेरे भी हिस्से का जी लेना

मेरी दोस्त मेरे भी हिस्से का जी लेना।


प्रशासन पुराण 21

आज का दिन सदभावना दिवस के रूप में मनाया गया सबने राज्यशासन की मंशानुरूप शपथ ली कि जाति द्वेष को न मानकर साम्प्रदायिक सौहार्द्र से काम करेंगे सबको शपथ दिलाकर बड़े "साब" गाड़ी में उड़ गए अपने दौरे पर ओर बाकी बचे कर्मचारी बडबडाते हुए काम के लिए लौटने लगे कह रहे थे साला है तो आदिवासी पर ब्राहमणों सा व्यवहार करता है मुसलमानों को माल वाले चार्ज नहीं दिए ओर बलाइयो चमारों को सब माल वाले चार्ज दे रखे है अब हमारी जाति का अधिकारी आने दो तब बताएँगे इनको, साले सदभावना दिवस की माँ......(प्रशासन पुराण 21)

मन की गांठे

देखा यहाँ वहा और फ़िर लौट आया और उस संसार में रमता जोगी क्या करता नेह के दिए लेकर निकला एक अवधू बांटता रहा आलोक और ढूंढता रहा बाती बाती और फ़िर लो जलाकर करता रहा इश्क एक दरवेश लंबे समय तक, फ़िर देखा कि छूट रहा है टूट रहा है कतरा कतरा जीवन, अपनी इहलीला खत्म कर भी नहीं मिल रहा प्रतिसाद, अपने अंदर के प्रेम को सूखाकर जिया नहीं जा सकता और फ़िर लौटना तो है ही जीवन की सांध्य बेला पुकार ही रही है चल पडो उस ओर जहा उड़ जाएगा हंस अकेला जग दर्शन का मेला/जैसे पाख गिरे तरूवर के (मन की गांठे)

मन की गांठे

मन की आवारगी को समझते हुए कितनी दूर आ पहुंचा हूँ पर आज भी यह समझ नहीं आया कि ये सब क्या और कैसे हो गया, ऐसा सोचा तो नहीं था कभी सपने में भी फ़िर हकीकत का जिक्र करना तो पाप जैसा है जितना सोचता हूँ मवाद भरता जाता है दिल दिमाग में और लगता है कानो से टपकने लगेगा. मन उन्मुक्त आवारा की तरह सोचता है और फ़िर विचित्र से अपराधबोध, गुबार, संताप निकलने लगते है व्याकुलता इतनी बढ़ जाती है कि शरीर पर ज्वर का प्रकोप चढ जाता है हाथ पाँव निर्जीव होकर निढाल हो जाते है समझ का फेर क्या से क्या कर देता है और पूछता हूँ बार बार खुद से "तेरा मेरा मनवा कैसे एक होए रे.."(मन की गांठे)

Thursday, August 18, 2011

संविधान काग़ज़ी फूल है-नागार्जुन


इसके लेखे संसद फंसद सब फ़िजूल है
इसके लेखे संविधान काग़ज़ी फूल है
इसके लेखे
सत्य-अंहिसा-क्षमा-शांति-करुणा-मानवता
बूढ़ों की बकवास मात्र है
इसके लेखे गांधी-नेहरू-तिलक आदि परिहास-पात्र हैं
इसके लेखे दंडनीति ही परम सत्य है, ठोस हक़ीक़त
इसके लेखे बन्दूकें ही चरम सत्य है, ठोस हक़ीक़त

जय हो, जय हो, हिटलर की नानी की जय हो!
जय हो, जय हो, बाघों की रानी की जय हो!
जय हो, जय हो, हिटलर की नानी की जय हो!

-नागार्जुन


मोडून पडला संसार जरी

ओळखलत का सर मला !
पावसात आला कोणी ?

