Monday, April 28, 2014

कांकेर यानी उत्तर बस्तर का दर्द




कांकेर यानी उत्तर बस्तर का दर्द
आप इस स्वतंत्र देश के आदिवासी को पचास से साथ किलोमीटर दूर वोट डालने जाने के लिए मजबूर कर देते है जिसे आपने नागरिक होने के नाम पर एक भी सुविधा नहीं दी बल्कि उससे शिक्षा छीन ली, स्वास्थ्य सुविधाएं छीन ली, उसके ब्लाक के सारे दफ्तर अघोषित रूप से उठा ले गए और उन सभी दफ्तरों को सौ किलोमीटर दूर स्थापित कर दिया जहां दफ्तरों के नाम भी बोर्ड पर नहीं लिखे है ऐसे में बताईये कि क्यों कोई अपने आप को इस देश का नागरिक माने??? दूसरा आप देखेंगे कि यहाँ जहां जहां युरेनियम या लौह अयस्क मिलाने की संभावना है वहाँ वहाँ फौज तैनात की जा रही है, गाँवों से आदिवासियों को भयानक तरीके से विस्थापित किया जा रहा है और धीरे धीरे अक्रके सारी सुविधाएं ख़त्म कर दी गयी ऐसे में आप किसके लिए क्या कर रहे है और क्या नौटंकी दुनिया को दिखा रहे है यह चिंतनीय है. रोज आप ग्रामीण स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों की निष्ठा पर सवाल उठाते है, और उन्हें काम नहीं करने देते. किसी भी गरीब को पकड़कर एसपी जेल में डाल देते है और फिर चार पांच  दिनों बाद पत्रकार वार्ता बुलाकर नक्सली बनाकर पेश कर देते है और दो-दो लाख का इनाम बताकर अपना राष्ट्रपति पुरस्कार सुरक्षित कर लेते है. इस खेल में जिला कलेक्टर की भूमिका भी होती है जो जोश में पता नहीं क्या क्या करते रहते है. यह सब क्या है. आज भी मै कई ऐसे गाँवों के नाम आपको बता सकता हूँ जहां से सारे युवाओं को सरकार ने अपनी दमनकारी नीती के तहत जेल में बंद  कर रखा है क्योकि उनका सिर्फ एक ही कसूर है कि वे विस्थापित नहीं होना चाहते.

हाँ यदि आप राशन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की बात करेंगे तो आपकी बात सरकार सुने शायद पर जहां आप विस्थापन, जल जंगल जमीन की बात करेंगे तो आप नक्सलवादी है यह सीधा सा गणित है. आज कांकेर में जहां आदिवासे बस्तियां है वहाँ फिर से संगठन की बात सुनाई दे रही है हालांकि यह भी सच है कि आदिवासियों को संगठित करना बहुत सरल है क्योकि उन्हें सिर्फ विश्वास में लेना है और बात करना है इसलिए यहाँ एक जमाने में एनजीओ भी सफल थे परन्तु आज हालात बदले है एनजीओ ने अपना मुंह बंद कर रखा है या वे सिर्फ सरकार के कार्यक्रमों की डूगडूगी पीट रहे है या चुप बैठे है जानबूझकर पर संगठन बनाना आज सरल है. इसी के चलते सलवाजूडूम भी खडा किया गया था जिसमे बहुत नुकसान हुआ और नतीजा सारे देश ने देखा. असली समस्या यह है कि पिछले बारह सालों में नौ लाख हेक्टेयर वह भूमि ख़त्म कर दी गयी जहां आदिवासी या किसान एक साल में तीन-तीन फसलें लेते थे अब वह भूमि या तो भू माफियाओं के कब्जे में है या उद्योगपतियों के पास है यह सिर्फ पहाडी नहीं बल्कि मैदानी इलाकों में भी हुआ है.
दुनियाभर से लोग आते है कम करते है पर हम जैसे पत्रकार जो यहाँ जमीन पर विकट परिस्थितियों में काम करते है, को प्रशासन इतना धमकाता है, पिटवाता है लोहे की छड़ों से और लेपटोप, कैमरे तोड़ देता है कि बस, घर से तक विस्थापित कर दिया जाता है और तो और हमारे अखबार के मालिक अंत में हमपर दबाव बनाते है कि समझौता कर लो हमारे ना करने पर वे कह देते है कि यह हमारा अधिकृत प्रतिनिधि नहीं है. कितना दुःख होता है पर हम फिर भी लगे है और काम कर रहे है. हम लोग आर्थिक तंगी में रहकर काम करते है, हमेशा डंडा बना रहता है, तलवार लटकी रहती है पता नहीं कसी दिन हमें बम के साथ गिरफ्तार होने की खबर बन जाए.

