Saturday, June 30, 2012

Interesting Discussion on Water Problem of Dewas and Award

संयुक्त राष्ट्र ने मध्य प्रदेश के देवास जिले को इस साल सामुदायिक जल प्रबंधन के काम के लिए दुनियां के बेहतरीन तीन कामों में से एक माना है. बधाई हो देवास.
Sandip Naik अरे वाह मेरा जिला महान और पानी के ये हाल वहाँ कि बारह दिनों में एक बार मिलता है इंदौर से उधार ले-लेकर गुजारा चल रहा है.............हमें तो दशकों से पानी नसीब नहीं हुआ..........घर के ट्यूबवेल पर ज़िंदा है वरना सरकारी पानी तो सपने भी नहीं आता ब............ये कहा से खबर या गप्प उडाई है तुमने भाई...........हाँ पानी के नाम पर बड़ी दुकाने जरूर है देवास से लेकर बागली तक.... 


@ Ground Journalist, I know this whole game very well. This was started by M Mohan Rao then DM Dews who brought this Ponds in farms concept and in addition to this roof water harvesting was also the efforts of people. I have been in Dewas from 1970 and seeing the clear deterioration in water level. As far as ground water is concerned the level is more than 600 feet now, I do have a borewel at my home and depth is 560 feet, you can make out what situation is. Although lot of efforts are being done, also I want to reiterate here that there was a time when municipal corporation used to bring water by TRAINS and it had become the talk of the nation. NOw we are getting water from Narmada and that too we are completely on the mercy of Indore and its politicians. Even Dewas MLA claimed that he brought water of narmada to Dewas.........dont challenge, हमें मालूम है जन्नत की हक्केकत लेकिन दिल बहलाने को ये ख्याल अच्छा है and what UN do am well aware as of now am doing consultancy for one UN Organization and what kind of work and things are going on I know very well, all are just pleasing Bureaucrats ..............writing good report and reality are two different aspects and we should nt challange ground realities.ya.................???
also i need nt to learn about dewas from you as i too have done lot of work for the said problem and am nt in Ego its your ego that reflecting here ............by visiting villages on sample basis and writing a Prize winning report that too with copy + paste will nt make you great and immortal..............if you can nt use a constitutional language for any one it clearly shows who is living in Pseudo ego 
 
*It is not a game of any M Mohan Rao. There are thousands of farmers of hundreds of villages, I talked and interviewed and met for weeks. I have seen thousands of ponds and no one took the name of any M Mohan Rao.
 
*Yes I know that you are the God of Dewas. 
 
*Dear Sandip Naik ji,
I am happy to visit Dewas with anyone. The thousands of farmers will tell the truth. You are not a God. Let farmers decide what is the truth.
sorry there is no god in Dewas it is Hill of Devi ..........alas you could refer some history and EM Forster .......
*I am not a historian. I am a journalist and prefer to see things by my own eyes and prefer to talk with common people rather than gods or goddess of the field of NGOs and so-called sponsored social activism.  
 
*Entire malwa region and that too villages are facing severe scarcity of water, entire crop pattern has been changed due to water scarcity and off course there are farmers who gave a tough fight to this problem by using and making ponds in their fields but unfortunately drinking water is still a big issue. What journalists see and write we all know its all sponsored and especially when they get fellowships from organizations like UN or some international funding agency, all is in vain.........unfortunately. In stead of talking about the issues and all they start praising IAS officers and concerned. For kind information neither am god nor any NGO wala type of dalal and nt the social activist and also nt a journalist thankfully........................but I know the issue and i know where is the problem.....................nor i intend to become a master piece like Anupam Mishra ...........what i am i know and am happy with this ...........
 
*Dear Sandip Naik, I challenge you to prove my report wrong. Do not debate, just prove it by facts not by superficial or emotional baseless logics. I will write to UN and other organizations that my report was wrong. I am happy to visit Dewas again with you on my expenses to evaluate the facts of my report. I am accredited journalist and follow code of conduct professionally. I accept your challenge.

I will not be in India up to August thus after September 2012 to November 2012, I am happy to visit Dewas with you to check the facts.

If you accept, please let me know.

बाबा नागार्जुन की एक कविता- अकाल और उसके बाद

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास

कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुंआ उठा आंगन से ऊपर कई दिनों के बाद

चमक उठी घर भर की आंखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पांखें कई दिनों के बाद ।

Friday, June 29, 2012

फ़िर एक बार फराज़.............

कुछ मुहब्बत का नशा था पहले हम को फराज़,
दिल जो टूटा तो नशे से मुहब्बत हो गयी...!!
हम जमाने में यूंही बेवफ़ा मशहूर हो गए फराज़,
हज़ारों चाहने वाले थे किस किस से वफा करते...!!
उसे तराश के हीरा बना दिया हम ने फराज़,
मगर अब सोचते हैं उसे खरीदें कैसे...!!
आँसू हंसी हंसी में निकल आए क्यों फराज़,
बैठे बैठे यह कौन से गम याद आ गए...!!
काट कर जुबां मेरी कह रहा था वो फराज़,
अब तुम्हे इजाज़त है हाल-ए-दिल सुनाने की...!!
“फराज़” वो आँखें झील सी गहरी तो हैं मगर,
उनमें कोई अक्स मेरे नाम का नहीं,
आशिक़ी से उसकी उसे बेवफ़ा न जान,
आदत की बात और है वो दिल का बुरा नहीं...!!
तुम मुझे ख़ाक भी समझो तो कोई बात नहीं,
यह भी उड़ती है तो आँखों में समा जाती है...!!
किसी के एक आँसू पर हजारों दिल तड़पते हैं,
किसी का उम्र भर का रोना यूंही बेकार जाता है...!!
उसने मोहब्बत की कसम दी है,
और प्यार का वास्ता भी लिखा है,
उसने न आने को कहा है और,
साफ साफ लफ्जों में रास्ता भी लिखा है...!
तुम तक्क़लुफ़ को भी इख्लास समझते हो फराज़,
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला...!!
 
कुछ ऐसे हादसे भी ज़िंदगी में होते हैं फराज़,
कि इंसां बच तो जाता है मगर ज़िंदा नहीं रहता...!!
तुम इसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठे हो फराज़,
उसकी आदत है निगाहों को झुका कर मिलना...!!

सभी की दुआएं कबुल हो

कल का स्टेटस था..........
"आज से पेट्रोल सिर्फ २० रूपये प्रति लीटर, डीज़ल १० रूपये लीटर, इनकम टेक्स माफ, वेट खत्म, गेस की टंकी मात्र १०० रूपये, रेल किराए में ६० % की कमी, सरकार ने एक मुश्त सातवे वेतन आयोग का गठन कर नवीन वेतनमान १ जुलाई से देने की घोषणा, सभी राज्यों में तनख्वाहों में ४०% की वृद्धि, टेलीफोन फ्री, राशन की दुकानों पर अमीर गरीब सबको साल में छ माह का राशन मुफ्त क्योकि गेंहू का रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन हुआ है, मनोरंजन कर हटा, बैंकों में ब्याज की दरों में १६० % की बढ़त, मकान - दूकान और वाहनों के लिए लोन निशुल्क, और हवाई यात्राएं बसों की दरों पर

ये आज की प्रमुख सुर्खियाँ है क्योकि दादा नामांकन भर रहे है और मौन मोहन सिंह वित्त मंत्री का " चार्ज" लेंगे और पहली बार स्वतंत्र रूप से बगैर मेडम से पूछे देश हित में निर्णय लेंगे ............क्योकि अब सरकार को २०१४ में जिताने की जिम्मेदारी उनकी है और वे इतिहास में भी अमर होना चाहते है.....

यकीन ना हो तो शाम को ख़बरों का इंतज़ार करिये.............और दिन भर दुआ............"

और लों पेट्रोल सस्ता हो गया कल ही सपना देखा था और दुआएं की थी.................

भक्तों ने आग्रह किया है लेपटोप बाबा से की उनकी सस्याये दूर करो तो लों .........सभी की दुआएं कबुल हो और भक्तों अपनी व्यक्तिगत परेशानी के लिए अपनी जन्म कुंडली और मात्र पांच हजार का चेक या ड्राफ्ट भेजे.............लेपटोप बाबा के नाम ......................जल्द ही उपाय बताकर आपकी सारी समस्याएं दूर की जायेंगी........सभी को आशीर्वाद

Thursday, June 28, 2012

हिन्दी वर्णमाला

हिन्दी वर्णमाला 
अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ
ए ऐ ओ औ अं अः ऌ ॡ
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ञ
ट ठ ड ढ ण ड़ ढ़
त थ द ध न
प फ ब भ म
य र ल व
स श ष ह
क्ष त्र ज


देवनागरी वर्णमाला को दो भागो में विभाजित किया गया है, स्वर व व्यंजन, फिर व्यंजन के भी दो प्रकार होते है, वर्ग युक्त व्यंजन और वर्गेतर व्यंजन (वर्ग से अलग) और साथ में होते है संयुक्ताक्षर, अनुस्वर और विसर्ग इये देखे कैसे वर्णमाला को और अच्छे से समझा जा सकता है|
१४ स्वर:-
अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ ऌ ॡ ऋ ॠ

२५ वर्ग युक्त व्यंजन:-
क ख ग घ ङ {कवर्ग}
च छ ज झ ञ {चवर्ग}
ट ठ ड ढ ण ढ़ {टवर्ग}
त थ द ध न {तवर्ग}
प फ ब भ म {पवर्ग}

८ वर्गेतर व्यंजन:-
य र ल व
स श ष ह

३ संयुक्ताक्षर:-
क्ष त्र ज्ञ

१ अनुस्वर :-
अं

१ विसर्ग :-
अः

इस प्रकार १४+२५+८+३+१+१ = ५२
 
सहयोग अनिमेष जैन, शिवपुरी


Tuesday, June 26, 2012

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...!!! - रामधारी सिंह ''दिनकर''

रामधारी सिंह ''दिनकर'' जी की ये कविता 1974 की संपूर्ण-क्रांति का भी नारा बनी...आज आपातकाल के जन्मदिन पर फिर दोहराते हैं :

सदियों की ठंढी, बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...!

जनता? हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चूस रहे,
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली...!

जनता? हां, लंबी-बडी जीभ की वही कसम,
"जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है...।"
"सो ठीक, मगर, आखिर इस पर जनमत क्या है?"
'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है...?"

