Thursday, June 30, 2016

Posts from 24 to 30 June 16



मुझे याद है जब मैं प्राचार्य था तो एक अधिकारी मेरे पास आये वे बोले कि मेरे बच्चों के छात्रवृत्ति के फ़ार्म फॉरवर्ड कर दो , तो मैंने कहा सर ये तो अनुसूचित जाति के है और आप तो सवर्ण है , बोले नही वो तो मैंने सरनेम बदल दिया है, असल में तो मैं चमार हूँ। मैंने कहा उसमे कोई गलत नही पर ये सवर्ण होने का नाटक क्यों तो बोले फर्क पड़ता है। एस डी एम रहते हुए सवर्ण बनकर देवास में खूब तथाकथित यश कमाया ब्राह्मण समाज की अध्यक्षता करते रहे, सम्मेलन में ज्ञान बाँटते रहें और जब विभागीय डी पी सी की बात आई तो अपना चमार होना स्वीकार करके आय ए एस बन गए। पूरा ब्राह्मण समुदाय हैरान था, बाद में वे प्रमोट होकर कलेक्टर बन गए , यहाँ वहाँ कलेक्टर बने और खूब रुपया कमाया, अपने नालायक बच्चों को सेट करवाया , खूब चांटे भी खाये जहां गए वहां सार्वजनिक रूप से लोगों ने जन सुनवाइयों में पीटा और घसीटा। बाद में शिकायतों के अम्बार के बाद इन्हें भोपाल में बुला लिया पर जो सवर्णवादी ठसक का दिखावा करते थे वो गजब की थी साले सवर्ण शर्मा जाए !!!
बहरहाल ये हकीकत है, दलित को दलित कहने में शर्म आती है और ये चयनित अधिकारी सवर्णों के सरनेम लगाकर सबसे ज्यादा दलितों का ही शोषण करेंगे मप्र के कई दिग्गजों को जानता हूँ जिन्हें जात छुपाकर सवर्ण बनने का चस्का है और अब धन बल पर अब अपने बच्चों को सवर्ण बना रहे है पर जहां फ़ायदा मिलेगा वहां फट से भँगी, पासी, चमार या बलाई बन जायेंगे।
इसलिए मैं कहता हूँ जात बता बे !!!
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आई आई टी और मेडिकल में जाने की तैयारी करने वाले बच्चों को कोचिंग के विज्ञापनों से फायदा हुआ हो या ना हुआ हो पर भास्कर, नईदुनिया जैसे अखबारों ने रोज जैकेट बनाकर जरूर अपने गोदाम भर लिए। इन मन मोहक विज्ञापनों पर कोई रोक लगेगी जिससे बच्चे इनके जाल में फंसते है और अंत में जाकर आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते है। सरकार कोचिंग के खिलाफ एक्शन लेती है पर इन अखबारों के खिलाफ कुछ नही करती जो रोज भ्रामक विज्ञापन छापते है। देवास के एक कोचिंग के विज्ञापन भी आते है जो लोग अपना बी ई नही कर पाएं वो आई आई टी में घुसवाने का दावा करते है। शर्मनाक ।
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ये जो सड़ी गली न्यूज कटिंग, आलेख, कहानी, कविता या अपने पुराने छपे हुए फोटु की फाइल को किसी पदमश्री के तमगे की तरह से घर में दबोचकर रखा है और हर आने जाने को बेमुरव्वत परोस देते हो और फिर कम दूध शक्कर और चाय पत्ती वाली घटिया चाय पिलाकर घर से विदा करते हो और अब रोज फेस बुक पर सुबह शाम भयानक गम्भीर हो चुके लेखक होने की बीमारी से ग्रस्त होकर इन सबके फोटु यहां पेलते हो ना, इसे ही शास्त्रों में छपास की कुंठा कहा गया है ।
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रात अब नींद का आगोश नही वरन एक घबराहट की तरह से आती है और सारी रात अँधेरे को और पसरता हुआ बहुत करीब से देखता हूँ इतना कि जब भोर में कुछ कुछ उजाला होने लगता है तो रश्मि किरणों से भी डर जाता हूँ क्योकि इनके अंत पर फिर एक रात खड़ी है ।
एक नींद है जो आती नही और कुछ ख्वाब है जो सुला देते है और इस सबमे कमजोर आदमी क्या करें, स्वीकारोक्ति और अनिद्रा दो दुर्लभ लक्षण जीवन के !!!
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बीत ही क्यों ना जाती आषाढ़ की यह लम्बी रात और इसके मुहाने से उग आये सावन की सुबह
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खतों में रिश्ते रहते थे.
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ये जो फेसबुक और वाट्स एप पर दोस्ती, वफ़ा और प्यार की कसमें निभाते हो घटिया चुटकुलों से लेकर "धार्मिक" वीडियो शेयर करते हो और ताउम्र समबन्ध निभाने के वादे करते हो और जब नेट बेलेंस खत्म हो जाता है तो सारी वफ़ा फुस्सी बनकर निकल जाती है, शास्त्रों में इन्हें ही दोगले कहा गया है।
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अचानक से देख रहा हूँ कि पत्रकारों को एनजीओ के कामों में रूचि आने लगी, मुफ़्त की रोटी तोड़ने के लिए बेचैन होने लगे है, और कुछ नही तो दुनियाभर की खबरें तोड़ मरोड़ कर पेश करने लगे है क्योकि पत्रकारिता से कुछ मिल नही रहा और यहां कुछ काम करने की समझ नही लिहाजा ब्लैकमेल का धंधा अपना लिया है इंदौर भोपाल से लेकर देश भर के राज्यों के बड़े शहरों में ये कुंठाग्रस्त मीडिया कर्मी सेक्स वर्कर की भूमिका में आ गए है और बुरी तरह से हाय पैसा हाय पैसा कर रहे है क्योकि इनकी औकात तो नही है कि कुछ ढंग का अकादमिक काम कर पाएं, लिख पाएं या फील्ड वर्क भी कर पाएं बस सबसे ज्यादा इनका फ्रस्ट्रेशन एनजीओ पर निकल रहा है और अब अपनी आशाएं उम्मीदें इन्होंने अपराध बोध के बहाने से एनजीओ पर निकालना शुरू कर दी है। कईयों को देखा है जिनकी औकात दस हजार माह की नही थी वे राजधानी में सत्तर से अस्सी लाख तक का मकान दूकान लेकर बैठे है और रोज हवस बढ़ती जा रही है।
यही हाल कुछ सरकारी कर्मचारियों का भी है जो दिन रात दमन में पीस रहे है, हमारी रचनात्मकता खत्म हो रही है और हमें अशिष्ट तरीके से शोषित किया जा रहा है जैसे जुमले उछालकर एनजीओ में आने की तमन्ना है, ये वो लोग है जिनके कुत्सित इरादों को कही जगह नही मिल रही तो ये एनजीओ से पाना चाहते है और जब इनकी तृतीय श्रेणी कर्मचारी बुद्धि के चलते कुछ मिल नही रहा तो ये गाहे बगाहे अपनी घटिया लेखनी और अनर्गल प्रचार प्रसार से खुद के अमर होने के लिए दुष्प्रचार में संलग्न है।
भगवान भला करें इन सबका !!!
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रात गुजर जाए 
यूँही बीनता रहूँ 
नेह की बूंदे आँगन में
तुम किसी में तो मिलो 
मेरे आसमान में गूँज है
धरती पर कम्प है
बीच अधर में बूँदें
अब मिल भी जाओ 
कि जीवन अमृत हो जाएँ

