Saturday, May 30, 2015

Posts of 30 May 15


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अभी गयी है सुबह के काम निपटाकर आपा, नाम क्या है यह शायद ही किसी को  पता होगा, पर कॉलोनी की सभी बाईयों में मुस्लिम महिला वही है आपा जो कम से कम तीस घरों के बर्तन, झाडू - पोछा और खाना बनाने का काम करती है. अकेली आती है, सुबह छः बजे से और फिर लौटती है इसी समय, हाँ, दोपहर में - मेरे घर के सामने आंगनवाडी में दलिया खा लेती है कभी मेरे घर से कुछ मिल जाता है या कभी सामने जया दे देती है या "मिश्रा काका के यहाँ खाकर आई हूँ" यह कहकर मुस्कुरा देती है. शाम को फिर पांच बजे से रात को नौ बजे तक कॉलोनी में ही रहती है और लौटती है, साल में सिर्फ ईद पर छुट्टियां मनाती है आठ दिन की और फिर भिड जाती है. इसके पहले छोटी थी काम वाली - जिसे उसकी बड़ी बहन उषा लेकर आई थी, बाद में उषा इंदौर चली गयी तो छोटी ने सब घर पकड़ लिए, पर टी बी हो गयी, पति मर गया, लड़का कुछ करता नहीं था सिवाय गांजा पीने के,  तो उसकी बेटी भावना घर - घर आने लगी काम करने, आठ बरस की थी पर अभी जब वह काम छोड़कर घर गयी तो उसकी उम्र पंद्रह साल हो गयी थी, अच्छा खासा यानी करीब आठ हजार कमा लेती थी पर छोटी को टीबी थी और इलाज हो नहीं पा रहा था सो भावना ने निर्णय लिया कि अब वह माँ को लेकर इंदौर चली जायेगी. 
छोटी और उषा के पहले सुशीला थी जो मच्छी पकड़ते पकड़ते घरों में बर्तन मांजने लगी थी, उसे इसमे ज्यादा सुकून था और सुरक्षा भी और फिर निश्चित आय भी थी. उसकी बीडी का खर्चा आराम से निकल आता था पति से रोज़ लड़ती थी और खूब बीडी पीती थी, हम सब कौतुक से देखते थे सुशीला को, क्योकि मेरी दादी का नाम भी सुशीला था. इसके पहले तारा बाई थे जो कई बरसों तक मेरे घरों में बर्तन का काम करती रही - ठाकुर जाति की कद्दावर महिला थी और अदभुत वाक् शक्ति और दबंगता, कहती थी काम इसलिए करती हूँ कि बहूएँ कुछ बोल न पायें, पति सरकारी छात्रावास में चपरासी थे - जो मर गए, तो तारा बाई ने यह काम पकड़ लिया. पर मौत बहुत बुरी हुई तारा बाई की ! बद्री केदार गयी थी सन 87 की गर्मियां रही होंगी, जब बहुत समय बीत गया तो घर वालों ने थाने से पूछताछ करवाई क्योकि तब मोबाईल नहीं थे और गरीब घरों में फोन कहाँ, मोहल्ले में एकाध हुआ करता था. तब पता चला कि बस में गए यात्रियों में चार - पांच ठण्ड के कारण वही निपट गए, लाश कौन ढोकर लाता - लिहाजा आस पास के लोगों ने अंतिम संस्कार वही कर दिया . आने पर लोगों ने कहा कि तारा बाई को अपने काम करने वालों घरों से, वहाँ के बच्चों और बर्तनों से बहुत लगाव था. रावल काकी ने बताया कि बस में उनके पास बैठी अंतिम क्षणों में भी वे कह रही थी कि कढ़ाई को अगर नीम्बू से ना धोया गया तो चौहान साहब के यहाँ की कढाई फूट जायेगी.........या मुंगी साहब की एल्युमिनियम के देगची में ईंट का चुरा नहीं लगे तो अभी चार पांच साल और चल सकती है.


असंगठित क्षेत्रों में काम करने  वाली इन औरतों का कभी कोई सोचेगा और इनका जीवन क्या यूँही बीत जाएगा किसी महिला आन्दोलन में दर्ज होने और सशक्तिकरण के नारों के बीच गुम होता सा ? 

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पिघलती सड़क पर गुलमोहर की छाँव से गुजरते हुए पानी की मृग तृष्णा में गुजर रहा है जीवन. धूप से मैंने कहा कि क्यों इतनी तेज हो रही हो, और थोड़े दिन इठला लोगी, फिर तो बरसात की फुहारें तुम्हारा दर्प पिघलाकर रख देंगी और तुम किसी नाले में पडी नजर आओगी, एक तेज बौछार में बह जाओगी और किसी कीचड सने गड्डे में लोट मारती नजर आओगी , अगर थोड़ी भी शर्म है तो निकल लो चुपके चुपके और बिछ जाओ राहों में ऐसे जैसे बिछ जाती है मोगरे की सुवास शाम के धुंधलके में किसी पथिक के नथुनों में, बरसो तो ऐसे जैसे रात रानी के फूल बरसा देते है अपनी काया का सम्पूर्ण सत्व किसी रात को सुगन्धित करने में, चमको तो ऐसे जैसे किसी रात के अंतिम पहर में शुक्र तारा चमकता हो और मांगने पर सब कुछ न्यौछावर कर देता हो किसी के लिए, उडो तो ऐसे जैसे नीलकंठ  उड़ आता है और झटके से मुराद पुरी होने का आशीर्वाद दे जाता हो, खिलो तो इस गुलमोहर के फूलों की तरह से, अमलतास या टेंसू के फूलों की तरह जो सबसे जुदा होकर भी अनूठे है और दूर से ही अपने पीलेपन या लालिमा से सबको हर्षित कर लेते है, 

बावली धूप तुम हो किस नशे में और दुनिया में .?  

Friday, May 29, 2015

Posts of 29 May 15


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शायद मप्र के 51 में 14 जिला मुख्यालय किसी भी तरह की रेल सेवा से जुड़े नही है। तहसील और बाकी सब तो छोड़ दीजिये। कांग्रेस ने तो कुछ नही किया पर व्यापम के रुपयों से इन दलित जिलो को तो रेल से जोड़ देते मामा जी। कितना काम बाकी है अभी दो तीन शहरों में मेट्रो लाकर कमाई के रास्ते खोजने के बजाय आधार भुत ढांचों पर अब तो ध्यान दो।
मने कि यूँही सोच रहा था कि देवास में बुलेट ट्रेन की पटरी मैं उखाडूंगा तो यह ख्याल आया। हाँ शराब की दुकानें जरूर बढ़ी है गत तीन शासन कालों में मामा जी के और हर गाँव में लाडलों को शराब के ठेके जरूर दिलवाये है और घोटालों तक पहुँच की है ।
एम पी अजब है - सबसे गजब है।


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वसुंधरा राजे जैसी मुख्यमंत्री की सोच भी कितनी निम्न है और इसमे वह अकेली शामिल नहीं होगी , संघ से लेकर भाजपा और शिखर नेतृत्व के बिना इतना बड़ा फैसला लेना क्या उस शराबी महिला मुख्यमंत्री के लिए संभव था? आखिर ऐसी भी क्या मजबूरी है कि गुर्जरों से भाजपा को इतना प्रेम एकाएक उभर आया और 5 % का निर्णय लेना पडा ? अब बात पक्की है कि इनका मकसद संविधान का पूरा कबाड़ा करके रद्दी में बेचकर गोलवलकर कृत संघी नियम देश में लादना चाहते है और देश को कहाँ ले जायेंगे यह तो इनका राम ही जाने जो इस भरी गर्मी में अभी भी टेंट के नीचे अपने शरण स्थली की आस में गत सत्तर साल भाजपा और कांग्रेस द्वारा थोपा हुआ दूसरा वनवास भोग रहे है. कितने बेशर्म और अनाडी लोग है ये और ऊपर से वसुंधरा .उफ़...........!!! दरअसल में वसुंधरा और बैंसला का गठजोड़ साफ़ दिखता है जो आने वाले समय में मुश्किल पैदा करेगा। दूसरा मैं अब दलित उत्थान आदि में विश्वास इसलिए नही रखता कि वास्तविक आदिवासी तो दुनिया से खत्म हो रहे है और असली दलित आज भी मैला ढो रहे है और मलाईदार या तो मायावती नुमा हो गए या विदेशों में अयोग्य होकर भी भिक्षावृत्ति से डिग्रीयां बटोर रहे है। इसलिए अब इन आरक्षित दलितों से नफरत है मुझे । भयानक जमीन और रूतबा होने के बाद भी नोकरी चाहिए ऊपर से काम आता भी नही, करेंगे भी नही और हरिजन एक्ट की धमकी अलग देंगे कमजर्फ कही के। गुर्जर हो या अजा या अजजा अब ये सिर्फ पढ़े लिखे दलितों का सारा खेल है। आरक्षण मांगने वालो को गोली मार दो जब नक्सली अपने हक के लिए गोली खा रहे है तो सरकारी संपत्ति को नुक्सान पहुचाने वालो को मत बख्शो जो मेरे कमाई के आयकर से बनाई जाती है। इन नामुरादों के लिए अब कोई सहानुभूति नही है। आरक्षण से जगह पाये और सुविधाएं भकोसते लोगों का भी अब सोशल बाय काट होना चाहिए क्योंकि ये वो ही भस्मासुर है जो भला करने वाले को दंश मार रहे है। बहुत हो गया नाटक और वोट बैंक का खेल। भारतीय प्रशासनिक सेवा में ऐसे दो तीन लोगो को मैं जानता हूँ जो अपनी चमार जाति छुपाकर ब्राह्मणों का सर नेम लगा रहे है , नायब तहसीलदार से होते हुए आरक्षण की बैसाखी से आज मप्र में कलेक्टर बने बैठे है और एक वाक्य अंग्रेजी का नही आता , चांटे और घूंसे खाकर जी रहे है और रुपया बटोर रहे है, बस बोलो मत चमार है हरिजन एक्ट लगा देंगे। चापलूस ,मक्कार और अव्वल दर्जे के धूर्त है ये सब आरक्षित लोग ।

