Saturday, August 29, 2015

एक जुग बीत गया तुम्हारी याद में -दशरथ मांझी केतन मेहता की नजर से

केतन मेहता ने जरुर सोचा होगा कि यह नेतृत्व विहीन समय है और जब इस समय सारा देश और समूची मानवता एक गहन अन्धकार से गुजर रही है तो वे एक बुलंद नारे के साथ आते है जो सिर्फ शब्द नहीं वरन अपने आप में समूचे बदलाव की ओर इंगित भी करते है, और एक परिवर्तनकामी दिशा भी देते है. इस समय में जब आस्थाएं धुंधला गयी है, रोल मॉडल फेल हो गए है, विखंडित व्यक्तित्व अपने दोमुंहेपनसे लबरेज है और समय के चक्र में पीसता बेबस, लाचार आदमी लगातार हर मोर्चे पर जूझ कर अंततोगत्वा हारकर निढाल हो गया है - तो वे एक नारा ठीक दुष्यंत की तर्ज पर बुलंद करने की कोशिश करते है व्योम में कि कही कोई उठे और फिर ललकार करें कि "शानदार, जबरजस्त और जिंदाबाद". ये तीन शब्द नहीं पर एक खुले आसमान में पत्थर उछालने की अपने तई इमानदाराना कोशिश भी है. इस पुरे संघर्ष में एक जग से छिपी प्रेमाग्नि भी है जो सिर्फ ना पहाड़ को काटती है वरन एक समूची डूब रही सभ्यता और उस जाति  को धिक्कार करने का जज्बा भी पैदा करती है जो अपने आप को बेबीलोन की सभ्यता से आगे सिन्धु घाटी के किनारों से होती हुई जेट युग में प्रवेशकर दुनिया का "जगसिरमोर"  बनने की प्रवृत्ति पर भी गहरी चोट करती है. इस अवसान की बेला में जब सारे नायक यवनिका में छुपे हुए अपनी अस्मिता बचाने की पुरजोर कोशिश कर रहे है - ऐसे में वे एक ऐसे समुदाय के नायक को सच में परदे पर "परसोनीफाई" करते है जो मुसहर समुदाय से आता है जिसका काम चौपायों के गोबर में पच ना सकें अन्न या गेहूं के दाने बीनकर साफकर खाने के लिए होने वाले रोज के संघर्ष और कठिन जिजीविषा का जीवन है, वे बिहार के उस काल की बात को याद दिलाते है जब सामंतवाद तमाम तरह की आजादी के बाद और 'पूर्व  और उत्तर आपातकाल के दौरान हुए जमीनी मारकाट के दुष्परिणाम भी आमजन के पक्ष में खड़े नहीं दिखाई देते थे, वे दिल्ली की उस अंधी दौड़ को भी लक्षित करते  है जो नार्थ ब्लाक के द्वार पर आये आम आदमी से उसके हक़ के प्रमाणपत्र छिनकर या पायी गयी किसी भी कीर्ति की पताका और यश के सबूत को मिटाकर फाड़कर या छिनकर वापिस खाली हाथ अपने गाँव में जाने को मजबूर कर देते है. 

अपने पुरे केनवास पर केतन का जाल उन काले पीले लोगों की साफगोई से भरा पडा है जिसे हम छूने में या साथ बैठकर थोड़ी दूर जाने में भी सदियों की घृणा को महसूस करते  है, वे परदे पर एक इन वंचितों और  दलितों का और सामंत के मुखौटों का ऐसा तिलिस्म रचते है कि बरबस हमें उस त्रेता युग या द्वापर युग की याद आ जाती है जो सिवाय शोषण भेदभाव और गैरबराबरी वाले समाज को रचने के अलावा कुछ और नहीं कर सकता था. इसके नायक ठीक वो ही थे जो बाद में सदियों तक और बल्कि आजतक पूजे जा रहे है. केतन का दशरथ सिर्फ प्रेम में पगुराया नहीं वर्ना पुख्ता राजनैतिक समझ का भी बाशिंदा है जो आलोक झा से रोज पंगे लेता है और उसी के साथ मिलकर अपना मिशन भी पूरा करता है, केतन निश्चित ही बहुत चालाकी से अपना अंडर लाइन मुद्दा और प्रेस की भूमिका को रेखांकित करना चाहते है कि इस भीषण समय में सिर्फ और सिर्फ एक सही आदमी सही काम सही दिशा में कर ही नहीं सकता बल्कि ऐसी ख़त्म होती आवाजों का प्रतिनिधत्व करके सही जगह पहुंचा भी सकता है पर अफसोस प्रेस इसे एक रुपहले परदे और बॉक्स ऑफिस के व्यवसाय पर टिकाकर दूसरे कामों में मशगुल हो गयी. शायद यह समझना भी जरुरी था कि ये आलोक एक नहीं हजार लाखों चाहिए ताकि दुनिया भर और खासकरके भारत जैसे देश में अकेले संघर्ष करते दशरथ मांझियों को सामने ला सकें. पहाड़ सिर्फ पहाड़ नहीं होता पत्थर का या कठिन डगर का - बल्कि एक छोटा पुर्जा भी कई बार एक बड़े एवरेस्ट से बड़ा होता है. और यह सब कहना लिखना भी एक खुली राजनीती है क्योकि मेरा मानना है कि आप किसके पक्ष में खड़े है और किसके पक्ष में लिख पढ़ रहे है वह भी राजनीती है. इसलिए दशरथ मांझी फिल्म नहीं, प्रेम नहीं, संघर्ष नहीं, प्रेरणा की कहानी नही, अकारण कही गयी दास्ताँ नहीं, दशरथ मांझी जैसे अदने से शख्स - जो मुसहर था. की गाथा नहीं - बल्कि इस खतरनाक समय में और फासिस्ट ताकतों के खिलाफ लड़ने का माद्दा पैदा करने वाली फिल्म होने के साथ - साथ एक पतनशील बना दिए जाने वाले समाज में ऊपर उठने के लिए किसी दर्दनाक कूएं में मौत से लड़ते लोगों के लिए लटकती हुई सीढ़ी है जिसके पाए कमजोर हो चुके है और रस्सी भी जर्जर हो चुकी है - बस किसी तरह से खींचकर बाहर आना है और फिर खड़े होना है इन जमींदारों के खिलाफ, उस प्रशासनिक व्यवस्था के  बीडीओ के खिलाफ जो भ्रष्टतम तरीकों से रुपया खा जाता है, उस वन विभाग के खिलाफ जो जंगल बचाने के नाम पर बड़े उद्योगपतियों से मिला है और नक्सलवाद को बढ़ावा देता है, उस केंद्र सरकार की पुलिस के खिलाफ जो किसी दशरथ से उसके होने के प्रमाण छीनकर फाड़ देती है, उस कमीने नेता के खिलाफ जो अंत में जीप से उतरकर संघर्ष की राह में हमारा हमराह बनकर हमें डंडे खाने के लिए छोड़ देता है. यह फिल्म अपने आपमें एक पुरी पक्षधरता और सम्पूर्ण पारंगतता के साथ मिल् जुलकर  लड़ने के लिए इशारा करती है और आगे बढकर अपने हक़ लेकर अपने नाम दुनिया के सारे रास्ते कर लेने का जोश पैदा करती है. 

