Tuesday, May 22, 2018

तीन राज्यों के चुनाव और आर्च बिशप की चिठ्ठी 22 May 2018



जिन्ना के बाद आर्क बिशप को निशाना बनाया जा रहा है
सीधी सी बात है मप्र छग और राजस्थान में चर्च का प्रभाव है और मिशन स्कूल, अस्पताल, विकास के काम फैलें हुए है
इस वर्षान्त तक इन तीनों राज्यों में चुनाव है और मुसलमान के साथ ईसाई को निशाना बनाने से बुद्धिजीवी भी साथ देंगे, मप्र और छग आदिवासी बहुत राज्य है वही राजस्थान दलित बहुल. आदिवासी इलाकों में बैगा, पंडो, पहाड़ी कोरबा, गौंड, कोरकू, सब चर्च भी जाते है और आरक्षण का लाभ भी लेते है - यह पांसा सही है जो चौखट पर देर तक बना रहेगा और हर सीढ़ी चढ़ने वाले को साँप की तरह डसकर नीचे उतार देगा
मप्र में गणेशजी से लेकर हनुमान जी की मूर्तियां बांटी गई है, छग में दिलीप सिंह जूदेव ने आंदोलन खड़ा किया ही था चर्च के खिलाफ, छग में हाल ही में मैंने देखा कि धार्मिक अनुष्ठानों की बयार चल रही है और अंदर तक काम करने वाली सिस्टर्स और फादर ब्रदर को धमकाया जा रहा है कि केरल या झारखंड वापिस जाओ, हाल ही में मै जब छग में रमनसिंह जी जिले कवर्धा के आदिवासी ब्लॉक पंडरिया में था जहां चौदह सौ फीट ऊपर के बैगा बहुत क्षेत्र के तेलियापानी और आसपास गाँवों में सचिवों को कहा गया था कि भागवत के लिए ट्रेक्टर भरकर आदिवासियों को लाना है 
हाल ही में केंद्र सरकार ने लगभग 8000 स्वैच्छिक संस्थाओं का FCRA प्रमाणपत्र समाप्त किया है यह कहकर कि विदेशी रुपयों से आदिवासी इलाकों ने धर्मांतरण हो रहा है. इसका सबसे ज्यादा असर मिशनरीज़ पर पड़ा है जिन्हें पर्याप्त मात्रा में रुपया मिल रहा था पर वे भारतीय अकॉउंट प्रणाली के अनुसार ही नियमों के तहत खर्च कर रहे थे 
वर्तमान सरकार का यह मानना है कि यदि विदेशी रुपया आये तो वो भी हमारे आनुषंगिक दलों में जाएं जो दशकों से कंगाल थे
दूसरा महत्वपूर्ण कार्य यह किया कि कम्पनी एक्ट में कम्पनियों को अपने लाभ का 2 प्रतिशत एन जी ओ के माध्यम से खर्च कर क्षेत्र विकास के लिए उपयोग करना था वह भी नीति आयोग के पुल में डाला जा रहा है और यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि अब नीति आयोग से एन जी ओ को CSR के कोटे का रुपया मिलेगा, जबकि FCRA के नाम को आतंकवाद और धर्मांतरण का नाम देकर हम अपनी ही कमियों को छुपाते है। वास्तविकता में CSR में 50% का खेल है मोटी रकम का जो किसको पसंद नही आयेगा, FCRA में तो 50 जगह चेकिंग होती थी , लेकिन फर्क पड़ा हिंदुस्तान के हिंदुस्तानियों को । क्योंकि जहां सरकार नही पहुचती थी वहां 80 % पैसा FCRA का ही विकास लाता था.  अब तो विकास जुमलों में दिखता है - क्योंकि FCRA बंद होने से सीधे तौर पर 2 करोड़ लोग प्रभावित हुए और 12 लाख से ज्यादा बेरोजगार हुए है जो इन 8000 एन जी ओ में काम करके आजीविका चलाते थे। 
ऐसे में आर्क बिशप के चर्च के आन्तरिक प्रशासन चलाने वाले पत्र से दिक्कत होनी ही थी , मानकर चलिये अब मिशनरी, मदरसे और तमाम अल्प संख्यक वर्ग के स्कूल, कॉलेज, धर्मस्थल, अस्पताल और धर्म गुरु निशाने पर रहेंगे और आई टी सेल नित नए नूतन प्रयोग कर इतिहास, सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण और दुष्प्रभाव सामने लाती रहेंगी