कपडे होते कर्दमलेले, केसावरती पाणी.
क्षणभर बसला नंतर हसला , बोलला वरती पाहून
गंगामाई पाहुनी आली गेली घरट्यात राहून
माहेरवाशिन पोरीन सारखी चार भिंतीत नाचली
मोकळ्या हाती जाईल कशी
बायको मात्र वाचली
भिंत खचली चूल विझली होते नव्हते नेले
प्रसाद म्हणुनी पापण्यान मध्ये पाणी थोडे ठेवले
कारभारनीला घेउनी संगे सर आता लढतो आहे
पडकी भिंत बांधतो आहे , चिखल गाळ काढतो आहे
खिशा कडे हात जाताच हसत हसत उठला
पैसे नकोत सर मला जरा एकटे पण वाटला

मोडून पडला संसार जरी मोडला नाही कणा
पाठी वरती हाथ ठ्ठेऊन नुसते लढ म्हणा !

-
कुसुमाग्रज

हाथ रखिए पीठ पर

घर तो टूटा रीढ़ की हड्डी नहीं टूटी मेरी
हाथ रखिए पीठ पर और इतना कहिए
की लड़ो...
बस!!!
कुसुमाग्रज

(मोडून पडला संसार जरी मोडला नाही कणा
पाठी वरती हाथ ठ्ठेऊन नुसते लढ म्हणा !!)



मन की गांठे

कहा तो उसने कुछ नहीं था पर अबोले ही सब कुछ स्पष्ट था यह भी कि एक खत्म हो चुके और भावुक के साथ रहना बहुत मुश्किल है यह भी कि जीवन में जब सामने प्रगति के सोपान राह देख रहे हो तो पीछे पलटकर कोई मुसीबत अपने साथ नहीं रख सकता यह भी कि जीवन से थके हारे और ऊबे हुए लोग उसे पसंद नहीं थे, पर उसने तो तुम्हे जीवन से ज्यादा चाहा था ये तर्क अब मुझपर तीर नहीं चला सकते अब तो सामने हरियाली है और विरासत में मिला एश्वर्य यह तंगहाली और भोथरी लिजलिजी भावनाए मुझपर असर नहीं डालती और एक इत्र के मानिंद उड़ गया था वो उसके जीवन से-काहे का ताना...कौन तार से जब जोड़ी चदरिया(मन की गांठे)

मन की गांठे

विचित्र है यह मोह माया जिसने ज्यादा प्रेम सम्मान लिया / दिया वो सबसे ज्यादा नाकारा और मूर्ख साबित कर दिया गया और बेहद उपेक्षित, बस यही उपेक्षित और दीन-हीन लाचारगी से भरा जीवन जीते हुए घसीटते हुए एक अनजानी राह पर ऐसे चलता रहा वो जैसे किसी अपने ने उसे सबसे ज्यादा धोखा दे दिया और बस हार गया एक दिन सब कुछ छोडकर रम गया वो अपने राम में और फ़िर साँसों की वीणा को ऐसा स्वर दिया कि उस पार जाकर ही रूका-माया महाठगिनी हम जानी(मन की गांठे)

Wednesday, August 17, 2011

कोई नहीं बचा था-पास्टिर निमोलर

यह लोकतान्त्रिक अधिकारों की लड़ाई है..याद रहे:
“..पहले वे आए

यहूदियों के लिए

...और मैं कुछ नहीं बोला

क्योकि
मैं यहूदी नहीं था।

फिर वे आए
कम्युनिस्टों के लिए

और मैं कुछ नहीं बोला

मैं कम्यु निस्ट नहीं था।

फिर वे आए

मजदूरों के लिए

और मैं कुछ नहीं बोला

क्योकि मैं मज़दूर नहीं था।

फिर वे आए

मेरे लिए

और कोई नहीं बचा था

जो मेरे लिए बोलता।...”

-पास्टिर निमोलर
(हिटलर काल के जर्मन कवि)

जन गण मन की कहानी ..............................​.

सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा।

उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए। रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता"। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था।

इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है "भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। "

जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था।

उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।

रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया। सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे।

रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे। 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये।

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल।

गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे। उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना। हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे। वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत "जन गण मन" गाया करते थे और गरम दल वाले "वन्दे मातरम"।

नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई।

बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा"। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए।

नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था।

बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है।

तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है ?

इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद्। और अच्छा लगा हो तो इसे फॉरवर्ड कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये अंग्रेजी छोड़ कर।

जय हिंद !!!

Some More Facts for Reference:-

- In 1913 when Tagore received Nobel, Gandhiji was still in South Africa

-Surendra Nath Banerjee was in ICS only till 1875, when he was dismissed from service. He became President of Indian national Congress in 1895 & 1902. He died in 1925 at Barrackpur, perhaps his ghost released that letter after Tagore’s death in 1941.

- It was Harold Hjarne who was the chairman of Nobel Prize Committee and not King George for 1913.

- Congress was split into “Naramdal & Garamdal “in 1907 (not in 1941) at Surat session. “Naramdal” was not led by ML Nehru, who joined active politics only in 1914, but by Gopal Krishna Gokhale (Political Guru of Gandhiji ) and “Garamdal” by Bal Gangadhar Tilak (Jinnah was his Political secretary and lawyer at that time)

- During above mentioned split Gandhiji was still in South Africa and was a rather unknown figure in India. The party was reunited in 1916 by the efforts of Tilak, Gokhale, Annie Beasant etc.

- ML Nehru entered Central Assembly in 1921 but not as part of Coalition govt. but leader of opposition and there his team exposed numerous follies of British govt.

- Tilak died in 1920 and ML Nehru in 1931, so once again some ghosts were leading the ghost dals “naram” & “garam” in 1941.

- True Tagore did returned his Knigthood after Jalianwala Bag Massacre, but so did various others like Gandhiji himself who returned the title of “kaisar-e-Hind” given to him for his work during World War I and other services.

- Jan Gan Man was adopted as national anthem on 24-1-1950. Gandhiji died on 30-1-1948.

- The constituent assembly that adopted national anthem had 299 members , so how did 318 supported “Vandematram”. Further if Muslim’s opposition was the only reason for rejecting “Vandematram”., then how come none of the Muslim members of constituent assembly did not oppose it.


Dr Rakesh Agrawal with his wife Rani and Kids



One of my oldest & best friends Dr Rakesh Agrawal with his wife Rani and Kids. Wow!!! nice to see you Rakesh after almost 23 years। Thanx to IT guys who made FB type of thing had it nt been there we would nt have met and seen each other as well. Rakesh is an Expert Doctor in US for last 23 years.............



लिपटा और गुमा हुआ...दिन

कल तक अन्ना के नाम की धूम मचाने वाले फेसबुक के लोग कहा है यहाँ पूरी वाल खाली पडी है सब ठंडा.............अशोक वाजपेयी की एक अश्लील कविता याद आ रही है..........
"स्खलन के बाद जब कुछ अच्छा नहीं लगता।"
खैर.........एक नया दिन और सब वही सर्द सुबह और ओंस के बीच लिपटा और गुमा हुआ...दिन को कहा तलाश करू...रात तो गुजर ही गयी थी जैसे तैसे...अब यह चक्र भी हो ही जाएगा अपनी धुरी पर पूरा।

उल्लू सीधा करना

एक लंबी छुट्टी के बाद आज ही लौटा हूँ कर्मस्थली पर देखना है कि ठीक से काम कर पाता हूँ या नहीं अब मन नहीं है कि फ़ालतू के चक्करों में पडू और अपना ध्यान और अपना मन व्यथित करू वो भी उस सब के लिए जो अपना था ही नहीं जैसे एक साये को पकडने के लिए देह की समिधा देकर भी साये को पकड़ा नहीं जा सकता तो क्या मोह क्या माया और क्या रिश्ता क्या नाता बस सब माया है, अपना उल्लू सीधा करना में भी जानता हूँ और बाकी सब तो माहिर होते ही है...

Tuesday, August 16, 2011

एक काले दिन के फूटकर नोट्स


देश में लगभग आपातकाल जैसे हालात बन् रहे है आज संसद तय करेगी और सुप्रीम कोर्ट के आदेश इस देश की दशा और दिशा तय करेंगे......कल का भाषण और मौन मोहन सिंह का नजरिया यदि ठीक होता तो शायद आज ये स्थिति नहीं बनती. जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगो को संयम बरतना कितना जरूरी है यह ६५ वी साल गिरह का सबसे बड़ा पाठ है. खैर, अब यह देखना है कि ऊंट किस करवट बैठता है, अब विपक्ष को पानी भूमिका ठीक से निभाना होगी ना कि टालमटोल वाली.