तुम्हारी याद में एक जुग बीत गया जैसी बात उस समय उभरती है जब प्रेम अपने सम्पूर्णत्व को प्राप्त कर लेता है और उस अँधेरे में नाचते मानव पुतले उस प्रेम और उस समर्पण को नहीं देख सकते जब तक सफलता अपने प्रेरक से आगे निकलकर शिखर पर बस जाती है और समूची प्रकृति अपने नैसर्गिक सौन्दर्य के साथ आपके साथ अँधेरे में भी धरती से उछलकर आसमान में एक छेद ही नहीं बनाती बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रास्ते का निर्माण करती है और गह्लोर के गाँव और पहाड़ से आगे जाता है, जो किसी नवाजुद्दीन को तराश कर राधिका आप्टे को स्थापित करके इतिहास में अमर बनाता है.

Wednesday, August 26, 2015

Posts of 26 Aug_15



देश जल रहा है महंगाई, आरक्षण और प्रतिशोध में और देश के प्रधानमंत्री को रक्षा बंधन पर गरीब की जेब से बारह, दो सौ या तीन सौ रूपये छिनने में शर्म नहीं आ रही, अम्बानी और अडानी और बिरला के लिए बटोर रहे है कि अपनी पुश्तों का कर्ज मानो चुकाना हो.....

विज्ञापनों का मायाजाल - बचो - बचो, इनसे बचो.............

मै देश के सत्रह मुख्यमंत्री, बीस राज्यपाल, एक प्रधानमंत्री, सत्तर प्रतिशत केबिनेट मंत्रीमंडल, सभी राज्यों में अस्सी प्रतिशत मंत्रीमंडल, आधे से ज्यादा सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में बैठे बेंच में न्यायाधीशों में और राष्ट्रपति पद के लिए इस महान भारत देश में आरक्षण की मांग करता हूँ.


विचित्र देश है आपका महाराज, जो आग लगाता है वही शान्ति की अपील भी करता है .......
ॐ शान्ति शान्ति शान्ति ..



शर्म आती है कि हमें सबको आरक्षण चाहिए ना अपनी योग्यता बढ़ाना चाहते है ना दक्षता ना कौशल बस घटियापन से सड़कों पर उतर आते है, जिन्हें आरक्षण मिल चुका है वे भी दशकों से ले रहे है इसका फ़ायदा और फिर भी अभी पीढी दर पीढी इसे भकोसना चाहते है, कुल मिलाकर सत्ता की गुलामी करके वही के वही रहेंगे दो कौड़ी के चापलूस मक्कार और अनैतिक. ना आत्मसम्मान है ना इज्जत ना मान अपमान का घूँट सहने समझने की शक्ति बेशर्मों की तरह से आज हर आदमी अपना ज्ञान और योग्यता बढाने के बजाय बैसाखी लेना चाहता है कैसे समाज में हम रह रहे है और क्या पा लिया है सत्तर सालों में ? कभी सोचा है कि इसी फूट का फ़ायदा हर कोई उठाना चाहता है अम्बानी हो अडानी ओबामा या अजीम प्रेम या कोई ओवैसी. दुर्भाग्य कि सरकार में बैठे निठल्ले भी सब एक सुर से इसको दबाने की बात कर रहे है मूल मुद्दे पर ध्यान नहीं है......



Behind Hardik Patel's movement it is assumed that Arvind Kejriwal is playing tricks to down the current CM/PM and their Lobby and raising unecessary voices for reservations and all. It might be a mess and complete wash off........but what is harm in it even if kejriwal or any one is behind the scene? problem is that you can nt resist any more pressure and the Indian Govt is uselsss and lost completely......this is the high time to take a stock of all deeds done by govt and plan for remaining 3 and half years else we are in either vain or gone...........as simple as any thing can be.....

देश के हालात ठीक नहीं है और हर व्यक्ति आरक्षण का नाम और चादर ओढ़कर देश में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहा है. हार्दिक तो मात्र एक बहाना है, गुर्जर आन्दोलन, जमीनी आन्दोलन, नक्सलवाद, काश्मीर में आन्दोलन, पूर्व में, दक्षिण में तेलंगाना अभी ठंडा नहीं हुआ है,, दलित आन्दोलन, शहरों में भीड़, आतंकवाद, अपराध, कीमतों में बढ़ौत्री, किसानों की आत्महत्या, बलात्कार, अत्याचार, व्यापम और भ्रष्टाचार में डूबे मंत्री सांसद और मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र से लेकर सारे राज्य अस्थिर और दुखद स्थिति में और बाकी सारी जगहों पर भी ...अन्तर्रष्ट्रीय स्तर पर लगातार पिछड़ना - पाकिस्तान से बातचीत फेल, ओबामा का पलटना,
आखिर क्या किया साहेब डेढ़ साल में ऐसा जादू कि आपकी लहर ही खत्म हो गयी, इलाहाबाद में युवा कहते है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में सबसे ज्यादा सांसद भाजपा के होकर भी निकम्मे साबित हो रहे है और हमने गलती की जो भाजपा को वोट दिया अबकी बार बहनजी को वोट देंगे..........
सवाल यह है कि क्या हम अब राज्यविहीन सरकार या तानाशाही की ओर बढ़ रहे है? अफसोस यह है कि जिस चुनी हुई सरकार से उम्मीदें थी वह बेअसर हो गयी है और अपना जनमत खो चुकी है, मोदी हार गए है और देश उनके काबू से बाहर हो गया है ना अर्थ की समझ इस आदमी को ना सत्ता की ना समाज की और ना राजनीती की तो सवाल यह है कि अब देश क्या करें, जिस तरह से प्याज के बहाने से मार्केट का कबाड़ा हुआ या परसों शेयर मार्केट ने पलटी खाई वह मनमोहन या कांग्रेस के राज्य में कभी नहीं हुआ हाँ हर्षद मेहता तब भी थे और आज दुर्भाग्य से जेटली जैसे लोग खुद हर्षद बने हुए है जो पिछले दरवाजे की इंट्री है..............जिस सरकार के मुखिया को अपने ही देश के लोगों की भलाई के लिए वोटों की खातिर गिडगिडा पड़े और किसी राज्य की बेशर्मों की तरह बोली लगाना पड़े उसकी क्या समझ और क्या नीति?
पता नहीं क्यों सुप्रीम कोर्ट चुप है और गुजरात का महानायक.......हां हां हां देख रहे है ना क्या सत्यानाश किया है दस सालों का फोड़ा अब फूटा है और अभी तो मवाद निकलना बाकी है साहेब..............देखते रहिये..........!!!!

Posts of Week 18 to 25 Aug 15


इलाहाबाद से लौटकर काम और द्वाबा उत्थान एवं विकास समिति की सुखद स्मृतियाँ और कौशाम्बी जिले में भयानक बदतर हालत कुपोषण की, बच्चों, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं में सबसे ज्यादा असर सपा सरकार और घटिया राजनीती के शिकार, परन्तु निष्क्रिय प्रशासन और व्यवस्था पाकर दुःख हुआ. एक तस्वीर काम करने वाले जांबाज सिपाहियों के साथ जिसके नेता परवेज भाई है, दूसरी तस्वीर मित्र Santanu Sarma के साथ और तीसरी तस्वीर बाल मजदूर को लेकर लिखी गयी अदभुत कविता जो पुरे हालात का जिक्र करती है उसके जीवन का.






