Saturday, September 21, 2019

सन्डे हो या मंडे रोज़ खाओ अण्डे 20 Sept 2019

सन्डे हो या मंडे रोज़ खाओ अण्डे
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मध्यप्रदेश में कुपोषण एक स्थाई बीमारी है हर वर्ष लाखों बच्चे इसकी चपेट में आते हैं और मर भी जाते हैं
सरल भाषा में कुपोषण अर्थात उम्र के हिसाब से ऊंचाई में कमी या वजन में कमी और शरीर के साथ दिमाग़ का पूर्ण रूपेण विकसित ना होना और बच्चे बार बार बीमार पड़ते है और अंत में मर जाते है यानी कुल मिलाकर बच्चे जो हैं मौत के मुहाने पर हैं , उनके आहार में माइक्रो न्यूट्रिएंट्स देकर और साफ पानी एवं स्वस्थ आदतें विकसित कर हम इससे मुक्ति पा सकते है और यह हमने प्रदेश के 4 जिलों के 100 गांवों में किया है जहाँ आज एक भी बच्चा कुपोषित नही है
मध्यप्रदेश के आदिवासी ब्लॉक्स में स्थिति ज्यादा गंभीर है यहां पर पूर्ववर्ती सरकार ने किसी के कहने में आकर आंगनवाड़ियों में अंडा ना देने का निर्णय लिया था
हम सब जानते हैं कि अंडा प्रोटीन का श्रेष्ठ स्रोत है और यह आसानी से उपलब्ध भी है आदिवासी इलाकों में अंडा, मटन, मुर्गा, या मछली आदि खाने का परंपरागत रिवाज है वहां इन चीजों को लेकर कोई छुआछूत या पैमाने नहीं है, ना ही शुचिता है - फिर क्यों वर्तमान सरकार कुपोषण को मिटाने के लिए अंडा ना देने पर तुली हुई है
मध्यप्रदेश के कम से कम 89 ब्लॉक्स में जो पूर्णतया आदिवासी ब्लॉक है, में अंडा देने का आदेश जारी किया जाए - ताकि इन क्षेत्रों में कुपोषण को जड़ से मिटाया जा सके, इन क्षेत्रों के सांसद, विधायक और जनप्रतिनिधि सरकार पर, प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय कमलनाथ जी पर दबाव बनाए तो यह रणनीति कारगर होगी और बच्चों का स्वास्थ्य सुधरेगा
अभी मुझे डॉक्टर अशोक मर्सकोले जी , जो निवास, जिला मंडला के विधायक हैं, ने बताया कि कल वे एक कार्यक्रम में गए थे जहां विभिन्न प्रकार का पौष्टिक आहार गांव की महिलाओं ने बनाये थे और उनमें से एक अंडा भी था - किसी को भी असहज नहीं लगा और बच्चों ने बड़े चाव से खाया
अनुज डॉक्टर अशोक मर्सकोले, डॉक्टर हीरा अलावा जैसे हमारे पास उच्च शिक्षित डॉक्टर हैं जो क्रमशः जबलपुर मेडिकल कॉलेज और ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली से पढ़े हैं - ज्यादा बेहतर जानते हैं कि बच्चों को क्या पोषक आहार देना चाहिए, महिला बाल विकास की टेक्निकल टीम को ये मार्गदर्शन दे सकतें है, दोनों युवा विधायक है और कुछ करने का जज्बा भी रखते है
अच्छी बात यह है कि आज इन दोनों से बात की तो इन्होंने आश्वस्त किया है कि वे इस अभियान में मदद करेंगें