सोशल मीडिया की भूमिका से हम आशान्वित है और अगर वेब अखबार पत्रिकाएं या फेसबुक जैसे माध्यम नहीं होते तो हम आत्महत्या ही कर लेते, पिछले दस बरसों में माहौल बहुत निराशाजनक हुआ है. ब्लॉग, फेसबुक और वेब अख़बारों ने हमें फिर से अपनी बात रखने का मौका दिया है और दुनिया बहर से हमारे लिखे को सराहा जाता है और दुनियाभर के लोग जब आते है मिलने तो अच्छा लगता है. छत्तीसगढ़ स्वर नेट जैसे प्रयोग और बाकी संवेदनशील पत्रकारों से मदद मिल जाती है तो अच्छा लगता है. हमें नहीं लगता कि आने वाले समय में कांग्रेस या भाजपा या वामपंथी भी इस नक्सली समस्या का कोई सार्थक हल करना चाहते है क्योकि बाजार जिस तरह से हावी हो गया है, फौज को तैनात करके सारे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन एक सुनियोजित नीती के तहत किया जा रहा है, अबूझमाड़ के घने जंगलों में हवाई हमलों के बहाने उद्योगपतियों के लिए खदाने खोदने का जोखिम लिया जा रहा है आदिवासियों को उजाड़कर यह निश्चित ही हम सबके लिए एक खतरे का संकेत होना चाहिए. शहरी आबादी में एकाध ही शायद कोई सम्वेदनशील होता है पर आज आदिवासियों की चिता किसे है, वन विभाग जंगल घेर रहा है, उन्हें संवैधानिक अधिकार के तहत पट्टे भी नहीं दिए जा रहे है- ना व्यक्तिगत ना सामुदायिक. देश की मीडिया को सिर्फ शहरी मुद्दे दिखाते है या चुनाव पर इसमे सब गायब है हमारे लोग हमारे जंगल और हमारी संस्कृति. इसका कोई इलाज है किसी के पास???

यह दर्द है हमारे समय में जमीनी हकीकतों से रोज़ रूबरू होते पत्रकार साथियों का. फेसबुक पर बने दो पत्रकार साथियों कमल शुक्ला और तामेश्वर सिन्हा से मै आज कांकेर में मिला तो लम्बी बात हुई. कमल शुक्ला और तामेश्वर सिन्हा यहाँ के विशेषग्य पत्रकार है जिनके बड़े गहरे सरोकार है और आदिवासियों के लिए वे दिल से लड़ भी रहे है और ठोस काम भी कर रहे है. मुझे लगा कि क्या सच में हम, हमारा प्रशासन, हमारा तंत्र, हमारे राजनेता, और मीडिया अपने कर्तव्य निभा रहे है. सोशल मीडिया भी खामोश है इन सब मुद्दों पर. बस इतना कहना है कि सिर्फ हंगामा खडा करना मेरा मकसद नहीं...............

