Tuesday, August 29, 2017

प्रेम, पीड़ा, पराक्रम और पराभव का नाम ओरछा (Aug 2017)


प्रेमपीड़ा, पराक्रम और पराभव का नाम ओरछा





1
कड़ी धूप में चली थी गणेश कुंवरी
अजुध्या से ओरछा की ओर गोद मे थे राम राजा
जो उसकी प्रार्थना और तपस्या से नही
नदी में डूबकर जान देने के इरादे के फलीभूत होने पर आये
सिर्फ यही नही अपनी शर्तों और जिद पर

पैदल ही चल पड़ी गणेश कुंवरी राजा राम को लेकर
ओरछा की ओर क्या क्या ना सहा होगा उस रानी ने
जो बुंदेलों की आन बान थी जंगल, नदी और मौसम के झंझावात भी झेले होंगे
जिक्र नही इसका स्त्री को सहना ही पड़ता है गोदी में राजा राम हो, श्रीकृष्ण हो
ओरछा आकर भी वह राजा राम को उनके लिए बन रहे मन्दिर में बसा ना पाई
जुझार सिंह के सामने गर्व से गोदी में बैठे राजा राम को आले में बिठा दिया
भव्य आलीशान मन्दिर खाली रह गया जो आज भी वीरान है राम के बिना
बुंदेलखंड में कहते है लाई तो राजा राम को अजुध्या से पर मन्दिर ना दे पाई
ओरछा की कहानी में राजा राम आज भी है पर गणेश कुंवरी गायब है.

खंडित जहांगीर महल,लक्ष्मी और चतुर्भुज के मंदिर की कहानी में
रात को होने वाले रुपया देकर कहानी सुनने वालों को
शो में सुनाई देती है गणेश कुंवरी की कहानी
दर्द की क्षणिक दास्ताँ में मानो उतर आती हो
अभी भी बुंदेलों में कई गणेश कुंवरियाँ घूमती है
पन्ना से दिल्ली तक बस अब वे अपने राजा राम को
किसी बड़े धन्ना सेठ के यहां गिरवी रख आती है.

 2
राय प्रवीन की आत्मा आज भी घुंघरुओं में बजती है
छत्रसाल के राज्य भर में जहां बुंदेले राज करते थे
राय प्रवीन की आवाज इन मंदिरों से होकर बेतवा में बहती है 
जहांगीर महल से ओरछा की गलियों में उड़ाती है देखा तुमने ?

मैं जब भी आया यहां तो दूर तक फैले बियाबान में 
बंजर धरती पर कही नही दिखी हरियाली जबकि 
पाँच नदियों के मिलन पर बना था यह शहर
बुंदेलों ने जितने महल और मन्दिर बनाएं यहां
हर जगह राय प्रवीन के प्यार की कहानी गूंजती है

अपने दरबार से आगरा में अकबर के पास भेजा
वहां जाकर सूख गई जैसे सूख गई है बेतवा केन
पर गजब का साहस था उस गायिका में जिसने 
शहंशाह आलम को कह दिया था भरे दरबार में

बिनती राय प्रवीन की, सुनिये साह सुजान,
जूठी पातर खात है, वारी, वायस स्वान  
कैसे जुटाया इतना साहस राय प्रवीन भरी सभा मे बोलने का
राजा भी हो तो अकबर जैसा, जान गया गायिका की मनोदशा
भेज दिया राय परवीन को फिर ओरछा में बुंदेलों के पास
मरने तक गाती रही और फिर मरकर भी 
भटक रही है राय प्रवीन आज भी ओरछा की धूल से किलों के बुर्ज तक 
शाम होते जब छाने लगता है अंधेरा तो उसकी आवाज गूंजती है
सूने महल के अंधियारों में रूह भटक आती है खजुराहो तक

राय प्रवीन अब दैहिक रूप से नही है ज़िंदा 
झांसी, हरपालपुर, मउरानीपुर या मानिकपुर से
हजारों राय प्रवीन रोज दिल्ली, मुम्बई, सूरत जा रही है
सूख गई है बेतवा के संग खेतो की मिट्टी, आंख के आंसू
ठेकेदार के यहां काम करते बज रहे है घुंघरू चहूं ओर
कि यहां घर का चूल्हा जल सकें बाप महतारी का

इस देश के सभी शहंशाह ए आलम अब तक खामोश रहें और 
हिम्मत नही किसी मे कि भेज दें वापिस एक भी राय प्रवीन को
ससम्मान उस बेतवा के किनारे जहां लांगुरिया गूँजती है
देश के महलों में रात को अँधेरे में सिसकती है

हजारों राय प्रवीन और बुंदेलखंड की झाँसी की रानियां
देश के बड़े शहरों में, कोई इनके प्रेम का दर्द नही बुझता।


3

लाला हरदौल के अमर प्रेम की भूमि कहाती है
आल्हा और ऊदल गूंजते है कण कण में वीरता के
ये औरंगजेब की छोटी सी बेटी बदरुन्निसा की जमीन है
जिसने अपने ही पिता के सेनापति को मात दी
बुंदेलों के प्रेम में ऐसी पड़ी बचपन से कि दस साल में लड़ बैठी पिता से 
इलाहाबाद के मोहम्मद खान बंगश ने जब पन्ना पर हमला किया
तो हार गया प्यार के आगे और लौट गया मुंह बनाकर इसी धरती से
बाजीराव पेशवा चलकर आये दूर दराज से बचाने इस बुंदेली धरती को
ये ओरछा एक मंदिर और नदियों का शहर नही मात्र संस्कृति का भी अड्डा है.
इस रंगीली भूमि में गूंज रही है प्रेम, पराक्रम और पीड़ा की दास्तानें
सूख गई है नदियां, बंजर हो गई लाल जमीन, खत्म हो रही है आवाजें
छतरपुर, महोबा, पन्ना, टीकमगढ़, झांसी या ललितपुर से कारवां जाता है रोज
लौटना बड़ा भारी होता है इस रंग - बिरंगे बुंदेलखंड में लोगों का
जंगल मे घिरता जा रहा है रिहाईशी इलाका कि शेर और बाघ विराज सकें
बुंदेलखंड की राय प्रवीन, बदरुन्निसा याकि गणेश कुँवरी बिक जाती है 
दिल्ली, मुम्बई या सूरत के बाजार में रोटी की खातिर  
जुझार सिंह रिक्शा चलाते है जबलपुर में  
लाला हरदौल कूली बन गए है झांसी स्टेशन पर
बुंदेले ढो रहे है सेना का सामान बबीना और तालबेहट में
बच्चे मरें जा रहे है दूध के बिना कमजोर होकर
सूखी वीरान आंखों में बंजर धरती का अक्स दिखता है
व्यवस्था इस नरकयात्रा के लिए एक पॅकेज की घोषणा करती है
और खबर बांचकर ओरछा के पण्डे खुश होते है घंटे जोर से बजते है
अब कही कोई वृंदावन लाल वर्मा नही लिखतें कहानी
कोई भूषण कवि या केशव इस जमीन को कविता में नही पिरोते
खाली पड़े उजाड़ गांवों में बूढ़े और फेंक दिए गए बीमार लोग अभिशप्त है मरने को
ओरछा में विदेशी इन्हें नही पूछता कि क्यों जिंदा हो अब तक
राजा राम भी मन्दिर में सिमट कर बैठे है और भक्ति कि धार देख मुस्काते है. 
प्रेम, पीड़ा, पराक्रम और पराभव के पर्याय इस ओरछा में
सैलानियों की बहार रहती है दिन भर, साल के बारहों मास 
गोरी चमड़िया हैरान होती है प्रेम समर्पण की कहानियां सुनकर
रास्ते के उदास चेहरे बुझ नही पाते इनके सवाल
मेलों में लगे ठेले लूटने में लगे है बुंदेलखंड को
प्रेम अब नही उपजता, सबको हर यात्री एक मौका नजर आता है
ओरछा प्रशासन के कागजों में एक धार्मिक नगरी है जहां शराब और लड़की 
पिछले दरवाजे से महंगे दामों में ऊंची होटलों में आसानी से उपलब्ध है 
जो आपको अस्थाई प्रेम की निशानियां दे सकती है और लांगुरिया सुनकर
आप इन्हें टीप दे सकते है. 