Govt is feeling guilty and now in dilemma what to do...........Session of Parliament is on, they are talking seriously, in the mean time why cant Hon Supreme Court take Su- Motto action and instruct Govt to release all activists of India Against Corruption. But best part is Delhi Police has acted with lot of passions, it must be appreciated, in the way all behaved it shows that they are also in favor of this group.
Its a BLACK DAY in the country, may be these people are wrong but in the way govt is acting this is ridiculous and embarrassing।


Monday, August 15, 2011

सात कारण अन्ना हजारे को देश के लिए सात दिन देने के

सात कारण अन्ना हजारे को देश के लिए सात दिन देने के
पहला कारण है श्री अन्ना हजारे खुद. भ्रष्टाचारी को सज़ा नहीं मिल पाती क्यूंकि उसकी जांच करने वाला भी भ्रष्ट होता है. घूस लेने वाला जानता है की पकड़े जाने पर वह घूस देकर छूट जायेगा. करोड़ों की संपत्ति एकत्र कर चुका प्रवचनकार लाखों की गाड़ी से उतर कर जनता को ज्ञान बांटता है की माया-मोह त्यागो, तो आमजन इस बात को केवल उसकी आदत मानकर दूसरे कान से निकाल देती है. लेकिनं दशकों बाद देश को एक ऐसा नेतृत्वकर्ता मिला है, जिसकी निजी आवश्यकताएं और संपत्ति वाकई लगभग शून्य हैं. अहमदनगर, महाराष्ट्र के मंदिर के एक छोटे से कमरे में रहने वाले किशन बाबूराव हजारे यानी अन्ना हजारे के नाम कोई संपत्ति, कार, मकान-खेत-उद्योग या फार्म हॉउस नहीं है. एक बिस्तर और खाने की थाली यही निजी संपत्ति के नाम पर अन्ना की चीज़ें हैं. न्यूनतम आवश्यकताएं ही इस संत व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति है और किसी धन-पद-नाम-पुरूस्कार आदि की अपेक्षा न होना ही उन्हें अजेय बना देता है. वर्षों तक जनकल्याण और न्याय के लिए किये गए संघर्ष का तप उनके सामान्य से चेहरे को सम्मोहक बना देता है. निडरता और अन्याय के प्रति आक्रोश उनकी आवाज़ में झलकते हैं. आश्चर्य नहीं कि आज करोड़ों भारतीयों को खादी की वेशभूषा में गांधी टोपी लगाये श्री अन्ना हजारे को देखकर बरबस गांधीजी की याद आ जाती है. इसलिए श्री अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार के विरोध में लड़ाई में उनका साथ देने का सबसे पहला कारण है कथनी और करनी में समरूपता वाला और पद-संपत्ति के प्रति निर्मोही ऐसा जननेता देश को बार-बार नहीं मिलेगा.



दूसरा, कारण है आत्मरक्षा...जी हाँ, देश को थोड़ी देर के लिए अपने हाल पर छोड़ दीजिये, अपने परिवार की रक्षा तो हर कोई चाहता है. भारत में भ्रष्टाचार आज कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और प्रेस, यानी लोकतंत्र के चारों स्तंभों में घुन की तरह लग चुका है. पूरी दुनिया में हजारों बार परखा हुआ तथ्य है भ्रष्टाचार और माफिया दोनों साथ साथ पनपते है. देश में जितना भ्रष्टाचार का स्तर ज़्यादा होगा, अपराधी तत्वों और माफिया के हौसले उतने ही बुलंद होंगे. भारत में भी हम देख सकते हैं की भ्रष्टाचार का स्तर बढ़ने के साथ कानून का डर अपराधियों में समाप्त होता जा रहा है. अपराधी का संरक्षण नेता और नेता का पोषण भ्रष्ट अधिकारी करते हैं. इसी खतरनाक गठबंधन के कारण आज यदि कोई माफिया तो छोडिये छोटा-मोटा गुंडा भी किसी आम आदमी के पीछे पड़ जाए तो वह कानून की मदद लेने की बजाय कुछ ले-दे कर अपनी जान छुड़ाना चाहता है. आज गुंडा माफिया तत्व सामान्य जन की संपत्ति के पीछे पड़े है, तय जानिये कल उसकी इज्ज़त और ज़िंदगी भी छीनने लगेंगे. इसलिए अपनी और अपनी आनेवाली पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है भ्रष्टाचार को रोक कर गुंडा-माफिया तत्वों की प्राणवायु समाप्त की जाए.