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आजकल काम है नही कुछ ख़ास सोच रहा हूँ कुछ गेती, तगारी, सब्बल, फावड़ा, और चाकू - छुरी लेकर देवास के स्टेशन पर पहुँच जाऊं और रेलवे की पटरियां उखाड़ना शुरू कर दूं कि जिन्दगी में कोई तो मांग पुरी करें सरकार . क्योकि क़ानून मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता और राजनीती तो पटरी उखाड़ने से ही चलती है, रहा सवाल लोग कौन होंगे तो वे सभी मेरे क्षेत्र के ब्राह्मण, बनिए, सिंधी, पंजाबी, कायस्थ, ठाकुर और अन्य भी. साला आरक्षण तो मिलेगा पांच प्रतिशत ही सही हर जाति और समुदाय को, तंग आ गया हूँ गत साठ बरसों से साला SC/ST/OBC जैसे शब्द पढ़कर हर जगह. नफ़रत हो गयी है इन शब्दों से अब और फिर मामाजी भी वसुन्धरा जी की पार्टी वाले ही है - वे भला क्यों ना देंगे आरक्षण राज्य की नौकरियों में ? उन्हें अगला चुनाव जीतना है या नहीं ? देवास से हर जगह जाने वाली गाड़ियां गुजरती है ........

तो बोलो गुर्जरों की जय - जिन्होंने देश की तमाम जातियों और समुदायों को रास्ता दिखाया और कर्नल बैसला को अगले साल मोदी जी पदम् भूषण से नवाजेंगे यह पक्का है, जब रजत शरमाओ जैसे को मिल जाता है तो कर्नल बैसला तो महान आदमी है इतिहास पुरुष है, जियो जी भरके .......

Wednesday, May 27, 2015

Posts of 27 May 15



Preeti Nigam​ बहुत पुरानी साथी , दोस्त और परिवार की सदस्य ही है. प्रीती से बहुत पुरानी मित्रता है मेरी. प्रीती की बड़ी बहन प्रभा निगम मेरे साथ देवी अहिल्या बाई विवि में शोधरत थी जब शिक्षा संस्थान के विभागाध्यक्ष डा बी के पासी हुआ करते थे, प्रभा और साधना खोचे मेरे साथ ही थी और वे नए शुरू हुए इंदौर पब्लिक स्कूल में पढ़ाती थी. प्रीती ने सोशल वर्क में मास्टर किया और समाज सेवा के क्षेत्र में आई , तब से कही ना कही काम के दौरान मिलना जुलना होता रहा, भारतीय ग्रामीण महिला संघ, राऊ में हम तीन साल तक साथ काम किये मै भोपाल चला गया और प्रीती NRHM उज्जैन में पर मिलने का सिलसिला जारी रहा. आज जब मै मप्र में काम करने वाली सोशल वर्कर महिलाओं को पलटकर देखता हूँ तो पांच या छः महिलाए नजर आती है जिन्होंने बाकायदा नौकरी ही की है अपने एनजीओ नहीं खोले - जबकि चाहती तो ये खोल सकती थी - इनमे से प्रीती एक है, बाकी प्रज्ञा, सविता, आरती आदि और मित्र है. फिर प्रीती लेप्रा में आ गयी इंदौर और फिर भोपाल. फिर किसी पारिवारिक कारण की वजह से वह इंदौर में आकर सुरक्षित शहर पहल के काम को नेतृत्व दे रही थी. हाल ही में प्रीती ने इस्तीफा दिया है और अपनी गृहस्थी बसा रही है. लन्दन के श्री अनिल निगम के साथ उनका विवाह 6 जून को संपन्न होने जा रहा है यह हम सबके लिए बड़ी खुशी की बात है.


आज दफ्तर में हमने एक छोटा सा अनौपचारिक कार्यक्रम शाम साढे पांच बजे रखा था जिसमे सबने प्रीती के धैर्य और सिखाने के हूनर की तारीफ़ की और बताया कि कैसे पुरी टीम को विपरीत परिस्थिति में बांधकर रखा और लगातार छः माह तक वेतन ना मिलने के बाद भी सोलह लोगों की बड़ी टीम को प्रीती ने काम में लगाकर रखा और उनके हर सुख दुःख का एक टीम लीडर होने के नाते ध्यान रखा. बड़े भावुक माहौल में आज प्रीती ने जो चंद शब्द कहे उसे रिकॉर्ड करके रखा जाना था जिसमे उन्होंने बताया कि कैसे कोई प्रोजेक्ट कमी और अच्छाई के बीच झूलता है और बंधनों के बीच स्वतन्त्रता को मेंटेन करके चलना पड़ता है. संस्था, सरकारी कामकाज और टीम का मोटीवेशन लगातार बनाए रखना बहुत महत्वपूर्ण होता है. प्रीती ने वसीम, हिमांशु, अंशुल, लोकेन्द्र, मनीषा तेलंग और मेरा जिक्र करते हुए कहा कि इन सबके सहयोग बिना यह महत्वपूर्ण कार्य असंभव था. जब प्रोजेक्ट ख़त्म हो जाएगा तो हम याद करेंगे कि कैसे एक बड़े मुश्किल समय में हम सबने चुनौतियों को स्वीकारते हुए कितना काम किया और कितना सीखा. प्रीती ने बड़े आत्मविश्वास से कहा कि नए साथियों के लिए यह एक बड़ा मौका था जब उन्होंने अपनी पहली नौकरी में वसीम, हिमांशु और संदीप सर या मेरे साथ काम किया और दिल - दिमाग और हिम्मत से विकेन्द्रित तरीके से नया करने की हिम्मत जुटाई. आज का यह वक्तव्य एक समाज सेवी महिला के लगभग पंद्रह सालों का सारांश था जो प्रीती ने बहुत सहज तरीके से व्यक्त किया, मेरे लिए यह सब सुनना कौतुक भरा और सीखने लायक था कि कैसे एक सहजता से अपनी बात कोई रख सकता है यह बहुत दुष्कर कार्य है.


अंत में प्रीती ने बड़ी अच्छी बात कही कि जीवन की लम्बी दुःख भरी यात्रा में जब हम सब ओर जगहों और प्रयासों से हार चुके होते है और बहुत कठिन डगर पर चलना आरम्भ करते है तो परमात्म हमारे साथ बहुत चुपके से यादों की एक पोटली रख देता है और नितांत दुखों और पराजय के मुश्किल क्षणों में यह स्मृतियों की पोटली अपने आप खुल जाती है और ये ही यादें जीवन में आगे बढाती है, ताकत देती है और लड़ने का माद्दा पैदा करती है, बस हमें अपनी पोटली बचाए रखना है.

बहुत याद आओगी प्रीती हम सबको, एक नई दुनिया में जा रही हो हमारी शुभकामनाएं और बहुत स्नेह तुम्हारे साथ सदैव है, बस आज की तरह अपना हौंसला और अपनी बात कहने का साहस - तमाम धैर्य और सहिष्णुता के साथ बनाए रखना, यही हम सबकी भी ताकत है और हिम्मत . अशेष शुभकामनाएं.

इस कार्यक्रम का समापन हिमांशु के गाये एक गीत से हुआ "आने वाला पल जाने वाला है.......एक बार वक्त से लम्हा गिरा कही , वहाँ दास्ताँ मिली लम्हा कही नहीं ........" 


Waseem Iqbal​  Manisha Sharma Telang​  Kírtí Díxít​   Vinod Nahar​    Lokendra Jadhav​  Arti Pandey​  Anshul Chaturvedi​   Himanshu Choudhary​




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बिकना जरुरी है 

खरीददार तलाश कर लो 

बाजार, प्यार, बहाव में 
बिकना जरुरी है मित्रों 
दोस्ती, यारी और आशिकी 
व्यवसायिकता के बीच 
मै, आप और हम सब 
महज एक माल है 
तय है कीमते हम सबकी 
समय आने पर बिकेगा 
सब बिकेगा और जो नही 
बिकेगा वो फेंक दिया जाएगा 
जो धरती के व्योम तक 
ऐसा फेंका जाएगा कि फिर
क्रन्दन सुनाई नही देगा 
भीड़, बाजार तंत्र के बीच 
याद रखे और तैयार करें अपने को
कि इस बाजार में बिकना 
महज एक स्वाभाविक 
प्रक्रिया है और सहज भी 
आईये बिके हम भी 
आईये खरीदो मुझे 
इंतजार है जनाबे आली

Tuesday, May 26, 2015

Posts of 26 May 15


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हमारे प्रिय लेखक और अग्रज , हिंदी के वरिष्ठ कहानीकार और उपन्यासकार डा प्रकाश कान्त जी का आज जन्मदिन है। वे सहसा आयोजन और उत्सवों से दूर रहते है पर हम तीन लोग कहाँ मानने वाले थे। अभी पहुंच गए और एक आत्मीय माहौल में एकदम सादे तरीके से मनाकर आ गए। वे खूब लम्बी और रचनात्मक जिंदगी जिए यही हम सबकी शुभेच्छा है।
 — with Bahadur Patel.















