Thursday, August 30, 2012

उल्लू की नसीहत और देश के हालात.......


एक बार एक हंस और एक हंसिनी जंगल में घूम रहे थे बातों बातों में समय का पता नहीं चला शाम हो गयी, वो अपने घर का रास्ता भूल गए और चलते-चलते एक सुनसान जगह परएक पेड़ के नीचे जाकर रुक गए . हंसिनी बोली मैं बहुत थक गयी हूँ चलो रात यहीं बिताते हैं सुबह होते ही चलपड़ेंगे. हंस बोला ये बहुत सुनसान और वीरान जगह लगती है (----''यहाँ कोई
उल्लू भी नहीं रहता है''-----) चलो कोई और जगह देखते हैं. उसी पेड़ पर बैठा एक उल्लू हंस और हंसिनी बातें सुन रहा था वो बोला आप लोग घबराएँ नहींमैं भी यहीं रहता हूँ , डरनेकी कोई बात नहीं है आप सुबह होते ही चले जाईयेगा . हंस और हंसिनी उल्लू की बात मानकर वहीँ ठहर गए .
सुबह हुई हंस और हंसिनी चलने लगे तो उल्लू ने उन्हें रोक लिया और हंस से बोला तू हंसिनी को लेकर नहीं जा सकता ये मेरी पत्नी है. हंस बोला भाई ये क्या बात कर रहे हो तुम जानते हो कि हंसिनी मेरी पत्नी है. उल्लू बोला नहीं हंसिनी मेरी पत्नी है तू इसे लेकर नहीं जा साकता . धीरे-धीरे झगड़ा बढ गयाऔर तू-तू में-में होने लगी . उल्लू हंस की बात मानने को तैयार ही नहीं था . तभी चतुराई से उल्लू बोला
कि हम पंचों से इस बात का फैसला करवाएंगे कि हंसिनी किसकी पत्नी है . हंस के पास कोई चारा नहीं था . उल्लू उनको लेकर पास के गाँव में गया और हंस ने पंचों को अपनी व्यथा सुनाई.
फिर फैसले के लिए पंचायत बुलाई गयी सभी पंचों ने विचार विमर्श किया और सोचा कि हंस तो कहीं बाहर से यहाँ आया है और उल्लू तो हमारे गाँव में ही रहता है इसलिए हंसिनी उल्लू को ही दे देते हैं जिससे हंसिनी हमारे गाँव में ही रहेगी. पंचों ने फैसला सुनाया हंस को बोले कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और उसे तुम उसे लेकर नहीं जा सकते हो.हंस दुखी होकर रोने लगा.
फिर तीनों लोग वापस गाँव से बाहर निकल कर उसी पेड़ के पास जाकर रुके. हंस बहुत दुखी था तभी उल्लू बोला हंस दुखी मत हो हंसिनी तेरी ही पत्नी है और तू ही इसे लेकर यहाँ से जायेगा. लेकिन मेरी एक नसीहत सुन ''ये जगह इसलिए इतनी सुनसान और वीरान नहीं है कि यहाँ उल्लू रहताहै बल्कि इसलिए सुनसान और वीरान कि यहाँ ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लू की बात मान कर फैसले लेते हैं''.
दोस्तों आने वाले समय में हमें ऐसे पंचों को हटाना है
और ऐसे पंच ढूढने हैं जो उल्लुओं की बात न मानें तभीहमारा देश खुशहाल हो सकेगा

Great people talk about ideas

How our inner Ego sometimes misjudges a PERSON
A lady in a faded grey dress and her husband, dressed in a homespun suit
walked in timidly without an appointment into the Harvard University
President's outer office. The secretary could tell in a moment that such
backwoods, country hicks had no business at Harvard and probably didn't even
deserve to be in Harvard.

"We want to see the President "the man said softly..

"He'll be busy all day "the secretary snapped.

"We'll wait" the lady replied.

For hours the secretary ignored them, hoping that the couple would finally
become discouraged and go away. They didn't and the secretary grew
frustrated and finally decided to disturb the president.

"Maybe if you see them for a few minutes, they'll leave" she said to him.
The President, stern faced and with dignity, strutted toward the couple.

The lady told him "We had a son who attended Harvard for one year. He loved
Harvard. He was happy here. But about a year ago, he was accidentally killed
My husband and I would like to erect a memorial to him, somewhere on campus
"

The president wasn't touched....He was shocked. "Madam "he said, gruffly, "
we can't put up a statue for every person who attended Harvard and died. If
we did, this place would look like a cemetery."

"Oh, no," the lady explained quickly "We don't want to erect a statue. We
thought we would like to give a building to Harvard."

The president rolled his eyes. He glanced at the gingham dress and homespun
suit, and then exclaimed, "A building ! Do you have any earthly idea how
much a building costs? We have over seven and a half million dollars in the
physical buildings here at Harvard."

For a moment the lady was silent. The president was pleased. Maybe he could
get rid of them now.

The lady turned to her husband and said quietly, "Is that all it costs to
start a university ? Why don't we just start our own?"
Her husband nodded. The president's face wilted in confusion and
bewilderment.

Mr. and Mrs. Leland Stanford got up and walked away, traveling to Palo Alto,
California where they established the University that bears their name.
Stanford University , a memorial to a son that Harvard no longer cared about

Most of the time we judge people by their outer appearance, which can be
misleading.. And in this impression, we tend to treat people badly by
thinking they can do nothing for us. Thus we tend to lose our potential good
friends, employees or customers.

Remember

In our Life, we seldom get people with whom we want to share & grow our
thought process. But because of our inner EGO we miss them forever.
It is you who have to decide with whom you are getting associated in day to
day life.

Small people talk about others,
Average people talk about things,
Great people talk about ideas

Wednesday, August 29, 2012

प्रशासन पुराण 56



कल एक वरिष्ठ साथी से बात हो रही थी जो लंबे समय तक म् प्र नरोन्हा प्रशासनिक अकादमी में बतौर फेकल्टी रहे है और आजकल कुछ सहयोग करते रहते है. कह रहे थे कि देश का सुशासन करने के लिए जिन भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को चुना जाता है और लबासना मसूरी में भेजा जाता है इन्हें वहाँ यह बार बार सिखाया जाता है कि तुम देश के कर्णधार हो और अब देश तुम्हारे ही भरोसे है इसलिए अपना "इगो" कायम रखते हुए और सबको म
ुर्ख समझकर काम करो, यह "पेम्परिंग" इन्हें जीवन भर ज़िंदा रखती है और गर्व और इगो साथ ही अपने ही आप में मस्त रहकर ये अधिकारी देश का सत्यानाश कर डाल रहे है. ना इन्हें जन की फ़िक्र है, ना लोक की, ना लोकतंत्र की. जब तक लबासना का ढांचा मूल रूप से बदला नहीं जाता मेरा मतलब वहाँ पर दो वर्ष के प्रशिक्षण को ठीक से वर्तमान सन्दर्भों में लागू नहीं किया जाता तब तक देश में ऐसी ही ढीलपोल चलती रहेगी. मै कभी से कह रहा हूँ कि भा प्र से के अधिकारी की जिले में निरंकुशता पर लगाम लगायी जानी चाहिए. मेरी नजर में बराक ओबामा और भाप्रसे का अधिकारी पूरी दुनिया को अपनी जेब में रखकर चल रहा है और जो मर्जी वो कर रहा है. जिले में जिलाधीश नामक व्यवस्था खत्म की जाये और ये तथाकथित हाई क्लास ब्यूरोक्रेट्स जमीन से जुड़े और सच में लोकसेवक की मंशा अनुरूप काम करें. इतने आयोगों ने इन सुधारों के लिए अनुशंषाएं की है पर कहाँ किसी को फर्क पड़ा, नेता पांच साल के लिए आते है और बस ये सबका बेंड बजा देते है ......नियम कायदे तो बदले जा सकते है पर इनको कौन कब बदलेगा.....