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हल्के बादल, हवा मे पानी की बूँदें, सुर्ख आसमान और दूर कही से लौटते पक्षी, और नीचे नेह को सोखती धरती, सूख रही मिट्टी, एक खुशबू इसे, कहें तो सौंधी, वैसे कोई नाम नही दे सकता इसे मैं, छोटे से कोमल पौधे निकल रहे है और बड़े पेड़ों की छाल पर रजत बूँदें ठहर कर उन्हें मखमली बना रही है, पत्तियों का हरापन आँखों को चुभने लगा है मानो आँखों से हरियाली छिनकर ले गए हो कमबख्त, ये रुक रुक कर गूंजते स्वर और कलरव गान और दूर पहाड़ी पर लूका छुपी खेलती धूप का अस्त होता साम्राज्य अपने आप से शरमाकर विलीन हो गया है, नन्ही बूंदों ने प्रखर ताप को चुनौती देकर खत्म कर दिया है । छत पर देखता हूँ तो उबड़ खाबड़ कवेलू और अतरो पतरों को ठीक करते मानुष चेहरों से व्यथित नजर आते है यूँ नही कि दो पल तक लें ऊपर निरभृ आसमान को और सदियों की प्यास बुझा लें।
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निहारता हूँ सारी रात
तकता हूँ सारी रात
बैठा हूँ हथेलियाँ पसारे
कि समेट लूँ अपने हिस्से की 
चन्द नेह की अमृत बूँदें

Saturday, June 25, 2016

Posts between 16 to 23 June 16 Mamoni and Sankalp




जैन दर्शन में एक सिद्धांत होता है - देखने का, दृष्टा का, सम्यक दर्शन, ज्ञान और सम्यक चारित्र का; जो कहता है कि हर वस्तु जीव का एक चरित्र और स्वभाव होता है. जैसे मिर्ची है, तो उसका चरित्र चरपरापन है, तीखापन है; पानी का चरित्र बहना है, गीलापन है, काक्रोच का स्वभाव गंदगी में रहने का है, मच्छर का स्वभाव काटना है, जौंक का स्वभाव खून चूसना है, सांप का विष वमन करना है, जहर का स्वभाव जहर फैलाना है, गुलाब का स्वभाव खुशबु है,.....आदि-आदि. जब आप इनसे इनके स्वभाव और चरित्र के अलावा किसी व्यवहार की अपेक्षा करेंगे, तो वह स्वभाव कार्यरूप में आना संभव न होगा और अपन कुड़ेने लगेंगे. अब गलती उस जीव या वस्तु की तो नहीं है; कि वह हमारे अनुरूप व्यवहार नहीं करते; गलती हमारी है कि हम गलत अपेक्षा या उम्मीद कर रहे हैं. वे तो अपने चरित्र और स्वभाव के अनुरूप की कार्यरत हैं.
अब ऐसे में क्या करें? तो सिद्धांत कहता है कि जब आप चरित्र और स्वभाव को बदल नहीं सकते, तो अपनी भूमिका तय करो और सिर्फ देखो कि क्या हो रहा है, कौन कर रहा है? आप अपने स्वभाव और चरित्र को ही नियंत्रित कर सकते हो, उसके अनुरूप चलो; बस! इससे थोड़ी नींद आएगी. रक्तचाप नियंत्रित रहेगा. जुबान साफ़ रहेगी. षड्यंत्र रचने की पृवृत्ति नियंत्रित रहेगी. आखिर में पता चलता है कि समग्र विश्व उतना ही है, जितना हमारा अपने स्वभाव और चरित्र के बारे में अपना खुद का ज्ञान और भान. इसका आशय यह भी नहीं है कि खुश रहिये या दुखी रहिये; बस बने रहिये, वास्तव में जो आप हैं ।