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प्यार सिर्फ प्यार होता है और झगडा बढ़ने से प्यार बढ़ता ही है चाहे फिर हमारी, तुम्हारी, इसकी, उसकी या सबकी जिन्दगी में कोई और आ जाए........पहला प्यार भूला पाना नामुमकिन है बस सवाल यह है कि हम भूलने को मानसिक रूप से तैयार हो जाए. जीवन चलता रहता है और कभी रुक नही सकता और फिर अभिनय के इस दौर में जो सर्वश्रेष्ठ भी हम अपने आप के सामने परोस लेते है जिन्दगी का वह भी कभी - कभी हम पर ठीक बूम रेंग की तरह से पलटवार करते हुए  लौट आता है. चाहे वह तनु हो, मनु हो या दत्तो   या मै तुम या हम - सब....... जिन्दगी... काश कि कभी रिटर्न हो सकती !!! मै शर्त लगाकर कडा श्रम करने को आज भी तैयार हूँ अगर यह जिन्दगी एक रफ कॉपी हो जाए और रिटर्न में एक सीधी सादी जिन्दगी मिल जाए.कुछ नहीं चाहिए बस चंद साँसें और एक् धडकता  हुआ दिल जो कहें " हर पल यहाँ जी भर जियो.........." 
कंगना हम सबके बीच महिला सशक्तिकरण और नए बाजार के दौर की नई आईकॉन है जो इस दुनिया में गाँव और बाजार के बीच संप्रभुता, फैशन, संस्कृति, मूल्य, सभ्यता की जो नए चमक और वैश्वीकरण का जो जाल है, की ओर उन्मुख करती है, कंगना जानती है कि बाजार और प्यार के बीच से रास्ता यश और रूपये की ओर जाता है इसके लिए अभिनय कर लेना कोई बड़ी बात नहीं है इसलिए उसे इस समय की बड़ी अभिनेत्री कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा पर हाँ वह  बेचना जानती है दिल - दिमाग या प्यार चाहे वह फेशन से हो, तनु मनु से हो या किसी भी तरह से, क्योकि हमारा समाज अब नया चाहता है चाहे प्रेम में या सेक्स में, बाजार में या भावनाओं में, और फिर समाज के बदलते दौर में महिलाओं के अधिकार, अस्मिता और प्रासंगिकता को भी दर्शाती है इस मायने में कि औरत सिर्फ भोग्या है शराब पीकर, या अंत तक फेरे देखने की चाह में वह अंत में सिर्फ एक लिजलिजी सी औरत ही साबित होती है जो पति परमेश्वर के आख्यान को ही महत्व देकर जड़ हो चुकी और सड़ी हुई मानसिकता को पुष्ट करती है. यह फिल्म नहीं हमारे समाज की बीमार होती जा रही मानसिकता, और गिरते जा रहे जीवन मूल्यों के बीच जीवन को एक बार फिर से पाने की कोशिश है जो सिर्फ यही बताती है कि हम सब कितने अजीब रिश्तों में जी रहे है. बदचलनी बेवफाई  में बदल जाये और ठरकी लोलिता को आदर्श मान लें या प्यार प्रदुषण का प्रतीक बन जाए तो जीवन कहाँ रह जाता है.......?

Monday, May 25, 2015

Posts of 24 May 15

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दुनिया के सारे गुलमोहर एक हो जाओ
तुम्हारी हरियाली और लालिमा के बीच अपने जर्द पीलेपन को छुपा लूँ !!!!


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बौखलाहट बड़ी जालिम चीज है 
अरविन्द में हो, राहुल में हो या मोदी में या जय ललिता में आखिर अपना ही नुकसान करती है। नतीजा देश को भुगतना पड़ रहा है !!!!


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दुनिया कविता , कहानी और उपन्यास से बदल जाती तो आज हमारी शक्ल ही कुछ और होती, बाकी आप लगे रहिये और पेलते रहिये यहां वहां से उठाकर चिपकाते रहिये , कौन पूछता है ...

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कल रात कुछ वरिष्ठ साथियों से बात हो रही थी जो मप्र शासन में जिम्मेदार पदों पर काम कर रहे है। उन्होंने बताया कि लूट का खेल जमीन से लेकर तबादलों और छोटे मोटे कामों में भी इतना घृणित चल रहा हैं कि सहसा कोई बहुत छोटा कर्मचारी भी वहाँ हाथ डालने से बचेगा। खासकरके जिला कलेक्टर जिस पैमाने पर रुपया कमाने के एजेंट बन गए है और वे जिस घटिया तरीकों से रुपया कमाकर , दस्तावेजों में हेर फेर करके और सरकार का और अपना पेट भर रहे है वह बहुत चिंतनीय है। अपनी अकड़ और तेवर में रहकर वे सारी मर्यादाएं त्याग चुके है। पिछले दस वर्षों का मेरा अपना अनुभव भी यही कहता है कि प्रदेश में हालात बहुत गंभीर हो गए है। जन सुनवाई से लेकर मुख्यमंत्री हेल्प लाईन तक की नोटंकी सिर्फ और सिर्फ नाटक है। 
शिवराज सरकार का प्रशासनिक खामियाजा इस प्रदेश को दशकों तक भुगतना पडेगा। जिला कलेक्टर के तबादले के बाद चार्ज देते समय उससे क्या क्या चार्ज लिया जाता है या उसके किये काले कामों का लेखा जोखा क्या नया कलेक्टर देखता है या क्या नया कलेक्टर पुराने कलेक्टर के द्वारा किये गए जमीन, खनिज, हथियार के लायसेंस, बड़े स्तर पर की गयी खरीदी या शिक्षा स्वास्थ्य में लिए गए निर्णयों की समीक्षा करता है या संभाग स्तर पर बैठे गोबर गणेश नुमा कमिश्नर कुछ जांच पड़ताल भी करते है या मदद करते है या अपना हफ्ता मिलने पर चुप रहते है। मप्र में जिस अंदाज में बड़े शहरों में कलेक्टर बदले गए और वो जो अपने पीछे गलत कामों और दस्तावेजों का सत्यानाश करके जाते है उसका हिसाब कहाँ मिलेगा ? पूरी व्यवस्था में कलेक्टर महज एक पुर्जा है जिले को ठीक चलाने का पर जब वह रुपया कमाने का जरिया बन जाए सत्ता के लिए तो वह सब भूलकर सिर्फ और सिर्फ सत्ता का दलाल हो जाता है। पब्लिक सर्वेंट की परिभाषा फिर से सीखिये जनाब और नही तो घर बैठिये। आपकी प्रतिबद्धता जनता से है सत्ता के सरमायेदारों से नही। शर्म आना चाहिए ऐसे दलाली करते हुए, आपसे बेहतर तो कई बार ....खैर !!! संभागीय स्तर पर जो रेवेन्यू कमिशनर बैठते है वे राज्यपाल है , गोबर गणेश है या सिर्फ भेरू है जो एक पत्थर को गेरू लगाकर किसी भी घाट की शुरुआत में बैठे होते है जो ना कुछ कर सकते है ना कुछ करना चाहते है। ये सिर्फ अपने संभाग के सिर्फ जिला कलेक्टरो की फेंकी हुई हड्डियों से अपना जीवन चलाते है और किसी भी विभाग में सचिव बनने के पूर्व काला पानी की सजा भुगतते है। कुल मिलाकर प्रशासन के कलंक और जनता के रुपयों से पल रहे ये मात्र प्रशासनिक ढोंग और बड़ा बोझ है। सुबह लिखी मेरी पोस्ट पर एक बुजुर्ग साथी ने कहा कि तुम पर तरस आता है क्योकि यह काम कलेक्टर वीरेंद्र सखलेचा या प्रकाश चन्द्र सेठी या सुंदरलाल पटवा या कैलाशनाथ काटजू या अर्जुन सिंह के समय दिग्विजय के समय भी कर ही रहे थे, रुपया कमाकर नेता को देने का तो अब शिवराज के समय करके मुख्यमन्त्री को दे रहे है तो गलत क्या है? हाँ अर्जुन सिंह से आज तक राशि बढ़ गयी है लेन देन में क्योकि "क्वांटम" बढ़ गया है! यानि कि शिवराज हो या दिग्विजय - ये सब एक ही है और कलेक्टर तब भी भृष्ट थे और अब भी तो क्या फर्क पड़ा ? अभी पूर्व प्रमुख सचिव स्वास्थ्य, प्रवीर कृष्ण के करोड़ो रूपये के घपलों को लेकर लोकायुक्त जांच कर रहे है जो मुख्य मंत्री के चहेते अफसर थे और प्रदेश के मरीजों को कूड़ा कचरा उन्होंने जरूरी दवाईयों के नाम पर प्रदेश की जनता को तीन साल परोसा ।


हम भृष्टन के , भृष्ट हमारे !!!!