Thursday, September 19, 2019

Posts of II and III Week of Sept Bhopal Accident of 11 youths in Ganesh Visarjan

कुठियाला हो तो कोई विवि तीन करोड़ श्रेष्ठ विवि की लिस्ट में नही आएगा कभी
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माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल, का कुलपतित कुठियाला न पत्रकारिता पढ़ा था ना 20 साल का अनुभव था, न कभी उसने कुछ पढ़ाया फिर भी कुलपति बन गया इतना घोर फर्जीवाड़ा जिस सरकार ने किया हो वह सरकार उम्मीद करती है कि भारत के विश्वविद्यालय दुनिया के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक होंगे
आप सोचिए कि शिवराज सरकार ने सारे नियमों को ताक पर रखकर इसकी नियुक्ति की - जिस आदमी ने अपने चेंबर में शराब का बार बना रखा हो और अनाप-शनाप खर्च किए हो, स्टडी सेंटर के नाम पर बंदरबांट की हो और अयोग्य और घोर अपढ़ व्यक्तियों को नियुक्त किया हो उस आदमी का क्या किया जाना चाहिए
अपने सरकारी दौरों में शराब पीने के विवि फण्ड से भुगतान किये, फिश एक्वेरियम घर ले गया - कितना नीच और घटिया होगा ये - क्या इनका शिक्षाविद यही है - जगसिरमौर बनाने की संस्कृति , इसलिए देशभर में "अम्ब विमल मति दें" जैसी पवित्र प्रार्थना गाते है कि इस तरह के लोगों से बल मिलेगा सारे कथित पापों को
अफसोस यह है कि बहुत सारे मित्र वहाँ प्राध्यापक है पर वे भी चुप रहें और कुछ ना बोलें, शर्म आना चाहिए इन लोगों को अपने को प्राध्यापक कहते जो 15 वर्ष तक एक निहायत नीच और पतित आदमी का साथ देते रहें - यहां फेसबुक पर ज्ञान, जनसरोकार और अपने छात्रों के साथ खुद को स्वयंभू आदर्श बनाते नही अघाते और एक नीच व्यक्ति के पापों में सहभागी बनकर सद्कार्य करते रहें - यह ज्यादा पीड़ादायी है, आप लोग ना शिक्षक हो ना पत्रकारिता के जानकार - आप भी उतने ही भ्रष्ट और पतित हो जितना यह कुठियाला है , किसी को टैग नही कर रहा पर आप लोगों की इज्जत मेरी नज़र में रही नही और शर्म आती है कि रिटायर्ड होकर , सारी सुविधाएं भकोसकर नर्मदा आंदोलन या मानवता के गुणगान गाते हुए आप लोग यहां नैतिकता की मूरत बनें हुए है या अभी भी रीढ़हीन होकर चुप है - अफसोस कि आपके ही छात्र ये न्यूज लिखकर आपको आईना भी दिखा रहें है और आपका झूठा सम्मान भी कर रहें है - छि और थू - अपराध करने वालों के साथ शामिल थे आप भी
पिछले 15 सालों में बहुत ही कम ढंग के प्रोडक्ट इस विश्वविद्यालय से निकले हैं - बाकी तो बंदरों की जमात है अफसोस कि माखनलाल चतुर्वेदी के नाम पर बना राष्ट्रीय विश्वविद्यालय आज अपने कलंक धो नहीं पा रहा
इस तरह के लोगों को या तो फांसी हो या सड़क पर जनता के हवाले छोड़ दिया जाये ताकि फिर कोई कुलपति इतनी हिम्मत ना करें
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प्रोफेसर जेड ए सैय्यद जो हमारे मित्र सैयद सादिक अली और भाई जाकिर के पिताजी थे, का आज दुखद निधन हो गया
सैय्यद साहब हमारे समय भूगोल विभाग के अध्यक्ष थे के पी कॉलेज में और बहुत ही सहज व्यक्ति थे - पिछले वर्ष जब मैंने लॉ महाविद्यालय में प्रवेश लिया तो मुझे तत्कालीन प्राचार्य डॉक्टर रहमान ने बताया कि सैय्यद साहब भी लॉ पढ़ रहे हैं, 85 वर्ष की उम्र में वे महाविद्यालय में आते थे कभी-कभी और कक्षाएं अटेंड करते थे , कॉलेज में बहुत ही युवा प्राध्यापक पढ़ाते थे और उनसे वे छात्र के रूप में सीखते थे, ये उनका लॉ का अंतिम वर्ष था
प्रोफेसर सैय्यद अपने समय में भूगोल के विद्वान पर रहे और लंबे समय तक उन्होंने अकादमिक शोध और भूगोल के क्षेत्र में बड़े काम किए, उनका जाना एक बड़ी क्षति है
सादिक और जाकिर तथा समस्त परिवार के लिए प्रार्थनाएँ , प्रोफेसर सैय्यद को हार्दिक श्रद्धांजलि
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दुनिया के सबसे ज़्यादा युवा वाले देश के मूर्ख और कठपुतली बने 55 % युवा
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भोपाल में गणेश विसर्जन के दौरान 11 युवाओं की मौत और फिर भी जुलूस निकले ढोल और डीजे के साथ , देशभर के आंकड़े 40 पार है - बताईये कोई तार्किकता है इन मौतों की
सरकार ने हमारे मेहनत के रुपयों को फिर ख़ैरात के रूप में बांटा 11 - 11 लाख का भंडारा - क्यों इस पर कोई सवाल नही कर रहा , मेरी बला से 1000 मरें जब उन्होंने धर्म की अफीम चाट रखी है, अपनी पारिवारिक या व्यक्तिगत जिम्मेदारी नही समझ कर मन्दिर मस्जिद के इशारों पर चलने वालों को पब्लिक ट्रस्ट से एक रुपया नही देना चाहिए, कमलनाथ सरकार की यह नीति बहुत ही घातक और घटिया है - जो लोग एक रुपया ना कमाकर चंदे के रुपयों से उत्सवों के नाम धींगा मस्ती और डीजे पर अश्लील नाच गाना करके समाज का जीवन नरक बना रहे है उन्हें और उनके परिवारों को सज़ा दी जाना चाहिए
क्या ये पढ़े लिखें गंवार सुधरेंगे - कभी नही, क्योकि गलती हमारी है सरकारों की है , 73 वर्षों में हमने उन्हें रोजगार देने के बजाय हमने धर्म की अफीम चटाई है
कांवड़िये हो या राम मन्दिर के झंडा उठाउँ या गणेश पंडाल के ये युवा तुर्क या या हुसैन कहकर सड़कों पर खून बहाने वाले युवा सबका दिमाग़ धार्मिक गुरुओं ने खराब कर रखा है
कुछ उपाय जो दिमाग़ में आ रहें है -
● अभी दुर्गा पूजा आने वाली है डीजे ढोल और बैंड वालों को ही कसा जाएं उनके उपकरण और साधन जप्त कर लिए जाएं
● मूर्ति बनाने वालों को ही निगरानी में रखा जाएं, ऊंचाई और आकार के स्पष्ट निर्देश हो एक SOP बनाई जाए
● समाज 11 या 51 रुपये से ज्यादा चंदा ना दें
● नगर निगम बिजली विभाग अपने कर कड़ाई से वसूले जगह और बिजली के
● सुबह और शाम आरती के बाद बिजली काट दी जाएं ताकि शोरगुल हो ही ना
● लाइटिंग से लेकर होर्डिंग, झंडे पताकें लगाने पर कड़ा प्रतिबंध हो
● ये प्रावधान तोड़ने वालों की मूर्ति जब्त कर ली जाए फिर वो मोहर्रम का ताजिया हो या गणेश की मूरत
अभी सड़कों पर जुलूस डीजे का ये हाल है कि गणेश उत्सव, मोहर्रम, डोल ग्यारस, दुर्गाउत्सव, पर्युषण, गुरु पर्व , तेजाजी, गोगादेव, आशाराम का जन्मदिन या क्रिसमस के जुलूस ने ट्राफिक का तो कबाड़ा कर रखा है और अश्लील भौंडे नाच और कानफोड़ू गानों से रात रात भर सो नही पा रहे लोग यह अब बारहों मासों का रोना है
अभी 5 सितंबर को हिंदी के वरिष्ठ कवि डाक्टर ओम प्रभाकर जी के घर गए थे - वो गम्भीर बीमार हो गए है - घर के ठीक पास मन्दिर के भोंपू से उनका जीवन नरक बन गया है , 24 घँटों भोंगे बजते रहते है भागवत, आरती और ना जाने क्या क्या - कई बार मैंने भी अपने यहां की समस्या को लेकर कोतवाली में फोन किया तो जवाब मिला कि बर्दाश्त करिये हम कुछ नही कर सकते
अजान हो या भजन - भारत मे नरक बन गया है जीवन और हमारे युवा जान दे देंगे पर मूर्खता नही छोड़ेंगे , अपना समय और जीवन ऐसे लोगों के बहकावे में आकर बर्बाद कर रहे है जो खुद मूर्खता की हदें पार कर चुके है दो कौड़ी की अक्ल के साथ
अभी दुर्गा उत्सव में 15 - 20 दिन है - क्या कोई प्रशासनिक या सामाजिक पहल हो सकती है
बहुत मन है कि मरने के पहले देशभर के इन 55% युवाओं को अपनी नौकरी, शिक्षा और बेहतर जिंदगी के लिए , परिवार, बूढ़े माँ - बाप और देश के लिए "संसद भवन , रायसीना हिल्स और नार्थ / साउथ ब्लॉक्स" को घेरकर समस्या निवारण तक डटे रहते हुए देखूँ पर यह सम्भव नही लगता इस जन्म में क्योकि हम कुतर्की है बजाय तार्किक होने के
या बन्द कर दो स्कूल कॉलेज, IITs , IIMs , और सब जो इन्हें जहर परोस रहें है
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हम करें राष्ट्र आराधन
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एक ओर चाँद पर चंद्रयान, 104 उपग्रह छोड़ना
दूसरी ओर
न्यूटन, ग्रेविटी, मोर के आंसुओं से बच्चा, महाभारत काल मे इंटरनेट, कर्ण के समान पैदा होने / करने की तकनीक, बत्तख, गाय और ऑक्सीजन - मतलब दुनिया में ना इतने एक्ट्रीम पर रहने वाले मूर्ख ना कोई थे, ना है और ना होंगे
कम से कम चरक या सुश्रुत को ही याद कर लेते, पतंजलि को ही याद कर लेते, पण्डिता रमा बाई को ही याद कर लेते या गार्गी को ही याद कर लेते
गैलीलियो को जो चर्च ने सज़ा दी या ब्रूनो को जलाया या चर्च के आधिपत्य को ना मानने वालों के साथ अमानवीय व्यवहार किया वह कोई गलत नही था - सत्ता जब मूर्ख, उजबक, अपढ़ और अनपढ़ों के हाथ मे होती है तो वे सिर्फ ज्ञान का ही सत्यानाश नही करते बल्कि पूरी पीढ़ियों को बिगाड़ते है
यह सिर्फ इस सरकार की बात नही विप्लव देव या केंद्रीय मंत्री उदाहरण नही बल्कि यह एक श्रृंखलाबद्ध सुनियोजित कार्यक्रम और संगठन कृत दुष्प्रचार का हिस्सा है इसी देश मे हम गोबर गणेशों ने गणेश की मूरत को दूध पिलाया है और वैज्ञानिकता को धता बताई है - याद है उस समय स्व प्रो यशपाल ने कितना लिखा , समझाया था पर हम तो धर्म भीरू और भेड़ है
अभी साढ़े चार साल बाकी है इंतज़ार कीजिये ये महामना क्या क्या परिकल्पनाएँ स्थापित करते है और विलक्षणता की ऊंचाइयों को छूते है - एक ओर दुनिया भर में ज्ञान का डंका बजाने और भीख मांगने हम घूम रहे है दूसरी ओर सामान्य से कम समझ वाले मंत्री जिम्मेदार विभाग लेकर बैठे है
उच्च शिक्षा , ज्ञान, खुलापन, बहस और शोध की संभावनाएं यही निहित है - यकीन मानिए जनाब यह नया अंधा युग है और यहां चीज़े साफ़ तभी दिखेंगी जब हम सब गहन अँधेरे में होंगे
आईए स्वागत करें हम अपना ही , अपने भाल पर उन्नत टीका लगाकर
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मैं के रियाँ था वो भोपाल वाली मेंढकी कूँ भारतीय दण्ड संहिता की धारा 125 में भरण पोषण भत्ता सांसद कोटे से जाएगा क्या या शिवराज जी की पेंशन से या कमलनाथ जी मुख्यमंत्री मेंढकी भरण पोषण योजना सुरु कर रिये हेंगे महिला सशक्तिकरण विभाग से
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पुढच्या वर्षी लवकर या
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'दर्द का रिश्ता' स्मिता पाटिल और सुनील दत्त की अदभुत फ़िल्म थी जिसमे देश प्रेम, चिकित्सा सेवाएं, कैंसर, बोनमेरो, और प्रेम के बीच पूरा महीन रिश्तों का तानाबाना बुना गया था, अंत में सब भला होता है और फ़िल्म आस्था और पारिवारिक मूल्यों के साथ देश प्रेम पर खत्म होती है, इसका एक गाना आजतक प्रचलित है - " मेरे मन मंदिर में तुम भगवान रहे / मेरे दुख से तुम कैसे अनजान रहे "
इस फ़िल्म को पिताजी देखने ले गए थे, अंत में उनकी आंखों में आंसू थे और बहुत भावुक मन से उन्होंने इस फ़िल्म की तारीफ़ की थी, आज यह सब सोच रहा हूँ तो याद आ रहा है सब कुछ
मराठी घरों में गणपति उत्सव एक विशेष उत्सव है जिसके लिए पूरा परिवार, पूरा मोहल्ला और पूरी संस्कृति उत्साहित रहती है - गणपति के आने से पूर्व ढेरों तैयारियां होती है और 10 दिन का यह उत्सव इतनी धूमधाम से मनाया जाता है कि विश्वास नहीं होता गणपति कोई मूर्ति है, कोई देवता है या कोई ऐसी चीज जो 10 दिन बाद खत्म हो जाएगी - गणपति की मूर्ति घर में आने के साथ साथ उन्हें विराजित किया जाता है और उनके साथ परिवार के जरूरी सदस्य के रूप में व्यवहार किया जाता है - जहां उन्हें मीठा और नमकीन का भोग तक लगाया जाता है, वही परिवार के हर सदस्य उनसे अपने मन की बात करते हैं और यह कोशिश करते हैं कि अपनी समस्याएं उनके साथ बांट सके, कह सके और सुन सके
10 दिन के बाद जब गणपति की विदाई होती है तो मन बहुत भारी हो जाता है ऐसा लगता है कि शरीर से - देह से आत्मा निकल कर जा रही है और भावुक मन से सभी बहुत भारी आंखों से उन्हें विदा देते हैं, 10 दिन का हल्ला गुल्ला और मेला ऐसे खत्म होता है जैसे जीवन से सब कुछ समाप्त हो गया - तब लगता है कि बचा क्या है
आज ऐसा ही कुछ हुआ जब मित्र प्रयास और समाधान गौतम ने अपने महाविद्यालय में हम मित्रों को बुलाया और गणपति उत्सव का समापन किया तो बहुत अच्छा लगा - हॉल में भव्य रूप से विराजित किये गए गणपति जी की आरती हुई और फिर एक भंडारा हुआ जहां पर शहर के गणमान्य नागरिक, महाविद्यालय के विद्यार्थी , शिक्षक और पारिवारिक सदस्य उपस्थित थे यह आत्मीय आयोजन इतना भव्य था कि लगा हम सब एकाकार हो गए हैं
देवास शहर में ही अपने साथ पढ़े हुए हम सात आठ मित्र हैं जिसमें से हम चार -छह लोग आज मिल पाए, कुल मिलाकर यह दिन बहुत अच्छा रहा; मन दुखी है गणपति जी की विदाई है - इन 10 दिनों में बहुत कुछ मैंने भी कहा और सुना है और कुछ - कुछ बातें हुई हैं - जिनका जिक्र फिर कभी करूंगा, अभी रुंधे हुए गले से यही कहूंगा कि "गणपति बप्पा मोरया - पुढच्या वर्षी लवकर या"
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#सांप_के_सिर_पर_पांव Posts of Sept III week 2019



