Monday, February 29, 2016

Posts of 28 Feb 16



शायद यह पूरे देश के लिए मुश्किल की घड़ी है जब हम अपने " बच्चों" पर भरोसा नही कर रहे, भारत माता को खींचकर गैंग रेप हो रहे है, सत्ता के मद में चूर लोग और नेता चुप है, संसद में गलत बयान दिए जा रहे है, मंत्री ऑन रिकॉर्ड झूठ बोल रही है, सबसे सम्पन्न लोग पिछड़े बनने की होड़ में संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे है, सरकारेँ उद्योगपतियों की गुलाम होकर अरबों रूपये के कर्ज माफ कर रही है, गरीब आदमी के चूल्हे को जलाने की दियासलाई में पूरी बेशर्मी से हर छह माह में टैक्स बढ़ाकर लिया जा रहा है, देश का सर्वोच्च शिखर पर बैठा आदमी दुनिया घूमकर थक चूका है इस कठिन समय में यह देश का रुपया बर्बाद करके खिलाड़ियों के साथ बच्चों से परीक्षा की बात करता है बजाय एक जलते हुए विवि में जाने के। गुरुओं को डंडे मारे जा रहे है, मुख्य मंत्रियों ने राज्यों को भ्र्ष्टाचार का अड्डा बना लिया है, कैसा शासन और प्रशासन है जिसकी पुलिस, अधिकारी, न्यायाधीश, विपक्ष, आम लोग एक सिरे से नाखुश और असंतुष्ट है, दुनिया भर के लोग रोज़ पत्र लिख रहे है, मीडिया भी कारगर भूमिका में नही है ? और आप खतरा भांप नही रहे, एक धार्मिक उन्माद में सच कहने वालों को संगठित भीड़ में निशाना बना रहे है।
एक बार फिर से पढ़िए क्या यह सब गलत है ?
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जो लोग मुझे ज्ञान देते है खासकरके भक्त और अंधे लोग जो दिल दिमाग की बातें छोड़कर जाहिल गंवारों की तरह से जब तब यहां चले आते है कमजोर और दलाली टाइप तर्क लेकर उनसे सिर्फ इतना कहना है कि मुझे ज्ञान ना दें, फेसबुक पर अरबों लोग है, वहाँ जाकर भड़ास निकाले, उल्टी करें और अपना दिमागी मवाद बहाये।
मेरी वाल पढ़ने को किसी डाक्टर ने नही कहा है और यदि कहा भी है तो go for second opinion. 
या तो मेरी सूची से स्वतः निकल लें बजाय कि मैं आपकी सार्वजनिक आरती उतारकर रुखसत करूँ !!! 
ज्यादा पढ़ाई लिखाई इतिहास और भाषा का दम्भ ना दिखाएँ और ना अपने पद का, मैं आपका गुलाम नही और ना ही आपके घटिया तर्कों के जवाब देने को मैं बाध्य हूँ ।

टेग ना करें यह करना आपकी ओछी और टुच्ची मानसिकता का परिचायक है।
समझ रहे है ना, ढपोर शंखियों ???

Monday, February 22, 2016

Posts of Feb 15 to 22 , 2016 Notes, Jottings on JNU Issues.......

हमने तो सिर्फ हाथ उठाया सलाम को, 
समझा उन्होंने इसमें है ख़तरा निज़ाम को

-अदम गोंडवी


क्या यह महज संयोग है कि जे एन यु में पांच छात्र पहुंचे और जाट आन्दोलन ठंडा पड़ा ?
किसको बेवकूफ बना रहे हो सरकार ? जनता तो बहुत मैच्योर हो गयी है आप लोग भी बड़े हो जाओ, सड़े गले बौद्धिक सुनना बंद कर के दिमाग की खिड़कियाँ खोलो और थोड़ा पढो - लिखो........कब तक खुद जाहिल बने रहोगे और जनता को बनाते रहोगे....... तुम चाहते थे कि एक ही तीर से दिल्ली, जाट और जेएनयु को साध लोगे.......मुगालते में हो तुम्हारी नाक के नीचे अरविन्द ने काम करके दिखा दिया एक साल में और वो भी बगैर कांग्रेस को कोसे और शीला दीक्षित को याद किये बिना और एक तुम हो जो भ्रम फैला रहे हो कि साठ साल के पाप धोने को समय चाहिए......हांहांहांहां.........अपने आप से तो सच बोल लो महाराज...
एक विश्व दीपक ने तुम्हारे और सुधीर चौधरी जैसे दलाल की पोल खोल दी, दस लड़कों ने नानी याद दिला दी, तुम्हारे खट्टर के राज में जाटों ने देश प्रेम दिखाकर संपत्ति का सत्यानाश कर दिया......गजब....
याद रखना तुमसे ज्यादा समझ और एक्सपोजर तो तीन साल जेएनयु में पढ़े एक युवा छात्र की होती है और वो इतना पढ़ लेता है तीन सालों में कि तुम्हारा दीनानाथ बत्रा सात जन्मों तक नहीं पढ़ पायेगा..........
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कल देवास में कबीर यात्रा देखी,100 लोगों की भीड़ के साथ चल रही यात्रा में आधे से ज्यादा परिचित लोग, दोस्त और पुराने साथी थे। जिस मकसद से हम लोगों ने 1992 में कबीर मण्डलियों के साथ काम शुरू किया था और एक अभियान बनाया था वह इस संगीत, रॉक और कैफे के बीच कही खो गया है। अफ़सोस यह भी है कि इसमें कई समझदार साथी अभी भी है, अच्छे लोग, युवा अपने व्यवसाय छोड़कर आये जरूर है पर ग्लैमर और चकाचोंध की दुनिया का भरम वो बनाये हुए है और कबीर लोक परम्परा से हटकर एलिट और विशेष लोगों का खास तरह के आडम्बर और ओढी हुई "सादगी" की बानगी बन गया है।
भजन अब गाने बन गए है और सूफीयाना स्वरुप प्रस्तुति - जो एक समूची परम्परा को ठेठ, गँवईपन को नष्ट कर रहा है। हालांकि दर्शक वृन्द अभी भी वही है जो कबीर गाता है - मेहनतकश और समाज में हाशिये पर पड़ा, शहरों में जरूर एक अभिजात्य वर्ग बना होगा पर हमारे कस्बे में कल नब्बे प्रतिशत वही लोग थे - जो विस्मित थे इस रॉक और कैफे को देख सुनकर। सिर्फ ताली बजाने और रॉक बैंड पर वाहवाही लूटने से कबीर यात्रा तो हो जायेगी पर कबीर जिस "ज्यों की त्यों धर दीनी" की बात करते थे या कहते थे "मौको कहाँ ढूंढे रे बन्दे" वह खो जाएगा। 
आपको क्या लगता है, आपने तो आनुषंगिक अनुसंधान किया है कबीर को आत्मसात करके डा Linda Hess, Purushottam Agrawal जी। मुझे मालूम है कि समय बदल रहा है, रुचियाँ बदल रही है, कबीरा बाजार में खड़ा है पर फिर कबीर गाने का या समझने का अर्थ क्या - जब ये ताकतें हावी होती रहे और उसी कबीर को रॉक और कैफे में तब्दील कर दिया जाए और हम पीछे खड़े हाथ मसोजते रह जाए ? मेरे लिए ये यात्रा एक पहेली बन रही है जो हर वर्ष किसी ब्राह्मणी संस्कार, कुळ धर्म की तरह से निकलती जा रही है और रहेगी !!!