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ये जो प्राइवेट बस स्टेण्ड पर खड़े होकर कंडक्टर से हुज्जत करके अपने और बीबी के किराए में से बीस बीस रूपये कटाकर तीन मोटू और गबरू बच्चों को तीन की सीट पर बिठाकर टिकिट माफ़ करा लेते हो ना हरसोला या लोहारपीपल्या जाने को और फिर भर गर्मी में खटारा बस में बैठकर अपने सड़े गले मोबाईल से फेसबुक अपडेट करते हो ना गोइंग फ्रॉम "देवी अहिल्या बाई एयरपोर्ट या नई दिल्ली टर्मिनल 2 या मुम्बई एयरपोर्ट" लिखकर हवाई जहाज का निशाँ छोड़ते हो ना उसे ही शास्त्रों में छल प्रपंच कहा गया है।

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ये जो दोस्तों को मिस कॉल करके अपना प्यार जताते हो ना और फिर कहते हो कब से ट्राय कर रहा हूँ और तुम उठा नही रहे थे बार बार पूरी घण्टी जा रही है, वह मिस कॉल नही था, उसे शास्त्रों में कृपणता कहा गया है और इस मानवीय कमजोरी को दूर करने का शास्त्रोचित तरीका तुम्हारे नम्बर को फोन बुक, वाट्स एप और अन्य सभी जगहों से ब्लॉक करके तुम्हारा हर तरह से बहिष्कार करने को सुझाया गया है।

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ये जो बरसात में घर से प्लास्टिक की पन्नी में मोबाइल और फटा हुआ बटुआ रखकर निकलते हो और दोस्तों को एक प्लेट गर्म पकौड़े और कट चाय नही पिलाते ना - उसे ही शास्त्रों में मनुष्य योनि के पाप कहा गया है ।

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एक पिता के जल्दी खत्म हो जाने से खुद का पिता हो जाना बहुत खतरनाक होता है और फिर सारी उम्र आप संयम, समर्पण और सेवा में ही खत्म हो जाते है जब तक आप अपने आपके बारे में सोचना शुरू करते है तब तक सब कुछ खत्म हो जाता है। 
ऐसे असमय बने सभी पिताओं को याद कर और उनके जज्बे को सलाम करते हुए आज के इस बाजारीकृत पितृ दिवस की शुभकामनाएं ।


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बरसात होने की उम्मीद में कितने बीज धरती के कड़े कवच को फोड़कर बाहर आने की हिम्मत कर रहे है ।

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कौव्वों से ज्यादा उम्मीद न करें, उनकी औकात सिर्फ कंकड़ उठाने की ही है, शिलाएं उठाने और उन्हें संवारकर मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या चर्च बनाने के लिए जो कौशल और दक्षता लगती है वो इन कौव्वों में कभी नही आ सकती, ये महान काम करने वाले कुछ और ही लोग होते है ।

अरे जो कौव्वे अपने घोंसलें नही बना सकते और कोयल के घोंसले में अंडे रख देते है वे क्या जमीन तोड़ने का काम करेंगे ? इसलिए डरने की बात नही कौव्वों की पूजा करें और उन्हें मरे खपे लोगों के पिण्ड छूने के लिए मनुहार करते रहें , ये काले कौव्वे सिर्फ चिल्ला ही सकते है बाकी तो अछूत ही रहेंगे।


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संकल्प, मामोनी, शाहाबाद, बारां राजस्थान में आज बीस बरसों बाद गया। मोती और चारु के बनाये इस कैम्पस की शुरुवात मेरे सामने हुई थी कितनी बार आया, गया - याद नही पर आज मोती और चारु की मौत के बाद उनकी अनुवस्थिति में जाना बहुत ही नास्टेल्जिक कर गया।
पुराने साथी चन्दा भाई, रमेश और गजराज जी मिलें पर अब सवाल है कि कोई प्रोजेक्ट नही, ठोस काम नही, अनिल बोर्दिया जी नही, खैरुलाल भी गुजर गया। बजरंग लाल जी रिटायर्ड हो गए, नीलू दोमट में कही अस्पताल और आश्रम चला रहे है, लवलीन भी गुजर गयी, महेश बिंदल है जो इन तीन साथियों के साथ कुछ करने का प्रयास कर रहे है पर बड़ा सवाल है कि अगले वे लोग कौन है जो तीसरी पीढी की लीडरशिप सम्हाल सकें ।
आते समय चारु की तंगी तस्वीर ले आया साथ में।


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तन गीला, मन सूखा रह गया
कल बारिश में सब कुछ बह गया.
निहारता हूँ सारी रात
तकता हूँ सारी रात
बैठा हूँ हथेलियाँ पसारे
कि समेट लूँ अपने हिस्से की 
चन्द नेह की अमृत बूँदें

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घर से बच्चे चले जाने के बाद घर सिर्फ अवशेष रह जाते है
लौट आओ बच्चों अपने घर में जो भी है सब तुम्हारा है, लौट आओ !!!!