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आज बहुत दुखी हूँ . ग्वालियर में युवाओं के एक समूह के साथ हूँ तीन चार दिन से. ये सब पढ़ रहे है पर इन्हें ना BE, LL B, BCA, या X , XII का मतलब मालूम या स्पेलिंग भी नही आती.बहुत गहराई से बात की तो ये सब शर्मिन्दा है और अफ़सोस कर रहे कि अंतिम वर्ष में आ गए पर ज्ञान या विषय के नाम पर कुछ नही आता. यह जो साजिश हो रही है कि बच्चों को शिक्षा में रखो पर ज्ञान मत दो यहां तक कि उन्हें लिखना पढ़ना भी मत सिखाओ, और जब जनता मूर्ख रहेगी , मूल कौशलों और दक्षताओं से दूर रहेगी तो भ्र्ष्टाचार को बढ़ावा ही मिलेगा! जम्मू काश्मीर से शिक्षक के खिलाफ जो एफ आई आर हुई , वह सही है । मेरा बस चले तो इन बच्चों के शिक्षको को जिन्होंने इन्हें ग्वालियर जैसे शहर के स्कूल में पढ़ाने के नाम पर धोखा किया उन्हें लाईन से किसी चौराहे पर लटकाकर सरेआम गोली मार दूँ ! बहुत हो गया अब ! कब तक हम मूल बातों को भूलकर फ़ालतू की बाते करते रहेंगे ? 


Friday, May 22, 2015

Posts of 22 May 2015





ये है प्रदीप कुशवाह, मात्र सत्रह साल के है पर असली मर्द, युवा और दिलेर हिन्दुस्तानी है. गोल पहाड़िया, राजा का गैस गोदाम बस्ती, ग्वालियर से है. आज प्रशिक्षण में इनकी कहानी बताई गयी तो मेरा सर गर्व से उठ गया. 

प्रदीप के पिता को जमीनी झगड़ों में फंसा कर तीन साल पहले जेल में बंद कर दिया गया था, परिवार में प्रदीप के अलावा माँ और तीन बहनें थी , एक बहन की शादी पिताजी कर चुके थे, प्रदीप ने मेहनत की काम किया पेंटिंग का प्लास्टर ऑफ़ पेरिस का और शाम शाम को घर घर जाकर गैस सिलेंडर बांटी, फिर दूसरे नंबर की बहन की शादी की, माँ ने भी काम किया, आज भी प्रदीप पढ़ रहे है और काम भी कर रहे है. 

पूछने पर प्रदीप ने बताया कि पिता जी का जन धन खाता भी खुल गया, माँ का भी खुला है परन्तु रुपया एक भी नहीं है उसमे, कहने को बी पी एल कार्ड है पर कोई सुविधा नहीं मिलती है - ना राशन का सामान मात्र अठारह किलो गेंहूं मिलता है बस, बाकी कोई मदद नहीं , पर प्रदीप के हौंसले बुलंद है. मेहनत करके उसने पचास हजार इकठ्ठे कर लिए है, और अब तीसरी बहन की शादी करने वाला है, 

प्रदीप कहता है - "फिर बचेगी एक और बहन तो उसकी भी शादी कर दूंगा दो साल बाद, हम गरीब है और पिताजी के कोर्ट की फीस भी वकील लूटकर हमसे ले लेता है विधिक सहायता से कोई मद्द नहीं मिलती पर हम हारेंगे नहीं. मै काम भी करता हूँ और पढ़ भी लेता हूँ, पिताजी की जिम्मेदारी निभा रहा हूँ पर अच्छा लग रहा है, और सीख रहा हूँ दुनियादारी"

जब पूछा कि अच्छे दिन क्या है तो बोला वो तो मुझे नहीं पता पर हमारे जो खाते खुले है जन धन के उसमे कम से कम सौ रूपये तो सरकार डलवा दें तो सरकार क्या है मै मान जाऊं !!! सरकार भले ही अच्छे दिन ना लायें पर मेरी जिन्दगी में मेरी मेहनत  से अच्छे दिन जरुर आयेंगे, यह मेरा वादा है. प्रदीप की बात सुनकर मै द्रवित हो गया और जी भरकर आशीर्वाद दिए कि जा बच्चे तेरी वाचा फलें और मेरी उम्र भी तुझे लग जाए. 


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सही है, देश में दलित कम थे जो अब इन नामुरादों को भी आरक्षण चाहिए? यानि कि इस कर्नल को शर्म भी नही आती जो गुर्जर सबसे ज्यादा जमीन देश की लेकर बैठे है उन निकम्मों को भी आरक्षण चाहिए. गोली मार दो सबको इसी रेलवे लाईन पर जो विकास के पापा की राह में रोड़ा बने हुए है।
मेरा फिर से कहना है कि सभी प्रकार का आरक्षण अब बंद होना चाहिए, बहुत हो गया चुतियापा ! और जो मांगे उसे खुले आम चौराहे पर फांसी दे दो !!!



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चलो आखिर आजादी के इतने सालों बाद "राज्यपाल " नामक बेचारे घोर उपेक्षित नामर्द को मोदी सरकार ने वयस्क यानि "मर्द" घोषित किया.
काश वो बेचारी गुजरात की राज्यपाल भी जो एक बुजुर्ग महिला थी, अपने आपको राज्यपाल समझ पाती जिसने सूचना आयुक्त की नियुक्ति की थी और इसी मोदी ने उसका जीना हराम कर दिया था पांच सालों में !!!
अरविन्द और तमाम कम्बख्तों अब खेलो कबड्डी !!!!


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अच्छे दिनों की प्रसव पीड़ा , फुल टर्म हो गया अब क्या करें - नॉर्मल डिलीवरी का इंतज़ार या सीजेरियन , पर नर्सिंग होम का खर्च कौन देगा- अम्बानी, अडानी, अजीम प्रेम, टाटा, जिंदल या NRHM से आएगा ???

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और महान आश्चर्य !!!!
अभी टीवी ऑन किया और सोनी लगाया तो.......
"सी आई डी" नही आ रहा है। हे भगवान, संसार में सब ठीक है ना ????


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गुजरात से लेकर तमिलनाडु तक भारत एक है

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इधर सरकार का एक साल पूरा उधर अम्मा के अच्छे दिन, आज से ही राज्य की महारानी बनी!
सब नदी नाव संयोग है प्रभु !!!


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इस निर्जन में कभी लगता था कि कोई पहुंच नही पायेगा
सूरज की रश्मि किरणों से पूछ लेता तो बेहतर बता देती.



मैं यही हूँ और इसी जगह पर जो कभी सरकी नही पांवो के नीचे से 
तुम शायद वहाँ हो जहां शायद सरकने के लिए एक क्षण ही काफी है

Thursday, May 21, 2015

Posts of 21 May 15




6

असल में किसी की गलती नहीं है हम सब लोग परेशान है कांग्रेस की साठ साला सरकार ने इतना त्रस्त कर दिया है और हालात इतने दुष्कर हो गए है कि जीवन निर्वहन कठिन हो गया है इसलिए सच में हम सब लोग एक चमत्कार की उम्मीद कर रहे थे और लगा था कि गुजरात में भले ही हत्याएं हुई हो, कुपोषण सर्वाधिक रहा हो, अधिकारियों को निपटाया गया हो, घपले घोटालें रहे हो, परन्तु हम सब एक नेता से अवतार की उम्मीद में थे, क्योकि हमें बचपन से अवतारवाद सिखाया गया है, हम चाहते है कि हम मूक बने रहे  और कोई सर्व शक्तिमान हमारे दुःख हर लें और हमें तमाम मानसिक शारीरिक व्याधियों से मुक्त कर दें, घर बैठे हमारे अकाउंट में रुपया डाल दें या बी पी एल कार्ड बना दें, इसलिए नेता ने भी जन धन से लेकर हर आदमी से बारह रूपये बटोरने का काम किया और हम भी तैयार हो गए कि कि चलो जीते जी तो हम भला ना कर पायें परिवार का, कम से कम लूले लंगड़े हो गए या मर ही गए तो परिवार को मात्र बारह रुपयों से दो चार लाख दिला जायेंगे जाते जाते.........पर कहाँ यह सुख भी.....महंगाई के जमाने में हम अपने रिश्तेदारों की गमी में दूसरे गाँव या शहर नहीं जा पा रहे और एक मोबाईल की मिस कॉल घंटी से संवेदनाएं व्यक्त कर देते है या एक एस एम् एस से या वाट्स अप जैसे टुच्चे माध्यम से शोक जता देते है तो जाहिर है नेता का विश्व भ्रमण वो भी रंग बिरंगी कपड़ों में अखरेगा ही, हम जैसे कमीनों और देश द्रोहियों को, बस अपनी कुंठा में और कुछ ना कर पाने की बेबसी में अपने बाप दादाओं, माता-पिता को कोसते हुए हम अम्बानी और अडानी या अजीम प्रेम जैसे घटिया आदमी को गालियाँ देने लगते है.......अब बेचारे नरेंद्र मोदी इस सबके बीच देश का ताज पहनकर आ गए तो उस भले आदमी का क्या दोष.......साधो देखो जग बौराना...........

5.

बदला क्या है एक साल में- ना बस्तियां, ना मोहल्ले, ना बिजली की स्थिति, ना पानी की सप्लाय, ना नाली और नाले, ना गंगा की सफाई, ना स्वच्छता अभियान, ना विदेश नीती, ना धारा 370 हटी, ना राम मंदिर की शुरुवात हुई, ना अलग राज्यों की पहल हुई, ना विकेंद्रीकरण, ना महिला सुरक्षा, ना अपराध कम हुए, ना हिंसा कम हुई, ना मुकदमे निपटे, ना शिक्षा का स्तर सुधरा, ना रेलवे में हालात बदले, ना रोडवेज शुरू हुई - हाँ चार्टेड बसे दुगुने किराए पर चलने लगी.
जो भी यहाँ कमेन्ट करें एक बार तटस्थ होकर सोच लें और वाहियात कमेन्ट करके अपने माँ बाप की दी हुई शिक्षा और संस्कार यहाँ ना दर्शायें 



4.

IIT, IIM और अन्य संस्थान हम क्यों खोल रहे है, किसके लिए खोल रहे है ? बारहवीं , दसवी और आठवी पास बच्चे बहुत ही सरल हिंदी के वाक्य भी नही पढ़ पा रहे है, जिसमे चार या पांच सरल शब्द है। वे ठीक से पढ़ना तो दूर उच्चारण भी नही कर पा रहे, क्या सारा दोष इन बच्चों का है ? कितना शर्मनाक है यह सब कि शिक्षा, खासकरके सरकारी शिक्षा को एकदम बर्बाद करके रख दिया है । सारे अवसर डी पी एस में या ऐसे ही स्कूलों में महंगी फीस देकर पढ़े बच्चों को ही यह देश अवसर उपलब्ध करा रहा है। मध्यमवर्गीय और गरीब बच्चे कहाँ जाए ?
आज अभी ग्वालियर में जब यह नजारा देखा तो मन खिन्न हो गया।


3.

गुलमोहर के फूलो की लालिमा को और तेज प्रचण्ड ताप में उसी गुलमोहर की एकदम हरी पत्तियों को ठीक तुम्हारी तरह मुस्कुराते हुए देखा था तो जिंदगी का मकसद और परिभाषा सीख गया था.


2.

तेज धूप, पिघलती सड़क, सूखे वृक्ष, हवा में ओंस की नाजुक बूंदों की अनुपस्थिति, गर्द और गुबार, छाँव की तलाश में भटकती आत्माएं, सदियों की ऊब, दशकों की बेबसी और अस्त व्यस्त सा उधेड़बुन में बीतता जा रहा उहापोह में जीवन, इस सब के बीच कब - कैसे मैं , कैसे - कहाँ किस वीराने में भटक गया तुम्हारी परछाई ढूंढते ढूंढते और अब जब इस समय ठीक जब सूरज प्रचण्ड रूप से ठीक मेरे सर पर सवार है तो मैं मोम की भाँती पिघल गया हूँ और अंदर से रेशा रेशा उधड़ गया हूँ! बस अब देखना यह है कि कैसे और किस तरह जुटा पाउँगा अपने होने के लिए उन कोमल तंतुओं को , उन जर्द पलों को और उन उनींदी रातों को और कभी ना उगने वाली सुबहों को जो मेरे को परिभाषित करेंगी.  ये जो सूरज का तेज है जो एक उद्दण्ड बारिश की तरह से बरस रहा है , असल में वह तपिश है जो कभी हमारे बीच हुआ करती थी और क्षणे क्षणे खत्म होती चली गई और अंत में मैं एक चातक पक्षी की तरह से ताकता रह गया, स्वाति नक्षत्र के बाद चंद बरसी बूंदों को भी तरस गया । बोलो ना , कुछ तो बोलो ये मानसून की बदलियाँ कब मेरे छज्जे से गुजरेंगी और मेरा पोर पोर भिगोकर उद्दाम वेग से उठने वाले ज्वर को शांत करेंगी ... तुम्हारे लिए .....सुन रहे हो ना..... कहाँ हो तुम .....


1.

हिन्दी का साहित्य जगत फूहड़, छिछोरे, नाटकबाज और तथाकथित विचारधाराओं को ओढ़कर चलने की नौटंकी वालों से भरा पडा है और इसमे ये रोज नया गढ़ते है और रोज नया बुनते है सिर्फ और सिर्फ प्रसिद्धि (?) पाने के लिए और अपनी कुंठाएं निकालने के लिए. रही सही कसर फेसबुक ने पुरी कर दी है. आये दिन मेर पेज को लाईक करों, मेरा स्टेटस शेयर करो, मेरे स्टेटस पर कमेन्ट करों, मेरी किताब मंगवा लो, मेरे वाल पर टिप्पणी करो, मेरे चित्र देखो आदि से हिन्दी के बड़े नामी गिरामी कवि कहानीकार और उपन्यासकार ग्रस्त है भगवानदास मोरवाल से लेकर कई लोग इसी कुंठा में मर रहे है, दूसरा विचारधारा वाट्स एप जैसे माध्यम पर भी लड़ाई का शक्ल ले चुकी है और वहां भी रुसना मनाना और छोड़ना जैसे मुद्दे जोर पकड़ रहे है छि शर्म आती है कि चार लोग इकठ्ठे होकर कुछ रचनात्मक नही कर सकते और कोई वरिष्ठ साथी कुछ कहता है या कोई समझदार इन्हें इनकी औकात का आईना दिखाता है तो सब मिलकर पीछे पड़ जाते है उसके और उसे फर्जी साबित कर देते है या आपस में ही दोषारोपण करने लग जाते है. हिन्दी की दुर्दशा के लिए ये सब लोग बारी बारी से जिम्मेदार है.. हिंदी की चिंदी और साहित्य के नाम पर कचरा फैलाने वालों इतिहास तुम्हे माफ़ नही करेगा।

ब्राह्मण के भेष में बनिया

दलित के नाम पर अवसरवादी
क्षत्रिय के नाम पर चापलूस और सत्ता के दलाल 
कामरेड के भेष में पूंजीपति
कर्मचारी के भेष में धंधेबाज
विचारधारा के भेष में इमोशनल ब्लैकमेल
दिनभर फेसबुक और अन्य साइट्स पर ज्ञान पेलना
नोकरी के बजाय वाट्स एप पर कवितायें झिलवाना
चौकीदारी करते समय उपन्यास कहानी की रचना करना
चिकनी चुपड़ी महिलाओं के लिए अपना थोथा ज्ञान उगल देना
जाति को गाली देते हुए अपनी जात बिरादरी को पुष्ट करना
साम दाम दंड भेद से अपनी चीजें बेचना बिकवाना
दो पेग के चक्कर में दुनिया घूम आना
रूपये की हवस में कुंठित होकर धन्ना सेठों की जी हुजूरी में लिप्त रहना
एनजीओ को गाली देकर एनजीओ की और एनजीओ वालों की सुविधाएं भकोसना
निर्लज्जता से झूठी गरीबी का गुणगान करना और पूंजी की कामना करना
मीडिया के लोगों से जायज और गैर जायज रिश्ते बनाकर स्वयं को पोज़ करना
ब्यूरोक्रेट्स के सर्द तलवों को जीभाचार से उष्ण करना
नरम मुलायम भाषा और चाटुकारिता के जीन्स को अपने खून में जगह देना
अपनी रचना के अनुवाद को पचास सांविधानिक भाषाओं में बताना
मौका मिलने पर दुनिया का घृणास्पद पुरस्कार लेने में तनिक संकोच ना करना
विश्विद्यालयों में तमाम अपमान सहकर भी लोंडो लपेडो के मुंह लगना
चार छह छर्रे पाल कर नवोदित लेखिकाओं को घास डालना
मवाद और बदबू से भरे माहौल में कीड़ों की तरह बजबजाना

जय हिंदी , हिन्दू और हिन्दुस्तान ।

हिंदी का लेखक यानि नोटंकी साला !!!
और नाटक का पटाक्षेप
काश Gouri Nath जैसे भले मित्र को यह कला आती तो आज दिल्ली में ऐश करता और हिंदी के लेखक उसके घर इस भरी गर्मी में कूलर भरते !!! गौरी के नाथ सीख लो लेखको को जन्मदिन पर भर भर दुआएं देना अपनी लग्गी लगाकर या धमकी देना कि अब बंद कि तब बंद !!!

Tuesday, May 19, 2015

Posts of 19 May 15


हिन्दी का साहित्य जगत फूहड़, छिछोरे, नाटकबाज और तथाकथित विचारधाराओं को ओढ़कर चलने की नौटंकी वालों से भरा पडा है और इसमे ये रोज नया गढ़ते है और रोज नया बुनते है सिर्फ और सिर्फ प्रसिद्धि (?) पाने के लिए और अपनी कुंठाएं निकालने के लिए. रही सही कसर फेसबुक ने पुरी कर दी है. आये दिन मेर पेज को लाईक करों, मेरा स्टेटस शेयर करो, मेरे स्टेटस पर कमेन्ट करों, मेरी किताब मंगवा लो, मेरे वाल पर टिप्पणी करो, मेरे चित्र देखो आदि से हिन्दी के बड़े नामी गिरामी कवि कहानीकार और उपन्यासकार ग्रस्त है भगवानदास मोरवाल से लेकर कई लोग इसी कुंठा में मर रहे है, दूसरा विचारधारा वाट्स एप जैसे माध्यम पर भी लड़ाई का शक्ल ले चुकी है और वहां भी रुसना मनाना और छोड़ना जैसे मुद्दे जोर पकड़ रहे है छि शर्म आती है कि चार लोग इकठ्ठे होकर कुछ रचनात्मक नही कर सकते और कोई वरिष्ठ साथी कुछ कहता है या कोई समझदार इन्हें इनकी औकात का आईना दिखाता है तो सब मिलकर पीछे पड़ जाते है उसके और उसे फर्जी साबित कर देते है या आपस में ही दोषारोपण करने लग जाते है. हिन्दी की दुर्दशा के लिए ये सब लोग बारी बारी से जिम्मेदार है.

दखल प्रकाशन ने अभी शुरुवात की ही है, विश्व पुस्तक मेले के बाद प्रचार हुआ और अमेजोंन से लेकर तमाम साईट्स पर किताबें बिक गयी, ख़त्म हो गयी, यह हल्ला था, और लाल्टू ने बी बी सी में भी जिन किताबों का जिक्र किया उसमे दखल का नाम था, तो फिर ये अचानक से बंद करने का निर्णय की सूचना और मेरे यह लिखे जाने पर कि यह दखल का स्कैंडल तो नहीं अशोक पांडे ने जिस तरह से अशालीन भाषा में जवाब दिया उससे लगता है कि यह किसी ने फर्जी आई डी बनाकर सूचना लिखी है, अशोक शालीन है, सभ्य है भी है, और अच्छे मित्र है और ऐसा निर्णय वो लेंगे ही नहीं. दखल के लिए तो वे ग्वालियर से दिल्ली गए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया और आये दिन दिल्ली में कार्यक्रमों में दखल के लिए शिरकत करते है एक अच्छी खासी टीम है उनके पास युवाओं की और जे एन यु से लेकर तमाम जगहों पर वामपंथ और साहित्य का झंडा उठाते रहते है फिर यह निर्णय क्यों?

Sunday, May 17, 2015

Posts of 17 May 15


1
कभी सुबहें मनहूस हो जाया करती है . कल सारा दिन भोपाल में था कुछ काम से, रात आया तो कमरे में बदबू थी पर थका होने के कारण देखा नहीं सो गया, आज सुबह देखा तो कमरे की कोने वाली खिड़की में जिस गिलहरी ने बच्चे दिए थे, जिस मेहनत से उसने अपना साजो सामान इकठ्ठा किया था और रोज भाभियों के रखे सकोरों में से पानी पीती और कुछ ना कुछ बटोर कर लाती थी, खाने को जो भी फलों के टुकड़े, सब्जियों के टुकड़े या सूखा अन्न रख देते थे -वह खा लेती थी , सब व्यर्थ गया.........मैंने देखा कि  पाँचों बच्चे मर गए है, और उन्ही की वजह से बदबू फ़ैल रही है, गिलहरी सुबह से हल्ला कर रही  थी, जब मैंने खिड़की के पल्ले को हटाया, और उस बेशकीमती साजो सामान को हटाया तो वह गिलहरी दीवार की मुंडेर पर चुपचाप तक रही थी और इस कड़ी धूप का मानो उसपर कोई असर ना हो रहा हो......बहुत भारी मन से मैंने वो कचरा उठाया और पाँचों बच्चों को बारी बारी से डस्टबिन में रखा और नीचे चल दिया कि कही फेंक दूं -वहाँ भी वो गिलहरी आ गयी..........ये गर्मी का मौसम और ये मौत के सिलसिले......उफ़.......

दूसरी खबर और निराशाजनक है, भास्कर के मेधावी पत्रकार वीरेन्द्र चौहान का असामयिक निधन, वीरेन्द्र मेरे घर के सामने रहते थे और बहुत करीबी मित्र थे, वो जब इंदौर से पत्रकारिता पढ़ रहे थे और आते थे और कुछ ना कुछ हाथ में लिखा होता था और पूछते थे कि इसकी भाषा और कैसे कड़ी की जाए, फिर पढाई के बाद यहाँ - वहाँ नौकरी करने के बाद आखिर भास्कर में काम करने लगे फिर भी संपर्क रोज ही होता था. कुछ काम के दबाव और और कुछ निजी मात्र चालीस बरस की उम्र में हार्ट अटैक का शिकार और मृत्यु कितना दुखद है. ये छोटी उम्र में मरना और हार्ट अटैक, कैंसर, शुगर, ब्लड प्रेशर, जैसी बीमारियाँ आखिर सब हमारे अपने जाए दुःख तो नहीं है? जिस  मिलावटी दौर में हम सब जिए जा रहे है, वह घातक है हम सब के लिए,  कल भोपाल में राकेश दीवान से बात हो रही थी इसी बारे में जो एक दवाओं की कार्यशाला में हिस्सा लेकर लौटे ही थे.

मौत ने किसी को बख्शा नहीं है और याद आते है तथागत जिन्होंने एक स्त्री के पुत्र को ज़िंदा करने के लिए शर्त राखी थी कि एक ऐसे घर से चावल के चार दाने ले आओ जहां मौत ने झांका ना हो और वह स्त्री जब दुनिया भर में घूम आई तो उसका विलाप पूरा हो चुका था वह समझ गयी थी कि मौत शाश्वत है और हर घर में उसका जीवन से ज्यादा अधिकार है..........मौत है तभी हम है और जीवन का अनंतिम सत्य मौत ही है, बस शब्दों में हम मनहूस या मातम कहें पर सत्य वही है और हम सब धीरे धीरे उसी ओर बढ़ रहे है............

ये गिलहरी के पांच बच्चे और उनकी मौत का सदमा बहुत दर्दनाक है हमने किसी जानवर को भी जीने लायक नहीं छोड़ा है पर्यावरण को इतना बर्बाद कर दिया है कि ये मूक और शक्तिहीन जानवर भी क्या करें और किससे कहें ? 

ॐ शान्ति ॐ शान्ति ॐ शान्ति..............

Friday, May 15, 2015

पूरा दिन - गुलजार



मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है,
झपट लेता है, अंटी से
कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की
आहट भी नहीं होती,
खरे दिन को भी खोटा समझ के भूल जाता हूँ मैं
गिरेबान से पकड़ कर मांगने वाले भी मिलते हैं
"तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है, तुझे किश्तें चुकानी है "
ज़बरदस्ती कोई गिरवी रख लेता है, ये कह कर
अभी 2-4 लम्हे खर्च करने के लिए रख ले,
बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं,
जब होगा, हिसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं
अपने लिए रख लूं,
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन 
बस खर्च 
करने की तमन्ना है !!

Wednesday, May 13, 2015

जीत तक ज़ारी जंग


फिर एकबार कही से हिम्मत जुटाकर कुछ शुरू करें......

बाज लगभग 70 वर्ष जीता है,
परन्तु अपने जीवन के 40वें वर्ष में आते आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है।

उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं-

1. पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है व
शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं।

2. चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन निकालने में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है।

3. पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूरे खुल नहीं पाते हैं, उड़ानें सीमित कर देते हैं।

भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना
और भोजन खाना....
तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं।

उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं,
या तो देह त्याग दे,
या अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे...
या फिर
स्वयं को पुनर्स्थापित करे,
आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में।

जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं,
वहीं तीसरा अत्यन्त पीड़ादायी और लम्बा।

बाज पीड़ा चुनता है
और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है।

वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है,
एकान्त में अपना घोंसला बनाता है,
और तब प्रारम्भ करता है पूरी प्रक्रिया।

सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है..!
अपनी चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं पक्षीराज के
लिये।
तब वह प्रतीक्षा करता है
चोंच के पुनः उग आने की।

उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है और प्रतीक्षा करता है पंजों के पुनः उग आने की।
नये चोंच और पंजे आने के बाद
वह अपने भारी पंखों को एक एक कर नोंच कर निकालता है और प्रतीक्षा करता पंखों के पुनः उग आने की।

150 दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा...
और तब उसे मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान, पहले जैसी नयी।

इस पुनर्स्थापना के बाद वह 30 साल और जीता है,
ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ।

प्रकृति हमें सिखाने बैठी है-
पंजे पकड़ के प्रतीक हैं,
चोंच सक्रियता की और
पंख कल्पना को स्थापित करते हैं।

इच्छा परिस्थितियों पर नियन्त्रण बनाये रखने की,
सक्रियता स्वयं के अस्तित्व की गरिमा बनाये रखने की,
कल्पना जीवन में कुछ नयापन बनाये रखने की।

इच्छा, सक्रियता और कल्पना...
तीनों के तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं.. हममें भी चालीस तक आते आते।

हमारा व्यक्तित्व ही ढीला पड़ने लगता है,
अर्धजीवन में ही जीवन
समाप्तप्राय सा लगने लगता है,
उत्साह, आकांक्षा, ऊर्जा....
अधोगामी हो जाते हैं।

हमारे पास भी कई विकल्प होते हैं-
कुछ सरल और त्वरित.!
कुछ पीड़ादायी...!!

हमें भी अपने जीवन के विवशता भरे
अतिलचीलेपन को त्याग कर नियन्त्रण दिखाना होगा-
बाज के पंजों की तरह।

हमें भी आलस्य उत्पन्न करने वाली वक्र मानसिकता को त्याग कर ऊर्जस्वित सक्रियता दिखानी होगी-
"बाज की चोंच की तरह।"

हमें भी भूतकाल में जकड़े अस्तित्व के
भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी-
"बाज के पंखों की तरह।"

150 दिन न सही, तो एक माह ही बिताया जाये, स्वयं को पुनर्स्थापित करने में।
जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही,
बाज तब उड़ानें भरने को तैयार होंगे,
इस बार उड़ानें
और ऊँची होंगी,
अनुभवी होंगी,
अनन्तगामी होंगी....!