सही कहा था आलोक ने जीवन में छोटी सी उम्र बिताने के लिए दो चार लोगों का और दो चार दोस्तों का होना ही पर्याप्त है.



अब अपने शहर और अपने लोगों को, दोस्तों को इतने लम्बी अवधि के लिए छोड़ने की हिम्मत नहीं होती.............ये उम्र का असर कह लें या स्नेह के बंधन, अपनी फिजां की आदतें या अपने पेड़ पौधों की महक पर अब नहीं होता और अब सोचकर ही इतना लंबा निकलूंगा....



शहर जितना बड़ा होता है उतना ही निष्ठुर होता जाता है ऐसे में लोग अपनी प्राथमिकताएं तय करते है तो कोई गलत नहीं बस धिक्कार् और थू-थू करने को जरुर जी करता है मानव मशीन बन चुके लोगों और झूठे मक्कार लोगों पर .



पान तो भैया अपने मालवे में ही मिलता है , ई इलाहाब्बाद में तो कछु मजा नहीं आया, सब ससुरा पीला पत्ता खिला देते है, सही है ममता दीदी के राज से पुत्तर प्रदेश में आते-आते जान निकल ही जायेगी ना पनवा की फिर बांग्ला हो, मालवी या कुछ और....



दफतने तर्के ताल्लुक में भी रुस्वाई है, 
उलझे दामन को छुड़ाया नहीं करते झटका देकर ।


एक गम्भीर सवाल पूछ रहा हूँ, ये लाइव चैनल्स पर ज्ञान बांटने तथाकथित विशेषज्ञ बैठते है उन्हें सुनता कौन है?
अब जी ऊब गया है बकवास और व्यर्थ बहस सुनकर कार्यक्रम के बाद सब लोग चाय बिस्किट साथ लेते होंगे और चैनल्स की पुल कार सबको एक ही ठेले में सबको घर छोड़ती होगी.
लिफाफा भी खोलकर देखते होंगे कि कम ज्यादा तो नही दिया ?

Saturday, August 22, 2015

सतना को भूला नहीं हूँ आज भी - शुक्रिया कुलदीप 21/8/15



सन 1993-95  की बात है, सतना में अनुपमा एजुकेशन कान्वेंट ने चित्रकूट ग्रामोदय विवि का बी एड का अध्ययन केंद्र लिया था और मै भी बी एड करना चाह रहा था यह दूर वर्ती शिक्षा के माध्यम से होना था और फीस भी कम थी सो प्रवेश ले लिया तब देश बहर से कई लोगों से सम्बन्ध बने थे. नफजगढ़ दिल्ली का एक युवा जो बहुत गुस्सैल था नाम था कुलदीप कुमार जो अपने पिताजी के साथ आया था प्रवेश लेने पर एक डेढ़ साल में ऐसा कुछ रिश्ता बना कि वो भाई मानने लगा. और फिर कोर्स पूरा होने के बाद सब छुट गया. मेरे जीवन में सतना का बड़ा महत्त्व है और यदि कभी ईश्वर ने पूछा कि (यदि ईश्वर है और पुनर्जन्म होता हो तो)  कहाँ जन्म लोगे दोबारा तो कह दूंगा कि अगला जन्म सतना में लूंगा. 

खैर, इस सारे मामले में अच्छी बात यह है कि आज लगभग पच्चीस बरस बाद कुलदीप ने फेस बुक पर मुझे खोज निकाला और एड किया मै देखते ही पहचान गया, कुलदीप ने दो तस्वीरें भेजी की कि मै पहचान लूं, ऐसा हो सकता है कि मै अपने दोस्तों को भूल जाऊं भाईयों को भूल जाऊं. कुलदीप को मैंने तब काम कर रहा था उस संस्था की एक गीतों की किताब भी बहंत की थी जो उसने आजतक सम्हालकर राखी है यह मेरे लिए फक्र की बात है. शुक्रिया Kuldeep Yadav​  बहुत मिस किया तुम्हे इन दिनों. अब शायद मेरा सतना में जो खोया था वो भी मिल जाए तो जीवन में शान्ति से मर सकूं सिर्फ अब एक ही तमन्ना बाकी है.....................कुलदीप ने उस किताब को इतने जतन  से सम्हालकर रखा है और मेरे हस्ताक्षर देखकर भी अचंभित हूँ. ...

सतना को भूला नहीं हूँ आज भी ..........तुम्हारे लिए .............सुन रहे हो ना कहाँ हो तुम...........मिल जाओ अब..................................


Monday, August 17, 2015

Posts of 17 Aug 15



अम्बानी  और अडानी के लिए तेल लेने के लिए क्या क्या करना पड़ रहा है, इधर सारा देश राम राम, काश्मीर, 370 धारा हटाओ, आतंकवाद, पाकिस्तान मुर्दाबाद , हजार सर लेकर आओ, ललित गेट, संघ और भाजपा कर रहा है और उधर वे शेख, मुल्लों और मस्जिदों में अल्लाह खोज रहे है.

34 साल  बाद किसी मुखिया को अपने आकाओं के लिए तेल - तेल करते हुए मस्जिदों में मत्था टिकाते हुए मजबूरी वश देखा, ऐसी भक्ति को प्रणाम और ऐसे वफादारों को भी दिल से सलाम, दोस्ती हो तो ऐसी. बढ़िया है लगे रहो..........बस अब नागपुर में जाकर सफाई देनी होगी एक बार आने के बाद. 

वैसे  मजाक के अलावा यह कदम मोदी जी की अपने आसपास के देशों में प्रतिष्ठा बढ़ाएगा, मै उनके इस कदम की सराहना करता हूँ. यह समय की मांग है और अब समय आ गया है कि जाति समुदाय के दंश से निकलकर नेता देश और भले की सोचे. मोदी जी सच में यह जाति धर्म समुदाय का चश्मा उतार फेंके और अपने तई निर्णय लें, छोड़े संघ को और कूप मंडूक रैली निकालने वाले भगवा धारियों को, फिर देखें कि कैसे हम सब लोग उन्हें दिल से समर्थन देते है और मदद करते है. अच्छे दिन सच में ऐसे ही आयेंगे यह समझना जरुरी है मीडिया, मोदी और मीडियाकरों को भी. आज देश के सामने क्रुड आयल की ज्यादा जरुरत है बनिस्बत राम मंदिर के, देश के कुपोषण और दीगर मुद्दों को संबोधित करने के लिए हमें विदेशी मुद्रा चाहिए ना कि जेब की गाँठ का रुपया मंदिर मस्जिदों में खर्च किया जाए.

एकदम  सही किया जो शेख की जमीन में घुसे और अब इंतज़ार है किसी बड़े निर्णय का बॉस........तभी तो आजादी के दूसरे दिन जाने का फैसला एक इतिहास बनेगा.