Thursday, June 16, 2016

महंगाई के खेल में लिप्त मोदी सरकार Posts of 16 June 16

महंगाई के खेल में लिप्त मोदी सरकार 

इस देश के राजनीतिज्ञों, प्रशासन और नीति निर्माताओं को आम लोगों से कुछ लेना देना नहीं है यह तो स्पष्ट ही है पर सुप्रीम कोर्ट और रबर स्टाम्प राष्ट्रपति भी इतनी बेरुखी दिखाएँगे यह पता नही था।
सरकार के हाथ से शासन और प्रशासन दोनों छूट गया है या तो सरकार खुद इस पूरे महंगाई के खेल में शामिल है या भृष्ट, गुंडे मवालियों के दबाव में कुछ भी कर पाने में असमर्थ है। 
यह दुर्भाग्य है कि सब्जी से लेकर खाने की वस्तुएं और पेट्रोल डीजल पर अब बाजार का कब्जा है।

मनमोहन रचित बाजारीकरण और खुलेपन से वर्तमान सरकार को और ज्यादा मौक़ा मिल गया कि वह देश को कैराना से लेकर उलजुलूल मुद्दों में उलझाये रखे और अम्बानी से लेकर गली मोहल्ले के टुच्चे व्यापारी नंगा नाच करें और सुबह शाम निक्कर पहनकर देश भक्ति में नमस्ते सदा वत्सले गाते रहें।
जिस देश के विकास के खोखले नारे लेकर विदेशों में भीख का कटोरा और चापलूसी का छद्म रचते हो वह कितना घिघौना है, छि !
भारतीय जनतंत्र में किसी भी सरकार ने दो साल में इतना खराब शासन कभी नही किया, यहां तक कि जिन भृष्ट कांग्रेसियों को हटाकर आप आये थे अच्छे दिन लाने उन्होंने भी 60 साल लिए देश को खोखला करने में पर आप तो जड़े ही खोद रहे हो हुजूर, शर्म आती है या वो भी बेच खाई है निर्लज्जों की तरह।
तुमसे तो अच्छे वो पिछड़े देश है जो अपनी जनता के लिए जीते मरते है, तुमने तो अपने घर परिवार को बेच दिया और जिस भारत माता की दुहाई देते नही थकते उसे विश्व बाजार में सरेआम कलंकित कर दिया। इस महादेश के लोग अब तरस रहे है और कोस रहे है और तुम ना जाने किस लोक में दिवा स्वप्न देख रहे हो। शर्मनाक है एक लोकतंत्र में मुखिया और समूची राजनीति का इस तरह से गैर जिम्मेदार हो जाना और बिक जाना !!!

Wednesday, June 15, 2016

Posts of 15 June 16 देश बदल रहा है‬


फिर भी खिल रहे है बिना नागा फूल दोपहरी में 
महक रहा है पुदीना और मोगरा इस ताप में
तुतलाती जुबान से विकसित हो रही है भाषा
लार्वा से बन रही है मछलियाँ और मेंढक

एक ठहरे पानी में तैर रहे है अमीबा अभी भी
हाथी और शेर को चुनौती नही दे पाया कोई
पेड़, पहाड़ और ऊँचे हो रहे है हर पल 
जमीन में लगातार फ़ैल रही है जड़े

हवा अभी भी आवारा सी घूम लेती है उन्मुक्त
दुनिया में अभी भी प्रेम पींगे पसार लेता है
सूरज वक्त पे निकल आता है उसी ऊर्जा से
चाँद की गति भी बदल रही है पक्ष दर पक्ष

जुगनू रोज लड़ते है मजबूत अंधेरों के खिलाफ
नन्हे से बीज फोड़कर उग आते है बंजर धरती को
सब कुछ वैसा ही है ठहराव और बदलाव
पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना बदस्तूर जारी है

सिवा इसके कि एक गिरगिट को लगता है कि
उसके हर पल रंग बदलने से दुनिया बदल जायेगी 
उसके अनुसार और थम जायेगी गति पूरे ब्रह्माण्ड की 
और वह समय को थाम लेगा मुट्ठी में ।

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बुढ़ापा बचपन की शैतानियों और जवानी के सद-लक्षणों से गुजरता पाप होता है जिसे भुगतने के लिए सबको तैयार रहना चाहिए।
- बूढ़ी काकी (प्रेमचन्द) से मुआफ़ी सहित


सुधार की जुगाड़ में झूठ से नाता भी ना जोड़े क्या ?
-प्रेमचन्द से मुआफ़ी सहित !

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अबकि बार
लात की दरकार
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Tuesday, June 14, 2016

Posts of 14 June 16 PM Modi

प्रधानमंत्री ने इलाहाबाद में कहा  कि " अगर ढंग  से काम नही किया तो लात मारकर बाहर कर देना "