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Apparently right time to use Right to Call Back.
Unfortunately our so called hippopotemous skinned Leaders know that one day people may use brutely, hence they are not passing it in parliament.
Alas we would have this right to exercise, we would have thrown away this 31% pseudo majority.

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बड़ा निकम्मा राज्य है हरियाणा, ससुरे राष्ट्रद्रोही वकील है सबके सब वहाँ, सड़कों पर आ नही रहे, क्या हुआ ???
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गुर्जर, जाट, मुसलमान, पटेल, वकील, युवा, मीडिया यानि सब देश द्रोही है और कांग्रेस ने साठ सालों में जो किया उसका पाप है ये सब !!!
तो आप कर क्या रहे है दो साल से ? बहुमत में आकर भी अपने घर के लोगों को नही सम्हाल पा रहे , ना पार्टी को, तो काहे मन की भड़ास निकालने को आये थे पार्टी में, दो साल में पेट भर गया दुनिया भर में हनीमून मनाकर ?
चुप क्यों हो, ये जो संपत्ति देश में खत्म हो रही है मेरे मृतक माँ बाप की मेहनत से चुकाए इनकम टैक्स से बनी थी, मेरा भाई जो मरने तक TDS चुकाता रहा उसकी मेहनत से बनी है, मैं जी तोड़ हम्माली करता हूँ सालभर दूर दराज के इलाकों में जाकर, और तुम्हारी ऐयाशियों के लिए टैक्स नही भरता और ना इन हरामखोर उपद्रवियों के लिए जो नंगा नाच कर रहे है,
सेना को लगाकर तुम गलती कर रहे हो ठीक वैसे जैसे मच्छर मारने को हथौड़ा इस्तेमाल करते है अनपढ़ लोग। बन्द करवाओ यह नाच और हिंसा, तुम चुप रहकर बरी नही हो सकते, इतनी घटिया राजनीति अगर इस देश के हुक्मरानों का चरित्र है तो शर्मनाक है।
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जाट आंदोलन भी राजनैतिक अपरिपक्वता, घटिया राजनीति और कमजोर नेतृत्व का परिचायक है। गुर्जर, जाट जैसी अगड़ी और आर्थिक रूप से सक्षम जातियों को आप तुष्टीकरण के तहत आरक्षण का झुनझुना दोगे तो हिंसा और बढ़ेगी।
मोदी को पार्टी के भीतर कितना विरोध झेलना पड़ रहा है, राजनाथ की कमजोर पकड़, बकैती और मोहन भागवत जी आरक्षण पर की गयी टिप्पणी ने मोदी को कमजोर और मजबूर कर दिया है कि वे भाजपा के भीतर ही घुटने टेक दें और वो सब करें जो एक आदर्शहीन राजनीति मूल्यहीन व्यवस्था बनाती है।
मोदी पर अब गुस्सा नही दया आती है, भारत का सबसे कमजोर, मजबूर और दयनीय प्रधानमन्त्री जो ना निहाल चन्द्र को हटा पाया ना शिवराज को, ना संघ को दबा पाया और हर मोर्चे पर बुरी तरह फेल चाहे जे एन यु हो, दिल्ली में हार हो, पाक मोर्चे पर मात हो या ये जाट आंदोलन। अफ़सोस !!! पुरानी कहावत थी ना - जो गरजते है वो बरसते नही !!! मिट्टी के शेर,

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डरे हुए सम्पादक, मरे हुए पत्रकार और बर्बाद हो चुके चैनल्स ज़िंदा और खुद्दार नागरिक तैयार करते है, जो लोग इस बात को नही मानते वे एक बार इन तीनों में से किसी को आजमा कर देख लें ।
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देखना एक दिन ये चैनल के एंकर ही एक दुसरे की हत्या कर देंगे तनाव और प्रतिद्वंदता में आख़िरी में खुद को गोली मारकर मर जाएंगे।
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रविश कुमार अगर इसी तरह से अच्छे कार्यक्रम करते रहे तो आधे से ज्यादा पत्रकार फ्रस्ट्रेशन में मर जायेंगे और इसमें बिहार के ज्यादा है जो बनना तो खुले, लगनशील और अकादमिक पत्रकार चाहते थे, कुल मिलाकर संघी, पराजित और घटिया किस्म के दो कौड़ी के आदमी बनकर रह गए और अब जो फेलोशिप जुगाड़कर नाम कमाया था या एनजीओ की पत्रिकाओं में चमके थे और अपना पेट यहां वहाँ मुंह मारकर भर रहे थे, अब भूखे मरने की हालत हो गयी है, अखबारों में रात पाली के बन्धुआ बनकर रह गए है जो सुबह सुबह अखबारों के बण्डल बांधकर घर लौटते है।
साल भर तक कुत्तों की तरह से जुगाड़ खोजते रहते है, मुफ़्त की यात्राएं, सेमीनार, झोले, पिठ्ठू बैग्स, छोटी मोटी राशि, और जुगाड़ ताकि दारु मुर्गे का खर्च निकल सकें या किसी बरगद की चापलूसी करके घास फूस खाकर ज़िंदा रहने की कोशिश करते है। नीच कर्म करके अपने को मुख्य धारा का पत्रकार बताने में गुरेज नही करते ये दलाल !!!
ना बेचारे अंग्रेजी सीख पाये , ना IIMC नई दिल्ली में पढ़ पाये, कुल मिलाकर माखनलाल , भोपाल में रहकर मख्खन लगाना सीख गए संघी गिरोह के मास्टरों से, जिससे बीबी बच्चे पाल रहे है। अधकचरा ज्ञान, भाषा और कुपोषित दिमाग लेकर रविश को कोसते है - करें भी क्या अन्धेरा दिलों दिमाग में छाया है ।
ओम थानवी जिंदगी में बन नही पाएंगे लिहाजा सुबह शाम ओम थानवी नाम से दस्त लगते है और रविश का निमोनिया हो जाता है। आनंद प्रधान को भी इन्ही टुच्चे लोगों ने कोसा था और इनकी नानी मरती थी उनके ज्ञान के आगे। ये लोग जीवन में हॉकर के बजाय डेस्क पर बैठ गये यही इनकी उपलब्धि है।
इन पर गुस्सा नही , दया आती है !!!!
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सबसे ज्यादा शर्मनाक यह है कि राष्ट्रवाद और देश भक्ति जैसे मूल्य आधारित बातों को बहुत घटिया तरीके से परोस दिया गया और पढ़े लिखे लोग जिसमे डाक्टर, इंजीनियर, वकील, अध्यापक और बाकी भी बहुत सतही तौर पर इनके झांसे में आ गए।
क्या देशभक्ति साली इतनी कमजोर थी कि ये साले टटपूंजिये टीवी एंकर, या नकल करके लॉ पढ़ा हुआ अठन्नी का धंधा करता वकील, अपने बाप के दो नम्बर से कमाए रूपये लगाकर व्यापमं से पढ़ा हुआ डाक्टर जो मुंह काला करके विदेश भाग गया बरसों तक और धन कमाकर लौट आया और अब हमे देशभक्ति सीखाएगा ? या कम पढ़े लिखे लोग हमे सिखाएंगे देश प्रेम और अब इन टुच्चों से राष्ट्रप्रेमी का प्रमाणपत्र लेंगे जो मुंह में गाली और दिमाग में ध्वंस और दिल में माँ बहनों के साथ बलात्कार करने का सपना देखते है।
चलो मान लिया , पर जो लोग भी इस बहाने सामने आकर नंगे हुए है उनकी बौद्धिकता, समझ, पढ़ाई, डाक्टरी, तकनीकी अक्ल और देश को लेकर क्या समझ और औकात है - साफ़ हो गया।
मुझे तो अच्छा लग रहा है, भाजपा और संघ का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने बाबरी मस्जिद से लेकर आज तक लोगों की पहचान करवाने में मदद की। इसी तरह से निर्भया काण्ड के समय भी महिला समानता और समता की बात करने वाले लोग सामने आये थे, अण्णा आंदोलन में एनजीओ और तथाकथित वामपंथी और कांग्रेसियों और समाजवादी क्रांतिकारियों की पहचान हुई थी।
सीखने के लिए इससे सस्ते और कारगर हथियार कहाँ और किसे मिलेंगे ? और इस कन्हैया ने तो सबको ही खुले मैदान में लाईन से खड़ा कर दिया, भारत की संप्रभुता, तीन सेनाएं, 125 करोड़ से ज्यादा लोग यानि मानव संसाधन - जिसमे 55 प्रतिशत युवा, बस्सी जैसे खस्सी धूर्त अफसर और सबसे ज्यादा विश्व का 56 इंची सीने वाला इतिहास में अनूठा एकमात्र प्रधानमंत्री जो दुनिया में दहाड़ता है, क्या इतने कमजोर है ये सब कि दस लोंडों से डर जाएंगे, अरे इन दस राष्ट्रद्रोहियों से तो मेरे मोहल्ले के कुत्ते ही निपट लेंगे जो पीछे पड़ गए तो, पकड़ो और एनकाउंटर कर दो वही तो करते है कुर्सी बचाने को, और इत्ता सब करके भी तुम्हारी नाक के नीचे से भाग गए , दिल्ली में तुम्हारे रमनसिंह का दंडकारण्य वाला छत्तीसगढी जंगल तो नही है ना ?
छोडो गुरु - जाटों को सम्हालो, जो तुम्हारे पड़ोस में आग लगा रहे है और तुम किसानो को फसल बीमा देने का झुनझुना बजाने की कोशिश में हो !!! शिवराज जैसे मुख्यमंत्री की पीठ पर हाथ धरते हो जो बारह सालों में भृष्ट अफसर , चपरासियों और पटवारियों का सरगना है, व्यापमं में हुई मौतों का जिम्मेदार है, खनिज घोटालों में लिप्त है। देश में तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके है पिछले दो सालों में, उस पर कुछ नही कहोगे ? एक बलात्कारी केबिनेट मंत्री है अभी भी - यह कौनसा राष्ट्रप्रेम है ?
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एनडीटीवी पर अन्धेरा।
यह देखकर आपातकाल के समय खाली छोड़ दिए गए संपादकीय पृष्ठ याद आ गए।
कौन जिम्मेदार है इस सबका ? कम से कम रविश कुमार में इतनी तमीज बची है कि पूरी मीडिया में कुछ जाहिलों जैसे दीपक चौरसिया, सुधीर चौधरी, रोहित सरदाना, अर्नब गोस्वामी और सुदर्शन चैनल जैसे बिकाऊ लोग और इस तरह के लोगों के लिए उन्होंने आज अपने कार्यक्रम में अन्धेरा रखा है।
यह पश्चाताप हम सबका है और हम इस तरह के सभी चैनलों और एंकरों द्वारा किये कुत्सित प्रयासों की निंदा करते है, ऐसे सारे वकीलों की निंदा करते है जो क़ानून का खिलवाड़ करके आम लोगों में ख़ौफ़ पैदा कर रहे है।
मैं सुप्रीम कोर्ट और संविधान में पूर्ण आस्था रखते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश और राष्ट्रपति से अनुरोध करता हूँ कि तुरन्त हस्तक्षेप करके देश को और मुसीबत में जाने से, ऐसे कट्टरपंथी लोगों से, विचारधारा से बचायें ।(19 Feb)
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जाट आरक्षण कुचलकर दिखाओ और मेरे इनकम टैक्स के रुपयों से बनी संपत्ति को बचाओ। नई उम्र के बच्चों पर तो खस्सी को ढाल बनाकर बहुत नोटँकी कर ली महाराज, दम हो तो इन अगड़े और रईस जाटों को रोको ये जो राष्ट्र की सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे है यह कौन सा राष्ट्रपुण्य का कार्य है ? कमजोर, निहत्थे और तुमसे ज्यादा पढ़े लिखों पर तो बहुत गुंडागर्दी करवा ली भाड़े के अनपढ़ काले कौवों से , अब देश के विकसित राज्य के इन जाटों को कब्जे में कर के बताओ जिन्होंने आज रोहतक जैसे शांत शहर में आज तांडव किया और एक मंत्री के घर में भी आगजनी की।
वाह रे देश प्रेमियों !!! छद्म राष्ट्रवादियो !!!!

