Sunday, December 29, 2013

महंगाई के समय में सस्ते इलाज के लिए इंजिनियर की दरकार





एक  बहुत पुराना और प्यारा सा दोस्त है देश के जाने माने शिशु रोग विशेषज्ञों में उसकी गिनती है जब हम लोग छोटे थे तकरीबन नवमी, दसवी में तब से वो डाक्टर बनने के सपने देखता. खूब जी तोड पढाई करके वो डाक्टर बना और पिछले बीस  बरसों से वो अपोलो, एस्कार्ट, फोर्टीज और मियो जैसे बड़े संस्थानों में काम कर रहा है. पिछले कई दिनों से वो कह रहा है कि यार संदीप मै जो कर रहा हूँ उसमे मजा नहीं है रूपया बहुत है पर जिन बच्चों का मै इलाज करता हूँ  वो सब विदेशी है और मुझे अपने इलाके के बच्चों का दर्द महसूस होता है. धार- झाबुआ-बड़वानी जैसे इलाके में बच्चे कुपोषण से मर जाते है शर्म आती है मुझे अपने पढाई और ज्ञान पर, कुल मिलाकर लब्बो लुबाब यह निकला कि हम दोनों मियाँ बीबी मिलकर एक ऐसे बच्चों का अस्पताल  खोलना चाहते है जहां विश्व स्तर की सुविधाएं हो, निशुक या  न्यूनतम शुल्क पर हो और पिछड़े इलाकों में लोग इसका इस्तेमाल करें- कोई बच्चा इलाज के अभाव में दम  ना तोड़े. 

अब  सवाल कई है यह दोस्त कहता है कि आई सी यु की भीतर की मशीने महंगी है और जो कंपनिया इन्हें बेचने का धंधा करती है वो लागत मूल्य से कई गूना ज्यादा वसूलती है, क्या हिन्दुस्तान में आई आई टी या कोई ऐसे इंजिनियर है जो उसकी मदद करें सस्ती मशीने बनाकर दें जैसे कंप्रेस्ड एयर के लिए छोटी मशीन की जरुरत है जिससे डिस्पोजेबल वेंटीलेटर बनाए जा सके जिससे जिन्दगी के चांसेस ज्यादा हो जाते है और ये सस्ते होने चाहिए. डाक्टर  दोस्त बहुत ईमानदारी से अच्छे इंजिनियर तलाश रहा है जो कुछ मशीने बनाने में मदद कर सके. वो कहता है या तो मै मेडिकल छोड़कर फिजिक्स में चला जाऊं और काम करूँ या मै ऐसे कुछ सरफिरे इंजीनियर्स को बताता रहूँ और मशीने बन जाए ताकि इलाज बिलकुल सस्ता हो जाए जैसे मात्र दस रूपये या सौ रूपये. 

ध्यान  रहें कि यह डाक्टर दोस्त नवजात शिशुओं के ह्रदय रोगों का फिजिशियन ही नहीं देश के छः सात सर्जनों में से एक है और सालाना तनख्वाह करोड़ होगी, पर उसे लगता है कि वो अपने इलाके के बच्चों को कुछ दे नहीं पा रहा. पति पत्नी दोनों इस पेशे में जितने काबिल है उनका समर्पण और ईमानदारी काबिले तारीफ़ है. आपकी नजर में कोई ऐसा सिरफिरा इंजिनियर है?  एक प्रतिष्ठित और रचनात्मक इंजिनियर अरविंद गुप्ता का नाम मैंने सुझाया है जो विज्ञान में खिलौने बनाते है मशीने भी पर इस बारे में अरविंद के अतिरिक्त........कोई और आपकी निगाह में हो जों इस काम में मदद करें, जूनून की तरह लगकर तो हम सब साथ है. रूपयों की कमी नहीं है और हाँ इज्जत और बाकी सब भी मिलेगा नाम, यश और पेटेंट भी........ सवाल मदद का है. 

जितनी  जल्दी हो सके बताईये चाहे वो दुनिया के किसी कोने में हो अगर जज्बा और जूनून है तो दूरी मायने नहीं रखती और गर्व है अपने प्यार दोस्त पर,और हाँ यदि किसी को कोई बच्चा  शिशु रोग से पीड़ित खासकरके ह्रदय रोग वाला तो मुझसे बिंदास संपर्क करें. धन्यवाद मित्रों.

संदीप नाईक 

Saturday, December 28, 2013

सत्ताईस बरसों के काम के कुछ अनुभवों का निचोड़


भगवान  के लिए एक बार अपने जीवन में झांककर देखिये कभी तो आपको कोई बेहतरीन रचनात्मक सुझाव या विचार दिमाग में आया होगा.......बस उठाईये कलम और घिस डालिए चार-छः पन्ने और फिर इन्ही पन्नों को जीवन भर चलाते हुए अपने को इतना महान बना दीजिये कि बेचारे गरीब लोग आपको उत्कृष्ट बना दें, आपको महान व्यक्ति का दर्जा दे दें और फिर दुनिया भर के लोग आपको रूपया पैसा देने को तैयार हो जाए (भले ना दें पर आप कम से कम यह तो हर बार कह ही सकते है कि इस बार मेरे पीछे कई लोग पड़े है कि फंड ले लो, फंड) और फिर उन्ही चन्द पन्नों को जोड़ जाडकर पोथे बनाते रहे और इस तरह ताजिंदगी आप बेहतरीन, नए विचारों वाले, खुले स्वतंत्र और बढ़िया व्याभिचारी-कम-नवाचारी शख्स तो इस भारत जैसे देश में बन ही सकते है क्योकि यहाँ सब चलता है धंधा है, गंदा है, और फिर आप तो आप है गधे के.............!!!