मानो, जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;
अथवा कोई दुधमुंही जिसे बहलाने के,
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में...!

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...!

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है...!

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार,
बीता; गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं;
यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय,
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं...!

सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तैयार करो,
अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो...!

आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में...!

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...!!

Monday, June 25, 2012

सावधान होशियार खबरदार..............II

आओ महाराज इस पिछड़े परदेस में आपका स्वागत है............ए पोरया जा रे हाथ धोके साब को कट पिला और मेम साब के लिए कुर्सी पर फटका मार चल जा........अरे मास्टर सुना नहीं ये वही है जिनकी इस देश में सबसे बड़ी फेक्ट्री है शोषण की, इन्होने देश के पढ़े लिखे युवाओं को अपने डिब्बे चलाने दिए फ़िर अमेरिका में माल बेचा वहाँ से भगाया तो देश के नामचीन शहर में एयरपोर्ट की राजनीती में लग गये, जब टेक्स बढ़ने लगा तो कुछ बूढ़े नापाक रिटायर्ड आय ए एस अफसरों की रणजीत सेना बनाकर शिक्षा के क्षेत्र में दुदुम्भी बजा दी और सरकारों के आला अधिकारियों को टुकड़े डालकर अपना झोला फैलाया और अब ये आका है देश के समाजसेवी और बड़े कारपोरेट जगत के महामहिम!!! रोज ये गलियाते है राजनीति को, नेताओं को और देश को जेब में रखते है, इनकी बीबियाँ एनजीओ चलाती है और बहुत महंगे अखबारों में रोज एक लेख लिखती है बालिका शिक्षा पर, ए सरपंच इधर आ, जा दो पोया लेके आ देखता नहीं तेरी पंचायत में साब आये है अब तेरे गाँव  के बच्चों का भला इनके गुर्गे करेंगे और फ़िर देखना बारहवीं के बाद इन्ही के विश्व विद्यालय में भेज देना जहां जाने माने लोग जो अपनी अंतरात्मा और जमीर बेचकर डुगडुगी बजा रहे है साब की और जिंदगी बेचकर मेनेजर बन् गये है, .........बोल जम्बूरे नवाचार करेगा जी सरकार......लों आ गये गरीब दलित और हाशिए के लोग भी आ जाओ आ जाओ बैठो झेलो...... तो साले गाँव  के पिछड़े लोगों इधर आओ सुनो और चुपचाप सुनो वो जो मेडम इंग्लेंड से आई है सब लिख रही है तो समुदाय की भागीदारी के चटपटे किस्से भी दर्ज करेगी ..चलो बोलो कि मेरे बच्चे पढ़े नहीं है... साब नहीं आते तो म्रर  जाते............अरे सालों बोलो कुछ तो बोलों , म् प्र का नाम डूबाओगे क्या, साले आदिवासी और दलित कही के..........इनका चरण वंदन करो ये कारपोरेट है देश की सबसे बड़ी ताकत और शक्ति ये सब खरीद लेंगे अब देखो ना वित्त मंत्री को तो निपटा दिया कपिल सिब्बल भी इनकी जेब में है सालों बोलो नहीं तो बंद हो जाओगे जेल में........सावधान होशियार खबरदार..............

सावधान होशियार खबरदार

म् प्र में अब एक बड़े मैनेजर और सबसे ज्यादा रसूख वाले कारपोरेट का शिक्षा में दखल हो रहा है अब आप समझ लीजिए कि अगले पांच बरसों में शिक्षा का और भी ज्यादा कबाडा होगा क्योकि ये लोग ना तो शिक्षा की समझ रखते है, ना कोई विचार , ना कोई विकल्प है, ना कोई अवसर- बस करोडो रूपयों का दाना पानी है और बूढ़े रिटायर्ड लोग जो रूपये पानी और विदेशों की चाहत में मौत की राह तक रहे है लाचार निकाले गये कर्मचारी ........जी हाँ आप अभी भी नहीं पहचान पा रहे है ये वही है जो स्कूल से लेकर विश्व विद्यालय तक बना बैठे है और इनके कार्यकर्ताओं के नाम से उत्तरांचल की शालाओं में दीवारों पर नील से "अनमोल वचन" लिखे गये है. एक समय था जब म् प्र में शिक्षा के नाम पर प्रयोग, नवाचार और काम करने की छूट थी और अब इनके प्रवेश से सब "प्रोफेशनल" हो जाएगा और चंद टुकडों की खातिर सारे जमीनी एनजीओ भी इनके इशारों पर नाचने लगेंगे और यही नहीं ये कारपोरेट राजस्थान, गुजरात, उत्तरांचल के कई संस्थाओं और लोगों को निगल गया है क्योकि ये सिर्फ मेनेज करना जानते है और कुछ नहीं. मुझे मप्र के शिक्षा परिदृश्य की बहुत चिंता है क्योकि अब किसी माई के लाल के पास इतना रूपया नहीं होगा यहाँ तक कि सरकार के पास भी नहीं, जो पहले ही अपना ईमान बेच बैठी है, कुछ उम्मीद पुराने घाघ एनजीओ से थी पर अब क्या करे जाने माने पुराने एनजीओ तो टाटा बिडला और बैंकों की कमाई पर परिवार पाल रहे है तो अब बचा क्या........बस भूल जाओ सब और लाइन में खड़े रहो और उदघोषणा करो कि "सावधान होशियार खबरदार दुनिया भर में पीटने पिटाने के बाद मप्र में शिक्षा का कबाडा करने कारपोरेट आ रहे है..............कंप्यूटर की दुनिया में युवाओं का भयानक शोषण कर अपना टेक्स बचाने के नाम पर उपरी जेब से निचली जेब में सी एस आर के नाम पर रूपया भरकर दूकान चलाने वाले आ रहे है........... 
 
किसी भी काम में यदि समय सीमा तय हो जाती है तो नवाचार और काम करने की गुन्जाइश खत्म हो जाती है ...............हालांकि यह भी भी महत्वपूर्ण बात है कि डेड लाइन हमारे जिसे लोगों के लिए ही लाई गयी थी कि उठो कुछ करो महाराज..........खासकरके शिक्षा में जब समय सीमा तय हो जाती है तो सब खत्म हो जाता है यहाँ तक कि शिक्षा शब्द के मायने भी ................

Saturday, June 23, 2012

प्रशासन पुराण 50

उस दिन की बात थी दफ्तर प्रमुख ने लेनदेन के मसले पर एक अधीनस्थ को पेपरवेट उठाकर निपटा दिया था सेवाभावी था अफसर, सो उसने आव ना देखा ताव और लगा दिया पेपरवेट, खून निकला और टाँके लगे और फ़िर थाने में रपट भी लिखी गयी. जिले के सूचना अधिकारी ने अखबार वालो को ले देकर मामला रफा-दफा कर दिया, एक दो साले चेनल वाले रह गये- दारू समय पर पहुँच नहीं पाई तो उन्होंने इस घटिया सी खबर की प्रादेशिक सुर्खियाँ बटोरी,  बस पी एस सी से आया युवा सूचना अधिकारी हतप्रद था उसने इस सेवाराम से रूपया खा लिया था सो इन दोनों में भी ठन गयी. खैर, पुलिस तो जाहिर है खाने के लिए ही पैदा हुई है. दफ्तर में सबको अपना हिस्सा नहीं मिल रहा था सो लोगों ने राजधानी जाकर बूढ़े कमजोर लाचार आयुक्त से शिकायत की कि भैया हम सबको या तो रूपया खाने दो या हम उस सेवाराम के साथ काम नहीं कर सकते, जिसे मारा गया था वो भी इस जत्थे में शामिल था. बस फ़िर क्या था दफ्तर में एक अबोला था और लगभग तीन माह के बाद शासन की कुम्भकर्णी नींद टूटी और नए वित्तीय साल के शुरू होने के दो माह बाद पीटने वाले और मार खाने वाले अफसरों के तबादले के ऑर्डर आ गये. खुशी की लहर तो दौड़ी पर ये क्या... ना सेवाराम टस से मस हो रहा है ना वो मार खाने वाला, बस दफ्तर में खिलाई पिलाई का मामला पूर्ववत जारी है- रोज सरपंच आते है, रोज पूजा पाठ होता है, रामजी की आरती उतारी जाती है, मिठाईयां आती है, नोट के बण्डल उतारे जाते है बड़ी बड़ी गाड़ियों से और फ़िर एक अकेला सेवाराम ही ले जाता है सारी नोटों की गड्डियाँ, दफ्तर हैरान है कि शासन क्या कर रहा है और सबसे मजेदार धृतराष्ट्र को एक बड़ा मोटा चश्मा पहनने के बाद भी कुछ दिखाई नहीं देता आजकल सुना है कि धृतराष्ट्र का दुर्योधन भी राजधानी चला आया है बस रह गयी है तो उसकी कुर्सी जो भयानक रूप से बासती है क्योकि दुर्योधन इसी कुर्सी पर बैठकर डकारे लिया करता था और पादता रहता था काम तो था नहीं बस मंडी की गाड़ी में बैठकर ऐश करता और बेवकूफी सी हरकतों से जिले में प्रशासन की माँ भैन करता रहता था. .....जय हो सेवाराम की, धृतराष्ट्र की और दुर्योधन की (प्रशासन पुराण 50)

