Tuesday, September 30, 2014

Blood Bank Contact List of Indore , MP



Blood Bank Contact List of Indore , MP

श्मशान सा समर्पण भाव और सफाई अभियान


आज देवास के श्मशान में जब भाई की अस्थियाँ समेट रहे थे तो वहाँ तीन और परिवार के लोग आये हुए थे और उन्होंने बड़े करीने से सारी अस्थियाँ समेटी, बल्कि हम सबने समेटी, फिर हमने जगह को झाडू से साफ़ किया, साफ़ पानी का छिड़काव किया, फिर एक बाल्टी में पानी के साथ गोबर और गो मूत्र मिलाकर उस स्थान को स्वच्छ किया और फिर कुछ अगरबत्ती लगाकर उस जगह को एकदम पवित्र बनाने की कोशिश की यानी हाईजिनिक किया.
मुझे लगा कि अगर हम उस जगह को इतनी साफ़ कर देते है जिसका उपयोग हमारे जीते जी हम खुद के लिए नहीं कर पायेंगे, और भावना यह रहती है कि कोई दूसरी लाश आयेगी तो उसे साफ़ जगह मिलना चाहिए इसलिए हम सारे लोग बिलकुल भिड जाते है और सफाई में कोई कसर नहीं रखते, क्या हम अपने सार्वजनिक स्थलों को साफ़ नहीं रख सकते?
वही याद आया कि देश में सफाई की बड़ी बड़ी बातें हो रही है नई झाडुएँ खरीदी जाकर मीडिया में छा जाने को नौटंकी निभाने की रस्में अदा की जा रही है और जिस गांधी को मारकर राजनैतिक सफाई की दुहाई पिछले सत्तर बरसो से दी जा रही थी, यकायक उसी गांधी को दुनिया में बेचकर और देश में २ अक्टूबर से सफाई का बड़ा काम हाथ में लिया जा रहा है, क्या मोदी जी या सरकार यह कर पायेंगे?
श्मशान सी सादगी और तन्मयता, या उतने ही समर्पण से हम अपनी सार्वजनिक जगहों पर क्यों नहीं दिखती, सड़क, शौचालय, सीढियां / चढ़ाव,पार्क, सार्वजनिक वाहन, बस स्टेंड, अस्पताल, मंदिर, रेलवे स्टेशन, स्कूल कॉलेज, कूएं, नदी, तालाब या समुद्र, जंगल जमीन, नभ, या अन्य उपयोग की जगहों पर. अगर हम इसी भक्तिभाव और समर्पण भाव से हर जगह को अपना मानेंगे और यह तय कर लेंगे कि हमारे बाद इसका इस्तेमाल कोई और करने वाला है तो शायद देश में सफाई का नजारा ही कुछ और होगा और बल्कि मै तो यह कहूंगा कि हम क्यों यह भी माने कि इसका उपयोग हम करने वाले है भले ही हम ना कर पाए अपने जीवनकाल में परन्तु कम से कम दूसरों के लिए सार्वजनिक जगहों को स्वच्छ रखें.
मैंने तो तय किया है कि आज से यही करूंगा मुझे किसी जगह को काम में लेना हो या नहीं परन्तु दूसरों के लिए सफाई का काम जरुर करूंगा चाहे कुछ भी हो जाए, बोलिए आपको मंजूर है यदि हाँ तो सच्चे दिल से प्रण कीजिये और बस लीजिये हो गया सब साफ़ सुथरा एकदम से. राजनीती अपनी जगह पर अगर प्रधान मंत्री दिल से देशवासियों का आव्हान कर रहे है तो आईये अपने परिसर और वातावरण को स्वच्छ करें और सम्पूर्ण भाव से इस अभियान में योगदान दें.
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Monday, September 29, 2014

संगीत नाईक "बाबा" का गुजरना यानी सहोदर के बिछड़ने का स्थाई दुःख




जीवन  बहुत कठोर होता है और परसों (27/9/2014) आखिर में मौत ने फिर घर देख लिया और मेरे सगे छोटे भाई  संगीत नाईक जिसे हम प्यार से और पूरा देवास "बाबा" कहता था, को अपने आगोश में ले लिया. 





पिछले  बारह वषों से जिस जीवन की लम्बी लड़ाई वो लड़ रहा था, अपने दोनों गुर्दे खत्म होने के बाद भी जिस हिम्मत और आशा से उसने लम्बी लड़ाई लड़ी और मौत को हर बार चकमा दिया, परसों आखिर सात दिनों अस्पताल में घेर घार कर मौत ने उसे दबोच ही लिया. 

मेरे  जीवन में उसे मैंने बचपन से प्यार ही नहीं दिया एक पिता की भाँती उसे पाला  और उसके हर पल में मै उसके साथ रहा. तुलसीदास जी कहते है कि जग में सहोदर जैसा कोई नहीं हो सकता और अब मै यह जब आज लिख रहा हूँ तो कुछ शब्द मानो खो गए और वाणी थक से गयी है. बस इतना ही कि मुझे अकेला छोड़कर वो एक लम्बी दूरी पर अनथक यात्रा के लिए निकल गया है अकेला और हम सब बेहद अकेले रह गए है अब. 

मै  बहुत शुक्रगुजार हूँ लाईफ लाइन अस्पताल इंदौर के पुरे स्टाफ का जिहोने इन बारह वर्षों की लड़ाई में हमारा साथ दिया, इंदौर के सभी पैथोलोजिकल प्रयोगशालाओं का जिन्होंने गाहे बगाहे हमारी मदद की, कई मित्रों का जिन्होंने इस पुरी संघर्षमयी यात्रा में नैतिक साहस दिया, उन ढेरों युवा साथियों का जिन्होंने समय समय पर रक्त दिया और उसे जीवन देते रहे और ये साथी इतने है कि इनका किसी एक का नाम लेने से काम नहीं चलेगा, वे सभी दोस्त जिन्होंने रक्त का इंतजाम करवाने में मदद की और मेरी एक छोटी सी विनती पर दौड़े चले आये, मेरे सोशल वर्क के साथी, मेरे विद्यार्थी और किशोर दोस्त जो खून देते देते कब बड़े हो गए पता ही नहीं चला जैसे पुनीत ढोली या विवेक गुप्ता,  और मेरे साथ हर पल रहे,  हर कदम पर वरना यह बारह साल की लम्बी यात्रा मै कर ही नहीं पाता, मेरे सभी रिश्तेदार जिनका साहस, हिम्मत और सहयोग मेरे साथ परसों शाम तक और आज भी मेरे साथ बना हुआ है. मेरे परिजन, मेरे भाई संजय,  मेरी भाभियाँ, मेरे भतीजे सिद्धार्थ, अनिरुद्ध और अमेय, मेरे दोनों बच्चे अपूर्व और मोहित.......इन सबके बिना मै कितना अकेला और असहाय हूँ आज समझ में आ रहा है. 

किस  किस का नाम लूं ? समझ में यह आ रहा है कि एक आदमी की मदद कितने लोग करते है और उसके ज़िंदा रहने में हम सबका कितना बड़ा हाथ होता है यह सब कृतघ्नता से याद रखना चाहिए, देवास के दोस्त जिनपर मै अधिकार से कुछ भी कह देता था पर उन्होंने आख़िरी तक मदद की, शिक्षा विभाग के वे सभी कर्मचारी जो उसके साथ यह संत्रास भुगतते रहे और उसे काम पर आने की प्रेरणा देते रहे... 

पहले पिता (1989) फिर माँ (2008) और अब भाई का गुजर जाना , जीवन जैसे ठहर ही गया है और दिमाग शून्य हो गया है मानो किसी ने पत्थर रख दिया हो. 

बस  आज जब मै खेड़ीघाट ( बड़वाह)  पर माँ नर्मदा में तीसरे के बाद भाई की अस्थियाँ प्रवाहित कर रहा था तो सारी अस्थियों ने बीच पानी में मेरे चारो ओर एक घेरा बना लिया मानो मोहवश वे बहना ना चाह रही हो.....यह प्रण लिया है कि चाहे जो हो जाए कोई कुछ भी कहे, सारे आरोप और गिले शिकवे मंजूर है,  मै मदद करने का अपना उसूल नहीं छोडूंगा और मरते दम तक  करता रहूंगा.

शायद  इतना ही कर पाया तो मेरे लिए यह पर्याप्त होगा. भाई की यादों को लेकर शीघ्र ही कुछ लिखूंगा और बाकी अस्पताल और डाक्टरों की लूट, चिकित्सा के दुश्चक्र के बारे में भी.  