दस्तावेज, रपट और लिखने पढ़ने के नाम पर आप बहुत सालों तक दुनिया को विशुद्ध रूप से बेवक़ूफ़ बना सकते है. मैंने अपने जीवन में कईयों को सारी उम्र एक ही तरीके से, एक ही विचार पर लिखते-पढ़ते और चुतिया बनाते हुए देखा है, इनकी झोली में दुनिया भर की सामग्री के नोट्स, फोटोकॉपी और चन्द पन्नें होते है जिनके सहारे इनकी उम्र बीत जाती है. ये ना एक लाइन लिख पाते है ना कुछ सार्थक गढ़ पाते है. बस बकलोल किस्म के चन्द मार्केटिंग वाले लोग इन्हें महान बनाकर इनके साथ अपनी भी रोजी रोटी चलाते रहते है. दूसरा रपट, दस्तावेजीकरण का धंधा जोरो से देश में पनपा है जिसका कुछ सर पैर नहीं होता. लोग एक बात को इतनी बार लिखते है कि मूल कृति की ह्त्या हो जाती है और ड्राफ्ट पर ड्राफ्ट बनते रहते है जिसको ठीक करने में बेचारे कुछ लोग ठीक उस मुसहर की तरह हो जाते है जो गाय के गोबर के बड़े भारी पोटे में से गेहूं के कुछ अधकच्चे दाने चुनता है और अपना करम बार बार ठोकता है कि हे भगवान क्यों मेरे जिन्दगी में यह काम मेरे मत्थे मढ दिया और कुछ लोग तंग आकर कह देते है कि बस बहुत हुआ अब नहीं, और कभी नहीं 

सन्दर्भ: काम चालू आहे, अब नई संस्कृति दिल्ली से आने वाली है बहुत जल्दी आपके द्वारे, इस सबमे माहिर लोग एक बार फिर अपने भोथरें हथियार पैने करने में लग गए है, सावधान इंडिया.



नौकरी में अनुभव का मतलब संस्था या तंत्र द्वारा अभी तक की गयी सभी मूर्खताएं, गलतियां और चुतियापों को खूबसूरती से ढक देनेवाला और सारी उलटबांसियों को व्यवस्थित तरीके से "प्रेजेंटेबल फ़ार्म" में लाने वाला एक अदद मूर्ख और चाहिए होता है इसलिए अक्सर कहा और पूछा जाता है आपको कितना अनुभव है इससे पहले का...?

Sunday, December 22, 2013

देवास में 22/12/13 को संपन्न कबीर मिलन समारोह

















बात बहुत पुरानी तो नहीं पर पिछली सदी का अंतिम दशक था जब हम लोग एकलव्य संस्था के माध्यम से देवास जिले कुछ जन विज्ञान के काम कर रहे थे शिक्षा, साक्षरता, विज्ञान शिक्षण के नए नवाचारी प्रयोग, संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में भी कुछ नया गढ़ने की कोशिशें जारी थी. एक दो बार हमने घूमते हुए पाया कि मालवा में गाँवों में कुछ लोग खासकरके दलित समुदाय के लोग कबीर को बहुत तल्लीनता से गाते है और रात भर बैठकर गाते ही नहीं बल्कि सुनते और गाये हुए भजनों पर चर्चा जिसे वे सत्संग कहते थे, करते है. यह थोड़ा मुश्किल और जटिल कार्य था हम जैसे युवा लोगों के लिए कि दिन भर की मेहनत और फिर इस तरह से गाना बगैर किसी आयोजन के और खर्चे के और वो भी बगैर चाय पानी के. थोड़ा थोड़ा जुड़ना शुरु किया, समझना शुरू किया, पता चला कि कमोबेश हर जगह हर गाँव में अपनी एक कबीर भजन मंडली होती है. बस फिर क्या था दोस्ती हुई और जल्दी ही यह समझ आ गया कि भजन गाने की यह परम्परा सिर्फ वाचिक परम्परा है. 

स्व नईम जी और दीगर लोगों से सीखा कि कबीर की वाचिक परम्परा मालवा और देश के कई राज्यों में बरसों से जारी है और स्व पंडित कुमार गन्धर्व ने भी इसी मालवे की कबीर की वाचिक परम्परा से प्रभावित होकर बहुत कुछ नया गुना, सूना और बुना था. बस फिर दोस्ती हुई नारायण देल्म्या जी से जो तराने के पास के गाँव बरन्डवा के रहने वाले थे वे हमारे गुरु बने, फिर प्रहलाद सिंह टिपान्या जी से दोस्ती हुई धीरे धीरे हमने देवास में एकलव्य संस्था में एक अनौपचारिक "कबीर भजन एवं विचार मंच" की स्थापना की. हमारे साथी स्व दिनेश शर्मा इस काम में जी जान से जुट गए और हम लोग भी साथ में थे. हमारे साथ डा राम नारायण स्याग थे, मार्ग दर्शन के लिए.