Wednesday, April 16, 2014

पच्चीस बरसों बाद चारोली







आज बीस पच्चीस बरसों बाद चारोली खाई एकदम जंगल से तोडी हुई ताजी। मेरे लिए छग की यात्रा सबसे बड़ा उपहार था यह । वन अधिकार क़ानून के बाद अब यह मजेदार चीज दुर्लभ हो गयी है और लघु वनोपज भी ख़त्म होते जा रही है। ग्राम कांदा डोंगरी जिला महासमुंद के आदिवासी भाईयों और बहनों ने मेरी छग की यात्रा को नायाब तोहफा देकर अविस्मरनीय बना दिया है। दुर्भाग्य से हमारे बच्चों ने ना चार देखें ना शहतूत बस रिलायस फ्रेश के फल खाकर ज़िंदा है। मैंने इस यात्रा में पुन्नीराम और हेमलता के साथ तेंदू फल भी बहुत खाए । काश ये सब चीजें शहरों में मिलती !!!

10/04/14

सम्भावनाओं के समीकरण कभी संतुलित नहीं हो सकते




इस बीच बहुत कुछ है जो दरका है हम सब के बीच

सन्दर्भ, प्रसंग और व्याख्याएं एक अन्तराल के बाद तब निर्जीव होने लगती है जब सिद्धतम हालात, प्रत्युत्पन्नमति, अवचेतन पर उद्दाम वेग से भावनाओं का नियंत्रण अपने चरम पर नहीं होता।

इसलिए हे मन क्षमा कर दो और भूल जाओ इन सबको और चल दो उस अनंत की ओर जहां सिर्फ और सिर्फ एकात्म्निष्ठ होकर हम अपने आप को अपने आपमें विलीन करके सर्वस्म में खो जाए।

ॐ शांति ,ॐ शांति , ॐ शांति !!!

संयोग, संयम, साथ, स्वप्न, सत्यनिष्ठा,समेकन और सत्यता के सात प्रयोग जीवन में लाने के लिए लगातार प्रयासरत रहना ही एक शाश्वत और अनवरत साधना है।

इस सबके बीच से रास्ता निकालते हुए जीवन में अपने बनाये मार्ग और मूल्यों के लिए यदि सब त्यागना भी पड़े तो हे मन संकोच ना करो और उस पथ पर चलो जहां सब कुछ निर्विकार भाव से स्वीकारना पड़े और तटस्थ होकर हम सबमे रहकर सबसे निर्लिप्त रह सके।

ॐ शान्ति, ॐ शान्ति, ॐ शान्ति !!!
कभी जिन्दगी के बाज़ार में अपने को बेचने निकलो तो पता चलेगा कि एक कोने में जगह मिलेगी मंडी के कोने में और जब तक कोई ग्राहक आयेगा, आप का माल बासी हो जाएगा और शाम के झुटपुट में सस्ते दर पर बेचते हुए लौट कर वापिस आना होगा थके कदमों के साथ। अगर यकीन नही तो अपने सपनों में बेच कर देखिये अपने आपको

निर्मम होकर सोचने के लिए क्रूर होना पडेगा और अहितकारी निर्णय लेने होंगे। ऐसे अलभ्य और सदवाक्य रचना होंगे जो क्षणिक तो अमंगलकारी होंगे पर कालान्तर में यही अक्षर क्षरित ना होकर मार्ग प्रशस्त करेंगे - चाहे वो कविता हो, कहानी हो या अभिव्यक्ति की कोई और विधा, बल्कि जहां जीवन हो या मृत्यु का सर्ग।

सम्भावनाओं के समीकरण कभी संतुलित नहीं हो सकते

नर्मदा नदी किसी तीर सी होकर मेरे अन्दर से गुजरती है 

होशंगाबाद में नदी के पुल पर से


ये बिजलियां क्यों चमक रही है और ये बारिश 
ये शायद किसी गहरे दर्द से वाबस्ता होकर गुजरी है अभी अभी


एक अधीर जीवन के सपने को जीने की बेताबी

अब तू नही था तो मै अपने आप में ही खो गया था और अब जब तू मिल गया है तो लगता है कि मै था ही नहीं और अब सब कुछ ख़त्म हो गया है।

जीभ जैसी जिन्दगी और यायावरी सा कृत्य !!!
हे इश्वर कही तो पूरा होने दें !!!


अकेलापन, अवसाद, हताशा और तनाव- जीवन के स्थायी भाव हो गए है बस हक़ के लिए लड़ते लड़ते खुद खत्म हो जाना होगा और फिर शायद .....

