Tuesday, July 31, 2012

प्रेमचंद के बाद दूसरा कौन लिखे गोदान......??

 
होरी पड़ा अचेत खेत में
धनिया खाए पछाड़ रेत में
गोबर भूखा फ़िरे शहर में
ऐसी हालत है घर-घर में
प्रेमचंद के बाद दूसरा
कौन लिखे गोदान......

हिन्दी के विलक्षण विवादास्पद लेखक, जिन पर अभी तक लाखों शोध हो चुके है, भारत और दुनिया में एम ए करके अपने गाईड की जी हुजूरी और चापलूसी से प्रेमचंद पर पी एच डी का अनुपयोगी पोथा लिखकर तलवे चाटकर नोकरी दिलवाने वाले बेचारे साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद को पता नहीं था कि उनका इतना दुरुपयोग होगा . आज ये सब चाटुकार प्रेमचंद के नाम पर अपना परिवार चला रहे है और आज जी भरके अपनी भड़ास निकालेंगे. हे प्रेमचंद आप अनुभवी और जीवन्त हो दुनिया में, हमें माफ कर दो कि हमने आपकी कहानी उपन्यास की परम्परा में कुछ नया गढने के बजाय आपको अपनी रोजी रोटी बना लिया. आज आपको याद करते हुए आपके अथक कार्य और मेधा, समझ और बुद्धिमत्ता को प्रणाम.

Monday, July 30, 2012

लड़के जवान हो गए - अच्युतानंद मिश्र



और लड़के जवान हो गए
वक़्त की पीठ पर चढ़ते
लुढ़कते फिसलते
लड़के जवान हो गए

उदास मटमैला फीका शहर
तेज़ रौशनी के बिजली के खम्भे
जिनमे बरसों पहले बल्ब फूट चुका है
अँधेरे में सिर झुकाए खड़े जैसे
कोई बूढा बाप जवान बेटी के सामने
उसी शहर में देखते-देखते
लड़के जवान हो गए

लड़के जिन्होंने क़िताबें
पढ़ी नहीं सिर्फ बेचीं
एक जौहरी की तरह
हर किताब को उसके वज़न से परखा
गली-गली घूमकर आइसक्रीम बेचीं
चाट-पापड़ी बेचीं
जिसका स्वाद उनके बचपन की उदासी में
कभी घुल नहीं सका
वे ही लड़के जवान हो गए

एकदम अचूक निशाना उनका
वे बिना किसी ग़लती के
चौथी मंज़िल की बाल्कनी में अख़बार डालते
पैदा होते ही सीख लिया जीना
सावधानी से
हर वक़्त रहे एकदम चौकन्ने
कि कोई मौक़ा छूट न जाए
कि टूट न जाए
काँच का कोई खिलौना बेचते हुए
और गवानी पड़े दिहाड़ी
वे लड़के जवान हो गए

बेधड़क पार की सड़कें
ज़रा देर को भी नहीं सोचा
कि इस या उस गाड़ी से टकरा जाएँ
तो फिर क्या हो ?
जब भी किसी गाड़ीवाले ने मारी टक्कर
चीख़ते हुए वसूला अस्पताल का खर्च
जिससे बाद में पिता के लिए
दवा ख़रीदते हुए कभी नहीं
सोचा चोट की बाबत
वे लड़के जवान हो गए

अमीरी के ख़्वाब में डूबे
अधजली सिगरेट और बीडियाँ फूँकतें
अमिताभ बच्चन की कहानियाँ सुनातें
सुरती फाँकते और लड़कियों को देख
फ़िल्मी गीत गाते
लड़के जवान हो गए

एक दिन नकली जुलूस के लिए
शोर लगाते लड़के
जब सचमुच में भूख-भूख चिल्लाने लगे
तो पुलिस ने दना-दन बरसाईं गोलियाँ
और जवान हो रहे लड़के
पुलिस की गोलियों का शिकार हुए

पुलिस ने कहा वे खूँखार थे
नक्सली थे तस्कर थे
अपराधी थे पॉकेटमार थे
स्मैकिए थे नशेड़ी थे

माँ बाप ने कहा
वे हमारी आँख थे वे हमारे हाथ थे
किसी ने यह नहीं कहा वे भूखे
और जवान हो गए थे

बूढ़े हो रहे देश में
इस तरह मारे गए जवान लड़के

नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा VI

कमरे का पानी जितना उलीच रहा था उतनी ही तेजी से भर रहा था कमरा, सारा सामान यूँही अस्त व्यस्त सा पड़ा था और दाल आटा बह गया था जीवन की बिलकुल बुनियादी आवश्यकता यूँ पानी में बहते देख वह लगभग हक्का बक्का सा रह गया था अपने जीवन के चार दशकों को याद करके सिहर उठता था अक्सर यादों ने कितना कुछ उसे दिया था दर्द, संताप, संत्रास, विलाप, स्मृतियों का दंश, तनाव, पछतावे और एकाकीपन पर इस सबको वो छोडकर खुश था कि कभी कभी जीवन में किसी को कुछ मिलता नहीं है और जो जीवन वो अपनी शर्तों पर जी रहा है- पिछले पन्द्रह सालों से, वह भी करोड़ों लोगों का एक महज सपना ही तो है, पर एकाएक आये इस तूफ़ान ने और कमरे में छोटी सी सिमटी हुई जिंदगी को और भीगो दिया. यह आत्मा को किसी कुए में डूबोने जैसा था जबरन....लगा कि यह सिर्फ गद्दे- तकियों, कपड़ों का भीगना नहीं, सामान का बहना- नहीं वरन ये वो घाव है जो शरीर, आत्मा और कमजोर पड़े जज्बे को बाहर ले आया है. सारा काला और घिघौना अतीत एक बदबूदार मवाद में बह रहा है और जीवन के सुख-दुःख इस मवाद में शामिल है , जिस तरह से यह सामान जिसे उसने गत पन्द्रह सालों में जतन से खरीदा, सहेजा और बचाया था... मांज पोछकर चमकाया था, वो यकायक छोड़ चला है एक नए सफर की ओर जैसे आत्मा बदलती है चोला, जैसे बदल जाता है नजरिया, जैसे छोड़ देते है अपने बहुत करीबी लोग जो साँसों में बसे थे, जैसे गुजर जाती है परछाई छाँव में, जैसे छोड़ देते है पत्ते पेड़ की मजबूत डगाल को, खिल जाती है पाँखुरियाँ फूल की नाभि से. चलो अच्छा हुआ यह भी देख लिया, पिछले चार दशकों में यही बाकी था जीवन में भुगतने को. पानी का प्रलाप जारी है यह अब और क्या - क्या ले जाएगा समझ नहीं आ रहा पर यह तय है कि उस दिन जो सब कुछ जमींदोज करके आया था उससे ज्यादा तो नहीं वसूल सकता, आसमान पर बादल और घने हो गये है, बिजलिया कडक रही है, चारों ओर से पानी की बूँदें अपने उद्दाम वेग से चली आ रही है और मै कमरे के बीचो बीच खडा अपने निस्तेज हो चुके और खंडित हो चुके अस्तित्व को रेशा रेशा बहते देख रहा हूँ.........(नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा VI)

क्या बिजली जाने का आपको अफसोस है?

टी वी की न्यूज वाला एक आदमी से .....आप कहा जा रहे थे
आदमी - जी नोयडा
क्यों?
जी मेरी सास बीमार है
क्यों?
जी उसे किडनी फेल है
क्यों?
जी मुझे नहीं पता
तो ये मेट्रो बंद होने से आपको क्या फर्क पड़ा है ?
जी जा नहीं पा रहा हूँ...........

टी वी की न्यूज वाला दूसरे आदमी से- आप कहा काम करते है
आदमी - जी केन्द्रीय सचिवालय में
क्यों?
जी मेरी नौकरी है
क्यों?
अरे ये क्या सवाल है
सॉरी , मेट्रो के बंद होने से आपको क्या लगता है
मै दफ्तर नहीं जा पा रहा हूँ समय पर और आज आवश्यक बैठक है
तो दिल्ली में बिजली गुल होने में आपके दफ्तर का क्या रोल है
जी वो उनसे पूछो

टी वी की न्यूज वाला तीसरे आदमी से- ट्राफिक में कब से फंसे है आप
जी तीन घंटे से
क्यों?
जी मै क्या बताऊ सुना है कि सिग्नल खराब हो गये है
तो आपको यहा कैसा लग रहा है
जी बहुत परेशानी है पानी नहीं है पीने को
क्या आपको लगता है कि केन्द्र सरकार को पीने के पानी की व्यवस्था करना चाहिए दिल्ली में बिजली जाने पर........
जी .मुझे नहीं पता.....
क्या बिजली जाने का आपको अफसोस है?
जी हाँ है पर

तो दर्शकों आपको यह बता दे कि ये है दिल्ली के हाल बिजली जाने पर केन्द्र सरकार की हालत पतली हो गयी है शीला दीक्षित आज् मीडिया से बात करने को उपलब्ध नहीं है दिल्ली के जीटी रोड से कैमरामेन ******** के साथ मै ****** "*****' न्यूज के लिए..

Sunday, July 29, 2012

एक बार फ़िर फराज.............