हर माह की दो तारीख को आसपास की मंडलियाँ आती भजन गाती और सत्संग होता. बहुत वैज्ञानिक धरातल पर बातचीत होती थोड़ा शुरू में विवाद हुआ क्योकि जिन पाखंडों और दिखावों का कबर विरोध करते थे ये मंडलियाँ उन्ही बातों को करती थी फिर लम्बी चर्चा होती और धीरे से हम सीखते कि इस वर्ग में चेतना बहुत जरुरी है और यह कबीर के माध्यम से निश्चित ही आ सकती है. भारतीय इतिहास और अनुसंधान परिषद् के सहयोग से हमने एक छोटा सा दस्तावेजीकरण करने का कार्य अपने हाथों में लिया जिसमेहम इस वाचिक परम्परा को लखित रूप में दर्ज कर रहे थे. होता यह था कि दिनेश मै या अन्य साथी कबीर मंडलियों के साथ बैठते और जो वो गाते या बोलते थे या उनके पास कोई डायरी होती हम उसमे से लिख लेते उसे टाईप करा लेते और फिर कबीर के मानकीकृत बीजक में से मिलान करते और फिर मंडलियों से चर्चा करते कि यह शब्द क्यों बदला गया या अर्थ क्या है आदि आदि. 

प्रहलाद जी की पहली भजन के कैसेट डा सुरेश पटेल के साथ हम लोगों ने सतप्रकाशन इंदौर से बनवाई थी और फिर यह लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि इसका जिक्र करना ही मुश्किल है. गत वर्ष प्रहलाद जी को पदम् श्री से विभूषित किया गया है. इस बीच कबीर भजन विचार मंच का काम बहुत आगे बढ़ा तथाकथित कबीर पंथियों को इस कार्यक्रम से दिक्कतें भी हुई. 


 बीच स्टेनफोर्ड विवि अमेरिका से प्रोफ़ेसर लिंडा हैज़ हमसे एक बार आकर मिली तो उन्हें यह बहुत अच्छा लगा और फिर उन्होंने ऐसा काम हाथ में लिया कि पिछले दस वर्षों से वो यही काम आकर रही है. उन्होंने कबीर की वाचिक परम्परा का गहरा अध्ययन किया, उन्होंने कबीर भजनों का अंग्रेजी में अनुवाद किया ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस से उनकी किताबें आई है. इस बीच वे प्रहलाद जी को अमेरिका ले गयी. वहाँ उनके कार्यक्रम कई विश्व विद्यालयों में करवाए है. प्रो. लिंडा ने खुद हिन्दी सीखी और गहरा काम किया आज वे देश विदेश में कबीर की वाचिक परम्परा की विशेषग्य है.


आज अपने शोध के दस वर्ष पुरे होने और काम ख़त्म होने का उन्होंने एक अनूठा काम किया. आज देवास में ढेरों कबीर मंडलियों को स्थानीय मल्हार स्मृति मंदिर में बुलाकर सुना, उन्हें कुछ नगद राशि दी और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित भी किया. उनकी नई किताब भी आ रही है. यह कठिन काम करके वे अपने देश में एक नया उदाहरण बन गयी है. एक ओर जहां हमारे विवि में लोग कुछ भी शोध करते रहते है जिसका कोई ओर छोर नहीं होता वही लिंडा ने एक अनजान देश में नई भाषा सीखकर एक लुप्त प्रायः होती परम्परा को पुनर्जीवित किया और उसका दस्तावेजीकरण करके दुनिया के सामने कबीर की नए तरह से व्याख्या सामने रखी. साथ ही मालवा के उन लोगों में कबीर को लेकर एक नया अलख जगाया जो संभव नहीं था. शबनम वीरमानी ने भी इसी तर्ज पर चार फ़िल्में बनाई है जिनका जिक्र फिर कभी बहरहाल आज के इस कबीर मिलन समारोह की तस्वीरें आपके लिए. एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस कार्यक्रम में शिरकत करने विदुषी कलापिनी कोमकली विशेष रूप से उपस्थित थी और उन्होंने निर्गुण शब्द और निर्गुणी भजनों की बात में शब्द और विचार को महत्त्व देते हुए दो भजन सुनाये. 

देवास में बगैर शोर शराबे के संपन्न हुए इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में जो सादगी और भव्यता थी वो मेरे लिए अकल्पनीय थी. प्रो लिंडा हैज़, राजीव नेमा, प्रहलाद जी, कलापिनी, कैलाश सोनी, अरविंद सरदाना, मित्र बहादुर, दिनेश पटेल और डा प्रकाश कान्त, संजीवनी ताई, जीवन सिंह ठाकुर, अविनाश गोडबोले, उपकार, विवेक, नमन जोशी, आदि गणमान्य लोगों की वजह से यह आयोजन ऐतिहासिक बन गया.