प्रशासन पुराण 49

सरकारी दफ्तर था सो जाहिर है लोग भी सरकारी होंगे और वे भी असरकारी, सबका सबसे सम्बन्ध था सबकी सबसे प्रीति थी और सबने सब सांठ गाँठ रखा था सो कही कोई दिक्कत नहीं आती थी ठीक एनजीओ वालों की तरह जो एक तरह की भाषा बोलते थे और एक जैसा ही व्यवहार करते थे. इस पुरे दफ्तर में पुरे समय धुएं के बादल छाये रहते थे कोई भी आता तो चपरासी से लेकर बाबू और बड़े साहब भी बीडी की मांग करते थे बस अकाउन्टेंट था जो ससुरा सिगरेट मांगता था उसके अनुशासन और मूल्य बहुत ही अलग थे. जब किसी नए ज्वाइन हुए आदमी से लगने वाले कर्मचारी ने कहा कि घूम्रपान तो निषेध है तो सारा दफ्तर मानो नींद से जाग गया और उस नए से आदमी को काटने को दौड़ा और बोला कि नियम कायदे हमें ना सिखाओ मियाँ, यहाँ तो सालों से यही होता आया है और होता रहेगा. अब सवाल यह था कि बात तो सही थी पर कैसे रोके सो सबने मिलकर एक नियम तय कर लिया कि हर आने वाले से एक बीडी बण्डल और सिगरेट के पैकेट के रूपये मांग लिए जाए और फ़िर शाम को इकट्ठा करके आपस में बाँट लिए जाए ताकि जिसको जब पीना हो पी ले- बाहर खुले प्रांगण  में, संडास में या इस बंगले से नुमा दफ्तर के किचन में,  बस तकलीफ थी तो उन भद्र सी दिखने वाले दो महिलाओं को जिनमे से एक दिन भर साडी का पल्लू सम्हालकर स्लीपर उतारकर चक्करघिन्नी बनी घूमती रहती थी और दूसरी बीस मिनिट की बस यात्रा कर आयी हुई थकान मिटाने को बैठी रहती थी, चूँकि दोनों ही महिलायें कोटे से थी सो कोई कुछ बोल भी नहीं सकता था वैसे भी सारा दफ्तर कोटे में आता था. नया आदमी चकित था और हैरान कि कैसे एक दफ्तर में दिन दहाड़े बीडी सिगरेट चल रहे है और वो भी परमार्थ के सहारे. बाकी गुटखा तम्बाखू और दीगर बातें तो अलग थी बस कही लिखा नज़र नहीं आता था कि राम नाम सत्य है !!! ( प्रशासन पुराण 49)

Tuesday, June 19, 2012

बिछड़े सभी बारी बारी.........................."

कितने आदमी थे .............
सरकार छत्तीस.....................
और अब कितने है यहाँ..........
बस आठ................
क्यों
सरकारी और अंतर्राष्ट्रीय दबाव थे ना सरकार........काम भी अलबेला था सरकार
धीरे धीरे सब बिछड गये और चले गये .............
तो तुम क्या कर रहे हो...............

जी गुनगुना रहे है गुरुदत्त की तर्ज पर
"बिछड़े सभी बारी बारी.........................."
और लों एक और आउट ................Vishal Pandit

अच्छा लगा कि जीवन के सफर में और भागती दौडती ज़िंदगी में कुछ पल ठहर कर एक निर्णय लिया और अब और बेहतर करने का जज्बा लेकर यहाँ से वृहद अनुभवों की बिसात पर जा रहे हो. ढेर सारी शुभकामनाएं और दुआएं कि जो करो बेहतर करो, सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ करो, साथ ही अपने हूनर और दक्षताओं को बढाते रहो.


जयपुर आने पर निश्चित ही डेरा तुम्हारे घर लगेगा और फ़िर तुलजापुर जीवंत हो उठेगा और ढेर सारी यादें............


शुभकामनाएं......
 

Sunday, June 17, 2012

ये अमेरिका की पढाई इतनी महंगी और महत्वपूर्ण क्यों

ये अमेरिका की पढाई इतनी महंगी और महत्वपूर्ण क्यों है कि जो जा रहे है वो जाने के पहले गधों जैसे हो जाते है वीसा, जी आर ई , टोफेल और आखिर में बेंक के लोन चक्कर में..............
सबसे ज्यादा बुरा लगता है जो विद्यार्थी जा रहे है वो सर पर लोन का बोझ और सदियों की थकान लेकर जाते है फ़िर वहाँ जाकर क्या ऐसा मिल जाता है कि उनका सारा किया धरा धूल जाएगा...........पाप पुण्य और वगैरहा वगैराह, और अब तो अमेरिका की एम्बेसी यह सूंघ ले कि गुरु आप नौकरी के भी जुगाड में रहोगे पढाई के बाद, अपने लोन को चुकाने के धत करम भी करने की मंशा पाल रहे हो, तो बस भैया वो तो वीसा पे ही कुंडली मार के बैठ जायेंगे ..............
जहां तक मेरा ज्ञान है भारत ज्ञान का केन्द्र रहा है फ़िर ये हाय तौबा क्यों............और फ़िर ये सारा दर्द झेलकर जाने की जरूरत क्यों.....................
गौतम बुद्ध कहते है लंबी दूरी तय करना हो तो सर पर कम वजन रखकर चलो...............पर हमारे ये युवा सर पर अरबों टन का तनाव और पुश्तों के कर्ज रखकर जा रहे है जबकि मियाँ ओबामा ने आउटसोर्सिंग बंद करने का भी फैसला कर दिया है और वो क्या कहते है रिसेशन भी तो झाँक रहा है दूर कही से...............अरे जिस देस के जन गण मन को गाकर बड़े हुए उसे ठुकरा कर कहा जाओगे और फ़िर तुम्ही लोग देस की "सिक्सा" को छोड़ दोगे तो कौन बिसबास करेगा हमारी "सिक्साओं" पर क्यों भिया सई है कि नई............
समझाओ भैया लोगों बहनों............अपुन तो बुढा गये अब............
Chandni Tyagi
m not sure about how far can we go by dwelling on our past glory and achievements. The fact is that none of the Indian universities even make it to the top 500 universities in the world. Then, why should the younger generation be condemned to take up sub-standard higher education here when other alternatives are available...i agree with u on the negative effects of such costly education on students but linking it with patriotism and values will be wrong.
 
Tohid Qureshi The answer to this bhedchaal is skill development in our own country
Everyday I meet people across industries, from journalism to engineering. Employers say that they have vacancy but are not getting the right people whereas loads of youths remain jobless despite having the degree. We need to attract the best talent in teaching at all levels from KG to PG
 
Sandip Naik
Chandni Tyagi agreed but this is our responsibility to make our instts BEST among all........why cant we when we have TIFR, BARC, TISS, IIMs, IITs and all such why we are unable to impress our own youths to get into the same. I really have serious concerns for the issue though written this very satiric but am serious and have lot of questions. We need a real revolution for higher education now enough of the drama of SSA and universalized primary education, in spit of knowing real status of Primary education I will still go for higher education now to focus upon
 
Chandni Tyagi
dada the point is that even the institutes that have been mentioned by u as an example of the best ones in India don't make it anywhere closer to the world's top 500 ones. Why should somebody settle for the inferior one when they have opportunity and talent to be in the best one. As far as improving the state of higher education in India is considered I dont see it happening untill and unless such institutes become autonomous and out of the bureaucratic clutches.
 
 
Apoorva Dubey This was the worst public mockery of mine!
 
 
Sandip Naik
This is nt public mockery of any one or individual, my concern is about the quality education being provided by Indian instts, and larger vision. India had been a center of Gyan and today people like Kapil Sibbal and others are making hell of education, I also wrote that govt should stop flowing money in Primary education and pay attention in higher education as we see that lot of professional colleges are coming up but no one is paying attention on quality and hence the issues I raised here are of country nt of any individual. If you cant inter prate the things am also helpless and am damn happy with all such Sick Mentality and my own Castle.
 
 
Samarth Shrivastava Malik baat shiksha ki nahi paiso ki hai plus mere bharat mahan mien kota hi le doobta hia hum jais gareebo ko.
Sandip Naik
interestingly when I wrote this yesterday late night at a serious note, although in the form of satire, so many friends told me over the chat box that the reasons are entirely different nt only education, quality, money but the environment of US Open Culture and many more exposures which tempt them to go. I had very serious discussions with the friends who have done their PG, Ph D and Post Doc and now either settled in US UK or came back to India. But no body dared to write here on my wall except Tohid Qureshi, whom I said to write his views on public domain. Reservation and quota is nt a big issue Samarth Shrivastava, this is the simplest thing we can solve in fraction of seconds, but we are lacking at commitment for Improvement and at the national level we are nt putting even 3% of our GDP on education as of now. that too very meager amount on higher education and researches. So think at a larger level and I expect discussions with open mind, nt with close mindset. Again want to reiterate here that am raising things for education as a Country and nt to make Mockery of any individual.
Vishal Pandit Tarakki karne ka haq sabko hai Gurudev.....Hamne to apne planning commission ke deputy chairman, PM, UPA Chairman etc sabko aayat kiya ha
 
 
 

Saturday, June 16, 2012

एक अशोक के पेड़ को लगाने से सौ पुत्रों का सुख

सुना था कि एक अशोक के पेड़ को लगाने से सौ पुत्रों का सुख मिलता है, बहुत साल पहले यानी कि सन १९८२ में जब यह मकान बना ही था और इसके फेंसिंग भी नहीं खीची गयी थी तब मैंने बाल्गढ़ की नर्सरी से लाकर एक नहीं, दो नहीं, पुरे सात अशोक के पेड़ लगाए थे........कालान्तर में वे बड़े होते गये और उनकी पत्तियाँ इस तरह से जगह घेर लेती थी कि हमें गाहे- बहाहे उन्हें छांटने के लिए एक आदमी बुलाना पडता था जो उन डालियों को काटकर सड़क पर फेंक देता था, कई दिनों तक उन पत्तियों को सूखता हुआ देखकर दुःख होता था कि उन्हें गाय जानवर भी नहीं खाते थे. धीरे धीरे समझ आया कि संसार में सब ऐसा ही होता है कहावतों और मिथकों में जीने वाले हम लोग अचानक कही से कुछ सुन लेते है फ़िर अंधानुकरण करने लगते है और मन की भ्रांतियों को गुत्थम गुत्था करके अपने लिए दुःख पाल लेते है जैसे यह सौ पुत्रों का सुख ............हा हा हा...........एक या दो पुत्र ही आदमी को इतना दुःख दे देते है कि वो सारे उम्र उनसे ही निजात नहीं पा सकता तो तो सौ पुत्रों का दुःख कैसे छुडवायेगा............मिथक, जीवन और सच्चाई कितने अलग होते है ना............? आज अचानक एक कथा पढ़ रहा था तो यह जिक्र सामने आया अशोक के पेड़ लगाने का तो आज के परिपेक्ष्य में जाना समझा और फ़िर लगा कि यह छोटी सी पढ़ी हुई बात बरसों मन में घर करके रह गयी और इस क्रम में जीवन का कितना सत्यानाश हो गया यह कोई समझता है क्या................?

RIP- Shrikant Suryvanshi the only Best Chemistry Teacher

Shrikant Suryvanshi the only Best Chemistry Teacher of the world and Dewas passed away today..............