आजकल ये आदिवासी ज्यादा बोलने लगे है.....


आज एक जिला स्तरीय बैठक में बड़ा गजब हुआ है एक जिला पंचायत के सदस्य श्री फागराम जी, जो आदिवासी समाज के है, ने बड़ी दिलेरी के साथ होशंगाबद्द जिले के केसला ब्लाक के तामु रोड पर बनने वाले मिनरल वाटर और शराब फेक्ट्री का विरोध किया जिसकी स्वीकृती राज्य शासन ने ( पत्रांक नवीन विनिर्माण इकाई D-1/शासन FB-1-43/2011/12/5 दिनांक 16/2/2012) दे दी है, उन सदस्य महोदय ने राज्य शासन के दो वरिष्ठ मंत्रियों और जिले के
सभी अधिकारियों के सामने दिलेरी से कहा कि यह फेक्ट्री अगर खुल गई तो केसला ब्लाक के किसानों को पानी की दिक्कत हो जायेगी क्योकि फेक्ट्री तो बड़े -बड़े, मोटे- मोटे ट्यूबवेल बनाएगी और जमीन में घुसकर तीन हजार फूट से भी पानी ले आयेगी, साथ ही शराब बनाने के लिए लाखो टन अनाज बर्बाद कर देगी, इन सदस्य महोदय ने यह भी कहा कि केसला ब्लाक में 314 बच्चे गंभीर कुपोषित है, आदिवासियों को खाने को मिल नहीं रहा ऐसे में सरकार यह शराब की फेक्ट्री डालकर क्या विकास करना चाहती है और किसका विकास...वे इस बैठक की जमकर तैयारी करके आये थे उन्होंने आंगवाड़ी, प्राथमिक स्वास्थय केंद्र, पोस्टमार्टम रूम, स्कूल, वन विभाग के भी बहुत ही जोरदार मुद्दे तथ्यों के साथ इस अंदाज में उठाये कि मन प्रसन्न हो गया. हालांकि मंत्रीद्वय और प्रशासन के अधिकारियों को उनकी सारी बातें नागवार गुजर रही थी मुझे ऐसा लगा, पर उनकी बातों में जो दम था और सारे तर्क इतने अकाट्य प्र ठोस थे कि थे जिले के अधिकारी उनके होम वर्क पर जवाब नहीं दे पा रहे थे और सिर्फ सतही बातें कर रहे थे. बैठक खत्म होते ही मै उन श्रीमान जी को खोज रहा था कि उन्हें ग्राम सभा के प्रावधानों के बारे में बताऊ कि "म प्र पंचायती राज और ग्राम स्वराज अधिनियम" के तहत राज्य शासन ग्राम सभा से पूछे बगैर किसी भी तरह के काम की स्वीकृती नहीं दे सकती यदि वह काम ग्राम पंचायत में आता है तो, पर वे मिल नहीं पाए. पर मै उन्हें खोज कर ही रहूंगा और उनसे मिलकर बहुत कुछ सीखा भी जा सकता है. अधिकारीगण बैठक के बाद जैसा कि होता है कह रहे थे आजकल ये आदिवासी ज्यादा बोलने लगे है.....

नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा VIII


कुछ पछतावे कभी भी जीवन में पछतावे नहीं बन् पाते वो नासूर बन् जाते है और हम ताउम्र इन्ही के साथ जीने को अभिशप्त रहते है...................सुना क्या...............कहा हो तुम...........

Monday, August 27, 2012

हम सब कहते है कि जय जय पंच परमेश्वर.............!!!



रोशनी उगाने का एक जतन और......."

श्री विभूति दत्त झा म् प्र के जानेमाने वकील और सामाजिक कार्यकर्ता है और पिछले तीस बरसो से वे लोगों के मुकदमे ब्लाक से लेकर हाईकोर्ट तक लड़ रहे है. इन दिनों वे मंडला में रहकर बिछिया ब्लाक के गाँव में अलख जगाने का कार्य कर रहे है. आज उन्होंने एक राज्य स्तरीय कार्य शाला में अपने अनुभव सुनाते हुए कहा कि जब वे लगातात कोर्ट कचहरी से तंग आकर आलीराजपुर जिले के कठ्ठीवाडा ब्लाक में गये तो मेरी एक मित्र साधना हेर्विग ने उन्हें दो किताबें पढाने को बहुत पतली किताबें थी एक " द हंगर प्रोजेक्ट" द्वारा प्रकाशित पुस्तिका जिसे संदीप नाईक ने लिखा था ग्राम सभा एवं दूसरी "डिबेट" संस्था द्वारा प्रकाशित पैसा एक्ट पर किताब, इन दोनों किताबों ने उनका नजरिया ही बदल दिया और फ़िर विभूति जी अपने डेढ़ घंटे के उदबोधन में कठ्ठीवाडा में किये आदिवासियों की लड़ाई, कालान्तर में मंडला के बिछिया ब्लाक के छोटे से गाँव हेमलपुरा पंचायत से शुरू हुई लड़ाई और आज लगभग पुरे इलाके में एक आंदोलन बन चुके विभूति जी एक बड़ी हस्ती है. उन्होंने जिस तरह से छः बरस पुरानी लिखी किताब का जिक्र और फ़िर सारी मानसिकता बदलने का वर्णन किया उसे सुनकर झुरझुरी आ गई. लगा कि लिखे शब्दों की कोई कीमत होती है और किस बात का असर कहाँ जाकर कैसे होता है यह हममे से कोई नहीं बयाँ कर सकता पर आज अपने होने की सार्थकता और फ़िर से अपने लिखे पर प्यार हो आया. सहज, सरल और एकदम ठेठ देसी अंदाज में और धोती में रहने वाले विभूति दा को देखकर कहना मुश्किल है कि ये वही शख्स है जिसकी तूती कोर्ट में बोलती है या थी, अब वे आदिवासी लोक भाषाओं में पारंगत है. एक मजेदार बात उन्होंने कही कि जब वे आदिवासियों की हकों के लड़ाई लड़ते है तो सबसे सब भाषाओं में बात करते है कलेक्टर से अंगरेजी में बात करते है तो तहसीलदार, एस डी एम कौतुक से उन्हें देखते है और फ़िर बाद में नक्सलवादी कह देते है... वाह विभूति दा आज आपकी बातों ने एक बार फ़िर से दम भर दिया और कुछ करने का जज्बा याद दिला दिया कि "एक जतन और अभी एक जतन और, रोशनी उगाने का एक जतन और......."
Herwig Streubel, Leena Kanhere, Amitabh Singh

Sunday, August 26, 2012

कामरेड ए के हंगल और नील आर्मस्ट्रोंग को लाल सलाम!

Friday, August 24, 2012

छोटी पर बड़ी सीख.............

Wednesday, August 22, 2012

बेहद प्रेरणादायी और सोचने योग्य कहानी.......

साभार Rahul Banerjee बेहद प्रेरणादायी और सोचने योग्य कहानी.......

Socrates was widely lauded for his wisdom. One day the great philosopher came upon an acquaintance who ran up to him excitedly and said, "Socrates, do you know what I just heard about one of your students?"
"Wait a moment," Socrates replied. "Before you tell me I'd like you to pass a little test. It's called the Test of Three."
"Test of Three?"
"That's right," Socrates continued. "Before you talk to me about my student let's take a moment to test what you're going to say. The first test is Truth. Have you made absolutely sure that what you are about to tell me is true?"
No," the man said, "actually I just heard about It."
"All right," said Socrates. "So you don't really know if it's true or not. Now let's try the second test, the test of Goodness. Is what you are about to tell me about my student something good?"
"No, on the contrary..."
"So," Socrates continued, "you want to tell me something bad about him even though you're not certain it's true?"
The man shrugged, a little embarrassed.
Socrates continued. "You may still pass though, because there is a third test - the filter of Usefulness. Is what you want to tell me about my student going to be useful to me?"
"No, not really."
"Well," concluded Socrates, "if what you want to tell me is neither True nor Good nor even Useful, why tell it to me at all?"
The man was defeated and ashamed. This is the reason Socrates was a great philosopher and held in such high esteem.

Sunday, August 19, 2012

चट्टानों पर से गुजरा तो पाँवों के छाप पड गये सोचो कितना बोझ लेकर गुजरा हुंगा मै"

पिछले एक डेढ़ साल में मै इतना हैरान परेशान रहा कि जीवन में कभी नहीं रहा और इस सबमे मजेदार यह था कि किन्ही अपने बहुत करीबी दोस्तों ने ये सिला दिया, दोस्ती का अच्छे सब्जबाग दिखाकर जीवन को तहस नहस कर दिया, हालांकि कुछ दोस्तों ने चेताया भी था पर लगा कि एक बार क्यों ना विश्वास कर ले पर सबने छल किया इस छोटी सी अवधि में तीन शहर में डेरा उठाये घूमने और हर जगह नए सिरे से चूल्हा बसाने के लिए,सामान ढोना, कागजी कार्यवाही और फ़िर गैस आदि के झंझट...... बहुत जिगरा लगता है गुरु......कहना और भुगतना बहुत् मुश्किल है. शुक्र है दोस्तों की भीड़ में कुछ अपने थे और फ़िर परिवार के लोगों ने इस नालायकी भरे फैसले में साथ दिया वरना टूटा तो पहले से ही था साथ ना मिलता तो खत्म ही हो जाता........बात इसलिए आज यहाँ खुलकर लिख रहा हूँ कि एक मित्र से अभी बात हो रही थी जो एक बड़ा फैसला लेकर बड़ा नाम कीर्ति और यश की पताकाएं एवं बड़ा बैनर वो भी अखबारी दुनिया का, छोड़कर नया कुछ करने जा रहे है उन्होंने पूछ लिया कि क्या यह सब आसान है........मै क्या जवाब देता. पर भगवान ना करे कि उन्हें मेरे जैसे
कमीने दोस्त मिल जाये जो जीवन बर्बाद कर दे लोक लुभावन नारों से और वादों से. आजतक किसी के बुराई और बद दुआओं का काम नहीं किया है पर ईद की पूर्व शाम पर उस दोस्त को कोसने को जी चाहता है जिसने एक भले आदमी अकेले आदमी को तीन तीन शहरों में सामान ढोने और हर बार नए सिरे से बसने का दर्द दिया इससे विस्थापन की पीड़ा और उन लोगो की तकलीफ समझ आई जो हर तीन चार माह में चल देते है सर पर अपने मैले कुचेले सामान और दुःख की गठिया का दर्द लेकर नए ठिकानों की ओर........जीवन में सब कर लों पर दोस्तों पर यकीन भी सोच समझ कर करना. अफसोस यह है कि कोसने और अपनी दुर्गति होने की संभावना मानकर वो गुजरात चली गई..............जो दोस्त होने का दावा करती थी बस याद आये दुष्यंत कुमार कि

"चट्टानों पर से गुजरा तो पाँवों के छाप पड गये
सोचो कितना बोझ लेकर गुजरा हुंगा मै"

कभी वापस न आने का वादा तुम्हें देता हूँ.

यह कविता दोस्तों, कम से कम कुछ दोस्तों ने पढ़ी है, फिर भी दोबारा पढ़ने और पढ़वाने का मन कर रहा है, न जाने क्यों....या शायद जाने क्यों...:)

वसीयत

छूट गयीं जो अधूरी, मुलाकातें तुम्हें देता हूँ
हों न सकी जो बातें, तुम्हें देता हूँ
जो कवितायें लिख न पाया, तुम्हें देता हूँ
जो किताबें पढ़ न पाया, तुम्हें देता हूँ

मर कर भी न मरने की यह वासना
स्मृति की बैसाखियों पर जीने की यह लालसा
तुम्हारी कल्पनाओं, यादों के आकाश में
तारे की तरह टिमटिमाने की यह कामना
यह भी तुम्हें देता हूँ

जहाँ से शुरू होती है आगे की यात्रा
वहाँ से साथ रहना है सिर्फ़ वह जो किया
अपना अनकिया सब का सब
पीछे छोड़
कभी वापस न आने का वादा
तुम्हें देता हूँ.
साभार Purushottam Agrawal.....

सबको ईद मुबारक....

सबको ईद मुबारक....

 
 
लों आखिर एक माह के रोज़े, नमाजों और दुआओं के चलते ईद आ ही गई, ईद को लेकर बचपन से एक उत्साह रहता था ना मात्र सिवैया खाने की ललक बल्कि सबसे मिलने जुलने की बेकरारी, मोहल्ले भर में घूम घूम कर सबको ईद मुबारक कहना और ईदी इकठ्ठी करना और फ़िर दोस्तों के साथ फिल्म देखने जाना, हर बार हामिद कही ना कही जेहन में रहता था और बड़ी मस्जिद के बाहर लगे मेले में चिमटा दिखते ही मन में टींस सी उभर जाती थी. आँखें खोजती थी कि कही कोई हामिद दिख जाये तो जेब खर्च और साईं ईदी उसे दे देंगे हम सब दोस्त ...........देवास की टेकडी से चढ़कर राधागंज की मस्जिद में झांकते थे कि हजारों सर कैसे सजदे में झुकते है और मै देखता था कि कहा से हजारों बिजली के लट्टू की उपमा प्रेमचंद ने ली होगी? बड़े हुए तो साथ पढ़े दोस्तों के घर पुरे रमजान माह में आना जाना होता, रात में तराबी सुनते थे और कोशिश करते कि मुँह से गाली ना निकले और किसी के लिए बुरे ख्याल ना आये. भले रोजे ना रखे पर खाने और अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखें, ईद पर दूर शहरों में काम करने वाले दोस्त देवास आ जाते तो साथ बैठकर ढेर सारी बातें तसल्ली से करते. देवास में स्व नईम जी, स्व अफजल सर के यहाँ हर साल ईद पर जाते ही थे और खूब सारा खाते थे और आते समय जिद से अपनी ईदी लेकर आते थे.

धीरे धीरे सब छूट रहा है अब ईद, दीवाली, क्रिसमस, पतेती या गुरुनानक जयंती केवल औपचारिकता जैसे लगने लगे है हालांकि जोश अब भी है पर बाजार, महंगाई, रिश्तों के तल्ख्पन और दूरियों ने सबको बहुत सीमित कर दिया है पर हौसला है अभी जवाँ कि अभी बहुत कुछ है भले ही हामिद साक्षात ना हो पर चिमटा और सजदे में झुके सर याद दिलाते है कि इबादत, भाईचारा, मेलजोल, अपनत्व और रिश्तों के कोमल तंतुओं से जुड़े हम लोग त्यौहार मना रहे है वो भी दिल से.......चाहे ईद हो या दीवाली........
बहरहाल सबको ईद मुबारक और दुआएं है कि यह त्यौहार हम सबके लिए खुशियाँ, तरक्की और नई उम्मीदों के नए रास्त खोले .........आमीन.........

Tuesday, August 14, 2012

आज़ादी की पूर्व संध्या पर एक कविता जनकवि नागार्जुन की...

Happy Independence Day with a beautiful Poem. ( Courtesy - Anand Pradhan and Gopal Rathi)


“...ज़मींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है,
अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है!
सब घुस आए भरा पड़ा है, भारतमाता का मंदिर
एक बार जो फिसले अगुआ, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर!

छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे,

देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे!
जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा,
काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा!

रोज़ी-रोटी, हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा,
कोई भी हो, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा!
नेहरू चाहे जिन्ना, उसको माफ़ करेंगे कभी नहीं,
जेलों में ही जगह मिलेगी, जाएगा वह जहां कहीं!

सपने में भी सच न बोलना, वर्ना पकड़े जाओगे,
भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुंचो, मेवा-मिसरी पाओगे!
माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसानों का,
हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमानों का!”

-नागार्जुन

Sunday, August 12, 2012

कुंदा सुपेकर का समर्पित जीवन -शिक्षा - साक्षरता के लिए

आज अभी मनोज लिमये और प्रीति निगम ने एक दुखद सूचना दी कि राज्य संसाधन केंद्र इंदौर की पूर्व निदेशिका सुश्री कुंदा सुपेकर का आज दिल का दौरा पडने से सुबह दुखद निधन हो गया. ताई के नाम से मशहूर कुंदा जी ने अपने कैरियर की शुरुआत इंदौर के भारतीय ग्रामीण महिला संघ से की थी. स्व कृष्णा अग्रवाल जी के साथ उन्होंने समाजसेवा का ककहरा सीखा और बाद में भारतीय  ग्रामीण महिला संघ के अनेक महत्वपूर्ण पदों पर काम कर इस महिला संघ को देश विदेश में पहुंचाया. जब देश में १९९० में अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता वर्ष मनाया जा रहा था तो दिल्ली में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के निदेशक लक्ष्मीधर मिश्र ने राज्यों में स्वैच्छिक संस्थाओं को राज्य संसाशन केंद्र देने की बात कही और इस तरह में म प्र में भारतीय ग्रामीण महिला संघ को उनके कामों को देखते हुए राज्य संसाधन केन्द्र की जिम्मेदारी सौपी गयी, कुंदा ताई इस केन्द्र की निदेशक बनी और तब से पुरे प्रदेश में और देश में साक्षरता के नए प्रयास, जिला स्तर पर पाठ्य सामग्री का निर्माण, नवाचार और स्थानीय परिवेश के हिसाब से सामग्री का विकास और ढेर सारे प्रयोग हुए. यह सब कुंदा ताई की समझ बूझ और दूरंदेशी का नतीजा था कि जिले में साक्षरता समितियों को विकेन्द्रित अधिकार मिले और उन्होंने अपने तईं काम किये. मुझे याद है देवास के साथ साथ अनेक जिलों में उर्दू के प्राईमर भी तैयार किये गए थे जिसमे शासन तैयार नहीं था पर कुंदा जी ने बहुत जोर दिया कि यदि ये जिलों की मांग है तो क्यों शासन के नियम उन पर लागू किये जाये, साथ ही देवास में शिक्षा शास्त्र के तहत एकलव्य में सफल रूप से प्रयोग किये गये शब्द -अक्षर कार्डों का भी प्रयोग ताई के साथ और उनके साथी अंजलि अग्रवाल, अर्चना वाजपेयी,  मनोज लिमये, सेमसन और अखिल दुबे के विचार विमर्श के बाद करना तय हुआ था जिसे बाद में देश भर में सराहा गया. मेरा ताई से एक लंबा पारिवारिक नाता रहा जिसमे मैंने उनके साथ जो सीखा खासकरके साक्षरता, समुदाय का उन्मुखीकरण, माहौल बनाना, प्रशिक्षण, मूल्यांकन और नई तकनीकों का समावेश जिसमे किशोर वय के बच्चों को समाहित करते हुए कैसे काम किया जाये. ताउम्र वे गरीब लोगों और महिलाओं की शिक्षा के लिए समर्पित रही भारतीय ग्रामीण महिला संघ में कृष्णा जी के बाद वे एक प्रमुख आधार स्तंभ थी जिन्होंने उस ग्रामीण महिला संघ रूपी बेल को एक घना वट वृक्ष बनाया, राज्य संसाधन केन्द्र की नई बिल्डिंग जापानी दूतावास के सहयोग से बनवाई और राऊ स्थित जीवन ज्योति केन्द्र में पढने वाली गरीब अनाथ लडकियों के होस्टल और हायर सेकेंडरी स्कूल को स्थापित करने में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा. इसी राऊ में मैंने कितनी ही गरीब असहाय एवं अनाथ महिलाओं को कई प्रकार के प्रशिक्षण लेते हुए और फ़िर बाद में अपने पैरों पर खड़े होते हुए देखा है.  आज जब यह खबर मिली तो मन उचाट हो गया है. अभी मैंने हाल ही में ताई से बात की थी तो उन्होंने कहा कि मेरा भतीजा अब ठीक है, संदीप तू सुबह से आ जा, मै यही परदेशीपुरे में सुभाष नगर में रह रही हूँ भाई के यहाँ,  सुबह से आना और यही खाना वगैरह खाना, अपनी भतीजी की शादी में बुलाया था जो परसों ही हुई है अफसोस मै जा नहीं पाया पर ताई से वादा किया था कि इन दस दिनों की छुट्टियों में जरूर आउंगा एक पूरा दिन आपके साथ बैठुंगा और गप्प लडाऊंगा साथ में खाना खायेंगे और प्राथमिक शिक्षा के बारे में कुछ एक्शन प्लान बनाएंगे पर सब अधूरा रह गया. ताई के आख़िरी शब्द याद है अभी भी......"बेटा, कुछ लडकियों के लिए भी करो रे, ये बेचारी गरीब लडकियां पढ़ेंगी नहीं तो आगे कैसे बढेंगी" आज प्रीति ने बताया कि उषा अग्रवाल ने कहा कि "कुंदा बहुत अनुशासन मेटेंन करती थी और कभी किसी को परेशान नहीं किया देखो गयी भी तो आज रविवार के दिन कि किसी को छुट्टी ना लेना पड़े..." सही है जिंदगी भर सबको, देशभर में अनुशासन और महिला सशक्तिकरण की मिसाल बनी मेरी और पुरे देश की कुंदा ताई का यूँ जाना बहुत दुखद है आज देश में जब २०११ के जनगणना के आंकड़े देखते है और साक्षरता की बढ़ी हुई दर देखते है तो इसके मूल में कुंदा सुपेकर जैसी साहसिक और बुद्धिमान महिलाओं को सलाम करने को जी चाहता है वे आधुनिक युग की पंडिता रमा बाई या सावित्री बाई फूले थी जिसने देश भर में सबके लिए शिक्षा-साक्षरता का माहौल बनाया और इसके लिए मरने तक अपने तईं  पुरे प्रयास शिद्दत और इमानदारी से किये. यह कहना कि कुंदा जी आज नहीं है गलत है उनकी जलाई हुई शिक्षा और साक्षरता की मशाल यहाँ - वहाँ जल रही है और नित नया उजाला फैला रही है . कुंदा जी आपको आपके जज्बे और पुरे सार्थक जीवन को सलाम और नमन. इंदौर और देश ने ना मात्र इन दिनों शालिनी ताई मोघे और कुंदा ताई को खोया है वरन म प्र से दो जमीनी कार्यकर्ता भी खोये है जिन्होंने प्रसिद्धी से दूर और नाम या पुरस्कारों की दौड़ से दूर रहकर सार्थक काम किये और ये इतने रेडिकल काम थे कि शायद आनेवाली पीढियां कभी विश्वास भी नहीं करेंगी कि ये साधारण कद काठी वाली महिलायें जो बहुत ही साधारण सी पृष्ठभूमि से आई थी इतना बड़ा बदलाव कर सकती थी पर सच तो सच है. सलाम ताई आप हमेशा रास्ता दिखाती रहेंगी यह विश्वास है.

Thursday, August 9, 2012

लघुता से प्रभुता मिले,
प्रभुता से प्रभु दूर,
चींटी शकर ले चली,
हाथी के सर धूर.

अज्ञात.

Courtesy - Navodit Saktawat

Wednesday, August 8, 2012

मोबाईल देने का विरोध क्यों ???

सेम पित्रोदा ने स्व राजीव गांधी को कंप्यूटर युग का स्वप्न दिखाया था तो भी हमारी पीढ़ी ने बहुत विरोध किया था और कहा था कि इससे बेरोजगारी बढ़ेगी आदि आदि, आज हम सब लोग इसके फायदे देख ही रहे है. मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि वैसे भी इस देश में सूचना क्रान्ति आ चुकी है यदि सबके पास आधार कार्ड जा रहा है तो बी पी एल परिवारों को मोबाईल देने का विरोध क्यों , यह सही है कि देश में अभी हम रोजी - रोटी और मकान, बिजली पानी और स्वास्थय जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे है, निश्चित ही मोबाईल इन सबका हल ना है, ना होगा.... पर यकीन मानिए आने वाले पांच सालों में हालात एकदम बदल जायेंगे यह मेरा पक्का मानना है. सरकार के जो भी मंतव्य हो, दबी - छुपी भावनाएं हो, चुनाव की ओर इशारे हो, ट्रेस करने के उद्देश्य हो, फील्ड मोनिटरिंग की बात हो, संदेश देने की बात हो, या सामुदायिक सूचना प्रणाली को मजबूत करने की बात हो हमें एक नई आशा और उम्मीद के साथ इस पहल का स्वागत करना चाहिए. कम्युनिटी रेडियो को लेकर भी इस तरह के पूर्वाग्रह उठे थे मुझे याद है शुरू में हालांकि अभी भी पेचीदगियाँ है इसमे, पर आज यह एक बड़ा हथियार बना है दूरदराज के इलाकों में बदलाव का, यही बात दूरदर्शन पर भी लागू थी, खैर बहुत उम्मीदों से आशा के साथ मै इस पहल को देख रहा हूँ कि इससे दूर दूर तक फैले हमारे गाँव में सूचना का संजाल फैलेगा और हम तक सही बात सीधे पहुंचेगी यह तो तय है अब हमें तय करना है कि इस सही सूचना का क्या करे.........मुझे तो लगता है कि अब लोगों को "वर्चुअल वर्ल्ड" में रहने, अपना स्थान बनाने और उपयोग करके प्रेशर बनाने की ट्रेनिंग देनी चाहिए, बहुत हो चुके जागरूकता और लोक लुभावन कार्यक्रमों के चुतियापे...........

Tuesday, August 7, 2012

नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा VII

पानी का रौद्र रूप चारों ओर देखा है आपने कभी, आप लोग जो रूखे सूखे शहरों से आते हो हमारे शहर को नजर लगाते हो, यहाँ मै जन्मा हूँ ये दीगर बात है कि बाहर पढ़ा और बाहर रहा हूँ, ये बूढ़े  माँ- बाप मुझसे उम्मीद रखते है कि मै कमाऊ धमाऊ और उनके पाप धो लू, कर्जा फेड डू, पर क्या इतना आसान है सब, इस शहर के लोग टुच्चे है सब साले नर्मदा हर- हर करके रोज पानी- पानी करते है, अपनी ओलादों से क्यों उम्मीद करते है, मै बढता जा रहा हूँ, एक नौकरी नहीं है तो क्या, शादी तो होना चाहिए ना, क्या मै इंसान नहीं हूँ, दारु पीता हूँ तो क्या एब है... बस एक सपना है कि नियाग्रा के फाल पर खडा होकर  एक अपने पसंदीदा ब्रांड का सिगरेट पीना चाहता हूँ और जो धुआँ उड़ेगा उसमे मेरा भविष्य कितना शानदार होगा यह आपने कभी कल्पना की है श्रीमान जी ??? आज मेरे घर में पानी घूस आया तो आप लोंग चले आये यहाँ समाज सेवा करने , क्यों इन नामुराद बस्ती के लोगों को बचा रहे है मरने दो इन्हें, नर्मदा हर- हर करके इन्होने नर्मदा को कोपित किया है अब पानी इनके घरों में भर रहा है तो जाने दो, डूबने दो, सबको वैसे भी ज़िंदा रहकर ये क्या कर लेंगे, देखो मेरे बूढ़े माँ - बाप.. अभी भी नमामि नर्मदे देवी का जाप कर रहे है, वो देखो बस्ती डूब रही है, समाज सेवा के टुच्चे लोग सड़े गले आलूओं की सब्जी और रेपसीड तेल की पूडियां लेकर बांटने आ गये है, अपने घरों के पोतड़े उठाये यहाँ बांटने आ गये है, अब शासन भी मुआवजे के चंद टुकड़े बांटकर अमर हो जाएगा और हमसे वोटों की भीख मांगेगा, हेलीकॉप्टर में बैठकर सहानुभूति दिखाने वाले मैंने बहुत देखे है, और ये मीडिया के लोग हमारे घरों के फोटो खींचकर क्या दिखाएँगे जमाने को हमारी गरीबी या नंगापन.......???अरे जाओ साहब मै चंडीगढ में पढकर आया हूँ और मेरे नियाग्रा फाल के ऊपर खड़े होकर सिगरेट पीने के ख्वाब में बाधा मत बनो, मै सबको जानता हूँ आप सब ढोंगी है .......ये शहर ऐसे ही डूबेगा और यहाँ के लोग इसी नर्मदा में नर्मदे हर हर करते रहेंगे सड़ेंगे, गलेंगे और मरेंगे...........(नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा VII)

प्रशासन पुराण 55

हरदोई: एसडीएम ने भेजा इंद्रदेव को नोटिस
एसडीएम ने तहसील के नायब नाजिर को व्यक्तिगत रूप से यह नोटिस इंद्रदेव को तामील कराने की हिदायत दी है। नायब नाजिर, तकनीकी कारण बता नोटिस तामील करने में असमर्थता जता रहे हैं। पत्रांक और सरकारी मुहर से जारी इस नोटिस के बारे में सवाल करने पर एसडीएम इसे अपने खिलाफ साजिश बताते हैं। वहीं कार्यवाहक कलक्टर ने मामले पर अचरज जताते हुए कहा कि मामले की जांच कराएंगे, जिसने
भी ऐसा किया उसके खिलाफ कार्रवाई होगी।

जिले के सवायजपुर ब्लाक में पिछले काफी दिनों से काले बादल मंडराते दिखे लेकिन यह बादल बिन बरसे चुपचाप निकल गए| इस पर सवायजपुर के उपजिलाधिकारी सत्य प्रकाश शर्मा ने अपने कार्यालय के पत्रांक संख्या मेमो 273 नोटिस-2012 स्वर्ग लोक निवासी देवराज इंद्र के नाम जारी किया है। सत्य प्रकाश ने अपने आदेश में लिखा है कि विगत लगभग 72 घंटों से आप वर्षा का प्रलोभन देते हुए तहसील सवायजपुर के आस पास घूम रहे है किंतु समय काफी व्यतीत हो जाने के बाद भी आपके द्वारा और न ही पर्याप्त वर्षा ही करायी जा रही है। जिससे जनता त्रस्त है। इसलिए आप लिखित स्पष्टीकरण तीन दिन में उनके समक्ष प्रस्तुत करें।

एसडीएम ने इन्द्र देव से यह भी जवाब माँगा है कि आखिर आपके द्वारा इस क्षेत्र में वर्षा क्यों नहीं कराई जा रही है| यदि आपका संतोषजनक लिखित स्पष्टीकरण नियत अवधि में प्राप्त नहीं हुआ तो तहसील सवायजपुर में बिना उचित कारण के वर्षा न कराए जाने के आरोप में दोषी मानते हुए आपके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए आप स्वयं उत्तरदायी होंगे।
 
साभार- अनुभव गर्ग 

Saturday, August 4, 2012

जोग लिखी...........

(I)
तुम्हारे लिए..........सुन रहे हो...............कहा हो तुम........

हम दोनों हैं दुखी । पास ही नीरव बैठें,

बोलें नहीं, न छुएं । चुपचाप समय बिताएं,
अपने अपने मन में भटक भटककर पैठें
उस दुख के सागर में जिसके तीर चिंताएँ
अभिलाषाओं की जलती हैं धू धू धू धू ।

-त्रिलोचन !

(II)
ले दे कर अपने पास फ़कत एक नज़र तो है
क्यूँ देखे जिन्दगी को किसी की नज़र से हम......
-साहिर लुधयानवी

 (III)
बशीर बद्र साहब आपने क्या क्या सहा होगा और ये लिखा फ़िर..........

अगर यकीं नहीं आता तो आजमाए मुझे

वो आइना है तो फिर आइना दिखाए मुझे

अजब चराग हु दिन रात जलता रहता हु

मै थक गया हु हवा से कहो बुझाये मुझे

बहुत दिनों से मै इन पत्थरो में पत्थर हु
कोई तो आये जरा देर को रुलाये मुझे

मै चाहता हु तुम ही मुझे इजाजत दो

तुम्हारी तरह से कोई गले लगाये मुझे
  
(IV)

अपने बारे में लगातार आलोचना सुन सुन कर और नकारात्मक व्यक्ति के खिताब जीतने की बाद लगा कि शायद ये चार पंक्तियाँ, पुरानी है पर बहुत मौंजू है........

लीक पर वे चलें जिनके

चरण दुर्बल और हारे हैं
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं
 

Thursday, August 2, 2012

मोहित ढोली तुम्हारे आगे सार्थक भविष्य है. शुभकामनाएं और ढेर स्नेह.

प्रिय मोहित 
पिछले लगभग बारह बरसों में हम कितने करीब आ गये पता ही नहीं चला तुम्हारी पढाई- आर्मी स्कूल महू,  आई आई टी रूडकी, नौकरी और इस दौरान मेरा लगातार तुमसे संपर्क हरिद्वार, शिरडी, इंदौर, महू, देवास, सीहोर, होशंगाबाद, मेरी माँ के आख़िरी दिनों में सुयश अस्पताल में तुम्हारा साथ और माँ की मृत्यु के बाद जीवन के सबसे मुश्किल समय में मेरे साथ होना  और ना जाने कहा कहा भटकते भटकते हम कितने करीब आ गये और आज अचानक तुम जब अपनी आगे की पढाई के लिए जा रहे हो तो मन बहुत व्यथित है. बहुत छोटे थे जब मै आर्मी स्कूल में तथाकथित बड़े पद पर आया था और फ़िर उसके बाद तुम्हारी जीवन में जो त्रासदी हुई उससे हम बहुत करीब आये और मैंने तुम्हे अपना पुत्र मान लिया और वो सारे एक्सपोजर दिए जो देना भी थे और नहीं भी यहाँ  तक कि अभी तीन दिन खाना बनाने की ट्रेनिंग के बहाने से तुम तीन दिन मेरे पास रहकर गये हो, मैंने यही कहा था कि अब ये क्षण जीवन में कभी नहीं आयेंगे क्योकि तुम भले ही दिल दिमाग से मेरे पास रहोगे पर ये सामीप्य कभी एक पिता को नहीं मिल पायेगा...........यह मुझे लगता है. पिछले कई बरसों से तुमने मेरा पागलपन झेला भुगता और सहा है, आज यह सब सोचकर शर्म भी आती है, एक ग्लानि भी होती है और शायद मेरे इस सबसे तुम वाकिफ भी हो, जिस बहादुरी और खुलेपन से तुमने अपनाया मुझे इस सबके बावजूद भी वह मै बयाँ नहीं कर सकता. लगता है कि जीवन में जो कुछ पागलपन और लडने की जिद्द थी वो अब खत्म हो गयी है और जैसा मैंने कहा कि अपूर्व के केस ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि अपने पागलपन में मैंने कितना नुकसान कर दिया सबका, मै, तो खैर, एक प्रायश्चित्त कर ही रहा हूँ, सारी  उम्र करता रहूंगा पर अब सब पर से विश्वास उठ गया है, यहाँ तक कि अपने आप से भी!!! जब तुम जाने वाले थे और हम रोज, हर बार मिलकर बातें करते थे तो कितना जोश होता था पर अब जब तारीख पास आ गयी है तो लग रहा है कि हाथ पांवों में जान ही नहीं है दिल दिमाग सुस्त पड गये है, इन आख़िरी दिनों में जो कुछ भी हुआ वो बेहद दुखदायी है और इस सबके लिए मै अपने आप को और अपने पागलपन को जिम्मेदार मानता हूँ. बहुत जिद्द करके समाज सेवा में आया था घर से झगड कर अपनी मरती हुई माँ को भी कुछ बता नहीं पाया था कि ऐसा क्यों जीवन जीने का निश्चय किया है, उस दिन तुमने जीवन जीने की कुछ टीप दी थी इंदौर के उस पार्क में पर अब अपराध बोध इतना है कि फ़िर से नया शुरू करने की हिम्मत नहीं है और अपूर्व प्रसंग ने बची खुची हिम्मत भी तोड़ दी है मेरी बहुत दुखी हूँ, पिछले दस दिनों से घर पर बैठा हूँ........और आज.........खैर !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
तुम्हारे आगे एक नई जिंदगी है, नए सपने, नए दोस्त, नए लोग, नई दास्तानें ......बस जाओ.... खूब पढों यश कमाओ, और अपने साथ - साथ अपनी माँ और भाई  और उस पुरे परिवार के लिए कुछ  सार्थक करो जिन्होंने तुम्हारे आज के होने में तुम्हे योग्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. मेरे जैसे लोग जीवन में आते जाते रहते है जो बिगाडते ज्यादा है.  
देश की बात तो नहीं करूँगा पर हम दुनिया के बाकी लोगों की तुलना में सच में पिछड़े है और अभी भी शिक्षा और बाकी बातें हमारी प्राथमिकता नहीं है यही मै कहना चाह रहा था कि उच्च अध्ययन करके देश समाज के लिए भी कुछ  करना होगा ताकि आने वाले पीढियां कुछ सार्थक नहीं तो कम से कम अपना पेट भर सके......मै कोई सीख नहीं दे रहा और ना ही अपेक्षा कर रहा हूँ पर एक बात कि यदि कभी कुछ हम अपने ही लोगों के लिए कर पाए कि वो कम से कम समझ ही विकसित कर ले तो पर्याप्त होगा. 
जैसा कि मैंने कहा था कि मै सच में अकेला हूँ थोड़ा बहुत था वो दोनों में बाँट दिया था पर अब नितांत अकेला रह गया हूँ मेरी जिंदगी में सिर्फ "तुम हो और तुम ही रहोगे"..............एक बेटे को मै जो भी दे सकता था देने की कोशिश की और आगे भी करूँगा, कुछ नहीं चाहिए बस अपना आख़िरी कर्तव्य निभा देना तुम जानते हो मै क्या कह रहा हूँ, बस............मेरा सारा पागलपन भूल कर यही छोड़ जाना और बस अपने सुखी और सार्थक भविष्य के लिए ईमानदारी से प्रयास करना, हाँ अनूप, अमितोष, सचिन, उत्कर्ष जैसे प्यारे लोगों  से मिलवाने के लिए तो मै धन्यवाद भी नहीं कह सकता........ये लोग मेरे लिए जीवन में बहुत कीमती है मै कोशिश करूँगा कि इनसे जुडा रहू तुम्हारे बगैर भी एकदम निश्छल रूप से साधारण रूप से पागलपन में नहीं चिन्ता मत करो........तुम्हारी इज्जत खराब नहीं होगी.

पुनीत को मै देखता रहूगा यह मेरा वादा है, बशर्ते,  यदि तुम्हारा परिवार और वो इसे अन्यथा ना ले तो............

आज जितना दुखी हूँ, कभी नहीं हुआ, शायद अपने अकेले रहने के निर्णय पर भी नहीं था.......अब मेरे पास बात कंरने के लिए, लडने के लिए और अपने पागलपन को तवज्जों देने वाला कोई नहीं है एकदम अकेला हूँ .......बस आशा यह है कि आख़िरी समय पर तुम मेरे पास हो, साथ हो हो यही आश्वस्ति जीवित रखेगी शायद मुझे............

बहुत आशीष, स्नेह और  आगे के उज्जवल भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएं

क्या संबोधन दूँ समझ नहीं पा रहा..........

अन्ना आंदोलन की असफलता के दंश

अन्ना साहब को निश्चित रूप से एक राजनीतिक दल बनाना चाहिए. व्यवस्था परिवर्तन वह चाहते नहीं और व्यवस्था के भीतर रहकर कुछ करने के लिए संसद में होना ज़रूरी है. ऐसा करने पर एक फायदा यह होगा कि हम जैसे
लोग लोकपाल के अलावा भी दुसरे मुद्दों (जैसे आर्थिक नीति, आरक्षण, रोजगार,सेज, श्रम-सुरक्षा आदि) पर उनके विचारों से अवगत हो सकेंगे. मैं, एक आम नागरिक, उन्हें इसके लिए शुभकामनाएं प्रेषित करता हूँ. संवेदनहीनता तो खैर हमारे समय का जैसे आइना बन गया हो. लेकिन क्या वह सरकार की ही तरफ से है? अन्ना और उनके लोग क्या कम संवेदनहीन हैं? जिस तरह से उनके तेवर और उनका अब तक का व्यवहार रहा है, क्या उन्होंने बातचीत के लिए कहीं एक इंच ज़मीन छोडी है? जो बिल वह बनवाना चाहते हैं वह केवल एक तानाशाह सरकार ही बना सकती है. इसके पहले कौन सा आन्दोलन ऐसा रहा है जिसमें समझौते के लिए कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा गया? पहले दौर में आई भीड़ और मीडिया के सहारे बनी अन्ना की इमेज का नशा ऐसा चढ़ा है कि उन्होंने खुद को सारी दुनिया से ऊपर मान लिया है. अब राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा की गई है तो वह भी कुछ इस अंदाज में कि जैसे कोई तारणहार उतर रहा हो. इस हवाई आन्दोलन में जनता से संवाद जैसी कोई स्थिति नहीं है. दूसरी राजनीतिक पार्टियों की तरह ही एक हाईकमान है जो मनमाने फैसले करता है. फिर भी, मैं चाहूंगा कि यह पार्टी अपना विस्तृत घोषनापत्र पेश करे. कम से कम, नई आर्थिक नीति और श्रम कानूनों तथा विदेशी निवेश जैसे मुद्दों पर उनका स्पष्ट दृष्टिकोण सामने आये. मैं जानना चाहूंगा कि आज इस मनुष्य विरोधी व्यवस्था में ही इमानदारी (वैसी जैसी मारुती के मजदूर नेताओं को गिरफ्तार कर उसके मालिक को फोन करके आश्वस्त करने में हरियाणा के ड़ी जी पी ने दिखाई या जैसी पास्को के खिलाफ आन्दोलनरत आदिवासियों के खिलाफ उडीसा सरकार या उसके कर्मचारी दिखा रहे हैं) लागू कर के वह रह जाना चाहते हैं या मनुष्यता के प्रति ईमानदार होकर आम जनता के पक्ष में खड़ा होना चाहते हैं. मुझे उम्मीद तो नहीं, लेकिन अगर वह ऐसा कर पाते हैं तो मुझे भी उनके साथ जाने में क्या संकोच होगा?

बिलकुल सहमत हूँ ........अब आया ना ऊंट पहाड़ के नीचे अब समझ आएगा कि शराबी को कैसे पीटेंगे खम्बे से बांधकर और बाकी भी मुंगेरीलाल के हसीन सपने......

सिर्फ याद आ रहा है चचा ग़ालिब का एक शेर

आज दे दे इजाजत दोस्तों.............

मैंने पिछले बरस ही कहा था कि इनका मकसद कुछ और नहीं अपनी पुरानी तडफ और गहरी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना है राजनीती तो अभी भी बहाना है असली मकसद कुछ और है ये अन्ना को सिर्फ यूज कर रहे है और सरकार में बैठे लोग बहुत घाघ है युही बाल सफ़ेद किये है सरकार ने, मेरी नजर में सरकार ने कोई बात न करके बहुत अच्छा किया, ना बात की ना गिरफ्तार किया, ना अनशन छुडवाने कोई नेता आएगा, ना किसी भी लोकपाल या समिति बनाने की बात की, और इस बहाने मीडिया को भी अपनी औकात याद आ गयी और अन्ना टीम को भी भीड़ के बहाने अपनी स्थिति समझ आ गयी है, देश में कोई बड़ा समर्थन जमा नहीं कर पाई. राजनैतिक दल भी दूर हो गये है, मेरे वोट को यह टीम बेइज्जत करके कैसे रहेगी. मेरा दावा है यदि अन्ना एक विधानसभा की भी सीट जीत ले बाकी टीम के सदस्यों का जीतना तो बहुत दूर की बात है. ये ना गांधी का मार्ग था ना इरोम शर्मिला का मार्ग है, ना किसी शकर गुहा नियोगी का मार्ग था, ना दुनिया में किसी भी आंदोलन का. जिस तरह से दिल्ली का आंदोलन खत्म हो रहा है, विकेन्द्रीकरण के नाम पर अब नई राजनीती शुरू करना है और इस बहाने से देशभर के लोगों का दो साल से सिर्फ समय बर्बाद कर रहे है.   


"बहुत बेआबरू होकर तेरे कुचे से हम निकले, बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फ़िर भी कम निकले"
मेरी इबादतों को ऐसे कर क़ुबूल ऐ मेरे ख़ुदा, . .

कि सज़दे में मैं झुकूं,

तो मुझसे जुडे हर रिश्तें की ज़िन्दगी सँवर जाए ..!!

एक बार फ़िर फराज.................



 

मेरे सब्र की इन्तेहा क्या पूछते हो फ़राज़
वो मेरे गले लग कर रोया किसी और के लिए.

हम जमाने में यूँही बेवफा मशहूर हो गये फराज,
हजारों चाहने वाले थे किस किस से वफ़ा करते !


ताल्लुक तोड़ने का कहीं जिक्र भी करना न "फराज़"
मैं लोगों से कह दूंगा कि उसे फ़ुरसत नहीं मिलती ...
खुद को चुनते हुए दिन सारा गुज़र जाता है फ़राज़
फ़िर हवा शाम की चलती है तो बिखर जाते है

बहनें - असद ज़ैदी (प्रसंग राखी 2 Aug 2012)



कोयला हो चुकी हैं हम बहनों ने कहा रेत में धंसते हुए
ढक दो अब हमें चाहे हम रुकती हैं यहां तुम जाओ

बहनें दिन को हुलिए बदलकर आती रहीं
बुख़ार था हमें शामों में
हमारी जलती आंखों को और तपिश देती हुई बहनें
शाप की तरह आती थीं हमारी बर्राती हुई
ज़िन्‍दगियों में बहनें ट्रैफि़क से भरी सड़कों पर
मुसीबत होकर सिरों पर हमारे मंडराती थीं
बहनें कभी सान्‍त्‍वना पाकर बैठ जाती थीं हमारी पत्नियों के
अंधेरे गर्भ में बहनें पहरा देती रहीं

चूल्‍हे के पीछे अंधेरे में प्‍याज़ चुराकर जो हमें चकित करते हैं
उन चोरों को कोसती थीं बहनें
ख़ुश हुई बहनें हमारी ठीक-ठाक चलती नौकरियों से भरी
सम्‍भावनाएं देखकर

बहनें बच्‍चों को परी-दरवेश की कथाएं सुनाती थीं
उनकी कल्‍पना में जंगल जानवर बहनें लाती थीं
बहनों ने जो नहीं देखा उसे और बढ़ाया अपने
अज्ञान की पूंजी
बटोरते-बटोरते

यह लकड़ी नहीं जलेगी किसी ने
यों अगर कहा तो हम बुरा मान लेंगी
किसलिए आख़िर हम हुई हैं लड़कियां
लकड़ियां जलती हैं जैसे हम जानती हैं तुम जानते हो
लकड़िया हैं हम लड़कियां
जब तक गीली हैं धुआं देंगी पर इसमें
हमारा क्‍या बस, हम
पतीलियां हैं तुम्‍हारे घर की भाई पिता

मां देखो हम पतीलियां हैं
हमारी कालिख़ धोयी जाएगी, नहीं धोया गया हमें तो
हम बन कालिख़
बढ़ती रहेंगी और चीथड़े
भरती रहेंगी शरीर में जब तक है गीलापन और स्‍वाद
हम सूखेंगी अपनी रफ़्तार से

हम सूख जाएंगी
हम खड़खड़ाएंगी इस धरती पर सन्‍नाटे में
मोखों में चूल्‍हों पर दोपहरियों में
अपना कटोरा बजाएंगी हम हमारा कटोरा
भर देना - मोरियों पर पानी मिल जाता है कुनबेवालो
पर घूरों पर दाना नहीं मिलता
हमारा कटोरा भर देना

हम तुम्‍हारी दुनिया में मकड़ी-भर होंगी
हम होंगी मकड़ियां
घर के किसी बिसरे कोने में जाला ताने पड़ी रहेंगी
हम होंगी मकड़ियां धूल-भरे कोनों की
हम होंगी धूल
हम होंगी दीमकें किवाड़ों की दरारों में
बक्‍से के तले पर रह लेंगी
नीम की निबौलियां और कमलगट्टे खा लेंगी
हम रात झींगुरों की तरह बोलेंगी
कुनबे की नींद को सहारा देती हमीं होंगी झींगुर

कोयला हो चुकी हैं हम
बहनों ने कहा रेत में धंसते हुए
कोयला हो चुकीं
कहा जूतों से पिटते हुए
कोयला
सुबकते हुए

बहनें सुबकती हैं : राख हैं हम
राख हैं हम : गर्द उड़कर बैठ जाएगी सभी के माथे पर
सूखेंगी तुम्‍हारी आंखों में ग्‍लानि की पपड़ियां
गरदन पर तेल की तह जमेगी, देखना

बहनें मैल बनेंगी एक दिन
एक दिन साबुन के साथ निकल जाएंगी यादों से
घुटनों और कोहनियों को छोड़कर

मरती नहीं पर वे, बैठी रहती हैं शताब्दियों तक घरों में

बहनों को दबाती दुनिया गुज़रती जाती है जीवन के
चरमराते पुल से परिवारों के चीख़ते भोंपू को
जैसे-तैसे दबाती गरदन झुकाए अपने फफोलों को निहारती

एक दिन रास्‍ते में जब हमारी नाक से ख़ून निकलता होगा
मिट्टी में जाता हुआ
पृथ्‍वी की सलवटों में खोई बहनों के खारे शरीर जागेंगे
श्रम के कीचड़ से लिथड़े अपने आंचलों से हमें घेरने आएंगी बहनें
बचा लेना चाहेंगी हमें अपने रूखे हाथों से

बहुत बरस गुज़र जाएंगे
इतने कि हम बच नहीं पाएंगे।

http://anunaad.blogspot.in/2012/08/blog-post.html
("अनुनाद" से साभार ,शिरीष मौर्य के सौजन्य से )