Monday, December 16, 2013

"औरतें"- उदय प्रकाश की कविता

वह औरत पर्स से खुदरा नोट निकाल कर कंडक्टर से अपने घर
जाने का टिकट ले रही है
उसके साथ अभी ज़रा देर पहले बलात्कार हुआ है

उसी बस में एक दूसरी औरत अपनी जैसी ही लाचार उम्र की दो-तीन औरतों के साथ
प्रोमोशन और महंगाई भत्ते के बारे में
बातें कर रही है
उसके दफ़्तर में आज उसके अधिकारी ने फिर मीमो भेजा है

वह औरत जो सुहागन बने रहने के लिए रखे हुए है करवा चौथ का निर्जल व्रत
वह पति या सास के हाथों मार दिये जाने से डरी हुई
सोती सोती अचानक चिल्लाती है
एक और औरत बालकनी में आधीरात खड़ी हुई इंतज़ार करती है
अपनी जैसी ही असुरक्षित और बेबस किसी दूसरी औरत के घर से लौटने वाले
अपने शराबी पति का

संदेह, असुरक्षा और डर से घिरी एक औरत अपने पिटने से पहले
बहुत महीन आवाज़ में पूछती है पति से -
कहां खर्च हो गये आपके पर्स में से तनख्वाह के आधे से
ज़्यादा रुपये ?

एक औरत अपने बच्चे को नहलाते हुए यों ही रोने लगती है फूट-फूट कर
और चूमती है उसे पागल जैसी बार-बार
उसके भविष्य में अपने लिए कोई गुफ़ा या शरण खोज़ती हुई

एक औरत के हाथ जल गये हैं तवे में
एक के ऊपर तेल गिर गया है कड़ाही में खौलता हुआ

अस्पताल में हज़ार प्रतिशत जली हुई औरत का कोयला दर्ज कराता है
अपना मृत्यु-पूर्व बयान कि उसे नहीं जलाया किसी ने
उसके अलावा बाक़ी हर कोई है निर्दोष
ग़लती से उसके ही हाथों फूट गयी थी किस्मत
और फट गया था स्टोव

एक औरत नाक से बहता ख़ून पोंछती हुई बोलती है
कसम खाती हूं, मेरे अतीत में कहीं नहीं था कोई प्यार
वहां था एक पवित्र, शताब्दियों लंबा, आग जैसा धधकता सन्नाटा
जिसमें सिंक-पक रही थी सिर्फ़ आपकी खातिर मेरी देह

एक औरत का चेहरा संगमरमर जैसा सफ़े़द है
उसने किसी से कह डाला है अपना दुख या उससे खो गया है कोई ज़ेवर
एक सीलिंग की कड़ी में बांध रही है अपना दुपट्टा
उसके प्रेमी ने सार्वजनिक कर दिये हैं उसके फोटो और प्रेमपत्र

एक औरत फोन पकड़ कर रोती है
एक अपने आप से बोलती है और किसी हिस्टीरिया में बाहर सड़क पर निकल जाती है
कुछ औरतें बिना बाल काढ़े, बिना किन्हीं कपड़ों के
बस अड्डे या रेल्वे प्लेटफ़ार्म पर खड़ी हैं यह पूछती हुई कि
उन्हें किस गाड़ी में बैठना है और जाना कहां है इस संसार में

एक औरत हार कर कहती है -तुम जो जी आये, कर लो मेरे साथ
बस मुझे किसी तरह जी लेने दो

एक पायी गयी है मरी हुई बिल्कुल तड़के शहर के किसी पार्क में
और उसके शव के पास रो रहा है उसका डेढ़ साल का बेटा
उसके झोले में मिलती है दूध की एक खाली बोतल, प्लास्टिक का छोटा-सा गिलास
और एक लाल-हरी गेंद, जिसे हिलाने से आज भी आती है
घुनघुने जैसी आवाज़

एक औरत तेज़ाब से जल गयी है
खुश है कि बच गयी है उसकी दायीं आंख
एक औरत तंदूर में जलती हुई अपनी उंगलियां धीरे से हिलाती है
जानने के लिए कि बाहर कितना अंधेरा है

एक पोंछा लगा रही है
एक बर्तन मांज रही है
एक कपड़े पछींट रही है
एक बच्चे को बोरे में सुला कर सड़क पर रोड़े बिछा रही है

एक फ़र्श धो रही है और देख रही है राष्ट्रीय चैनल पर फ़ैशन परेड
एक पढ़ रही है न्यूज़ कि संसद में बढ़ाई जायेगी उनकी भी तादाद

एक औरत का कलेजा जो छिटक कर बोरे से बाहर गिर गया है
कहता है - 'मुझे फेंक कर किसी नाले में जल्दी घर लौट आना,
बच्चों को स्कूल जाने के लिए जगाना है
नाश्ता उन्हें ज़रूर दे देना,
आटा तो मैं गूंथ आई थी

राजधानी के पुलिस थाने के गेट पर एक-दूसरे को छूती हुईं
ज़मीन पर बैठी हैं दो औरतें बिल्कुल चुपचाप
लेकिन समूचे ब्रह्मांड में गूंजता है उनका हाहाकार

हज़ारों-लाखों छुपती हैं गर्भ के अंधेरे में
इस दुनिया में जन्म लेने से इनकार करती हुईं
लेकिन वहां भी खोज़ लेती हैं उन्हें भेदिया ध्वनि-तरंगें
वहां भी,
भ्रूण में उतरती है
हत्यारी तलवार ।

------ उदय प्रकाश
December 16, 2013 at 12:15pm

('रात में हारमोनियम', वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली: 1998)