Monday, May 21, 2018

कर्णाटक चुनाव और त्वरित प्रतिक्रियाएं 19-20 May 2018

कर्णाटक चुनाव और त्वरित प्रतिक्रियाएं 
गम्भीरता से सोचिये कि जिस येदियुरप्पा को मोदी का करीबी संगी साथी मीडिया ने सिद्ध किया था उनके साथ क्या किया पार्टी ने
दो घण्टे पहले एक साथी के साथ लोकसभा का इस्तीफा ले किया और ठीक 4 बजे मुख्य मंत्री का पद भी छिनवा लिया
आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी से लेकर तमाम केबिनेट मंत्रियों के भी क्या हाल बनाकर रखे है किसी से छुपा नही है
वही कांग्रेस में है - अपने पिता की आयु के कपिल सिब्बल से लेकर गुलाम नबी आजाद, शीला दीक्षित और तमाम वरिष्ठ कांग्रेसी 47 साला राहुल के सामने नत मस्तक होते है
इधर अखिलेश, मायावती, ममता, वृंदा करात या प्रकाश करात या दक्षिण में कुमार स्वामी या अन्य पार्टियों मे भी यही खेल और परंपरा है
कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि सामन्तवाद और जड़ता हमारे संस्कारों में है और समाज मे है रची बसी इसलिए हम जाति, धर्म और सम्प्रदाय को पोषित करते है और ठीक इसके विपरीत इन्ही से ये दासता और गुलामी सीखते है
संविधान में बराबरी, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व के सिद्धांत और मूल्य 26 जन 1950 से लागू है पर हम ना मानते है और ना पालन करते है
और तमाम पार्टियां लोकतंत्र की दुहाई देते हुए जनता जनार्दन को बेवकूफ बनाकर ज्ञान देती रहती है
राजनीति में कोई सगा नही और समय आने पर सबके भीतर बैठा सामंत जागता है और येदियुरप्पा जैसे कर्मठ और प्रतिबद्ध व्यक्ति को कही का नही छोड़ता
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राहुल गांधी ने अभी बहुत ही सभ्य तरीके से शानदार जवाब दिया और बता दिया कि मोदी और भाजपा की पूरी मशक्कत - जो उन्हें पप्पू साबित कर रही थी, बर्बाद हो गई। उन्होंने स्पष्ट शब्दों ने कहा कि भ्र्ष्टाचार मतलब प्रधानमंत्री है, किसी 56 इंची छाती की हवा निकालने के लिए दो मिनिट का भाषण पर्याप्त था, साथ ही अमित शाह को हत्या का अभियुक्त [ Murder Accused ] भी कहा
हिम्मत को सलाम
मोदी जी को आत्ममंथन करना चाहिए और समझना चाहिए कि उनके आसपास के लोग ही उनके सबसे बड़े दुश्मन है
भाजपा को अब हवा में उछलने के बजाय वस्तु स्थिति समझे और काम करें
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गोवा, मणिपुर, मेघालय और बिहार के साथ मप्र, राज और छग में स्थितियां बिगड़ने और सत्ता हाथ से जाने के बजाय बूढ़े येदियुरप्पा की कुर्बानी सौ गुना बेहतर है
अमित शाह का गणित संतुलित है
सुप्रीम कोर्ट की खोई हुई प्रतिष्ठा भी लौट आई , रुपया बच गया और अब मप्र, छग और राजस्थान में जम के चुनाव लड़े जाएंगे
कुल मिलाकर भाजपा की रणनीति सफल रही है
मुबारक अमित शाह और नरेंद्र मोदी जी
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अंग्रेजी तो साली सीख ही जाते रोते झीकते
दक्षिण भारत की मलयालम की थोड़ी सी समझ है थोड़ी सिंधी और बहुत थोड़ी बांग्ला भाषा की, पर अपने ही देश की अन्य भाषाओं को नही सीख पाया खासकरके दक्षिण भारत की किसी भाषा पर अधिकार नही।
सिर्फ मराठी, हिंदी, अंग्रेजी और मप्र छग की कुछ लोक भाषाएं आती है जिनमे भी सिर्फ मालवी में ही पारंगत हूँ
आज येदियुरप्पा का भाषण समझ नही आ रहा तो अफसोस हो रहा है
एक विषय कम कर दो पर चार पांच भाषा फार्मूला शिक्षा में लागू करो यार, नही सीखना फ्रेंच, जर्मन या रशियन साला मुझे कौन बाहर जाना है पर अपने देश और मातृभूमि की भाषाएं तो सीख लूँ कम से दो और दक्षिण भारतीय भाषाएं , समय कम है मेरे पास अब
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हारेंगे दोनो बल्कि तीनों ही
भाजपा के लिए शर्म थोड़ी ज्यादा होगी क्योंकि नंगई और रुपये का खेल सामने आ जायेगा, गोआ मणिपुर और बिहार के लोगों को अपने कर्णधारों और नीति नियंताओं पर भरपूर शक होगा
मप्र, राज और छग में लोगों को इनकी नियत पर शक ही नही होगा बल्कि यकीनन वे वोट देने से भी कतराएंगे और वोटिंग प्रतिशत उल्लेखनीय रूप से गिरेगा
कांग्रेस को बैठे ठाले एक नरेटिव्ह मिल जाएगा
इस सबका नुकसान यह है कि हम अपने जन नायकों , कोर्ट और मीडिया पर से बचा खुचा विश्वास भी खो देंगे और कभी गर्व से सिर नही उठा पाएंगे कि हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र है
एक दो व्यक्तियों की महत्वकांक्षाओं ने इस महान देश को कितना नीचे गिरा दिया जिसकी कोई सजा नही हो सकती
***
विश्वास मत हासिल करने से
सत्ता हासिल होती है
विश्वास नही

Naresh Saxena जी से मुआफ़ी सहित
[ जिन्हें इसका सन्दर्भ नही मालूम वे नरेश जी की यह कविता पढ़ लें ]
पार
पुल पार करने से
पुल पार होता है
नदी पार नहीं होती

नदी पार नहीं होती नदी में धँसे बिना
नदी में धँसे बिना
पुल का अर्थ भी समझ में नहीं आता
नदी में धँसे बिना
पुल पार करने से
पुल पार नहीं होता
सिर्फ लोहा-लंगड़ पार होता है

कुछ भी नहीं होता पार
नदी में धँसे बिना
न पुल पार होता है
न नदी पार होती



Friday, May 18, 2018

छोटी उम्र में मौत का कहर 17 May 2018



छोटी ही उम्र थी 34 - 35, अभी दो नन्ही बच्चियां है दस साल की और छह साल की , एक अदद पति और सास श्वसुर
कल दोपहर तक कितना जूझी कैंसर से और इलाज के नाम पर लम्बे समय से ऑपरेशन, कीमोथेरेपी, दवाएं, अस्पताल की जान लेवा जांच प्रक्रियाएं और घर अस्पताल के बीच ठहरा हुआ जीवन
इस बीच घर का तहस नहस होना, घर बिकना, पति का बीमार होना और बाजार के उतार चढ़ाव में धंधे पर होने वाले खतरनाक असर जिसका सीधा प्रभाव उसके मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ा ही होगा
मौत को घर देखना ही था, इस कमबख्त ने कही नही छोड़ा एक भी कोना संसार मे , हरेक को छला है - मौत से भयावह, ठगने वाला छलिया कोई नही और बेरहम तो इतनी कि कोई मोह माया नही - आगा पीछा भी नही देखती कभी एक झटके से अपने साथ ले जाती है दृष्ट और निकम्मी कही की
कल दोपहर को हार गई वो और हम सबको, उन सबको, उन अबोध बच्चियों को हमेशा के लिए बिलखता छोड़ गई इस जहाँ में जो दिन पर दिन आकाश गंगा का खतरनाक अखाड़ा बनता जा रहा है
जाना तो सबको था पर आज जब धूं धूं जल रही थी तो वहां खड़े हममे से हरेक की आंख कातर भाव मे थी और दिख रहा एक लापरवाह भविष्य, घटाटोप अंधेरा
कोई कह रहा था ईश्वर है और सबका ख्याल रखेगा
काश ऐसा सच मे हो जाता तो वो जाती ही क्यों , हम सबके सर्व शक्तिमान महान ईश्वर के पास क्या दया दृष्टि और संयम भी नही ?
[ तटस्थ ]