ट्रेन की डायरी और जीवन यात्रा के दुखद संस्मरण


धुप में निकलो तो लगता है कि जीवन के पानी को सूरज की तप्त किरणें सब कुछ लेकर निचोड़ देंगी और आख़िरी कतरा भी नहीं बचेगा जब यह देह अपने अंतिम पड़ाव पर होंगी। एक बूँद तो रख दो हे दैदीप्त्मान !!!

आपको मुबारक तार्किकता के अभेद किले , मै अपनी कुतर्क की छोटी सी पारदर्शी पन्नी से बनी झोपडी में खुश हूँ जो खुली है और इसमे हवा आने जानी पर्याप्त जगह है जो मुझे ज़िंदा रखती है।

जीवन के कई मोड़ ऐसे होते है जहां से सिर्फ दूर तक अँधेरे कोने, बंद दरवाजे, ऊँची दीवारें, धुंधलका और "डेडएंड" ही नजर आते है। 
और दुर्भाग्य से हमें अक्सर रास्ते यही से ढूंढने पड़ते है, इसी सबमे जीवन हर बार ख़त्म भी होता है और पलटी भी मारता है।



हम अपना "नेशनल केरेक्टर" बना पायेंगे कभी.... श्याम लाल ने पूछा !!!

Photo: ये है श्याम लाल अमरकंटक एक्सप्रेस में एसी कोच की देखरेख  करते है। कल इन्होने बताया कि लोग कम्बल नेपकिन और सफ़ेद चादरे चुरा ले जाते है फलस्वरूप इनके छह हजार वेतन से हर माह ठेकेदार  पंद्रह सौ काट लेता है। इन्होने कहा कि ये दुर्ग के पास एक गाँव में रहते है बहुत गरीब परिवार है चार हजार में गुजारा भत्ता कैसे होगा। यह सोचना ही मुश्किल है। 
एक सवाल बड़ी मासूमियत से श्यामलाल यादव ने पूछा कि आप लोग जो एक-दो हजार का टिकिट खरीदते है रेलवे के कम्बल और नेपकिन क्यों उठा ले जाते है । अगर यही आपका दांत मांजने का ब्रश भी आप बेसिन पर भूल जाते है तो चोरी का इल्जाम हम जैसे गरीबों पर लग जाता है। रात को हमें रूपये देकर सिगरेट दारु  माँगते है। कैसे बड़े लोग एसी में आते है और आपकी नियत कितनी खराब होती है। जितनी गन्दगी आप लोग करके जाते है उतनी तो  हम भी नहीं करते भले झोपड़ियों में रहते हो। 
श्यामलाल  ने कहा कि हमें आपके जैसे बड़े लोगों से नफ़रत है जो देश  चलाने का काम करते है। गरीबों की हाय लेकर और  रेलवे के नेपकिन चुराकर कौनसा मैदान जीत लोगे आप लोग....
श्यामलाल देर तक बड बड रहा था और मै सोच रहा था कि क्या अब इस चुनाव के बाद हम अपना "नेशनल केरेक्टर" बना पायेंगे कभी या हर गरीब गुर्गा कलपता रहेगा और कोसता रहेगा।



ये है श्याम लाल अमरकंटक एक्सप्रेस में एसी कोच की देखरेख करते है। कल इन्होने बताया कि लोग कम्बल नेपकिन और सफ़ेद चादरे चुरा ले जाते है फलस्वरूप इनके छह हजार वेतन से हर माह ठेकेदार पंद्रह सौ काट लेता है। इन्होने कहा कि ये दुर्ग के पास एक गाँव में रहते है बहुत गरीब परिवार है चार हजार में गुजारा भत्ता कैसे होगा। यह सोचना ही मुश्किल है। 