जनसत्ता 16/12/13 में अग्रिम की कहानी


Sunday, December 15, 2013

बकलोल शेर,और गंजडी घोड़ा


फिर घोड़े ने गांजे का एक लंबा बेहतरीन कश लिया उसके स्वर में थोड़ी खरखराहट थी आँखों में हल्का सा गुबार था, उसने अपनी थूथन को पटका और फिर घटिया सी दिखने वाली भौंहें उठाई और गधों को लगभग चुनौती देते हुए कहा कि मुझसे अच्छा रेंकने वाला कोई नहीं है मै ना मात्र रेंक सकता हूँ वरन, चिंघाड़ भी सकता हूँ, टर्र-टर्र भी कर सकता हूँ, भौंक भी सकता हूँ, चहचहा भी सकता हूँ, मीठी कूक भी निकाल सकता हूँ इस जंगल के सारे मूर्ख शेर मेरे कब्जे में है और फिर मै एक घोड़ा हूँ यह तुम गधों को याद रखना चाहिए ऐसा कहकर वह बहुत ही कातर स्वर में मिमियाने लगा, उसके हाथ-पाँव कांपने लगे, चेहरा मुरझा गया. आखिर घोड़े को भी अपराध बोध तो सालता था क्योकि वह भी एक सरीसृप से निकल कर इस भीषण युग में विकास की सीढियां चढ़ता हुआ आया था इस सितारा संस्कृति में, अपने विकृत अतीत को याद करते हुए रोने लगा, उसे याद आया अपना दोहरा-तिहरा चाल चरित्र और अपना अपमान जो लगातार होता रहा- कभी नदी के मुहाने पर, कभी गेंडे के छज्जे पर, कभी वो पेन्ग्युईन बना, कभी शुतुरमुर्ग बनकर जमाने से अपने आपको छुपाता रहा, इस जंगल में रोज नया घटता देख उसकी आत्मा चीत्कार उठती, अचानक उसका गांजा ख़त्म होने लगा तो गधों को लगा कि यही सही समय है जब दुलत्ती मार दी जाए इस घोड़े को और फिर शेर सहित इस घोड़े को इसी नरक में पटक कर कही ऐसे जंगल में जाया जाए जहां कम से घोड़े, घोड़े तो बनकर रहें- उल्लू, मगरमच्छ, सियार, लोमड़ी, उदबिलाव, सांप और घडियाली आंसू बहाने वाले बाकी नपुंसक मच्छरों से हम निपटने में माहिर है. गांजे की चिलम को घोड़े के हाथों में थमाकर गधों ने जंगल राज का संविधान और शिक्षा की पवित्र किताब उसके हवाले कर दी और कहा कि अपने बकलोल शेर (?) से कहना कि गधों ने जंगल देखे है, ज़माना देखा है और जानवर देखे है पर टट्टू के भेष में ना घोड़े देखे, ना बकलोल शेर, हमने युग देखे है, हम इतिहास बनाते है, और हर जंगल के और दुनिया के अपने तरीके और उसूल होते है जो एक न्यूनतम और वाजिब मूल्यों और मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित होते है, उनका पालन किया जाना चाहिए, अगर तुम्हारे उसूलों से दुनिया चलती तो अब तक सारा जहां बदल गया होता.

और फिर एक दिन घोड़े को जब असलियत का मालूम पडा तो उसने दूर देश में जा चुके गधे को लिखा कि जंगलराज में सब कुछ ख़त्म हो चुका है उस खच्चर के कारण और दोगले साँपों के कारण जंगल का क़ानून भयानक बिगड़ चुका है, घोड़े की खिसियानी जिन्दगी अब इन टट्टूओं, सांप, नेवलों, मगरमच्छों, खच्चर और उल्लूओं पर ही निर्भर रह गयी है और इस वजह से उसका धंधा बुरी तरह प्रभावित हो रहा है, घोड़े का सन्देश लाने वाले दूत को गधे ने एक दुलत्ती मारकर विदा किया और कहा जाकर कहना अपने घोड़े से कि अब वो दिन लद गए जब गधे की कोई बिसात नहीं थी, यह उसके पूर्व जन्मों का फल है वरना गधे चाहते तो सब कुछ पारदर्शी करके लौटते और फिर घोड़े की पीढियां कभी जंगल में अपना अस्तित्व बचा नहीं पाती ख़त्म हो जाती पुरी पहचान और फिर .खैर........गधे तो गधे और घोड़े तो घोड़े ही होते है- एक कामकाजी और दूसरा घोर निकम्मा..