Monday, August 28, 2017

Posts of Ram Rahim and last week of August 2017




क्षमा के इस महान पर्व में हम अपने आपको ही दिल - दिमाग़ से मुआफ़ कर दें तो शायद एक बेहतर इंसान बनने की प्रक्रिया शुरू हो।
इनसे, उनसे, आपसे तो प्यार - मुहब्बत या धन्धे के रिश्ते है। लाज़िम है कि इनमें व्यवहार, लेन - देन जुड़ा है, टकराहट भी होगी और जुड़ाव भी बना रहेगा। ये सब तो जीवन है अस्तु बनता सँवरता ही रहेगा।
गर अपने आपको मुआफ़ नही किया और सज़ा देते रहें - पल पल तो शायद फिर कुछ भी नही बचेगा !!!
आओ, मैं अपने आपको मुआफ़ करूँ - ताकि उस अनंतिम यात्रा का साक्षी हो सकूँ , ताकि मन मे कोई बोध, ज्ञान और अपराध की किंचित छाया भी ना रह सकें।
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सारे बाबाओं, साधु - संतों को दी गई ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा वापिस लो।
मेरे देश के जवान इन घटिया लोगों की सेवा और सुरक्षा के लिए नही है
मेरा टैक्स का रुपया इनके लिए बर्बाद करने का सरकार को कोई हक नही। वो गुरमीत हो या रामदेव - तुरन्त ये सुरक्षा इनसे वापिस लो। रामदेव तो विशुद्ध व्यापारी है वो अपने रुपये से खुद की सुरक्षा करें गर डरपोक है तो।
#मोदी जी ध्यान दें ।
@PMOIndia को ट्वीट करें और दबाव बनाए या सरकार को इनकम टैक्स देने का बहिष्कार करें। बहुत हो गई मूर्खताएं।

"प्रधानमंत्री भारत के हैं,बीजेपी के नहीं. मुख्यमंत्री राज्य के हैं,बीजेपी के नहीं हैं"
- हरियाणा -पंजाब हाई कोर्ट 
26 अगस्त 17 एक आदेश में
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"किसी भी कीमत पर जीतना ही राजनीतिक नैतिकता बनती जा रही है."
- ओ.पी.. रावत
चुनाव आयुक्त , भारत सरकार 
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शर्म बाकी है अभी या हिंदी भी समझ नही आती !!!
इस पर ही किसी का बौद्धिक कर सुन लेते, मनन , चिंतन ही थोड़ी देर कर लेते तो लोकतंत्र का अर्थ समझ आता।

महामहिम राष्ट्रपति जी से तो अब उम्मीद करना बेकार है ये दीगर बात है कि वे क़ानून पढ़े है और ज्ञाता भी है।

आपको ना आती हो मुझे शर्म आती है
73 बच्चों की मौत
10 किसानों की मौत
56 व्यापमं में मौत
असंख्य जवानो और आदिवासियों की छग में मौत
दादरी, मुजफ्फरनगर के दंगों में मौत
मोब लिंचिंग में मौत
गुजरात ऊना में दलितों की मौत
पाटीदारों, जाटों की मौत
दार्जिलिंग में मौत
कश्मीर में हजारों मौत
सीमा पर जवानों की मौत
केरल में संघियों और वामियों की मौत
रागिनी दुबे की मौत
आज एक बेटी का हाथ काट दिया गया
दाभोलकर, पानसरे की मौत
रेलवे में हुई 8 दुर्घटनाओं में 1000 से ज्यादा लोगों की मौत
सफाई कर्मचारियों की रोज हो रही मौत
और आज विकसित राज्यों में से
28 लोगों की मौत
आपको कोई नैतिक, संविधानिक हक भी नही बनता कि आप , आपके निकम्मे मुख्यमंत्री , आपकी केबिनेट और आप खुद भी पद पर बने रहें।
आपकी पार्टी का मत है कि इतने बड़े देश मे ये सब होना लाजमी है। आप मुतमईन है कि देश मे आपके समर्थक भी मूर्ख और अंधे है तो मानते रहिये यह शर्म उन्हें भी सम्भवतः आती हो यदि उनकी रीढ़ सीधी हो और जमीर ना मरा हो तो।
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दुख के साथ मैं भारत का नागरिक आपको अपनी सरकार मानने से इनकार करता हूँ और देश मे सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति जी से निवेदन करता हूँ नई सरकार का गठन करें।

राम रहीम, नपुंसक व्यवस्था, कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए फौज, पुलिस और कार्यपालिका का दोहन करके झोंकना ऊपर से मीडिया और जनमानस के साथ भयानक हिंसा क्या दर्शा रहा है।
राष्ट्रपति क्या देख रहे है और सुप्रीम कोर्ट क्या कर रहा है। भंग करें दोनो राज्यों में सरकार और व्यवस्था फौज को हस्तगत करें।
भाजपा के लिए आत्म मंथन का दौर और अभी नही सुधरें तो 2019 में भुगतने के लिए तैयार रहें ।
यह बेहद गम्भीर संकट का समय है। संयमित रहें और देश को सर्वोपरि मानें ।

सुप्रीम कोर्ट अब धर्म को निजी घोषित करें और सार्वजनिक रूप से बेजा इस्तेमाल पर तुरन्त प्रतिबंध लगायें। जो भी आश्रम, मदरसे या मिशनरीज़ चल रहे है बाबा, मुल्लों और पादरियों के संरक्षण में और अवैध काम हो रहे है उन पर सरकार तुरन्त कार्यवाही करके राजसात कर अपने कब्जे में लें - वहाँ स्कूल, अस्पताल बनवाएं और जनहितार्थ के लिए चालू करें।
ये उदाहरण हमारी 70 साला तुष्टिकरण की नीति का ठोस उदाहरण है जिसे कांग्रेस ने पैदा किया, पाला पोसा, पोषित किया और अब भाजपा के साथ बाकी पार्टियां भी इसी राह पर निकल पड़ी है। आज का यह उदाहरण सिर्फ व्यवस्था को पंगु बनाने वाला नही वरन भस्मासुर की तरह सत्ताओं की मौत तय करने वाला भी है।
पिछले हफ्ते में न्यायपालिका ने जो भी काम किया है वह मुझमे पन्थ निरपेक्ष देश और संविधान में आस्था जगाता है और आशा दिलाता है कि अभी सब कुछ खत्म नही हुआ है। इसका श्रेय निश्चित ही महादेश की जनता को दिया जाना चाहिए।
सलाम , जोहार और जोर से कहता हूँ -
भारत माता की जय !!!

