Thursday, August 11, 2011

मन की गांठे

अपना क्या होता है और किसे अपना कहे जिसने सब छोड़ कर सब अपना लिया वो या जिसने सब अपनाकर सब छोड़ दिया एक ही झटके में तोड़ दिया वो ? मन का फेर है यह तो पता था पर जब आज मैंने अपने सामने जिंदगी को अपने से दूर रहकर मौन देखा, तो लगा कि में पस्त हो गया हूँ और अब हांफते हुए इस उहापोह में कुछ कर नहीं पाउँगा जीने का माद्दा ही जब खत्म हो जाए तो क्या जीवन और क्या मरण सब एक समान होता है और फ़िर हम जीते ही क्यों है और मरना भी क्या होता है जीते हुए सब सामने देखना कि कैसे कोइ रूठकर चला जाता है(मन की गांठे)

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