फिर जंगल में घोड़े ने एक बड़े और मोटे ताजे गधे को नियुक्त करते हुए कहा कि अब से यह राज तुम्हारा है, यहाँ के सब जानवर तुम हांकना, सारे उदबिलाव, उल्लू, मगरमच्छ, सियार, सांप और नेवलों के बीच रहकर इस जंगल को चमन बना देना. बेचारा गधा नया था उसे रेंगना भी नहीं आता था इस जंगल में भाषा भी नई थी, उसे ना पानी दिया, न घास दिखाई, न सूरज की उजली किरणें दिखाई कि वो जंगल में जीवन जीने का किंचित यत्न भी करता, एक पौर्णिमा बीती और फिर कृष्ण पक्ष की काली रात शुरू हुई जब सियारों ने रेंकना शुरू किया और उल्लूओं ने चहकना, गंदले पानी में दूर देश के पक्षी उड़कर आये तो अपने साथ अपनी गंदी मिट्टी से गंदे बीज लाकर फिर बोने लगे जहर, तो गधे को कुछ समझ आया उसने तुरंत निर्णय लिया और एक दिन जब ठंड से सारा जंगलराज सरोबार हो रहा था, सूरज की किरणे कही नजर नहीं आ रही थी वो घोड़े के जंगलराज को मात्र एक शुक्ल और एक कृष्ण पक्ष से कम समय में दुलत्ती मारकर भाग गया और जाकर बोला सालों घोड़ों तुम सूअरों से भी ज्यादा बदजात हो, तुम तो जानवर तो क्या इंसानों से भी गए गुजरे हो और तुम्हे नरक नहीं स्वर्ग नहीं त्रिशंकु भी नसीब ना होगा.
अब घोड़े किसी नए उल्लू की तलाश कर रहे है जो जंगल राज को नया राजस्व उगाकर दे सकें.

Wednesday, December 11, 2013

"सिर्फ युवराज ही नहीं, अग्रिम भी जीत रहा है एक लम्बी लड़ाई कैंसर के खिलाफ"





देश  में कैंसर के खिलाफ और तमाम ऐसी असाध्य बीमारियों से लड़ने के जीवंत किस्से हम अक्सर सुनते रहते है और जब हम पढ़ते है तो एक मामूली खबर सोचकर टाल जाते है या दहशत से काँप भी उठते है. बात जुलाई की है जब मै हरदोई गया था, अपने एक साथी के घर खाना खा रहा था- बाहर दोपहर के समय तीन बच्चे खेल रहे थे, ध्यान नहीं गया. 

थोड़े  दिनों बाद इसी साथी ने बताया कि उनमे से एक बेटा मेरे छोटे भाई का है जिसे हरदोई से डाक्टरों ने लखनऊ रेफर किया है क्योकि उसका हीमोग्लोबिन स्थिर नहीं रह पा रहा और बार-बार खून देने के बाद भी रक्त की अल्पता से डाक्टर भी परेशान है. मेरा मन किसी अनिश्चित कुशंका से काँप गया सिर्फ सात साल का था यह बच्चा. फिर जो होना था वही सच हुआ उसे लखनऊ लाया गया ताबड़ तोब और रातम- रात किसी तरह से जुगाड़ करके संजय गांधी पी जी आई, लखनऊ, में भर्ती कराया गया. उसके पिता शीतेंद्र इंदौर में मूक बधिर बच्चों के लिए स्पेशल टीचर का कोर्स कर रहे थे और माँ उन्नाव जिले के किसी स्कूल में सरकारी अध्यापिका है. बस फिर क्या था शीतेंद्र को अपना कोर्स छोड़कर आना पडा और माँ ने छः माह की छुट्टी के लिए आवेदन किया पर सरकारी अधिकारियों को कहाँ यह पचता है स्थानीय बी एस ए ने अडंगा लगा रखा है. अग्रिम को रक्त कैंसर की बीमारी से ग्रस्त घोषित किया गया. 

खैर, अग्रिम का महँगा इलाज शुरू हुआ- रोज जांच और कड़ी परीक्षा डाक्टरों ने कह दिया कि अब इसे हरदोई ना ले जाया जाए क्योकि कमोबेश रोज ही पी जी आई आना पडेगा, सो माँ बाप ने सामने ही एक रेस्ट हाउस में एक कमरा ले लिया और रहने लगे अपने लाडले का इलाज करवाने के लिए. हर तीसरे दिन खून की दो- तीन यूनिट और महंगी दवाएं, मोटी सुईयां और कीमोथेरेपी, बस इस सबमे लगभग छः माह बीत गए. हालत कभी नर्म कभी गरम और चिंताजनक हो जाते हम सब बहुत तनाव में थे मेरे सहकर्मी साथी भी अक्सर परेशान रहते. 

अभी  तीन दिसम्बर को मेरे साथी ने कहा कि सर आप हरदोई अकेले आ रहे है ना गाडी से, मैंने कहा हाँ क्यों, तो बोला कि भैया को घर लाना था डाक्टरों ने उसे घर जाने की इजाजत दे दी है, बस फिर क्या था मै बहुत खुश हुआ. शाम को भीड़ भरे इलाके से और गंदे ट्राफिक से बचते हुए पी जी आई पहुंचे तो अग्रिम बाहर खेल रहा था. चहक उठा उसे याद था कि मैंने उसके लिए एक बड़ी वाली कैडबरी लाई थी जो वो खा नहीं पाया था, और फिर तो गाडी में बैठकर जो बोलना शुरू किया कि बस. आज वो कैद से बाहर था और अपने दादा-दादी और भाई बहनों से मिलने अपने घर हरदोई जा रहा था. कडाके की सर्दी पर उसे कहाँ फ़िक्र, अपने घर की याद में छः माह से वो बेचैन था. मैंने पूछा कि क्या खाओगे तो बोला खाना तो बहुत कुछ है खट्टा भी पर अभी साले डाक्टरों ने मना किया है, पर दादी और माँ ने वादा किया है कि वो टमाटर की चटनी बनायेंगे जब मै घर जाउंगा. स्कूल छुट रहा है, अंकल पर थोड़े दिनों में मै सब कव्हर कर लूंगा फिर अपनी कक्षा में पहला नंबर लाकर दिखाउंगा. पी जी आई में डाक्टर बहुत अच्छे है पर मै कभी डाक्टर नहीं बनूंगा क्योकि जो दूसरों को तकलीफ दें वो भी कोई पढाई है. मेरी कीमो में मेरे सर के सब बाल उड़ गए, पर ठीक है आ जायेंगे. 