तीसरा कारण है पारिवारिक समृद्धि की कामना जो हर इंसान में विद्यमान होती है. अब ये प्रश्न जायज़ है की श्री अन्ना हजारे जब स्वयं अपने लिए कोई संपत्ति नहीं बनाना चाहते हो उनके आन्दोलन की सफलता से हमें समृद्धि कैसे मिलेगी ? देश और किसी सामान्य जन दोनों के लिए समृद्धि दो तरह से ही बढ़ सकती है, आय बढ़ाकर या खर्चे घटाकर. आज सब जानते हैं की सरकारों द्वारा खर्च किये जाने वाले एक रुपये का ज़्यादातर हिस्सा भ्रष्टाचार की स्थापना की भेंट चढ़ जाता है और मात्र चंद पैसे ही वास्तविक कार्य में खर्च होते हैं, इसे सामान्य भाषा में कहते हैं रूपया चंद पैसों में चलना. आज यदि सरकार का रूपया दस पैसे में चलता है और श्री अन्ना हजारे के आन्दोलन और जन लोकपाल के कारण पच्चीस पैसे में भी चलने लगा तो इसका अर्थ होगा सरकार के पास बिना एक भी नया कर लगाए या पुराने करों की दर बढ़ाये अथवा पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य बढ़ाये, ढ़ाई गुना अधिक क्रय शक्ति. निश्चित तौर पर इस से देश का विकास तो होगा ही आम आदमी पर करों और महंगाई का बोझ घटेगा. इससे आम आदमी उतनी ही आमदनी में ज़्यादा आसानी से जीवन यापन कर सकेगा, जिसे आप उसकी समृद्धि भी कह सकते है.



हांगकांग 70 के दशक के प्रारंभिक वर्षों तक भ्रष्टाचार और माफिया की जकड में था. अंततः 1974 में गठन हुआ इन्डिपेंडेंट कमीशन अगेंस्ट करप्शन (ICAC) का. इस साधन संपन्न लेकिन स्वतंत्र संस्था ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध धरपकड़, रोकथाम और जन जागरूकता के तीन सूत्रीय कार्यक्रम चलाकर हांगकांग को दुनिया में ईमानदारी के लिए प्रसिद्द विश्व-व्यापार के पसंदीदा केंद्र में बदल दिया. पहले ही वर्ष में लगभग साठ प्रतिशत बड़े अधिकारियों की छुट्टी कर ICAC ने उनमें से अधिकांश को जेल की राह दिखाई और जो बचे उन्होंने रिश्वत के नाम से ही तौबा कर ली. हांगकांग की तरह ही इक्वाडोर, तंजानिया, बोत्स्वाना, माली, सेंगल जैसे छोटे-छोटे राष्ट्र भी अपने यहाँ भ्रष्टाचार मिटाने में सफल रहे और भुखमरी की स्थिति से उबरकर आज विकास की राह पर है. भ्रष्टाचार मिटाने के लिए एक मजबूत कानून यानी जनलोकपाल के लिए आन्दोलन कर रहे अन्ना के पीछे खड़े होने का चौथा कारण है राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न की जो कार्य हमारे एक-दो शहरों या प्रदेशों जितने बड़े राष्ट्र कर सकते हैं...उसे करने में विश्वगुरु रहा भारत असमर्थ है क्या ?