Thursday, May 17, 2018

क़बीर कुआं एक है, पानी भरे अनेक / बर्तन में ही भेद है, पानी सब मे एक। 17 May 2018




क़बीर कुआं एक है, पानी भरे अनेक 
बर्तन में ही भेद है, पानी सब मे एक।


***
सौ रुपये में मेघना गुलज़ार का देश भक्ति वाला इंजेक्शन कारगर नही
जीवन, जासूसी, आई बी, रिश्ते, हत्याएं, योजना, प्रशिक्षण और पश्चाताप इतना आसान नही होता
अपने पिता की कुछ कालजयी फिल्मे ही देख लेती पहले तो शायद इतना आसानी से चलती फ़िल्म में पूर्वानुमान लगाना आसान ना होता
नायिका प्रधान फ़िल्मे भारत मे कोई नई नही है पर आलिया भट को प्रधान बनाकर, भावनाओं का ज्वर कूटकर भर देने से ना फिल्मे इतिहास बनती है और लोकप्रिय
पिछले डेढ़ माह में देखी हिचकी, अक्टूबर, बियॉन्ड द क्लाउड्स और राजी में से यह सबसे रद्दी फ़िल्म थी
गुलज़ार साहब बिटिया को स्थापित करिये पर हड़बड़ाहट में नही
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ये उषा बाई थोरात है - 47 वर्ष की है, तीन साल पहले पति की मृत्यु हो गई थी, तीन लड़के और एक लड़की है।
बीपीएल कार्ड है- कई वर्षों से पर क्या लाभ मिला आज तक कुछ नही, अनुसूचित जाति से आती है पर इसका ना उन्हें लाभ मिला ना बच्चों को - कोई छात्रवृत्ति नही ना नौकरी और ना आवास योजना में लाभ
बेटी की शादी के लिए देवास में मुख्यमंत्री सामूहिक कन्यादान योजना में पंजीयन करवाया था पर रूपये नही दिए तो रिजेक्ट कर दिया और उन्हें 20 % ब्याज पर कर्ज लेकर ब्याह करना पड़ा
बेटे तीन है मजदूरी करते है कभी काम मिलता है कभी नही और अब कोई उम्मीद भी नही कुछ काम मिलने की
उषा बाई पिछले 22 वर्षों से हमारे घर और कॉलोनी के कई घरों में काम करती है हर दिन एक फार्म लेकर खड़ी होती है कि " भैया - ये नई योजना आई है इसका फार्म भर दो, बैंक में ये हो गया, राशन चार माह से नही मिला, बेटी की डिलीवरी में अस्पताल में रुपये मांग रहे है"
मैं तंग आ जाता हूँ उसके फार्म भरते भरते - क्योकि फार्म भरकर कहानी खत्म नही होती - वो हर हफ्ते मोबाइल दे देती है टूटा फूटा कि देखो इसमें कोई सन्देश आया क्या ?
आज चुनाव परिणाम देख रही थी टीवी पर तो उबल पड़ी मैने कहा फ़िल्म बना लूँ तो बोली - बनाओ और सबको दिखाओ कि हम गरीबों के साथ क्या हो रहा है
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"मुद्दे शौचालय जैसे भी नही बचे अब..... गन्दगी है पूरा परिवेश बजबजा रहा है "
तो क्या दिमाग़ लगाइएगा
अभी आदि बहुत दुखी था कि ये क्या हो गया ,मैंने कहा दुखी मत हो , हम सब भ्रष्ट है और कुछ अच्छा होना हमें सुहाता नही
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क्योटो में मजा आया होगा ना ठाकुर, गरीब गुर्गों की मौत से, चलो ट्वीट लिखो, निलंबित करो, मुआवज़े की घोषणा करो
कांक्रीट का पुल गिरा, शिंजो आबे को बुलाओ , झूला झुलाओ, गंगा आरती करो, मंगल गान गाओ, सखी साजन घर आया
शर्मनाक है और प्रधान सेवक के लोकसभा क्षेत्र में लापरवाही का इससे बड़ा नमूना क्या हो सकता है
अभी हाल ही में बनारस यात्रा से लौटकर मैंने लिखा था कि स्टेशन से लेकर पूरे शहर में गन्दगी से लेकर अवैध निर्माण पार्टी विशेष के झंडे लगाकर किये जा रहे है और किसी का ध्यान नही है
स्मार्ट सीटी की झांकी है, पूरा देश बाकी है
गए क्या प्रधान सेवक या आध्यात्म पुरुष योगी