लम्पट, लठैत और गुंडे मवाली जब सत्ता में आते है तो भाषा का सबसे पहले चीर हरण होता है, और फिर इनका तो गांधी वध से लेकर गुजरात, बाबरी मस्जिद, मुज्जफर नगर, दादरी, और अब ताजे नकली कैराना तक संहारों में साफ़ हाथ है , अस्तु यदि "लात घूंसे माँ बहन और आदि अलंकारिक शब्दों का प्रयोग" सांविधानिक पद पर बैठा कोई भी शख्स करता है और मीडिया इसे प्रचारित करता है तो कोई गलत बात नही है।
फांसीवाद की दबे पाँव नहीं खुले आम कानूनी रूप से लाल कार्पेट बिछाकर स्वागत करने वाली बात है यह और अब इस बहस का भी कोई मतलब नही कि पन्त प्रधान तो श्रेष्ठ है परंतु उनके सिपाही , संगी साथी - जो साधू संतों के भेष में सांसद बने बैठे है या विधायक जो सरकारें गिराने के लिए या राज्य सभा जैसे पवित्र सदन में खरीदी फरोख्त से लेकर गुंडई करने माहिर है, खराब है। जब तक ऊपर से श्रेय या राज्याश्रय नही होगा तब तक कोई चूँ चपड़ नही कर सकता।
दुखद है एक सबसे बड़े लोकतन्त्र के प्रमुख का इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना, और हम घर में बच्चों को, किशोरों को, युवाओं को शिष्टाचार सिखाते रहें । दूसरा महत्वपूर्ण यह कि यह लात मारकर भगाने के लिए मुझे किसी भी हालत में इतने गलीज स्तर तक जाने की जरूरत नही है, मैं भारतीय संविधान का जागरूक और सम्मानित नागरिक हूँ जो वोट की ताकत जानता है, गत 60 सालों में त्रस्त होकर बहुत ही शिष्ट तरीके से कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया था, हाल ही हो रहे विभिन्न चुनावों में जनता ने यह किया हो - मुझे याद नहीं पड़ता कि लोकतन्त्र में "लात" की जरूरत किसी को पडी हो, हो सकता है कि दो वर्षों में अपनी अकर्मण्यता, नाकामी, और देश के लोगों के अच्छे दिन ना ला पाने के लिए अभी से ग्लानि भाव जाग गया हो और परिणीति स्वरुप यह दिवास्वप्न दिखने लगा हो।
यकीन मानिए महामना हम आपका, अपने देश के बहुमत का और "प्रधान मंत्री" नामक सांविधानिक पद का दिल से सम्मान करते है और हमारे खून, संस्कृति और परम्परा में लात मारना नहीं सिखाया गया है।
हमारे धर्म में रावण को भी हमने इज्जत दी है, मरते समय हम उसके चरणों में बैठकर ज्ञान ले रहे थे, हमने कंस को राजा माना है, हमने दुर्योधन, शकुनि, सूर्पनखा, विभीषण को भी सम्मान दिया, ताड़का से लेकर भस्मासुर तक को इज्जत दी और उनके मृतक शरीर को भी बहुत सम्मान से रखा और पूजा है, अरे शिखण्डी तक हमारे धर्म में पूजनीय है। हमने कभी लात का प्रयोग नही किया क्योकि हम अपने वोट की कीमत जानते है, ऐसे ओछे विकल्प हमारी संस्कृति में नहीं है, आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी या किसी अन्य पार्टी को भी ऐसी मात देने की जरूरत नही पडी।
कृपया चुनाव की वैतरिणी पार करने के लिए प्रभु राम की तरह केवट पर आश्रित रहें और उसके पाँव पड़े, लात मारने जैसी बात कर अपनी शिक्षा, सभ्यता और घरेलू संस्कारों की महत्ता का प्रतिपालन और दिखावा न करें।
हम शांतिप्रिय लोग है और वसुधैव कुटुम्बकं में यकीन करते है क्योकि असली हिन्दू है , 1992 में रथ यात्रा से प्राप्त लायसेंस धारी नही सनातन और शाश्वत हिन्दू । आपको देश हित में सदबुद्धि परम पिता परमेश्वर दें।
इति, ॐ शान्ति !!!

Thursday, June 9, 2016

Narendra Modi's 5 Country Visit and Poor India.and #Subahasawere news paper Post of 9 June 16

Narendra Modi's 5 Country Visit and Poor India. 

(अंधभक्त, चापलूस, और कमजोर दिल वालें ना पढ़ें और उल्टी करना मना है, यह पोस्ट सिर्फ भारत देश से प्यार करने वालों और देशहित में सोचने वालों के लिए है. सोचा था कि अब मोदी पर अपना समय जाया नहीं करूंगा पर कल की नौटंकी देखकर लगा कि एक पोस्ट तो बनती है -देश बदल रहा है)
भाषण की तारीफ़ करना होगी और खासकरके इस बात के लिए कि अंगरेजी में बोले वे, देश की उजली तस्वीर सामने रखना गुनाह नहीं है और नाही इस उजलेपन से आती हुई ग्रांट यानि अनुदान का रुपया, एनजीओ इस काम में बेहद माहिर होते है, गरीबी परोसकर करोड़ों रुपया लाना आसान है. परन्तु मोदी जी जिस उजलेपन की तस्वीर के सहारे देश में संडास से लेकर एनएसजी की सदस्यता तक के लिए देश के आर्थिक, सामाजिक और विकास की बेहद उजली तस्वीर सामने रखकर संविधान की दुहाई दे रहे है क्या वह वाकई में इतना उजला है. जब वे वहाँ लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई दे रहे थे ठीक उसी समय पहलाज यहाँ घोषणा कर रहे थे कि "वे चमचे है- मोदी जी के" यह किस संविधान और देश की तस्वीर है. लोग तारीफ़ कर रहे है भाषण की, मुझे भी अच्छा लगा परन्तु फिर किसान आत्महत्या का क्या, रीवा सतना में मीजल्स और कुपोषण से आठ बच्चे मर जाते है, लोग आज भी पंद्रह किलोमीटर दूर से पानी ला रहे है पीने को, शहरों से बिजली सारा - सारा दिन गायब है, देवास जैसे औद्योगिक शहर में कोई सुनने वाला नहीं है, यहाँ के अंधभक्त अभी यहाँ ज्ञान देने चले आयेंगे पर करेगा कोई नहीं कुछ.
देश यकीनन बदल रहा है, जीडीपी के आंकड़ों के फरेब में और विकास की झूठी गाथा सुनाकर, गली मोहल्लों में शिवाजी के हथियार दिखाकर, भगवान की मूर्ति को संघ का गणवेश पहनाकर, पाठ्यक्रम से लेकर इतिहास तक में बदलाव करके और पिछड़ा वर्ग के पदों पर पिछले दरवाजों से एंट्री मारकर आरक्षण खत्मकर देना, बिहार में शिक्षा का सरेआम मजाक, किशोरों की आत्महत्याएं, स्वास्थ्य, शिक्षा और सर्विस डिलेवरी जैसी सेवाओं का बजट खत्म कर, रेल किरायों में भयानक बढ़ौत्री करके, बसों का निजीकरण करके (हरदा जैसे कसबे में यादव बस सर्विस को ही सिर्फ इंदौर तक बस ले जाने और लाने की इजाजत है, बाकी किसी और को नहीं), इंदौर से भोपाल तक एसी बसें चल रही है और देवास से भोपाल जाना हो तो कोई बस नहीं है कारण सब बाहर से चली जाती है, देश यकीनन बदल रहा है - बलात्कार से लेकर सब कुछ तेजी से बढ़ रहा है, क्या अच्छा होता कि महाप्रभु NCRB के आंकड़े वहाँ रख देते, कर्ज और भूखमरी के खेल भी वहाँ रख देते, न्यायाधीश और गडकरी की लड़ाई वहां रख देते, सीना ठोंककर कहते कि रोबर्ट वाड्रा को गिरफ्तार किया है, स्विस बैंक से काला धन लाया हूँ, सोनिया की नागरिकता खत्म कर इटली भिजवा दिया है वापिस, राहुल को मानहानि के मुकदमे में जेल करवा दी है, और कम्युनिस्टों को काला पानी भिजवा दिया है, बलात्कारी निहाल्चंद्र को राष्ट्रपति क्यों नहीं बना देते
जिस देश में सत्ता बनाए रखने के लिए आप ममता से लेकर महबूबा और अब मायावती से समझौता कर लो, प्रज्ञा से लेकर गोधरा के अपराधियों को छोड़ दो, एक नरसंहार के नायक को पार्टी प्रमुख बना दो उससे बड़ा विकास क्या हो सकता है, आपके लोग आंबेडकर को गाली दें, नेहरू को कोसे, महात्मा गांधी के हत्यारे के मंदिर बनाने की बात करें, अपनी तुच्छ महत्वकांक्षा में जीते जी अपने मंदिर बनवाने में आपकी मौन स्वीकृति हो, एक बारह साला धार्मिक मेले में सरकार पांच हजार करोड़ रुपया फूंक दें और आपका पार्टी प्रमुख दलितों के साथ नहाने-धोने और खाने की नौटंकी करके समाज में फूट डालने का काम करें, लोगों के आयोजन पर शिवराज जैसे व्यापमं के अघोषित नायक अतिक्रमण कर लें और राजकाज और राज्य के भयानक सूखे पर ध्यान देने के बजाय निकम्मे, तुंदियल साधू संतों के तलवे चाटते रहें तो देश सचमुच बदल रहा है मित्रों
आईये मोदीजी के लौटने पर वन्दनवार सजाएं, धूप आरती करें, उन्हें डिठौना लगाएं और देश के संसाधनों को अम्बानी, अडानी के बाद दुनियाभर के उद्योगपतियों के लिए खोल दें- आईये स्वागत करें, यशगान गायें और कहें कि देश बदल रहा है.