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2012 में दिल्ली में हुआ निर्भया काण्ड और ठीक चार बरस बाद कन्हैया काण्ड। भीड़ अब हर काण्ड को उत्सव की तरह लेती है चाहे अन्ना आंदोलन हो या किसी नेता की रैली।
शायद हम सीखते नही है, बातचीत के खुले मंच खत्म हो गये है, हम अपने घरों में ही बात नही कर पा रहे, समाज में, विश्व विद्यालयों में तर्क, अभिव्यक्ति, कहन के मौके खत्म हो गए है। सबसे बड़ा अफ़सोस यह है कि धैर्य खत्म हो गया है बस टूट पड़ो और भीड़ का हिस्सा बन जाओ।
अब समय आ गया है जब हर तरह के विचार, तर्क और आईडिया को युवा, किशोर और समाज के लोगों तक ले जाए, खुले मन से बात करें । लेखक , राजनैतिक लोग, प्रशासक, बुद्धिजीवी, किसान, मजदूर, पत्रकार और महिलाये भी खुले मैदान में आये अपनी बात रखें, सुने सबको, सब बोले।
अभी अनुज गैरी ( Nabil K Singh) ने यह अच्छा सुझाव दिया कि क्यों ना इस कठिन समय में हम खुले मैदान में, प्रांगणों में चर्चा सत्र रखे और जमकर बहस करें, सीखें, सबको सुनें और फिर देखें कि क्या हमारा स्तर बढ़ता है, अब भाषा की नही अभिव्यक्ति के स्तर को सुधारने और सीखने की बात है।
सबसे पहले मैं खुद खुले मन से सीखने को, धैर्य से सुनने को, समझने को तैयार हूँ। आईये हम कोशिश करें कि इस कारवां को आगे बढ़ाये।
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370 खत्म करना, नार्थ ईस्ट में शान्ति, राम मन्दिर , 15 लाख हरेक के खाते में लाना, काला धन देश में वापिस लाना, महंगाई कम करना, सबको शिक्षा, रोजगार और आवास, भ्र्ष्टाचार मुक्त भारत - ये आपके मेनिफेस्टो के पहले दो तीन पृष्ठों की बाते है, आगे अभी बहुत बाकी है।
क्या हुआ तेरा वादा, वो कसम वो इरादा ? अब यह मत कहना कांग्रेस ने क्या किया साठ साल।
छोडो मरने दो कान्हा कन्हैया और ससुरे वाम पंथियों को, देशद्रोहियों को फांसी दे दो , पर गुरु इन मुद्दों पर जवाब दो,

Monday, February 15, 2016

जेएनयु के बहाने देश की शिक्षा और सन्दर्भों पर पुनर्विचार का समय - Post of 15 Feb 16



जेएनयु के बहाने देश की शिक्षा और सन्दर्भों पर पुनर्विचार का समय


ये देश क्या होता है और कितने लोग जानते बूझते है देश, देश प्रेम और देश द्रोह का सही अर्थ, जिस देश में सरकार के कारण रोहित वेमुला को मरना पड़े या  एक गरीब छात्र कन्हैया को गिरफ्तार होना पड़े अपने ही विश्व विद्यालय से एक ऐसे कृत्य के लिए जिसमे उसका कोई दोष ही नहीं, बल्कि दोष यह है कि वह चुनी हुई छात्र परिषद् का अध्यक्ष है, उस देश में इससे ज्यादा शर्मनाक नहीं हो सकता. जिसने नारे लगाए उसे पकड़ना छोड़कर निर्दोष को पकड़ना सिर्फ कमजोरी दर्शाता है और हर तरफ से बैकफूट पर आ चुकी सरकार की गहरी हताशा और कुंठा. देश में आजादी के बाद संभवतः यह पहला अवसर है जब मोदी जी को लखनऊ से लेकर दिल्ली तक छात्रों के समूहों का विरोध झेलना पड़ रहा है.



थोडा गहराई में जाए तो हम पायेंगे कि ये समूचा आन्दोलन रोहित वेमुला की मौत के बाद उठे दलित आन्दोलन को कुचलने की परिणिति के तहत उभरा है और अब यह साफ़ है कि जे एन यु के बहाने सरकार दलित आन्दोलन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नकल कसने की जोरदार तैयारी में है. छदम हिंदुवादियों और फासिस्ट ताकतों का गठजोड़, कांग्रेस और वामपंथी दलों का चुप रहना बहुत घातक है इस समय. यह पढ़े लिखे लोगों के खिलाफ कम पढ़े लिखे लोगों के द्वारा अपनी एकमात्र विचारधारा को थोपने और यदि नहीं माने तो जेल से लेकर ह्त्या कर देना या आत्महत्या के लिए उकसाना भी राज्य करवा सकता है यह शायद इस पूरे घटनाक्रम से सीख निकली है जोकि बेहद खतरनाक है. 

 

कितना लाचार है इस सरकार का हताश तंत्र जिसका गृह मंत्री बाकी सारे महत्पूर्ण काम छोड़कर एक विवि में पीछे समय लगा रहा है, और एक फर्जी ट्वीटर के जरिये को विश्वसनीय मानकर इस घटना का समबन्ध हाफिज से बता रहा है. काश कि गृह मंत्री यह समझ पाते कि यदि ऐसा कुछ हुआ भी है तो ये युवा देश के और अपने ही समाज से आये है जिन्हें समझाने की जरुरत है बजाय इस तरह की बयानबाजी करने के वे खुद विवि में जाते और बात सुनने का प्रयास करते. काश कि राजनाथ सिंह यह दम पाकिस्तान के सामने दिखाते तो सच में मोदी जी का छप्पन इंच का सीना दमकता.......दम होता तो जाते और दाउद को ले आते,  नवाज शरीफ से पंगा लेते, दिल्ली में हार जाने का अपराध बोध, अरविन्द की लोकप्रियता से जल भुनकर इस हद तक आ गए कि एक गरीब घर के बच्चे को गिरफ्तार कर लिया, ऊपर से दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बस्सी और उनकी फौज को इस्तेमाल करके अपनी छबि कब तक चमकाने लग गए.


सन 1991-92 में आडवानी ने रथ यात्रा निकालकर मंडल आयोग की रिपोर्ट को कमजोर किया था और प्रमाणपत्र बांटे थे नागरिकता के, प्रगतिशील लोगों ने तब भी आडवानी से नही माँगा था और आज रोहित की मौत के बाद ये अपनी हताशा और कुछ ना कर पाने की बेबसी को जेएनयू के बहाने समूचे दलित और वंचित आन्दोलन को कमजोर करना चाहते है, गांधी को कितनी बार मारोगे, पूरी दुनिया देख रही है, जो छबि तुमने बनाई थी विकास और गति की वह औंधे मुह पडी है आज गटर में, और यह भी कि दो साल के पहले ही कितना विध्वंस कर दिया देश का और हजार साल पीछे पत्थर युग में ले गए हो.......
गाली गलौज और बदतमीजी से यदि समस्याएं सुलझ सकती तो अमेरिका सिर्फ गालियों का ही आयात निर्यात करता, जब कहता हूँ कि कूढ मगज और अधकचरे दीनानाथ प्रदत्त इतिहास और संस्कृति ज्ञान की रट्टा मार परीक्षाएं पढ़कर आये ज्ञान से और एक विशेष कुंठित विचार धारा से पढ़कर आये शिक्षालयों के प्रोडक्ट ऐसे ही निकलेंगे. भ्रष्ट और हत्यारे सिपहसालार, तुम्हारे मुख्यमंत्री, बलात्कारी मंत्रियों की फौज, जुबान पर काबू खो चुके केबिनेट मंत्रीगण, तुम्हारे उद्योगपति, तुम्हारे नेताओं और मंत्रियों का व्यापमं के बहाने, नक्सलवाद के बहाने, जरुरी वस्तुओं, दवाईयों और पेट्रोल - डीजल के भाव बढाने का खेल या टैक्स चोरी का खेल अब समझ आ रहा है आम आदमी को - इसलिए अपढ़ और लठैत ब्रिग्रेड की बौखलाहट और हताशा जाहिर है सामने आना ही थी.
जे एन यु देश का एकमात्र विश्व विद्यालय है जिसकी छबि अंतर्राष्ट्रीय  स्तर पर है जहां दुनिया के कोने कोने से छात्र पढ़ने आते है और यहाँ अंतर्राष्ट्रीय विकास राजनीती और समाज विज्ञान का अध्ययन होता है. कब तक यह सरकार और मानसिकता भारतीय विश्वविद्यालयों को माखनलाल पत्रकारिता भोपाल में बिठाई चोकडी की तरह कब्जा करके हथियाने के ख्वाब संजोती रहेगी, ये सरकार  कब तक आम लोगों को जरुरी चीजों से महरूम रखेगी, कब तक अघोषित आपातकाल लगाकर कांग्रेस के साठ साला शासन को कोसकर समय माँगते रहेगी, गांधी के हत्यारे गोडसे के जश्न मानाने वालों को छुट देकर वल्लभ भाई पटेल की मूर्ती बनाने का काम करती रहेगी, असलियत सामने है और लोग तय करेंगे.....


सरकार की मंशा यह है कि  जे एन यु को इस तरह से बदलना चाहते है जैसे काशी विवि के मुख्य द्वार से सञ्चालन निकलता है ठीक उसी की तरह से जे एन यु भी बदल जाए. मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह लगता है कि यह सब राजनाथ सिंह का किया धरा बवाल है जो अब प्रधान मंत्री बनना चाहते है और इसलिए बाकि सारे काम छोड़कर इनकी इच्छाएं बलवती हो रही है. जानते है ना कि आडवाणी कभी बन ही नही पाएं और समझ गए है कि 2019 में वापिस आने की संभावना कम है। 
भाजपा के अंदर की अंतर्कलह सामने है और मोदी जी को जितना खतरा पाक से नही जितना भाजपा से है तभी वे अमित शाह के अलावा किसी और पर विश्वास नही करते, खैर राजनाथ ने अभाविप के गधो द्वारा लगाये पाक जिंदाबाद नारों को उनके मित्र हाफिज सईद से जोड़ा है और उसके ट्वीटर अकाउंट का हवाला दिया है वह उनकी योग्यता और कुशलता का प्रमाण है। उप्र भाजपा से लगभग निष्कासित राजनाथ के पांसे उलटे पड़े है. देश की बेरोजगारी, भुखमरी, कुपोषण, गरीबी, महिला हिंसा से लड़ो........दम है तो शिक्षा में बदलाव लाओ......कब तक मुद्दों से भटककर उद्योगपतियों को मदद करते रहोगे, कब तक दलितों को कुचलने के कुत्सित प्रयास करते रहोगे?
क्या यह सही समय नही जब हम जैसे लोगों को सब छोड़कर सड़कों पर आना चाहिए और जलेस, प्रलेस, जसम, और समान विचारधारा के लोगों को सामने आकर लोगों को बताना चाहिए। हमारे कई साथी पक्की सरकारी नोकरी, बैंक, कार्पोरेट्स, पी एस यु आदि में रहकर दुदुंभी बजाते है और बाहर आकर रुदालियों की तरह से गीत गाते है, जन के लिए कविता- कहानी लिखते है, और जनपक्षधरता की बात करते है। असल में दोमुंहापन वाम दलो और प्रगतिशीलों का जीवन चरित्र बन गया है और ऐसे समय में जब सब कुछ नष्ट हो रहा है तो क्यों नही इन्ही की तरह सड़कों पर आते है ? दिक्कत यह है कि इन्ही गाली देने वाले वामियों ने इसी सरकार से अरबो रुपयों की जमीन हासिल की है और मठ बनाकर बैठे है, बड़ी संस्थाएं को हथियाकर बैठे है, विश्व विद्यालयों में पद और पीठों पर आसीन है और वाम की छाती पर पैर रखकर वे सत्ता का भोग कर हवाई यात्राओं से लेकर जीवन की लक्ज़री बटोर रहे है और पद्म पुरस्कारों की होड़ में है।दर्जनों लोगों को मैं जानता हूँ जो नासूर है और वाम की रोटी खाकर वाह वाही लूट रहे है और धन बटोर कर आने वाली सात पीढ़ियों को कुबेर बना दिए है। वाम दलों को अपना आत्म मन्थन करना चाहिए ताकि दूसरों से लड़ने के पहले खुद "ताकत" प्राप्त करें ।


विश्व विद्यालयों को ज्ञान और खुलेपन का प्रतीक होना चाहिए जहां हजार प्रकार के विचार जन्में, सैंकड़ों प्रयोग हो, नवाचार हो और छात्रों को नित नया ज्ञान मिले और वे देश हित के लिए अपनी मानसिकता बना सकें. यदि शिक्षा के मंदिरों में पुलिस राजनीती, कूटनीती और छदम बुद्धिजीविता प्रवेश कर जायेगी तो फिर सीखने को बचेगा क्या, लोकतंत्र की खूबसूरती ही यह होती है कि वह सब तरह की विचारधारा प्रयोग और नवोन्मेषी विचारों को स्थान देता है. आईये इन सारे संदर्भो और प्रसंगों को देखते हुए 'जनशिक्षा" को पुनः परिभाषित करें और व्याख्या करते हुए नई इबारतें लिखें ।
-संदीप नाईक

स्वतंत्र टिप्पणीकार 

Friday, February 12, 2016

Posts of 12 Feb 16

जिस देश में सरकार के कारण रोहित को मरना पड़े या या कन्हैया को गिरफ्तार होना पड़े उस देश में इससे ज्यादा शर्मनाक नहीं हो सकता. जिसने नारे लगाए उसे पकड़ना छोड़कर निर्दोष को पकड़ना सिर्फ कमजोरी दर्शाता है और हताशा.

अब समझ गए ना कि पढ़े लिखे छात्रों के खिलाफ कम पढ़े लिखे लोग किस स्तर पर उतरकर एक बड़ी संपत्ति पर कब्जा करना चाहते है और समूचे दलित आन्दोलन को कुचलना चाहते है.

कितना लाचार है सरकार का हताश तंत्र जिसका गृह मंत्री बाकी सारे महत्पूर्ण काम छोड़कर एक विवि में पीछे समय लगा रहा है. यह दम पाकिस्तान के सामने दिखाएँगे तो सच में छप्पन इंच का सीना दमकेगा....... कमजोर को दबाकर क्या दिखा रहे हो सरकार?

दम हो तो जाओ दाउद को लाओ, नवाज शरीफ से पंगा लो, दिल्ली में हार जाने का अपराध बोध, अरविन्द की लोकप्रियता से जल भुनकर इस हद तक आ गए कि एक गरीब घर के बच्चे को गिरफ्तार कर लिया वाह रे मर्दों............

दिल्ली पुलिस को इस्तेमाल करके अपनी छबि कब तक चमकाओगे जनाब.......?


देश की बेरोजगारी, भुखमरी, कुपोषण, गरीबी, महिला हिंसा से लड़ो........दम है तो शिक्षा में बदलाव लाओ......कब तक मुद्दों से भटककर उद्योगपतियों को मदद करते रहोगे, कब तक दलितों को कुचलने के कुत्सित प्रयास करते रहोगे?

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सन 1991-92 में आडवानी ने रथ यात्रा निकालकर मंडल आयोग की रिपोर्ट को कमजोर किया था और प्रमाणपत्र बांटे थे नागरिकता के, हमने तब भी आडवानी से नही माँगा था और आज रोहित की मौत के बाद ये अपनी हताशा और कुछ ना कर पाने की बेबसी को जेएनयू के बहाने समूचे दलित और वंचित आन्दोलन को कमजोर करना चाहते है, गांधी को कितनी बार मारोगे, पूरी दुनिया देख रही है, जो छबि तुमने बनाई थी विकास और गति की वह औंधे मुह पडी है आज गटर में, और यह भी कि दो साल के पहले ही कितना विध्वंस कर दिया देश का और हजार साल पीछे पत्थर युग में ले गए हो.......

गाली गलौज और बदतमीजी से यदि समस्याएं सुलझ सकती तो अमेरिका सिर्फ गालियों का ही आयात निर्यात करता, जब कहता हूँ कि कूढ मगज और अधकचरे दीनानाथ प्रदत्त इतिहास और संस्कृति ज्ञान की रट्टा मार परीक्षाएं पढ़कर आये ज्ञान से और एक विशेष कुंठित विचार धारा से पढ़कर आये शिक्षालयों के प्रोडक्ट ऐसे ही निकलेंगे तो समझ आता है कि इन मूर्खों से उलझने से कोई फ़ायदा नहीं है गदर्भाधिराज वही रहेंगे और इनकी देशभक्ति सिर्फ उलझने में है, तर्क इनके बस का नहीं क्योकि नागपुर की गैंग इन्हें यही सीखाती है बचपन से, लाठी से पीया तेल आखिर कब जोर मारेगा ?
तुम्हारे भ्रष्ट और हत्यारे सिपहसालार, तुम्हारे मुख्यमंत्री, बलात्कारी मंत्रियों की फौज, जुबान पर काबू खो चुके केबिनेट मंत्रीगण, तुम्हारे उद्योगपति, तुम्हारे नेताओं और मंत्रियों का व्यापमं के बहाने, नक्सलवाद के बहाने, जरुरी वस्तुओं, दवाईयों और पेट्रोल - डीजल के भाव बढाने का खेल या टैक्स चोरी का खेल अब समझ आ रहा है आम आदमी को - इसलिए तुम्हारी अपढ़ और लठैत ब्रिग्रेड की बौखलाहट और हताशा जाहिर है सामने आना ही थी.
कब तक तुम विश्वविद्यालयों को माखनलाल पत्रकारिता भोपाल में बिठाई चोकडी की तरह कब्जा करके हथियाते रहोगे, कब तक आम लोगों को जरुरी चीजों से महरूम रखोगे, कब तक अघोषित आपातकाल लगाकर कांग्रेस के साठ साला शासन को कोसकर समय माँगते रहोगे, अब तुम देश में फ्रांस से किसी बाप को बुला लो या ओबामा को, पाकिस्तान के नाम पर बरगालाओ या इशरत जहां को उसकी मौत के बाद बारह साल बाद भुनाओ, गांधी के गोडसे का जश्न मनाओ या सावरकर के गुण गाकर पटेल का स्तुप बनाओ - असलियत सब सामने है अब गुरु.........
असलियत सामने है और लोग तय करेंगे.....
भक्त, जाहिल और उज्जड लोग यह ना पढ़े और ना अपने दिमाग का कूड़ा मवाद यहाँ उन्डेले - वो स्वच्छ भारत की जागीर है वहाँ जाकर उल्टी करें......वरना कमेन्ट डिलीट कर दिया जाएगा..........

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Out Look 1 to 15 Feb 16 Thanks Akansha Pare 

Tuesday, February 2, 2016

Posts of 29-31 Jan 16


मुझे भी शुमार करो अब गुनहगारों की फेहरिस्त में....
मैं भी क़ातिल हूँ हसरतों का, मैंने भी ख्वाहिशों को मारा है..