एक राम रहीम ने 70 साल के देश, कानून और व्यवस्था को चुनौती दी है। देश पाक चीन से निपटने में व्यस्त है अभी।
पंजाब हरियाणा से सेना में सबसे ज्यादा जवान है शायद और आर्थिक समृद्धि भी वहॉ है, ये सब दर्शाता है कि धर्म को सड़क पर लाने की इजाजत देकर हमने इन बाबाओं के रूप में नाग पाले है और अब ये सम्हले नही सम्हल रहे।
दूसरा, एक ओर जहां राजनीति को तटस्थ होकर न्यायपालिका का सम्मान कर न्याय हेतु सहयोग करना चाहिए वही वहां के भीरु मंत्री 144 धारा ना लगाने की बात कर न्याय पर ही दबाव डाल रहे है।
सोचिये आज अल्पसंख्यक कहे जाने वाले सिख धर्म बहुल दो छोटे राज्यों ने पूरे देश को हिला दिया है कल अगर हम धर्म के गलत प्रयोग और प्रयोजन को सड़क पर ला देंगे तो विश्व मे शांतिपूर्ण ढंग से जीने वाले, जगसिरमोर बनने की ताकत रखने वाले देश का क्या होगा।
दोनो राज्यों को कड़ाई से राम रहीम को अंदर कर कानून भंग करने के जुर्म में निपटाना चाहिए। यह सिख धर्म जैसे महान वीर पराक्रमी धर्म के राज्य में उत्पात मचा रहा है इससे कड़ाई से निपटना चाहिए ।

Wednesday, August 23, 2017

Punarvasu Joshi V/S Prabhu Joshi V/S Sandip Naik and Devil's Advocate Shashi Bhushan 22 Aug 2017


Punarvasu Joshi V/S Prabhu Joshi V/S Sandip Naik and Devil's Advocate Shashi Bhushan


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अभी परसो 12 अगस्त को ही मैं, बहादुर और मनीष उज्जैन गए थे और देवताले जी के घर पहुंचे थे परंतु राजेश सक्सेना जी ने बताया कि वे दिल्ली में है।
उज्जैन जाएं और उनसे ना मिले तो फिर कुछ जाने का मतलब नही है।
असंख्य स्मृतियां है और असंख्य तस्वीरें । जितेंद्र श्रीवास्तव के साथ या मदन कश्यप जी के साथ या हम लोगों की उनके साथ की लंबी मुलाकातें और उनका अधिकार के साथ देर तक रोककर रखना , कचोरी खिलाना या कविता पर चर्चा । शब्द धुँधले पड़ रहे है और दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया है ।
चन्द्रकान्त देवताले जी का यूँ गुजर जाना हिंदी कविता के एक युग की समाप्ति है, एक व्यक्ति अपने आप मे कविता का कोष था और साफ़ दृष्टि और बगैर किसी लाग लपेट के अपनी बात निष्पक्ष होकर कहता था। वह शख्स हम सबको रिक्त कर खुद अपनी झोली में हम सबकी दुआएं लेकर चला गया। पिछले दिनों उन्होंने मुझे कम से कम 15- 20 पौधे दिए थे जो मैंने बहुत प्यार से सँवारकर रखे है । ये पौधे ही अब कविता है, चन्द्रकान्त देवताले है और मेरी धरोहर है।
आपके लिए शरीर का छूट जाना अच्छा हुआ क्योकि इलाज की पीड़ा भयावह थी, आखिरी दिनों में कृशकाय और दुर्बल काया, कमजोर पड़ती स्मृति के साथ लोगों से मिलने में भी परहेज करने लगे थे आप।
आपको नमन करूँगा, श्रद्धांजलि नही दूँगा क्योकि आप मरे कहां है - मरिहै संसार !!! दुखी हूं यह भी नही कहूंगा क्योकि आपसे जी भरकर मिला हूँ , बातें की है, ठहाके लगाए है और कविता पर समझ बनाई है, आपके फोन आने पर आपकी चुहल याद है कि " नाईक , मैं मुक्तिबोध बोल रहा हूँ" आपके साथ एक जमाने मे 60 मिली के दो दो पेग लगाए है। स्व श्रीमती कमल देवताले जी के साथ काम किया है उनकी मृत्यु पर भी आपका दुख साझा किया है आपको अपनी बेटियों की हिम्मत बढ़ातेे देखा है और फिर आपके साथ अपने जीवन के बेहतरीन क्षण बिताए है।
अगस्त तुम सच में जल्लाद हो जो उज्जैन में स्थित हिंदी कविता के महांकाल को भी लील गए !!!
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हिंदी के कवि चन्द्रकान्त देवताले को पुष्पांजलि देते हुए प्रभु जोशी जी ने नई दुनिया मे 16 अगस्त को एक आलेख लिखा था। उनके सुयोग्य पुत्र पुनर्वसु जोशी , जो गत 18 वर्षों से अमेरिका में रहकर पढ़ रहे थे , ने 17 अगस्त को वह आलेख फेसबुक पर शेयर किया था। मैंने उस पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि एक विजिट के आधार पर इतना बड़ा अतिशयोक्ति पूर्ण विवरण लिखकर कवि के बारे में लिखना सिर्फ शब्दों की बाजीगरी है।
दूसरा देवताले जी खुद अपनी बीमारी के बारे में बात करने से बचते थे, आखिरी दिनों में वे मिलने से भी कतराते थे। बेहतर होता कि प्रभु जोशी जी उनके साहित्यिक अवदान की , कविता की चर्चा मुक्तिबोध, निराला, त्रिलोचन या अन्य बड़े कवियों के बरक्स करते।
उसी समय मैंने Shashi Bhooshan से भी फोन पर यही बातें की।
कल उज्जैन में देवताले जी की स्मृति में एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम रखा गया था तो एक तथाकथित पत्रकार उर्फ फर्जी साहित्यकार उर्फ आत्म मुग्ध और दुनिया मे सबसे ज्यादा ब्लॉक करने वाले फेसबुकिया चरित्र के व्यक्ति के आलेख की बात हुई, पुनर्वसु के आलेख की भी बात हुई। तो मैने अपनी बात मित्रों से कही । जब टिप्पणी खोजने गया तो मिली नही तब समझ आया कि 18 वर्ष अमेरिका जैसे खुले देश मे रहकर आने के बाद हरि भटनागर के लिए मानकीकृत हिंदी में बड़े विदेशी लेखकों का अनुवाद करने वाले हिंदी प्रेमी और अपनी बड़ी बड़ी टिप्पणियों से मात्र 37 साल के इस युवा ने मुझे ब्लाक कर दिया ।
भला हुआ जो मेरी गगरी फूटी की तर्ज पर अब माजरा समझ आया कि वो आई डी कौन चला रहा था क्योंकि शक तो पहले ही था कि हिंदी जब मैं 51 बरस यहां रहकर नही सीख पाया तो 18 वर्ष अमेरिका में रहकर आया खुले दिल दिमाग का व्यक्ति हिंदी के ऐतिहासिक सन्दर्भों और प्राचीनतम लेखकों के बारे में साधिकार लेखन, अनुवाद और प्रसंगों को कैसे याद करके लिख लेता है।
खैर शुक्र है अपुन ब्लॉक हो गए , वरना फर्जी प्रोफाइलों में उलझकर जीवन वैसे ही नष्ट हो रहा है । लोकतंत्र और खुले दिमाग के लोग जब इतने संकुचित हो जाये कि आलोचना ना सह सके और आत्म मुग्ध रहे तो मेरे ठेंगे से !!!

Shashi Bhushan - हम सब बर्दाश्त नहीं कर पाने में चले गए हैं। कोई कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। लोगों में किसी क्रिया की प्रतिक्रिया देखता हूँ तो बुरी तरह डर जाता हूं। अनुकूलन को लोगों ने सुखकर या प्रीतिकर होना ही चाहिए मान लिया है।

मैंने अपनी प्रतिक्रिया आपको बतायी थी। पुनर्वसु के यहां मैंने उसे लिखा भी है। वह होगी।


वह स्मृति लेख मुझे व्यक्तिगत रूप से अच्छा लगा था। मैने उसे विद्यालय में सुनाया भी था। कविता को भी सुनाया। उसने कहा यह जाबिर हुसैन पर लेख की तरह है या वैसा जैसा हजारी प्रसाद द्विवेदी ने टैगोर पर लिखा। यह उसकी राय है।

मेरी स्पष्ट राय है कि लेखन एक संवाद होता है। यदि किसी लेखक के बारे में हमारी धारणा ठीक न हो या हममें पूर्वाग्रह हों तो यह संवाद नहीं हो पाता। मैं आपको समझता हूं इसलिए तब भी कहा था आज भी कह रहा। 

प्रभु जोशी को मैं बहुत बड़ा कलाकार लेखक और चिंतक मानता हूं। मैं कह सकता हूँ कि जो बातें उन्होंने 2007 के आसपास बातचीत में यों ही कही होंगी वही बातें आठ दस साल बाद या तो टीवी में किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति से सभा सेमिनार में सुनने को मिलती हैं। उस दिन जो गणेश देवी रवीश जी से कह रहे थे वो सब बातें जोशी जी सालों से कह रहे हैं।

लेकिन प्रभु जोशी अब इंदौर में एक स्वायत्त द्वीप है। उनसे प्रतिस्पर्धा वाले लोग काफी हो गए हैं। मुझे नहीं मालूम कि अपना दुखड़ा रोने के लिए भी उनके पास वक़्त है। मैं या उनके शुभचिंतक यह चाहते भी हैं कि उन्हें यह सब दिखाई सुनाई न दे। उन्हें अपने अधूरे काम करने का एकांत और शांति दी जानी चाहिए।

पुनर्वसु भारत का ऐसा प्रतिभाशाली युवा है जिसके लिए मेरे दिल में गहरा प्रेम है। वह बहुत पढ़ा लिखा और कई मसलों में अपने बाप का बाप है। काश उसने भी हम लोगों की तरह कुछ सफलताएं और नौकरी चाही होती। काश वह इतना प्रतिभाशाली न होता। काश उसकी धारिता का काम भारत में होता। वह पढ़ लिखकर अपने घर लौट आया है तो हम उस पर लानत भेज रहे हैं और हम वही लोग हैं जो मुम्बई की एक माँ के लिए जार जार रो रहे हैं। हम किसी भी घर के लिए कितने बाहरी होते जा रहे लोग हैं!!!

मैं आपको इतना जवाब इसलिए दे रहा हूँ कि आपको जानता हूँ, आपका टोन मुझे पता है।
लेकिन यह सबको नहीं पता होगा। कुछेक कह सकते हैं मैंने आपको अच्छा जवाब दे दिया है। कुछ तो यह भी बोल सकते हैं प्रभु ने ही डिक्टेट कराया होगा। कुछ लोग हमेशा बड़े कमाल के होते हैं।

कितना अच्छा होता कि आपने ही बर्दाश्त कर लिया होता। क्या फर्क पड़ता है किसने ब्लॉक कर दिया। मुझे भी अन्फ़्रेंड करते रहते हैं लोग।

लेकिन एक बात कहूँगा देवताले जी के बारे में प्रभु जोशी के विचार बड़े मानीखेज और साहित्यिक महत्व के हैं। आखिर प्रभु जोशी ने उनका पोर्ट्रेट बनाया। क्यों बनाया होगा? क्या दिया होगा देवताले जी ने उन्हें?

स्वेटर बनाने वाली औरतों के बारे में आप जानते होंगे। वे पहननेवालों को बद्दुआ नहीं देतीं। प्रभु जोशी तो फिर भी चित्रकार हैं।

इंदौर कई स्तरों पर बिखर चुका है भाई साहब। नोट कीजिये। अब वहां प्रभु जोशी जैसे लोग किसी प्राचीन स्मारक की ही तरह हैं।

अभी इतना ही

Sandip Naik - तुमने लिखा यह सही है पर प्रभु जोशी जी ने व्यक्तिगत बातचीत में कई लोगों को और पिछले वर्ष प्रेमचंद जयंती पर अपने उद्बोधन में कहा कि उनके होनहार बेटे को नैनो टेक्नोलॉजी में पी एच डी करने पर नौकरी नही मिली और भारत मे उसके लायक नौकरी नही है। लौटता कौन है यह सब जानते है खैर वह व्यक्तिगत मसला है उनका। 


मुझे ब्लॉक होने का दुख नही , असहिष्णु होने और आत्म मुग्ध होने का दुख है इस उम्र में (दोनों के लिए) यदि हम बर्दाश्त ना कर पाएं तो क्या अर्थ है। और मैंने तो जिक्र जानबूझकर किया ताकि सनद रहे और लोग जो हिंदी पूजकों को पूजते है वे भी समझे कि खेल क्या है मोहरें क्या है और सहिष्णुता और आत्म मुगद्धता के बरक्स असली नकली प्रोफ़ाइल के मायने क्या है।

और ये सिर्फ मेरी प्रतिक्रिया नही इंदौर के बड़े छोटे कवि, कहानीकार और पत्रकार भी जानते है कि किस तरह से कौन किसे प्लांट कर रहा है और क्यों ? यह दीगर बात है कि वे पीठ पीछे देवास , उज्जैन, इलाहाबाद या गांधीनगर या दिल्ली में बोलते है खिल्ली उड़ाते है और मैं बगैर भय के साहस से बोलता हूँ क्योकि मैं तो कबीर पंथी हूँ। सच्चाई तुम भी जानते हो और स्पष्ट रूप से पूछूं तो बताओ इतने बरसों से हिंदी सीखा रहे है कितने ऐसे सुयोग्य बना दिये जो अनुवाद से लेकर हिंदी का इतिहास साधिकार लिख दें ? 