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सुबह सवेरे अखबार को बंद करना 
यानि मुक्ति पाना किसी आत्म मुग्धता से 

भयानक अनियमित वितरण के कारण आने वाला अखबार "सुबह सवेरे" बंद कर दिया एक माह से। लगा था कि यह अखबार कुछ नयापन लिए होगा और सामग्री से लेकर विश्लेषण और जानकारी कुछ अलग होगी, कई बार संवाददाता के लिए भी बात की, विशेष संवाददाता के लिए बात हुई, फोटो वे जानकारी कार्ड के लिए भेजी, नियमित कॉलम भी लिखें और आलेख भी, वक्त बेवक्त समय निकालकर सामग्री भेजी , परंतु अंत में कुछ नही हुआ।
बहुत बारीकी से देखा और विश्लेषित किया तो पाया कि अपने आस पास के जमा लोगों के लेख से लेकर खबरें ही है और गाहे बगाहे अखबार का एनजीओकरण हो जाता है। 
रोज मुखपृष्ठ से लेकर अंत तक अख़बार में काम करने वाले 8-10 लोग ही लिख, पढ़, समझ रहे है और फेसबुक पर शेयर कर रहे है। ख़बरों का हाल ये कि किसी शहर या कस्बे के लिए ना जगह निर्धारित ना पृष्ठ बस जो आ गया -जूना पुराना वही छाप दिया, कभी भी कही से किसी भी शहर की डायरी और खबरें।


समझ यह नही आया कि अच्छे लोग और बहुत करीबी मित्र जो पत्रकारिता के पारंगत और सिद्ध् हस्त है - वहाँ कार्यरत है फिर ऐसी दुर्गति क्यों, मुझे अखबार का कार्ड ना मिलने का कारण तो साफ़ समझ आया कि महीने में लाख के विज्ञापन नही जुटा सकता और ना ही किसी बिकाऊ चैनल का राज्य प्रतिनिधि हूँ जिसे उपकृत किया जा सकें पर अखबार सिर्फ अखबार की तरह ही अच्छा लगता है। जैसे चाय दूध पानी शक्कर चाय पत्ती से ही अच्छे से बनती है उसमे इलायची तक ठीक है पर नवाचार करते हुए आप लाल मिर्च और लहसून का छौंक लगा देंगे तो वह फिर चाय तो नही होगी।
दूसरा लेखन का कोई पारिश्रमिक नही, इंदौर के एक तथाकथित बड़े लेखक ने झगड़ कर अपना पारिश्रमिक माँगा तब उन्हें भेजा गया, कितना, यह पूछने पर वे चुप्पी साध गए, उनका साफ़ कहना था कि इसी लेंथ के लेख के जनसत्ता या नईदुनिया रूपये 3000 देता है तो फिर फ्री में क्यों लिखें । बात सही थी, सो अपुन ने भी भेजना बंद कर दिया वैसे भी जिस जगह 20-35 प्रतियाँ ठीक से बंट नही पाती उस अखबार में लिखना व्यर्थ है।
दुर्भावना नहीं है, ना उत्तेजित हूँ ना किसी की आलोचना है पर अखबारों के निकलने के निहितार्थ समझने होंगे और यह भी जानना होगा कि तमाम घाटों और नफ़ा नुकसान के बाद भव्यता कैसे मेंटेन होती है ? बाकि सब तो हो रहा फिर लेखकों को एक प्रति भी नही देंगे पारिश्रमिक तो दूर !!!
मेरी शुभकामनाएं सभी के साथ है पर अब फेसबुक ज्यादा बेहतर और प्रभावी माध्यम है और सार्थक भी कम से कम मन में अपेक्षा और जुनून तो नहीं है।