●●●●●जीत तक ज़ारी जंग●●●●

Tuesday, May 12, 2015

Posts of 11 and 12 May 15 Kartik & Arti's Marriage

7.


6.
लोकसभा में कितने घटिया लोग है जो अपने आरोपों पर जवाब देने के बजाय किसी के परिवार पर आक्रमण करते है कायर और मक्कार सांसद भाजपा के है और जवाब के बजाय घटिया कुतर्क करते है, लोकसभा अध्यक्ष महोदया जो इतनी अनुभवी और संस्कारित होने का दावा करती है क्या इसलिए वहाँ बैठी है कि ये सब घटियापन चलने दें इससे तो बेहतर मीराकुमार थी जो बैठ जाईये, बैठ जाईये तो चिल्लाती थी इनसे तो बहुत बेहतर ही थी. ये सुमित्रा ताई भी क्या करें - है तो उसी जड़ मानसिकता की ना - जो लठैत और फासीवादी है और इंदौर जैसे शहर को प्रतिनिधित्व देती है, जहां लठैत राजनेता ही रहते है और जब आती है उन्ही से घिरी रहती है काम तो कुछ करती नहीं, और लड़ाई भी लठैतों से ही है इंदौर में टुच्चीवाली तो आखिर ये सब संस्कार जायेंगे कहाँ ???

5.
मप्र में लग रहा है मानो कांग्रेस का शासन चल रहा है पिछले कुछ दिनों में जो हालत हुए है, शिवराज मामाजी ने जो भी अनिर्णय की स्थिति में खुद को रखा है और प्रदेश का नुकसान किया है उससे सहसा दिग्विजय सिंह की याद हो आती है.
इस बात को मै पुरी गंभीरता से कह रहा हूँ और यह सब होना स्वाभाविक भी है वही चमचे, वही मुख्यमंत्री, वही मक्कार ब्यूरोक्रेट्स और वही भ्रष्टाचार और काम करने के एडहोक तरीके. 
शिवराज मामाजी भी एक ही रोल में उकता गए है यह उनकी बॉडी लैंगवेज से लगता है विश्वास ना हो तो देख लें अब सिर्फ वे खानापूर्ति कर रहे है. बेहतर है कि वे सत्ता किसी और को सौंप दें और वन की ओर प्रस्थान करें.

"कहते है ना अति सर्वत्र वर्जयेत"



4.
राजू और जया जैसे लोगों को सजा माफ़ और सलमान बाहर
देश में राम राज्य आया है, स्वागत करो और न्यायपालिका को अब कार्यपालिका और विधायिका से सीधा जोड़ दो..........
कोई आश्चर्य नहीं होगा कि रिटायर्ड न्यायमूर्ति भी अब चुनाव लड़े अगली लोकसभा में और राज्यसभा से सीधे बेकडोर इंट्री करें ..
तो बोलो, पार्टी का नाम बोलो - कौनसी पार्टी होगी.............? बोलो बोलो, शरमाओ मत, डरो मत बोलो .....
क्या कहा था इकबाल चचा ने "तेरे सनमकदों के बुत हो गए पराये............."


3.
जब जीवन में दो अमृत और एक आशीष हो तो दोस्ती शब्द के मायने कुछ स्वर्गिक भी हो जाते है। और फिर अमृत को अमृत से मिलाने का पुण्य भी लगता है।
भास्कर भोपाल में Amrit Sagar अमृत सिंह और दो पाटन के बीच में आशीष महर्षि.
छोटी सी अद्भुत और यादगार मुलाक़ात। शुक्रिया।




2.
Amrit Sagar हमारे मप्र के भोपाल में। मजा आ गया। पर अखर यह गयी कि हमारी मेजबान इस समय दिल्ली में सोशल नेटवर्क पर अपने काम में व्यस्त है।
जिन्हें यहां होना चाहिए वो दिल्ली में। अब ये दो बेचारे कहाँ जाए, क्या खाये पीये, कोई सुनने वाला नहीं। हे भगवान् कोई मदद करें
दो बेचार बिना सहारे , देखो पूछ पूछ कर हारे
बिन ताले की चाभी लेकर फिरते मारे मारे !!!!


1.
और हमारे कार्तिक मियाँ बंध गए विवाह के पवित्र बंधन में। Kartik Abhas and Arti Parashar







Saturday, May 9, 2015

Posts of 9 May 15

7
आवाजें गूंजती थी यहाँ - वहाँ और हर कही, बस यूँ लगता कि अभी निकल जाऊं और इन आवाजों के पीछे बावरा से चल पडू , फिर लगता कि उस पार्क के अँधेरे कोने में वो कंचे कही तड़फ रहे होंगे जिन्हें कल ढलती शाम के समय वो बच्चे छोड़ गए थे, आसमान की तरफ ताकता कि कही से कटती हुई पतंगों की थाह मिल जाए तो उड़ चलूँ उनके संग कि कही तो गिरेंगी और कोई तो थाम लेगा - चाव से और प्यार से घर ले जाएगा, मरम्मत करके फिर छोड़ देगा  आसमान में उड़ने को, फिर ख्याल आता उन बिलों का जिनमे कॉकरोच या चूहे घुस गए और फिर कभी नहीं लौटे और आध्यात्मिक मुद्रा में बिल के मुहाने पर बैठी बिल्ली कितनी तसल्ली से इंतज़ार कर रही हो अपनी क्षुधा शांत होने की और अन्दर जिन्दगी से जंग लड़ रहे चूहे कही से कूद फांदकर निकल गए हो इसी अंतहीन सिरे से दूसरी ओर - एक और जिन्दगी के तलाश में, या याद आती है वो चींटियों की लम्बी कतारें जो किसी अदृश्य अतल गहराई से मुंह में पता नहीं क्या लिए कितनी ही सदियों से जाए जा रही है और उनकी अनथक यात्रा ख़त्म ही नहीं होती. पानी में टेडपोल और लार्वा देखते हुए समझ ही नहीं पाया कि ये मछली है या मेंढक, बस पानी में कंकर मारकर उसकी शान्ति ही भंग की थी मैंने, समंदर के किनारे से लौटते हुए पांवों के नीचे से रेत फिसलने का एहसास लिए सोचता कि जिन्दगी कैसे खिसक रही है आहिस्ता से और साँसों का सफ़र अपने साथ सब कुछ बहा लिए जा रहा हो वासना की उद्दाम लहरों के साथ, घने जंगलों से गुजरता तो लगता कि सायं सायं के बीच पेड़ों पर चहकते पक्षी और चहूँ ओर से आती भीन- भीन के बीच सर्प और नेवले से फुफकार रही है मेधा और बुद्धि और इस यायावरी संघर्ष में तिलिस्म से टूटते स्वप्न क्षण भंगुर हो गए हो मानो यकायक एक चीते सी हांफती मौत सामने आ गयी और ललकार रही हो उद्धिग्न होकर, शाम होते - होते झींगुरों के स्वर कानों के करीब होते और दैदीप्त्मान से होते चंद्रमा में, मै उन तारों के साथ चलने लगता कि रात के तीसरे पहर में हल्की सी आहट हो रही है सूरज की, ठीक इसी समय दूर कही शुक्र तारा पुरी ताकत से निकल रहा होता और एकदम निश्छल सा ध्रुव उत्तर में आसमान से चमक खोते हुए, सरकते सुरुचि और सुनिती के बीच की लड़ाई में उत्तर से पता नहीं कहाँ चला जा रहा होता. ये सुबह से इस पहर में ख़त्म होता स्वप्न नहीं है यह जीवन के बीचोबीच से जद्दोजहद करती जिन्दगी की असली रूमानियत भरी मेरी, तुम्हारी और हम सबकी कहानी है - जो हम सबने जानी है और अब समय है कि इसे एक पूर्ण विराम दिया जाए. 
आमीन...!!! 

6
दो लाख का बीमा करवाया तो मौत दिखने लगी
देवास के बड़े लोग जिनके खातों में करोडो रूपये होंगे और जेवरात की संख्या तो भगवान् जाने वे भी आज IDBI में 12/- में अपना दो लाख का बीमा करवाते दिखें, मैंने भी करवा लिया 12 में क्या जाता है.............बेशर्मी तो खून में है हिन्दुस्तानी जो हूँ.........

अब थोड़े दिन में हुजूरे आला के सत्संग होंगे कि 12 /- के बीमे का आग्रह छोडो, फिर अम्बानी अडानी और टाटा से लेकर सब लोग ये "सब्सिडी" छोड़ेंगे और फिर मेरे जैसे घटिया आदमी को सब शक की निगाह से देखेंगे कि कमीने गैस से लेकर बीमे की राशि देश हित में छोड़ता क्यों नहीं.......? 

अब आज घोषणा और कल समर्पण की मांग ऐसा करते करते पांच साल निकल जायेंगे और आखिर में मिलेगा .


बोलो भक्तो...........क्या मिलेगा..........बाबाजी का ठुल्लू.............

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सरकार पहले अपने स्टेट बैंक, या बैंक ऑफ़ इंडिया जैसे राष्ट्रीयकृत बैंको को सुधार दें और वहाँ के कर्मचारियों को सुधार लें ज़रा जो बैंक लोकपाल से भी नहीं डरते बाकी सब तो बाद में ठीक हो जाएगा.........