Sunday, August 16, 2015

Posts of 16 Aug 15















मप्र पर्यटन विकास निगम मांडव में इस सीजन में कई प्रकार के उत्सव आयोजित करता है परन्तु कल जो इस कसबे की बदहाली देखी वह अकल्पनीय थी और बेहद शर्मनाक. हर जगह भीड़ और ट्राफिक का कोई इंतजाम नहीं. रूपमती महल पर जब भयानक जाम लगा तो कोई ओपी वर्मा और एक चौहान पुलिस वालों को मैंने कहा कि स्थिति गंभीर हो रही है कुछ हादसा हो सकता है तो उन्होंने स्थानीय प्रशासन को गाली देते हुए कहा कि साला पचास साठ मरेंगे नहीं लोग तब तक आना बंद नही करेंगे और सुधरेंगे नहीं - इतनी भीड़ है हम भी क्या करें , मरने दो मरते है तो. जब बगडी वाले रास्ते पर जाम हो रहा था तो मैंने पुलिस वालों से कहा कि अभी सम्हाल लो वरना दिक्कत हो जायेगी तो बोले हो जाने दो तीन चार घंटे जाम में फसेंगे तो सब आना भूल जायेंगे और फिर जाम रात तक तो खुल ही जाएगा, और उस तरफ हमारी बीट नहीं है, आप अपना काम करो......
ये हालत है प्रशासन की, जिला प्रशासन को इस बात से कोई मतलब नहीं है , जो अधिकारी वहाँ थे, वे मालवा रीट्रीट में भोपाल से आये अधिकारियों की लाल बत्ती का ख्याल रख रहे थे, दूसरा ट्राफिक जाम में मैंने भोपाल, खरगोन, इंदौर, उज्जैन की मप्र शासन वाली गाड़ियां देखी, जब पूछा तो बोले हम गलत जा रहे है तो क्या हम सरकारी अधिकारी है और देख नहीं रहे लाल - पीली बत्ती !! सवाल यह है कि छुट्टी के दिन अपनी सरकारी गाडी लेकर आये कैसे,ऊपर से हार्न / बाजार बजाकर आम लोगों की लाइन में गलत तरीके से घुसकर ट्राफिक की समस्या को और बढ़ा रहे हो, ऊपर से बदतमीजी और दादागिरी ......सरकारी अधिकारी हो तो नियम तोड़ोगे?
मांडव में जब जिला कलेक्टर को मालूम होगा कि छुट्टी के दिन इतनी भीड़ आती है तो क्या इंतजाम नहीं करना चाहिए , 20-30 पुलिस वालों के भरोसे पांच -दस लाख की भीड़ को हवाले करना क्या जायज है? और ऊपर से मप्र पर्यटन विकास निगम अपना बाजा अलग बजाता है, क्या यह निगम जिला कलेक्टर को लिखता नहीं कि आवश्यक इंतजाम करें? क्या बाध्य नहीं कर सकता ? स्थानीय एस डी एम्, एस डी ओ पी को अक्ल नहीं है या देवघर की तरह होने वाले हादसे का इंतज़ार कर रहे है या कुछ सैंकड़ों मर जाए तो इनकी स्थाई समस्या का हल हो जाएगा - ना लोग आयेंगे - ना इंतजाम करना पड़ेंगे.
कल सारा दिन जाम में घुमते रहे हम लोग और बगैर देखे और कुछ खाए पीये लौटे. सिर्फ दो जगह देख पाए बाकी समय वहाँ की भीड़ से निकलने में लग गया. भाड़ में जाये मप्र पर्यटन विकास निगम और इसके लुभावने विज्ञापन. सत्यानाश कर दिया पुरे प्रदेश का और दुनिया भर को बुलाते है कि एम पी अजब है सबसे गजब है................
सहमत है महेंद्र जी या आप सुरक्षित रहकर पूरा मजा ले पायें? Mahendra Sanghi​

RIP Shivendra Pandey

शिवेंद्र पाण्डेय यही नाम था उसका, पता नहीं कभी जब मै भोपाल में था पांच बरस पहले तो मिला होगा किसी कार्यशाला में तब से मुझसे फेसबुक पर जुड़ा था, सोशल वर्क में कार्यरत था, पहले एक्शन एड के किसी प्रोजेक्ट में था, फिर महिला मुद्दों पर कम करने वाली संस्था में और हाल ही जब पिछली बात बात की थी तो पता चला आजकल सागर में है.

अभी सन्देश बंसल  ने खबर दी उसने कल सागर में आत्म्हत्या कर ली है. समाज सेवा के क्षेत्र में आजकल जिस तरह के दबाव, कम वेतन, और रचनात्मकता को दबाया जा रहा है वह निश्चित ही घातक है. 12 अगस्त को अपना जन्मदिन मनाया था और 14 को अपना फेस बुक अकाउंट और वाट्स अप अकाउंट भी बंद कर सबको सूचना दी थी उसने. एक जिन्दादिल शख्स..........का यूँ खत्म होना बहुत ही दुखद है.

जो युवा इसमें काम कर रहे है या आना चाहते है वे सोच समझकर आये क्योकि अब यह क्षेत्र भी बहुत "रिस्की" और कठिन हो गया है. अगर अपने इमोशंस को आप मैनेज नहीं कर सकते और काम के दबाव, तनाव, आरोप - प्रत्यारोप सह नहीं सकते, और अगर अपनी रचनात्मकता को इस सबके बावजूद बचा नहीं सकते तो बेहतर है आप कुछ और कर लें पर क्षेत्र में ना आये.

शिवेंद्र तुमने मिलने का वादा किया था और सागर आने का सोच भी रहा था पर तुम उसके पहले ही चले गए मित्र, यह ठीक नहीं किया तुमने.........दुनिया बड़ी है , बहुत बड़ी पर सबको अपनी पसंद का काम  मिलता भी नहीं है और जिस तरह के समाज में हम रह रहे है वहाँ हमारी व्यक्तिगत खुशियों और जिन्दगी का महत्व भी नहीं है हमारे चारो और हमें मारने के औजार लिए लोग, समाज, तंत्र और व्यवथाएं मौजूद है..........खैर,, तुम्हारा निर्णय सही भी लगा एक दृष्टि से मुझे. खुश रहो जहां भी रहो...........

अच्छा लगा कि तुम आखिर थक हार कर अपना रास्ता बनाते हुए चले गए............ बहुत हिम्मत का काम था यह निर्णय लेना और फिर उस पर अमल करना, बिरले ही होते है बस थोड़ा जल्दी हो गया .कुछ कवितायें तुम्हारी अधूरी है, कुछ लड़ाईयां अधूरी है तुम्हारी और महिलाओं को बराबरी मिलने में बस कुछ ही सदियाँ और लगेंगी............शिवेंद्र, तब तक धीर धर लेते मित्र !!!

Friday, August 14, 2015

Post of 14 Aug 15

अभी लगभग 200-300 परिवारों से जीवंत संपर्क करके आया हूँ चार जिलों के 20 गाँवों में एकदम ठोस रूप से कह रहा हूँ . और दो सौ किशोरियों से सीधे बात करके ..........भगवान् कसम सिर्फ एक घर में संडास मिला था वो भी शिवपुरी जिले के पोहरी से सटे गाँव में जिसका इस्तेमाल भी होता है. स्कूलों और बाकी सब तो छोड़ ही दो खां साब................