कर्नाटक की जोड़तोड़ , तोड़फोड़ से फुर्सत मिलें तो ना, मेरा उद्देश्य सत्ता पाना है बाकी बातों से मतलब नही है
क्योटो बनाने चले थे - एक पुल बनाने में 100 से ज्यादा लोगों को दबा दिया और कई मर गए
शर्म मगर उनको आती नही है
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कुल मिलाकर हम मंडी, मीडिया, प्रशासन, वेश्या और बाकी सबको कोसते है कि बिकाऊ है पर चुने हुए विधायक, सांसद और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों से बड़ा और घटिया माल कोई नही भारत मे जो बिक जाता हो
बन्द करो चुनाव और हमारे पसीने की कमाई का उजाड़ना
सरे बाजार मिश्र और यूनान के गुलामों की तरह बिक जाए - उन्हें जूते मारो
कौन आजाद हुआ, किसके माथे से स्याही छूटी !
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अब सब कुछ साफ है ये सत्ता चाहते है किसी भी तरह से। मप्र , छग और राज के चुनावों में शुचिता पर अभी से प्रश्न है क्योंकि राज्यपाल नामक कठपुतली इन्ही की है। मप्र में आनंदी पटेल तो खुलेआम कहती है कि ऐसे काम करोगे तो भाजपा को वोट कैसे मिलेंगे
अब तो मोदी शाह सम्भावित मोटे मुर्गों से सीधा रुपया लेकर शपथ दिलवा दें क्योंकि करोड़ों रुपये बर्बाद करने का कोई अर्थ नही है । इसी के साथ 2019 के चुनाव कितने भयावह होंगे यह समझना आसान है।
एक ही तरीका मुझे समझ आता है कि सी जे आई के ख़िलाफ़ महाभियोग पुनः लगाया जाये संयुक्त विपक्ष द्वारा और जस्टिस लोया के केस की कार्यवाही फास्ट ट्रैक में चलाई जाकर दोषी को अंदर किया जाये ताकि देश थोड़ा राहत महसूस करें।
मूल पर प्रहार किये बिना कुछ नही होगा और पौराणिक कथा के अनुसार सात पहाड़ों के पार जाकर तोते के प्राण पखेरू उड़ाए बिना कोई काबू में आने वाला नही , कितने शर्म की बात है कि मायावती, ममता, वृंदा करात, राहुल, अखिलेश, तेजस्वी, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य जैसे युवा और कद्दावर नेता समस्त वरिष्ठ नेता जिसमे प्रकाश करात से लेकर कमलनाथ या मनमोहन सिंह तक के लोग मायूस होकर घर बैठ गए और लोकतंत्र की हत्या होते देख रहे है
सबसे ज्यादा दुर्भाग्य शाली है भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य जो मोदी शाह की जोड़ी के तमाशे को देख रहे है और असहाय महसूस कर रहे है। मुझे लगा था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में मोहन भागवत जी, सुरेश भैया जी या राम माधव जी जैसे बुद्धिजीवी है जो वास्तव में बुद्धिजीवी है जो दृष्टि भी रखते है और नब्ज भी पहचानते है - वे भी कितने असहाय हो गए है - उनके जमीनी काम, समर्पण और कड़े श्रम पर आस्था थी - वैचारिक मतभेद अपनी जगह पर संघ की सांगठनिक क्षमता को नकारा नही जा सकता, आज पूरा संघ इन दो लोगों की जिद और दादागिरी के सामने कितना बौना हो गया है और अब संघ किन कामों, संस्कृति और विकास को लेकर जनता के सामने लगातार दो वर्षो तक जाएंगे। पार्टी में सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी से लेकर जावड़ेकर या अन्य कोई क्यों नही बोलता, रोकता या टोकता इन दो को या सब अपनी अस्मिता को लेकर हैदस में है
दुर्भाग्य है कि बाबा विश्वनाथ की नगरी में हाहाकार है, जिस गंगा माई की कसम लेकर नैतिकता, ईमानदारी और संविधानिक आस्थाओं की शपथ मोदी ने ली थी , जिस पार्टी को विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनाया था आज वह कितनी तुच्छ महत्वकांक्षा और लोभ में फंसकर रह गई है, दीनदयाल उपाध्याय या गुरुजी या हेडगेवार जी का यह स्वप्न था ? क्या यही कुल मिलाकर जनसंघ से भाजपा तक का सफर और पैराडाइम शिफ्ट था - अगर हां तो, भाजपा के शीर्ष लोगों को और भक्त जनों को विचार करना चाहिए जिनमे अभी भी थोड़ा दिमाग़ शेष है
फिर कहता हूँ कि आने वाली पीढ़ियों को हम कभी नही कह पाएंगे एक था मोदी


Sunday, May 13, 2018

लम्पट दुनिया में मौको कहाँ ढूंढ़े रे बन्दे 13 May 2018

लम्पट दुनिया में मौको कहाँ ढूंढ़े रे बन्दे 

हम सब औसत बुद्धि के लोग है और इसलिए औसत तरीके से सोचते है विचारते और करते है

जलन, कुढ़न, ईर्ष्या, द्वैष भाव , कुंठा, अपराध बोध और तनाव हम सबमे है और यह स्तुत्य है
प्रेम, आशा, भावनाये या भावुक होना, दूसरों के दर्द महसूस करना, खुशी गम में शरीक होना हमारी शेष बची मानवीयता का अहम हिस्सा है
इन सारे गुणों और दोषों के साथ हम जो भी दैनिक जीवन के कार्यों के अतिरिक्त कुछ कर रहे हों तो वह निश्चित ही एक अन्याय है और छल
खेलना, बागवानी, पढ़ना लिखना, संगीत, वाद्य , फ़िल्म देखना, चित्र बनाना, सैर, पर्यटन, समाज सेवा, राजनीति, या कि कोई अन्य ललित कला से लेकर जोखिम के काम करना जीवन के दैनंदिन कामों में शरीक कभी नही रहा
ये सारी विधाएं हमने अपने को स्थापित करने, अपना अहम और दर्प बरकरार रखने के लिए और तथाकथित समाज मे अपने को विशिष्ट बनाकर स्थापित करने के लिए ईजाद की
आरम्भ में यह जरूर एक शौक और कौशल या दक्षता वृद्धि के लिए रहा होगा परंतु शनैः शनैः यह एक किस्म का भयावह खेल बन गया जिसमें आज हम खुद के ही सबसे बड़े दुश्मन बनकर रह गए है
इस सबको स्थापित करने की मंशा में हमने इतने झूठ, गल्प और आलोड़न बना लिए कि आज जब आईना देखते है तो शर्म भी नही आती कि हम कहाँ आ गए है
यह बार बार भूल जाते है कि बेहद ओछी और औसत बुद्धि के हम लोगों ने चातुर्य , धुर्तता , जुगाड़, और घटियापन से अपने को एक प्रतियोगिता में झोंक दिया है जिसमे हर वक्त हम हर किसी से हर बात छुपाते हुए, सबको दुलत्ती मारते हुए, येन केन प्रकारेण और वीभत्स तरीकों से विश्व विजयी होना चाहते है
हम यह भूल रहे है कि इस सबमे हमने मूल मनुष्यत्व खो दिया है और जो सहज मानवोचित गुण हममे निहित थे - उन्हें विलोपित कर श्रेष्ठ बनने की प्रक्रिया में खुद कलुष से भर गए है , कितना रीत गये है यह समझ नही पा रहे हैं
हर क्षेत्र विधा का यही किस्सा कोताह है और हर कोई इसी सर्ग में पर्व मना रहा है , इस भीषण में समय मे ये प्रवृत्तियां चरम पर है और जानते बुझते हुए हम सिर्फ और सिर्फ हर कही से किसी भी प्रकार से कुछ भी पा लेना चाहते है
आखिर ये आग, ये ललक, ये वासना और ये मोह क्यों और बजाय अपने आप से तटस्थ होकर सोचने के - हम अंधी दौड़ में क्यो है , हम क्यों पा लेना चाहते है जो हमारा नही है।और चाहते है कि हर जगह पैर पसारकर बैठ जाये और अंगद की तरह स्थापित हो जाए भले वो हमारा कर्म क्षेत्र हो या ना हो
कई दिनों से जूझ रहा हूँ अपने आप से , चूंकि मेरा वास्ता लिखने पढ़ने से है तो देख रहा हूँ कि यहां ये दुष्प्रवृत्तियाँ बहुतायत में है ही नही, बल्कि लोग विक्षप्त होने की हद से बाहर जाकर इसमे पारंगत हो रहे है
मैं ठहर गया हूँ और यह स्वीकार कर रहा हूँ - एक तरह से कन्फेस कर रहा हूँ कि मेरा मूल काम जीवन जीना है - जितना भी, जैसा भी शेष बचा है और लेखन पठन पाठन बिल्कुल ही इतर क्षेत्र है और इसे मैं अपने शौक में लेता हूँ ना कि अपने को स्थापित करने के लिए - और स्थापित होने के लिए ना किसी की चिरौरी करूँगा ना ही किसी को शराब पिलाऊंगा , ना ही उसकी उजबक हरकतें बर्दाश्त करूँगा और किसी के पोतड़े तो निश्चित ही नही धोऊंगा
ना मुझे अमर होने की चाह है, ना किसी तरह की हवस, ना ही किसी से कोई प्रतियोगिता , ना अपने को लगातार झोंकते हुए या षड्यन्त्र रचकर कुछ भी हथियाने की चेष्टा करनी है, मेरी कोई मंशा नही है कि इतिहास के किसी कोने में बिंदु भर जगह भी मेरे नाम से भरी जाएं
आप जो भी करें - मुझे रंजो गम नही , बस मैं मुतमईन हूँ कि इस तपती दोपहरी में मैं अपने आप को इस सबसे अलग करता हूँ, मुझे कुछ लिखना - पढ़ना भी है तो 52 वर्ष उम्र हो चली है, मैं निर्णय स्वयं लूंगा - मित्र लोग कृपया अपने (कु)विवेक का परिचय ना दें और अपने स्वयं के संजाल, षड्यन्त्र और गला काट स्पर्धाओं तक सीमित रहें
कबीर कहते है - हिरणा समझ बुझ वन चरना