Wednesday, September 17, 2014

‘नाकोहस’ by Purushottam Agrawal




सपने में वह गली थी, जहाँ बचपन बीता था। सड़क से शुरु हो कर गली, चंद कदम  चलने के बाद चौक पर पहुँचती थी, जहाँ मोहल्ले का घूरा था और जहाँ होली जला करती  थी। यहाँ से तीन दिशाओं की ओर सँकरी गलियाँ जाती थीं। सामने की ओर जाने वाली गली में आगे चल कर एक और चौक आता था, जहाँ मंदिर और मजार का वह संयुक्त संस्करण था, जिससे वह गली अपना नाम अर्जित करती थी। सुकेत ने देखा, उस गली से एक मगरमच्छ आ रहा है,  रेंगता हुआ, दुम इत्मीनान से मटकाता हुआ, गली की छाती पर मठलता हुआ, आता है घूरे वाले चौक तक। अरे, सुकेत पहली बार देखता है कि यहाँ एक हाथी लेटा हुआ है, मगरमच्छ हाथी की एक टाँग चबाना शुरु कर देता है,  हाथी छटपटाता है, लेकिन जैसे जमीन से चिपका दिया गया है, केवल चीख सकता है, अपनी जगह से हिल नहीं सकता। इसी बीच दूसरी गली से एक और मगरमच्छ आता है, हाथी की दूसरी टाँग पर शुरु हो जाता है। हाथी की दर्द और दुख से भरी चीखें जारी हैं, वह शायद वैकुंठवासी नारायण को ही पुकार रहा है, जैसे पुराण-कथा में पुकार रहा था, किंतु या तो चीखें वैकुंठ तक पहुँच नहीं रहीं, या नारायण को अब फुर्सत नहीं रही।
जिंदगी हस्ब-मामूल चल रही है। वाटरकर साहब काली टोपी,लाल टाई लगाए साइकिल पर दफ्तर रवाना…त्रिवेदीजी अपनी मोटर-साइकिल पर। सब्जी वाला ठेला लेकर आया है, उसने हाथी और उसे भंभोड़ते मगरमच्छों से बस जरा सा बचाकर ठेला लगा दिया है, आवाज लगा रहा है…‘कद्दू ले लो, भिंडी ले लो, लाल-लाल टमाटर…’ गृहणियाँ ठेले की तरफ बढ़ रही हैं, मगरमच्छ हाथी को चबा रहे हैं….हाथी की चिंघाड़ें करुण रुदन में बदल रही हैं, धीमी हो रही हैं, जमीन पर चिपकी देह में जो थोड़ी-बहुत हलचल थी, वह कम से कमतर होती जा रही है…आँखें आसमान बैकुंठ की ओर तकते तकते अब  अपनी जगह से लुढ़कती जा रही हैं…कहीं नहीं दिख रहे गरुड़ासीन, चतुर्भुज नारायण…सुकेत खुद हाथी की ओर से प्रार्थना कर रहा है कि गरुड़ासीन नारायण नहीं तो महिषासीन यम ही आ जाएँ…दोनों में से कोई न हाथी पर कान दे रहा है, और न सुकेत पर…हाथी की चिंघाड़-चीत्कारें बस शून्य में जा रही हैं, वापस आकर दर्द की लहरों का रूप लेती उसी की देह में व्याप रही हैं, उन्हें न वैकुंठ लोक के नारायण सुन रहे हैं , ना यमलोक के देवता और ना भूलोक के नर-नारी…
सपने के अक्स पसीने की बूंदों में ढलकर जगार तक चले आये थे, स्मृति में बस गये थे। स्मृति ताकत भी थी, कमजोरी भी। बचपन में उसे पींपनी-फुग्गे वाले के खिलौनों में सबसे ज्यादा चाव चूड़ियों के टुकड़ों से बनाए गये कैलिडोस्कोप का था। वह न जाने कितनी-कितनी देर गत्ते के उस छोटे से सिलेंडर को आँख से चिपका कर घुमाता, दूसरे सिरे पर बनते, पल-पल शक्ल बदलते, रंग-बिरंगे  आकारों को निहारता रहता था। बचपन से इतनी दूर, आज भी मन में एक दूसरे से जुड़ी-अनजुड़ी हजारों यादें चूड़ियों के उन टुकड़ों जैसी अनगिनत शक्लें बनाती रहती थीं। फर्क यह था कि गत्ते के कैलिडोस्कोप में चूड़ियों के टुकड़े मनमोहक आकारों में ढलते थे, यादों के कैलिडोस्कोप में बनने वाले ज्यादातर आकार या तो भरमाते थे, या डराते थे। मगरमच्छों द्वारा भंभोड़े जा रहे हाथी का अक्स आज भी  देह को पसीने से भर देता था। वह नहीं भूल पाया था कि परंपरा में हाथी शरीर-बल के साथ बुद्धि-बल के लिए भी अभिनंदित प्राणी है। वह नहीं भूल पाया था, गजोद्धार की, तथा दीगर कथाएँ। यह कथा-स्मृति सपने के हाथी की बेबसी को, उसकी दुचली-कुचली हालत को, नर- नारायण और यम की बेरुखी को और गाढ़े दुख में रंग देती थी। हालाँकि, सुकेत जानता था कि हमेशा यादों में डूबे रहना व्यक्ति और समाज के बचपने का लक्षण है, कहता भी था ‘यार, बहुत ज्यादा अतीत घुसा हुआ है हमारी चेतना में…वी हैव टू मच ऑफ हिस्ट्री…संतुलन होना चाहिए…’
संतुलन? इस समय, कुछ लोग वर्तमान को अतीत के हिसाब-किताब बराबर करने वाला अखाड़ा समझ रहे थे, तो कुछ वर्तमान के जादुई गलीचे पर सवार ऐयाशी  की हवा में उड़ानें भर रहे थे। जिन्दगी की चाल भी बहुत  तेज-रफ्तार थी, क्या घर में, क्या सड़क पर, हर जगह हर आदमी न जाने कहाँ फौरन से पेश्तर पहुँच जाने की जल्दी में था। तेज-रफ्तार वक्त में सुकेत और उसके जैसे लोग बीते वक्त में कहीं जमे रह गये फॉसिल थे, ऐसे  पुरालेख थे, जिन्हें हर कोई कोसता था कि दफ्तरों में, गलियारों, दुनिया में खामखाह जगह घेरे हुए हैं।
यह मगरमच्छों द्वारा भंभोड़े जा रहे हाथी की करुण चिंघाड़ के  साथ टूटी नींद की आधी रात थी, देह को पसीने से भिगोती जगार के साथ शुरु हुई आधी रात….
‘चलो’….
अरे, ये तो वही बलिष्ठ गण हैं, जो कभी मोहल्ले में दिखते हैं, कभी टीवी के परदे पर। कभी किसी फिल्म-शो में पत्थर फेंकते नजर आते हैं, कभी पार्क में बैठे नौजवान जोड़ों को सताते…कभी किसी साहित्योत्सव में किसी लेखक के आने की  संभावना भर से वहाँ नमाज पढ़ कर अपनी ताकत दिखाते, कभी किसी पेंटर के देशनिकाले का उत्सव मनाते…कभी लड़कियों को रेस्त्राँ से मार-पीट कर भगाते, कभी माथे पर सिन्दूर लगा लेने वाली लड़कियों के विरुध्द मुहिम चलाते, कभी किसी फिल्म पर रोक लगाने को सामाजिक न्याय का प्रमाण बताते, कभी किसी लेखिका को धर्मगुरुओं के सामने घुटने टेकने का आदेश देकर अपनी धर्मनिरपेक्षता साबित करते…हर तरफ आहत भावनाओं का बोल-बाला था…
एक बार खुर्शीद ने कहा भी था, “अमाँ, यह ससुरी धर्मनिरपेक्षता तो अपने देश में आहत भावनाओं की एंबुलेंस बनती जा रही है…”
“और अक्ल की बात करने वालों की मुर्दागाड़ी…” रघु ने टुकड़ा जड़ा था। रघु  तो अपने नाम से ही भावनाएं आहत करने का अपराधी था, क्योंकि “ यह दुष्ट ईसाई होकर भी हिन्दू नाम धारण करता है, सो भी भगवान राम के पूर्वपुरुष का”। रघु क्या  बताता  कि उसके ईसाई पिता को हिन्दू परंपराओं की कितनी भावपूर्ण जानकारी थी, रघु के चरित्र से वे कितने प्रभावित थे, अपने बेटे का नाम रघु रख कर कितना सुख अनुभव करते थे….बताने से होना भी क्या था?
सुकेत को याद था कि बचपन के दिनों में उस उनींदे नगर में भी ऐसे नमूने थे, लेकिन उपेक्षित…आजकल के मुहाविरे में, ‘हाशिए पर’। लोग उनकी नैतिक चिंतावली सुन भी लेते थे, और हँस कर टाल भी देते थे। लेकिन, टीवी की ब्रेकिंग न्यूज के इन दिनों में ये सारे देश में ग्राउंड-ब्रेकिंग रफ्तार से बढ़ते ही चले जा रहे थे। टीवी चैनल ऐसे नमूनों को जन्म देने वाली जच्चाओं की भूमिका निभा रहे थे, और सुधी विमर्शकार दाइयों की। लेकिन, अपनी जच्चाओं और दाइयों को छोड़ ये नैतिक नौनिहाल  मेरे घर में कैसे घुस आए? कौन हैं ये लोग, गुंडे या यमदूत? ले कहाँ जा रहे हैं? यमलोक?
यमदूत आत्मा को पता नहीं किस वाहन में ले जाते हैं। सुकेत को तो कार में उन्हीं जानी-पहचानी सड़कों से सशरीर ले जाया रहा था। बड़े-बड़े होर्डिंगों पर, फ्लाई-ओवरों और अंडर-पासों की दीवारों पर अजीब से नारे, अजीब से ऐलान चमकते दिख रहे थे। रास्ते में पड़ने वाले अंधेरे टुकड़ों में भी ये ऐलान फ्लोरसेंट रंगों से लिखे हुए थे—‘नाश हो इतिहास का’,  ‘दस्तावेजों को जला दो, मिटा दो’, ‘कला वही जो दिल बहलाए’, ‘साहित्य वही जो हम लिखवाएँ’…
हर ऐलान के नीचे एक लाइन ज़रूर लिखी थी, कहीं-कहीं वह लाइन ही मुख्य ऐलान थी—‘ हर सच बस गप है, सबसे सच्ची हमारी गप है’…यह लाइन हर जगह अंग्रेजी में भी लिखी थी। आखिर मूल लाइन तो इस वक्त, यहीं क्यों, हर जगह अंग्रेजी से ही आ रही थी, इंग्लैंड वाली नहीं, अमेरिका वाली अंग्रेजी से—‘ऑल ट्रूथ इज़ फिक्शन, अवर फिक्शन इज़ दि ट्रूएस्ट वन’…
इतनी चमक थी सड़क पर कि अँधेरे टुकड़े भी स्याह चमक में नहाए से लग रहे थे। इतनी रफ्तार थी कि सुकेत को ले जा रही कार के साथ सड़क भी तेजी से दौड़ती लग रही थी। तेज-रफ्तार ट्रैफिक के साथ ही ताल दे रही थी कार के भीतर और बाहर हर तरफ गूँजते गाने की रफ्तार। उसी तेज-तर्रार अंदाज का था गाना जैसे सुकेत ने दो-एक बार मॉल्स में या नौजवानों के पसंदीदा हैंग-आउट्स में सुने थे–
‘ अक्कड़-बक्कड़ बंबे बौ, अस्सी नब्बे, पूरे सौ
सौ में लगा धागा/ विकास निकल कर भागा/
इसके संग-संग तू भी दौड़/ बाकी सबको पीछे छोड़
बुद्धि को तू रख पकड़/ मुट्ठी में कसके जकड़
जो न माने तेरी बात, खुपड़िया उसकी फौरन फोड़
बाकी सबको पीछे छोड़
बम चिक बम चिक बम चिक…’
सुकेत के आस-पास बैठे दोनों बलिष्ठ उसके कंधों पर हथेलियाँ ठोकते हुए टेक में टेक मिला रहे थे—‘खुपड़िया उसकी फौरन फोड़/ बाकी सबको पीछे छोड़…बम चिक बम चिक बम चिक’। सुकेत की चिढ़ भरी निगाहों या अपने शरीर को सिकोड़ने का उन पर कतई कोई असर नहीं पड़ रहा था।
जहाँ सुकेत को लाया गया, वह कोई थाना नहीं, कई मंजिलों वाली एपार्टमेंट टावर थी। जिस फ्लैट में उसे ले गये, उसे देख कर लगता नहीं था कि अंदर इतनी ऊंची दीवारों वाला, इतना बड़ा गोल कमरा भी हो सकता है। सामान्य सा घर, सामान्य सा दरवाजा…कदम रखने के पल तक सुकेत किसी सामान्य ड्राइंग-रूम में ही घुसने की उम्मीद कर रहा था, लेकिन दरवाजा खुला डरावनी विशालता से भरे इस इस गोल, नीम-अंधेरे कमरे में।
रघु और खुर्शीद कमरे में पहले से मौजूद थे, या शायद उसी पल वे भी कमरे में लाए गये, जिस पल सुकेत…लेकिन किस दरवाजे से? सुकेत ने पूछना चाहा, असंभव…उसने सुनना चाहा नामुमकिन…तीनों दोस्त एक साथ एक छत के तले…लेकिन बोलने-सुनने से वंचित… उस चिकनी दीवारों, चिकने फर्श वाले गोलाकार के अलग अलग बिंदुओं पर ये तीन दोस्त अनबोले, अनसुने खड़े हैं, जिस सर्वव्यापी बम-चिक शोर से गुजर कर सुकेत यहाँ आया था, उसने यहाँ दीवारों से उधार लेकर चिकना सन्नाटा पहन लिया था। तीनों अपनी अपनी जगह इंतजार कर रहे थे, ना जाने किस बात का, किस घटना का, किस इंसान का…
सुकेत को एकाएक लगा जैसे कोई लंबा गलियारा साँप की सी कुंडली मार कर गोलाकार हो गया है। यह अहसास होते ही वह चिकनी दीवार से कुछ इंच आगे सरक गया, दीवार उसे साँप की देह जैसी लगने लगी थी, सुकेत ने कभी साँप की देह छुई नहीं थी, उस छुअन की कल्पना तक उसे डरावनी भी लगती था, घिनौनी भी…वह सर्प-देह के चंगुल में खड़ा है, यह अहसास ही सुकेत की आत्मा के रेशे रेशे में डर और बेबसी भरे दे रहा था…मन को समझाने के लिए वह बताने लगा खुद को—नहीं यह साँप की देह नहीं, कोई बहुत लंबी, बल्कि अनंत में चली जा रही सुरंग है जो गोल गोल घूम रही है, घूमते घूमते थक-थक गयी है, गोल कमरे का रूप लेकर सुस्ता रही है…
कमरे के बीचों-बीच यह मंच एकाएक कहाँ से आ गया? शायद मैंने ही ध्यान नहीं दिया…मंच भी है, उस पर मेज भी…मेज के पीछे कुर्सी और कुर्सी पर सिर्फ एक आवाज…
‘वेलकम, सुस्वागतम…नाकोहस के इस फ्रेंडली इंटरएक्शन—मित्रतापूर्ण वार्त्ता-सत्र—में आप तीनों बुद्धिजीवियों का स्वागत है…’
शब्द स्वागत के, लेकिन ‘बुद्धिजीवी’ कहते समय स्वर में खिल्ली…तीनों को इस पाखंड पर चिढ़ हुई। ‘मैत्रीपूर्ण वार्तासत्र’ के लिए किसी को आधी रात उठवा नहीं लिया जाता। डरावनी सर्प-देह की कुंडली में फँसा कर नहीं रखा जाता। और, यह नाकोहस है क्या बला?
‘चिंता न करें, आप लोगों को यहाँ आने का कष्ट इसीलिए दिया गया है कि आपके सारे सवालों के आखिरी जबाव दिये जा सकें, आप लोग सवाल-जबाव की बेवकूफी से आखिरी बार छुट्टी पाकर भले लोगों की तरह जीवन के आखिरी दिन तक चैन से जी सकें…’
‘अंतर्यामी का दरबार है क्या यार’….सुकेत ने सोचा, अंतर्यामी आवाज फिर से बोल पड़े इसके पहले ही उसने सवाल दाग दिया, “ चक्कर क्या है…क्या जुर्म है हम लोगों का- जो पुलिस, नहीं पुलिस नहीं, गुंडों  के जरिए…”
“इतनी हड़बड़ी से कैसे काम चलेगा?” आवाज एक चेहरे में बदल रही थी। ‘आश्चर्य लोक में एलिस’  के चेशायर बिल्ले की तरह धीरे-धीरे चेहरे का  आकार खुल रहा था, लेकिन बिल्ले की नहीं, गिरगिट की शक्ल। उस चेहरे को खुलते देख, सुकेत को अपने सपने के मगरमच्छ याद आने लगे। वैसी ही लंबी सी थूथन खुल रही थी, लेकिन डरावने दाँतों की कतार की जगह लपलपाती जीभ । देह शायद इंसान की ही थी, थूथन बिल्कुल गिरगिट की, जिस पर चेशायर बिल्ले जैसी दोस्ताना शरारत नहीं, सारे सवालों का हल हासिल कर चुकी चेतना की चिकनी कठोरता थी, अटूट आत्मविश्वास की चमक थी, और आवाज में ताकत का ठहराव, ‘आप लोगों को यहाँ पुलिस नहीं लेकर आई है, और गुंडे कह  कर, आप जिनकी भावनाएं आहत कर रहे हैं,  वे असल में बौनैसर हैं…’
‘बौने सर या बाउंसर ? जो सर लोग हमें यहाँ लेकर आए हैं, देह से तो बौने के बजाय बाउंसर ही लग रहे थे,  हाँ, बुद्धि से…’
‘इतना अहंकार उचित नहीं, मान्यवर। अहसान मानिए कि आपकी लद्धड़ बुद्धि फास्ट डेवलपमेंट के इस तेज-रफ्तार जमाने में अब तक बर्दाश्त की गयी है…बाउंसर नहीं, बौनैसर माने बौद्धिक नैतिक समाज रक्षक, संक्षेप में बौनैसर…यू सी, हम कोई बुद्धि-विरोधी नहीं, बल्कि बुद्धि के रक्षक हैं…लेकिन यह अब नहीं चलेगा कि स्वयं को बुद्धिजीवी कहने वाले  भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली समाजद्रोही, राष्ट्रविरोधी हरकतें करते रहें…बुद्धि की मनमानी बहुत हो ली, बुद्धिजीवियों के सम्मान का तमाशा बहुत हो चुका, अब जरूरत है, अनुशासन की… भावनाओं की रक्षा की, इसीलिए बौद्धिक नैतिक समाज रक्षक—बौनैसर—समाज की रक्षा तो करते ही हैं, यह ध्यान भी रखते हैं कि बौद्धिक कर्म अनुशासन-हीनता का रास्ता न पकड़ ले…याद रहे, इन समाज-रक्षकों के बारे में बकवास करना दंडनीय अपराध है…वैसे, यह अपमानजनक टिप्पणी भी तो आपने ही की थी ना सुकेत सर…कुछ ही दिन पहले कि इन दिनों इमारतें ऊंची होती जा रही हैं, और मनुष्य बौने…’
‘इसमें अपमानजनक क्या है? किसका अपमान किया मैंने?’
‘सारे मनुष्यों को बौने कहा, और पूछ रहे हैं कि अपमान किसका किया…’
‘यों तो मैंने अपना भी अपमान किया…’
“आप अपना अपमान नहीं कर सकते, जैसे आत्महत्या नहीं कर सकते”, अधिकारी की आवाज का ठंडापन बर्फ का सा था, हाँ थूथन लाल हो गयी थी, “आत्म- हत्या हो या आत्म-अपमान…आप ही कर लेंगे तो हम क्या करेंगे? हमारा काम हमें करने दीजिए….”
सुकेत को एकाएक याद आया, बचपन में, घर में फ्रिज नहीं था; गर्मी में मुन्ना बर्फ वाले से किलो-दो-किलो बर्फ लाने आम तौर से वही जाता था। मुन्ना सुए और हथौड़े की सहायता से बड़ी सी सिल्ली में से बर्फ का टुकड़ा तोड़ कर तराजू पर रखता था। क्या होगा सुए और हथौड़े की चोट का नतीजा… बर्फीली आवाज की सिल्ली में धकेले जा रहे सुकेत की हिम्मत नहीं हुई, कल्पना करने की।
‘तो फिर हमारा काम क्या है?’ सुकेत चौंका, यह रघु की आवाज थी, अभी कुछ ही देर पहले तो हम एक दूसरे की आवाज नहीं  सुन पा रहे थे, अब…
अंतर्यामी फिर से बोल पड़े, ‘ यह एक छोटा सा डिमांस्ट्रेशन था, सुकेतजी, आप लोगों को समझाने के लिए कि आपकी बोली-बानी, आपके कान-जबान कितने आपके रह गये हैं, और  कितने हमारे हो गये हैं…’,सुकेत को लगा कि वह उस आवाज को छू सकता है, यह छुअन भी ऐन वैसी ही, जैसी दीवार की छुअन लग रही थी…सर्पदेह की सी। सुकेत को अपने चेहरे पर, सारी देह पर नीले-काले धब्बे उभरते लगे। उसने हड़बड़ा कर हथेलियों, कलाइयों पर निगाह डाली। कोई धब्बे नहीं थे, लेकिन उसी पल सुकेत अपनी रगों में किसी को दुम मटकाता, मठलता हुआ महसूस कर रहा था….उसकी चीख निकल गयी, ‘मेरे भीतर यह मगरमच्छ…’
अंतर्यामी ने ध्यान नहीं दिया, रघु और खुर्शीद ने भी नहीं। चीख गले से निकली भी थी, या भीतर ही?  अधिकारी रघु से मुखातिब था…‘ आपका काम है कमाना, खाना, सोना, रोना और मस्त रहना। यार, कितने तो तरीके   हैं इन्फोटेनमेंट के…मन करे तो दूसरों के रोने का रस लो, मन करे तो खुद ही टीवी पर रो कर दिखा दो, भगवान के नाम पर रो लो, देश के नाम पर रो लो…टीवी पर रोने पर कोई रोक नहीं, हाँ, एकांत में रोने के चक्कर में मत पड़ना। एकांत  जैसी समाजद्रोही हरकतों को काफी हद तक तो टीवी ने कम कर ही दिया है…बाकी काम जारी है…लोगों को सिखाने के लिए, उनके सीखने को ‘मॉनिटर’ करने के लिए राष्ट्रीय चरित्र-निर्माण आयोग, राष्ट्रीय अनुशासन संस्थान, विवेक-पुनर्निर्माण समिति आदि का गठन किया गया ही है….हम नाकोहस वालों का अपना मैंडेट है…कुल मिला कर टारगेट यह—कोई भी नागरिक किसी भी हालत में अपने चरित्र को, दूसरों की भावनाओं को चोट ना पहुँचा पाए। एकांत खतरनाक है, एकांत  में सवाल पैदा होते हैं, सवालों से निजी दुख और सामाजिक उत्पात जन्म लेते हैं, सो….क्या कहते हैं आप इंटेलेक्चुअल लोग उसे…हाँ, कैथारसिस, विरेचन….मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी…सारे समाज के लिए रंग-बिरंगा, सुंदर कैथार्सिस मुहैया कराने के लिए तो छोटे से शुक्रिया के  मुस्तहक तो हम हैं ही….क्या ख्याल है ज़नाब खुर्शीद साहब….’
‘ मेरे नाम की वजह से उर्दुआने की ज़रूरत तो नहीं थी, बहरहाल शुक्रिया’ खुर्शीद ने अपने जाने-पहचाने अंदाज में कहा, ‘किंतु मेरा निवेदन भी यही है, कृपया बताएँ…हम यदि अपना स्वयं का अपमान तक  नहीं कर सकते तो मनुष्य योनि का करें क्या?’
अंतर्यामी गिरगिट एकाएक सोच में डूबा लगने लगा। क्या उसे याद आ गया था कि शक्ल गिरगिट की हो, ड्यूटी मगरमच्छ की, लेकिन वह स्वयं भी अंतत: मनुष्य था…
कमरे में जाने कितनी देर सन्नाटा गूँजता रहा। इन तीनों की आवाज और हरकत फिर से स्थगित कर दी गयी थी। वे अपनी जगह जरा सा हिल लेने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते थे। हाँ, चुपचाप साझा ढंग से मुस्कराना मुमकिन था…रघु और खुर्शीद की मुस्कान बता रही है कि वे भी वही सोच रहे हैं, जो सुकेत खुद सोच रहा है—यह एक सपना है, जो मैं देख रहा हूँ, बाकी दोनों मेरे सपने में हैं, बस। कुछ ही देर की बात है, नींद खुलेगी, सपना टूटेगा, और मैं बाकी दोनों को छका-छका कर बताऊंगा कि सपने में मेरे साथ उन दोनों की भी क्या दुर्गति हुई। मजे मजे में बुलाऊंगा भी कि आज रात फिर दोनों साथ-साथ चले आना मेरे सपने में…
‘ वैसे तो, जैसा कि आप जानते हैं, जगत ही ब्रह्म का सपना है…’ गिरगिट चेहरे के रंग लाल, हरे, नीले हुए जा रहे थे, चिकनी आवाज अब लपलपाती जबान से  नहीं, उस गोल कमरे का रूप ले चुकी सुरंग के, उस साँप की कुंडली के कोने कोने  से आ रही थी, ‘ लेकिन, आप यह भी तो जानते हैं कि सपना था, यह अहसास सपने में नहीं, उसके खत्म हो जाने के बाद ही होता है…इस वक्त आप किसी सपने में नहीं, नाकोहस के मैत्रीपूर्ण वार्तासत्र में है…नाकोहस याने नेशनल कमीशन ऑफ हर्ट सेंटिमेंट्स—संक्षेप में नाकोहस, आप आहत भावना आयोग भी कह सकते हैं… ग़ौर करें, ‘नाकोहस’- इस एब्रिविएशन  से यह भी मतलब  निकलता है कि आप  जैसे लोगों द्वारा फैलाया गया कुहासा दूर करना ही इस कमीशन का मैंडेट है… हिन्दी में भी, ‘आभाआ’ याने बकवास के अंधकार को दूर कर, आनंद और विकास की आभा को बुलाना…आभा आ…आभा को हाँ, कुहासे को ना…नाकोहस…
‘नाकोहस? आभाआ?’ रघु, सुकेत और खुर्शीद ने एक दूसरे की आँखों में झाँका। आँखों के तीनों जोड़ों में एक सा अचंभा था, ‘ यह बक क्या रहा है, यार…ढेर सारे कमीशन हैं, रोजाना दो-चार बन जाते हैं, लेकिन ये कौन-कौन से कमीशन बखान रहा है, चरित्र-निर्माण आयोग, आहत भावना आयोग, नेशनल कमीशन ऑफ हर्ट सेंटीमेंट्स…हमें पता तक नहीं चला…’
अंतर्यामी गिरगिट-शक्ल ने फिर से जल्दी-जल्दी रंग बदले, शायद यह इन लोगों के बिगूचन पर खुशी जाहिर करने का उसका तरीका था, ‘नाकोहस आपके ऊपर-नीचे-दायें-बायें हर तरफ है…नाकोहस आपका पर्यावरण है। समझदार लोग समझ भी गये हैं, आप जैसों को समझाने की कोशिशें भी बौनेसरों ने की तो हैं…’
बात एक तरह से सही थी, तीनों दोस्त अलग-अलग भी, और साथ-साथ भी भावनाएं आहत करने के आरोप में गालियाँ भी झेल चुके थे, पिटाई भी। आईपीसी 153 ए और आईटी एक्ट 66 ए के केस भी तीनों पर चल ही रहे थे, लेकिन वे सब तो गुंडागर्दी और राजनैतिक बदमाशी की घटनाएँ थीं…यह बाकायदा कमीशन—नाकोहस—आभाआ….
‘फैसला किया गया है कि नाकोहस को हवा में घोल दिया जाए, आभाआ की आभा को हर नागरिक के भीतर-बाहर फैला दिया जाए…. मेरे प्यारे बुद्धुओ,नाकोहस तुम्हारी जानकारी में हो ना हो, इसे तुम्हारी नींद में, तुम्हारी साँस में होने की जरूरत है, तुम्हारे घर में, तुम्हारी सड़क पर होने की जरूरत है। मुझे विश्वास है कि इस मैत्रीपूर्ण वार्तासत्र के बाद, तुम तीनों में जरूरी सुधार आ जाएगा, नाकोहस को तुम भी अपने भीतर पाओगे और भावनाएँ आहत करने वाली पापबुद्धि को सदा के लिए  बाहर निकाल फेंकोगे’।
रघु चुप नहीं रह सकता था, सुकेत को मालूम था कि वह बोलेगा जरूर। जब वह दमदमी टकसाल में, गोद में एके 47 को लाड़ से बिठाए, खालिस्तान समझा रहे खाड़कुओं के सामने चुप नहीं रहा था, तो इस इस सपने में, इस गिरगिट के सामने उसके चुप रहने की बात तो सपने में भी नहीं सोची जा सकती । लेकिन वह बोला, और अपन सुन ही नहीं पाए तो?
सुकेत की आँखें जीभ लपलपाते गिरगिट की ओर अनुरोध के साथ देखने लगीं। वह जिससे  घृणा कर रहा था, उसी से अनुरोध कर रहा था कि रघु की आवाज सुनने दी जाए।  रघु इस गिरगिट की ऐसी-तैसी करेगा, यह तय था, लेकिन उस ऐसी-तैसी का  मजा ले पाने के लिए सुकेत निर्भर था उसी गिरगिट की मर्जी पर। उसकी मर्जी के बिना वह सुन नहीं सकता था, रघु की  आवाज, जैसे कुछ देर पहले रघु और खुर्शीद सुकेत की आवाज नहीं सुन पा रहे थे…
सुकेत के मन में ऐसी घृणा और निर्भरता एक साथ होने की स्मृति अब तक नहीं थी…क्या कभी बाहर आ पाएगा वह विवशता की इस स्मृति से कि अपने रघु की नाकोहस की ऐसी-तैसी करती आवाज सुनने के लिए वह नाकोहस  के ही निहौरे कर रहा है…
गिरगिट मुस्कराया, अंतर्यामी ठहरा…सुकेत और खुर्शीद सुन पा रहे थे, रघु की आवाज, ‘सुनिए भाई साहब, ऐसे जादू-तमाशे हमने बचपन से देखे हैं। बड़े होकर तो हालत यह हो गयी है कि…’
‘होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे’…खुर्शीद ने गिरह लगाई, जैसे पचीस बरस पहले दमदमी टकसाल में लस्सी छकते, उपदेश सुनते अपन हँस-हँस कर  खुद के डर को छका पा रहे थे, वैसे ही इस अजूबे को भी जिन्दादिली से ही निबटा रहे हैं…
‘लेकिन इस अजूबे की अपनी इज़ाज़त से…’ मगरमच्छों द्वारा भंभोड़ा जा रहा हाथी  सुकेत के समूचे अस्त्तित्व में चिंघाड़ उठा। बल-बुद्धि से महिमामंडित वह विशाल प्राणी बेबस और लाचार था, मगरमच्छों की क्रूरता के सामने…उसकी पुकारें नारायण  से दया की भीख माँग रही थीं, या देह चबाते मगरमच्छों से…मैंने तो नारायण के बारे में सोचा तक नहीं, बल्कि इस गिरगिट की ओर ही टिकाई निहौरा करती निगाह, उफ…क्या हो गया है मुझे….क्या हो रहा है हम तीनों को…मैं अकेला ही नहीं, बाकी दोनों की निगाहें भी तो मेरी ही तरह निहौरे कर रहीं हैं इस गिरगिट के…न करें तो आवाज नहीं सुन सकते, कौन जाने अगले पल देख भी न सकें एक दूसरे को…
स्मृति जा रही है पंचतंत्र की कहानी की ओर। मगरमच्छ की क्रूर मूर्खता की, बंदर की चतुराई की उस कहानी में तो बंदर बच गया था, मगरमच्छ को यकीन दिला कर कि वह अपना कलेजा पेड़ पर छुपा कर रखता है। हम उस बंदर की चतुराई से ही तो सीख रहे हैं, रणनीति के तहत निहौरे कर रहे हैं, इस घिनौने गिरगिट से, कोई बात नहीं…
मगरमच्छ मूर्ख मान गया था कि बंदर अपना स्वादिष्ट कलेजा शरीर में नहीं पेड़ की खोखल में छिपा कर रखता है, हम भी इस गिरगिट को मूर्ख बनाकर निकल जाएंगे कि, ‘जी, हम तो अब भावनाएं आहत करने वाली शरारतें घर पर छोड़ कर ही निकला करेंगे…’
गिरगिट ने नारंगी रंग लेते हुए सुकेत की ओर तिरस्कार भरी निगाह डाली, ‘मेरी ही मेहरबानी से अपने दोस्त की बकवास सुन पा रहे हो, मन ही मन फिर भी हीरोपंथी झाड़ रहे हो, चाहूँ तो सुनना-बोलना तो क्या हिलना-डुलना तक इसी पल रोक सकता हूँ, याद कर रहे हो उस बदमाश बंदर को, उस बेवकूफ मगरमच्छ को…भूल जाओ यह बकवास, बस अपना सपना याद रखो, सच वही है…’
हाथी हिल नहीं सकता। नारायण को परवाह नहीं, यम को जल्दी नहीं। मगरमच्छ आश्वस्त—जीभ को गोश्त का स्वाद, कानों को क्रंदन का सुख मिलने में कोई बाधा नहीं। हाथी की विवशता,  मगरमच्छों की आश्वस्ति का  सच  सुकेत की चेतना में बर्फ तोड़ने वाला सुआ बन कर चुभा…अंदर ही अंदर सारा खून निचुड़ सा गया, चेहरा शर्म और दर्द  से बैंगनी  होने लगा, गिरगिट ने तृप्ति से जीभ लपलपाई, और खुद भी बैंगनी रंग अख्तियार करते हुए सुकेत की ओर आँख मारी, ‘मेरे बैंगनीपन का कारण अलग है, समझे…’
सुकेत को अपने नाम पर शर्म आने लगी, कैसा सुकेत—सूर्य— हूँ मैं कि…
‘थैंक्यू खुर्शीद’ रघु कह रहा था, ‘मैं आपकी कोमल भावनाएँ आहत  नहीं करना चाहता, लेकिन सरजी इतना तो जानते ही होंगे कि किसी भी वक्त में चालू मान्यताओं और उनसे जुड़ी भावनाओं से ही चिपका रहता तो इंसान आज भी नरबलि चढ़ा रहा होता। बात को समझिए नाकोहस साहब, कहीं न कहीं सत्य तो है ना, कुछ तो है उसकी शकल, हालाँकि उसको पूरा जान पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है, इसीलिए तो उस पर सतत पुनर्विचार जरूरी है…दैट इज ब्लासफेमी फॉर यू…जिसके बिना इंसान आगे बढ़ ही नहीं सकता…’
‘मिस्टर रघु मैं जानता हूं कि ब्लासफेमी क्या चीज है…आपकी तरह ईसाई भले…’
‘मैं ईसाई घर में जन्मा जरूर, लेकिन ईसाई हूँ नहीं…’
‘आप स्वयं को ईसाई कहलाना पसंद नहीं करते, लेकिन पसंद का जमाना गया, यह पहचान का जमाना है, आप चाहें ना चाहें आपकी पहचान तो ईसाई की है, मरते दम तक रहेगी, मरने के बाद तक रहेगी…बाई दि वे, आप पर एक चार्ज यह भी है कि आप  अपनी पहचान छुपाने की कोशिश करते हैं, खैर, न जाने किस जमाने की बात आप कर रहे हैं, सत्य होता है एब्साल्यूट सत्य होता है भले ही पूरी शकल न दिखाता हो, पढ़े-लिखे हो कर ऐसी बेवकूफी की बातें…’ आवाज में वह लाड़ भरी सख्ती आने लगी थी जिसका इस्तेमाल पालतू जानवरों से बात करने में किया जाता है,  ‘मेरे प्यारे बेवकूफो, सत्य वत्य कुछ होता नहीं, वजूद केवल ताकत का है, इतिहास में पहली बार इस व्यावहारिक सत्य को दार्शनिक रूप मिला है, अब पीछे नहीं जा सकते हम…कोई जरूरत नहीं ब्लासफेमी की, सत्य की खोज, माई फुट… सत्य है क्या?  प्याज की गाँठ– छीलते जाओ, छीलते जाओ, हर परत के नीचे एक और परत, और आँखों में पनीली
जलन…बहुत डेमोक्रेसी-वेमोक्रेसी बघारते हो, तुम लोग, जनता को पनीली जलन से बचाना सरकार का कर्तव्य है या नहीं …सत्य-वत्य बहुत हो लिया अब जो भी खोज होनी है एटीएम में होनी है…एटीएम समझते हो ना?’
‘यार, यह हमें इतना घामड़ समझता है…एटीएम माने ऑटोमेटिक टेलर मशीन, पॉपुलर मुहावरे में एनीटाइम मनी…’
‘मैं जानता था’ गिरगिट की देह ने खुशी के मारे इस बार रंग ही नहीं बदला, फुरहरी भी ली, ‘ जानता था मैं, पुराना इडियम घुसा पड़ा है इडियट किस्म की खोपड़ियों में, एटीएम का नया मतलब है—ऑल टेक्नॉलॉजी ऐंड मैनेजमेंट—साइंस ऐंड टेक्नालॉजी में कन्फ्यूजन की गुंजाइश है, कुछ बेवकूफ हवाई किस्म की थ्योरिटिकल रिसर्च में राष्ट्रीय संसाधन नष्ट करने लगते हैं…मैनेज करना है कि साइंटिस्ट अपने काम से काम रखें, फिजूल के पचड़ों में ना पड़ें… पॉलिसी डिसीजन स्टैटिक्स के आधार पर लिए जाने चाहिएं…तुम्ही बताओ तुम्हारा महान साहित्य, महान संगीत विचार समाज के कितने फीसदी लोगों के काम का है? इन सारी चीजों को मैनेज  करना है, इसलिए एटीएम—ऑल टेक्नॉलॉजी ऐंड मैनेजमेंट—इसी में रिसर्च, इसी में विकास… बंद करनी है  बाकी हर बकवास…ऐंड दैट इज़ दि फाइनल ट्रूथ, कभी मत भूलना यह सबक़—सत्य वही जो हम बतलाएँ…’
रघु , खुर्शीद और सुकेत गिरगिट की लंबी स्पीच सुनते ही रह गये, बीच में बोलना संभव  कहाँ था? गिरगिट अपने मुँह का माइक ऑन करने के साथ ही इन तीनों की जबान पर ताला लगाना भूला कहाँ था? वे केवल ठंडी आवाज सुन सकते थे— ‘मुझे पता है, आप लोग सोच रहे हैं कि…’, पहली बार उस मेज से आती आवाज में बर्फ की सिल्ली की ठंडक के बजाय इंसानी शरारत सुनाई दी, ‘ईसा मसीह का उदाहरण दें या नचिकेता का, उद्धरण नैयायिक उदयन का दें या इब्ने सिन्ना इज्तिहादी का, या  वाल्टेयर का, या लाओत्जे का…कबीर और मीरां के नाम तो बस आपके मुँह से अब निकले कि तब निकले…आपको लगता है कि नाकोहस अनपढ़ों का जमावड़ा है? सब मालूम है हमें…आप तीनों का लेख, ‘राइट टू ब्लासफेमी’ भी ध्यान से बांचा गया है नाकोहस द्वारा, “ ब्लासफेमी याने धर्म और भगवान तक की शान में गुस्ताखी करना इंसान का अधिकार तो है ही, मानव-समाज की प्रगति की शर्त भी है…” यही फरमाते हैं ना आप लोग उस निहायत कन्फ्यूजिंग हेंस मॉरली रिपगनेंट ऐंड सोशली डेंजरेस लेख में….उस लेख के बाद हमारी कार्यवाही का कोई असर आप पर नहीं पड़ा, इसीलिए तो आपको इस खास इंटर-एक्शन में आने की जहमत दी गयी है…
उस लेख के बाद नाकोहस की कार्यवाही? तीनों ने एक दूसरे की आँखों से सवाल पूछा, ‘यार, यह हो क्या रहा है? जिस नाकोहस का नाम तक नहीं सुना, उसने अपने खिलाफ कार्यवाही भी कर डाली?’’
‘ कानून की जानकारी ना होना लीगल डिफेंस नहीं  होता, यह तो आप लोग नाकोहस बनने के पहले भी जानते-मानते ही आए हैं ना….’ नाकोहस के गिरगिट का अंतर्यामीपन सहज लगने लगा था, जो मन में सोचते थे, उस पर गिरगिट की टिप्पणी अब तीनों में से किसी को जरा भी नहीं चौंका रही थी। गिरगिट कह रहा था, ‘ नाकोहस के होने से आप नावाकिफ हैं, तो नाकोहस का काम रुक थोड़े ही जाएगा…हाँ, हमारे तरीके कुछ अलग हैं, पुलिस-वुलिस से ज्यादा, हम बौद्धिक नैतिक समाज रक्षकों याने बौनेसरों पर या फिर लोगों की अपनी सद्बुद्धि पर भरोसा करते हैं… खुद दुखी, आहत और उत्पीड़ित होने का दावा करते हुए किसी की ठुकाई करना कितना मादक सुख देता है, आप क्या जानें…मैं तो…मुझे तो.. आ..ह…’ गिरगिट को कोई रोमांचक पल याद आ रहा था, ‘मेरी भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले, तुझे तो मैं…ओह…आ…तेरी तो मैं आह…अरे बेवकूफों तुम क्या जानो, कितना मजा है इसमें…हाय…आह ओह…’
गिरगिट उस सुख को याद  कर रहा था, जो वह भावनाएँ  आहत  करने वालों की देहों को क्षत-विक्षत करते समय पाता था, मुँह से निकलती सीत्कारें, लंबोतरे चेहरे पर छा रही खुमारी, लपलपाती जीभ पर चमक रही तृप्ति ऐसी थी मानो वह किसी परम काम्या नारी के साथ सेक्स का सुख ले रहा हो।
सुकेत को याद आ रहा था, ब्लासफेमी वाले लेख के पहले भी, बहुत तीखी गाली-गलौज, बहुत जहरीले कटाक्ष झेले थे उसने, और रघु, खुर्शीद जैसे उसके कई दोस्तों ने। उसे अपनी वह प्रेमिका भी याद आयी जो मोहब्बत की बातें ऐसे करती थी कि पचास के दशक की फिल्मों की घोर सेंटिमेंटल नायिका तक पस्त हो जाए; और कटाक्ष ऐसे करती थी, जैसे कोई तीखी छुरी त्वचा से माँस तक पहुँचाए, उसे गोल-गोल घुमाए, फिर ताजे घाव पर नमक-मिर्च बुरके…
जैसे यह गिरगिट कह रहा है, वैसे ही वह भी दावा करती थी—दोष उसी का है जिसके माँस में छुरी गपाई जा रही है, जिसके घावों पर नमक-मिर्च बुरका जा रहा है…वह तो बेचारी स्वयं अपनी भावनाओं के आहत होने से पीड़ित है…यह सब करते समय उसे सुख भी वैसा ही मिलता था, जैसे सुख की यादें इस गिरगिट के मुँह से सीत्कारें निकलवा रही हैं, इसके चेहरे पर खुमारी ला रही हैं…प्रेमिका की यह कटाक्ष-कला सुकेत ने झेली थी, उसके लिए अनुपयोगी हो जाने के बाद। सुकेत के लिए बहुत भारी और अबूझ थे वे दिन। समझ नहीं आता था कि ऐसा क्यों? आज एकाएक कौंध—कहीं वह इस गिरगिट द्वारा या इसके गिनाये अजीबोगरीब कमीशनों में से किसी के द्वारा तो तैनात नहीं की गयी थी? कौन कर रहा है निजी रिश्तों और निजी पलों में ऐसी तैनाती? कौन चला रहा है आहत भावनाओं का कारोबार ? किस इरादे से चला रहा है? वह स्त्री उसके जीवन में जैसे अधिकार के साथ घुसी थी, उसने सुकेत को जैसे लुभाया था… क्या किसी  योजना के तहत ? किसकी थी योजना?  क्या अब रिश्ते भी नाकोहस जैसे कमीशनों की देखरेख में बन-बिगड़ रहे हैं?
सुकेत भीतर बीते दिनों को देख रहा था, और बाहर..
…नाकोहस हमारे सामने गिरगिट की शक्ल में खास संदेश लेकर आया है…रंग ओढ़ लो स्वयं आहत होने का, भंभोड़ डालो मगरमच्छी निर्ममता से…तीखी दंत-पंक्ति से, जहरीली जीभ-छुरी से, लोहे की छुरी से भी, भावनाओं को आहत करने वाला अपना हर अधिकार खो चुका, मारो-पीटो, जो चाहो करो… घर फूँक दो उसका, मत देखो कि साथ में तुम्हारा घर भी जला जा रहा है…पल-पल रंग बदलते रहो…अपनी भावनाओं का खेल हो तो हर पिटाई जायज, किसी और की भावनाओं का मामला या तो प्रतिक्रियावाद या राष्ट्रद्रोह…गिरगिट-भाव और मगरमच्छ-ताव दिन-दूने रात चौगुने ढंग से समाज में न पसरा तो नाकोहस के होने का मतलब ही क्या?
ब्लासफेमी वाले लेख के बाद तीनों को कई बार पिटाई झेलनी पड़ी थी, घरों के दरवाजों पर अश्लील गालियों और भद्दे चित्रों का प्रसाद भी  मिला था। अपने-अपने धर्म के नरकों में जाने के सुझाव, और स्वयं नहीं गये तो भेजने की व्यवस्था के आश्वासन भी तीनों को मिले थे…उस वक्त, समझ रहे थे कि लोग पगला गये हैं, आज मालूम पड़ रहा है कि पागलपन में पद्धति थी—मेथड इन मैडनेस। नाकोहस, आभाआ की पद्धति।
डर लगता था, साथ होते थे तो हँसी की ढाल डर के आगे अड़ा देते थे, अकेले में खुद को याद दिलाते थे, डरना इंसानी फितरत है, डर कर घर बैठ जाना, मोर्चे से भाग जाना कमजोरी। कोशिश करते थे साथ-साथ भी, अपने अपने एकांत में भी कि डर इंसानी फितरत ही रहे, भगोड़ी कायरता न बन जाए…आज जो डर सुकेत को लगने लगा था, वह और तरह का था, अपनों से कटाक्ष, गैरों से पिटाई का नहीं, नाकोहस की व्यापकता का डर…मेथड इन मैडनेस का डर…गिरगिट अधिकारी का चेहरा गायब था, मेज के ऊपर अधभर में टँगी लपलपाती जीभ ही दिखी सुकेत को… आवाज सुनाई दी, ‘हम हवा में हैं, हम आवाजों में हैं, हम मुस्कानों में हैं, हम रिश्तों में हैं…कहाँ तक जानोगे कौन कौन है हमारा एजेंट—भद्दा शब्द है एजेंट—सही  नाम है, बौनेसर— बौद्धिक नैतिक समाज रक्षक…वह गाना था ना तुम्हारे बचपन की किसी फिल्म में, ‘जहाँ जाइएगा, हमें पाइएगा…’
याने…याने…शायद रघु भी, शायद खुर्शीद भी…क्यों नहीं…क्यों नहीं…मैं खुद क्यों नहीं…कुछ ही देर पहले मैं निहौरे करती निगाह से निहार नहीं रहा था, इस घिनौने गिरगिट को? कुछ देर पहले लग रहा था, मेरी देह पर नीले धब्बे आ रहे हैं, कहीं इस वक्त मेरी देह का रंग पीला, नारंगी या हरा तो नहीं हो रहा? सुकेत की हिम्मत नहीं हुई अपनी हथेलियों, कलाइयों पर निगाह डालने की…सर्पदेह की जकड़ में तो वह यहाँ आते ही ले लिया गया था, अब उसे जलते तवे पर खड़े होने का भी अहसास हो रहा था…हर तरफ से तपिश की लपटें लपक रहीं थीं, कमरे की जो दीवारें उसे कुछ ही देर पहले बहुत ऊंची लगी थीं, सिकुड़ रही थी, छत धीरे-धीरे, जैसे मजा लेते हुए  नीचे आ रही थी, सुकेत को गोया जिन्दा चिना जा रहा था, वह चीख रहा था, पता नहीं रघु और खुर्शीद तक उसकी आवाज पहुँच रही थी या नहीं…उसने पूरी ताकत से चीख लगाई, ‘छोड़ो हमें, जबाव दो, मुक्ति दो…’ वाकई चीख पाया क्या वह? उसे खुद तो अपनी आवाज सुनाई दी नहीं, औरों ने क्या सुनी होगी…
यह क्या दिख रहा है मुझे…खुर्शीद अपनी जगह से हिल पा रहा है, रघु भी, अरे, मैं खुद भी…हममें से कोई भी एक-दूसरे की तरफ नहीं बढ़ रहा, हम तीनों की गति नाकोहस के गिरगिट की ओर है, हम में से हरेक उस तक बाकी दोनों से पहले पहुँचा जाना चाहता है…क्यों? आखिर क्यों? यकीनन उस की दुम पकड़ कर झटका देने के लिए, उसकी कुर्सी खींच लेने के लिए….या…या…या…इस या के आगे सोचने की हिम्मत नहीं हो रही थी, सुकेत की…ना अपने बारे में, ना बाकी दोनों के बारे में…
तीनों जोड़ी आँखों में डर का घुमावदार गलियारा था, आशंका की  सुरंग थी, जो सामने खड़े इंसान को भेदती जाने कहाँ चली जा रही थी…वे तीनों एक दूसरे को देखना चाह रहे थे, देख रहे थे गिरगिट को, जो पल-पल रंग बदलता बेहद खुश लग रहा था…‘इस मैत्रीपूर्ण वार्तासत्र में आने के लिए आप तीनों का धन्यवाद, विदाई-भेंट के रूप में सलाह है, आप तीनों कुछ दिन आराम करेंगे, चाहें तो घर पर ही, बात ना समझ पाएँ तो शायद किसी नर्सिंग होम में….बट रेस्ट इज ए मस्ट फॉर यौर हैल्थ’, मेज से उठता  गिरगिट मुस्करा रहा था…
सुकेत को यकीन हो चला कि या तो सपना है या हैल्यूसिनेशन, वरना कैसे हो सकता है कि कोई सचमुच का गिरगिट सचमुच की मेज पर सचमुच का सूट पहने बैठा हो और सचमुच की हिन्दी बोल रहा हो… लगता है, आज पीने- खाने में कुछ गड़बड़ की है, इसीलिए इतना डिस्टर्बिंग सपना आया है…जो गालियाँ, पिटाई खाईं, खाते ही रहते हैं, उससे इस घिनौने गिरगिट का, इसके नाकोहस का क्या लेना-देना है…मैं रौब में आ गया हूँ, बाजीगरी तो देखो  बेहूदे की, बंबइया फिल्मों के भाई लोगों की तरह स्टाइलिश धमकियाँ दे रहा है…
‘सुकेतजी, बात हैल्यूसिनेशन की नहीं, भावनाओं के एसेसिनेशन की है, जो आप आगे से ना करें तो अच्छा है…बाई दि वे, कभी घाव पर चलती चींटियाँ महसूस की हैं, आपने?’
अच्छा तो धमकी का स्टैंडर्ड कुछ रचनात्मक हो  रहा है…सुकेत ने रघु और खुर्शीद की ओर ताका, लेकिन उनके चेहरे सपाट थे…याने गिरगिट ने फिर उनके सुनने पर रोक लगा दी है…गिरगिट मेज से उठ खड़ा हुआ, इंसान की तरह चलने के बजाय रेंगने का फैसला किया, दरवाजे तक पहुँच कर उसने ताबड़तोड़ रंग बदले, गर्दन घुमाई, बोला, ‘जिस वक्त आप मुन्ना बर्फ वाले के सुए को याद करके डर रहे थे ना, ऐन उसी वक्त आपके दोस्तों को लग रहा था, उनके घावों पर चींटियाँ चल रही हैं, पूछ लीजिएगा, नाकोहस से बाहर…माफ कीजिएगा…नाकोहस से बाहर तो अब क्या निकलेंगे…इस इमारत से बाहर निकल कर…’
पूछने की जरूरत नहीं थी, रघु और खुर्शीद के चेहरे ही गिरगिट की बात की ताईद  कर रहे थे…जिस वक्त मुझे सुए का डर था, उसी वक्त इन लोगों को घाव पर चलती चींटियों का अहसास…
‘ऐसी की तैसी तेरी,  तेरे नाकोहस की’ आतंक के भँवर में फँसते सुकेत ने प्रतिवाद में पूरी की पूरी ताकत झोंक दी, जोर से चिल्लाया, ‘ऐसी की तैसी तेरी, घिनौना गिरगिट कहीं का, नाकोहस की दुम…’
इस ताकतवर चीख के साथ उसकी  आवाज वापस आ गयी, सुनने की ताकत भी, उस लेख के बाद जो हुआ था, उसे याद करने की कूवत भी…सुकेत को अपनी आवाज सुनते ही उम्मीद बँधी, बस बहुत हुआ, अब आँख खुली जाती है, पसीना जरूर भरा होगा बदन में, लेकिन इस दु:स्वप्न से मुक्ति तो मिल ही जाएगी…
बिस्तर से उतरना चाहा सुकेत ने…यह क्या? टाँगें साथ नहीं दे रहीं, घुटने मुड़ नही रहे, जैसे लॉक कर दिये गये हैं…ओ….कितना दर्द…क्यों? कैसे? हे भगवान…किसी तरह उठ कर, चलने के नाम पर घिसटते हुए वह बाथरूम गया, हिम्मत बाँध कर, वैसे ही घिसटता सा किचन में पहुँचा,चाय बनाने के लिए खड़े रहना जैसे उम्र भर खड़े रहना हो गया, अकेला इंसान…करना तो सब कुछ खुद ही था, आदत भी थी, लेकिन आज जैसा दर्द…पहले कभी नहीं, तब भी नहीं जब पिटाई झेलनी पड़ी थी…किसी तरह वह हाथ में मोबाइल लिये बालकनी तक पहुँचा…सब कुछ सामान्य ही तो है यार…घुटनों में कुछ समस्या है तो चलते हैं ना डाक्टर के पास, किसी दोस्त के साथ, सबसे पहले तो रघु और खुर्शीद को ही बुला लेते हैं…मोबाइल पर नंबर डायल कर ही रहा था कि मैसेजों पर निगाह गयी, कई मैसेज थे, आम तौर से जितने होते थे, उनसे बहुत ज्यादा…आशंकित सुकेत ने मैसेज बाक्स खोला, दर्जनों मैसेज, भेजने वाले वही चंद दोस्त…सूचना एक ही ‘ तुम्हारा फोन मिल ही नहीं रहा है, कहाँ गायब हो तुम, सुकेत, कल रात किसी ने खुर्शीद को सीढ़ियों से धकेल दिया है, रघु का मोटर-साइकिल एक्सीडेंट हो गया है, दोनों हस्पताल में हैं…आपरेशन दोनों के होने हैं, जैसे ही मैसेज देखो, फौरन पहुँचो…’
टाँगे ही नहीं, सुकेत की समूची देह अकड़ गयी, पता नहीं रोमों से पसीना बह रहा है, या गुम घावों पर चींटियाँ चल रही हैं…टाँगों में दर्द जकड़न का है, या मगरमच्छों के चबाने का…चिड़ियों की चहचहाट कानों में गूँज रही है, या गिरगिट की ठंडी आवाज…रीढ़ की हड्डी पर  किसी ने बर्फ की सिल्ली चिपका दी है…सारा शरीर सुन्न…उसके हाथ से मोबाइल फिसल गया, झुक कर उठाना असंभव, झुकने की तो बात क्या, कुर्सी पर बैठना नामुमकिन…घुटने सीधे ही रह सकते थे, वह खड़ा ही रह सकता था या लेटा।  भयानक दर्द पर अब आतंक के नमक-मिर्च की बुरकी भी थी…सुकेत तड़प रहा था, लेकिन तड़प की चीख इंसानी आवाज के बजाय हाथी की चिंघाड़ सी क्यों…सुकेत ने थर-थर काँपते हुए देखा, बालकनी से नजर आती सड़क की ओर, सब कुछ बादस्तूर चल रहा था, धीरे-धीरे बढ़ता ट्रैफिक, तेजरफ्तारी, आवा-जाही, सब कुछ वैसे का वैसा..बस, वहाँ बीचोंबीच… मगरमच्छ इतमीनान से हाथी की टाँगें चबा रहे हैं… हाथी बस चीख सकता है, अपनी जगह से हिल नहीं सकता…
टूट रहे घुटनों पर किसी तरह देह को ढोता सुकेत खड़ा है—महानगरीय फ्लैट की बालकनी में नहीं..किसी पहाड़ी कगार के छोर पर…गिरा तो न जाने कहाँ जाकर गिरेगा… हड्डडियों का भी पता जाने चलेगा या नहीं…
हाथी की चिंघाड़ें करुण रुदन में बदल रही हैं, धीमी हो रही हैं, जमीन पर चिपकी देह में जो थोड़ी-बहुत हलचल थी, वह कम से कमतर होती जा रही है…आँखें आसमान बैकुंठ की ओर तकते तकते अब  अपनी जगह से लुढ़कती जा रही हैं…

दृष्टिकोण का फ़र्क


दृष्टिकोण का फ़र्क



बहुत समय पहले की बात है ,किसी गाँव में एक किसान रहता था . वह रोज़ भोर में उठकर दूर झरनों से स्वच्छ पानी लेने जाया करता था . इस काम के लिए वह अपने साथ दो बड़े घड़े ले जाता था , जिन्हें वो डंडे में बाँध कर अपने कंधे पर दोनों ओर लटका लेता था . उनमे से एक घड़ा कहीं से फूटा हुआ था ,और दूसरा एक दम सही था . इस वजह से रोज़ घर पहुँचते -पहुचते किसान के पास डेढ़ घड़ा पानी ही बच पाता था .ऐसा दो सालों से चल रहा था . सही घड़े को इस बात का घमंड था कि वो पूरा का पूरा पानी घर पहुंचता है और उसके अन्दर कोई कमी नहीं है,

वहीँ दूसरी तरफ फूटा घड़ा इस बात से शर्मिंदा रहता था कि वो आधा पानी ही घर तक पंहुचा पाता है और किसान की मेहनत बेकार चली जाती है .

फूटा घड़ा ये सब सोच कर बहुत परेशान रहने लगा और एक दिन उससे रहा नहीं गया , उसने किसान से कहा , “ मैं खुद पर शर्मिंदा हूँ और आपसे क्षमा मांगना चाहता हूँ?” 

“क्यों ? “ , किसान ने पूछा , “ तुम किस बात से शर्मिंदा हो ?”
“शायद आप नहीं जानते पर मैं एक जगह से फूटा हुआ हूँ , और पिछले दो सालों से मुझे जितना पानी घर पहुँचाना चाहिए था बस उसका आधा ही पहुंचा पाया हूँ , मेरे अन्दर ये बहुत बड़ी कमी है , और इस वजह से आपकी मेहनत बर्वाद होती रही है .”, फूटे घड़े ने दुखी होते हुए कहा.

किसान को घड़े की बात सुनकर थोडा दुःख हुआ और वह बोला , “ कोई बात नहीं , मैं चाहता हूँ कि आज लौटते वक़्त तुम रास्ते में पड़ने वाले सुन्दर फूलों को देखो .” घड़े ने वैसा ही किया , वह रास्ते भर सुन्दर फूलों को देखता आया , ऐसा करने से उसकी उदासी कुछ दूर हुई पर घर पहुँचते – पहुँचते फिर उसके अन्दर से आधा पानी गिर चुका था, वो मायूस हो गया और किसान से क्षमा मांगने लगा .
किसान बोला ,” शायद तुमने ध्यान नहीं दिया पूरे रास्ते में जितने भी फूल थे वो बस तुम्हारी तरफ ही थे ,
सही घड़े की तरफ एक भी फूल नहीं था .

ऐसा इसलिए क्योंकि मैं हमेशा से तुम्हारे अन्दर की कमी को जानता था , और मैंने उसका लाभ उठाया . मैंने तुम्हारे तरफ वाले रास्ते पर रंग -बिरंगे फूलों के बीज बो दिए थे , तुम रोज़ थोडा-थोडा कर के उन्हें सींचते रहे और पूरे रास्ते को इतना खूबसूरत बना दिया .

आज तुम्हारी वजह से ही मैं इन फूलों को भगवान को अर्पित कर पाता हूँ और अपना घर सुन्दर बना पाता हूँ . तुम्ही सोचो अगर तुम जैसे हो वैसे नहीं होते तो भला क्या मैं ये सब कुछ कर पाता ?”

दोस्तों हम सभी के अन्दर कोई ना कोई कमी होती है , पर यही कमियां हमें अनोखा बनाती हैं .
उस किसान की तरह हमें भी हर किसी को वो जैसा है वैसे ही स्वीकारना चाहिए और उसकी अच्छाई की तरफ ध्यान देना चाहिए, और जब हम ऐसा करेंगे तब “फूटा घड़ा” भी “अच्छे घड़े” से मूल्यवान हो जायेगा.

लाल सलाम कामरेड



कामरेड को पूंजी से सख्त नफ़रत है और वो परिग्रह, पूंजी, जमीन जायदाद के भी खिलाफ है .....................
परन्तु कामरेड को दोस्त ऐसे चाहिए जिनके पास.....
1) कार हो जो कामरेड को घूमा फिरा दें
2) शराब की पार्टियां दे सकें
3) कॉफ़ी हाउस में नियमित ले जा सकें
4) गाहे-बगाहे उधार दे सके और कामरेड लेकर भूल जाएँ
5) हमेशा अपने खर्च पर घूमने फिरने ले जाए
6) दोस्तों की नौकरी ऐसी रुतबे वाली हो कि फटीचर कामरेड की चल निकले
7) कामरेड किसी भी दोस्त पर जूँ और पिस्सू की तरह से चिपककर शोषण कर सके
8) किसी खटमल सा खून पी सके अपने दोस्तों का
9) कामरेड की कविता पाठ कहानी पाठ का खर्च दोस्त उठायें
10) कामरेड की घटिया किताबों को दोस्त बेचें और खरीदें
11) कामरेड पूंजी को गाली दें शादी ब्याह को और समाज को गाली दें पर यही सब उसे महान बनाए और तोकते फिरे हर जगह कि तुम महान हो समर्पित कामरेड
12) कामरेड के बच्चों की फीस यही पूंजी वाले दोस्त भर दें
13) कामरेड की सिगरेट और दारु का खर्च अमीर दोस्त उठाये
14) कामरेड बीमार हो तो दोस्त तीमारदारी करें
15) कामरेड कही से मारकर कुछ भी लिख दें दोस्त लोग प्रशंसा करें
16) और अंत में कामरेड दोस्तों को कुछ ना बताएं और दोस्तों के पैजामे की नाडी का रंग भी जानने की जिज्ञासा रखें
लिस्ट बहुत लम्बी है, कामरेड सही है - साले पूंजीपति दोस्त हरामखोर होते है , और कामरेड हमेशा सही होते है. वे बुद्धिजीवी होते है और फ़ालतू कामों में, दुनियादारी में अपना जीवन बर्बाद नहीं करते, नहीं करना चाहिए.......आईये कार्ल मार्क्स जिंदाबाद बोले, आईये मजदूर एकता जिंदाबाद बोलें, आईये दुनियाभर के पूंजीपतियों को धिक्कारें और दुत्कारें.
L

Sunday, September 14, 2014

मित्र के साथ बगैर किसी स्वार्थ के लम्बी बातचीत - शुक्रिया रत्नदीप.








बड़े दिनों बाद एक शाम खुशनुमा हुई और खूब बातें की, देवास में शायद ही ऐसी कोई शाम बीती हो कभी . असल में अब दिक्कत यह हो गयी है कि कोई फोन करता है तो कहता है कि मिलना है तो काम के अलावा कुछ नहीं कहता - मसलन नौकरी लगवा दो, फलां सुनील भाई से आपकी दोस्ती है तो वहाँ नौकरी का जुगाड़ करवा दो, रिज्यूम भेज देता हूँ, एनजीओ के प्रोजेक्ट्स लिख दो या फंड दिलवा दो, भाई को कही लगवा दो, कुछ उधार मिल जाएगा क्या, वो एक अखबार के लिए कुछ लिखा था उसे ठीक कर दो, अनुवाद करवाना था, एक पार्टी दे दो दारु की, कवितायें लिखी है छपवाना है किसी जगह छपवा दो, या कुछ और अजीब तरह के काम बताकर लोग, तथाकथित दोस्त लोग मिलना चाहते है.

ग्लोबल होती दुनिया में छोटे कस्बों के लोगों के एक्सपोजर बड़े हो गए है जाहिर है उम्मीदें भी बड़ी और माशा अल्लाह ज्यादा ही बड़ी हो गयी है, और मै ठहरा छोटा आदमी और गैर संपर्कों वाला, ना सिफारिश करता हूँ, ना पसंद करता हूँ कि सिफारिश बन जाऊं. लोग दोस्ती रिश्तों को दुहना चाहते है और यदि आप उनके काम के नहीं तो दूध में से मख्खी की तरह से निकाल फेकेंगे और पीठ पीछे ना जाने क्या क्या बात करेंगे साहित्य हो या समाज सेवा पत्रकारिता हो या रिश्तेदारी, बस इसी सब के चलते अब मिलना जुलना कम कर दिया है और सोच रहा हूँ बंद कर दूं फ़ालतू समय बर्बाद करने से अच्छा है कि मुंह ढाक कर सो जाओ थोड़ा आराम कर लो.

इस सबके बीच एक युवा उद्यमी और उत्साही साथी, मित्र के साथ बगैर किसी स्वार्थ के लम्बी बातचीत, गर्मागर्म कॉफ़ी और ऐसे ही लगातार मिलते रहने का वादा लिए जब यह शाम गुज़री तो यकीन ही नहीं हुआ कि ऐसा भी हो सकता है.

शुक्रिया रत्नदीप. Ratnadeep Shastri

Saturday, September 13, 2014

"शीशा" डा जय नारायण त्रिपाठी की कहानी

"शीशा" बहुत अच्छी कहानी है आदमी के लगातार एकल हो जाने की जो और कही नहीं पर शीशे में अपने लिए योग के मायने तलाश रहा है, और फिर धीरे धीरे तर्क और जीवन के विकल्प खोजता है........और सनकीपन में उसे लगता है कि अब कुछ नहीं शेष है.......बस इसी सबमे वह खोजता रहता है और एक दिन अचानक चुपचाप से समा जाता है उस वीरान शीशे में...

डा जय नारायण त्रिपाठी आई आई टी मुम्बई से पी एच डी है, फेसबुक पर लगातार सक्रीय और लेखन पठन पाठन में बेहद रूचि. इन दिनों नोएडा में शोध और विकास में व्यस्त कम्पनी में वरिष्ठ शोधार्थी के रूप में कार्यरत है. बहुत प्रतिभाशाली और संवेदनशील जय एक युवा और समर्थवान कहानीकार बनने के लिए तत्पर है. 

अशेष शुभकामनाएं.

Jai Narayan Tripathi








"शीशा"


हर रोज़ की तरह आज भी उनका दरवाज़ा बंद था। मैंने खटखटाया तो बंद कमरे से ही हुँकार भर के आने का इशारा कर दिया। यह रोज़ का क्रम था। शाम के भोजन के बाद टहलने जाना हमारी दिनचर्या का अहम अंग हो चुका था। यह शुरु कब से हुआ इसके बारे में स्पष्टतः कह पाना मुश्किल था। हुआ यूँ था कि एक बार वे मुझे रायपुर रोड़ पर मिल गये थे। मेरा भोजन के बाद कुछ देर घूमने जाने का नियम कई वर्षों से जारी था। चूँकि वे उस दिन सहसा मिल गये और आँखों के संपर्क के बाद 'इग्नोर' नहीं किया जा सकता था| नतीजतन उन्हें भी शिष्टाचार के तौर पर मुस्कुराना पड़ा। वैसे भी मकानमालिक को 'इग्नोर' करने में विशेष लाभ नहीं है। महीने में एक बार तो मिलना ही पड़ता है। मेरे घर में और घर के आसपास के किसी भी घर में किसी भी जीवित प्राणी से उनका संपर्क न के बराबर था। मैं एक अपवाद था, वो भी उस 'अनइग्नोरेबल' मुलाक़ात के कारण। उनके कमरे में उनके अलावा किसी ने किसी को कभी आते जाते नहीं देखा था। ख़ैर, मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं थी क्योंकि वो किराया महीने में बाक़ी किरायेदारों से पहले देते थे। उस दिन अचानक मिल जाने के बाद मैंने उन्हें रोज़ साथ घूमने चलने का प्रस्ताव दिया था जो उन्होंने मेरी आशा के विपरीत मान भी लिया था। लेकिन हमारा संपर्क सिर्फ़ उस समय तक ही रहता था। बाक़ी समय मेरा 'ओहदा' भी अन्य सभी की तरह ही था। मैंने भी अन्य लोगों की तरह उनके कमरे में जाने की जुर्रत नहीं की थी। उनके कमरे में (जो कि मेरे घर में था!) उनके अलावा किसी भी और का जाना वर्जित था। ख़ास तौर से झाड़ू पोंछा करने वाले 'मामीसा' के ग़लती से एक बार घुस जाने के बाद हुए घटनाक्रम के बाद तो कोई स्वयं जाने का इच्छुक नहीं था। दरअसल वो भूल गयी थी कि कमरे में नये किरायेदार आये हैं| रोज़ की तरह बिना पूछे वो अंदर घुस गयी थी। ये बात उन्होंने कमरा किराये पर लेने से पहले जोर देकर कही थी कि उनके कमरे में कोई नहीं आना चाहिए| उनका व्यक्तित्व औरों से कुछ अलग था। घंटो घंटों तक कमरे से नहीं निकलते थे। छुट्टी के दिन भी पूरा समय कमरे में ही गुज़ारते थे।  उत्सुकता की बात ये थी कि कमरे में ऐसा कुछ नहीं था जो उसे बाक़ी कमरों से विशिष्ट बनाता हो या उसमें अकेले इतना समय गुज़ारा जा सके। बस एक बड़ा सा शीशा था जो कि सामान्यतः घरों में नहीं पाया जाता है। इसकी पुष्टि मामीसा ने भी की थी। मैंने भी दो तीन बार ही उनका कमरा अधखुला देखा था वो भी सिर्फ़ उतने समय के लिये जितने समय में अंदर से बाहर और बाहर से अंदर जाया जा सकता है। कुल मिलाकर उनका कमरा और वो शीशा लोगों की जिज्ञासा के केंद्र थे। पिछले कई महीनों से साथ में घूमने पर भी मैंने इस विषय में कभी बात नहीं की थी। वैसे भी वो पूरे रास्ते भर में इक्की दुक्की बात ही करते थे।

आज की शाम कुछ अलग नहीं थी। आज भी मुझे अॉफ़िस से आते हुए सब्ज़ी लेने जाना था और आज भी खाना खाने के बाद मुझे एसिडिटी होनी थी। पर आज की शाम कुछ अर्थों में विशेष थी। हमेशा गंभीर रहने वाले व्यक्ति के चेहरे पे आज मुस्कुराहट थी। आज शाम उनका व्यवहार कुछ अलग था। चेहरा हल्की ख़ुशी को छिपाने के प्रयास को छिपा नहीं पा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कुछ पा लिया हो एक लंबी प्रतीक्षा के बाद। चलते चलते हम आधा रास्ता भी नहीं पहुँचे थे। 
"अच्छा एक बात पूछना चाहता हूँ। कई दिनों से जिज्ञासा थी।"
"हाँ। पूछिये।" यह उनके अच्छे मूड का परिणाम था।
"आपके कमरे में वो जो शीशा है वो इतना बड़ा क्यों है?" वो चुप हो गये जैसे अनपेक्षित प्रश्न पूछ लिया गया हो। थोड़ी देर रुक कर उन्होंने बिना जवाब दिये चलना जारी रखा।
"वैसे ही पूछ रहा था। इतने बड़े शीशों की घरों में सामान्यतः ज़रूरत नहीं होती है। और आप तो वैसे भी अकेले आदमी है।"
"वो शीशा अलग है। उस शीशे से मैं योग करता हूँ।"
"शीशे से योग?" मैंने चौंककर पूछा। "ऐसा कैसे? कभी सुना नहीं।" मैं आश्चर्यमिश्रित कौतूहल की स्थिति में था। 
"हाँ। शीशे से।" उन्होंने इतनी सहजता से कहा कि मुझे अपने अज्ञान पे कोई अविश्वास नहीं हुआ। वैसे भी मुझे अध्यात्म में रुचि न के बराबर थी। हाँ, योग की शारीरिक क्रियाओं से में थोड़ा परिचित था टी.वी. के कारण। 
"शीशे से आपका मतलब उसी शीशे से है ना जिसमें हम बाल बनाते है?" मैंने वार्तालाप में अपने ज्ञान के स्तर के स्पष्ट हो जाने की चिंता के बग़ैर पूछा।
"जी। वही शीशा।" उन्होंने मेरे 'सिली क्वेश्यन' का जवाब उस तरह दिया जैसे एम​.ए.(हिंदी साहित्य​) के द्वितीय वर्ष के विद्यार्थी से किसी ने सूर्य के तीन पर्यायवाची पूछ लिये हो।
"लेकिन कैसे? मुझे कुछ समझ में नहीं आया।" मेरी अधीरता बढ़ती जा रही थी। 
"योग क्या होता है? ज़रा बताइये।" फ़्लिप-फ़्लॉप की तरह प्रश्न पूछने वाले और उत्तर देने वाले एकदम से बदल चुके थे।
"वो .. वो जो टीवी में ... मुझे भी आता है कपाल-भाति !" मैंने आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया। हालाँकि मेरा क्षणिक आत्मविश्वास उन कॉर्पोरेट मैनेजर्स की तरह था जिनका करियर ताउम्र 'जार्गन्स' पर जीवित रहता है। कपाल भाँति मैंने कभी भी नहीं किया था।
"नहीं।" उनकी मुस्कुराहट ने उनके भावों को शब्दों से ज़्यादा अच्छे तरीके से संप्रेषित कर दिया था। "वो योग का एक छोटा सा हिस्सा है। योग का अर्थ काफ़ी वृहद है।" मेरे अग्यान () का स्तर स्पष्ट हो चुका था।
"योग का अर्थ होता है - मिलन, किसी में मिल जाना, या किसी को किसी में मिला लेना।" उन्होंने राजपाल एंड संस के शब्दकोश की तरह योग के कई अर्थ बता दिये। मैंने सिर्फ़ सिर हिला कर अपनी सहमति और जिज्ञासा प्रदर्शित की। "योग का मतलब है उस एक में मिल जाना"|
"किस एक में?" सहमत हो जाने के बावज़ूद भी मुझे ये परिभाषा संदर्भ में बैठती नज़र नहीं आ रही थी।
"हमारी चेतना एकत्व का एक भाग है। वस्तुत​: हम सभी एकक है।"
"वो कैसे?" मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया था फिर भी मैंने चेहरे का गांभीर्य बनाये रखा।
"हमारे अंदर जो आत्मा है वो उसी एक परमात्मा का अंश है। जैसे सागर और बूँद। सिर्फ़ मात्रा का फ़र्क है। बाहर हम अलग अलग हैं लेकिन चेतना के स्तर पर हम सभी एक हैं।" शब्दों और उनके अर्थ दोनों के हिसाब से गंभीरता बढ़ती जा रही थी|
"तो फिर योग क्या है?" मैंने चर्चा को मुख्यधारा में लाने की कोशिश की।
"अगर विज्ञान की भाषा में देखा जाये तो सभी पदार्थ या भौतिक वस्तुएँ ऊर्जा का ही रूप होती हैं। आइंस्टाईन ने जैसा बताया था E = mc^2. हम सभी के अंदर एक ऊर्जा है जो कि ब्रह्मांड़ की संपूर्ण ऊर्जा का एक भाग है। हमारी पृथक ऊर्जा को उस वृहद ऊर्जा में मिला देना ही योग है। आप जिन शारीरिक क्रियाओं की बात कर रहे थे वो इस दिशा में महज एक कदम है। योग के अन्य कई तरीके हैं।"
"पर योग के बीच में शीशा कहाँ से आ गया?"
"मैं शीशे से योग करता हूँ|"
"शीशे से योग! पर वो कैसे संभव है?"
"ध्यान के माध्यम से योग करना योग की एक प्रणाली है। मैं ध्यान के माध्यम से योग करता हूँ। शीशा उसमें मेरी मदद करता है|"
"ज़रा विस्तार से समझाइए|"
"योग के लिये चरम एकाग्रता की ज़रूरत होती है। एकाग्रता के अभ्यास के अलग अलग कई तरीके हो सकते हैं, उदाहरणस्वरूप किसी एक बिंदु पर एकटक देखते रहना जिसे त्राटक भी कहते हैं। लेकिन मैं शीशे से अपनी एकाग्रता बढ़ाता हूँ|"
"शीशे से एकाग्रता का क्या संबंध ?"
"शीशे में खुद को देखते रहना। यही मेरे लिये योग का अभ्यास है।"
"ऐसा कैसा अभ्यास?" ऐसी निरर्थक और उलूल जुलूल बातों के बाद मुझे उनके ज्ञान पे शक़ होने लगा था।
"देखिये। आप शीशे में ख़ुद को देखते है तो आपको कैसा लगता है? हर व्यक्ति ख़ुद को शीशे में सुंदर ही पाता है। इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति शीशे के सामने आकर स्वयं को कुरूप नहीं समझता। शीशा हमें आत्ममुग्ध बनाता है और यदि इस आत्ममुग्धता का सकारात्मक उपयोग किया जाये तो वो एकाग्रता बढ़ाने में सबसे अधिक उपयोगी है।"
"वो कैसे?" मैंने पूछा।
"शीशे के सामने खड़े हो कर स्वयं को निर्निमेष देखते रहना, इस प्रकार कि आप की  मंज़िल आप स्वयं हैं। लगातार देखते रहो। धीरे धीरे आप के आस पास की वस्तुएँ धुँधली होने लगेगी। फिर सिर्फ़ आपका चेहरा बचेगा। कुछ और देर बाद सिर्फ़ आँखें बचेगी जो किन्हीं आँखों को देख रही होगी। धीरे धीरे आप स्वयं को विलीन पायेंगे वातावरण में - एकदम भारहीन। तब योग शुरु होगा। एक ऐसा योग जो आपको पूरे ब्रह्मांड़ में मिला देगा। हवा की तरह घोल देगा।" 
मुझे शुरुआत में उनकी मानसिक स्थिति को लेकर जो थोड़ा संशय था वो अब विश्वास में बदल चुका था|
"तो आप ऐसा योग कर पाते हैं?"
"हाँ बिल्कुल। मैं हमेशा कई घंटों तक ऐसा करता हूँ।"
"फिर क्या होता है।"
"ये आध्यात्मिक क्रियाएँ बहुत धैर्य माँगती हैं। अधीरता से तो पाया हुआ भी खो  जाता है।"
"लेकिन आपने कहा था कि योग का लक्ष्य है किसी में मिल जाना। यहाँ क्या है मिलने को।"
"यहाँ शीशा है जो मुझे ख़ुद का स्वरूप दिखाने में मदद कर रहा है। मेरा प्रतिबिंब भी छलावा नहीं है। उसका भी अस्तित्व है जो मेरी मदद करता है ख़ुद को ख़ुद तक पहुँचाने के प्रयास में।"
"लेकिन आपके इस योग का चरम बिंदु क्या है?" मेरे इस प्रश्न के बाद वो ज़रा चुप हो गये।
"चरम बिंदु है ... इतना अधिक एकाग्र हो जाना कि मेरे प्रतिबिंब और मुझमें कोई फ़र्क ना रहे। मेरा प्रतिबिंब, मेरा सहायक, जितना मैं उससे दूर होता हूँ उतना ही मुझसे दूर हो जाता है और जितना मैं उसके पास जाऊँ वो उतना पास आ जाता है। वो प्रतिबिंब सत्य की तरह है, जितना उसे जानने की दिशा में आगे बढ़ो उतना स्पष्ट होता जाता है। मुझे सत्य को पाना है। इतना अधिक एकाग्र होना है कि उस से योग हो जाये। शीशे में समा जाना है।" वो चुप हो गये थे पर उनके चेहरे की अधीरता 
अब भी बोल रही थी। 
"लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है!"
"सूक्ष्म दुनिया में कुछ भी हो सकता है। मीरा भी तो कृष्ण की मूर्ति में समा गयी थी। कृष्ण ही उनके लिये सब कुछ थे। प्रेमी, स्वामी ... मीरा के प्रतिबिंब जो मीरा को पुकारते रहते थे उसे ख़ुद में समा लेने को। मुझे भी कोई बुला रहा है।"
हम काफ़ी दूर निकल चुके थे। सामान्यत​: हम काॅटन मिल से मुड़ जाते थे, लेकिन आज बातों में कुछ पता नहीं चला।
"हमें लौटना चाहिये। घर पहुँचते काफ़ी देर हो जायेगी।" उन्होने कहा।
मैं विचारों और सूचनाओं के बोझ तले दब गया था और फलत​: एक एक कदम मुश्किल से चल पा रहा था| पूरे रास्ते सिर्फ़ यही सोच रहा था कि ये क्या चल रहा था! लगा आज रात नींद नहीं आयेगी। 

रात की बातों को मैं बेतुके सपनों की तरह भूल चुका था| वैसे भी एक व्यस्त सुबह साथ में हो तो फिर से रात के लिये जगह लिहाज़ा शाम तक तो नहीं हो पाती है। फिर आज तो सुबह पानी भी आया था*, जो कि हमारे इलाके के लोगों के नियमित जीवन की सबसे महत्वपूर्ण परिघटना होती है| घड़ी ने मेरे नहीं चाहते हुए भी समय से थोड़ा पहले ही नौ बजा दिये थे। मुझे खाना खा कर​ आधे घंटे में अॉफ़िस पहुँचना था| आज वो उठे नहीं थे अब तक। पानी के वक़्त भी सुबह ७ बजे दरवाज़ा खटखटाया तब भी नहीं खोला था। अख़बार भी अब तक कमरे के बाहर ही पड़ा था| हो सकता हो थके हो! लेकिन फिर भी इतनी देरी से वो कभी नहीं उठते थे! मुझे अचानक से रात वाली घटना याद आयी। सारी बातचीत मेरे दिमाग में घूमने लगी, हालाँकि फिर भी मैंने उसका ज़िक्र किसी से करना उचित नहीं समझा। 

बहुत देर तक खटखटाने पर भी कोई आवाज़ नहीं आई। इतने में आस-पड़ोस के लोग भी इकट्ठे हो चुके थे। रोशनदान से झाँकने की कोशिश की गयी। हालाँकि रोशनदान से कमरे का हर कोना नज़र नहीं आ रहा था पर ये सुनिश्चित हो गया था कि पंखे से कोई रस्सी नहीं लटकी है। दरवाज़ा पीटने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो लोगों ने अनहोनी की आशंका जताते हुए दरवाज़ा तोड़ने का निश्चय किया| दायाँ दरवाज़ा धम्म से गिरा, और बायाँ आधा हवा में था आधा बारसोद से अटका हुआ था| बाक़ी लोगों को बाहर ही रुकने का इशारा करते हुए मैं झटके से अंदर दाख़िल हुआ। बिस्तर खाली था! चादर की तहें जमी हुई थी, तकिया भी अपनी जगह था। मैंने चारों और नज़रे दौड़ाई| इधर उधर देखा, पलंग के नीचे भी| कमरे में सिर्फ़ एक मटकी, ताकों में बिछे अख़बारों पे पड़े कुछ कपड़े, किताबों की छोटी अलमारी, और एक बड़ा सा शीशा था| कमरे में स्थिरता और नीरवता थी| मैं फिर से पीछे मुड़ा। सामने सिर्फ़ शीशा था| एकदम साफ़ और अविचलित, जैसे सालों से ऐसा ऐसा का ऐसा हो| कुछ पल को उस के सामने ठहर सा गया| कुछ लोग कमरे में घुसे और धीमी आवाज़ों में कुछ पूछने लगे। मेरा ध्यान शीशे से हटा। मुझे उनके प्रश्नों में कोई दिलचस्पी नहीं थी| फिर से शीशे की और एकटक देखने लगा| आवाज़े मद्धम होती जा रही थी| मैं कुछ देखने की कोशिश कर रहा था| पहली बार शायद ख़ुद को शीशे में देख पा रहा था।


Tuesday, September 9, 2014

शुक्रवार और बिंदिया को श्रद्धांजलि



हिन्दी का खेमा इतना ज्यादा बंटा हुआ है कि इसमे कोई मरे या जिए, किसी को फर्क नहीं पड़ता. देश में अच्छी पत्रिकाएं लगातार बंद होती गयी. सारिका, गंगा, धर्मयुग से लेकर अब बिंदिया और शुक्रवार और कही कोई अफसोस, धरना और प्रदर्शन नहीं, ना ही कोई सांत्वना के दो शब्द . 

इस बीच चतुर सुजानों ने धंधा बनाकर जरुर अपने अपने अखाड़े की पत्रिकाएं चलाकर/बनाकर चालू कर दी और विशुद्ध मुनाफा कमा रहे है जो कि गलत नहीं है. यह इस बात का भी संकेत  है कि अब पत्रिकाएं भोले भाले लोग, साहित्य और सरोकारी पत्रकारिता वाले लोग, मुद्दों की समझ रखने वाले लोग या विशुद्ध नौकरी करके बौद्धिक आतंक फैलाने वाले लोग नहीं चला सकते इसके लिये आपको नख दन्त विहीन लोगों से लेकर हर तरह के चालू पुर्जों तक को साधना होगा और पैतरेबाजी करते हुए भरपूर और भद्दे तरीके से मैदान में आना होगा कि आप विचारधारा, उत्तेजक, सनसनी और बाजारीकरण के बीच मार्केट की घटिया रणनीती को अपनाकर अपनी पत्रिका बेचेंगे एकदम नंगई से. 

पहले कारण के अलावा अगर हम देखे तो पायेंगे कि दूसरा बड़ा मुद्दा है सामाजिक मीडिया ने इन पत्रिकाओं के असर पर प्रभाव डाला है नागरिक पत्रकारिता के दौर में इनकी विश्वसनीयता और देरी से प्रकाशन पर भी फर्क पड़ता है, तीसरा, लेखको का प्रकाशन में घुसना और व्यावसायिक हो जाना.  चौथा, आम लोगों का पत्रिकाओं को ना खरीदना - जहां वे वीक एंड पर हजार रूपये की दारु पी जाते है वहाँ दस रूपये की पत्रिका खरीदने में "रूपया वेस्ट" की थ्योरी अपनाते है जो कि भारतीय समाज में घातक है इसी के चलते एक विचारधारा, असहमति के खिलाफ आक्रोश और असहिष्णुता बढ़ी है, और जो पढ़े लिखे मूर्ख है उन्हें पूछ लो कि पढ़ा क्या तो शून्य के अलावा कुछ नहीं मिलेगा....... 

खैर, अब इस पर भी अपढ़ टिप्पणियाँ आयेंगी पर मेरी चिंता अब "शेष बची" पत्रिकाओं को लेकर है - चाहे साहित्य की हो या राजनैतिक सरोकार रखने वाली, और यह सिर्फ हिन्दी की बात नहीं, अंग्रेज़ी में भी कोई अच्छी स्थिति नहीं है. और अच्छे अखबार भी देखते देखते मर गए,  खप गए इतिहास के पन्नों पर और हम कुछ नहीं कर पायें. शुक्रवार और बिंदिया को श्रद्धांजलि देते हुए शेष बची मृत्यु शैया पर जूझ रही पत्रिकाओं के लिए आईये दुआ करें और कामना करें कि बाजारीकरण और धूर्तता से उभरी पत्रिकाओं के बीच हमारी विरासत वाली पत्रिकाएं ज़िंदा रहे और अपनी पैठ इन सब चोरों के बीच बनाकर चलें. आमीन.....!!!

स्मृतियो के दंश और परिवेश से रची कहानियां : देवनाथ द्विवेदी का रचना संसार “और जीने का मोह”



पुस्तक चर्चा:-

स्मृतियो के दंश और परिवेश से रची कहानियां

देवनाथ द्विवेदी का रचना संसार “और जीने का मोह”

“कहानियां हवा में नहीं बना करती, उनका पौधा किसी ठोस जमीन पर खडा होता है, कहानी की जड़े किसी सच से पोषण खींचती है, बाद में उसकी शाखों, पत्तियों, कलियों और फूलों के कल्पना के रंग भी शामिल हो सकते है..” देवनाथ द्विवेदी हिन्दी में वरिष्ठ कहानीकार है और पिछले तीन दशको से कहानी छंद कविता में सक्रीय है, इनकी कहानियां देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में आ चुकी है और वे लगातार सक्रीय रहकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहते है. कहानी, कविता, यात्रा वृतांत और स्मृति चित्र शैली में लेखन के लिए द्विवेदी जाने जाते है, एक अच्छे कहानीकार होने के नाते वे अपने परिवेश को बखूबी जानते है और यह सब वे अपने पात्रों और रचनाओं में बहुत बारीकी से दर्ज करते है. असल में जिस तरह की पीढी का प्रतिनिधित्व देवनाथ जी करते है वह पीढी अनुशासन मूल्यों, गाँव और देहात की बसाहट के मोह में अभी तक बंधी हुई है और यह कहानी में जब बातें उभरती है तो लगता है कि अपने परिवेश को, इस समय में जब ग्लोबल दुनिया ने लगभग तहस-नहस कर दिया है, इस तरह से देखना और बचाए रखने की जिम्मेदारी हम सबकी है. इस प्रक्रिया में ये कहानियां बहुत दूर तक जाकर रिश्तों, विलोपित होती स्मृतियों के झरोखे बहुत ही मुस्तैदी से खोलती है और समूची भावनाओं के साथ जिस कैनवास पर बात करती है वह थोड़ा अटपटा जरुर लगता है परन्तु आज के बिखराव में आवश्यक भी प्रतीत होता है.

“और जीने का मोह” देवनाथ द्विवेदी का पहला कहानी संकलन है जो दिल्ली के पंकज पुस्तक मंदिर से आया था सन २०१० में परन्तु इस पर चर्चा नहीं हुई, इस तरह से यह महत्वपूर्ण संग्रह चर्चा में आने से रह गया. इस संकलन में लगभग एक दर्जन कहानियां माध्यम और निम्न माध्यम वर्ग के चरित्रों को लेकर लिखी गयी है. कहानियों में घर है, परिवार है, रिश्ते नाते है और संबंधों के दरकने की दास्ताँ है, पति पत्नी के बीच से लेकर दादा नाना और डाक्टर मरीज के बीच बनते बिगड़ते संबंधों की जहाँ बारीक से बारीक विवरणों वाली कहानियां है वही सामाजिक ताने बाने पर प्रश्न उठाता लेखक है, जो बार बार समाज में बदलते परिवेश, मूल्यों और समीकरणों पर टिप्पणी भी करता है. कुल जमा बारह कहानियों में से अधिकाँश का फलक शिक्षा के परिसर से गुजरता है यह इसलिए भी लाजिमी है कि लेखक ने खुद अपनी जिन्दगी का बड़ा हिस्सा शिक्षा के गलियारों में गुजारा है और अभी भी सक्रियता से वो प्रयोग प्रशिक्षण और शैक्षिक लेखन में बराबार भागीदार है, जाहिर है शिक्षा तंत्र की विसंगतियां, उद्देश्य और उपलब्धियां सामने आनी ही थी. लेखक इन्हें बहुत बारीकी से पकड़ने की कोशिश करता है और दुखद स्वर में विदाई कहानी के बहाने से सामने रखता है. ‘गीली मिट्टी’ जैसे कहानी के बहाने से समाज में पाशविकता और बालमन की गुत्थियों को समझाने का प्रयास भी करता है जहां एक बुजुर्ग एक छोटी से बच्ची पर शारीरिक अत्याचार की कोशिश करता है. संगः की सभी कहानियां अपने साथ देशज शब्द, प्रवाह और सुद्रढ़ भाषा लेकर आती है, कहानी में कथ्य है, सन्देश है, मुहावरे और एक ऐसा परिवेश है जो ठेठ ग्रामीण पृष्ठभूमि को समझने में मदद करता है. अधिकांश कहानियां यहाँ वहाँ छपी है और इन पर गाहे बगाहे बात भी हुई है. देवनाथ जी भावनाओं को महत्त्व देते ही नहीं वरन अपने पात्रों से बदलते समय में अपने लिए एक जगह बनाने की भी पुरजोर मांग करते है. ये कहानियां एक ऐसे समाज के निर्माण की ओर रुख करती दिखाई देती है जो बहुत ज्यादा मूल्यपरक और सिद्धान्तनुमा जिन्दगी का ककहरा सिखाये. नौकरी में लम्बे समय तक शहर दर शहर की ख़ाक छानने के बाद और बड़े शहरों में रहने के बाद भी उनके अन्दर का गाँव मरता नहीं ना ही गुलबिया मरती है जिसकी टीस एक कहानी में दिखाई पड़ती है पर यहाँ वे समाज में महिला की स्थिति का भी जिक्र करते है कि किस तरह से पुरुषप्रधानता  समाज में एक महिला को दोयम दर्जे का बनाकर उसका समूचा अस्तित्व ख़त्म कर देती है. लेखक भावुक है एक ओर जहां यह पात्रों को न्याय दिलाता है, विसंगति दिखाकर अपनी बात कहता है, वही कही कही गलत बातों को लगता है थोपने की भी हरकत करते दिखाई देता है.

एक ओर लोग है, घटनाएँ है, स्मृतियाँ है, अनुभूतियाँ है, दूसरी ओर शब्द, कैनवास, भाव और सन्देश है जो लेखक अपने दीर्घकालिक अनुभवो के उपजे मन से पुरी शिद्दत से हम सबको देना चाहता है. लेखक सूक्ष्म रूप से लेकर स्थूल रूप तक हर जगह मौजुद है और यही कहानी को बहुत बारीक महीन विश्लेषण देता है. असल में कहानी में विवरण, घटनाएँ और संवाद का बैलेंस मुझे एक चुनौती हमेशा से लगता रहा है, प्रतीकों में कहना और कई बार बहुत लाउड होकर कहना भी सापेक्ष लगता है. अक्सर सारी गड़बड़ यहाँ से शुरू होती है जब लेखक कहानी में विवरण देने लगता है और भाषा में बिम्ब उभारकर अपनी बात कहने लगता है यह तब तक ही जस्टिफाई करता है जब तक पात्र को या घटना को पूर्ण रूपें न्यायोचित ना कर दें पर इस जिद में कई बार अनावश्यक विवरण आ जाते है जो कहानी को कही ख़त्म करते है. देवनाथ जी हालांकि इसमे पुरी सतर्कता जरुर बरतते दिखाई देते है पर पात्रों का मोह और घटनाओं में बारीकी से विवरण देने की कला में सिद्ध हस्त होने से वे कई बार चूक जाते है. यह चुनौती प्रेमचंद से लेकर हिन्दी के तमाम तरह के लेखकों में रही है. कमलेश्वर, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा से लेकर संजीव या ज्ञानरंजन के यहाँ भी विवरणों की भरमार है परन्तु ये विवरण खलते नहीं है क्योकि वे भाषा मुहावरों और शब्दों से ऐसे गुँथे हुए है कि उन्हें पढ़ना बोझिल नहीं लगता. कारण स्पष्ट लगता है कि हर कहानी के शायद कई पाठ कई ड्राफ्ट होते हो इसलिए भाषा में जो लय और चरंणबद्धता दिखती है  वह कहानी को अमर बनाती है. इस संग्रह में वह बार बार ड्राफ्ट करने का अभ्यास कम दिखाई देता है. कई बार लगता है कि कच्ची कहानियां भी लेखक अपने मोह के कारण छोड़ नहीं पाया और संग्रह में संकलित कर लिया, इससे बचा जा सकता था. इस संग्रह के बाद लेखक की लगभग बीस कहानियां और प्रकाशित हो चुकी है, यात्रा वृत्तांत “सफ़र जारी रहे” और “साँसों का संगीत” (2014) जैसे संकलन भी आ चुके है जहां लेखक नई परिपक्वता के साथ अपनी उपस्थिति सार्थक रूप से यह दर्ज कराता नजर आता है. उम्मीद की जाना चाहिए कि देवनाथ द्विवेदी जी की आने वाली कहानियां एक स्पष्ट विचारधारा और ख़त्म होते गाँव और रिश्तों के बीच से निकलकर  आयेंगी और मार्ग प्रशस्त करेंगी.

-संदीप नाईक

अगस्त 9, 2014. 

Monday, September 8, 2014

Blood Bank in Indore





एक दोस्त ने इंदौर में ब्लड काल सेंटर शुरू किया है . ये काल सेंटरAshok Nayak की कोशिशों का प्रतिफल है..खुदा ना करें मगर यदि आपको इंदौर में कभी खून की ज़रुरत पड़े या आप ब्लड डोनेट करना चाहे तो इन नम्बर्स पर संपर्क करें. 09200250000, 09827666866, 07316008090.

Monday, September 1, 2014

तारकोव्‍स्‍की की फिल्‍म- सुशोभित शक्तावत







मध्‍यकालीन रूस में क्‍लीश्‍मा नदी के किनारे व्‍लादीमीर नामक क़स्‍बे पर वर्ष 1408 के पतझड़ में जब तातार हमला बोल देते हैं और पूरी बसाहट का क़त्‍लेआम करने के साथ ही क़स्‍बे के कैथेड्रल को भी तहस-नहस कर देते हैं तो अंद्रोनिकोव मठ में देवताओं के चित्र बनाने वाला चित्रकार अंद्रेइ रूबल्‍योव इस सर्वनाश से विचलित होकर शपथ लेता है कि वह अब कोई चित्र नहीं बनाएगा और न ही एक शब्‍द भी बोलेगा।

अंद्रेइ रूबल्‍योव का कहना था कि नृशंसता और ध्‍वंस से भरी इस दुनिया में उसके चित्रों की जब किसी को ज़रूरत नहीं, तो फिर वह क्‍यों नाहक़ इसमें अपने प्राण खपाए?

लेकिन पंद्रह वर्षों बाद जब व्‍लादीमीर के कैथेड्रल में ही एक अबोध किशोर के नेतृत्‍व में हफ़्तों तक कड़ा परिश्रम करने के बाद ग्रामीण कांसे के पवित्र घंटे का निर्माण कर उसे गिरजे पर स्‍थापित करने में सफल रहते हैं और जब प्रार्थना जैसे आवेग से भरी घंटाध्‍वनि क़स्‍बे की हवाओं में तैरने लगती है तो रूबल्‍योव अपनी शपथ तोड़ देता है।


रूबल्‍योव अंतत: इस बात को समझ जाता है कि क्रूरता से भरी इस दुनिया में भी एक कलाकार को अपने हिस्‍से का गीत गाना होता है, इसलिए नहीं कि उसका गीत विलक्षण है, इसलिए भी नहीं कि उसका गीत दुनिया में रत्‍तीभर भी बदलाव कर सकता है, बल्कि इसलिए कि ईश्‍वर ने किन्‍हीं अज्ञात कारणों से यह पवित्र दायित्‍व उसे सौंपा है और उसे इसका निर्वाह करना ही होगा। ईश्‍वर के निर्देशों को सुनने वाले ऐसे किसी भी व्‍यक्‍ि‍त के लिए सफलता और प्रयोजनमूलकता जैसी किसी चीज़ का अस्तित्‍व नहीं रह जाता। उसकी प्रतिभा ही उसकी बलिवेदी होती है।
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[अंद्रेइ तारकोव्‍स्‍की ने अंद्रेइ रूबल्‍योव के जीवन पर फिल्‍म बनाई है। संभवत: उनकी सर्वश्रेष्‍ठ कृति। रूबल्‍योव ऐतिहासिक चरित्र था, लेकिन तारकोव्‍स्‍की की फिल्‍म आधी हक़ीक़त आधा फ़साना है और सनद रहे कि आधी हक़ीक़त पूरी हक़ीक़त से ज्‍़यादा भरोसेमंद होती है। तस्‍वीरें, तारकोव्‍स्‍की की फिल्‍म के विभिन्‍न दृश्‍य।]

-सुशोभित शक्तावत