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किसी प्राइवेट स्कूल में बिल्कुल छोटे बच्चों को सुसु करवाने से लेकर के ख ग घ को पढ़ाने वाली कोई कम अक्ल वाली महिला - जो प्रोफेसर से नीचे ना आंके खुद को, यदि किसी थर्ड क्लास सरकारी कर्मचारी के साथ ब्याह दी जाए और वह किसी जाहिल की कुसंगति में लिखने पढ़ने लगे तो फेसबुक जैसे माध्यम उसे लेखिका बनाकर ही छोड़ते है और ये कुसंगत के यार दोस्त जो विशुद्ध मूर्ख होते है उसे चने के झाड़ पर चढ़ा - चढ़ा के एक दिन साहित्यकार घोषित कर देते हैं और फिर वह महिला घटिया किस्म का साहित्य रचने लगती है और नकचढ़ी बनकर मठाधीश बनने का जतन करती है
2
हर शाख पे लोमड़ियां बैठी है अंजामे साहित्य क्या होगा
लेखिका को सुंदर साड़ी पहनना जरूरी है, एक अपराध बोध होना जरुरी है कॉलेज में ना पढ़ा पाने का - हिंदी या अंग्रेज़ी भाषा
कोई ध्यान नही देता तो घटिया मजाक का पहाड़ बनाकर जमाने की सहानुभूति बटोरना जरूरी है - टसुए बहाना और फिर कुसंगति के दोस्त आयेंगे आँसू पोछने

मोदी, शिवराज या योगी की भक्तन बनकर हिंदी के हमदर्दों का प्यार बटोरना जरूरी है
दो कौड़ी के कहानी संकलन और अपने रुपयों से उपन्यास छपवाकर फ्री में बांटना - वो भी गली गली द्वारे द्वारे बांटना भी जरूरी है ताकि मुकम्मल पहचान बनें
3
फिर उस लेखिका ने अपनी माहेश्वरी साड़ी घर आई महिला लेखिकाओं की गैंग को दिखाते हुए बोला "आपको पता है कार्ल मार्क्स, लेनिन का ससुर था और कालिगुला 'मार्स' का बेटा था जिसकी शादी स्तालिन के बेटी से हुई थी - इस तरह से फ्रांस में बहुत साहित्य रचा गया और उसका असर यह हुआ कि भारत में महात्मा गांधी ने आजादी आंदोलन शुरू किया जो भारत के पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट थे
इतिहास और गणितीय आंकड़ों के बोझ से ग्रस्त ज्ञान के भयानक दस्त लगे थे इस बापड़ी को
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शहर में घास नही मिलती यह बात सिर्फ उन्हें ही समझ आती है जो अक्सर हर तरफ, हर घड़ी घास देखने, भोगने के आदी हो जाते है लाज़िम है कि गधों की यह बिरादरी अडोस पड़ोस के कूचा घरों में जाकर आस घास भकोस आती है
अडोस पड़ोस वाले भी खुश कि "उल्लू बनाया चरखा चलाया" की तर्ज पर कोई मुर्गा या बकरी खुद हलाल होने चला आया, ताली पीटो, कट चाय और जी भर पेला पेली करो, विष वमन कर - विष वमन कर और ये जीवन समर्पण की इस्टाइल में धो डालो ससुरों को इत्ता कि खुजाल मिट जायें
कवि, कवियत्री हो इस बिरादराना में शामिल - तो बात ही क्या फिर - नकचढ़ी, घोर बगदादी बकलोली करने चली जाएंगी क्योकि घास को मालूम नही कि गधे और गधियों के भी पर सुर्खाब के हो जाते है कविता,कहानी, उपन्यास लिख - पढ़कर - ऊपर से कोई ना छापे फेसबुक पर आशिक दीवाने तो रो धोकर मातम पुर्सी कर ही जायेंगे लाईक और कमेंट्स की
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कुछ कवि और कहानीकार और आलोचक और उपन्यासकार और समालोचक और टिप्पणीकार और सम्पादक इतने भयानक वाले महान ईश्वर होते हैं कि वे हर गोष्ठी में, हर चर्चा में, हर बहस में, हर जगह, हर कस्बे, हर पत्रिका, हर अखबार, हर शहर, हर राजधानी और हर शोक पत्र पर भी मौजूद होते हैं
हर पुरस्कार में भी इनकी भोली शक्ल दिख जाती है जैसे हर फेसबुकिया महिला की पोस्ट पर रात 3 बजे तक किये इनके कमेंट्स

ये बिल्कुल गोबर है जो हर कहीं चिपक सकता है जिसकी संझा भी बनेगी और कंडे - बाटी सब सिकेगा, खाद बीज में भी काम आएगा, बाद में बदबू आने पर घूरे की शोभा भी बढ़ा देंगे


{ ये हैश टैग किसी विशेष को किसी पोस्ट और कमेंट के संदर्भ में है सामान्य नही, महिला मित्र दिल पर ना लें }

Friday, September 13, 2019

10 सितंबर Post of 11 Sept 2019

10 सितंबर
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कमरा पूरा अस्त व्यस्त था - किताबों का अंबार लगा था पत्रिकाएं खुली पड़ी थी, कुछ कागज बिखरे पड़े थे , टूटे हुए पेन, जमीन पर ढुलकी हुई स्याही, खुला हुआ लैपटॉप, रेडियो , लेपटॉप का टूटा हुआ बेग, मोबाइल के चार्जर, यूएसबी, एक स्विच पर लटक रहा मोबाइल , फ्यूज बल्ब, धूल खाती ट्यूबलाईट्स, हेडफोन जो बुरी तरह उलझ गया था, बिस्तर पर अखबारों के ढेर थे , चादरे कहां छुप गई थी - मालूम नहीं पड़ रहा था
तकिए की खोल में रोटी के टुकड़े और प्लास्टिक के बर्तन में पड़ी दाल , टमाटर , प्याज़ और खीरा के टुकड़े रोटी के साथ सलाद होने का इतिहास बता रहे थे, समझ नहीं आ रहा था कि यह कमरा है या किसी कबाड़ी का ठेला - परंतु जो भी था कमरा ही था , शराब की बोतलें इतनी थी कि उन्हें बेचकर इस मंदी में एक देशी अध्दा तो आ ही सकता था , पर अब मन उचट गया था शराब से भी लिहाज़ा उसे अब ग्लानि होती थी
दीवार से सटकर बैठा हुआ वह शख्स ऊपर से टूटी हुई छत को देख रहा था जहां से लगातार तीन दिन से पानी टपक रहा था और उसके ठीक नीचे पानी का सैलाब था जो पूरे कमरे को गीला किए हुए था, उसका पैंट भी गीला होकर अब बदबू मार रहा था , पुट्ठों पर खुजली मच रही थी, कंजी लगी दीवारों से सटा होने के कारण पीठ भी भींज गई थी, लाल ददौडे उभर आये थे, दोनो जांघों के बीच लाल चकत्ते निकलें थे और पांव के पंजों में पानी के कारण लाल दाग हो रहे थे ,अपने दोनों हाथों की उंगलियों को हथियार बनाकर वह इस मीठी खुजली को खुजाकर तीन दिन से संतुष्ट कर रहा था और आंखों में एक वहशी पन उभर आया था उसकी
समझ नहीं आ रहा था कि इस पानी को कैसे बाहर निकाला जाए क्योंकि निकासी का कोई द्वार नहीं था ठीक वैसे जैसे फैली हुई देह पर छिद्र तो कई थे परंतु अंत में आत्मा कहां से निकलेगी - उसे पता नहीं था, कल ही वह दिन गुजरा है जब दुनिया भर के लोग एक दूसरे को सांत्वना बांट रहे थे और कह रहे थे कि अपने अवसाद और तनाव में मुझे फोन कर लेना , मुझे कह देना कहने से जी हल्का हो जाता है, बोल लेने से मन का घाव भर जाता है, सब कुछ साफ-साफ कह देने से सब कुछ ठीक हो जाता है
उसने भी कुछ ऐसे ही संदेश अपने मोबाइल पर पढ़े थे और उसके बाद जब मोबाइल की बैटरी खत्म हुई तो उसे जरूरत महसूस नहीं हुई कि उसे फिर से चार्ज पर लगाया जाए - परंतु अचानक उसे याद आया कि बहुत साल पहले उसके पिता और फिर बाद में थोड़े साल पहले मां गुजर गई थी, कभी-कभी उसे लगता था कि अंधेरे में आकर वे दोनों उससे बात करना चाहते हैं मोबाइल पर कैमरे के सामने, जी हां ठीक समझ रहे हैं आप - फ्रंट कैमरा के पास में जब नीले रंग का एक बहुत बारीक सा मद्धम नीली रोशनी वाला सेंसर का बल्ब रात अंधेरे में जलता है तो उसे लगता है कि उसके पिता बात कर रहे हैं , बीच-बीच में जब बैटरी कम होने के मैसेज आते है कि 25% बैटरी बची है तो उसे लगता है कि उसकी मां उसे कह रही है कि जीवन का इतना हिस्सा निकल चुका है , अब चार्ज कर लो - अपना जीवन संवार लो और कुछ आगे बढ़ो परंतु उससे कुछ समझ नहीं आता उसे लगता है जो कुछ होना था वह हो चुका है, जो कुछ उसके पास है वह खत्म हो चुका है , उसके पैदा होने का मकसद यही तक था , उसने अपना सर्वस्व देकर अपना कर्ज संसार के प्रति चुका दिया है और अब जो वह जी रहा है वह महज एक अनवरत सी प्रतीक्षा है मौत के आगत की
वह धीमे से उठा उसने धीमे से उस डिब्बे को ढूँढा जिसमे माचिस रखी थी सौभाग्य से उसके बहुत पास रखा था वह डिब्बा, भीगी हुई अगरबत्तियों को बमुश्किल जलाया और एक खीरे के टुकड़े में खोंस दिया और फिर बेचैनी से आलमारी के टूटे दरवाज़े को आहिस्ता से पकड़कर रखा और दूसरे हाथ से एक कपड़े की थैली निकाली जिसमे टेलीफोन बीड़ी का आधा बिण्डल पड़ा था जो उसके दोस्त ने उसे दिलवाया था जब वो उसके घर अरसा पहले आया था, इन दिनों वह बहुत बड़ा आदमी हो गया है उसकी कहानियों पर दो फिल्में बन गई है - काँपते हाथों से बीड़ी सुलगाई स्वाद तो नही था पर दोस्ती की आंच बाकी थी सो कमरा बीड़ी और अगरबत्ती के धुँए से महक रहा था उसने एक बार अपने कमरे को देखा, उन किताबों को देखा जो उसने पेट काटकर खरीदी थी, बरसों फ़टे कपड़े और दो जोड़ी स्लीपर में निकाल दी ज़िंदगी यह कहते हुए कि पुराने कपड़े पहनो नई किताबें खरीदो पर आज यह जाला भी टूट गया है भ्रम का
बाहर बरसात के बाद की धुंध थी, ना कोई अपना नज़र आ रहा था ना कोई दोस्त , बूंदों का शोर था, चुभती हुई हवा और आसमान का साया भी सर से उठ गया था, पाँव रखने को जमीन बची नही थी - उसकी आवाज भी कही जा नही रही थी, अचानक उसने निर्णय लिया और वह जुट गया अपनी यात्रा की तैयारी में उसे खुद अपने को विदाई देना थी आज
एक ढेर किताबों का लगाया उसने बीचों बीच, उसे सब याद आ रहा था और वह हाथ में कोहनी से पंजों के बीच प्लास्टिक की सुतली को डबल करने की प्रक्रिया में साक्षी भाव से जुटा था - एक बार छत की गर्डर को देखा फिर गणितीय ज्ञान से अनुमान नामक मूल्य का प्रयोग किया सुतली का फंदा उस पार से निकाला और फिर तसल्ली से किताबों पर खड़ा हुआ , जेब से बीड़ी निकाली एक और - सुलगाई और जोर से तीन बार चिल्लाया 10 सितंबर
मुक्तिबोध को याद किया उसने जिसका जन्मदिन था और ताउम्र घुटता रहा वह भी ऐसी ही वीरानियों में, अँधेरों में "अपना सब वर्तमान, भूत भविष्य स्वाहा कर
पृथ्वी-रहित, नभ रहित होकर मैं
वीरान जलती हुई अकेली धड़कन"