Friday, May 11, 2018

"खुदा को भी अच्छे अफसानानिगार की जरूरत है " RIP Ankit Chaddha 10 May 2018



"खुदा को भी अच्छे अफसानानिगार की जरूरत है"
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"खुदा को भी अच्छे अफसानानिगार की जरूरत है " - शायद मंटो की कब्र पर यह खुदा हुआ है - [ एपिटाफ़ पर ]
तुम ऐसे कैसे जा सकते हो
क्या तुम्हें याद नही अमेरिका जाने से पहले तुमने वादा किया था कि दिल्ली में हम मिलेंगे और फिर देवास आओगे, मेरे घर दो चार दिन रहोगे
उस दिन जब अमेरिका जा रहे थे तो एयरपोर्ट से फोन किया था कि मैं जल्दी ही लौटकर आऊँगा
यह गलत बात है, मैंने तो तुम्हे अपनी उम्र दी थी और कल मुझे ही छोड़कर चले गए कल खंडाला [ पूना ] के पास किसी झील में
दुखी हूं - यह नही कहूँगा, बस इतना कि कल कबीर ने भी अपना असली वंशज खो दिया है और हम सब पुनः अनाथ हो गए है
तुम तो दास्तान सुनाते थे - तुम्ही चले गए, अब ना दास्तान रही - ना किस्सागोई और ना कुछ कहने सुनने को
अंकित तुमने आज एक स्थाई दुख दे दिया है
विदा अंकित , तुम सदैव मेरे दिल मे एक श्रेष्ठ इंसान और बेहतरीन कलाकार के रूप में जिंदा रहोगे
[ ये 22 फरवरी 18 की तस्वीरें है जब अंकित पूरा दिन देवास में था, हम लोगों ने खूब बातें की थी
और 3 अप्रैल 18 को जब अमेरिका जा रहा था तो मैंने लिखा था जल्दी लौटना तो उसने रात एयरपोर्ट से फोन कर कहा था भैया हम दिल्ली में मिल रहे है मई में और फिर मैं आपके घर आऊँगा फिर Ajay Tipaniya के घर जाऊंगा एक किताब लिखनी है बच्चों के लिए ]
तुम ऐसे कैसे जा सकते हो अंकित हम सबको बिलखता छोड़कर !!
और यह है वो 22 फ़रवरी 2018 का पोस्ट जिसमे मैंने अंकित से लम्बी बात करके कुछ लिखा था.
काश, सच में में मै उसे अपनी उम्र दे पाता कि वह कुछ और बेहतरीन सृजन कर सकता और हम अबके लिए इस विषाक्त माहौल में कबीर, खुसरो, निजाम्मुद्दीन औलिया, रसखान, गांधी आदि पर दास्तानगोई कर जाता
पर यह तुमने ठीक नहीं किया अंकित, रात भर सोया नही हूँ और हम सब मित्र, कबीरपंथी रात भर तुम्हारे बारे में बातें करते रहें है
देश भर और दुनिया के चंद वो लोग जो तुम्हे प्यार करते है और सब अपना मानते है तुम्हारे मुरीद है और विश्वास नहीं कर पा रहे कि यह अनहोनी हो गई...........
नमन और विदा अंकित
होमर रचित इलियाड नामक महाकाव्य में एक दृश्य आता है जब एक बुरा आदमी (खूँखार डकैत ) गिरजाघर में एक युवा गायक पादरी के सामने अपने हथियार फेंक देता है यह कहकर कि कलाकार, गायक जिंदा रहना चाहिए। वह उस गायक को अपनी शेष उम्र भेंट में देता है और अपनी इहलीला समाप्त कर लेता है।
सारी जनता स्तब्ध है और गायक गा रहा है और इस तरह कलाकार और अच्छे गायकों के लिए सम्मान बना और परम्पराओं और विश्व की कमोबेश हर सभ्यता में यह शेष बचा हुआ है।
आज यह प्रसंग याद आया जब कबीर पर Ankit Chadha की दास्तान गोई सुनी, रोक नही पा रहा अपने को यह कहने से इस बन्दे में जो करिश्मा है वह अप्रतिम और अदभुत हैं।
बहुत दुआओं और स्नेह से देवास ने आज इस युवा प्रतिभाशाली व्यक्तित्व को नवाजा है - बस इसमें बहुत थोड़ा सा हिस्सा मेरा भी है - अपनी उम्र की भेंट और सारी दुआओं के साथ। कबीर को समझने का नजरिया ही बदल दिया !
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Thursday, May 10, 2018