Oh So sad ..............its a sad news indeed he was nt only a Chemistry teacher but one the best persons whom I met in life. I remember he was almost like our educational father and gave us all the learning of life. I know him since 1979, fortunately he was my class teacher in X "G", Very often he would meet us.......and ask about each one of us, he would know all my batch mates by name and keep him self up dated with our jobs, places and life. He was active till his last breath if i say it wont be wrong. Shrikant Suryvanshi was the name of Teaching Field in Dewas, Dr Upadhyay, Yatish kanungo, PD Saxena and Shrikant Suryvanshi are the four major pillars of educational field who taught 90 % of present Dewas and made them such human beings that they all are doing jobs nicely and running family. One of the pillars among these four has gone today. He was so kind that he would nt ask for fees in tuition from poor students, rather he would pay them for their exam / board fees. Thankfully due to his wishes I was heading one CBSE School as Principal in dewas in 1999-2000, where in he came one day and asked me to enroll his daughter in XI. I said you should nt have come, you could have just messaged me why did you come? He said no Sandip, am nt talking to my student, am talking to a Principal, and as a Parent I must be courteous to come and request.Rare bread of teachers with values and clear vision. Hats Off Sir you gave me and many more a value system and vision to look and peep into the Life. May God Bless his soul and give enough strength to family to bear this shock.

तुम जज्बात बनकर हमारे बीच जिंदा रहोगे तरुण


22 साल का तरुण. तरुण सहरावत, तहलका का फोटो पत्रकार. हम सबके बीच से चला गया,हमेशा के लिए. हमारे आदि पत्रकार, हम सबके आदर्श भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से भी बहुत पहले. सोचिए तो,पत्रकारिता के पेशे में 22 की उम्र क्या होती है ? इस उम्र में और अक्सर इससे ज्यादा ही में मोटी रकम झोंककर कोर्स करनेवाले मीडिया के हजारों छात्र इन्टर्नशिप के लिए इधर-उधर कूद-फांद मचाते रहते हैं. कायदे से दो स्टोरी किए बिना ही बरखा दत्त,राजदीप, अर्णव गोस्वामी जैसी एटीट्यूड पाल लेते हैं या फिर तथाकथित अनुभवी पत्रकारों की चमचई के शिकार हो जाते हैं.


कल आधी रात गए जब मैं तरुण की खींची तस्वीरों के बीच डूबता-उतरता जा रहा था और एफबी चैट बॉक्स पर एक के बाद एक ऐसे ही मीडिया कोर्स करनेवाले के सवाल आ रहे थे कि सर आइआइएमसी में जाने का सपना था, नहीं हुआ, अब आजतक वाले इन्सटीट्यूट में जाउं या विद्या भवन तो मन झन्ना गया. एक तरफ तरुण के गुजर जाने का सदमा था, इतनी छोटी सी उम्र में की गई उसकी बेहतरीन और खोए हुए अर्थ की पत्रकारिता थी और दूसरी तरफ चैटबॉक्स में उनलोगों के संदेश थे जिनका सपना पत्रकार बाद में या शायद कभी नहीं होता, उससे पहले किसी चमकीले संस्थान में प्रशिक्षु पत्रकार का गर्दन में पट्टा लगाने का ज्यादा होता है. मन में आया, उन सबों को तरुण के काम की लिंक फार्वड कर दूं लेकिन रुक गया. लगा नहीं कि वो पत्रकारिता के भीतर के जज्बात को समझ पाएंगे. तरुण ऐसे हजारों मीडिया छात्रों को जो स्क्रीन पर चंद दमकते चेहरे को देखकर इस चमकीले कोर्स में आते हैं, बता गया- जिस पीटीसी में कैमरामैन को बहुत ही चलताउ ढंग से याद करने का ख्याल तुम्हारे दिमाग में आता है, असल पत्रकारिता की जमीन उसके आस-पास ही होती है. उन सैंकड़ों दढ़ियल, चीनी के मरीज, पोलो और बिलियर्ड के शौकीन बॉसनुमा मीडियाकर्मियों को बहुत ही आहिस्ते से जवाब देकर चला गया जो हजारों "तरुण" को इन्टर्नशिप भर के लिए इतना थकाते रहे हैं कि वो इस पेशे में आने के पहले ही फ्रस्ट्रेट हो जाया करते हैं. जिन्हें अक्सर इस उम्र के पत्रकारों में कभी किक और संभावना नजर नहीं आती,तरुण बहुत ही जबरदस्त किक मारकर चला गया. पत्रकार के नाम पर जो बंधुआ बना लिए जाते हैं, उन्हें समझा गया- चाहे तुम कितना भी आगे-पीछे करते रह जाओ, मरने के बाद सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा काम रह जाएगा जैसे कि मेरा.
 मैं अपने भीतर से भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की तस्वीर को थोड़ा पीछे खिसकाकर इस तरुण की तस्वीर पहले लगाना चाहता हूं. बिना इस बात की परवाह किए कि आचार्य रामचनद्र शुक्ल के श्रद्धालुओं पर इसका क्या असर होगा और पत्रकारिता के इतिहास में भला इससे क्या बनेगा-बिगड़ेगा.
मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा कि जिस पत्रकार से कभी मिला नहीं, कभी बात नहीं हुई वो मुझे पिछले तीन दिनों से इस तरह बेचैन कर सकता है. मुझे नहीं पता कि जिन दर्जनों मीडियाकर्मियों को टीवी स्क्रीन पर रोज देखता हूं, उन्हें लेकर इस तरह की बेचैनी होगी भी कि नहीं. मैं पर्सनली नहीं जानता था तरुण को. बस उसकी खींची तस्वीरें देखी थी. लेकिन जब से प्रिंयका( प्रियंका दुबे, तहलका) की एफबी वॉल पर उसके बारे में पढ़ा जिसका आशय कुछ इस तरह से था कि तरुण तुम्हें हर हाल में लौटना होगा,ठीक होना होगा तो समझ नहीं आया क्या हो गया है उसे ? हालांकि इससे एकाध महीने पहले ही शोमा चौधरी ने अपनी राइटअप में विस्तार से बताया था कि तहलका के फोटो पत्रकार तरुण सहरावत और तुषा मित्तल स्टोरी के सिलसिले में अबूझमाड़, छत्तीसगढ़ गए थे और एक ही साथ कई बीमारी की चपेट मे आ गए. दुर्भाग्य से मैं वो स्टोरी पढ़ नहीं पाया था. तरुण की वॉल पर जब गया तो वहां सिर्फ और सिर्फ गेट वेल सून, जल्दी आओ तरुण, तुमने वादा किया था,कब आ रहे हो जैसे दर्जनों संदेशों से उसकी दीवार अटी पड़ी थी. उन संदेशों के बीच तरुण की तरफ से कोई जवाब नहीं था. मैं भीतर तक चला गया, मई तक, फिर अप्रैल के संदेशों तक. मुझे समझ नहीं आया. आखिर में प्रियंका दुबे के लिए संदेश भेजा- क्या हो गया तरुण को, सबलोग ऐसे क्यों लिख रहे हैं ? थोड़े समय बाद उसने उपर की लिंक के अलावे शोमा चौधरी की राइट अप की एक और लिंक भेजी.
शोमा चौधरी ने इस दूसरी राइट अप में तरुण के बारे में जिस तरह से लिखा बिना अपने आप आंखों में आंसू छलछला गए. मैंने उसके कुछ हिस्से का हिन्दी तर्जुमा करके एफबी पर लगाया. कुछ दिनों पहले वो खुद से सांस ले पा रहा था,ज्यादा तो नहीं पर थोड़ा-बहुत ही सही चलने लग गया था, चाय की चुस्की ले सकता था. ये सब विज्ञान का चमत्कार और उसकी खुद की इच्छाशक्ति थी. जब उसके भीतर थोड़ी ही चेतना आयी थी कि उसने सबसे पहले अपने कैमरे के बारे में पूछा..उसके बाद से फिर सबकुछ पहले की तरह..बेजान,उदास..तहलका की प्रबंध संपादक ने तरुण के बारे में बताया था कि जिन दिनों तरुण तेजपाल को लगातार धमकियां मिलती रही थीं और तहलका के इतिहास में वे बहुत ही बुरे दिन थे, रणवीर भइया यानी तरुण के पिता उनकी बेटी को स्कूल ले जाते और लाते थे. वो उनकी गाड़ी ड्राइव करते थे. जब उनका बेटा तरुण और अरुण बड़ा हुआ तो उसे तहलका ने अपनी टीम में शामिल कर लिया. तरुण बतौर फोटो जर्नलिस्ट और अरुण आइटी डिपार्टमेंट में.
शोमा चौधरी की इस राइटअप से गुजरने के बाद से मन स्थिर नहीं रह सका. बेचैनी बढ़ती गयी. तब तक तहलका से जुड़े पत्रकार और लेखक उसके बारे में कुछ-कुछ संदेश लगाने लग गए थे. उन सबों को पढ़ते हुए उसकी एक छवि मेरे मन में बन गयी कि वो अपने स्वभाव में कैसा था..अगली सुबह अतुल चौरसिया ने अपनी वॉल पर लिखा- Tarun died a death he didn't deserve. completely shattered. फिर ये कि cremation time is 3PM today at lodhi colony crematorium. Please be there to give a last salute to a great soul. हम जैसे घर में बैठे लोग इसी सूचना के आधार पर मुक्तिधाम, लोदी रोड़ चले गए.
समय से पहले मुक्तिधाम पहुंचना शोक से पहले आध्यात्म से गुजरने की प्रक्रिया है. आप पहले पहुंचकर जब वहां लगी शेड के नीचे बैठते हैं और चारों तरफ जीवन,सत्य,मृत्यु को लेकर दोहे और सूक्तियां के बोर्ड से गुजरते हैं तो दिमाग में बस एक ही सवाल आता है- दुनियाभर की हाय-तोबा, शोर और कोलाहल किसके लिए. जितनी लकड़ियों में अपने बेडरुम के फर्नीचर तक नहीं बन सकेंगे, उससे भी बहुत कम लकड़ियों में हम यहां आकर राख हो जाएंगे. अगर आप साहित्य के विद्यार्थी हों और आपने लाख दूसरे कवियों, रचनाकारों को पढ़ा है लेकिन उस जगह पर बैठकर आपको सबसे ज्यादा कबीर याद आएंगे. संभव हो उस कबीर में हजारी प्रसाद द्विवेदी की स्थापना और डॉ धर्मवीर का धारदार तर्क शामिल न हो. वहां से निकलकर यूनिवर्सिटी जाने के रास्ते तक इसी गुत्थागुत्थी में कट गया- आखिर मुक्तिधाम जाते ही सबसे ज्यादा कबीर ही क्यों याद आते हैं-
                   हाड जरै ज्यों लाकड़ी,केस जरै ज्यों घास.
                   सब जग जलता देख, भया कबीर उदास.
पवन ( पवन के वर्मा ) से मुलाकात हुई. वो एक-एक करके बताने लग गया तरुण के बारे में वो सारी बातें जिसने उसे 22 साल की उम्र में ही एक संवेदनशील और जरुरी फोटो पत्रकार बनाया था. छत्तीसगढ़ की उन चालीस तस्वीरों पर तरुण का एक के बाद एक विवरण और उससे निकलकर आयी तहलका हिन्दी के लिए स्टोरी..मैं सबकुछ तरुण के जीवन के बीच का तिलिस्म की तरह सुनता जा रहा था. मुझे महमूद की दास्तानगोई याद आ रही थी. दास्तानगोई के बीच से जुडूम-जुडूम की आवाजें. लोग जुटने लगे थे. तहलका के पत्रकारों का जत्था. तरुण के घर के लोग और फिर आखिर में तरुण भी. उदासी विलाप में बदलने लगी थी. कितना रो रहे थे ये सारे पत्रकार. मैंने दिल्ली शहर में पत्रकारों को कभी रोते नहीं देखा और वो भी इस तरह, ऐसे मौके पर. जिसे भी देखा- गाड़ी,फ्लैट,ब्ऑयफ्रैंड/गर्लफ्रैंड/ रिलेशनशिप की खींचतान, डाह-निंदा और अहंकार के बीच उलझे हुए ही. जिनकी उंगलियां ब्लैकबेरी और मैक पर थिरकती नजर आती है..लेकिन आज सबके सब रो रहे थे. मुझसे रहा नहीं जा रहा था. मन कर रहा था उनमें से किसी को भी पकड़कर खूब रोउं. हम एक बिल्कुल ही अलग दुनिया में डूबते जा रहे थे. पार्क में खड़ी पजेरो,जायलो,होंडा सिटी टिन के बक्से नजर आने लगे थे जिसमें बैठते-उतरते लोग सपनों के कैद होते बिंब भर लग रहे थे.
आखिर में वो मनहूस समय भी आया जिसके लिए हम कभी तैयार नहीं होते. आग की लपटों के बीच से तरुण का अद्म्य साहस आसमान की ओर तेजी से बढ़ रहा था. चटखती लकड़ियों के बीच मुझे सिर्फ और सिर्फ एक ही शब्द सुनाई दे रहा था- जज्बा. आखिर वो जज्बा ही तो था जो लाइफस्टाइल की बीट कवर सा दिखनेवाले तरुण को एक जमीनी स्तर का पत्रकार बना गया था. मैं उससे जब भी मिलता, उसकी तमाम कमिटमेंट के बावजूद पूछता- तरुण, तुम्हें कभी लगा नहीं कि मॉडलिंग में जाउं ? उन लपटों के बीच से उड़ता राख मेरी सफेद टीशर्ट में चिपकती जा रही थी. मैं लोगों को रोता देख रहा था. चारों तरह काठ को जलता देख काठ बन जाने के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता था.. बाहर निकलकर रिंग रोड़ पर कदम बुरी तरह लड़खड़ा रहे थे. हम नार्मल नहीं थे..लगा कुछ हो जाएगा. बड़ी मुश्किल से एक ऑटो तैयार हुआ डीयू कैंपस जाने के लिए. हम उसी कबीर की किंवदंतियां पर पर्चा सुनने जा रहे थे जो आज मुझे सबसे ज्यादा याद आ रहे थे.
पहुंचते-पहुंचते पर्चा पढ़ा जा चुका था. लोग सवाल-जवाब भी कर चुके थे. हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो.गोपेश्वर सिंह का अध्यक्षीय भाषण बाकी था. उन्होंने बोलना शुरु किया. हमारी कबीर पर अब तक की पढ़ी बातों से थोड़ा अलग और कहीं-कहीं प्रभावी भी.- सवाल है कि आलोचकों ने कबीर को जितना बड़ा क्रांतिकारी बना दिया है, पहले देखना होगा कि वो इसके हकदार है भी कि नहीं. कुछ समय बाद ऐसा होगा कि लगेगा कि कबीर ने पहले कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो पढ़ा और फिर अपनी बातें कही. अगर उन्हें समाज बदलने का काम करना था तो क्या कोई संगठन बनाया ? आगे से किसी ने कहा कि लेकिन सर वो रचना के जरिए समाज बदलना चाह रहे थे. प्रोफेसर का बोलना जारी था लेकिन उनके वक्तव्य से मुझे मोर का पंख लगाए कबीर का ध्यान रत्तीभर भी नहीं आया. मुझे उस कबीर का ध्यान आ रहा था जिन्हें मैं तरुण की जलती चिताओं के किनारे बैठा देखा था. वो कबीर जो ओनजीसी के साइनबोर्ड क बीच भी अपनी मौजूदगी बनाए हुए थे. उनके बोलते रहने के बीच मुझे धुकधुकी लगी रही- कहीं मैं जोर से चिल्ला न दूं- सर, ये सब रहने दीजिए. मुझे सिर्फ इतना बताइए- मुक्तिधाम में सिर्फ और सिर्फ कबीर क्यों आते हैं, तुलसी,मीरा,सूर और यहां तक कि मुक्तिबोध भी क्यों नहीं ?
जिंदगी के उदास क्षणों के बीच सीएसडीएस-सराय की लाइब्रेरी और वहां के लोग हिम्मत देते हैं. एक संभावना की थेरेपी शायद जिससे हमें थोड़े समय के बाद सब अच्छा-अच्छा लगने लगता है. लेकिन आज अफसोस कि वे बेअसर रहे..हम वहां से उसी उदास मन से घर की तरफ लौट गए. तरुण फिर से बुरी तरह याद आने लगा था. ताले में चाबी जा नहीं रही थी..घर खोलते ही धप्प से जमीन पर बैठ गया. बैठा रहा, मुश्किल से लैपटॉप अपनी तरफ खींचा. घड़ी की सुई सरकती गई.. बारह, एक, दो..एक एफबी अपडेट किया- मैं इतनी गहरी रात के बीच सोना चाहता हूं तरुण. उतने ही शांत तरीके से,बेफिक्र,निश्चिंत होकर जितनी आज मैंने तुम्हें दिल्ली की उबलती गर्मी में सनसनाती धूप के बीच, रिंग रोड़ की चिल्ल-पों, धक्का-मुक्की के बीच सोते देखा था. बस,मुझे नींद आ जाए. इस बच्चे को जब गले में रेडियो लटकाए देखा तो लगा तुमने फोटो जर्नलिज्म में कितना बड़ा अर्थ पैदा किया. मैं इस तस्वीर को अपनी अगली किताब का कवर बनाउंगा. बिना तुमसे पूछे.जैसे आज सुबह बिना बताए तुम्हारी प्रोफाइल पिक चुरा ली थी....

तीन,चार.पांच..नींद नहीं आयी. मुझे अब भी हैरानी हो रही है. तरुण से तो मिला भी नहीं था मैं. फिर ऐसा क्यों हो गया मेरे साथ? क्या ये सब शोमा चौधरी,प्रियंका दुबे,अतुल चौरसिया,गौरव सोलंकी जैसे लोगों के लिखे का किया-धरा है ? मुझ पर सुबह होते क्रम की रात हावी है और मैं फिर से एफबी वॉल से गुजरता हूं.फिर वही शब्द जज्बा और जज्बात..और इन सबके बीच तरुण की मुस्कराहट जिसके बारे में इनलोगों ने लिखा है- उसकी एक मुस्कान के पीछे पूरी दुनिया सिमटकर आ जाती थी....    विनीत कुमार जी का आलेख

Friday, June 15, 2012

तुम्हे याद हो कि ना याद हो........

कहा तो था कि आउंगा आज ही वो भी जानने के बाद मेरे बताने के बाद................फ़िर कहा अटक गये...........सामने से गुजरा तो इतने मशगुल थे कि पहचाना भी नहीं या मुझसे बात करने में दोस्तों को छोडना पडता.........जो भी हो मै तो उसी कोने से एकटक ताकता रहा कि अभी पलटोगे और एक आवाज़ दे दोगे कि रुक जाओ कहा जा रहे हो अँधेरे में मिलकर तो जाओ पर आसमान में घटाटोप अन्धेरा और छा  गया हल्की सी बूंदा बांदी होने लगी जो आग जल रही थी वो शायद शांत होने को नहीं और भडकाने को लगी थी और ऐसे में मेरा देर तक कड़े रहना मुश्किल हो गया यह पक्का हो गया था कि तुम देखकर भी अनजान बन् गये और आज ना आने के लिए भूल गये वो सब दिन और वो सब...........जो गजल की जुबान में कहू तो.....हममे तुममे करार था.....................तुम्हे याद हो कि ना याद हो........

तुम्हारे लिए ............सुन रहे हो...........कहा हो तुम........

और फ़िर एक बार अपने रण और रणक्षेत्र में अकेले दुदुम्भी उठाये..............जहां जीवन के ४५ से ज्यादा बरस बिता दिए, दोस्तों दुश्मनों का शहर, मददगारों का शहर, गुरूर वालों का शहर, राजनिती और गहमा गहमी का शहर, वो शहर जहां से जीवन की खुशियाँ उठाई थी और आज एकदम अकेलापन भुगतने की पीड़ा का दंश.............बस तसल्ली यह है कि आज भी किसी भी गली या कोने में निकल जाऊं तो चेहरे परिचित निकल आते है, डर नहीं लगता कि कही कुछ हो गया तो लोग जेबें टटोलेंगे और खोजते फिरेंगे या मोबाईल में आख़िरी कॉल देखेंगे, इसलिए मैंने तुम्हारे सारे नंबर ही मिटा दिए क्योकि अब तुम कहा और मै कहा ??? जब हम पास रहकर इतने दूर है तो दूर रहकर कहा पास आ पायेंगे.......................यहाँ तो यह आलम है कि लोग चेहरा देखकर घर छोड़ जायेंगे............आशीष मंडलोई कहता है अभी भी दादा आपकी लाश एक चौराहे पर रख दे सिर्फ दो दिन देवास में तो एकाध लाख तो इकठ्ठे हो ही जायेंगे, और मेरे एनजीओ में काम आयेंगे, पर आपकी लाश के कई दावेदार है मेरा कहा नंबर आएगा..................ऐसा शहर है यह मेरा................देवास...........बस अब उम्मीद है तो सिर्फ एक ही जाने के पहले वो जो असंख्य सुबहों के सूरज की कल्पना है- फलीभूत हो जाए...............रूह में कांपते से, डोर से हिलते वो सारे लोग सामने आ रहे है...........आँखे मिचमिचा रही है और एक बार फ़िर आयोवा की तरह से, एक बार वेरा और एक बार शहर की कहानियां याद आती है.............
(लिखी जा रही कहानी का एक अंश........)

Wednesday, June 13, 2012

अब ख्वाब बनकर बसना

दिल में.-रंजिश ही सही 
दिल्लगी तो रही 
दिल दुखेगा तुम्हारे बिन 
दुखते दिल की खातिर आना फिर

ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं
मालूम है,तुम मरकर भी हमें चाहोगे
पर क्या मरना जरुरी था हमें चाहने के लिए?
अच्छा, चाहो न चाहो,पर फिर आ जाओ

अबके बिछड़े शायद हम न मिलें
सूखे गुलाब अब किताबों में नहीं मिलते
नींद नहीं तो ख्वाब भी कहाँ
पर तुम जो इक गुलाब थे हमेशा
अब ख्वाब बनकर बसना 

कभी जो थे प्यार की जमानत

A Tribute to Ghazal maestro Mehdi Hassan.......

हमारी सांसो में आज तक वो हिना की खुशबू महक रही है
लबों पे नगमे मचल रहे हैं, नज़र से मस्ती छलक रहीं है

कभी जो थे प्यार की जमानत, वों हाथ है गैर की अमानत
जो कसमे खाते थे चाहतो की, उन्ही की नीयत बदल रहीं है

किसी से कोई गिला नहीं है, नसीब में ही वफ़ा नहीं है
जहाँ कहीं था हिना को खिलना, हिना वही पे महक रही है

वों जिनकी खातिर ग़ज़ल कहे थे वों जिनकी खातिर लिखे थे नगमे
उन्ही के आगे सवाल बन के ग़ज़ल की झांझर झलक रही है.........

मुझे छोड़ के जाने के लिए आ..........श्रद्धांजलि मेहंदी हसन साहब

तुम्हारे लिए ................सुन रहे हो.............कहा हो तुम................

रंजिशे सही दिल ही जलाने के लिए आ, आ फ़िर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ........

ज़िदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं
मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा
तू मिला है तो ये एहसास हुआ है मुझको
ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिए थोड़ी है
एक ज़रा सा ग़म-इ-दौरान का भी हक है जिस पर
मैंने वो सांस भी तेरे लिए रख छोड़ी है
तुझ पे हो जाऊँगा कुर्बान तुझे चाहूँगा
मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा

{मेंहेंदी हसन की आवाज़ मैं एक दिलकश ग़ज़ल}

Govind Piplwa  की दीवार से साभार.............

Tuesday, June 12, 2012

गुनगुने पछतावों के बीच जिंदा रहने का स्वांग

मुझे लगता है संत सा जीवन बिताने के लिए हमें दूसरों पर गुस्सा होते समय संयम रखना होगा और वो सारा गुस्सा अपने ऊपर निकालना होगा और अपने को ही तकलीफ देनी होगी शायद वही सच्चा संत चरित्र होगा.......शायद इस तरह से हम बचा सकेंगे एक संसार को और रिश्तों के महीन तंतुओं को जो बुनते है सारा ताना बाना.
हर एक का अपना एक मूल चरित्र होता है और हर कोई अपने अंदाज में भावों को व्यक्त करता है. मुझे लगता है मूल स्वभाव को बदलना भावनाओं से बलात्कार होगा...और रही गुस्से की बात वो तो निकल ही जाए तो बेहतर है, मेरा मानना है कि समझदार आदमी का गुस्सा जहाँ एक ओर निरर्थक नहीं होता वहीँ दूसरी ओर कभी बेकार नहीं जाता.
अब मुझे अपने निजी अनुभवों से लगने लगा है कि गुस्सा अपने ऊपर निकाल लू तो ही बेहतर होगा बजाय इस पर, उस पर, आप पर या व्यवस्था पर निकालने के बजाय.................क्योकि अब सहने की क्षमता खत्म हो गयी है................इससे अच्छा है कि मै अपने ऊपर नाराज हो जाऊ कुछ तर्पण करू , कुछ गुनगुने पछतावों के बीच जिंदा रहने का स्वांग या........पुनः अपने को प्रताडित करने की कोशिश.  

इंदौर में स्व श्रीकांत जोशी स्मृति समारोह में कुमार अम्बुज

  Photo: Srikant Joshi Memorial Program at Indore. Kumar Ambuj reciting his Poems    Photo: Kumar Ambuj reciting Poems at Indore. Thanx to Utpal Banergy my favorite Poet & close friend, for organizing the event. 
कल उत्कल बनर्जी ने इंदौर में स्व श्रीकांत जोशी स्मृति समारोह में लगातार दसवे वर्ष भी कविता संध्या का आयोजन किया...............इस बार आमंत्रित कवि थे कुमार अम्बुज. कुमार अम्बुज ने अपने लगभग सभी संग्रहों से प्रतिनिधि कवितायें पढ़ी और प्रीतम लाल सभागृह में बैठे श्रोताओं को लगभग मन्त्र मुग्ध कर दिया. किवाड, क्रूरता, अतिक्रमण, अमीरी रेखा और अन्य संग्रहों से पढ़ी गयी कवितायें सिर्फ कवितायें नहीं वरन जीवन की वे कठोरतम त्रासदियाँ है जो हमें ना सिर्फ समाज में होने वाली बातों का आईना दिखाती है वरन एक लडने की जिजिविषा भी देती है, ये कवितायें कुमार के गहरे आब्जर्वेशन और संवेदना से आती है इसलिए वे सीधे श्रोताओं के मन में घर कर लेती है या पाठक को हिला देती है. कुमार अम्बुज एक सुलझे हुए कवि ही नहीं बल्कि एक संगठनकार है जैसाकि विनीत ने कल कहा था कि वे कवि से ज्यादा आम आदमी, मजदूरों की लामबंदी और लोगों के मुद्दों पर काम करने वाले एक्टिविस्ट है जो कविता के बहाने से अपनी सामाजिक प्रतिबद्धताएं दर्शाते है. स्वभाव से विनम्र कुमार अम्बुज ने हाल में मोजूद लोगों को साथी के रूप में निरूपित करते हुए अपनी यात्रा का साक्षी बताया और बहुत सहजता से कामरेड आलोक खरे, ब्रजेश कानूनगो, बहादुर पटेल, विनीत तिवारी, आशुतोष दुबे, विवेक गुप्ता, जैसे कवियों और सहयात्रा में शरीक लोगों के नाम लेकर अपने काव्य प्रेम और ऊर्जा का स्रोत बताया. अशोकनगर, गुना के इप्टा के साथियों को याद किये बिना उनका काव्य पाठ अधूरा रहता सो उहोने उन्हें भी बहुत स्नेह से याद किया, शायद यही एक कवि का होना और एक अच्छे इंसान का होना है जो उसे अन्ततोगत्वा सरल कवि के रूप में स्थापित करता है. कुमार अम्बुज ने यह भी स्वीकारा कि इंदौर में बेंक में काम करते हुए उन्होंने अपने जीवन की बेहतरीन कवितायें रची है जो उनके लिए महत्वपूर्ण है. जेब में दो रूपये जैसी कविता मुझे उनकी सबसे प्रिय कविता लगती है जो एक आम आदमी के पुरे डर, हकीकत, और संसार के मायावी स्वरुप में बदलते जा रहे समय में आदमी को उसकी औकात याद दिलाती है पर इस सबके बावजूद भी यह आदमी लगातार संघर्षरत है सिर्फ दो रूपये जेब में लेकर......आज जब सरकार अठ्ठाईस रूपये और बत्तीस रूपे से उसकी सामाजिक आर्थिक औकात तय कर रही है. जमीन, भाई, क्रूरता और स्त्रियाँ, प्रेम और जीवन के अन्य दैनदिन विषयों से एक पूरा रचना संसार बुनते हुए वे बेहद चौकन्ने है और कही भी लगता नहीं कि वे किसी भी प्रत्यक्ष या छूते हुए अन्याय को छोड़कर निकल जायेंगे.............अपनी कविता का झंडा उठाये हुए...........मुझे लगता है कि वे आने वाले समय में साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले कवि की सूची  में अपना नाम दर्ज करायेंगे.......यही कामना और शुभेच्छाएं है.............एक अतृप्त कार्यक्रम से यकायक उठकर आना अखरता तो है पर महानगरों में समय का भी अपना चक्र होता है और समय पर सब खत्म होना भी एक तरह की क्रूरता है.  
Kumar Ambuj, Brajesh Kanungo, Bahadur Patel,,,,,,,and all Friends...
11 June 2012

Saturday, June 9, 2012

शुचिता और वैभव कुत्तों की भाषा में सुरक्षित है

श्वान  १

आजकल देर तक जागता हूँ तो
कुत्तों की आवाजें सुनता रहता हूँ
कुत्तों की लड़ाईयां सुनता रहता हूँ
एक साथ कई कुत्ते निकलते है
झुण्ड में और टूट पड़ते है किसी
अकेले दुबककर बैठे कुत्ते पर
या
किसी हड्डी चबाते कुत्ते पर
या
अपनी पूंछ चाटते कुत्ते पर
या
किसी बंगले में बंधे कुत्ते पर
जोर से भूंकने लगते है
बावजूद इसके कि वहाँ लिखा है
कुत्ते से सावधान !
कई बार उलटा भी हो जाता है
एकाध कुत्ता ही इस झुण्ड पर
भारी पड  जाता है
और उसके बगैर उठे ही यानी
गुर्राने से या सिर्फ अँधेरे में
चमकती आँखें देखकर पूरा झुण्ड
मिमियाते हुए बिखर जाता है
आजकल कुत्तों के बारे में बहुत सोचता हूँ मै
क्यों कि कुत्तों के भाव बढ़ रहे है
और नस्लें भी एक से एक नई आ गयी है
कुत्तों की दवाईयां, शैम्पू, साबुन, बिस्किट और
कुत्तों के लिए मांस के लोथड़े क्यों एकाएक आ गए है
बाजार में ...........!!!

श्वान २

बहुत सोचा गया कुत्तों के
साहित्य के बारे में
उसकी प्रासंगिकता और सन्दर्भों के बारे में
कुत्तों के साहित्य में छायावाद और प्रयोगवाद के बारे में
शोध तक प्रकाशित हुए परन्तु फ़िर भी
तर्क सम्मत ढंग से आलोचक कुत्तों ने अपना
पक्ष या वैचारिकी नहीं प्रस्तुत की
कुत्तों के साहित्य के बारे में
विभिन्न विमर्श और जेंडर
के बारे में भी बातें हुई
और विस्तार से लिखी गयी कहानी पेज दर पेज
परन्तु कही कोई प्रामाणिकता
नज़र नहीं आई.
पीठ, अकादमियां बनी और ठीक इंसानों की तरह से
प्रशासनिक कद के हैसियत वाले या उनसे जुड़े
लोगों, कुत्ते प्राध्यापकों को इन पर
आसीन किया गया पर फ़िर  भी रचा नहीं जा सका
ठीक ठाक वो साहित्य जो
कुत्ता समाज का दर्पण बनें .
मित्रों  इन दिनों मुझे कुत्तों के
साहित्य की बहुत चिंता है
और मै गहरी प्रतिबद्धता से कुत्तों
के साहित्य और अनुशीलन पर काम करना चाहता हूँ.

श्वान ३ 

कुत्तों में कविता को लेकर
खास किस्म  की आसक्ति होती है
यह बात मुझे कुत्ता कविता में
प्रतिमान और रहस्यवाद का तुलनात्मक
अध्ययन और अनुशीलन जैसे विषय पर
पी एच डी करने वाले कुत्ते ने बताया था
कुत्तों में कविता के प्रति विशेष अनुराग
उनके घ्राण इंद्री और पूंछ की गोलाई से विशेष
प्रभावित होता है
यदि किसी कुत्ते में सूंघने की अकूत
क्षमता है- मसलन वो सूंघ सके कि
अमुक कुत्ता आगे जाकर कूकूर प्रशासनिक सेवा में
बड़ा कुत्ता भवन बना सकता है
तो पूंछ की गोलाई और लचीलापन एक
सहज रूप में विकसित हो जाता है
यदि कोई कुत्ता कवि यह समझ ले कि
अमुक कुत्ता कवि किसी कूकूर ग्रंथावली या
कूकूर मासिक का संपादक हो जाएगा तो
थूथन के साथ लार भी टपकने लगती है
और पूंछ तो मारे खुशी के बगैर भोंगली में बारह मास रखे
सीधी  हो जाती है
कुत्तों में कविता की  समझ को लेकर
समझाने के लिए आपको सिर्फ गहरी
तटस्थता का भाव लिए आना होगा
कुत्ता कविता के व्यापक फलक पर.

श्वान ४ 

कुत्तों ने साहित्यकी विभिन्न
विधाओं पर पुरस्कार आरम्भ किये
पांच बड़े एवं बूढ़े कुत्तों को नियुक्त किया
कि वे श्रेष्ठ कुत्ता कवि ढूंढेंगे
दो खजेले कुत्तों को श्रेष्ठ आलोचक
कुत्ते को पुरस्कृत करने के लिए तय किया
कूकूर अनुशासन सेवा से जुड़े एक कुत्ते ने
छीन लिया अधिकार कि वो  श्रेष्ठ
कहानीकार कुत्ते को खोजेगा और साल में
अपने ही विभाग के सौजन्य से सारे  देश के
कुत्तों को बुलाकर, हड्डियां परोसकर
उस कमसिन कहानीकार कुत्ते को सम्मानित करेगा
फ़िर भी रह गए कुछ  प्राचीन कुत्ते जो
थे तो अभी की सदी में जन्मे पर
श्रृंगार, लय, ताल के साथ गीत छंद
लिखते थे और अक्सर प्रशासनिक सेवा से जुड़े
कुत्तों के साथ ताल्लुकात रखते थे
इन्हें गाहे- बगाहे बनने वाली समितियों में
रख  दिया जाता था और बरसों तक
एक दूसरे को ये पुरस्कृत करते रहते थे
मित्रों कुत्तों के बीच पुरस्कार बांटने की
बन्दर बाँट बहुत अदभुत है
पर अच्छी बात यह है कि
अभी कुत्तों में
ज्ञानपीठ, पदमश्री या सरस्वती परस्कार आरम्भ नहीं हुए है
इसलिए पुरस्कारों की शुचिता और वैभव
कुत्तों की भाषा में सुरक्षित है .


नर्मदा के कई शहरों में नदी के किनारे बैठकर नदी से बतियाते हुए- नर्मदे -हर, हर, हर...................

१. अमरकंटक

हरे पेड़ों के झुरमुट
घनी लंबी छायादार
सडकों से
आने वाले श्रद्धालु एकत्रित है
तुम्हारे उदगम पर
नदी
जहां से निकलती है
बहती है संस्कृति
पीढ़ी दर पीढ़ी
शंख, ढोल, और घंटियों
की गूँज से आवाज़
गगन तक गूंजती है
नर्मदे हर, हर, हर..............

२. जबलपुर 

ऊँची चट्टानों को क्या मिला,
कठोर हो गयी और दर्शनीय भी,
तुम्हे आगे बढ़ने को स्थान दिया
सारा शहर भेडाघाट जैसा कठोर
और धुंआधार जैसा हो गया है
संस्कृति और सभ्यता बदल रही है
परसाई भी नहीं अब !
नदी तुम आगे बढती रहो
संगमरमर तो पुनः तराश लिया जाएगा,
नदी तुम बढती रहो,
सबको कठोर बनाकर ............
नदी  का काम है बहना
कठोरतम  क्षणों में ही फ़िर गूंजेंगे
नर्मदे हर, हर, हर...............

३. होशंगाबाद

कांजी  लगे घाटों के
शहर में हलचल थी
लोग फिसलते थे
आंसू बहाते थे
रेत........
सारे  खारेपन को सोख लेती है
नदी किनारे का यह शहर
झोलों में बंद परिवर्तनों का साक्षी रहा है
पानी में वाहन चलते है
और सडकों पर नाव..........
क्यों ?
नदी  को किसने
जाना, बूझा और समझा है,
क्या करोगे सवाल पूछकर,
उत्तर कोई नहीं देता
नदी किनारे बसे शहर में
क्यों निराश, उदास, बेबस और हताश है लोग
चीखते है
नर्मदे हर, हर, हर.............

४. नेमावर

प्रदक्षिणा करते लोग
धर्मशाला और अखाड़ों में
गांजा, भांग के बीच
पाप-पुण्य तलाश रहे है
इस बीच गाँव करवट ले रहा है
हण्डिया का पुल और इसके
नीचे झोपड़ी से शिवपुत्र* ने
कबीर की निर्गुण धारा बहाई,
यमन, कल्याण और मालकौंस गाकर
नदी  के बहाव में भैरवी
के सूर बिछा दिए,
गाँव बदल रहा है- कस्बे और फ़िर शहर में
नदी संस्कृति नहीं साधन बन रही है
फ़िर क्यों पुनः..........
नर्मदे हर, हर, हर...................
(* शिवपुत्र  - पंडित कुमार गन्धर्व  के मेधावी पुत्र मुकुल शिवपुत्र जो संगीत की साधना में बरसों से नेमावर में नर्मदा के घाट पर रह रहे है )
५. महेश्वर 

कितनी लंबी दूरी चल चुकी हो
माता अहिल्या के घाट से
माता के शहर की प्यास बुझा रही हो
देवास की भी प्यास अतृप्त है.
सुना है भोपाल भी इसी क्रम में आ गया है........
लोग बेचैन है तुम्हारे लिए नर्मदा
बाजबहादुर ने मांडव में
रूपमती को नर्मदा दिखा दी थी एक पतली महीन रेखा के रूप में
खलघाट के पुल से
गुजरती क्यों सोचती हो
मंडलेश्वर, महेश्वर में क्यों
विचारती हो कि
जर, जमीन, जोरू, और सत्ता
होने के मायने भी
नदी का ही रूप है
यदि हाँ तो क्यो सुनती हो,
नर्मदे हर, हर, हर.............

६. नदी के बाहर 

कृशकाय सी पडी मेधा पाटकर
अतीत हो चुके बाबा आमटे
नदी के साथ बह चुके आशीष मंडलोई
और उन सब लोगों को अब कोई फर्क नहीं  पडता
मेरे शहरों से, कस्बों और गांवों से
वे लगे है दूरियां पाटने में
रैली, संघर्ष, आंदोलन,
सेठ, साहूकार, किसान, विश्व बेंक, सरकार, नेता,
पक्ष- विपक्ष, एनजीओ और समूह
सब लगे है, जुड़े है, टूटे है बारम्बार,
और  चीख रहे है अभी भी,
हर पल, हर दिन, हर जगह
नर्मदे  हर, हर, हर..............


संदीप नाईक



Thursday, June 7, 2012

मेरे हाथ तुम्हारे हाथों से जुड़कर- अच्युतानंद मिश्र



 
अच्युतानंद मिश्र युवा कवि ,आलोचक. सभी शीर्षस्थ पत्रिकाओं में कविताएं व आलोचनात्मक गद्य प्रकाशित. आलोचना पुस्तक ‘नक्सलबाड़ी आंदोलन और हिंदी कविता’ संवेद फाऊंडेशन से तथा चिनुआ अचेबे के उपन्यास ‘Arrow of God’ का ‘देवता का बाण’ शीर्षक से हिंदी अनुवाद हार्पर कॉलिंस से प्रकाशित. प्रेमचंद के प्रतिनिधि गद्यों का ‘प्रेमचंद :समाज संस्कृति और राजनीति’ शीर्षक से संपादन. जन्म 27 फरवरी 1981 (बोकारो). 