एक सवाल बड़ी मासूमियत से श्यामलाल यादव ने पूछा कि आप लोग जो एक-दो हजार का टिकिट खरीदते है रेलवे के कम्बल और नेपकिन क्यों उठा ले जाते है । अगर यही आपका दांत मांजने का ब्रश भी आप बेसिन पर भूल जाते है तो चोरी का इल्जाम हम जैसे गरीबों पर लग जाता है। रात को हमें रूपये देकर सिगरेट दारु माँगते है। कैसे बड़े लोग एसी में आते है और आपकी नियत कितनी खराब होती है। जितनी गन्दगी आप लोग करके जाते है उतनी तो हम भी नहीं करते भले झोपड़ियों में रहते हो। 


श्यामलाल ने कहा कि हमें आपके जैसे बड़े लोगों से नफ़रत है जो देश चलाने का काम करते है। गरीबों की हाय लेकर और रेलवे के नेपकिन चुराकर कौनसा मैदान जीत लोगे आप लोग....


श्यामलाल देर तक बड बड रहा था और मै सोच रहा था कि क्या अब इस चुनाव के बाद हम अपना "नेशनल केरेक्टर" बना पायेंगे कभी या हर गरीब गुर्गा कलपता रहेगा और कोसता रहेगा।


Yesterday I shared a story of Shyam Lal an AC Coach Attendant, Am really overwhelmed, in the way story is shared by more than 745 friends and non friends of FB. I am really thankful to all of you and really feeling obliged. Some web news editions have published it too and bloggers also picked up, am thankful to them too. 

Although, some of my Friends are requesting me to delete that story or his Photo as they are afraid that his job may be terminated in lieu, for such thoughts and all. But I dont feel, the story is in favor of Indian Railway and the boy should not be punished. He has put forward a harsh reality and this is the high time that we need to really think of poor, marginalized and working class. So called upper class and Rich people have been targeted who are creating a garbage in the Society and due to their misconduct we all have to pay and sacrifice.

We need to be ready in case if any action is taken against him, I hope you all will support him.

Thanks again for your likes, comments and share folks. Keep watching your surroundings and bring out cases here at this powerful Media.