सात  साल का बच्चा छः माह में इतना परिपक्व हो गया कि बस, फिर बोला अंकल आपको मालूम है कि क्रिकेट के युवराज सिंह को भी ऐसी ही बीमारी थी जब वो ठीक होकर खेल रहा है तो मेरा भी तो आज बोनमेरो टेस्ट हुआ है और फिर जल्दी ही पापा मम्मी ४५ बोतल खून का इंतजाम करेंगे और मेरा भी बोनमेरो लग जाएगा तो मेरे भी खून बनने लगेगा ना ? उसने बताया कि कैसे मोटी रॉड उसकी रीढ़ की हड्डी में डाली गयी बोनमेरो निकालने के लिए कितना रोया था वो .........मेरी आँख में आंसू थे मैंने कहा जरुर बेटा तुम्हारे लिए हम ४५ क्या ४५००० बोतल खून की व्यवस्था कर लेंगे........शीतेंद्र और विनीता सुन रहे थे...........बहुत सारा रूपया खर्च हो गया है और अब यह छः माह में घर जा रहा है तो हमें जो खुशी मिल रही है वह आपको बता नहीं सकते. आठ दिन घर रहकर अग्रिम पुनः एक बार इलाज के लिए पीजीआई आ गया है. फिर से जांच के दुश्चक्र में और लम्बी प्रक्रिया में पड़ गया है पर अब खुशी की बात यह है कि उसके शरीर ने सकारात्मक परिणाम देने शुरू कर दिए है और उम्मीद है कि वह जल्दी ही ठीक होकर अपने घर जा सकेगा और फिर से घर की मस्ती में अपनी कक्षा में और स्कूल, मोहल्ले में शामिल हो सकेगा.

आज का दिन मेरे लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि मैंने अग्रिम से और उसके माता-पिता से पूछकर उसकी तस्वीरें ली थी और यहाँ लिखने की अनुमति ली थी आज की तारीख इतिहास में बहुत ही अनूठी है सो सोचा कि इसे और श्रेष्ठ बनाने के लिए इस नन्हें फ़रिश्ते की वो कहानी आपके साथ बांटू जिससे जाम्बाजी का नया हौंसला मिलता है. आप सबसे यही इल्तिजा है कि इस नन्हें जाम्बाज के लिए दुआएं करें, अपने शुभार्शिवाद दें और अपने आसपास नजर रखे कि कही कोई घातक बीमारी किसी को अपने पंजे में ना लपेट लें. अग्रिम के लिए खूब सारा प्यार, दुआएं और शुभकामनाएं. और उसके परिवार के हौंसलें और हिम्मत के लिए सलाम कि कितने धैर्य से उन्होंने सब सहकर अपने इस नन्हें बच्चे की जान बचाई है. सच में बड़ा कठिन है यह सब सह पाना और फिर लड़कर निकल पाना. मै खुद कई लड़ाईयां लड़ चुका हूँ और अभी भी एक मोर्चे पर लड़ रहा हूँ तो समझ सकता हूँ कि क्या हालत होती है जब घर का एक सदस्य बीमार होता है ..........




Monday, December 9, 2013

भारत के लोग आज दिनांक 9 दिसंबर को आपको दिल्ली की गद्दी हवाले करते है

चलो अब ढंग से काम धाम पर लगो............लोकतंत्र है हार-जीत सब चलता है और सबको सब मान लेना चाहिए, मै लोगों के मतों की इज्जत करता हूँ और देश के चार राज्यों को हार्दिक बधाई देता हूँ कि कांग्रेस से और गांधी परिवार से पहली बार गत सात दशकों में छुटकारा मिला है. 


अब बारी केंद्र में बदलाव की है और देश के अन्य दीगर राज्यों में भी जैसे उप्र में सपा और बसपा से मुक्ति की कामना, बिहार में नितीश और लालू से मुक्ति की कामना, बंगाल में ममता और दक्षिण में क्षेत्रीय पार्टियों से मुक्ति की कामना में लोग कुलबुला रहे है........


बस हम सबको राहत मिलनी चाहिए, बिजली, सड़क, पानी के अलावा गैस प्याज से लेकर सीमा पर नित रोज मर रहे हमारे सिपाहयों की मौत से, शिक्षा स्वास्थ्य, महिलाओं के अधिकार और समतामूलक समाज, हिंसा और अलगाववाद की हर उस कोशिश से जो देश को देश नहीं रहने देती. हमें अपने किसानों की चिन्ता है जो सरकारी नीतियों की वजह से आत्महत्या कर रहे है , अब समय है कि इन मुद्दों पर तसल्ली से काम करो बजाय चुनाव परिणामों का विश्लेषण और पोस्टमार्टम करने से.