Monday, June 6, 2016

देवास में प्रेमचंद सृजन पीठ का कार्यक्रम और कहानी पाठ Posts of 5 June 16





कहानियों को अनुभव और कल्पनाशीलता समृद्ध बनाती है

आज की कहानियां सजग चौकन्नी और समय का आईना दिखाती कहानियाँ है। कहानियों को जीवन अनुभव कल्पनाशीलता और कला समृद्ध तथा पठनीय बनाती है। यह बात वरिष्ठसाहित्यकार सूर्यकान्त नागर, इंदौर ने कहानी पर आधारित कार्यक्रम में अध्यक्षता करते हुए कही। वर्तमान कहानी पर चर्चा और कहानी पाठ का ये कार्यक्रम प्रेमचन्द सृजन पीठ उज्जैन द्वारा शहर में आयोजित किया गया था। कार्यक्रम संयोजक मोहन वर्मा ने बताया कि इस कार्यक्रम में अपने समय के तीन कहानीकारो रवीन्द्र व्यास, इंदौर, शशिभूषण, उज्जैन तथा संदीप नाईक, देवास ने अपनी ताज़ा कहानियों का पाठ किया साथ ही वरिष्ठ कथाकार डॉ प्रकाश कान्त ने कहानियों के सफर पर अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणी दी। कार्यक्रम के आरंभ में प्रेमचन्द सृजन पीठ के निदेशक ने सृजन पीठ के कार्यक्रमों की जानकारी दी। पश्चात सृजन पीठ केनिदेशक जीवन सिंह ठाकुर,ओम वर्मा , बहादुर पटेल तथा ब्रजेश कानूनगो ने अतिथियों का स्वागत किया। कहानियों की विकास यात्रा पर बोलते हुए डॉ प्रकाश कान्त ने कहा समय के साथ कहानी अपना पाठ बदलती रही है। कहानियों में दलित विमर्श, नारी विमर्श की बात होती रही है जबकि कहानी विस्थापन, मुआवजा , किसानों की आत्महत्या और हमारे आसपास के सवालों को लेकर भी बदलते समय के साथ हमारे बीच गूंजती रही है। कहानी पाठ की शुरुवात शहर के रचनाकार संदीप नाईक ने की और "माधुरी दीक्षित " कहानी के माध्यम से एक व्यक्ति चित्र प्रस्तुत किया। इंदौर से आये रवीन्द्र व्यास ने एक प्रेम कहानी "सातवीं सीढी और पीले फूल" तथा पत्रकारिता के भीतर के सच को उजागर करती कहानी "यह बहुतसारी चीजों को भोंगली बना लेने का समय है " का पाठ किया। उज्जैन के आये शशि भूषण ने साधनहीन ग्रामीण परिवार के बीच के रिश्तों के तानेबाने पर आधारित कहानी "छाछ " का पाठ किया। कहानी पाठ के बाद अतिथियों को सृजन पीठ की ओर से अभिनन्दन पत्र भेंट किये गए। 



कार्यक्रम में प्रभु जोशी, प्रदीप मिश्र ,सत्यनारायण पटेल ,ब्रजेश कानूनगो इंदौर तथा डॉ गजधर, विजय श्रीवास्तव, दीक्षा दुबे,संजीवनी कांत, वैदेही सिंह, डॉ डी पी श्रीवास्तव, एस एम जैन, बी के तिवारी, मनीष वैद्य, मेहरबान सिंह,  दिनेश पटेल,अमित पिठवे, रमेश आनंद, अमेय कान्त ,राजेंद्र राठोड, डॉ इक़बाल मोदी, कुसुम वागडे सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित थे। कार्यक्रम का सञ्चालन मोहन वर्मा ने किया एवं आभार मनीष शर्मा ने माना।



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कित्ती कविताएँ पेल देते हो रे तुम लोग साला एक दिन में ? देवताले जी सही कहते है कि कविता लिखना आजकल पापड बड़ी उद्योग हो गया है और फिर उम्मीद करते हो कि हम वो पढ़े, लाईक मारे और कमेन्ट भी करें. माय फूट......... साला घटिया विषय और सड़े गले मुद्दे - लड़की, चाँद सितारे, सूरज, पेड़, चिड़िया, पंद्रह साला से साठ साला आदमी औरतें और माहवारी से लेकर रोमांस तक .कुछ लज्जा शेष है या बेच खाए वो भी........... डूब मरो हिन्दी को बदनाम कर दिया है.......
यदि आप 40 से 60 साल तक के आदमी और औरतों पर धाँसू किस्म की कविताएँ लगतार पेल सकते है तो हिंदी में आपका नाम ससम्मान लिया जाएगा और आप अमर भी हो सकते है फिर आप कवि हो या ना हो इससे कोई फर्क नही पड़ता। 
और छापने छपने की चिंता न करें वाट्स एप से लेकर फेसबुक है ना 50-60 लाइक्स और दो चार कमेंट तो मिल ही जायेंगे।

चलो बन्द करो यह पढ़ना और जाकर लिखो 55 साला आदमी और 45 साला औरतें !!!.