भारत के में भ्रष्टाचार के निर्मूलन के लिए कई सरकारी संस्थाएं हैं, जैसे - सी.बी.आई., सेंट्रल विजिलेंस कमीशन और ऐसी ही राज्यों की संस्थाएं आदि. लेकिन, इनकी सबसे बड़ी दिक्कत है इन पर पूर्ण सरकारी नियंत्रण और इनके बंधे हुए हाथ और आँखें. आपको जानकर आश्चर्य होगा की यदि सी.बी.आई. को किसी मंत्रालय में भ्रष्टाचार की जांच करनी हो तो उसे पहले अनुमति लेनी होगी, वो भी किसकी...? खुद उस मंत्रालय के मंत्री की ! यानी यदि सी.बी.आई. को दूरसंचार मंत्रालय द्वारा स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटाले की जांच करनी हो तो वह तब तक नहीं कर सकती जब तक स्वयं ए.राजा उसे अनुमति न दे. सी.वी.सी. का कुल स्टाफ दो सौ बत्तीस लोगों का है, और उसके जिम्मे 1500 सरकारी विभागों के चालीस लाख से अधिक कर्मचारियों के ऊपर निगाह रखने का कार्य है. केंद्र और राज्य सरकार की अधिकांश जांच एजेंसियों की समस्या यह है की वे सीधे मुक़दमा दायर कर गिरफ्तारी नहीं कर सकतीं. ज़्यादातर जाँच एजेंसियां सिर्फ "सलाह" दे सकतीं हैं की अमुक अधिकारी को बर्खास्त किया जाए अथवा उसको गिरफ्तार किया जाए. लेकिन उनकी इस "सलाह" का असर कितना होता है ये जानने के लिए सी.वी.सी. जैसी दिग्गज संस्था का सफलता रिकॉर्ड जानना काफी है - शून्य. आपको जानकार दुःख होगा कि जांच एजेंसियों द्वारा छापे में कई करोड़ रुपयों की नगदी के साथ पकडे गए कई अधिकारी आज भी बदस्तूर नौकरियां कर रहे हैं और जनता को दोगुनी रफ़्तार से लूटने में लगे हैं, क्योंकि जांच एजेंसियों द्वारा बर्खास्त करने की "सलाह" के बाद सम्बंधित मंत्रियों ने उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया. श्री अन्ना हजारे के हाथ मजबूत करने का पाँचवाँ कारण है देश की ज़रूरत भ्रष्टाचार से निपटने के लिए कम-से-कम एक एजेंसी की ज़रुरत जो सरकारी शिकंजे से मुक्त हो, अधिकार और साधन संपन्न हो. एक ऐसी एजेंसी जो देश में भ्रष्टाचार मिटने के एक मात्र उपाय, भ्रष्ट मंत्रियों और अफसरों को जेल पंहुचाने में सक्षम हो. क्योंकि जब तक एक कड़ा कानून ऐसी एजेंसी अस्तित्व में नहीं आती तब तक इंसान तो क्या भगवान भी देश से भ्रष्टाचार नहीं मिटा सकते.