देश के जिन युवाओं ने आपको साथ दिया चाहे कमल या झाडू को उनके लिए कुछ करो कब तक इन्हें अपने मकडजाल में आप फंसाते रहेंगे, कब तक इस्तेमाल करते रहेंगे, खाकी निक्कर पहनाकर बेरोजगार रखेंगे या धरना प्रदर्शन और भूख हड़ताल में शामिल कर अपनी भीड़ बढाते रहेंगे? इनकी भी अपनी जिन्दगी है ख्वाब है परिवार बसाना है अपने माँ-बाप की सेवा करनी है और भले ही एक आम आदमी की तरह पर जिन्दगी जीना है, दुनिया के सबसे बड़े युवा मुल्क की चिन्ता करिए रोजगारों का सृजन करिए और हर हाथ को झाड़ू नहीं काम दीजिये नरेगा के भ्रमजाल से निकलिए.


देश के सारे फ्लेगशिप कार्यक्रमों को बंद कीजिये-जैसे सर्व शिक्षा अभियान, कुपोषण बनाम पोषण आहार, शौचालय निर्माण, नरेगा, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, आदि जैसे कई ढकोसले है, चूँकि ये राज्य के मामले है अतः इन्हें राज्यों को विकेन्द्रित ढंग से हल करने दीजिये और देशी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों को भी कहिये कि बॉस काम करो वरना फूट लो यहाँ से, यूनिसेफ जैसे निकम्मे और मगरूर संस्थाओं का लायसेंस कैंसिल करिए- देश की समस्याएं हमारी है हम निपट लेंगे इन्हें बाहर करिए पहले और तमाम ऐसी जगहों पर जो काले लोग बैठे है उन्हें भी देश के प्रति जिम्मेदार बनाईये मुफ्तखोरों के मारे देश परेशान है. योजना आयोग के लोगों को बदलिए और सिर्फ कागजी शेरो को दहाड़ मारने के बजाय फील्ड में भेजिए.


एनजीओ कल्चर और कार्यशैली पर प्रतिबन्ध लगाईये और जो बहुत ही घटिया किस्म के लोग बगैर सोच समझ और विचारधारा के इस एनजीओ में घूस गए है उन्हें काले पानी की सजा दे दीजिये और कहिये कि फील्ड में जाओ काम करो वरना दूकान बंद.......!!!


मीडिया को बेलगाम होने से रोकिये और इस मीडिया को भी सबक सीखाईये क्योकि देश का नब्बे प्रतिशत नुकसान आपने नहीं, इस मीडिया ने किया है और इस बात को गंभीरता से लें वरना दो हजार चौदह में ये फिर कोई नंगा नाच करके सारा खेल बिगाड़ देगा.........सतर्क रहिये........सावधान रहिये, जानते है ना आप एक प्रचलित नारा कि"सावधानी हटी और दुर्घटना घटी" 


केंद्र
में भी सत्ता सम्हाल लो हम भारत के लोग आज दिनांक 9 दिसंबर को आपको दिल्ली की गद्दी हवाले करते है डा मनमोहन सिंह ने इस्तीफा दे ही दिया है यह मान लो..............बस हमारे मुद्दों पर काम करो प्लीज़...........

Monday, December 2, 2013

हत्याहरण ( हरदोई) और पाप मुक्ति का स्वप्न













कहते है प्रभु श्रीराम को रावण जैसे महाविदवान को मारने के बाद बेहद गंभीर पश्चाताप हुआ तो उन्होंने हिरन्यकश्यप की राजधानी के समीप एक जगह पर अपने जादूई प्रताप से एक कुण्ड की रचना की और उसमे अपने आप  को नहलाकर अपने ह्त्या के पाप से मुक्त किया.  कहते है कि जिसने भी ऐसे या कोई और भी पाप किये हो तो वो यहाँ आकर अपने आपको मुक्त कर सकता है. 

इस जगह का नाम है "हत्याहरण" पहले तो मुझे आश्चर्य हुआ कि ऐसी कोइ जगह होगी या Proper Noun के रूप में किसी गाँव या कसबे का नाम ऐसा कैसे हो सकता है परन्तु जब आज कुछ दफ्तरी काम से गया तो आज देखा कि सब सच है, आज सौभाग्य (?) से अमावस्या थी ऐसा वहाँ दान दक्षिणा की अपेक्षा करने वाले पंडित जी ने बताया कि जजमान आज बड़े मुहूर्त से आये हो तो सारे पापों से मुक्त हो जाओगे बस फिर क्या कुण्ड में सैंडिल पहनाकर ही पाप मुक्त हो गए.....

इस कुण्ड के मुहाने पर एक इंटर कॉलेज बना है जहां पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य गहरे अन्धकार में तो है ही साथ ही सुना कि यहाँ रूपये लेकर परीक्षा पास करवाने का भी धंधा होता है. खैर...आप चित्र देखकर पाप मुक्त होईये..

तुम्हें कोई खत्म नहीं कर सकेगा - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना


तुम धूल हो 
ज़िन्दगी की सीलन से 
दीमक बनो 
रातोंरात। 

सदियों से बन्द इन 
दीवारों की खिड़कियां , दरवाज़े 
और रौशनदान चाल दो। 

तुम धूल हो 
ज़िन्दगी की सीलन से जनम लो
दीमक बनो , आगे बढ़ो।

एक बार रास्ता पहचान लेने पर
तुम्हें कोई खत्म नहीं कर सकेगा।

- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना