Friday, October 25, 2013

चापलूस गणराज्य की स्थापना करें

आईये चापलूसी करें और सब पा लें जो हम इस जीवन में अपने कर्मों के सहारे नहीं पा सकते, चाहे संपत्ति हो, प्रमोशन हो, लाईक हो, कमेन्ट या अपने आलेख किसी अखबार, जर्नल या पत्रिका में. 

चापलूसी में बड़े गुण है राजनीती से लेकर फेस बुक तक में यह देखने को मिल जाएगा. आईये चापलूसों को सम्मानित करें, उनका नागरिक सम्मान करें, उन्हें ससम्मान लोकसभा, विधानभाओं, स्थानीय शासन की संस्थाओं में भेजें और इन चापलूसों द्वारा की जा रही चापलूसी प्रक्रियाओं को दस्तावेजित करके देश की धरोहर में संगृहीत करें.

कहाँ जा रहे है श्रीमान जी, आईये इन चापलूसों का एक नागर समाज बनाएं जो हर बात में हाँ में हाँ मिला दें और सब करने का दम भरते है, भले ही ना इन्हें हिन्दी आती हो या अंगरेजी, ना काम आता हो या ना समझ हो , ना काम करने का शउर, ना कुछ याद रहें ना कुछ करने का जज्बा हो, पर हाँ में हाँ मिलाना जरुर आता हो बस, ऐसे ही चापलूसों के आदमकद बुत बनाकर चौराहों पर स्थापित करें और इनके बनाए उसूलों पर सीमेंट कांक्रीट की पक्की सड़क बना दें, ना समझ है ना याददाश्त पर इनकी हाँ पर पूरा संसार समर्पित.

अपने आपको घोड़ा मानकर जो गधे टट्टू भी ना बन पायें और सारी उम्र सिर्फ दलाली और चापलूसी करके जीवन खपा दिया और अपने पीछे एक पुरी पीढी बिगाड़ दी उन चापलूसों से सावधान रहने की जरुरत नहीं है बल्कि अब इनसे हाथ मिलाकर अपना जीवन संवारने की जरुरत है क्योकि यही है जो राज करेंगे आपका भविष्य और वर्तमान संवारेंगे.

आईये इन चापलूसों को कहें कि देश में नई जगह बन रही है, नई स्थापनाएं की जा रही है इनसे कहें कि अपने काम में निष्ठा छोड़कर सिर्फ यहाँ-वहाँ भाषण देते रहें और मानदेय बटोरते रहें, अपनी रपट ना लिखकर अखबारों के पन्ने रंगते रहे, अपने काम के संबंधों से पाई ऊर्जा को लेकर अपनी जगह बनाएं नए मुर्गें खोजे और माल बनाए और नित्य दूध दुहते रहें.

आईये चापलूसों के लिए एक ऐसे राज्य की स्थापना करें जो तमाम तरह के उद्योगपतियों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों, विद्वानों, शिक्षाविदों, ब्यूरोक्रेट्स, व्याभिचारी नवाचारियों से परिपूर्ण हो ताकि इन्हें सांस लेने में दिक्कत ना हो, हाँ वहाँ बस श्मशान ना हो क्योकि ये ज़िंदा रहेंगे हमेशा के लिए चिर युवा ये चापलूस हमेशा देश में ज़िंदा रहेंगे............इन्हें ज़िंदा रहना ही होगा. आमीन.!!

Sunday, October 20, 2013

दुनिया के घोड़ों होशियार

उसे मालूम नहीं कि काबुल में घोडें नहीं होते, वह चालाक है, सारे गधों को इकठ्ठा करके जोत दिया और अब खुद घोड़ा बना बैठा है

अगर सच में घोड़े श्रेष्ठ होते तो जंगल छोड़कर नहीं आते या दुनियाभर में लोग घोड़ों के अभ्यारण्य बना रहे होते, गधों को कोई मुगालते नहीं- वे जंगल में भी खुश है और आपकी हम्माली करते हुए भी या पहाड़ पर टट्टू के रूप में चढते हुए भी या केदारनाथ के स्खलन में दबकर मरते हुए भी. सवाल यह है कि आखिर में बचेगा कौन??? तो सुन लो घोड़ों, डार्विन चचा कह गए कि Survival of the Fittest.

घोड़े सिर्फ टाँगे में जोते जा सकते है या रेस में दौडाए जा सकते है, तीसरे विकल्प के रूप में वे किसी बारात में सिर्फ चन्द घंटों के दुल्हे को ढोने का काम ही कर सकते है बाकी किसी काम के नहीं, गधे इस मामले में बड़े बेशर्मी से सब वे काम कर सकते है जो कोई नहीं कर सकता.............दुनिया के घोड़ों होशियार........

घोड़ों को अपनी श्रेष्ठ नस्ल का जितना मुगालता या गुमान होता है उतना किसी को नहीं, परन्तु वे गधों से तुलना करते समय भूल जाते है कि दुलत्ती गधों की जोरदार होती है और अगर सरेआम पड़ गयी तो कही के नहीं रहेंगे...............

अक्सर घोड़ों को कई बार मुगालते हो जाते है कि वे दौड़ जीत लेंगे और ताउम्र जवान बने रहेंगे, अच्छा होता कि वे एक बार देख लें कि उनका विकास (Evolution) गधों से बुरी हालत में हुआ है.

फिर गधे ने घोड़े को देखा और सोचा कि चलो ठीक ही हुआ कि मै गधा रहा वरना घोड़ा बनकर कही का ना रहता............मै घर और घाट दोनों का नहीं, पर ये कमबख्त तो दुनिया में कही का नहीं है - काम का ना काज का, सौ मन अनाज का .......

फिर गधे ने सोचा कि घोड़े पर दया करनी चाहिए असल में वह भी अस्तबल में ही तो अपना जीवन खपा रहा है और सिर्फ चने और रूखी-सुखी घास पर ज़िंदा है रोज उसे भी मालिक हांक देता है यह जानते हुए कि उसका "हार्स पावर" किस बेदर्दी से इस्तेमाल किया जाए............दरअसल में घोड़ा भी दिमाग से उतना ही पैदल है जितना उल्लू होता है, उसे रेस में सदियों से दौडाया जा रहा है और वह है कि किसी के सपनों को पूरा करने के लिए अनवरत दौड़ा ही जा रहा है...........माफ़ कर दो, माफ़ कर दो!!! गधे ने आखिर आज एक क्षण के लिए ही सही, घोड़े को माफ़ कर दिया.........

फिर गधे ने सोचा कि घोड़ा तो घोड़ा ही रहेगा और समय का दुश्चक्र है वरना यह घोड़ा भी एक लम्बी प्रसव पीड़ा के बाद सीजेरियन द्वारा इस स्थिति में लाया गया है. धीरे धीरे वो घोड़ो के अस्तबल को भी समझ रहा था और घोड़ो का साथ देने वाले उल्लू, मगरमच्छ, गिरगिट और साँपों को भी, पर लगा कि डार्विन बाबा कह गए है ना कि सबको ज़िंदा ही रहना है और जीने के लिए सब धत्तकरम करते है, कौनसा गलत करते है. बस अब गधा घोड़ों, खच्चर और बाकी के बीच है ज़िंदा और अभी तक साबुत अफसोस है तो अपने साथ वाले गधों का जो इस अस्तबल में आकर ना घोड़े रहे ना गधे बस सिर्फ दो कौड़ी के घटिया लफ्फाज़ चापलूस और घोर मक्कार बनकर रह गए है.

"शाहिद को देखा जाना बेहद जरुरी है"



"शाहिद" (हंसल मेहता द्वारा निर्देशित) सिर्फ एक फिल्म नहीं वरन हमारे सात दशकों की वो कहानी है जो आज भी टीस बनकर नासूर के रूप में मौजूद है, शर्मनाक यह है कि इसे एक फिल्म के रूप में बनाकर परोसना पड़ रहा है और हाल में सिर्फ चन्द लोग बातें करते हुए देख रहे है इस फिल्म को. असल में जो केके मेनन इस फिल्म में जेल की सीखंचों के भीतर रहते हुए कहते है ना कि "उसे मालूम नहीं कि काबुल में घोडें नहीं होते, वह चालाक है, उसने सारे गधों को इकठ्ठा करके खुद घोड़ा बना बैठा है' यह सिर्फ एक डायलाग नहीं वरन हमारे लोकतंत्र पर एक करारा तमाचा भी है, क्योकि ऐसे चालाक लोग हमारे आसपास मौजूद है जो सिर्फ अपने मकसद के लिए और बाजारीकरण के इस कमाऊ दौर में बुद्धिमानों को भी गधा समझ कर इस्तेमाल कर रहे है, और अकूत संपत्ति बना रहे है और अपनी राजनैतिक ताकत भी. यह फिल्म जिस मुम्बई के दंगों के साथ शुरू होकर स्व शाहिद आजमी के सम्पूर्ण कार्यों को दर्शाती है वह प्रशंसनीय है शाहिद के जेल के अनुभवों को बार बार अंत तक कोर्ट में तक सरेआम जलील किया जाता है यह दिखाता है कि गंगा- जमानी तहजीब वाले इस देश में कैसे एक इंसान को सिर्फ शाहिद, फहीम या जहीर होने से अपनी जिन्दगी दांव पर लगाना पड़ती है. यह फिल्म हमारी सुस्त और सांप की तरह रेंगने वाली कछुआ न्याय व्यवस्था पर भी गहरे कटाक्ष करती है परन्तु इस सबके बावजूद भी हालात सुधर कहाँ रहे है. शाहिद को अपनी जान देना पडी परन्तु हुआ क्या? संकीर्ण समाज में जहां एक इंसान को धर्म, जाति और रूपयों की कसौटी पर परखा जाता है और लगातार उसे यह एहसास हर कदम पर दिलाया जाता है तो निश्चित ही यह किसी भी विकसित समाज की निशानी तो कतई नहीं है. 

दूसरा पहलू है मुस्लिम समाज की अपनी समस्याएं. बंद और तंग गलियों में शिक्षा के प्रकाश से दूर किन्ही अंधेरों में पलता जीवन स्वास्थ्य और मूल सुविधाओं से वंचित ज़िंदगी जीने को अभिशप्त ये समाज भी क्यों नहीं समझता कि इल्म वह ताकत है जो इन्हें अर्थ शास्त्र से जोड़ेगी, दुर्भाग्य से वोट बैंक की चपेट में और अपढ़ मुल्लों के वर्चस्व के बीच ये कौम धीरे धीरे पिछड़ती चली गयी, बावजूद इसके कि देश में जामिया से लेकर तमाम तरह के मदरसों के लिए सरकारों ने "रहम' करके शिक्षा देने की नौटंकी की. सच्चर समिति बनी और सरकार ने आखिर अल्प संखयक कहकर देश के बड़े समाज का भद्दा मजाक बना रखा है. बहुत खूबसूरती से फिल्म भारत, पाकिस्तान और बंगलादेशी मुसलमानों के मानवीय पहलूओं और अधिकारों की बात करती है. यद्यपि यह दीगर बात है कि सउदी अरब, कुवैत, दुबई, या और बड़े बाजारों में मुसलमानों का कब्जा है और वहाँ हमारे यहाँ जामिया, अलीगढ़ या मेरठ याकि लखनऊ से मुस्लिम विवि से पढ़े शिक्षक इल्म बाँट रहे है और कमा रहे है. फिल्म में शाहिद भी ऐसी ही किसी संस्था से जकात के रूपये लेकर मुकदमा लड़ता है और बार-बार उसका इस तरह की संस्था से मिलने के दृश्य है जो दर्शाता है कि इस तरह की संस्थाओं के पास पर्याप्त रूपया है पर ये संस्थाएं इन्ही जामबाज मुस्लिम युवाओं को सुरक्षा देने में समर्थ नहीं है सिर्फ राजनीती कर सकती है या चिन्ता कर सकती है. हो सकता है हंसल मेहता और समीर गौतम सिंह की मंशा भले यह दर्शाने में ना रही हो परन्तु वे इंगित जरुर करना चाहते थे इसलिए जहीर की जीत की खुशी के बाद शाहिद इन कौम के ठेकेदारों से मिलता है. खैर, शाहिद की व्यक्तिगत जिन्दगी में तनाव और जिस बेरुखी का चित्रण है वह थोड़ा अवास्तविक लगता है या परिवार द्वारा उसकी पत्नी को स्वीकारने और फिर अलग होने की बात है वह भी थोड़ा अव्यवहारिक लगता है. 

पुरी फिल्म में कोर्ट के सीन बहुत वास्तविक है जों परम्परागत मुम्बईया फ़िल्मी लटकों- झटकों या भव्य कोर्ट की जिरह ना होकर बेहद वास्तविक है परन्तु जिस स्टाईल में सरकारी वकील और शाहिद के बहस के दृश्य है वह थोड़ा चिंतित इसलिए करता है कि यदि इस तरह के मुकदमों में जज साहब अपने टेबल के पास बुलाकर बात करते है तो "डीलिंग" की सम्भावना बने रहने का खतरा बना रहता है जों हमने "मोहन जोशी हाजिर हो" या "एक रुका हुआ फैसला" में देखा समझा है. पुरी फिल्म में कैमरा मुम्बई की उन संकरी गलियों, चालों, बजबजाते हुए माहौल में घूमता है जो मुस्लिम जीवन की वास्तविकता को दिखाता है और जिसकी वजह से जीवन बहुत खतरे में हो जाता है और अक्सर सरकारों या क़ानून या हिन्दू फासीवादियों के निशाने पर रहता है. 

मेरे पास बैठे सज्जन ने एक प्रचलित कमेन्ट किया था कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता पर हर आतंकवादी मुसलमान क्यों होता है. इधर हाल में यह धारणा भी टूटी है शायद इस पर भी हंसल मेहता राजकुमार उर्फ़ शाहिद से कहलवातें तो यह भ्रम भी दूर हो जाता क्योकि जब वे 9/11 की बात कर रहे है तो उस समय तक हिन्दू आतंकवाद भी न्याय पालिका में अपनी पहचान बना चुका था, इसे अगर वे धीरे से हलके में ही सही, उठाते तो शायद देश की संवेदनशील पीढी को एक सार्थक और सकारात्मक सन्देश दे पातें और कम से कम यह धारणा, जो जबरन फैलाई गयी है कि हर आतंकवादी मुसलमान होता है, को तोड़ पाते. बहरहाल फिल्म बहुत ताकतवर है, बॉस जैसी फ़िल्में भी इसके मुकाबले में है पर मेरा पक्का मानना है कि भले ही इसे दर्शक कम मिल रहे है और यह ग्यारह करोड़ का बिजिनेस ना दें पायें पर आने वाले दस बरसों में जब हिन्दी फिल्म इतिहास लिखा जाएगा तो बॉस को जगह शायद ना मिलें पर शाहिद का नाम और वर्णन सुनहरें हर्फों में लिखा जाएगा, मेरा सुझाव है की इसे जरुर देखे एक मुकम्मल समझ और सोच बनाने में यह फिल्म कामयाब है.