हुजुर आपके अधिकारी आपको गलत जानकारी दे रहे है कल ज़रा सम्हलकर बोलना वरना सूचना का अधिकार लगाउंगा और फिर जवाब तो आपके लोग देते नहीं है यह भला हमसे बेहतर कौन जानता है. ? खैर खुले में शौच से मुक्ति में अभी अपुन को दस हजार साल लगेंगे. क्यों ठीक बोल रिया हूँ ना? 

कित्ते संडास बन गए भिया
मने कि पूछ रहे है, क्या है कि पिछले साल सुनकर सोचा था कि इस साल देश खुले में शौच से मुक्ति पाकर यूनेस्को का कोई पुरस्कार ले लेगा !!!
हाँ ये भी ज़रा बताना कि अम्बानी, अडानी, टाटा, अजीम प्रेम, नारायण मूर्ती से लेकर बाकी दलालों ने कित्ता रुपया खर्च करके (CSR Funds) देश के कित्ते लोगों को संडास बना कर गिफ्ट दिए या ..........

अरे छोडो ना यार क्या संदीप बाबू........फ़ालतू बात कर रिये हो, कल सोने दो, लाल किले से नेहरु से लेकर असली फेंकू ने या सबने सिवाय फेंकने के किया क्या है, आराम से सोओ देर तक कल कम से कम आराम करो बाकी देश जाए भाड़ में........बस याद करो सरदार जाफरी को जो कहता था.......
कौन आजाद हुआ , किसके माथे से स्याही छुटी
मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का 
मादरे हिन्द के चेहरे पे उदासी है वही.............

थोड़ा गौर से देखिये ये उदासी सर्द और गहरी हो गयी है एक डेढ़ साल में ........बहरहाल आजादी की नुक्ती मुबारक नकली तेल और घटिया बेसन वाली.

Wednesday, August 12, 2015

बेखौफ वन विभाग और बेबस आदिवासी- बहेरा जिला पन्ना के आदिवासियों का दर्द - Post of 12 Aug 15



बेखौफ वन विभाग और बेबस आदिवासी- बहेरा जिला पन्ना के आदिवासियों का दर्द


आजाद भारत में क़ानून किस तरह से आम लोगों को परेशान करते है इसका एक ज्वलंत उदाहरण मप्र के पन्ना में नजर आ रहा है जहां वन विभाग एकदम छुट्टा होकर गरीब आदिवासियों पर आक्रामक हो चुका है. पत्थर खदान मजदूर संघ के युसूफ बेग ने बताया कि पन्ना के ग्राम बहेरा ग्राम पंचायत के निवासियों को वन विभाग के अधिकारियों ने जबरन बाहर निकालने के लिए महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों के साथ अनधिकृत रूप से मारपीट की. इस गाँव में ये आदिवासी सन 1965 से काबिज है. इन लोगों ने 28 अगस्त 2008 को वन अधिकार अधिनियम के तहत पट्टे के लिए 13 दावे किये थे जिनका निराकरण आज तक नहीं हुआ. यह हालत मप्र के अधिकाँश जिलों की है और लाखों प्रकरण प्रदेश की लालफीताशाही में उलझे पड़े है. बहेरा में बाद में 24 अन्य आदिवासियों ने दावे प्रस्तुत किये परन्तु कोई कार्यवाही नहीं हुई. ये आदिवासी गत 40 बरसों से यहाँ काबिज है और इन्हें तत्कालीन कलेक्टर ने मौखिक आश्वासन दिया था कि चूँकि वे लम्बे समय से वहाँ काबीज है तो रह सकते है परन्तु वन विभाग के अमले द्वारा समय समय पर इन गरीब आदिवासियों को परेशान किया जाता रहा है. गत 7 अगस्त को तो हद हो गयी जब बीट प्रभारी जगदीश शर्मा और डिप्टी रेंजर वाजपेयी और रेंजर ने गाँव में हमला बोला और झोपड़ियां गिराने लगे, सामान उड़नदस्ते द्वारा ली गयी गाडी में भरने लगे और जब लोगों ने विरोध किया तो भद्दी गालियाँ दी और महिलाओं के साथ अभद्रता की, मारपीट की. गाँव से इन आदिवासियों का सारा सामान उठाकर पन्ना बस स्टेंड पर लाकर फेंक दिया. इसके बाद सारे लोग कलेक्टर से मिले कलेक्टर ने 10 अगस्त को मिलने को कहा और जब ये पुनः मिले तो कलेक्टर, पन्ना ने कहा कि जमीन खाली करना होगी. यह हालात प्रदेश ही नहीं वरन पुरे देश में पिछले दिनों में बहुत तेजी से बढे है, जब सदियों से जंगलों में रह रहे आदिवासियों के लिए विस्थापन का रास्ता सरकारों ने खोला है. सारे नॅशनल पार्क अब स्थाई समस्या बन गए है. कान्हा का नॅशनल पार्क हो, गढ़ी बालाघाट का रिजर्व पार्क हो या माधव नेशनल पार्क, शिवपुरी का पार्क या छग में या कही और- सब जगह स्थाई रूप से रहने वाले आदिवासियों को गत पचास वर्षों से निष्कासित कर हकाला जा रहा है. आखिर इसका स्थाई हल क्या है. उमरिया, अनूपपुर और बांधवगढ़ के स्थाई बाशिंदे भी इन राष्ट्रीय महत्त्व के पार्कों को एक अभिशाप मानते है. इसका दूसरा असर भी जबरजस्त पडा है. नए वन कानूनों ने यद्यपि आदिवासियों को जंगल का हिस्सा मानते हुए लघु वनोपज लाने की छुट दी है परन्तु वास्तव में आदिवासियों को अब जंगल में जाना तो दूर उस ओर ताकना भी भारी पड़ सकता है. इस वजह से वे लघु वनोपज को अपनी थाली से गायब पाते है फलस्वरूप कुपोषण बहुत ज्यादा बढ़ा है. यदि उनकी गाय या भैंस जंगल में घास चरते पाई गयी तो उन पर पांच हजार रुपयों का जुर्माना लगाया जा रहा है. पन्ना जिले के ग्राम मनोरा में शुन्नू और कमलेश को जंगल के तालाब से 100 ग्राम की खडिया मछली पकड़ने पर छः माह तक जेल में बंद कर दिया गया. बालाघाट के ग्राम राम्हेपुर के सरपंच गत सात बरसों से कोर्ट में मुकदमा लड़ रहे है - क्योकि उनकी भैंस जंगल में घुस गयी थी मानो भैंस पढी लिखी हो, एक सरपंच को सात दिन तक इस अपराध के लिए जेल में बंद कर दिया गया था अब बताईये कि वन क़ानून लोगों के फायदे के लिए बने है या लोग क़ानून के लिए. वन विभाग के अधिकारियों को दिमाग में यह भ्रम है कि आदिवासी लकड़ी काटते है और जानवर मारते है. वे शायद यह भूल जाते है कि जितना जंगल आज बचा है वह सिर्फ और सिर्फ आदिवासियों के कारण ही बचा हुआ है वरना लकड़ी चोरी और शेरो की खाल या हाथी दांत के व्यापारी कौन है, यह अलग से बताने की जरुरत नहीं है. बहरहाल,  पन्ना का यह उदाहरण बताता है कि किस तरह से लोकतंत्र में आम आदमी को परेशान किया जा रहा है और अडानी, जिंदल, अम्बानी या बड़े उद्योगपतियों को छत्तीसगढ़ या मप्र में ही बड़े जंगल दिये जा रहे है. अभी दो दिन पहले इन आदिवासियों ने एसपी, पन्ना को वन विभाग के अमले के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करने का आवेदन दिया है. यदि आजादी के इतने बरसों बाद और आजादी की साल गिरह के एक हफ्ते पहले मिला यह तोहफा निश्चित ही हमारी तरक्की की कहानी बयान करता है.