जुगुप्सा के स्थायी भाव और चुनावी विज्ञापन



जैसा देखते है वैसा करते है यह मानव स्वभाव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है और इसका फ़ायदा ही अनेक विज्ञापन कम्पनियां उठाती है और अपना माल बेचती है. विज्ञापन जाने अनजाने में हमारे मन मस्तिष्क पर कही गहरे में धंस जाते है और हम विज्ञापन के झांसे में या यूँ कहूं कि दबाव में आकर अपना व्यवहार तक बदल देते है. अगर इसी बात को ताजा हो रहे चुनाव के सन्दर्भ में देखे तो हम पायेंगे कि आजादी के सात दशक बाद सबसे महँगा ‘विज्ञापनी चुनाव’ अब होने जा रहा है और इस समय हर तरफ चुनाव के विज्ञापनों की गूँज है. एक अनुमान के अनुसार पांच हजार करोड़ का खर्च मात्र भाजपा ने उठाया है और कांग्रेस भी इससे पीछे नहीं है. पेम्फलेट, ब्रोशर, पर्चे, बैनर, बिल्ले, से लेकर अखबारी विज्ञापन और इलेक्ट्रानिक मीडिया में इस समय विज्ञापनों की बाढ़ है. अगर थोडा गौर से देखे तो हम पायेंगे कि इस बार इस दौड़ में भाजपा बहुत पहले से विज्ञापन कर रही थी मोदी को पोज करके चाहे वो गोवा का अधिवेशन हो जिसमे आडवानीजी को हटाकर मोदीजी को प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाना और फिर हर जगह से मोदी-मोदी की गूँज को देश के हर कोने में पहुंचाना. चुनाव की आहट होने से पहले मोदीजी ने चुनाव अभियान शुरू कर दिया था, आतंरिक कलह के बहाने भाजपा मोदी की छबि को बनाने का तो काम कर ही रही थी, साथ ही साथ कांग्रेस पर आक्रामक तरीके सुनियोजित वार भी किये जाने लगे थे. इस सबमे जातिवादी समीकरण, मुस्लिमों को कोसने के साथ मोदी की उदार छबि को भी निरुपित किया जाने लगा था, गुजरात मॉडल का नुस्खा देश बदलने के लिए कारगर होगा यह बात भी दूर दराज तक पहुंचाई जा रही थी. ठीक इसके विपरीत कांग्रेस ने जानते बूझते हुए भी कोई स्पष्ट नीती नहीं अपनाई, बस अपने आठ फ्लेगशिप कार्यक्रमों का जिक्र करके मीडिया में पृष्ठ भर के विज्ञापन दिए जिसमे रोजगार योजना से लेकर समग्र स्वच्छता अभियान, महिला बाल विकास, स्वास्थ्य, पानी, बिजली, किसानों के लिए खेती के लिए किये प्रयासों का दस साला विवरण था पर यह बहुत “आय केचिंग” विज्ञापन नहीं थे. कांग्रेस जान रही थी कि कुछ कहने को है नहीं और दस साला कामों को इस समय भुनाना बहुत मुश्किल है, महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है. पर एक बात निश्चित ही तारीफ़ की थी कि किसी कांग्रेसी नेता ने आक्रामक और विध्वन्सक भाषा का प्रयोग नहीं किया. इस बीच ‘आप’ के अपने कामों और हडबडाहट की वजह से जो मीडिया कवरेज मिला वह ठीक ठाक ही था हालांकि अरविंद केजरीवाल ने भी अशालीन होकर कभी भाषण नहीं दिए. परन्तु चुनाव घोषित होने के बाद और जैसे-जैसे तारीख नजदीक आती गयी, भाषणों का स्वर तीखा होता गया - खासकरके जिस तरह से सीधे पार्टियों और व्यक्तिगत मसलों, परिवारों पर भाजपा का आक्रामक स्वरुप उभरा, वह आखिर कांग्रेस या क्षेत्रीय पार्टियों को कब तक बांधे रखता, सभी ने फिर एक स्वर में हमले तेज किये, इससे पूरा वातावरण खराब हुआ. कांग्रेस ने शायद तय रणनीती के अनुसार अपने बाण छुपाकर रखे थे पर अब राहुल गांधी या सोनिया गांधी भी तेज़ स्वरों में मोदी और भाजपा या क्षेत्रीय पार्टियों पर तीखे हमले कर रहे है. अब जिस तरह का माहौल उभरा है वह इतना खराब और कलुषित हो गया है कि लोकसभा में जब सांसद जीतकर जायेंगे और पास-पास बैठेंगे तो उनमे मेल-मिलाप में कितना समय लगेगा, यह कहना मुश्किल है क्योकि जिस तरह की भाषा का प्रयोग, इतिहास  का मखौल उड़ाया गया है और पारिवारिक उदाहरणों को देकर व्यक्तिगत छिछालेदारी की गयी है उससे एक स्वस्थ लोकतंत्र में मूल्य और सिद्धांतों की हार हुई है और जो दूरी बढी है उसे पाट पाने में शायद पांच साल लग जाए. जबकि आने वाले पांच सालों में देश को एक नई करवट लेनी है अपना भविष्य तय करना है, समस्याएं मुंह बाए खडी है, घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दें है जिनपर सबका सहयोग जरुरी होगा. सवाल यह है कि विज्ञापन का चुनाव के सन्दर्भ में क्या मतलब है और इस पुरे शो के पंडित बता पायेंगे कि किसको कितना संयम रखना चाहिए और जो प्रचार-प्रसार और विज्ञापन के लिए भाषा और माध्यम इस्तेमाल किये जाते है उनकी भाषा और प्रतीक क्या हो, इसके साथ ही भाषणों और मुख मुद्रा का भी संयमित प्रयोग किया जाना चाहिए. चुनाव के माहौल में विज्ञापन कंपनियों ने आने वाले दस सालों की संपदा तो इकठ्ठा कर ली परन्तु आज के संदर्भ में जो कुछ हुआ या हो रहा है वह बेहद निंदनीय है और इस तरह से मन के कोने में ये सब धंस तो गया है, परन्तु एक मधुर स्मृति की तरह नहीं बल्कि जुगुप्सा के स्थायी भाव के साथ.