देश की संसद में सजायाफ्ता और कई संगीन अपराधों के आरोपियों का प्रतिशत लगातार बढ़ता जा रहा है. भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे सांसदों-मंत्रियों का प्रतिशत भी उच्च है. एक अनुमान के अनुसार कड़ा भ्रष्टाचार विरोधी कानून जैसे अन्ना हजारे का "जन लोकपाल " आधे से अधिक वर्तमान राजनेताओं को जेल या फिर घर बैठा देगा. यही कारण है कि देश पर एक बेहद सीमित दायरे वाला और बिना अधिकारों वाला सरकारी लोकपाल कानून थोपने की तैयारी की जा रही है. सरकार की मंशा अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों द्वारा तैयार ड्राफ्ट को कूड़ेदान में डालने से ज़ाहिर हो जाती है. सरकारी लोकपाल यदि कानून बनता है तो टू जी स्पेक्ट्रम, आदर्श घोटाला, राष्ट्रमंडल घोटाला आदि जांच के दायरे बाहर होंगे. पंचायतों और नगरपालिका-स्थानीय समितियों के भ्रष्टाचार की जांच नहीं हो पायेगी, आम आदमी तो रिश्वतखोरी की शिकायत नहीं कर पायेगा नहीं निर्धारित समय के भीतर काम न करने वाले अधिकारीयों पर कार्यवाई हो पायेगी. करोड़ों मध्यम और निम्न श्रेणी के अधिकारी और कर्मचारी भी दायरे में न होंगे. संक्षेप में यह एक पूरी तरह लाचार और पंगु कानून होगा. श्री अन्ना हजारे जैसा गांधीवादी व्यक्ति सरकारी लोकपाल विधेयक की प्रतियाँ जलाने पर मजबूर यूँ ही नहीं हुआ होगा. श्री हजारे के साथ सात दिन के लिए सरकारी लोकपाल बिल का विरोध करने का छठवां कारण है लगभग सभी दलों द्वारा एकमत होकर थोपा जा रहा लचर सरकारी लोकपाल. यदि एक बार यह बिल पास हो गया हो गया तो तमाम अपराधी जेल के पीछे नज़र आने की बजाय बेफिक्र होकर देश को लूटते नज़र आयेंगे.



देश के चुनावों में आज इतना अधिक धन लगता है कि कोई आम शरीफ व्यक्ति चुनाव लड़ने की सोच भी नहीं सकता. यही कारण है की देश की संसद बाहुबलियों और धनाड्यों से भरी नज़र आती है. जन लोकपाल विधेयक काले धन को रोककर चुनावों को आम ईमानदार आदमी के लड़ने योग्य बनाने की और एक कदम होगा. भ्रष्टाचार के "जीरो रिस्क, फुल रिटर्न" का व्यवसाय बनने से भी राजनीति में आने की होड़ लगी है जो "जन लोकपाल" से घटेगी. अच्छे और सेवाभावी लोगों के आने से देश की संसद का असर बढ़ेगा तथा देश को वो नेतृत्व संसद द्वारा मिल सकेगा जो विश्व महाशक्ति के रूप में देश के लिए ज़रूरी है. भारत का युवा इस बात को अच्छी तरह से महसूस करता है तथा इसी कारण आज अन्ना की एक आवाज़ करोड़ों देशवासियों की आवाज़ बन गयी है. देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए इससे अच्छा मौका और नेता पता नहीं फिर कब मिले. यह आन्दोलन, जिसे श्री अन्ना हजारे आजादी की दूसरी लड़ाई कहते हैं, आज एक निर्णायक मोड़ पर है. आज देश के लिए सात दिन निकलकर हम देश की सबसे बड़ी आतंरिक समस्या से निपटने में अपना योगदान दे सकते हैं. श्री अन्ना हजारे के कहने पर सात दिन देश के लिए निकालने का सातवाँ कारण है इस सुनहरे मौके का पूरा लाभ उठाना. स्वतंत्रता दिवस के अवकाश के बाद अखबार जब आपके हाथ में आयेंगे तब तक अन्ना का आन्दोलन प्रारंभ हो चुका होगा. तो आप आज ही तय कर लीजिये - सोलह अगस्त से सात दिन देश के लिए अन्ना के नाम

Thursday, August 11, 2011

मन की गांठे

जीवन में दो चीजें पाना बहुत मुश्किल होता है उसे लगता था कि अपनो को जिसे वो बेहद प्यार करता था उन्हें बता पाना प्रेम के बारे में और दूसरा अपने आप को समझाना कि अपनो को प्यार करना बेहद खतरनाक है यह दवंड यह नैराश्य उसे हर पल कोसता और प्रेरित करता था कि एक लंबी लड़ाई जीवन में अन्तोत्गत्वा हारना ही पडती है सबसे मुश्किल काम अपनो को अपने आप से जोड़े रखना है और यह जुडना और टूटना ही आरोह अवरोह के समान हर पल उसे जीवन के अनंतिम सत्य के पास ले आते है मौत तुझसे एक वादा है(मन की गांठे)