-संदीप नाईक  



Tuesday, August 11, 2015

Posts of 11 Aug 15

मेरे भाई की मृत्यु को अगले माह 27 तारीख को एक साल पूरा हो जाएगा, मप्र के भ्रष्ट और घोर निकम्मे प्रशासन में पेंशन और आदि देयक लगभग आठ माह बाद मिलें और अब मामला अनुकम्पा नियुक्ति के लिए अटका पडा है. मैंने बड़े श्रम से और ढेर कार्यवाही करके शासन से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेकर सामान्य प्रशासन विभाग के नियमों के तहत पूरा प्रकरण जिला कलेक्टर देवास को जून माह में भिजवाया ताकि जिले में रिक्त किसी भी विभाग में सहायक ग्रेड के पद पर नियुक्ति हो सके प्रकरण कलेक्टर कार्यलय के बाबू राज में जिला कलेक्टर की भी बाबू सुनते नहीं है, और उन्हें भी घूमात्ते रहते है.

इस अनुकम्पा नियुक्ति के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने के लिए माननीय राष्ट्रपति कार्यालय, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने तीन तीन बार मप्र शासन के मुख्य सचिव को लिखा था, लगता है अब संयुक्त राष्ट्र मंडल में जाना पडेगा क्योकि इस देश के प्रशासन पर से विश्वास उठ गया है.

बार बार मेरे भाई की विधवा पत्नी कलेक्टर से मिलती है और वे बाबू को बुलाकर हडका देते है है परन्तु बाबू टस से मस नहीं होता. कारण यह है कि स्थानीय प्रशासन में बरसों से जमे इन बाबूओं की शक्ति इतनी बढ़ गयी है कि ये शासन के नियमों की लगातार अनदेखी करते है. आज जन सुनवाई में जब पुनः गए तो कलेक्टर महोदय कहने लगे "यह कलेक्टर का वर्ड है कि नियुक्ति हो जायेगी पर कब नहीं कह सकाता, और आप लोग बार बार चतुराई दिखाईये मत और परेशान मत करिए जब कार्यवाही करना होगी तब कर देंगे और अब आने की जरुरत नहीं है". असंवेदनशीलता की हद होती है अपने अधिकार और नियुक्ति के लिए मिलना अगर चतुराई है तो फिर सही तरीका क्या है कलेक्टर साहब? भड़कने से और अभद्र व्यवहार करने से कुछ नहीं होगा, महिलाओं के साथ बातचीत करने का तरीका नहीं मालूम.........आज बाबू ने आपको फिर घूमा दिया !!!!
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काश, जिला कलेक्टर मृत शासकीय कर्मचारी के परिवार का दर्द महसूस कर सकते तो शायद अपने अधिकार का उपयोग करके और इन बाबूओं पर कड़ा नियंत्रण करके मेरे जैसे कई प्रकरण निपटा सकते थे, ऊपर से हमसे कहा गया कि जन सुनवाई में आप यह शिकायत क्यों कर रहे है, आप सिर्फ मौखिक बातचीत करिए ....यानी कोई लिखित सबुत नहीं लेना चाहते, ना देना चाहते है जबकि सामान्य प्रशासन विभाग के नियमों के अनुसार पूरा प्रकरण मिलने पर कलेक्टर एक माह में नियुक्ति की प्रक्रिया सम्पूर्ण कर आवेदक को नियुक्ति देंगे परन्तु नियमों का इस देश में और प्रदेश में पालन होता कहाँ है? जब तक भ्रष्ट और निकम्मे बाबू मौजूद है तब तक कोई कुछ नहीं कर सकता. अपने अधिकारों के लिए दया दिखाने वाले ये प्रशासनिक ढांचा सिर्फ सफ़ेद हाथी साबित हुआ है हिन्दुस्तान में यह किसी से छुपा नहीं है. स्थापना के बाबू क्या होते है यह किसी से छुपा नहीं है खासकरके देवास में.


शर्मनाक है और प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रशासनिक मुस्तैदी की और कसावट की बात करते है.

Sunday, August 9, 2015

Post of 9 Aug 15


सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और सरकारें

अच्छा जरा सुनिए, लोकतंत्र  में डिग्री का महत्व सिर्फ कच्चे पक्के, नासमझ और गंवार समझे जाने वाले पंचायत के समय होने वाले चुनावों में ही होता है क्या? अबोध महिलाओं को आपने 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा 50 प्रतिशत आरक्षण तो दे दिया पर दो बच्चे से ज्यादा वाले चुनाव नहीं लड़ेंगे या आठवी पास के ऊपर ही पंचायत चुनाव लड़ सकते है जैसे क़ानून लाकर आपकी मंशा जाहिर होती है कि आप वास्तव में क्या चाहते है. 

देश के भूमि अधिग्रहण से लेकर कार्बन डेटिंग या परमाणु ऊर्जा या बलात्कार की सजा, या अपने देश की जमीन को दूसरे देश को सौंपना, या कैदियों की जान का निर्णय करना, या इत्ते सारे लोगों के लिए लम्बी योजना बनाना और इत्ते सारे रुपयों का हिसाब रखने के लिए कोई शिक्षा या समझ की जरुरत नहीं होती. राजस्थान में आप पंचायत के चुनाव में एक योग्यता निर्धारित करते है, और अपने समय में सब भूलकर अपढ़, कुपढ और मूर्ख लोगों को टिकिट दे देते है और फिर उनसे संसद में बिलकुल उजबकों की तरह से बहस करवाते है और उन्हें तमाम तरह की उच्च स्तरीय समितियों में रखकर अपनी मन मर्जी के निर्णय लिवा लेते है. 

ध्यान रहे यह आरोप पुरे सत्तर साल की राजनीती पर है सिर्फ मोदी पर नहीं, इसमें स्मृति से लेकर राहुल, सोनिया, ढपोर शंखी साधू संत और सबसे ज्यादा पढ़े लिखे मन मोहन तक शामिल है. 

अब शायद समय है जब देश में जब तथाकथित साक्षरता का स्तर भयानक बढ़ा है, इंजिनियर से लेकर एम ए, पी एच डी का अम्बार है और सब तरह के देशी विदेशी डिग्री लिए लोग बाजार में निकम्मे - नालायक प्रशासकों और नेताओं के कारण सडकों पर नौकरी की भीख मांग रहे है, उस देश में सोनिया, राहुल, स्मृति या मोदी या तोमर जैसे लोग सचमुच देश की एक पुरी पीढी के साथ धोखा है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक भयानक परिदृश्य तैयार करने की गहरी साजिश.