जवानी दीवानी 10 May 2018

जवानी दीवानी 

उचक कर आई थी मेन गेट से प्लेटफोर्म पर
प्लेटफोर्म पर भी देखा तो खूब तेज चल रही थी
एक प्रेमी ही था जो आया था छोड़ने -उसने उसे घुमाया बांहों में उठाकर 
लड़की भी खूब मस्त नाचने लगी बांहों में

जब ट्रेन छूटने को ही थी कि एक बार फिर दौड़कर नीचे उतरी और अपने माशूक को चूम लिया, सीधे उचककर चढ़ गई कोच में
अंदर घुसी तो तीन बड़े बेग थे, हाथ में दो झोले और एक बड़ा सा पर्स - मानो किसी छोटे मोटे जिले का सामान हो
फिर आकर बैठी और आहिस्ते से देखा सबको - कौन फंस सकता है
एक लोवर सीट पर बुजुर्ग को देखकर मन ललचा गया
"अंकल, मेरी रीढ़ की हड्डी में प्रॉब्लम है और डिस्क फेल है , कंधे भी खराब है गेप है C 1,2,3,4 में आप मेरी अपर बर्थ पर चले जायेंगे... शुगर है बार बार बाथरूम जाना पड़ता है ..."
"बेटी मै सत्तर साल का हूँ , जानबूझकर लोवर सीट ली है.."
"अंकल प्लीज़ - मेरी हालत देखिये ना, उफ़ उफ़ उफ़ ......क्या गजब की आवाजें .........." मानो बस अभी ट्रेन रोककर अर्थी उठाना पड़ेंगी
अंकल बेचारे भी मर्द ही थे - बेटी जरुर बोल रहे थे - पर नजरें गजब की नश्तर सी थी - पूरे जोश से बस चढ़ गए ऊपर की बर्थ पर किसी सोलह साल के जवान की तरह और ताडने लगे लड़की को - जो बामुश्किल तेईस की होगी लगभग ...
लड़की अब लोवर सीट पर मोबाईल चार्ज पर लगाकर बैठी है और कभी वीडीओ कॉल करती है , कभी बातचीत और कभी कोई फिल्म देखकर अजीब सी आवाजें निकालने लगती है
राष्ट्रीय नाटय विद्यालय, दिल्ली क्या खाक सीखायेगा ये हुनर

Wednesday, May 9, 2018

खरी खरी Posts from 1 May to 9 May 2018

तर्क कमजोर हो और आपकी भाषाई और बौद्धिक क्षमता बेहद कमजोर हो, आप बहस ना कर पाएं तो अपने लिखित कचरे में आतंक पैदा करने के लिए विदेशी लेखक, प्रहसन का उल्लेख कर दीजिये - बस आपको कुछ सिद्ध करने की जरूरत नही
आज दो तीन बौद्धिक टिप्पणियां देखी जो हद से ज्यादा लम्बी और झिलाऊँ थी तो बहुत साल पहले देवी अहिल्या विवि , इंदौर में हुए हिंदी के एक साहित्य आयोजन की याद आई जब शशांक ने उस सरकारी भोपू संचालक को डाँटते हुए कहा था भाषण मत दो, समय बर्बाद कर अपना ज्ञान मत पेलो हमने सब पढ़ा हैं, फालतू में विदेशी लेखकों के नाम लेकर आतंक मत फैलाओ, यह घटिया आदमी आज भी आतंक फैलाकर रखता है जिस पर तमाम तरह के चोरी के आरोप लगे है
पर उस सरकारी जी हुजूरी में भांड बनकर चाटुकारिता कर चुतियापा करने वाले घटिया लेखक से बड़े वाले आज मौजूद है, वो तो बेचारा निकम्मे और बेरोजगार विदेश पलट बेटे को अपना काम कर उसके नाम से छपवा कर हिंदी में स्थापित करने में लगा है क्या पता आज मरे कल दूसरा दिन, पर इन बाकी को क्या हुआ ?
***
चिंता मत करिए रोज़ रोज़ दुनिया भर में मुर्गे, बकरे, पाड़े, भैंसे, तीतर, सूअर कट रहे है सदियों से - कोई कम हुआ क्या ?
माना कि आप जबरजस्त भी है और जबरजस्ती भी है - एक दिन सूरज का उगना या डूबना रोक दीजिये, एक दिन चाँद को रोक लीजिये तो हम भी देखें कि कितना दम है
और नही तो औकात मतलब सीमा में रहिये और चुपचाप इस अस्तबल में समय गुजारिये, पगुराते रहिये, जुगाली कीजिये और निकल लीजिये
बहुत देखे है तुम जैसे धंधेबाज, प्रशासनिक अधिकारी, ज्ञानी, साहित्यकार, पत्रकार, समाज सेवी, ढोंगी, धार्मिक, संवेदनशील, कानूनविद, शिक्षाविद, आर्थिक जानकार, पर्यावरणविद, राजनीतिज्ञ, वैज्ञानिक और जमीन से लेकर अंतरिक्ष मे काम करने वाले स्वार्थी हम्माल
समझ आया या रोज खोलना शुरू करूँ तुम्हारे उपबन्ध और नाड़े !!!
***
# भगवान विश्वनाथ की नगरी का हूँ, पान तो खाऊंगा
# हे ईश्वर कहने में हर्जा नही है
# भगवान ने आंखें आगे देखने के लिए दी है
- नामवर सिंह
[अभी अभी एनडीटीवी पर ]
जानते है हो ना प्रगतिशीलों और जनवादियों - इन ठाकुर नामवर सिंह को, याद यह भी कर लो कि ज्ञानपीठ अवार्ड देते समय किसके साथ खड़े थे मंच पर
हिंदी साहित्य के महापुरोधा को शत शत प्रणाम
कहिए मित्रों , कैसा लगा - यकीन ना हो तो यूट्यूब पर देख लो डाऊनलोड कर लो
और अब शुरू हो जाओ चलो बहस करो, आओ ज्ञान दो - पूरे होश में थे ठाकुर और एकदम सॉलिड मेमोरी के साथ , गाना भी गाये " मुड़ , मुड़ के ना देख मुड़ मुड़ के "
मैं तभी सोच रहा था कि Ravish Kumar ने लम्बी प्रस्तावना, नामवर होने के मायने और अंत मे मुस्कुराते हुए अपनी बात क्यों खत्म की। मैं उनके अवदान को कम नही आंक रहा , बस समझने की कोशिश कर रहा हूँ आखिर मेरी भी समझ ठीक ठीक ही रही है प्रगतिशीलों और जनवादियों को लेकर और इनके चरित्र को लेकर
[ जिन्हें हिंदी साहित्य, साहित्य की टुच्ची राजनीति, पक्षधरता और नामवर होने के मतलब की समझ नही और नामवरीय आलोचना, कहानी एवम कविता के प्रतिमान की समझ नही वे यहां रायता नही फैलाएं ]
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दुर्भाग्य ही है कि एक झूठे शख्स ने भारतीय संविधान के नाम पर सत्य निष्ठा और देश की अखंडता बनाये रखने की शपथ ली है,अगर कोई संविधान के विरुद्ध जाकर काम करता है तो यह दंडनीय होना चाहिए
कितना शर्मनाक है कि कल हमारे पास रोल मॉडल की सूची में ऐसे झूठे, लफ्फाज और फुट डालने वाले लोग होंगे
[ कहानी का एक पात्र, मानसिक स्थिति में सड़क पर हुई हिंसा के दौरान भड़ास निकालते हुए ]

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जिन्ना को लेकर हंस में राजेंद्र यादव ने वीरेंद्र कुमार वर्णवाल लिखित एक लम्बी सीरीज छापी थी लगभग एक साल 1992- 94 की बात होगी
उसे पूरा पढ़ा था पर अब स्मृति दोष है ठीक से सन्दर्भ याद नही है
पर बात इसके आगे की है, आई टी सेल के इस मार्केटिंग में मत फंसिए, ये सब इस साल के 4 राज्यों के चुनाव और अगले बरस के चुनाव की पुख्ता तैयारी है क्योंकि इन प्रश्नों के जवाब नही है इनके पास
* संबित पात्रा की 28 लाख के पैकेज पर नियुक्ति - ये काम कब करता है हर समय तो गोबर लेकर लिपता रहता है 
* 370 का क्या हुआ
* मन्दिर बना
* एक के बदले दस सिर आयें
* समान आचार संहिता 
* कश्मीरी पंडितों की पुनर्बसाहट 
* 15 लाख
* डोकलाम विवाद
* कश्मीर में शान्ति प्रक्रिया
* 2 करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष

ये तो चंद वो जुमले है जो लोकप्रिय थे, एक बार भाजपा का घोषणापत्र अमित शाह से लेकर संबित पात्रा को खोलकर दिखा दो, बाकी का तो नही पता पर यह पात्रा सुना डाक्टर है पढ़ तो लेगा लिखा हुआ बशर्ते उसके मुंह पर कसी हुई पट्टी बांधकर रख दी जाये। बाकी का पढ़ाई -लिखाई से कोई सम्बन्ध नही है। हाँ, कही भाषण देना हो, बकर करनी हो या किसी मोहल्ले में बीसी के चुनाव हो तो बन्दे हाजिर है जितवाने का पूरा ठेका लिया जाता है
जिन्ना , जिन्ना 
गांधी , गांधी
नेहरू, नेहरू 
इंदिरा, इंदिरा
गुरुजी, गुरुजी

इन नामों से परहेज कीजिये, पूछिये कि बाजार से पेट्रोल डीजल सामान कब सस्ता होगा, बैंक - कोर्ट - चुनाव आयोग - संविधान आदि पर फिर कब विश्वास कर पाएंगे
हमारी गंगा जमनी तहजीब कब पुनर्जीवित होगी
कब हम सुकून से बेखौफ होकर परिवार के साथ बाजार घूम पाएंगे
बलात्कार कब रुकेंगे
कब हम अपने बच्चों का सुरक्षित भविष्य इस "जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गात अपि गरीयसी" पर देख पाएंगे
यदि ये घोटालेबाजों का देश और जिम्मेदार कांग्रेसी, वामी, बसपाई, सपाई, तृणमूली या भाजपाई कोई जवाब नही दे पाए तो चुनाव का बहिष्कार करिये और ठेंगे पर रखिये सबको , आपको कौनसा बेल्लारी से खनन कर रुपया कमाना है या रेड्डी बंधुओं से रोटी बेटी का सम्बंध करना है

***
किसी युवा मित्र ने पूछ लिया कि हिंदी में ये क्यों हो रहा है - नामवर के बहाने से इतना विवाद
मुझे जो समझ आया वह यह है दोस्त कि
- पुरस्कारों ने दिमाग खराब कर दिया है
- सोशल मीडिया के लाइक और कमेंट ने कुंठा बढ़ा दी है
- विवि में पढ़ाना हिंदी वालों का अंतिम लक्ष्य हो गया है
- खेमेबाजी अब धंधा बन गई है
- व्यक्तिगत लिहाज, लाज , सम्मान और तहजीब बहुत खुला खेल हो गया है
- नये पुराने और छोटे बड़े का भेद उदारीकरण और बाजार ने खत्म कर दिया है
- नेट से गाली और तारीफ सेकेंड में पहुंच जाती है
- पढ़ने लिखने की संस्कृति खत्म हो गई है
- मैं ही महान बाकी सब घटिया तो क्यों किसी की कोई इज्जत करें
- त्वरित सम्बन्ध बनाते - बिगाड़ते खुले मंच उपलब्ध है आईये भसड़ मचाईये
- निठल्लों ने पत्रिकाएं शुरू कर दी, थोड़े पढ़े थे उन्होंने पोर्टल के धंधे और जो जीवन मे कुछ भी नही कर पाए वो वाट्स एप के प्रशासनिक अधिकारी बनकर सुबह से देर रात तक रौब गाँठने लगे
- दारुबाज वाम या दक्षिण पन्थ को लेकर बैठ गये
- कुछ ने प्रकाशन खोल लिया और कुछ चोरी चकारी के माल को कम्पाइल कर ऐतिहासिक किताबें लिखने लगे
- मीडिया में जाने के लिए साहित्य की छाती पर पैर रखे और कांधे इस्तेमाल किये
- सरकारी बाबू से सम्पादक बने महान लोगों की चरणों की धूल को माथे से लगाना पड़ा
- स्त्रियों के खुलेपन से आत्मा सिसकारी और उन्हें मोहपाश में बांधने के चक्कर मे आपस मे लड़ भिड़े
- नये और प्रौढ़ हो चुके भी ललकारते हुए घर मे से निकाल लाये और चौराहे पर खुद के साथ इन्हें भी नंगा कर दिया
- प्रकाशक से लेकर प्राध्यापकों और सम्पादकों ने अपने छर्रे , गुंडे और शोधार्थी पाल रखे है जो एक इशारे पर आपकी इज्जत उतार देंगे ,बलात्कार कर देंगे - मालिक को आंख उठाकर तो देखो जरा
पण्डित भीमसेन जोशी का एक भजन है
" जो भजे हरि को सदा, सोही परम पद पावेगा
देह के माला, तिलक और छाप, नहीं किस काम के,
प्रेम भक्ति बिना नहीं नाथ के मन भावे

दिल के दर्पण को सफा कर, दूर कर अभिमान को,
ख़ाक को गुरु के कदम की, तो प्रभु मिल जायेगा

छोड़ दुनिए के मज़े सब, बैठ कर एकांत में,
ध्यान धर हरि का, चरण का, फिर जनम नही आयेगा

दृढ़ भरोसा मन मे करके, जो जपे हरि नाम को,
कहता है ब्रह्मानंद, बीच समाएगा "

और अंत मे प्रार्थना [उदय भाई Uday Prakash से मुआफ़ी सहित ]
कुल मिलाकर एक हमाम है जहां आईने ही नही और दीवारें टूट गई है लिहाज़ा सब अपना जलाकर किसी को पनपने नही देंगे , कबीर तो अपना सब कुछ जलाकर निकला था, ये अपना स्विस बैंक में जमाकर दूसरों का जलाने निकले है, यह भी पढ़ेंगे सब पर कन्नी काटकर सब निकल लेंगे क्योकि अपना अक़्स कही ना कही इसमे नजर आयेगा या अपने आका का, जाहिर है अपनी माँ को डाकन कोई नही कहता
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आशुतोष, रजत, सुधीर, पुण्य प्रसून, दीपक, अर्नब, सुमित, बरखा, आदि लगभग चमचमाते मीडिया के समकालीन और गहरे यार दोस्त है
जब चलना शुरू किया था तो नौकर थे चैनल्स के, धीरे धीरे परिपक्व हुए, विचारधारा पकड़ी और आईकॉन बनें
लगभग सब लोग शिखर पर है और कम से कम औसत बुद्धि वाला भारतीय इन सबको जानता है, पहचानता है और इनकी अक्ल, बुद्धि, वाक चातुर्य और समझ से भी वाकिफ़ है
इनमे 19 - 20 का ही अंतर होगा अर्थ, प्रतिष्ठा और पहुंच में, रवीश भाई थोड़ा इसलिये कुलबुला रहे है इन दिनों कि वरिष्ठ है, जनता का प्यार भी है पर ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा नही है अभी तक जो एक स्टेटस सिम्बोल है
थोड़ा गौर से देखेंगे तो दो माह के प्रपंच यही सब कुछ कहते है, आखिर थानवी जी को भी सुरक्षा लिहाज से पत्रिका में जाना ही पड़ा ना ताकि एक बैनर बना रहे छत पर
ख़ैर , कुछ तो लोग कहेंगे, रवीश भाई लगे रहो, आप मेरे अभी भी बेस्ट एंकर हो, और यह भी विश्वास है कि मीडिया में रहकर हिंदी में नए शब्द और मुहावरे आप ही लाओगे ! हिंदी में तो जलेस, प्रलेस और जसम आपस मे ही लड़ भिड़कर मर जायेंगे , जिन्हें प्रेस विज्ञप्तियां लिखने के बजाय जारी करने का काम आता है वे कुंठित , जड़ और बूढ़े मीडिया की समझ से परिपूर्ण बताते है, जो जीवनभर चाकरी करते रहें और अब पेंशन खाकर जिंदा है वे प्रतिबद्धता की बात करते है - ख़ैर, लाल सलाम
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मोदी को कुत्ते बहुत प्यारे है कभी गाड़ी के नीचे कुचलते है कभी देशभक्ति सीखते है
जनता के सेवक है या कुत्तों के 
मुद्दा जनता की समस्या है या कुत्तों की
चुनौती कुत्तों से है , काँग्रेस से
सत्ता जीतना कुत्तों के लिए है, रेड्डी बंधुओं के लिये
राहुल से डर है या कुत्तों से
देशभक्तों मे भक्ति कम है या कुत्तों में
भाषण देते है या कुत्तों को टारगेट करते है
जनता भाषण समझती है या ....
56 इंची सीना है तो कुत्तों की जरूरत क्यों पड़ रही
राहुल पप्पू है तो कुत्तों का साथ क्यो ले रहे

अपने आसपास घिरे लोगों से तो परेशान नही बेचारे
जब अक्ल, बुद्धि या तर्क खत्म हो जाये तो वाहियात बोल ही मुंह से निकलते है
इतिहास याद रखेगा कि एक विश्व स्तर की चाह रखने वाला प्रधान सेवक कुत्तों से ऊपर नही उठ पाया और विपक्षियों को ठिकाने लगाने के प्रयास में कुत्ते बिल्ली तक उतर आया
हम अपने बच्चो को कभी नही कहेंगें कि एक था मोदी , यह कहेंगें कि भारत मे 5 साल लूट का खेल चला और संविधानिक संस्थाओं की बर्बादी दो व्यापारियों ने की जो गुजरात से थे
देश के 126 करोड लोग लेखक मीडिया कर्मी बुद्धिजीवी और धार्मिक लोग नपुंसको की तरह चुप थे और सब सह रहे थे संविधान के प्रति जबाबदारी निभाने वालो को भी गैस चेम्बर में रखा जाता था और रेड्डी सरीखे लोगों को विधायिका में लाया जाता था