प्रतिभाशाली होना सबके लिए सम्भव है और हिंदी में इस समय अपने दम पर बहुत प्रतिभाशाली है कविता से लेकर आलोचना तक और वे शुद्ध देशी और हिंदी भाषी समाज से गौ पट्टी से आते है और पी एच डी कर रहे है अभी। मैं उन सबको प्यार करता हूँ और उन्ही से आशाएं है , मुतमईन हूँ कि वे हिंदी में नया रच रहे है और रचेंगे । 

तुमने लिखा , कहा - आभार और अंत मे इतना कि मेरी क्या मजाल कि किसी के एकांत में खलल डालूँ या विचलित करूँ मैं तो खुद निजीपन का हिमायती हूँ ।

प्रभु दा ने देवताले जी को मसखरा कहा था सनद रहे और यह भी कि पोट्रेट बनाया है।

Shashi Bhushan - मैं खुशनसीब हूँ कि इंदौर, उज्जैन, देवास के साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों से मुझे परिचित होने का अवसर मिला।


उज्जैन में रहता हूँ और इंदौर आता जाता रहता हूँ।

उज्जैन में देवताले जी से नहीं मिल पाया। जिस गोष्ठी की आप बता रहे वहाँ भी नहीं पहुंच पाया।

अपने विचार बदलने का अवसर मिले तो अवश्य बदलना चाहिए।

आपकी इतनी बड़ी आवाजाही है। कहाँ कहाँ अटक जाते हैं?

फिर बात करेंगे
अभी ग्वालियर हूँ

Monday, August 14, 2017

70 साल की आज़ादी का जश्न और एक मूल प्रश्न



70 साल की आज़ादी का जश्न और एक मूल प्रश्न 
आजादी का 70 वां साल आ रहा है। तरक्की यह है कि संसद, विधानसभा से लेकर नगर निगम, नगर पालिका, ग्राम पंचायतों और छात्र परिषदों में अपराधियों का प्रतिशत लगभग 60 से 70 है - जिनपर बाकायदा नामजद मुकदमे दर्ज है।
निहालचंद्र जैसे बलात्कारी व्यक्ति जिन्हें पुलिस भी गिरफ़्तार करने से डरती है - डेढ़ साल तक केबिनेट मंत्री बना रहता है। कई राज्यों के अकुशल और अयोग्य लोग - जो कई गम्भीर किस्म के अपराधों मसलन हत्या, नर संहार, दंगे, देश विरोधी गतिविधियों, बलात्कार, बलवा आदि में संलग्न है , आज प्रतिष्ठित पदों पर ससम्मान विराजमान है न्यायालयों से छूट भी गए है और जिले, प्रदेश और देश का मान दुनिया मे बढ़ा रहे है - बस फर्क इतना है कि वे अकुशल और अयोग्य है और कुछ लोग कुशल और दक्ष है जो काम करते है और एक बेहतर समाज बनाना चाहते है।
बहरहाल, अब आगे यह प्रश्न है कि क्या हम इसी तरह से चुन चुनकर अपराधियों को अपनी किस्मत का , हमारे इस देश के भविष्य का निर्णय लेने के लिए इन निर्णायक संस्थाओं में भेजते रहेंगे ?
सवाल इसलिए और बड़ा है कि वरिष्ठ वकील शांति भूषण ने द वायर पर देश के सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ लेने जा रहे जस्टिस दीपक मिश्रा को भी लेकर प्रश्न किये है कि एक अपराधी मुख्य न्यायाधीश कैसे हो सकता है जबकि उस पर ढेरों कानून के उल्लंघन और अपराधों की कहानियां दर्ज है, ऐसे में हम न्याय किससे मांगेंगे और सरकार यानी ये चुने हुए जनप्रतिनिधि बेहद शातिराना तरीके से संगठित तरीकों से नित्य नये उपक्रम कर देश और हमें गर्त में हर पल धकेल रहे है !
सवाल एक ही है कि क्या हम अभी भी अपराधियों को निर्णायक भूमिका में देखते है और उन्हें अपना कर्णधार मानकर अपनी नियति सौंप दे ?
मुझे नही पता, मैं सवाल कर सकता हूँ जवाब विद्वजन दें।

कांग्रेस से 60 साल भयानक भ्रष्टाचार किया, दलाल पैदा किये, देश बेच दिया।

आजादी के आंदोलन में हिस्सेदारी करके देश को आजाद भी कराया और पूरा मूल्य भी वसूल किया पर आखिर लोगों ने हर कोने से उन्हें बाहर कर दिया अब वे बाहर है और संतुष्ट है रोजी रोटी के इतने संकट नही है, लोग भी खुश है कि भ्रष्ट लोग बाहर है।

कुछ लोगों ने आजादी के समानांतर जहर बोने का काम किया - कौमों में , मासूमों में और सियासतों में और 60 साल के कड़े संघर्ष के बाद जहर के अविजित , अभेद्य और अपराक्रमी किलों पर सवार आज वे सर्वस्व हासिल कर सब पा लेना चाहते है।

अफसोस यह नही कि ऐसा क्यों , अफसोस यह है कि नशे की आदतों की तरह बुद्धिजीवी जो काल और समय से परे देखते है, कदमों की आहट पहचानते है और जानते, बुझते और समझते है कि जहर खुरानी के ये विशाल और अपराजेय के वट वृक्ष एक दिन उन्हें भी निगल लेंगे । 

देश , समाज और मनुष्य मात्र की काया में लगी ये दीमकें उन्हें शनै शनै चट कर रही है , उनकी आत्मा के पोर पोर को सूखा देंगी - फिर वे कायल है एक अवतार के, इस जहर बोने  की प्रवृत्ति के इतने हिमायती हो गए है कि अपनी ही संततियों में खुद जहर  बोकर आने वाली पीढ़ियों को विकृत कर रहे है । अपना तन - मन - धन,  अक्ल और सदियों से पार झांक लेने की दृष्टि जो मानव कल्याण के लिए उपजी थी - उसे भी जाया कर रहे है। 

इससे भयानक समय महाभारतीय या रामायण काल मे भी नही रहा होगा। मुझे ऐसे सभी रीढ़विहीन और मजबूर मित्रों से बेहद प्यार हो गया है , वे अपना ऐसा कुछ रचने में व्यस्त है जो उन्हें इस काल मे कालजयी करेगा और अमरता प्रदान करेगा। "समय लिखेगा उनका भी अपराध" ऐसी तटस्थता को मैं प्रणाम करते हुए बेहद आश्वसत हूँ , मुतमईन हूँ कि ऐसे मित्र यह जरूर मानेंगे कि लोक अपने अनुभवों और इतिहासबोध से सीखकर बहुत बड़े परिवर्तन करते है, साथ ही इन जहर खुरानी के ठेकेदारों पर भी स्नेह वर्षा करके पुचकारने और दुलारने का मन करता है कि ये यह नही देख रहें कि कोई और है काल के इसी समय मे जो गर्भस्थ अभिमन्यु की तरह हर प्रकार की युद्ध कलाएं तुम्ही से सीख रहा है और कल ही सामने तनकर खड़ा होगा।

#खरी_खरी


Saturday, August 12, 2017

गोरखपुर में राज्य प्रायोजित 60 बच्चों की हत्या -जिम्मेदार कौन?

गोरखपुर में राज्य प्रायोजित 60 बच्चों की हत्या - जिम्मेदार कौन ?