दुर्भाग्य से इस समय हुक्मरानों में इतनी भी नैतिकता नहीं है कि वे अपनी फर्जी ही सही, डिग्री का सार्वजनिक प्रदर्शन करें या आगे आकर खुद इस बात और विवाद को शांत करें. एक तरफ आप शिक्षा और सार्वजनिक रूप से शिक्षा के सार्वभौमिकरण की बात करते है, जनसंख्या से लेकर तमाम तरह के प्रपत्रों में शिक्षा का चालना लगाते है और इसी आधार पर छांट बीन करते है और अपनी बारी आने पर निहायत ही कायराना ढंग से छुप जाते है और फिर दुनिया भर में नैतिकता, ईमानदारी और पारदर्शिता का ढोल पीटते है. यह सिर्फ राष्ट्रीय शर्म ही नहीं, बल्कि इस छोटे से आधार पर किसी को भी किसी व्यवस्था में बने रहने का अधिकार नहीं है. 

इस पाप की शुरुवात कांग्रेस ने की, समाजवादी, जदयू, बसपा, वामपंथी, दक्षिण की सभी पार्टियां, और अब भाजपा यानी कोई भी दूध का धुला नहीं है. जयललिता जैसों ने तो शिक्षा का सत्यानाश ही कर दिया जब उन्होने अपने कार्यकाल में खुद को ही विश्व विद्यालयों से डाक्टरेट की डिग्री दिलवा दी, इससे बड़ी शर्म क्या होगी? इस समय हम सब नरेंद्र मोदी की तरफ आस भरी दृष्टि से देख रहे है कि वे ना मात्र आगे आये बल्कि इस समय देश की मांग को समझाते हुए अपनी डिग्री सार्वजनिक करें, लोक जीवन में एक आदर्श स्थापित करें, और इस धुंध को छांटे. यह उम्मीद कांग्रेस से नहीं कर सकते क्योकि वहाँ तो पुरे कूएं में भांग पडी है और बाकी दलों की बात छोड़ दें. 

एक बार मोदी जी ईमानदारी से अपने पुरे मंत्री मंडल की शिक्षा को सार्वजनिक कर दें और फिर देखे आपको जो बहुमत मिला है वह कैसे सम्मान में बदलता है और आपकी वाह वाही होती है.

Saturday, August 8, 2015

Post of 8 Aug 15




अभी एक अध्ययन किया है जिसमे किशोरियों की शिक्षा और पोषण को लेकर काम किया है. स्नेहां की इस रपट ने मेरी बात की पुष्टि की है. मुझे ज्ञात हुआ कि अध्ययन के सेम्पल में से  21%  किशोरियां अनपढ़ है, और मात्र 3.5 % ने बारहवीं के ऊपर पढाई की है, और सबसे मजेदार यह है कि ये सब 10 से 20 वर्ष तक की किशोरियां है यानी सर्व शिक्षा अभियान के बराबर इनकी उम्र है और अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता वर्ष 1990 के बाद जोर शोर से हुए साक्षरता के प्रचार प्रसार और पढ़ना बढना आन्दोलन और फिर तमाम तरह के ढपोरशंखी कार्यक्रमों के बाद भी ये प्राथमिक शिक्षा से वंचित है. 

उल्लेखनीय है कि मप्र में मानव संसाधन मंत्रालय से लगभग  एक करोड़ का सालाना  अनुदान प्राप्त करने वाले दो राज्य संसाधन केंद्र (प्रौढ़ शिक्षा) है - इंदौर और भोपाल में, दोनों का प्रबंधन एनजीओ करते है. इसमे काम करने वाले दक्ष कम जुगाडू ज्यादा है जो कभी लग गए थे सो टिके है और ये लोग है जो सिवाय लिपा- पोती के और कार्यशालों के कुछ नहीं करते. इसमे काम करने वाले लोग या तो लिखाड़ बन गए या दूसरी संस्थाओं में जाकर ज्ञान बांटकर रुपया कमाते है और इंदौर भोपाल कोई छोड़ना नहीं चाहता. सबसे पहले इन्हें बंद किया जाए और यहाँ के कर्मचारियों को दूर दराज के इलाकों में भेजा जाए. 

रहा सवाल शिक्षा का तो वो अनिल सदगोपाल से लेकर तमाम तरह के शिक्षाविदों ने नवाचार के नाम पर राज्य प्रायोजित और टाटा बिड़लाओं से प्रचुर मात्रा में अनुदान खाकर शिक्षा के धंधों में सब ख़त्म कर दिया है. और यहाँ से निकले धंधेबाज उप्र से लेकर दूसरे राज्यों में अब रुपया हवस की तरह कमा रहे है और भोपाल, बनारस, दिल्ली में जमीने लेकर पूंजीपति और मठाधीश बन गए है. राजीव गांधी प्राथमिक मिशन का ढोल पीटकर अमिता शर्मा जैसे प्रशासनिक अधिकारी दिल्ली उड़ गए और राज्य और जिलों से लेकर बीआरसी तक के बने हुए शिक्षा के नाम पर ऐयाशी के अड्डे चाहे वो संकुल हो या डाईट, शिक्षा महाविद्यालय हो या बीबीसी जैसे शिक्षा के कुप्रयोग ......अब प्रायः बंद पड़े है. 

मप्र में कोई ना लगाम कसने वाला है ना, ना चाहने वाला, इसलिए नवाचार व्याभिचार बन गया है और शिक्षा व्यापार, इसलिए इसका लंबा परिणाम व्यापमं के रूप में देखने को मिलता है. 

तुम्‍हारे साथ - सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना



तुम्‍हारे साथ रहकर
अक्‍सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
संभावनाओं से घिरे हैं
हर दीवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड़ गुज़र सकता है।


- सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना

Tuesday, August 4, 2015

Posts of 4 Aug 15



वैसे इस वर्ष मौसम वैज्ञानिकों ने (जी हाँ भारतीय महान सरकारी विभाग के वैज्ञानिकों ने ) भविष्यवाणी की थी कि बरसात कम होगी भला हो हमारी आस्था और विश्वास का कि समय रहते कवेलू ठीक कर लिए , फेर लिए, छत ठोंक दी, रिसती दीवारों पर हाथ फेर लिए, रेनकोट भी खरीद कर रख लिया, छतरी की ताड़ी सुधरवा ली, प्लास्टिक के जूतों को सिल्वा लिया,  भुट्टे खरीदकर रख लिए, मूंगफली सेंक ली, सोलर वाली इमरजेंसी लाईट रोज चार्ज करके रख लेते हेंगे, और सायकिल को गिरीस पेंटिंग डेंटिंग करवा कर रख लिया, नई तो भिया सई के रिया हूँ वाट लग जाती......... कुछ भी बोलते  है यार ये लोग भी क्यों.......भिया ???