और अंत में मजबूत इरादा करके दोनों हाथों से प्लास्टिक की सुतली खींच ही दी, झूलकर लटक गया था चेहरा, वह फिर भी मुस्कुराया मानो कह रहा हो - "अरे , मर गए तुम और ज़िंदा रह गया देश "
[ तटस्थ ]

Posts of 11 to 13 Sept 2019 Prayas Gautam and Amber Pandey's story

हम करें राष्ट्र आराधन
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एक ओर चाँद पर चंद्रयान, 104 उपग्रह छोड़ना
दूसरी ओर
न्यूटन, ग्रेविटी, मोर के आंसुओं से बच्चा, महाभारत काल मे इंटरनेट, कर्ण के समान पैदा होने / करने की तकनीक, बत्तख, गाय और ऑक्सीजन - मतलब दुनिया में ना इतने एक्ट्रीम पर रहने वाले मूर्ख ना कोई थे, ना है और ना होंगे
कम से कम चरक या सुश्रुत को ही याद कर लेते, पतंजलि को ही याद कर लेते, पण्डिता रमा बाई को ही याद कर लेते या गार्गी को ही याद कर लेते
गैलीलियो को जो चर्च ने सज़ा दी या ब्रूनो को जलाया या चर्च के आधिपत्य को ना मानने वालों के साथ अमानवीय व्यवहार किया वह कोई गलत नही था - सत्ता जब मूर्ख, उजबक, अपढ़ और अनपढ़ों के हाथ मे होती है तो वे सिर्फ ज्ञान का ही सत्यानाश नही करते बल्कि पूरी पीढ़ियों को बिगाड़ते है
यह सिर्फ इस सरकार की बात नही विप्लव देव या केंद्रीय मंत्री उदाहरण नही बल्कि यह एक श्रृंखलाबद्ध सुनियोजित कार्यक्रम और संगठन कृत दुष्प्रचार का हिस्सा है इसी देश मे हम गोबर गणेशों ने गणेश की मूरत को दूध पिलाया है और वैज्ञानिकता को धता बताई है - याद है उस समय स्व प्रो यशपाल ने कितना लिखा , समझाया था पर हम तो धर्म भीरू और भेड़ है
अभी साढ़े चार साल बाकी है इंतज़ार कीजिये ये महामना क्या क्या परिकल्पनाएँ स्थापित करते है और विलक्षणता की ऊंचाइयों को छूते है - एक ओर दुनिया भर में ज्ञान का डंका बजाने और भीख मांगने हम घूम रहे है दूसरी ओर सामान्य से कम समझ वाले मंत्री जिम्मेदार विभाग लेकर बैठे है
उच्च शिक्षा , ज्ञान, खुलापन, बहस और शोध की संभावनाएं यही निहित है - यकीन मानिए जनाब यह नया अंधा युग है और यहां चीज़े साफ़ तभी दिखेंगी जब हम सब गहन अँधेरे में होंगे
आईए स्वागत करें हम अपना ही , अपने भाल पर उन्नत टीका लगाकर
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पुढच्या वर्षी लवकर या
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'दर्द का रिश्ता' स्मिता पाटिल और सुनील दत्त की अदभुत फ़िल्म थी जिसमे देश प्रेम, चिकित्सा सेवाएं, कैंसर, बोनमेरो, और प्रेम के बीच पूरा महीन रिश्तों का तानाबाना बुना गया था, अंत में सब भला होता है और फ़िल्म आस्था और पारिवारिक मूल्यों के साथ देश प्रेम पर खत्म होती है, इसका एक गाना आजतक प्रचलित है - " मेरे मन मंदिर में तुम भगवान रहे / मेरे दुख से तुम कैसे अनजान रहे "
इस फ़िल्म को पिताजी देखने ले गए थे, अंत में उनकी आंखों में आंसू थे और बहुत भावुक मन से उन्होंने इस फ़िल्म की तारीफ़ की थी, आज यह सब सोच रहा हूँ तो याद आ रहा है सब कुछ
मराठी घरों में गणपति उत्सव एक विशेष उत्सव है जिसके लिए पूरा परिवार, पूरा मोहल्ला और पूरी संस्कृति उत्साहित रहती है - गणपति के आने से पूर्व ढेरों तैयारियां होती है और 10 दिन का यह उत्सव इतनी धूमधाम से मनाया जाता है कि विश्वास नहीं होता गणपति कोई मूर्ति है, कोई देवता है या कोई ऐसी चीज जो 10 दिन बाद खत्म हो जाएगी - गणपति की मूर्ति घर में आने के साथ साथ उन्हें विराजित किया जाता है और उनके साथ परिवार के जरूरी सदस्य के रूप में व्यवहार किया जाता है - जहां उन्हें मीठा और नमकीन का भोग तक लगाया जाता है, वही परिवार के हर सदस्य उनसे अपने मन की बात करते हैं और यह कोशिश करते हैं कि अपनी समस्याएं उनके साथ बांट सके, कह सके और सुन सके
10 दिन के बाद जब गणपति की विदाई होती है तो मन बहुत भारी हो जाता है ऐसा लगता है कि शरीर से - देह से आत्मा निकल कर जा रही है और भावुक मन से सभी बहुत भारी आंखों से उन्हें विदा देते हैं, 10 दिन का हल्ला गुल्ला और मेला ऐसे खत्म होता है जैसे जीवन से सब कुछ समाप्त हो गया - तब लगता है कि बचा क्या है
आज ऐसा ही कुछ हुआ जब मित्र प्रयास और समाधान गौतम ने अपने महाविद्यालय में हम मित्रों को बुलाया और गणपति उत्सव का समापन किया तो बहुत अच्छा लगा - हॉल में भव्य रूप से विराजित किये गए गणपति जी की आरती हुई और फिर एक भंडारा हुआ जहां पर शहर के गणमान्य नागरिक, महाविद्यालय के विद्यार्थी , शिक्षक और पारिवारिक सदस्य उपस्थित थे यह आत्मीय आयोजन इतना भव्य था कि लगा हम सब एकाकार हो गए हैं
देवास शहर में ही अपने साथ पढ़े हुए हम सात आठ मित्र हैं जिसमें से हम चार -छह लोग आज मिल पाए, कुल मिलाकर यह दिन बहुत अच्छा रहा; मन दुखी है गणपति जी की विदाई है - इन 10 दिनों में बहुत कुछ मैंने भी कहा और सुना है और कुछ - कुछ बातें हुई हैं - जिनका जिक्र फिर कभी करूंगा, अभी रुंधे हुए गले से यही कहूंगा कि "गणपति बप्पा मोरया - पुढच्या वर्षी लवकर या"