जिस देश मे सरकारें, कार्यपालिका और न्यायपालिका बच्चो की परवाह नही कर सकती और दुर्लक्ष करके संगठित रूप से हत्या के जघन्य अपराध में शामिल होती है उस देश का भविष्य तो क्या वर्तमान भी अंधेरे में है । यह राष्ट्रीय शर्म का दिवस है।


डरपोक मीडिया में दिलेरी से सबूत के साथ कहने वाले भी है। 60 मौतें 4 दिन में ! किस जगह शासन कर रहे हो और नर्क को नरक बना रहे हो ? ये कुशासन है और घोर अराजकता की भयावह स्थिति। 
अब बोलों , साबुन से हाथ धुलवाने वालों पोंगा पंडितों !! किस धर्म मे बच्चों की हत्या को जायज कहा गया है।

जो लोग ऑक्सिजन नही दे सकते वो अच्छे दिन देंगे, मूर्ख है देश के लोग जो इनसे उम्मीद करते है। मप्र में सरकार बताये कि एम व्हाय अस्पताल की जांच का क्या हुआ जब 18 बच्चे मरे थे इसी कारण से अभी !
सुना है अयोध्या में पत्थरों की सप्लाई निरन्तर जारी है!!!

जो कम्पनियां अस्पतालों में पेमेंट ना मिलने से ऑक्सिजन रोक दें आखिर वो पाकिस्तान या चीन की तो नही होगी ना, सीधी बात है कमीशन की डील पक्की हुई नही होगी। 

अगला सवाल है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का अरबों का रूपया, यूनिसेफ से लेकर ढोंगी सपोर्टर समूह और तमाम सॉफ्ट हारटेड स्वास्थ्य के रखवाले क्या कर रहे थे ?

क्या ऐसी कम्पनियों को ठेके दिए भी जाना चाहिए?
और आउट सोर्सिंग करो , सरकार लोगों को सूअर समझती है लोग कुत्ता समझते है और इस लड़ाई में अबोध बच्चे मारे जाते है। 

जब तक सरकारी स्कूल , आंगनवाड़ी,अस्पताल या कोई विभाग की जिम्मेदारी सुनिश्चित नही की जाएगी और इसमें काम करने वालों को पिछवाड़े पर लाल मिर्ची की धूनी देकर नही रखा जाएगा ये हरामी मक्कार सुधरेंगे नही।

क्षेत्र विशेष के जनप्रतिनिधि और मंत्री के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट की जाकर इन्हें तत्काल हिरासत में लेना चाहिए ताकि इन कमीने ऐय्याश लोगों को अपने काम और औकात भी समझ आये।

शिवराज जी , एम व्हाय इंदौर में हुई 18 बच्चो की मौत की जांच रिपोर्ट हमे कब देंगे, कौन जिम्मेदार था, किस कम्पनी का ठेका था, कमीशन की डील कितने पर पक्की हुई थी , कितने निलंबित और बहाल हुए, और आगे ये प्रदेश में ना हो इसके लिए क्या कदम उठाए गए है। 

हे नर्मदा नायक मैं इसलिए पूछ रहा हूँ कि बेचारे आदित्य नाथ योगी नये नये मुखिया बने है और आप 15 साल से राज काज कर रहे हो , व्यापमं से लेकर 6 करोड़ के विश्व रिकॉर्ड वाले पौधारोपण आपने "आसानी से सलटा" दिए है, सी बी आई से भी बच निकले है। 

थोड़ा ज्ञान बांटिए, किताबें लिखिए क्योकि अब पूरे देश मे  मोदी जी और अमित शाह हर पंचायत में मेहनत करके सरकार बनाएंगे ही। इसलिए विनम्र सुझाव था !

शुक्र यह है कि अभी गोरखपुर की दुर्घटना में पाक, आतंक, बीफ खाऊं मुसलमान, आई एस आई एस , कश्मीरी मिलिटेंट का हाथ घोषित नही हुआ है वरना तो ये सब होता ही और कांग्रेस, वामपन्थी आदि भी इसमें शामिल करार दे दिए जाते।

बक्सर के कलेक्टर द्वारा तनाव में आत्महत्या

मुम्बई में महिला का घर मे कंकाल मिला

देवास में 21 साल के युवा द्वारा तनाव में आत्महत्या

सिंघानिया अपने ही घर से बेघर 

60 बच्चों की हत्या /मौत

किसानों की हत्या / मौत 

रागिनी दुबे की सड़क पर हत्या 

कुपोषण से लगातार मौतें

विकास बराला और देश के युवाओं और मर्दों में मर्दानगी चरम पर
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ना राहुल, ना मायावती, ना वृंदा, ना येचुरी, ना ममता, ना दक्षिण ना उत्तर, ना पूरब ना पश्चिम !

ये समाज कौन सुधारेगा, आने वाली पीढ़ियों को तनाव, हिंसा, कचरा, गोबर , गौमूत्र और ये सब देकर जाओगे ? तुम्हारी औलादें किस पर गर्व करेंगी - कभी सोचा है ? 

मीडिया भांड और अकर्मण्य 
एनजीओ अपनी साख बचाने में लगें 
बुद्धिजीवी घर मे बकलोली कर रहें
युवा बीफ, गौ हत्या और गौ रक्षा में व्यस्त
डाक्टर, वकील, प्राध्यापक वैसे ही न्यूट्रल कहूँ या नपुंसक कौम है 
समाज विज्ञानी, अर्थ शास्त्री सरकार में घुसने और विदेश यात्राओं की जुगाड़ में 
वैज्ञानिक सड़क पर अनुदान के चक्कर मे 

बचा कौन ? समाज वृहन्नालाओं से चल रहा है 

डाक्टर कफ़ील एहमद छोड़ दो नौकरी, देश छोड़ दो और कही दूर जाकर किसी पिछड़े देश मे काम करो, तुम्हारी जरूरत वहां ज्यादा है - यहां सब लोग हिन्दू मुसलमान है, इंसान नही और इनके लिए ना यहां पर्याप्त डाक्टर है ना सुविधाएं , लिहाजा हम पशु चिकित्सक बढ़ा रहे है।
कफ़ील साहब आप क्यों इन बेगैरत लोगों के लिए अपना हुनर बर्बाद कर रहे है, ये लोग आपको आरोप, बेइज्जती और दुष्प्रचार के अलावा और कुछ नही दे सकते जनाब !
एक बार फिर कहता हूँ अपने साथ 50-60 होनहार चिकित्सा छात्रों को ले जाओ कम से कम कुछ काम तो कर पाएंगे वहां !



#खरी_खरी


Saturday, August 5, 2017

साहित्य के टुच्चे - 5 अगस्त 2017 एवं अन्य पोस्ट्स


1----
बहुत कोसते थे फेसबुक पर लिखने वालों को - फेसबुकिया, उच्छृंखल, उजबक, फालतू, टाईम पास और ना जाने क्या क्या !!!

बड़े बड़े लेखक बनते थे, अकादमिक और सिर्फ पत्रिकाओं में छपने वाले, प्रकाशकों को तेल लगाने वाले और बड़ी अकादमियों और भारत भवनों में मुफ्त की दारू और आयोजक के मुर्गे चबाकर हमेशा घटियापन की साहित्यिक राजनीति करने वाले बनते थे ना।

सबकी असलियत सामने है - औलादों से, नए नवेलों से, नाती पोतों से ई मेल, ट्वीटर, फेसबुक सीख रहे है , मोबाइल में हिंदी फॉन्ट डालकर अब 70- 75 की उम्र में टाइपिंग सीख रहे है पोपले मुंह के फोटो या कि खपी जवानी के फोटो चैंपकर लुभाने की आदतें फिर जवां हो रही है इन सबकी और अब अपनी बातें, लड़ाई झगड़े और वाद विवाद कर रहे है। कई बार आने जाने का नाटक किया और बड़े मुगालते में रहें कि कोई हाथ पांव जोड़ेगा कि आ जाओ पर लौट आए फिर और अब फिर पेलने में लग गए कविता , गद्य, आलोचना, ब्लॉग, और लंबे उबाऊ आलेख।

समझ आ गया कि पत्रिकाओं और किताबों का जमाना गया कि कोई खरीदे पढ़ें, इंतज़ार करें । यहां लिखों हाथों हाथ प्रतिसाद मिल जाता है और किसी की चिरौरी भी नही करना पड़ती , आत्म मुग्ध भी खूब हो सकते है और जूतम पैजार भी खूब कर सकते हो।

कुछ की अकड़ अभी गई नही है जिनकी नाक बह रही है और कुछ कुटिल किस्म की लेखिकाओं ने या दो टके के प्रकाशकों ने फालतू में सर चढ़ा रखा है वे ही नौटँकी कर रहे है और सोच रहे है उनकी टी आर पी छपे से ही बढ़ती है जबकि हकीकत ये है कि सरकार या कारपोरेट की गुलामी में चौबीसों घंटों  झक मार रहे है, बाकी तो सारे नोबल और बुकर के जायज हकदार ऊँट इस फेसबुक नामक पहाड़ के नीचे है। भारत भूषण पुरस्कार के बहाने इस हमाम में सबको देख लिया बगैर मानसून में नहाए।

खबरदार जो अब किसी ने किसी को फेसबुकिया कहा तो सारे सबूत लेकर बैठे है हर पोस्ट के थानेदार और कलपुर्जे

असल मे साहित्य के ये टूटे फूटे और चुके हुए चौहान युवाओं की बढ़ती प्रतिष्ठा और चर्चा में बने रहने से चिंतित है और देख रहे है कि अब घर मे पांव दबाने और मालिश करने कोई आता नही। लिहाजा शक्कर की बीमारी को सम्हालते हुए बी पी नियंत्रित करते आंखों पर मोटा चश्मा लगाकर भी की पेड पर कुश्ती लड़ रहे है और फिर अब यहां वहां आने जाने की , कार्यक्रमों की सेटिंग भी इसी ससुरी फेसबुक से होती है ना।

#साहित्य_के_टुच्चे

*****

अमित शाह जी किसने आपको भड़का दिया और गलत जानकारी दी कि दवाईयां 18 % सस्ती हो गई है।
ये लीजिये आपकी सरकार की एक और (ना) मर्दानगी भरी कार्यवाही।
हृदय का बायपास, किडनी का डायलेसिस , कैंसर और अन्य बीमारियों से पता नही जेटली या आपकी पार्टी के लोगों का पाला पड़ा या नही पर मैंने भुगता है और रोज अपने आसपास के लोगों को देखता हूँ ।
कभी विधायक खरीदने से फुर्सत मिलें तो एक बार किसी दवा की दुकान पर या अस्पताल में चले जाना 2019 के पहले ताकि समझ आ जाये कि भारत माता की जय बोलने वालों की हालत क्या है और ऊपर से ये जेटली नामक प्राणी दिनों दिन उजबक जैसे निर्णय लेता जा रहा है।

कांग्रेस को कहते थे तुष्टिकरण करते थे, और तुम क्या कर रहे हो।
कारण दे रहे है कि शिक्षा में पिछड़ापन है और गरीबी ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा है तो जिम्मेदार तो सरकार और ये समुदाय ही है ना !
अजीब है तर्क और कुतर्कों का कोई जवाब नही। 

फायदा उन्हें मिलेगा जो पहले से सरकारी नौकरी में बैठे है, बगैर कुछ करें धरे मलाई चाट रहे है सातवें वेतन आयोग की।

पढ़ाई, सुविधा और सहूलियत तो तो ठीक था, नौकरी में भी दिया और अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ाते हुए पूरी बेशर्मी से प्रमोशन में आरक्षण देंगे।
सत्यानाश हो इनका, आग लगे ऐसी वोटों की हवस को, जो बच्चे मेहनत करके पढ़ रहे है और कठिन परीक्षाएं पास कर रहे है उनके हक ये मूर्ख और उज्जड गंवार राजनेता जिंदगी भर मारते रहेंगे।
फिर कहता हूँ बच्चों पढ़ो लिखो और इस देश को छोड़कर कही और बस जाओ यहां जीवन भर जाति सम्प्रदाय और राजनीति तुम्हारी हर सांस नरक बना देगी।
मैं इस तरह के नौकरी प्राप्त कर प्रमोशन के लिए भी बैसाखी लेकर जीवन का गुजारा बसर सरकार की दी हुई भीख पर जिंदा रहने वालों, काम ना करके प्रमोशन लेनेवालों, योग्यता, जमीर और खुद्दारी को गिरवी रखने वालों के खिलाफ हूँ और आरक्षण के भी।
ईमानदारी से कोई बता दें कि आरक्षण से आये लोगों ने क्या झंडे गाड़े है , क्या भला किया अपनी ही जाति का और खुद ने नौकरी पाकर कितनी योग्यता बढाई है कि कुछ सार्थक योगदान दे पाए या ये और बता दें कि कितनी पीढ़ियों को आरक्षण नामक दवाई पिलाकर अपनी औलादों को निकम्मा और ठूंठ बनाते रहेंगे ।
अब तो शिक्षा मुफ्त है तो जाओ ना पढ़ाओ और अपनी औलादों को योग्य बनाओ उनमे खुद की योग्यता से जीने का साहस पैदा करो, कब तक रोते रहोगे कि ऊंची जातियों ने शोषण किया, मनु ने ये किया - वो किया। हमारी पीढ़ी ने तो नही लिखी ना मनु स्मृति, कितने ऊंचे वर्ग के घरों में है ये किताब जिसका रोना उठते बैठते गाते रहते हो। या तुमने कभी पढ़ी या देखी है - सिर्फ कुछ नेताओं के पिछ लग्गू बनकर दोहराते रहते हो ?
सवाल यह है कि कब तक आरक्षण पर जिंदा रहोगे ? कभी तो झांक कर देख को अपना हूनर, दक्षता और ज्ञान यदि नही तो हर माह थोड़ी झिझक महसूस होती है या नही जब हाथ मे गिनते हो मक्कारी के रुपये, और फिर वो आदिवासी तो इस प्रपंच से दूर है जो असली हकदार है तुम तो रो धोके लग गए , अब तो छोड़ दो दूसरों के लिए, कब तक झिकते रहोगे ?
कमेंट वही करें जो थोड़ी अक्ल या समझ रखता है मुद्दों की , दलित विमर्श वाले , घटिया आंदोलन चलाने वाले, मुफ्तखोर जो काम करने के बजाय दलितों के नाम पर सुविधा भकोस रहे है कमेंट ना करें और जवाब की उम्मीद ना करें। लाखों का पैकेज गटककर, सेमिनारों और हवाई यात्राओं में दलितों की राख पर दाल बाटी खाने वाले चिंतक भी यहां पांव ना पसारे।

युवा कवि "क" को कविता के लिए भारतीय बुकर पुरस्कार मिला ।
उसी दिन उसके दोनो हाथों में फ्रेक्चर , अस्पताल में भर्ती भयानक जख्मी होकर ।
चार युवा कवियों और तीन आलोचकों के खिलाफ 302 में एफ आई आर दर्ज दिल्ली में ।
देशभर के लेखकों में जलन, 9 युवा कवि किस्म के चापलूस, पी एच डी होल्डर , अधेड़ कुंवारे, कुंठित कवियों और दस बीस कविता संकलनों और हर रोज प्रोफ़ाइल पिक्चर बदलने वाली 6 कवियित्रियों ने आत्महत्या की।
मीडिया ने पुरस्कार वापसी गैंग को लताड़ा।
विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों में रोष।
सोशल मीडिया पर घमासान और अंत मे
मार्क जुकरबर्ग ने हिंदी में कविता लिखना आरम्भ किया।
*****

"घर - घर मिट्टी के ही बर्तन है और टकराने की आवाज से व्योम में हलचल होती है "

एक अलमीरा है, कुछ टांड और चार पांच रेक। एक लकड़ी की छोटी अलमीरा जिसमे सामने की तरफ कांच लगे है जो अब इतने घिस गए है कि आरपार नही दिखता, जिस झिरी में वे फिट थे वो झिरी धूल, मिट्टी और लकड़ी के बुरादे से भर गई है लिहाजा जब भी कांच खोलना होता है तो मशक्कत करना पड़ती है बहुत मानो सदियों से जमे हो और दशकों का श्रम लग रहा हो। वैसे भी बीच के अंधेरे कमरे में पड़ी इस अलमीरा को खोलने के लिए पच्चीस वाट का बल्ब जलाना पड़ता है वरना खतरा हमेशा बना रहता है कि कब कांच फुट जाए चर्र से और हाथ मे लग जाये किरच कोई या बांस की कोई फांस घुस जाए हथेली की नरम बाजू में और फिर खून की एक बारीक से धार निकल पड़े जिसे बगैर आंसूओं के देर तक मुंह मे रखकर चूसना पड़े कि खून बहना रुके और एक काला सा मोटा थक्का जम जाए । काश कि उस दिन जब बांस की मोटी फांस घुसी थी तो जो खून निकला था उसे चूसने के लिए तुम होते या कि एक कपड़ा बांधकर कसकर धार रोकने के लिए कोई तो वह सब नही होता , बहरहाल।

इन सभी अलमिराओं या रेक पर बर्तनों की एक सजावट थी-  कड़छी, संडासी, उचटन, झारा, पली, तलने वाली जाली, अलग अलग आकार के चम्मच, लोहे के काले लम्बे लम्बे अजीब आकार के औज़ार ! तपेलियाँ, डेगची, कढाहियाँ, भगोने, शकुंतला बर्तन, तेल के पीपे नुमा छोटे बर्तन, चाय की तपेलियाँ, डोंगे, कढ़ाव और भी आकार के बर्तन पीतल, स्टेनलेस स्टील और तांबे के, कुछ ब्रान्स और एलुमिनियम के भी थे जो झांक जाते थे यदा कदा !! इसके अलावा दीवार पर जंग लगी किलों के सहारे टँगी रेक में कुछ भिन्न प्रकार की थालियां थी, छोटी प्लेट्स, कुछ कटोरियाँ, कुछ बाउल और अजीब किस्म के बर्तन जिनका नाम भी मुझे याद नही था इसलिए मैं सभी को कटोरी और बाउल की दो श्रेणियों में बांट देता था। थालियां भी बड़ी छोटी होने के साथ साथ आकार, डिजाइन और रंग में अलग थी कोर वाली भी थी और सपाट भी , कुछ में खाने बंटेे थे और कुछ एकदम फीकी सी थी मानो जीवन की तरह कोई हलचल नही !!! ढेर सारे ग्लास थे आकार और प्रकार के - ऊँचे, ठिगने, मोटे ,पतले - पीतल, काँसे और स्टील के पर सब याद रहता था कि कौनसा कहां रखा रहता है और दही किसमें जल्दी जम जाता है।

लकड़ी की बुरादा होती जा रही अलमीरा में कांच के धुंधलकों के पार कुछ कांच के बर्तन थे और बॉन चाइना के कप बसी और केतली जो कोई खास आने पर ही बाहर निकलते थे । इन बॉन चाइना को छूने की मनाही थी और शायद देखने की भी। केतली को फिल्मों में ही देखा था अपने घर की केतली को हाथ लगाना पाप से बड़ा अपराध था । कुछ और बर्तन थे मसलन परात, तांबे का एक बड़ा बम्बा जिसमे ठंड के दिनों में कोयले डालकर पानी गर्म होता था, कुछ तवे थे और हंडे गागर के साथ एक कोने में रखी बाल्टियां जिन्हें इमली से रगड़ रगड़कर चमकाया जाता था और रखा जाता था मानो वो कोई जीने और संस्कारों का तगड़ा पैमाना हो।

--- जारी


अविजित, अविनाश, आदित्य, अभिषेक, अभिजीत, हरेराम, पीलेराम, कालेराम, मुकेश, सुकेश , नीलेश, उमार,कुमार, आ, झा, नित्या , अनित्या, दुःखेश, दुर्गेश, फिरोज, फारुख, अफसाना, रुखसाना, सुनीता, अनिता, दुर्गा, काली, भवानी अला फलां ढिमका आदि अनादि इत्यादि या और कुछ .... ये भीड़ गाय पट्टी से दिल्ली पहुंची अवागर्द है जो मप्र, यूपी ,बिहार ,झारखंड और राजस्थान से है। हिंदी में दो टके की मास्टर डिग्री लेकर प्राध्यापक बनने की चाह में ये दिन रात कोसने के सिवा कुछ नही करते मौजूदा प्राध्यापकों को। जीवन के रस रंग छोड़ चुके ये युवा प्रेम में असफल जीवन की कशिश में नित्य मरते जा रहे है और दया के पात्र है।

भारत भूषण से वंचित ये हिंदी के नए दलित है।
इसमे आप भी जोड़ सकते है कुछ नाम !!!
ये हिंदी के वो युवा कुंठित है जो पुरस्कारों की रज लेने को आपके चरण धोकर पी सकते है। वेब पोर्टलों पर घटियापन परोस कर और अपनी कुंठा में डूबी अवसादग्रस्त कविता, उजबक किस्म के गद्य और निम्नतम श्रेणी के किस्से लिखकर रातम रात हिंदी के बुकर पा लेना चाहते है। ये दिल्ली में किसी दुकान में टाइपिंग कर खुद को सॉफ्टवेयर इंजीनियर कहते है, होटल में वेटर की नौकरी कर होसपेटिलिटी बताते है, किसी पत्रिका में डिस्पेच वाले बाबू स्टूल पर बैठ के अपने को सहसंपादक बताते है। ये हिंदी के बदनाम कवि है जो पुरस्कार पाने को कोठो के लिए कविता लिखकर मंटो समझने का दावा करते है।
इन्हें पुरस्कार तो क्या हिंदी की जीवंत दुनिया से ही बेदखल कर देना चाहिए कि जाओ पढ़ो लिखो चीनी फ्रेंच और अँग्रेजी में इतना कि सीधा नोबल ही मिल जाएं।