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एक तो फ्री में लिखवा लेते है दबाव डालकर और फिर जब मिलते है तो गोली मारने की भी धमक्री देते है , ये तो हाल है मीडिया के नामी गिरामी संपादकों के। ये श्रीमान जो छोटे लाडले नवाब और अनुज है बेदर्द दिल्ली में रहते है मिले 15 साल बाद तो बन्दूक तान दी , गजब हो यार - Sarang Upadhyay । आज मजा आ गया। इनके शहर और मुहल्ले में था ना। देवास आओ मियाँ फिर देखते है 


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ये है ढोंग पाखण्ड और शर्मनाक दुनिया जिसमे हम रहते है। एक व्यक्ति मरता है और उसके लिए समाज के लोग करोड़ो रुपया खर्च करते है नीचे लिखे रीति रिवाजों पर और यही लोग ब्याज की चवन्नी भी नही छोड़ते। मप्र के बड़े अखबार नईदुनिया में आज की लीड स्टोरी है, कोई मन गढ़न्त कहानी नही है।
तिस पर से आज जब समाज के बच्चे कुपोषण और भूख से बिलबिला रहे है तो करोड़ो रूपये के मन्दिर बनाने का क्या तुक है। देश भर में यहां तक कि मालवा में गोम्मटगिरी से लेकर पुष्पगिरी तक जैसे मन्दिर बने है, पूरी की पूरी पहाड़ियाँ उजाड़कर अपने मठ बना लिए फिर इन मन्दिरों की जरूरत क्या है ? जिस विश्व कल्याण की बात ये समाज करता है वह कौनसा समाज है, विदिशा का एक सात साल का बच्चा दिल के छेद का इलाज नही करवा पाता और मर जाता है अभाव में, तब कोई भला मानुष आगे नही आता।
और यह सिर्फ एक समाज की नही सारे धर्मों और समुदायों की है, इंसानों के रहने की जगहें बजबजाते गन्दे नालों में है और मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च बीच शहरो में जमीन हथिया कर बैठे है।
विचलित हूँ पुष्पेन्द्र की खबर देखकर और ये ढोंग देखकर। शर्म आती है ऐसे देश का नागरिक होने पर जहां ज़िंदा बच्चे और आदमी की कदर नही और एक मरे हुए संत को मुखाग्नि देने के लिए करोड़ों की "बोली" लगती हो।
धिक्कार है ऐसे मुर्दा समाज पर , न्याय और शासन प्रशासन पर जो इस तरह की मौत के खुले जुए और सट्टे को प्रश्रय देता हो।
मप्र में यह सत्ता और राजनीति की शह पर ज्यादा हो रहा है, क्योकि निर्णायक लोग तो व्यापमं से जान छुड़ाने के रास्ते खोज रहे है और बच्चे मर रहे है।
एक बात और ये आयकर विभाग इस तरह के मामलों में क्या करता है जो लोग खुले आम इस तरह के कार्यक्रमों में, दीक्षा समारोह , पर्युषण और अन्य बोली लगाने वाले वणिक समुदाय के धन लोलुप धार्मिक रीति रिवाजों में रुपया लगाते है।
विदिशा के बच्चे की लाश और एक बेशर्म महिला अधिकारी द्वारा उसके पिता को दिए गए शासन प्रदत्त दो हजार रूपये कोई मायने रखते है इस शाही मौत के सामने ?
कितना और गिरेंगे हम और कितने बच्चों की जान लेंगे, शिवराज सिंह जी कितने और लोगों को अंधा करके अपनी कुर्सी बचाकर रखोगे, कब तक इस तरह के कार्यक्रमों को भव्यता दोगे ? याद रखना अगर भगवान मानते हो, मैं तो नही मानता, पर सुना है उसकी लाठी जब पड़ेगी तो आवाज भी नही होगी।


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धूप का सौंदर्यशास्त्र 30 Jan 16



ये जो पके हुए बैरो की खटास जो घुलमिल जाती है धूप से लेकर हवाओं में वो पता नही कब गायब हो जायेगी , अब से मेरे ख़्वाबों में वो अमराइयाँ आ रही है जो लखनऊ से हरदोई जाते समय मलीहाबाद की सड़कों पर गमकती थी मीठे और मदहोश करने वाले नशे की तरह, आज भी इस मालवे में उस नवाब को ढूंढता हूँ जो एक आम का पेड़ मेरे ख़्वाबों में लगा दे और मैं उन कच्ची डालियों पर उचक कर तोड़ लूँ एक बड़ा सा पीला आम छुटपुटे में और भाग जाऊं किसी चोर की तरह और खाता रहूँ देर तक गुठली को और फाँकों को सजाकर रख दूं अपने दिल के आले में !!!

दूर कही से सूरज की रुपहली किरणें पड़ती है तो चारो ओर फ़ैली यह मखमली हरियाली और मुखर हो उठती है, ये गेहूं की झूमती बालियाँ ऐसा तान छेड़ती है कि सडकों और गलियों से निकलती हवा रुक जाती है ठहठहाकर, भंवरें बावरे से होकर गुनगुनाने लगते है, मधु मख्खियाँ फूलों का रस छोड़कर टूट पड़ती है इस मखमली हरियाली पर और आकाश में उड़ते पक्षी कलरव गान शुरू कर देते है, ये बसंत का मधुमास है और पूरी फिजां में खामोशी पसारती हंसी ने छोटी छोटी पत्तियों को हिलाकर रख दिया होगा पूरे बियाबान में, इस बंद कमरे के बाहर मौसम बदल रहा है और यहाँ सदियों से पसरी मुर्दानगी भरी वीरानी छाई है, यह पेड़ के तनों से पुराने पत्ते बिखरने का और नयी कोपलें आने का वक्त है, हरी पत्ती के पीले जर्द हो जाने से और इसी जर्द आवारा पत्ती के अब धूप और हवा में दूर तलक बह जाने का खूबसूरत मौसम है, आओ बसंत का स्वागत करे, दूर सूरज ने भी लाल छोड़कर पीला रंग ओढ़ लिया है.........और चाँद कही पीली आभा में इतरा कर निकला है

#धूपकासौन्दर्यशास्त्र