मन की गांठे

अपना क्या होता है और किसे अपना कहे जिसने सब छोड़ कर सब अपना लिया वो या जिसने सब अपनाकर सब छोड़ दिया एक ही झटके में तोड़ दिया वो ? मन का फेर है यह तो पता था पर जब आज मैंने अपने सामने जिंदगी को अपने से दूर रहकर मौन देखा, तो लगा कि में पस्त हो गया हूँ और अब हांफते हुए इस उहापोह में कुछ कर नहीं पाउँगा जीने का माद्दा ही जब खत्म हो जाए तो क्या जीवन और क्या मरण सब एक समान होता है और फ़िर हम जीते ही क्यों है और मरना भी क्या होता है जीते हुए सब सामने देखना कि कैसे कोइ रूठकर चला जाता है(मन की गांठे)

मन की गांठे

जाते तो सब है पर ऐसे कोइ नहीं जाता जैसे चला गया जीवन से साँसों का रिश्ता, जीवन से सुखद स्वप्न, जीवन से एकाएक निकल जाना कौतुहल का और फ़िर एक स्थायी मौन के रूप में बस जाना दूर कही व्योम में, देखते रहना टूकुर टूकुर और सिर्फ न महसूस करना उस सबको जो दे चुका है अपनी समिधा और कर चुका है तर्पण अपने जीते जी.जाते तो सब है पर ऐसे कोइ नहीं जाता यूँ छोडकर अपने आप से छूटना भी क्या दर्द होता है यह सवाल ही आता है जेहन में इस सबके बाद(मन की गांठे)

मन की गांठे

लगता था कि सब कुछ ठीक हो गया है अब ये सब रिश्ते नाते मौत की अंतिम सांस तक जुड़े है और फ़िर सब कुछ तो दे दिया उसे जीवन की हर खुशी, धडकनों का स्पंदन, सारे मौसम, सारे पारितोष, या यूँ कहे कि जीवन डोर पर जब भी इस डोर को उसने देखा वो कही उलझती सी नजर आयी एक बारगी तो लगा कि रूतुपर्ण के बाद बयार होगी पर आज महसूस कर लिया कि जीवन तो चला गया और अब कुछ होने वाला नहीं तो उसने बस डोर को काट दिया हमेशा के लिए और फ़िर एक विश्राम ले लिया चिरस्थायी (मन की गांठे)

फेसबुक मेनिया

लगता था कि सब मेरा था सब मेरा है पर जब एक बड़ा जाला साफ़ हुआ तो लगा कि कुछ नहीं मेरा है जो मेरा अंश ही नहीं वो कैसे अपना हो सकता है जब मोह के पाश से छूटकर जाते हुए जिंदगी ने पलटकर नहीं देखा तब तक में एक भ्रम में जीते रहा और जैसे ही यह भ्रम टूटता है तो लगता है सब कुछ खत्म हो गया दो लोगो का मौन भी कितनी बड़ा शून्य पैदा कर देता है यह जानकार हैरानी होती है कैसे हम ज़िंदा रह लेते है एक गहरी चुप के साथ (फेसबुक मेनिया)

प्रशासन पुराण 20

जिंदगी में सुकून बड़ी चीज है साब, अब इतने साल काम कर लिया तो क्या निहाल कर दिया बस दो तीन साल बचे है, बस घूमते फिरते घर आ गए है बीवी भी यही है बेटे नोकरी में बेटियों को ब्याह दिया है, अब काम होता नहीं बस तनख्वाह के अलावा जो भी कोइ कुछ दे जाता है ले लेते है क्या किसी गरीब से मांगे, बस इतना तो मिल जाता है कि पति पत्नी की तनख्वाह बेंक से निकालना नहीं पडती और एक दो एफडी बना लेते है पांच लाख की हर तीसरे माह, प्रलाप जारी था(प्रशासन पुराण20)

Wednesday, August 10, 2011

एक पहिया ढोता है

‎20 साल बाद मैं अपने आप से सवाल करता हूं
क्‍या आजादी तीन थके हुए रंगों का नाम है
जिनको एक पहिया ढोता है
या
इसका कुछ खास मतलब होता है।
-धूमिल

आज भी सवाल वही है और उत्तर व्योम में है दोस्तों......