भाई Nalin Ranjan Singh ने एक गंभीर मुद्दे की ओर ध्यान आज दिलाया है
"राजधानी लखनऊ के 1850 स्कूलों में पढ़ने वाले 1.83 लाख बच्चों में 91 हजार यानी 50 फ़ीसदी बच्चे पढ़ने नहीं आ रहे हैं जबकि इन स्कूलों में पंजीकृत 1.83 लाख बच्चों में पात्र बच्चों को स्कालरशिप भी जारी कर दी गयी थी | सभी बच्चों को ड्रेस और किताबें भी दी गयी थीं |
यह मेरी नहीं डी.एम्.राजशेखर की रिपोर्ट है | इसमें यह भी जोड़ दें कि मिड डे मील भी बन ही रहा होगा"

मप्र की स्थिति भी इससे कोई जुदा नहीं होगी, मप्र में यदि कोई एनजीओ या स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करें तो शायद स्थिति समझ आये. लखनऊ के बारे में मेरा आकलन है कि दरअसल में यूपी में दिल्ली के बड़े शिक्षाविदों ने जो शिक्षाविद कम ठे्केदार ज्यादा है, ने कुछ स्थानीय मास्टरों का शोषण करके और उन्हें बरगला कर या फुसलाकर सारा कबाड़ा किया है. हरदोई से लेकर SIEMAT SCERT और ना जाने कहाँ कहाँ से ये लोग घूस गए है.. मैंने खुद इन्हें लखनऊ में अधिकारियों से हाथ मिलाते देखा है और कमाए धन से एकड़ों जमीन खरीदी है दिल्ली से लेकर बनारस तक......बेसिक इंसानियत नहीं है शिक्षा क्या देंगे ये भिक्षाविद.?

ये जो हाथी को लेकर भीख मांगने हट्टे कट्टे साधू संत निकल पड़ते है जो हाथी को गजानन्द और गणेश कहकर भीख कपडे अनाज बर्तन मांगते है, ये लोग वन विभाग को दिखाई नही देते ? खुले आम सड़कों पर ट्राफिक जाम करते जाते है और बेशर्मी से चिल्लाकर ध्वनि प्रदूषण भी करते है।
वही दूसरी ओर एक आदिवासी की गाय, बकरी या भैंस जंगल में घूस जाए तो जंगल विभाग इस गरीब को जेल में डाल देता है, 5000 हजार जुर्माना वसूलता है और ना जाने क्या क्या तोहमते लगाकर उसे लकड़ी चोर , बाघों का हत्यारा साबित कर देता है और इन सड़कों पर घूमने वालों मुस्टंडे साधुओं के भेष में निकम्मों को भीख देकर दुआएं लेता है क्या? मजेदार यह है कि समाज के सारे जिम्मेदार लोग मूक रहते है और दुआएं बटोरते है।
वाह रे जंगल के रखवालों !!!!

जो भाजपा अपने गिरेबां के शिवराज, सुषमा, वसुंधरा, निहालचंद्र, रमनसिंह, अमित शाह , जेटली, उमा भारती, , तमाम तरह के ढोंगी पाखण्डी साधू साध्वी जो संसद में अनाचार फैला रहे है और खुद मोदी जो देश की आँख में धूल झोंक रहे है उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नही करती उस पार्टी की सुमित्रा महाजन ने 25 सांसदों को निलम्बित कर अपनी कूप मण्डूक मानसिकता दिखा दी है. स्पीकर के रूप में उनका यह काला कार्यकाल याद रखा जाएगा। और मजेदार यह है कि मप्र में शिवराज जैसे भृष्ट और व्यापम में लिप्त मुख्यमंत्री ने विधान सभा तीन दिन में बन्द कर दी और भाग खड़े हुए. इतने लोकतांत्रिक है तो हिम्मत से मानसून सत्र चलाते ! पिछले दो बार से सदन में बैठने की हिम्मत नही पड़ रही और सुमित्रा जी जरा अपने 25 साल के अपने कार्यकाल को याद करो इंदौर में जो आपने रायता फैलाया है उसे समेटने में सदियाँ लग जायेगी. इंदौर को एक शहर से झुग्गी बनाने में और टुच्चे नेताओं को मंत्री बनाने में आपको हमेशा याद किया जाएगा. कितने दिन रहती है आप यहां और करती क्या है सिवाय मराठी ब्राह्मणों के जनेऊ संस्कारों में जाने के ? संसदीय मर्यादा - उफ़ ये शब्द तो अब देश के लिए कलंक हो गया है !!!


फिर आ गए है ये कारे बादल, बरस रहा है नेह और मन के किसी कोने में धधकती ज्वाला शांत हो चली है... अबकी बार इस बदली के साथ सब बरस जायेगा तो रिक्त होता सा लगूंगा और रिसते हुए टिप टिप बहुत अंदर किसी धरती के मुहाने से किसी क्षितिज में समां जाऊंगा और एक दिन फिर से अलस्सुबह किसी शुक्र तारे की आंच में तुम्हारे आँगन में एक कोंपल बनकर फिर उग आऊंगा, देखना तुम पहचान नही पाओगे... ये जो बादल है ना अपने साथ बड़ी कहानियाँ भी समेट लाते है इनकी झोली में सिर्फ नेह की बूंदें ही नही एक सृष्टि का अवसान और प्रारब्ध भी छुपा होता है... सुन रहे हो ना...कहाँ हो तुम.... तुम्हारे लिए....

पोर्न का विरोध वो कर रहे है जो चौबीसों घंटे इसी में डूबे रहते है, कवि सम्मेलनों में जाकर बदनाम होते है और बावजूद उसके भी लगे रहते है अपनी कुंठा मिटाने में और अब सद्व्यव्हारी बनकर ज्ञान बाँट रहे है..............

उपदेशों ही मूर्खानां...............!!!


Monday, August 3, 2015

Posts of 3 Aug 15



मप्र में कुपोषण को लेकर मेनका गांधी ने संसद में NFHS -III के आंकड़ों के आधार पर एक वक्तव्य दिया था, उस पर अपुन ने भी लिख मारा कि माते  ज़रा गंभीरता से देखो उथले कमेन्ट मत करो...........माते ने कहा था कि मप्र में सबसे ज्यादा कुपोषण है और यह पिछले बरसों में बढ़ा है. (ध्यान रहे कि माते के नैहर वाले यानी भाजपा यहाँ कई बरसों से काबीज है और बच्चे उनकी प्राथमिकता नहीं वरन शराब, व्यापम, डम्पर काण्ड, खनिज  जैसी बड़ी उनकी प्राथमिकताएं है) ........

आज की नई दुनिया में 3/8/15




सोनी चैनल को मालूम है कि भारतीयों ने सत्तर साल में कुछ काम नही किया सिर्फ खा-खाकर कब्जियत बढ़ा ली है, अस्तु 15 अगस्त की शाम को स्वतंत्र भारत में नागरिकों को "पीकू"का तोहफा !!!
मुबारक, अब इंतज़ार है झंडू आयुर्वेदिक वाली दवा कम्पनी झंडू पंचारिष्ट आधी कीमत में हाजमोला की पांच शीशियों के बोनस सहित देने की घोषणा करें और श्री सदी नायक इसका विज्ञापन करें निशुल्क