एक बार किसी स्टेट बैंक में जाकर देख लीजिये जहां नए नवेले स्टाफ और युवा जोश वाले लडके लडकियां जिस बदतमीजी से बात करते है या गप्प  करते रहते है या कैशियर स्मार्ट फोन पर अपने स्मार्टनेस के जलवे दिखाते है वह शोचनीय है. मजाल कि ग्यारह सवा ग्यारह से पहले काम शुरू कर दें या उनका सर्वर ठीक ना हो, या सबसे हाथ मिलाने में आधा घंटा बर्बाद ना हो और फिर चाय या गन्ने का रस हाय और हम ग्राहक टुकुर टुकुर ताकते रहें, अधिकारीगण बेचारे चीफ को गलियाते रहते है कि आज यहाँ बिठा दिया कल वहाँ बिठाया था आदि आदि और फिर चिल्लपों शुरू होती है, फिर काम .............अब ऐसे में ये मुई प्रधानमत्री की आये दिन होने वाली महत्वकांक्षी योजनायें .भाड़ में जाए जनता अपना काम बनता............

हुजूरे आला ज़रा इनकी समस्याएं भी देख लो हड़ताल में तो ये सबसे आगे है.........लगभग  पचास प्रतिशत ए टी एम बंद पड़े है ...कहाँ आप भी ना इन बेचारों पर रोज एक नया काम लाद देते हो..........
अब तक तो  जनधन का हिसाब हुआ नहीं, और पेंशन, और बीमा , और दुर्घटना योजना............अरे यार थोड़ा धीर तो धरो............ 


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IDBI बैंक की कर्मचारी ने कहा कि पता नहीं तीन दिन में हम कैसे ये अकाउंट खोल पायेंगे अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं है ना ही मालूम कि सरकार कहाँ से रुपया लायेगी इतना ........?

मैंने भी दोनों योजनाओं में फायदे के लिए अपने को इन योजनाओं में दर्ज तो करवा लिया है परन्तु यदि मृत्यु दर सामान्य रूप से दो प्रतिशत भी मान लें तो सरकार १२५ करोड़ में से पता नहीं कितने लोगों को दुर्घटना ग्रस्त लोगों को दो लाख का बीमा देगी या मृत्यु होने पर दो लाख का भुगतान करेगी?

अभी तो ग्रामीण या कस्बाई बैंकों में भी पर्याप्त स्टाफ नहीं है या स्व सहायता समूहों के खाते खोलने को भी बैंकों के पास समय नहीं है या नरेगा के हितग्राहियों के लिए स्टाफ नहीं है.

खैर, सिर्फ इतना कहूंगा कि आमीन !!!!


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Ravish Kumar​ जी का सपना! रविश भाई के बहाने हिंदी के तथाकथित युवा तुर्को को चार जूते !!!

सोचिये कि क्यों ये शख्स लोकप्रिय है. मीडिया और खबरों की भीड़ में अपनी रचनात्मकता बचाये रखना और फिर लिखना एक ऐसे समय में  जब गाँव और कस्बों में भी तनाव और समय की कमी से हम  सब जूझ रहे है वही रविश अपनी ऊर्जा दिल्ली जैसे शहर और मीडिया मंडी में रहकर भी बचाये हुए है. 

ये उन लोगों के लिए भी मैं लिख रहा हूँ जो अपने थोथे ज्ञान और सामन्ती अकड़ के चलते फेसबुक जैसे माध्यमों को घटिया कहते है और गाहे बगाहे मूर्खों जैसी सलाह देते है कि "फेसबुक पर स्खलन करना बंद करो".

सवाल लिखने, पढ़ने और लाइक , कमेंट्स का नही वरन विविध आयामों और इन घटिया लोगों को और हिंदी की पत्रिकाओं में बैठे उन उजबक युवा संपादकों के लिए भी एक चुनोती है जो यहां छपे को छापना पसंद नही करते और उनकी अश्लील पत्रिकाएं सौ से ज्यादा लोग गाय पट्टी में नही पढ़ते  और ये नामुराद उप संपादक या सम्पादन में सहयोग के नाम पर देश भर के लोगों का खासकरके महिलाओं का शोषण करते है. ये नपुंसक मानसिकता के मारे और नामर्द कर्मशील हिंदी के उज्जड और अपढ़ लेखक और अपराध बोध से ग्रसित और चौबीसों घंटे पूंजीवाद को कोसने वाले कुंठित और  सभ्यता के मारे लोगों को यह समझना चाहिए कि ये दुनिया तुम्हारे पूर्वाग्रहों और ओछी मानसिकता से नही चलेगी.


मैं मड़ई डालकर एक नाश्ता कार्नर खोलना चाहता हूँ । स्टेशन के किनारे या किसी घाट के छोर पर । जिसके बाहर एक बोर्ड लगा हो- रवीश नाश्ता सेंटर , सूरज की पहली और आख़िरी किरण के साथ दिलबहार नाश्ते का प्रबंध । बाँस से एक रेडियो लटका हो । गुनगुना रहे हैं भँवरे खिल रही है कली कली गाना आ रहा हो । एक ऐसा कोना भी हो जो बाहर से न दिखे जहाँ नौजवान नज़रें बचाकर हाथ नीचे किये सिगरेट पी सकें , बेंच के पीछे रानी मुखर्जी से लेकर ऐश्वर्या की तस्वीरें लगी होंगी ।
मक्खी और मच्छर से बचाने के लिए शीशे का छोटा महल बनाऊँगा जिसके अंदर टटका घुघनी का छोटा पहाड़ देख आपकी आंत मचल जाए । कतरनी चूड़ा और सजाव दही देखकर आप न्यू जर्सी फ़ोन कर दें कि जो बात यहाँ है वो तुम लोग को नहीं मिलता होगा और सुनते ही न्यू जर्सी वाला फ़ेसबुक पर स्टेटस लिखिए कि मिसिंग रवीश नाश्ता सेंटर एंड इट्स घुघनी । लव यू पटना ! झट से चार सौ लाइक भी मिल जाये ।
चमचम बिस्कुट, रसगुल्ला, लिट्टी और चंद्रकला की क्वालिटी ऐसी हो कि मैं फ़ेसबुकिया सहेलियों के ख़्वाबों का राजकुमार बन जाऊँ । मेरी दुकान पर रोज़ कोचिंग आते जाते नौजवानों की मोटरसाइकिलें खड़ी हो जाए । जो फ़ेल होने के बाद भी मेरी दुकान पर आएं और नाश्ते का दौर चले । दुकान पीपल के पेड़ के नीचे हो जिस पर नेताजी का पोस्टर हो । मेरी दुकान की शोहरत ऐसी हो जहाँ गांधी मैदान की रैली से लौटते नौजवान कार्यकर्ता ज़रूर आयें । मोदी और नीतीश पर विमर्श करते हुए चूड़ा घुघनी चट कर जाये ।
मैं कैश काउंटर पर अपने लकड़ी के बक्से के साथ मिलूँ । एक दो रुपये का खुदरा ऐसे माफ़ कर दूँ जैसे सरकार उद्योगपतियों के हज़ारों करोड़ का क़र्ज़ा माफ़ कर देती है और किसी से दस रुपया ऐसे वसूल लूँ जैसे कोई बैंक किसानों से क़र्ज़ा । मेरा सफ़ेद बनियान और टेरिकाटन का बुशर्ट ट्रेंड मार्क बन जायें । मैं चुपचाप एक ठहरे वक्त की तरह सबकी बातें सुनता रहूँ और अख़बार की बातों से मिलाता रहूँ कि ज़िले क़स्बे के इन युवा राष्ट्रीय नेताओं को कितना पता है ।
नाश्ते के उत्तम प्रबंध के साथ चाय का भी इंतज़ाम रहेगा । बैठने के लिए बेंच होगी और पानी के लिए तीन चार जग रख दूँगा । हरा और लाल रंग का जग । घड़े का पानी होगा । एक फ़ैमिली रूम भी होगा जहाँ कोई एकांत के साथ नाश्ता सके । वहां अमिताभ और रेखा का सिलसिला वाला पोस्टर लगा होगा । शाहरूख़ और काजल वाला भी । प्यार माँगा है तुम्हीं से .... अचानक ये गाना बज जाएगा और एक प्लेट घुघनी का आर्डर मिल जायेगा । पर्दा लगा होगा !
मेरे ये सपने उस ठंडी छांव की तरह हैं जहाँ मैं बड़े बड़े सपनों से कुचले जाने के बाद पनाह पाता हूँ । किसी बड़े शहर से घबराकर नाश्ता कार्नर में अपना एक शहर बनाता हूँ । मुझे सचमुच ऐसे सपने आते हैं । जिसमें किसी अनजान शहर से गुज़रने पर कोनेे के आख़िरी मकान में खुद को पाने लगता हूँ , किसी टेलर की दुकान में नीले साबुन से लकीरें खींचने लगता हूँ और फिर रेडियो सिटी पर आ रहे गाने में खो जाता हूँ । छोड़ो सनम काहे का ग़म हँसते रहो खिलते रहो....आओ मिलकर के यूँ बहक जायें कि आज होंठों की कलियाँ ....
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गलत फहमियों के सिलसिले इतने दिलचस्प हैं, 
कि हर ईंट सोचती है दीवार मुझपर टिकी है.
1.
Another wonderful evening with brilliant Anuj Pandey.
Thnx 
Vinod Nahar
 — with Anuj Pandey.