"नाना के मन में सबसे पहले यही विचार आया. हाथ की कॉपी सावरकर ने एक तरफ़ रखी और क़लम बुशर्ट में खोंसते हुए बात आगे बढ़ाई, “गाय घास भी खाती रहती है और मलत्याग भी करती रहती है. थकने पर अपने ही मूत्र और मल में पसरकर न केवल बैठ जाती है बल्कि पूँछ मारमारकर वह मलमूत्र से अपना पूरा शरीर गंदा कर लेती है. यह कैसा दिव्यजीव है जिसे स्वच्छता तक का ज्ञान नहीं और इस गौमाता का मूत्र और मल पवित्र करनेवाला और बाबासाहेब आम्बेडकर की छाया तक अशुद्ध करनेवाली है. ऐसा माननेवाले मनुष्यों की बुद्धि कितनी भ्रष्ट हो चुकी है, इसका अनुमान तुम स्वयं ही लगा सकते हो "
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दादीबाई शाओना हिलेल की जीवनी पर एक टिप्पणी
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Ammber Pandey की यह कहानी चमत्कृत करती है , इस कहानी का कथानक विशुद्ध राजनैतिक, ग्लोबल, शोषण, स्त्री और जेंडर के मुद्दों के बीच से होता हुआ मुम्बई, सावरकर और जातिवादी समाज की दुर्दांत व्यथा को चित्रित करता है
यह समालोचन पर दूसरी कहानी है एक माह बाद जो आपको एक सांस में पढ़ने को मजबूर करती है - यह पढ़ी जाना चाहिए और खासकरके उन लोगों को पढ़ना चाहिए जो बगैर श्रम किये कहानी पे कहानी पेले जाते है और उनमें एक जैसा कथानक और बिम्ब रचते है, हर घटिया अखबार और पत्रिका में छपने की भूख लिए पुरस्कारों की हवस में डूबे फर्जी और कॉपी पेस्ट लेखकों को यह कहानी पाठ्यक्रम की तरह पढ़ना चाहिये, यह अम्बर की अध्ययनशीलता, शोध का उद्यम और व्यापक वैश्विक दृष्टि, इतिहास और इस सदी की शुरुवाती उथलपुथल का व्यापक अध्ययन के श्रेष्ठ निचोड इसमें शामिल है
जियो अम्बर , तुम हर बार चमत्कृत ही नही करते , बल्कि दो बार से वीर सावरकर को लेकर जो समझ बन रही है, गाय , गौ, गोबर, गौमूत्र और गौमाता का जो आख्यान तुम वर्णित कर बड़ी समझ बना रहे हो जगत की - इस समय हिंदी के किसी लेखक में दम नही कि इस विहंगमता से अपनी बात तार्किकता और प्रमाणों से कह सकें
हिंदी कहानी में चीफ की दावत मिल का पत्थर थी, अम्बर की पिछली कहानी और इस कहानी को आप लगन से पढ़ेंगे तो समझ पाएंगे कि यह एक बड़े आंदोलन की नुमाइंदगी करती कहानी है जो आजादी के आंदोलन से ठीक पहले शुरू हुई और अब एक मोड़ ले रही है, दुर्भाग्य से अब ना कमलेश्वर है, ना राजेन्द्र यादव, ना नामवरजी या कोई शख्स जो इन दो का मूल्यांकन कर इतिहास में एक नया नाम दें - यह महज तारीफ़ नही पर ज्ञानोदय में छपी कहानियों के बरक्स कह रहा हूँ और बाजदफ़े नाराज भी होता हूँ कि हमारे कहानीकार क्या कचरा लिखते है और सस्ते पुरस्कार भी पा जाते है जुगाडमेन्ट से
अरुण देव जी का शुक्रिया कि यह साहस समालोचन में है कि इतने बड़े फलक और समयांश पर फैली कहानी को जगह दे रहें हैं 
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Tuesday, September 10, 2019

Girish' s Birthday and Other Posts - Seminar of Universities etc Posts of Sept 2019 I and II Week