मैं इसलिए लिख रहा हूँ 
                                            
में इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कविता
कि मेरे हाथ काट दिए जायें
मैं इसलिए लिख रहा हूँ
कि मेरे हाथ तुम्हारे हाथों से जुड़कर
उन हाथों को रोकें
जो इन्हें काटना चाहते हैं

अब और था
वह जब ‘अ’ के साथ था
तो ‘ब’ के विरोध में था
जब वह ‘ब’ के साथ था
तो ‘अ’ के विरोध में था
फिर ऐसा हुआ की
‘अ’ और ‘ब’ मिल गए
अब ?
वह रह गया
बस था ।


लड़के जवान हो गए

और लड़के जवान हो गए
वक्त की पीठ पर चढ़ते
लुढकते फिसलते
लड़के जवान हो गए

उदास मटमैला फीका शहर
तेज रौशनी के बिजली के खम्भे
जिनमे बरसों पहले बल्ब फूट चुका है
अँधेरे में सिर झुकाए खड़े जैसे
कोई बूढा बाप जवान बेटी के सामने
उसी शहर में देखते देखते 
लड़के जवान हो गए

लड़के जिन्होंने किताबें
पढ़ी नहीं सिर्फ बेचीं
एक जौहरी की तरह
हर किताब को उसके वजन से परखा
गली गली घूमकर आइसक्रीम बेचीं
चाट पापड़ी बेचीं
जिसका स्वाद उनके बचपन की उदासी में
कभी घुल नहीं सका
वे ही लड़के जवान हो गए

एकदम अचूक निशाना उनका
वे बिना किसी गलती के 
चौथी मंजिल की बाल्कोनी में अखबार डालते
पैदा होते ही सीख लिया जीना
सावधानी से
हर वक्त रहे  एकदम चौकन्ने
कि कोई मौका छूट न जाये
कि टूट न जाये 
कांच का कोई खिलौना बेचते हुए
और गवानी पड़े दिहाड़ी
वे लड़के जवान हो गए

बेधड़क पार की सड़कें
जरा देर को भी नहीं सोचा
कि इस या उस गाड़ी से टकरा जाएँ
तो फिर क्या हो ?
जब भी किसी गाड़ीवाले ने मारी टक्कर
चीखते हुए वसूला अस्पताल का खर्च
जिससे बाद में पिता के लिए
दवा खरीदते हुए कभी नहीं
सोचा चोट की बाबत
वे लड़के जवान हो गए

अमीरी के ख़्वाब में डूबे
अधजली सिगरेट और बीडियां फूंकतें
अमिताभ बच्चन की कहानियां सुनातें
सुरती फांकते और लड़कियों को देख
फ़िल्मी गीत गाते
लड़के जवान हो गए

एक दिन नकली जुलूस के लिए
शोर लगाते लड़के
जब सचमुच का भूख भूख चिल्लाने लगे
तो पुलिस ने दना-दन बरसाईं गोलियाँ
और जवान हो रहे लड़के
पुलिस की गोलियों का शिकार हुए

पुलिस ने कहा वे खूंखार थे
नक्सली थे तस्कर थे 
अपराधी थे पॉकेटमार थे
स्मैकिये थे नशेड़ी थे

माँ बाप ने कहा
वे हमारी आँख थे वे हमारे हाथ थे
किसी ने यह नहीं कहा वे भूखे
और जवान हो गए थे 

बूढ़े हो रहे देश में
इस तरह मारे गए जवान लड़के


ढेपा 

रात को
पुरानी कमीज के धागों की तरह
उघड़ता रहता है जिस्‍म
छोटुआ का

छोटुआ पहाड़ से नीचे गिरा हुआ
पत्‍थर नहीं
बरसात में मिटटी के ढेर से बना
एक भुरभुरा ढेपा है
पूरी रात अकड़ती रहती है उसकी देह
और बरसाती मेढक की तरह
छटपटाता रहता है वह

मुँह अंधेरे जब छोटुआ बड़े-बड़े तसलों पर
पत्‍थर घिस रहा होता है
तो वह इन अजन्‍मे शब्‍दों से
एक नयी भाषा गढ़ रहा होता है
और रेत के कणों से शब्‍द झड़ते हुए
धीरे-धीरे बहने लगते हैं

नींद स्‍वप्‍न और जागरण के त्रिकोण को पार कर
एक गहरी बोझिल सुबह में
प्रवेश करता है छो‍टुआ
बंद दरवाजों की छिटकलियों में
दूध की बोतलें लटकाता छोटुआ
दरवाजे के भीतर की मनुष्‍यता से बाहर आ जाता है
पसीने में डूबती उसकी बुश्‍शर्ट
सूरज के इरादों को आंखें तरेरने लगती हैं

और तभी छोटुआ
अनमनस्‍क सा उन बच्‍चों को देखता है
जो पीठ पर बस्‍ता लादे चले जा रहे हैं

क्‍या दूध की बोतलें,अखबार के बंडल
सब्‍जी की ठेली ही
उसकी किताबें हैं...
दूध की खाली परातें
जूठे प्‍लेट, चाय की प्‍यालियां ही
उसकी कापियां हैं...
साबुन और मिट्टी से
कौन सी वर्णमाला उकेर रहा है छोटुआ ?

तुम्‍हारी जाति क्‍या है छोटुआ?
रंग काला क्‍यों है तुम्‍हारा?
कमीज फटी क्‍यों है?
तुम्‍हारा बाप इतना पीता क्‍यों है?
तुमने अपनी कल की कमाई
पतंग और कंचे खरीदने में क्‍यों गंवा दी?
गांव में तुम्‍हारी माँ,बहन और छोटा भाई
और मां की छाती से चिपटा नन्‍हका
और जीने से उब चुकी दादी
तुम्‍हारी बाट क्‍यों जोहते हैं?...
क्‍या तुम बीमार नहीं पड़ते
क्‍या तुम स्‍कूल नहीं जाते
तुम एक बैल की तरह क्‍यों होते जा रहे हो
छोटुआ?

बरतन धोता हुआ छोटुआ बुदबुदाता है
शायद खुद को कोई किस्‍सा सुनाता होगा
नदी और पहाड़ और जंगल के
जहां न दूध की बोतलें जाती हैं
न अखबार के बंडल
वहां हर पेड़ पर फल है
और हर नदी में साफ जल
और तभी मालिक का लड़का
छोटुआ की पीठ पर एक धौल जमाता है –
“साला ई त बिना पिए ही टुन्‍न है
ई एतवे गो छोड़ा अपना बापो के पिछुआ देलकै
मरेगा साला हरामखोर
खा-खा कर भैंसा होता जा रहा है
और खटने के नाम पर
माँ और दादी याद आती है स्‍साले को”

रेत की तरह ढहकर
नहीं टूटता है छोटुआ
छोटुआ आकाश में कुछ टूंगता भी नहीं
न माँ को याद करता है न बहन को
बाप तो बस दारू पीकर पीटता था

छोटुआ की पैंट फट गई है
छोटुआ की नाक बहती रहती है
छोटुआ की आंख में अजीब सी नीरसता है
क्‍या छोटुआ सचमुच आदमी है
आदमी का ही बच्‍चा है छोटुआ क्या ?
क्‍या है छोटुआ?

पर
पहाड़ से लुढकता पत्‍थर नहीं है छोटुआ
बरसात के बाद
मिट्टी के ढेर से बना ढेपा है 
छोटुआ धीरे-धीरे सख्‍त हो रहा है
बरसात के बाद जैसे मिट्टी के ढेपे
सख्‍त होते जाते हैं
और कभी तो इतने सख्त कि
पैर में लग जाये तो
खून  निकाल  ही दे



आखिर कब तक बची रहेगी पृथ्वी

वे बचायेंगे पृथ्वी को
जी -२० के सम्मलेन में
चिंतित उनकी आँखें
उनकी आँखों में डूबती पृथ्वी

नष्ट हो रहा है पृथ्वी का पर्यावरण
पिघल रही है बर्फ 
और डूब रही है पृथ्वी
वे चिंतित हैं पृथ्वी कि बाबत
जी -२० के सम्मलेन में

पृथ्वी का यह बढ़ता तापमान
रात का यह समय
और न्योन लाइट की
रौशनी में जगमगाता हॉल
हॉल में दमकते उनके चेहरे
और उनके चेहरे से टपकती चिंताएं
और चिंताओं में डूबती पृथ्वी !

क्या पृथ्वी का डूबना बच रहा है
जी -२० के इस सम्मलेन में ?
कौन सी पृथ्वी बचायेंगे वो
वो जो ग्लोब सरीखी रखी है
जी -२० के इस सम्मलेन में !
क्या प्लास्टिक की वह पृथ्वी
डूब जायेगी ?

डूबते किसान को कुछ भी नहीं पता
डूबती पृथ्वी के बारे में
जी-२० के सम्मलेन को वह नहीं जानता
उसे पता है हल के फाल और मूठ का
जो धरती की छाती तक जाती है
जहाँ वह बीज बोता है
और महीनों वर्षों सदियों 
सींचता है अपने पसीने से
ताकि बची रहे पृथ्वी

बाँध टूट गया है
किसी भी वक्त डूब सकता है गांव
लहलहाती फसल डूब जायेगी
डूबता किसान डूबती धरती के बारे में सोचता है
जी -२० की तरह नहीं 
किसान की तरह 
अपने निर्जन अंधकार में

यह बारह का वक्त है
जी-२० का सम्मलेन खत्म हो रहा है
सुबह अख़बारों में छपेंगी उनकी चिंताएं
वे एक दूसरे का अभिवादन करते हैं
और रात के स्वर्णिम होने की शुभकामनाएँ देते हैं

नदी के शोर के बीच
टूटता है बांध

किसान के सब्र का
उसकी आँखों के आगे नाचते हैं
उसके भूखे बिलखते बच्चे
दिखती है देनदार की वासनामयी आँखें
उसकी बीबी को घूरते 

एक झटके से खोलता है
वह डी.डी.टी का ढक्कन !

सुबह के अखबार पटे पड़ें है
सफल जी-२० के सम्मलेन की ख़बरों से
डूबते गांव में कोलाहल है
किसान की लाश जलायी नहीं जा सकेगी
वह उन फसलों के साथ
बह जायेगी जी-२० के सम्मलेन के पार
समुद्र में !

आखिर कब तक
बची रहेगी पृथ्वी ?

संपर्क-277,पहला तल,पॉकेट-1 सेक्टर-14. द्वारका, नई  दिल्ली- 110075.                               मो. -             09213166256       ; ईमेल anmishra27@gmail.com