Sunday, October 13, 2013

YOU MADE MY DAY AND THIS SHORT TRIP TO DEWAS, NITIN. BHAWR


कल नितिन भवर से मिला बहुत पुराना दोस्त, अनुज और एक सघन पारिवारिक सदस्य, नितिन भारतीय फौज मे बहुत वरिष्ठ अफसर है और आजकल सूडान मे" युएन शान्ति मिशन" मे एक बटालियन को हेड कर रहा है. कल नितिन ने मेरी जानकारी मे वृद्धि की और सूडान और वहाँ के हालातों का जिक्र किया, कैसे वो लोग और हमारे भारतीय जवान वहाँ के आतंरिक कलह मे अपना दायित्व निभा रहे है कैसे वहाँ के आदिवासी और कबीलाई लोगों के आपसी झगडें और दैनिक जीवन मे भारतीय फौज लोगों को राशन बांटने से लेकर उनके स्वास्थय, शिक्षा और इन्फ्रा स्ट्रक्चर बनाने मे मदद कर रही है.
निश्चित ही यह सब काम एक पराये मुल्क मे कर पाना बेहद रोमांचित एवं चुनौती भरा है क्योकि नितिन ने बताया कि वहाँ रेगिस्तान है, बहुत बड़ा है दलदल है, पानी नहीं है, बहुत अभावों मे फौज काम करती है अपने परिवार से दूर रहकर, छोटी मोटी सब्जियां तक नहीं उग पाती है, बाकि फसलों का होना तो ख्वाब ही है, कैसे वो मछली पकडने के लिए तीन तरह के समुदायों को समुद्र मे भेजते है एक ही नौका मे ताकि उनमे झगडों के बजाय सामंजस्य बढे और कटुता की जगह प्रेम उत्पन्न हो. बस मछली ही जीवन है और चौपाये काटकर खाए जाते है, युवकों की शादियाँ नहीं होती क्योकि वहाँ पुरुषों की संख्या बेहद कम है मात्र 45% इसलिए वो आसपास के गाँवों पर हमला करके गायें चोरी करके ले जाते है. क्योकि दहेज मे लडकी को कम से कम पच्चीस गायें देना पडती है. गाँवों के आपस मे दूरी कम से कम सौ किलो मीटर है और इन झगडों मे भारतीय फौज की बहुत शक्ति जाया होती है-झगडें निपटाना, समझाना और फ़िर सामंजस्य करवाना कबीलों मे, बाप रे......वो भी एक इन्टरप्रेटर के साथ क्योकि आदिवासी भाषा बेहद जटिल है वहाँ, अंग्रेजी वो जानते नहीं है.
इतनी सार्री बातें हुई फ़िर भारतीय फौज के वीके सिंह के बारे मे, राजनीती बनाम फौज और उनका निर्णय, हरियाणा, जाट लाबी, खालसा पंथ और भारतीयता, भारतीय फौज के बारे मे और अपने देश के बारे मे. एक बात है फौजी अफसर बहुत सुलझा हुआ होता है और गंभीर भी. मै याद कर रहा था छोटे से नितिन को, कैसे पढाकू था, कैसे उसने सीडीएस की तैयारी की और पिछले कई बरसों मे देश के दुरूह और कठिनतम इलाकों मे रहा, बड़े ऑपेरशन किये और हर जगह सफल रहा, और इतनी छोटी उम्र मे लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर जा पहुंचा, आज वो सूडान मे भारतीय फौज के झंडे को बहुत फक्र और शान से ऊँचा रख, साढ़े आठ सौ जवानों और अधिकारियों को नेतृत्व दे रहा है - एक 'कंपनी कमांडर' के रूप मे. नितिन का दिसंबर मे प्रमोशन ड्यू है, मेरी ओर से अनेक शुभकामनाएं और उम्मीद है कि वह इसी तरह से देश परिवार का नाम ऊँचा करता रहेगा.
क्या कहते अंग्रेजी मे YOU MADE MY DAY AND THIS SHORT TRIP TO DEWAS, NITIN. Blessings for you and your family.......
और इस सारे अफसाने मे सबका तार-बेतार और जोडने की महत्वपूर्ण कड़ी, मेरा लाडला भाई और हितैषी हैदराबाद मे बसा डा. अतुल मोघे, जिसके अंदर हर सेकण्ड देवास और मालवा धडकता है, ना होता तो यह दिन बर्बाद ही हो जाता, सच मे. धन्यवाद अतुल तुम्हें भी भाई.
 — with Atul Mogheand Nitin Bhawar.

गुरु की करनी गुरु जानेगा............कलापिनी को "गुरु" के पद पर होने की बधाई.

देवास मेरे लिए सिर्फ इसलिए एक शहर नहीं है कि मै यहाँ का हूँ बल्कि इसलिए कि इस शहर मे रहकर बाबा (पंडित कुमार गन्धर्व) ताई वसुंधरा कोमकली, नईम जी, प्रभाष जोशी, डा प्रकाशकान्त, जीवन सिंह ठाकुर, ओम वर्मा, ब्रजेश कानूनगो, डा सुनील चतुर्वेदी, मोहन वर्मा, दिनेश पटेल, अफजल, बी आर बोदडे, निर्मला बोदडे, प्रभु जोशी, प्रिया-प्रताप पवार, बहादुर पटेल, सत्यनारायण पटेल, देव निरंजन, मनीष वैद्य, भुवन कोमकली, देव कृष्ण व्यास, शशिकांत यादव, राजकुमार चन्दन, मनोज पवार, राजेश जोशी, हरीश पैठनकर, गजानन पुराणिक, प्रहलाद टिपानिया, कैलाश सोनी, अम्बुज सोनी, मनीष भटनागर, डा शारदा प्रसाद मिश्रा, और ना जाने कितने ऐसे लोग है जो कला की दुनिया के शिखर पुरुष रहे है और है, और आज भी सक्रिय है. यह शहर मुझमे दौडता है आज लखनऊ मे हूँ पर हर पल यही लगा रहता हूँ जो कुछ भी सोचता और करता हूँ इस शहर के संस्कार और मूल्य मुझे हर बार नया कुछ सीखाते रहते है. ई एम फास्टर और भोजराज पवार से मैंने अंग्रेजी का साहित्य सीखा और कुमार जी ने राहुल बारपुते, बाबा डिके और विष्णु चिंचालकर से मिलवाया. कल शाम को मैंने कहा भी कि अगर ये चार-पांच लोग मेरे जीवन मे ना होते तो मै शायद ना समझ विकसित कर पाता ना कुछ संस्कार आते कला की दुनिया जिसमे चित्रकला, संगीत और लेखन पठन-पाठन सब शामिल है.

कल शाम की बेहतरीन शुरुआत लखनऊ से लाई राम आसरे की ड्राय फ्रूट गिलोरी से हुई जो देने मै पिन्नी के घर गया था. पिन्नी यानी "विदुषी कलापिनी कोमकली", देश की कुमार जी लाडली बिटिया और अब भारतीय शास्त्रीय संगीत की स्थापित गायिका- अपने साथ एक पूरी लंबी चौड़ी विरासत और भरपूर शास्त्रीयता का पुट लिए हुए रागों के गुन्ताडो को लगातार सुलझाती और हर पल नया रचते हुए कुछ करने की तमन्ना, जोश और उत्साह से भरपूर. देवास के हर मोहल्ले मे लोगों से मिलते- जुलते हुए, उनके सुख-दुःख मे शामिल, देश के हर मंच पर देर-सबेर हाजिर और अपने गायन की अमिट छाप छोडते हुए यश कमाने वाली कलापिनी.

कल शाम मिलने गया था. कुमार जी का "भानुकुल" इस समय संगीत और माता रानी के भजनों से घिरा हुआ है, चूँकि टेकडी के रास्ते पर बसा यह आशियाना अब शहर मे ही आ गया है, तो जाहिर है यह सब भुगतना ही है. तो पिन्नी ने कहा कि चलो अंदर ही बैठते है क्योकि यहाँ तो बात ही नहीं कर पायेंगे, यही से बात शुरू हुई कि किस तरह से देवास की टेकडी को एक सुनियोजित तरीके से बदल दिया गया और "जय माता दी"...... "दी" शब्द जो बिलकुल ही मालवा और देवास की भाषा से मेल नहीं खाता, लाद दिया गया. सर पर चुन्नी बांधने का रिवाज ही नहीं था, ना ही कोई चुनरी यात्रा निकलती थी दस पन्द्रह साल पहले, पर बाज़ार और धार्मिक लोगों ने ना मात्र इस टेकडी का स्वरुप बदला बल्कि यहाँ कि संस्कृति ही बदल दी. एक डेढ़ घंटे की बातचीत मे कलापिनी से कईं मुद्दों पर बात हुई जिसमे म गां अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विवि, वर्धा की स्थापना और अशोक वाजपेयी का पत्र, उसका उद्देश्य, और आगे का स्वरुप कैसे होगा इस पर बातचीत का जिक्र किया, फ़िर आज क्या हालात है, प्रो अपूर्वानन्द के तत्कालीन विचार जब वे वहाँ फेकल्टी थे. अशोक वाजपेयी की एक चिट्ठी का जिक्र जिसमे उन्होंने नमो को जिस तरह से प्रचारित किया गया है और मीडिया मैनेजमेंट के तहत उन्हें महान बनाया गया की बातचीत, हंस के वार्षिक आयोजन, लखनऊ के महाराष्ट्र समाज की यादें प्र वहाँ के रवीन्द्रालय की कार्यक्रम की याद और उसी दौरान राम आसरे मिठाई भण्डार की खोज, आदि मुद्दों पर जमकर बातचीत हुई.

सबसे अच्छा लगा कि कलापिनी ने बताया कि हाल ही मे मप्र शासन के संस्कृति विभाग ने पांच पीठों की स्थापना की है उसमे से एक पंडित कुमार गन्धर्व सृजन पीठ भी है. मप्र शासन ने कलापिनी को इस पीठ पर "गुरु" के पद पर नियुक्त किया है जो कि एक बड़े सम्मान की बात है. अब कलापिनी से कोई भी शिक्षा लेने विधिवत शिष्य के रूप मे रह सकता है, वे जहाँ है वही से इस पद को सुशोभित करती रहेगी. यह बहुत बड़े सम्मान की बात है यूँ तो वे कईं बरसों से कईं लोगों को संगीत की शिक्षा दे रही है पर यह पद सृजित कर और इस पद पर कलापिनी का गुरु होना बड़ी बात है. यह दर्शाता है वे अब एक सिद्ध हस्त कलाकार और स्थापित हो गई है क्योकि "गुरु" का पद संगीत मे मिल जाना बहुत बड़े त्याग की निशानी है और पारंगतता को देखकर ही यह सम्मान दिया जाता है. बधाई.


मैंने सौ. उत्तरा(जो भुवन की सुयोग्य पत्नी है) को कहा कि चलो एक रजिस्टर निकालो और मेरा नाम सबसे पहले लिखो. इस पूरी बातचीत मे भुवन के विचार भी सुनें, उत्तरा ने बढ़िया कॉफी पिलाई. भुवन का पुत्र अलख पूरी बातचीत मे धमा चौकड़ी मचा रहा था उसने सारी कुर्सियों और सोफे पर ओडोमास लगा दिया था कि मच्छर ना काटे और फ़िर बार बार हरि ओम कहकर पुलिसिया स्टाईल मे सैल्यूट कर रहा था. मुझे लगा कि एक सुयोग्य शिष्य तो घर मे ही है जिसे आगे इस संगीत की महान परम्परा को सम्हालना है. उस घर मे जाने पर बहुत ऊर्जा मिलती है और हर अपने आपको आने पर एम्पावर महसूस करता हूँ.

इतनी खुशी है इस बात कि कलापिनी अब गुरु है बता नहीं सकता, यह हम सब के लिए गर्व की बात है. मैंने पूछा कि क्या फेस बुक पर डाल दूँ तो पिन्नी ने कहा कि दशहरे के दिन डालना और बहुत विनम्रता से मुझे दो फोटो खींचने की अनुमति दे दी, लगा कि "गुरु" का पद अब सार्थक होने जा रहा है, "भानुकुल" से बाहर आया तो कान फोडू संगीत और कर्कश स्वरों मे भजन जारी थे पर मेरे अंदर मन मे एक अनहद नाद चल रहा था और याद आ रहे थे कुमार जी के भजन जिसमे उन्होंने कबीर की वाणी को आधार बनाकर कईं भजनों की रचना की है, "बुरा तो जीने, ज्ञान की जड़िया......" और "गुरु की करनी गुरु जानेगा, चेले की करनी चेला, उड़ जाएगा हंस अकेला............जग दर्शन का मेला"