Image may contain: Girish Sharma, smiling, outdoor and nature

अढाकू और पढ़ाकू गिरीश को जन्मदिन की बधाई
मित्र , अनुज और जानदार शख्स है गिरीश, खूब पढ़ते है - हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू और फ्रेंच और हम इनका भेजा कुछ पढ़ना शुरू करते ही है कि नया लिंक, पीडीएफ वाट्सएप में टप टप टपकने लगता है फिर पढ़ो और प्रतिक्रिया दो और इतनी विविधता सामग्री की - आप भौचक रह जाएं कि कहाँ से लाता है यह बन्दा इतने सन्दर्भ और फिर बहस, तार्किक चर्चा और अंत में सहज भाव से सब कुछ जज़्ब कर लेना
काम और सिर्फ काम के प्रति प्रतिबद्धता और दोस्तों के लिए जान हाजिर, लंबे समय से दोस्ती है और आज जब दस साल की इस यात्रा को देखता हूँ तो लड़ाकू का विशेषण जरूरी लगता है जोड़ना - क्योकि लड़ाई सिर्फ लड़ाई नही - वह उसूलों की जियादा है बजाय कोई मूर्त लड़ाई के और वहां लड़कर ही गिरीश ने मकाम हासिल किया है और अपने आसपास के सर्कल में ही नही - बल्कि वृहद रूप में एक रोल मॉडल भी स्थापित किया है - इस पूरी सियाहत का, यंत्रणा और हिम्मत का साक्षी रहा हूँ , निष्पक्ष भाव से मैने समझने की कोशिश की है और क़ई निर्णयों में शामिल रहा हूँ इसलिए हम कुछ दो तीन लोग बहुत करीब है और गूंथे हुए से है
मैं मुतमईन हूँ कि आने वाले वर्ष और भी धीर गम्भीर होने वाले है और वे अपना श्रेष्ठ अभी देंगे
गिरीश को जन्मदिन की बधाई, स्वस्तिकामनाएं एवं बहुत स्नेह और दुआएँ
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हर साल की तरह आज भी वे तुम्हें गुरु, ज्ञान, देश निर्माता आदि की सूली पर लाकर ज़िंदा ही टांग देंगे - हार, फूल, माला, तिलक, घटिया शाल और अंदर से सड़े नारियल के साथ घटिया कागज़ का चरित्र प्रमाणपत्र भी पकड़ा देंगे - ठंडे समोसे, सात चिप्स और नकली मावे की मिठाई के साथ
भाषणों में गोली देकर तुम पर इमोशनल अत्याचार करेंगे, राधाकृष्णन से तुलना कर तुम्हे नीच साबित करेंगे जिसने कभी कही नही पढ़ाया, तुमसे समर्पण मांगेंगे और तुम्हारी दरिद्रता का मजाक उड़ाकर आज महान साबित करके ही छोड़ेंगे
पर तुम स्थाई नियुक्ति, सातवें वेतन आयोग का नियमित वेतन, क्रमिक पदोन्नति और बराबरी पर अड़े रहना
शिक्षक दिवस कुछ नही होता, शिक्षक को रोज प्रसव पीड़ा सहना पड़ती है ताकि गंदे बजबजाते समाज मे, नालायक होते जा रहे, स्थापित हो चुके भ्रष्टाचार, अश्लीलता, गुंडे मवालियों के अड्डे बन चुके स्कूल, कॉलेज और विश्व विद्यालयों में अपनी आबरू छुपाती वाग्देवी और पतित होते जा रहे मूल्यों के बीच अपनी इज्जत बचाकर रोज शाम बापड़ा घर आ जायें वही शिक्षक का पारितोष एवं प्रतिफल है
"अशिक्षक दिवस" की कोई बधाई नही
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चाँद का मुंह टेढ़ा है जनाब
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हिंदी विवि वाले कितने दिनों तक केदारनाथ, मुक्तिबोध, वीरेन डंगवाल, निराला, प्रेमचंद, से लेकर बाकी सब पर सेमिनार करते रहेंगे और जनता का रुपया बर्बाद करते रहेंगे - अपने यार दोस्तों को , जातिवादी संगी साथियों को बुलाकर ऐयाशी करना शिक्षा के नाम पर धब्बा है, भारत जैसे गरीब मुल्क में इस पर प्रतिबंध लगना चाहिये, ऊपर से दुर्भाग्य यह होता है कि विभागों की घटिया राजनीति और प्राध्यापकों का भेदभाव, मनभेद, मतभेद और झगड़े बहुत साफ़ रूप से सामने आते है और सबके सामने पोल खुलती है बुरी तरह से
यूजीसी से रुपया ऐंठकर ये लोग सेमिनार के नाम पर एक माह तैयारी करते है, फिर फ्लाइट टिकिट, गेस्ट हाउस, होटल, अध्यक्ष, अतिथि, हर सत्र के जजमान और यजमान अलग, मेहमान, वक्ता, संचालक , आभार मानने वाले अलग और सुनने वाले शहर के दो चार चुके हुए बूढ़े उम्र के अंतिम पड़ाव पर आ चुकी औरतें जिन्हें सुनाई नहीं देता और हाथ पकड़कर सभागार में खींच कर लाना पड़ता है और कुर्सियों पर भीड़ बढ़ाते मास्टरों के शोधार्थी जो बेचारे पानी पिलाने से लेकर फोटो खींचने और फेसबुक तक रिपोर्ट पेलने का काम करते हैं , सेमिनार के बाद एक माह फिर सब सस्पेंड रहता है दो माह की पढ़ाई लिखाई बर्बाद कर देते है और बाकी समय दूसरे सेमिनारों में घूमते रहो
इन सेमिनारों में लीचड़ सम्पादकों, निकम्मे और चुके हुए रचनाकारों और शहर भर के टुच्चे तथाकथित साहित्यकारों की पौ बारह हो जाती है कि मुफ्त का भोजन, जबरन का मंच और अपनी ना बिकने वाली घर में पड़ी रद्दी जो खुद की ही लिखी होती है सबको बांटने का मौका मिल जाता है , लोकल अखबार के रिपोर्टर भी आकर "पान पट्टी" मुफ्त में खा जाते है और कुछ एक दो हजार भी लूट ले जाते है - माटसाब से न्यूज़ छापने के नाम पर, इस अवसर पर निकली स्मारिकाएँ तो तेरहवीं का शोक पत्र लगती है
शाम के समय में निंदा पुराण रस में लिप्त होकर शराब के दौर चलते हैं और यहां वहां के रिक्त पदों , पीएचडी की सीट पर बातचीत और कुलपतियों की शामत होती है तू कब सेमिनार कर रहा है , मुझे कब बुला रहा है तेरी पत्रिका में लेख छपा कि नहीं, मेरी पत्रिका में लेख कब भेजेगा , थोड़ा आसपास घुमवा दो , थोड़ा जल्दी जाना है ट्रेन का टिकट कैंसिल करके फ्लाइट करवा दोगे तो ज्यादा बेहतर होगा
इस तरह की बातचीत से यह सेमिनार खत्म होते हैं इनकी क्या उपयोगिता है कोई नहीं जानता सिवाय बकवास के कुछ नहीं होता यह बताओ कब तक केदार, रसखान, कबीर, मीरा, मुक्तिबोध , निराला, महादेवी प्रेमचंद और तमाम उन लोगों पर बकवास किए हुए सदियों से लिखे पर्चे पढ़ते रहोगे और शोध भी नया कुछ कर पा रहे हो - बस वही उपन्यास , कहानी, कविता में राजनीतिक , सामाजिक यथार्थ, महिला चरित्र , आलोचना, सौंदर्य और इसके अलावा है क्या
इन सेमिनार्स में युवा मास्टर प्रमाणपत्र लेने आते है ₹ 2000 देकर और शोधार्थी जेब से किराया भाड़ा देकर सेमिनार का उपस्थिति प्रमाणपत्र लेने ₹ 500 से 800 तक जमा करके बापड़े तीनों चारों दिन सबके पाँव ही पड़ते रहते है कौन ठरकी किस पैनल में फंस जाए और बदला लेने पर उतर जाएं और इस बहाने वो नई नवेली युवा शोधार्थिनो को या महिला प्राध्यापकों को ताक कर 500 या 800 वसूल लेते है
बेचारे बच्चे भी तंग आ गए हैं तुम्हारी बकलोली से पर वे करेंगे क्या - उन्हें तो झेलना ही है , कुछ भी हो जाए - क्योंकि डिग्री भी लेनी है और बाद में कहीं कॉलेज के लिए सिफारिश भी लगवानी है विश्वविद्यालयों में सेमिनार के नाम पर जो कचरा इकठ्ठा होता है साल भर तक उसे तुरंत प्रभाव से बंद किया जाना चाहिए - यह सिर्फ आपस में मिलने जुलने के अड्डे विकसित करने का तरीका है और कुछ नहीं, जिस तरह से लाखों रुपए बर्बाद होते है एक सेमिनार में उसका आउट पुट शून्य होता है कितने छात्र या मास्टर है जो हिंदी के केदारनाथ अग्रवाल या निराला या प्रेमचंद बन पाए
विज्ञान तकनॉलाजी में कम से कम नई समाजोपयोगी खोज और तार्किक बातें तो होती है वहाँ भी कचरा और नगीने बहुत है पर हिंदी अंग्रेज़ी में नमूने बहुत है फेसबुक पर ही टटोल लीजिये एक जाति के , एक वय के और एक गुट के प्राध्यापक आपको हर जगह नजर आ जाएँगे और मजाल कि इस गैंग में कोई महिला, दलित या अन्य प्राध्यापक दिख जाए यहां तक कि संचालन और आभार से लेकर गीत या सरस्वती वंदना गाने वाले भी इसी गैंग के सक्रिय सदस्य होते है
[ नोट - इस पोस्ट पर ना लाइक होंगे ना कमेंट क्योकि यहां बोलकर कोई अपने खुदा की गुडबुक से अलग होना नही चाहेगा - बहरहाल, अपुन तो साफ बोलेगा किसी को बुरा लगें तो लगें - दो रोटी ज़्यादा खा लेना ]
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स्कूल के हिंदी मास्टर -फ्रस्ट्रेशन के पूरक
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हिंदी का ज्ञानी, किसी भी विवि से पढ़ा हो और कुछ लिखने पढ़ने में रुचि हो ऊपर से अलेस, प्रलेस या जलेस के झंडे उठाता हो एवं रोज़गार के नाम पर स्कूल शिक्षक बन जाता है तो उसका विवि या महाविद्यालय में ना होने के फ्रस्ट्रेशन में जीवन नरक बन जाता है और फिर वह हर किसी को पेलना शुरू कर सबका जीवन नरक बना कर ही छोड़ता है
ये हिंदी के स्कूल मास्टर ना नेट , ना जेआरएफ और ना पीएचडी - पर ख्वाब विवि में हिंदी के आचार्य, मठाधीश या यूजीसी के हेड बनने के होते है, दर्जनों युवा मित्र भी है और ऐसे भी जो पीएचडी करके बैठे है - नवोदय और केंद्रीय विद्यालय में या राज्य सरकारों में चयनित हो गए पर नही गए क्योकि विवि में पढ़ाना है जीवन मे
उम्र में 38 - 40 के हो गए -शादी ब्याह हुआ नही, गाइड की चिरौरी करते हुए उम्र बीत गई, माया मिली ना राम, और जो मजबूरी में स्कूल में घुस गए जैसे तैसे या जुगाड़ से - अब अपने फ्रस्ट्रेशन से गर्दा मचाये है - साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता, विदेश नीति से लेकर संस्कृति तक यानी हर जगह उंगली करते रहते है और बस स्वर्ग से एक उंगल दूरी पर ही है - पढ़ाने के अलावा सारी बकर करेंगे और हर समय स्कूल के बाहर रहने को लालायित रहेंगे
जहाँ नही बोलना - वहाँ भी पेल आते है - लम्बा चौड़ा और कुछ चुके हुए चौहानों और मिसफिट साहित्यकारों और बूढ़ा गई थकी मांदी औरतों के चक्कर में स्वयम्भू कवि, आलोचक , कहानीकार या सम्पादक भी मानने की धृष्टता कर बैठते है
प्रभु इन्हें मुआफ़ मत करना - ये सब जानबूझकर कुंठित होकर कर रहे है भारी षड्यंत्र के तहत
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विश्विद्यालयों में अब परीक्षाएं कम्प्यूटर पर ऑन लाईन होना चाहिये, शुरुवात देवास के लीड कॉलेज से हो और यहाँ पर्याप्त मात्रा में कम्प्यूटर देकर यह शुरू हो, आजकल मोबाइल पर भी युवा तेजी से लिख लेते है, इसलिए ऑन लाइन हो और यह शीघ्र आरम्भ की जाएं
परीक्षाओं के प्रश्न ऐसे हो कि छात्रों को सतत पढ़ना ही पड़े या किताबें टटोलना पड़ेगी, नकल रुकेगी, कागज़ बचेगा और समय पर सब काम सम्पन्न होंगे
दिक्कत यह भी हो रही कि हाथ से लिखना अब मुश्किल होता जा रहा है, लंबे लंबे प्रश्नों के लंबे लंबे प्राचीन काल से चले आ रहें बकवास किस्म के प्रश्न मजबूरी में लिखना पड़ता है, कॉपियां जांची नही जाती और पन्ने गिनकर नम्बर दे दिए जाते है - गधे घोड़े एक समान हो जाते है , दो ढाई लाख प्रति माह कमाने वाले प्राध्यापक भी जरा दिखाए तो सही कि वे कुछ कर सकते है - बाबा आदम के ज़माने से चले आ रहें बकवास प्रश्नों को छापकर मुक्त हो जाते है 2 - 4 माह में भी जांचकर नही देते कॉपियां और छात्रों का जीवन बर्बाद कर देते है
#विक्रमविवि_उज्जैन में इसी घटियापन के कारण डेढ़ साल में एक सेमिस्टर हो रहा है तीन साल की डिग्री छह साल में हो रही और प्राध्यापक है नही महाविद्यालयों में, अतिथियों के भरोसे ठेके पर काम हो रहा है, कॉपियां जांचने के नाम पर विशुद्ध मक्कारी होती है - कॉपियां जांची ही नही जाती बस मनमर्जी से अंक बांटे जाते है, विवि को परीक्षा फीस वसूलना है और कॉलेजेस को फीस से जेब भरना है, जनभागीदारी वाले कभी आकर नही देखते कि कॉलेज के हाल क्या है अकादमिक हो, प्रशासनिक या अध्ययन अध्यापन के - जनभागीदारी समिति में राजनैतिक पिठ्ठू भरना बन्द करें पहले और अकादमिक लोगों को रखें जो अनुश्रवण और मार्गदर्शन कर सकें बजाय निकम्मे और अपने लोगों को रोज़गार देने के
इस सबका हल एक ही है अब नियमित परीक्षाएं ऑन लाइन ली जाएं - माननीय मोदी जी बहुत डिजिटल इंडिया की बात करते है तो अब यह काम भी करें ताकि सिर्फ बातें ना हो बल्कि क्रियान्वयन में भी दिखें
मप्र शासन के युवा तेजस्वी मंत्री भाई जीतू पटवारी जी इसकी पहल करें और पाइलेट के तौर पर देवास से आरम्भ करें जहां के वे प्रभारी मंत्री है
आशा है विचार होगा इस नवाचार पर -जवाब अपेक्षित है जिम्मेदार लोगों से
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उन दिनों छग में एक प्रोजेक्ट कर रहा था फील्ड वर्क करके दूर दराज़ के जिले सुकमा से होटल में आया ही था कि खबर मिली कि बिनायक के घर छापा पड़ा है तो वहां पहुँचा, मालूम पड़ा कि इलीना और बिनायक सेन के सूर्या अपार्टमेंट वाले घर से रायपुर में भी हजारों क़िताबें प्रशासन ने जप्त की, गाड़ियों में भरकर ले गए - जो दोनो ने जतन से दुनिया भर से खरीदी थी, बाद में पता नही वो कौन अधिकारी ले उड़ा - कोई या तो गंवार होगा इन माननीय की तरह या क़िताबी कीड़ा आय ए एस या आय पी एस रहा होगा या इनकी किसी की बीबी जो कवि टाईप होगी
शायद तीन साल पहले साथी सीमा को दिल्ली पुस्तक मेले से गोर्की और लेनिन खरीदने पर परेशान किया गया था और नक्सलवादी साहित्य कहा गया था इसे
जाहिल गंवार लोग हर जगह बैठे है सिर्फ न्यायपालिका में नही या वो एकमात्र जज नही
अपने कॉलेज में अभी एक प्रतियोगिता में मैंने अनुपम मिश्र का नाम पूछा, उनकी क़िताब "आज भी खरे है तालाब" का पूछा, नर्मदा पर बना पुनासा बांध किस राज्य में बना है पूछा, विक्रम सेठ, अरुंधति रॉय, अरुणा रॉय, नंदिनी सुंदरम, प्रभाष जोशी, दिलीप पडगांवकर, प्रणव रॉय - यहाँ तक कि तसलीमा नसरीन भी नही मालूम - विधि के तीनों साल के एक भी विद्यार्थी जवाब नही दे पाए - बाकी को छोड़ दो, ये सब 23 से ऊपर के है , ग्रेज्युएट या मास्टर डिग्री करके आये है - अब क्या कहूँ अपने ही बंधु बांधव है सब
कभी कभी आप ही गला घोंटके या फांसी लगाकर आत्महत्या करने को जी चाहता है , पिछले दिनों एक विधि प्राध्यापक ने कहा था कि मदर टेरेसा पंजाबन थी- जिंदगी भर मुंबई में काम करती रही और जब उसकी हत्या चर्च में हुई तो उसे ईसाई घोषित कर दिया, अब बताइए क्या किया जाए और यह सब पढ़े लिखे लोग हैं पीएचडी तक - इनका अचार डाले या मुरब्बा बनाकर आयात निर्यात कर दें
शर्म आती है कि हम पढ़े लिखे लोगों के साथ कार्यपालिका मेंं काम करते हैं - न्यायपालिका भी वैसी है और विधायिका तो छोड़ ही दीजिए - रहा सवाल मीडिया का तो वहां मटेरियल बहुत है
अपनी कुछ दस बीस हजार किताबों को अब समुद्र में जाकर डूबो आना होगा या लोहे के पर्दों में छुपाकर रखना होगा शायद - साला मृत्युंजय हो या पुनरुत्थान, अपराध और दण्ड हो या प्रेमी प्रेमिका संवाद , पाश हो दुष्यंत या गोरख पांडेय सब दिखती है , चे गवारा हो या चैपलीन, परसाई या मुक्तिबोध रचनावली, जितेंद्र श्रीवास्तव हो या विष्णु खरे या वीरेन डंगवाल या सुभाष पंत - पता नही भर्ती कैसे हो जाती है इनकी बड़े पदों पर और इन्हें खाना पच कैसे जाता है, बगैर पढ़े नींद कैसे आ जाती है महान लोगों को
स्व सफ़दर हाश्मी आज होते तो लिखते, गाते और कहते कि " पढ़ना लिखना सीखो, ओ मक्कारी करने वालो, दिमाग़ लगाना सीखो ओ ज्ञान बाँटने वालों ...."
अबे ओये गायतोंडे - हरामी, साले - सल्फास है क्या बै
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डॉक्टर लाखन सिंह मरा नही करते 8 Sept 2019

डॉक्टर लाखन सिंह मरा नही करते
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आज ही अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस है और आज ही साथी डाक्टर लाखन सिंह , बिलासपुर की मृत्यु की सूचना मिली है Himanshu Kumar जी से
सन 1990 की बात थी - दुनियाभर में अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता वर्ष मनाया जा रहा था देशभर के समाजवादी लोग, एनजीओ के लोग और विभिन्न शैक्षिक संस्थाओं के लोग साक्षरता मिशन से जुड़ रहे थे - यह वही वर्ष था जब प्रोफेसर स्वर्गीय यशपाल ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष के पद पर रहते हुए साक्षरता मिशन भी जॉइन किया था और आव्हान किया था कि एक वर्ष के लिये स्कूल कॉलेज और विश्व विद्यालय बन्द कर दो , पहली बार देश में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना की गई थी और डॉक्टर लक्ष्मीधर मिश्र उसके पहले निदेशक बनाए गए थे
मध्यप्रदेश में हम लोग एकलव्य और भारत ज्ञान विज्ञान समिति के माध्यम से तत्कालीन मप्र के 45 जिलों में साक्षरता का काम अभियान के रूप में आरंभ कर रहे थे, डॉक्टर संतोष चौबे, डॉ विनोद रायना, अमिता शर्मा, स्व आर गोपाल कृष्णन (आय ए एस) आदि जैसे लोग इस मिशन की अगुवाई कर रहे थे और जिलों में जिला साक्षरता समितियाँ बनाई गई थी देवास जिले का जिला संयोजक मैं था , देश भर के जत्थों के साथ मप्र भर में भी जत्थे निकलें, नुक्कड़ नाटक से लेकर सायकिल यात्राएं और इतने काम हम लोगों ने किए कि आज सोचकर ही कंपकंपी आ जाती है और हिम्मत भी नही कि वो सब सोच भी सकें
राज्य स्तर पर पहले डॉक्टर विनोद रैना, फिर संतोष चौबे और बाद में मप्र खादी संघ से आये खादी संघ के वरिष्ठ अधिकारी डॉक्टर लाखन सिंह ने राज्य संयोजक का दायित्व निभाया था, मुंगेली नाका, बिलासपुर, छग - बस इतना ही पता लाखन सिंह का था, लगभग 5 फीट की ऊंचाई, दुबला - पतला आदमी, तीखी और बुलंद आवाज़ और दृढ़ इरादों वाला हमेंशा हंसता रहता श्वेत दंत पंक्तियों की उज्ज्वल मुस्कान का यह छत्तीसगढ़िया जल्दी ही हम सबका साथी हो गया - लाखन सिंह ने बहुत काम किया, हमेशा खादी का कुर्ता पजामा, जैकेट पहनकर मुस्कुराते हुए काम करते थे - हम सब के साथी और साथ रहकर काम करने वाला यह शख्स गहरे सामाजिक सरोकार रखता था लंबे समय तक लाखन सिंह से दोस्ती बनी रही बीच में वे गायब थे पर इधर फिर गत 5 - 6 वर्षों से सक्रिय थे और मैं लगातार मिलता रहा सुकमा या भिलाई, दुर्ग, नांदगांव या दूर चाम्पा जांजगीर में या गरियाबंद या कही भोपाल में
छत्तीसगढ़ विभाजन के बाद भी हम लोग मिलते जुलते रहे और ज्ञान विज्ञान समिति के माध्यम से अनेक राज्य स्तरीय कार्यक्रमों में हमारा मेलजोल होता रहा, पिछले दिनों तक मैं जब भी छत्तीसगढ़ जाता लाखन सिंह से मिलकर आता था , बहुत ही सरल और सहज स्वभाव से थे कभी रायपुर, कभी बिलासपुर, कभी अंबिकापुर, कभी विश्रामपुर, दंतेवाड़ा या जगदलपुर में मिल जाते और मुझे आश्चर्य होता कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ दुबली पतली काया वाला यह आदमी कितना काम करता है
इलीना और बिनायक सेन जब भाटापारा में थे तो मैं जाता था " नवा अँजोर " साक्षरता के मॉड्यूल हमने मिलकर बनाये थे, छत्तीसगढ़ी में तब भी लाखनसिंह जी से मिलता था, बाद में छग के लिए भाषा, पाठ्यक्रम और मॉड्यूल के लिए हम लोगों ने बहुत काम किया था , रायपुर, बिलासपुर में हुए राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन, जन विज्ञान के कार्यक्रम ऐतिहासिक रहें है, होलकर कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉक्टर बीके निलोसे जी तब ज्ञान विज्ञान समिति के राज्याध्यक्ष थे - यह सब एक इतिहास बन गया है
मप्र ज्ञान विज्ञान समिति में अनूप रंजन पांडेय, राजकमल नायक से लेकर चुन्नीलाल और न जाने किन-किन लोगों को साक्षरता आंदोलन में खींच कर लाए थे तूहीन देव भी उनमें से एक थे, छत्तीसगढ़ अलग होने के बाद भी रायपुर के राज्य संसाधन केंद्र (प्रौढ़ शिक्षा) से जुड़े रहे और कई कार्यक्रमों में मुझे बुलाया , इन दिनों में वे छत्तीसगढ़ में पीयूसीएल का काम देख रहे थे और पिछली सरकार से जमकर कई मोर्चों पर लड़े थे, नई सरकार आने के बाद खुश नहीं थे और उनका कहना था कि आदिवासियों की हालत अभी भी वैसी ही है - जन अधिकार और नक्सलवाद के बीच आदिवासी पीस रहे हैं और वह लगातार मोर्चा ले रहे थे
आज उनका दुखद समाचार मिला तो बहुत बेचैन हो गया हूं लग ही नहीं रहा कि डॉक्टर लाखन सिंह हमारे बीच नहीं है , स्वर्गीय डॉक्टर लखन सिंह को सौ - सौ सलाम जोहार, प्यार और हार्दिक श्रद्धांजलि ऐसे प्यारे और प्रतिबद्ध लोग बहुत कम हुए हैं जो लंबे समय तक याद रखे जाते हैं और उनका काम हमेशा होता है - चाहे कितने भी वीभत्स तरीके से इतिहास को लिखा जाए विनोद रायना, लाखन सिंह , अजय खरे जैसे लोग हमेशा अमर रहते हैं - उनका काम बोलता है और वह कभी नहीं मरते
अभी पिछले हफ्ते अरुण त्यागी साथ छोड़ गए, आज लाखन सिंह जी - संगी साथी बिछड़ रहें हैं, मौत का एक दिन मुअय्यन है ग़ालिब - नींद क्यों आती नही , डर नही लगता पर अकेले रह जाने का गम ज़ियादा सालता है कि मैदान ए जंग में अब लड़ाई लड़ने को हम अकेले होते जा रहें हैं
नमन , और श्रद्धा सुमन
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Sunday, September 1, 2019

बहुत याद आते है वे शिक्षक - 01 सितम्बर 2019


बहुत याद आते है वे शिक्षक 
पुराने राजवाड़े में स्कूल लगा करता था जिसकी दीवारें जर्जर हो चुकी थी और छतों से टपकता हुआ पानी उन दीवारों पर कंजी की एक मोटी परत बना देता था,आठ दस पुराने कमरों में सिमटा हुआ स्कूल, बहुत पुरानी टाट पट्टियां, शिक्षकों के लिए रखी हुई लकड़ी की कुर्सियां अपनी दास्तान अनूठे अंदाज में कहती थी पर जो लगाव, प्रेम और अपनत्व शिक्षक और छात्रों के बीच में था वह अद्भुत था। उन दिनों कक्षा की सफाई करते हुए हमें कभी झिझक महसूस नहीं हुई और घर से पीतल का लोटा माँझकर कर शिक्षकों को पानी पिलाना मानो हमारी दैनिक दिनचर्या का एक हिस्सा ही था और शिक्षक इस बहाने बच्चों के घरों से सीधे जुड़े होते थे - कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वह पानी अखलाक के घर से आ रहा है , कैलाश के घर से या धर्मेंद्र के घर से - उन्होंने कभी नहीं पूछा अखलाक, कैलाश या धर्मेंद्र के माता पिता क्या करते हैं, उनकी जाति क्या है ।

हेड मास्टर पठान साहब सफेद झक पायजामा कुर्ता पहन कर और काली टोपी लगा कर आते थे और  जब रसखान कृत कृष्ण लीला पढ़ाते  "खेलत खात फिरे अंगना, पग पैंजनी बांध पीरी कछोटी, काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथ से ले गए हो माखन रोटी" इसको पढ़ाते - पढ़ाते कृष्ण का इतना सुंदर वर्णन करते थे कि बरबस ही कृष्ण का बाल रूप पूरे जीवन के लिए आंखों में समा गया और एक पौराणिक चरित्र को हमने जीवित मान लिया। पठान साहब जब रहीम या कबीर को भी पढ़ाते उनके दोहे समझाते तो लगता था यह स्कूल कभी खत्म ना हो और जीवन की पाठशाला रहीम, कबीर, रसखान ,दादू , मीरा में ही बनी रहे और हमेशा चलती रहे।

मानसून के मौसम में सावन के सोमवार,आंवला नवमी , आषाढ़ी पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा , शिक्षक दिवस ,मुहर्रम, गणेश चतुर्थी यह सारे दिन ऐसे गुजरते थे मानो जीवन का असली मजा और उद्देश्य इन दिनों के आयोजन और इन्हें सार्थक करने में ही निहित है। घर में दादी से लेकर मां , मौसी , मामी  चाची , बुआ सब शिक्षकीय व्यवसाय में थे इसलिए शिक्षा का जगत वह अपना सा और नितांत करीबी भी लगता है, लगता था जैसे शिक्षा, शिक्षक और जीवन बस इसी में घर आंगन और दुनिया बसती है। 

यही वह जादू था जिसने पढ़ने के लिए, पढ़ाने के लिए एक समझ विकसित की और धीरे - धीरे किताबों की बड़ी दुनिया से नाता जोड़ा, अक्षर शब्द का मतलब तो बहुत बाद में समझ में आया जब साक्षरता अभियान में काम करने का निश्चय किया - अक्षर मतलब जिसका क्षरण ना हो सके कभी।  सफदर हाशमी की कविता "किताबें करती है बातें" जब पढ़ी तो लगा कि किताबों का कितना बड़ा संसार है और यह संसार कितना भी बड़ा हो जाए उन्हें शब्दों और वर्णों में समेट कर समझा जा सकता है । 

हम लोगों के साथ पढ़े हुए कितने ही मित्र हैं जो आपस में मिलने पर सबसे पहले बातचीत की शुरुआत अपने शिक्षकों को याद करके ही करते हैं कि अज़ीज़ सर कहां हैं, शंकर लाल पंवार का क्या हुआ, राठौड़ मैडम कब गई , सहगल सर इन दिनों कहां है या निंबालकर मैडम की तबीयत बहुत खराब रहती है कभी चल कर देख आते हैं । स्कूल के शिक्षक हो या हायर सेकेंडरी स्कूल के या इस डिजिटल युग में जुड़े कॉलेज के शिक्षक आज भी उनके साथ बहुत सहज तरीके से बातचीत होती है, सोशल मीडिया पर उनसे नोकझोंक होती है और लगातार सीखते रहते हैं। परंपरा यह भी है कि हम लोग आज भी अपने शिक्षकों से मिलने शिक्षक दिवस के दिन उनके घर जाते हैं । आज मेरी एक छात्रा से बात हो रही थी जिसे मैंने 1987 - 88 में पढ़ाया था तो उसने कहा कि " मुझे याद है परीक्षा में मूल्यांकन के दौरान आपको जो पहली बार ₹ 20 मिले थे उससे आपने गर्मियों में हम सबको ककड़ी खिला दी थी पर आज हम लोग जब ड्यूटी देने जाते हैं और जो ₹ 90 पाते हैं तो वह हम बहुत सहेज कर वापस ले आते हैं - किस तरह से चीजें 20 सालों में बदली है यह अब हम देख पाते हैं " मेरे कई छात्र हैं जो आज यहां वहां बड़े पदों पर काबिज हैं वह कहते हैं कि निश्चित रूप से आपका शिक्षण बहुत अच्छे गुरुओं ने कराया होगा तभी आपने हमें एक खुला माहौल, सीखने के मौके और बराबरी से चर्चा करने के अवसर कक्षा में दिए - मत भिन्नता होते हुए भी छात्रों को बराबरी का माना और अपने हिसाब से विषय चुनने से लेकर विकसित होने की छूट दी तभी आज हम जीवन के क्षेत्र में अच्छा परफॉर्म कर रहे हैं। 

बचपन से शिक्षकों को एक अलग संदर्भ और मायनों में हमने देखा, सीखने की ललक नया कुछ कर पाने की छूट और बराबरी से बातचीत करने का जो मौका हमें मिला था वह दुर्भाग्य से आज के पूरे परिवेश में और शैक्षिक जगत में लगभग नामुमकिन है बहुत सारी सुविधाएं होने के बाद भी, बहुत सारा डिजिटलाईजेशन, महंगी फीस, महंगी पाठ्य सामग्री , महंगे उपकरण, बड़ी प्रयोगशाला है , बड़े खेल के मैदान , बड़े-बड़े पुस्तकालय और बसों की सुविधाएं होने के बाद भी क्या कारण है कि आज शिक्षक और बच्चों के बीच "कनेक्ट" नहीं है ।

सितंबर माह गणेश उत्सव का भी माह है जो त्योहारों की शुरुआत का प्रतीक है हम सब जानते हैं कि आजादी के आंदोलन को पुख्ता करने के लिए लोगों को एकत्रित करने के लिए लोकमान्य तिलक ने इस उत्सव की शुरुआत की थी आजादी के 73 वर्षों बाद यह त्यौहार मनाया जा रहा है - यह निश्चित ही शुभ है परंतु क्या अब यह लोगों को एकत्रित कर रहा है ? हर गली मोहल्ले में गणेश उत्सव मनाया जा रहा है और लोग बंट रहे हैं , मोहल्लों के नाम से अब समाज , जाति धर्म का अंदाजा लगाया जा सकता है । यह दुर्भाग्य है कि जिन चीजों को धीरे-धीरे खत्म होना था वह चीजें बढ़ते - बढ़ते इतनी बढ़ गई हैं कि अब लगता है इन्हें समाप्त कर पाना मुश्किल होगा । बहुत बड़ा दायित्व हमारे शिक्षा जगत पर है -  यदि हम अभी भी सुधर गए और समझ गए तो हम देश को सच में एक नए विकसित आकार में ढालकर  असली का देश बना सकते हैं - आज हमें एक राधाकृष्णन की नहीं लाखों-करोड़ों राधाकृष्णन की जरूरत है जो देश के कोने कोने में जाकर  कर "सा विद्या या विमुक्तते" की बात को लोगों तक पहुंचा सकें