Saturday, June 4, 2016

Posts of 1-3 June 16


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हिंदी में साहित्य की पत्रिकाएं लगातार महंगी होती जा रही है, भयानक मोटी, स्थूल, विचारशून्य, और एक विशेष किस्म के लोगों को छापकर उपकृत करती रहती है और उस पर से विशुद्ध व्यावसायिक बुद्धि से प्रकाशन गृह चलाने वाला और हर जगह जुगाड़ और संपर्कों से अपनी कूड़ा किताबें खपा देने वाला प्रकाशक गर्व से प्रेस लाईन और हर तीसरी पंक्ति में लिखेगा "अवैतनिक और अव्यवसायिक" साथ ही गरीबी का रोना ऐसा रोयेगा कि दुनिया का सबसे बड़ा भिखारी वही हो। 100 से लेकर 500 रूपये तक पत्रिकाएं निकाल रहे है। रेतपथ से लेकर तमाम उदाहरण सामने है।
मजेदार यह कि हरेक के अपने बन्धुआ है जो लपक कर पेल देते है वही कूड़ा कचरा जो सदियों से लिखकर अमर होना चाह रहे है और नोबल पुरस्कार की आस में मुंह धोकर बैठे है, ये वो लेखक है जो साहित्य के आतंकवादी और नक्सल गैंग के सरगना है और मजाल कि कोई और कुछ कर लें।
बहरहाल इतनी भारी कचरा पत्रिकाओं को ना पढ़ें ना खरीदें ये सिर्फ स्वान्त सुखाय और आत्म स्खलन के औजार है जिससे ये प्रकाशक और लेखक हिंदी और पढ़ने वालों की हत्या कर रहे है। इससे बढ़िया मनोहर कहानियाँ, सत्यकथा, कर्नल रंजीत के उपन्यास पढ़े जाएँ मनोरंजन तो होगा !!!
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अड़सठ तीरथ है घट भीतर .....
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शनिश्चर जयन्ति के अवसर पर देवास में आज विदुषी कलापिनी कोमकली का गायन हुआ। सन् 2003 के बाद इस मन्दिर प्रांगण में कलापिनी का गायन सुनना सुखद था, यह कार्यक्रम एकदम निजी महफ़िलों की तरह था जहाँ रसिकों को शास्त्रीयता की बारीकी भी समझने को मिली और भजनों का रस भी।
प्रारम्भ में सुश्री कलापिनी का स्वागत मराठी की वरिष्ठ कवि और शिक्षाविद् डा प्रफुल्लता ताई जाधव ने किया।
कार्यक्रम का आगाज स्व कुमार जी रचित एक बड़ा ख्याल से की जो राग श्री में निबद्ध था। स्व कुमार जी एक बार नाशिक से ट्रेन से लौट रहे थे तो रास्ते में उन्होंने वणी की देवी के दूर से दर्शन किये और कहा कि हे माँ मैं दूर से दर्शन कर कृतार्थ हो गया हूँ और आकर उन्होंने इस राग को रचा। इसके पश्चात राग तिलक में स्व कुमारजी रचित एक बंदिश और सुनाई, भजनों में मराठी भजन भी थे। श्री बद्रीनाथ जी की आरती सुनना बहुत ही रोचक और सुखद था। समापन मीरा के भजन से किया ।
कुमार जी और वसुंधरा ताई के जाने के बाद कलापिनी ने जिस तरह पूरी परम्परा और संस्कृति को सम्हाला है वह बहुत सम्बल देने वाला है , एक विदुषी होने के नाते वे गुरुत्तर पद को वे देवास में रहकर निभा भी रही है और थका देने वाली यात्राएं भी करके भारतीय शास्त्रीय संगीत की अक्षुण्णता को भी बनाये रख रही है, यह गौरव की बात है।
देवास के संगीत प्रेमियों ने इस साँझ को बहुत ध्यान से सुना और निर्गुणी भजनों का आस्वाद लिया।
कार्यक्रम में हारमोनियम पर थे उपकार गोडबोले, तबले पर विवेक क्षीरसागर, तानपुरे पर रामानुज विपट ने उत्कृष्ट संगति की।

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इन्हें कोई पहचानता है क्या देवास की बड़ी हस्ती है ?
मैं इन्हें 1970 से जानता हूँ। ये मेरे गुरु है और प्रा वि क्र 6, उस्ताद रज्जब अली खां मार्ग में शिक्षक थे, नाखून से चित्र बनाने वाले रमेश सर हमेशा हमारे लिए कौतुक का विषय हुआ करते थे। पूरे स्कूल की दीवारों को सजा रखा था Jaiprakash Chouhan ने आज सर से उनके घर मिलवाया, वृंदावन महाराज की गली और वो सारा बचपन याद आ गया। 1.1.1935 को जन्मे रमेश जी इन दिनों बीमार है स्मृति दोष के भी शिकार है पर जब बहुत देर तक मैंने याद दिलाया तो उन्होंने अपने छात्र और प्रसिद्द चित्रकार अफजल सर को भी याद किया और ढेर सारी बातें की। नाखून से चित्र बनाने वाले कितने लोग अब बचे है नही जानता पर चित्रों से प्यार रमेश सर ने करना सिखाया और बाद में कला गुरु विष्णु चिंचालकर से पूरी समझ विकसित की।
बहुत अच्छा लग रहा है बचपन और स्कूल की स्मृतियाँ सच में जीवन ऊर्जा है और यह कोई कभी किसी से ना छीनें।