खुद को चुनते हुए दिन सारा गुज़र जाता है फ़राज़
फ़िर हवा शाम की चलती है तो बिखर जाते हैं

मेरे सब्र की इन्तेहा क्या पूछते हो फ़राज़
वो मेरे गले लग कर रोया किसी और के लिए 


वो मुझ से बिछड़ कर अब तक रोया नहीं फराज़
कोई तो है हमदर्द जो उसे रोने नहीं देता
तटस्थ होना भी एक कला है जहां ना दुःख है, ना सुख है, ना उम्मीद की कोई धुंधली किरण.......बस एक देह है और साँसों का अनवरत क्रम जो पता नहीं कितनी सदियों और युगों तक चलता रहेगा....

नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा V

दरका तो कुछ नहीं था ......टूटा भी कुछ नहीं था....कही से कोई आवाज़ भी नहीं आई थी. इस भीगते हुए मौसम में जब सब कुछ भीगकर तरबतर हो गया था तो जीवन, वो भी एक बस आस पर चल रहा था, जब वो  आख़िरी भी  आस उस दिन टूट गयी तो जीवन में बचा ही कुछ नहीं, सब कुछ वही उसी जगह जमींदोज करके आ गया या यूँ कहू कि जमीन में गाड़कर अपने वजूद और उन रूपहले सपनों को जो मैंने कभी तुम्हारे साथ देखे थे, उन ऊँची पहाडियों पर घने पेड़ों की छाँव तले या मैसूर की गलियों में गोल गोल घूमते हुए या उस बौद्ध मंदिर में जहां अपने साथ हमेशा रखने की कसमें खाई थी, उस समय चक्र में जीवन के अनमोल क्षण और वो सामीप्य भी क्या सामीप्य था, शायद इसके सहारे ही जीवन चल सकता था पर कहाँ होता है सब कुछ अपना सोचा हुआ और फ़िर ये अपेक्षा भी तो एक दर्द ही है ना??? सब छूट गया .......सच है जमीन में सब कुछ गाड़कर सब कुछ खत्म हो ही जाता है, जब इंसान की देह भुरभुरी हो जाती है महज तीन चार माहों में तो यादें और सपने, कसमें और रिश्ते तो स्वाभाविक रूप से खत्म हो ही जाते है. एक आदमी को मारने के लिए जीवन में बहुत ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़ते बस छोटी सी दो बातें और छोटी मोटी अदाकारी ही पर्याप्त होती है. ये दीगर बात है कि बहुत बेशर्म देह और काया ही लौट आती है एक इको की तरह से फ़िर दो चार होने को जद्दोजहद करने अपने किये पाप भुगतने, पर यह निश्चित है कि अब लौटना नामुमकिन है और इस देह को, उन सपनों को, उन वादों की पोटली को, और रूपहले आनेवाले कल को मै त्याग कर आया हूँ रहा सवाल नश्वरता का तो वो...........बस ....सवाल ही नहीं जवाब कहाँ से होंगे.......तटस्थ होना भी एक कला है जहां ना दुःख है ना सुख है ना उम्मीद की कोई धुंधली किरण.......बस एक देह है और साँसों का अनवरत क्रम  जो पता नहीं कितनी सदियों और युगों तक चलता रहेगा.............हे ईश्वर कही तो पूरा होने दे......(नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा V)

Saturday, July 28, 2012

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं,

सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं।
दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रसाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

साँसों पर अवलम्बित काया, जब चलते-चलते चूर हुई,

दो स्नेह-शब्द मिल गये, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई।
पथ के पहचाने छूट गये, पर साथ-साथ चल रही याद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

जो साथ न मेरा दे पाये, उनसे कब सूनी हुई डगर?

मैं भी न चलूँ यदि तो क्या, राही मर लेकिन राह अमर।
इस पथ पर वे ही चलते हैं, जो चलने का पा गये स्वाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

कैसे चल पाता यदि न मिला होता मुझको आकुल अंतर?

कैसे चल पाता यदि मिलते, चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर!
आभारी हूँ मैं उन सबका, दे गये व्यथा का जो प्रसाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।


Friday, July 27, 2012

"तुम्हारा इंतज़ार"- मोहन कुमार डहेरिया



तुम नहीं जानती
कहां -कहां किया मैंने तुम्हारा इंतज़ार

मस्तिष्क में उठते संशयों तथा द्वंद्वों के मकड़जाल के अंदर
धैर्य के एक बेहद संकरे दर्रे में
दहशत की तोप के मुहाने पर
कीचड़ और काई से भरी प्रायश्चित की रपटीली ढलान पर
बनाते हुए बमुश्किल संतुलन
मैंने किया तुम्हारा इंतज़ार

उन दिनों जब
जीवन की एकरसता से ऊब रहे थे लोग
बदल रहे थे बहुत तेजी से शब्दों तथा चीज़ों के अर्थ
कोई बादलों के पीछे बने
फूलों के मंडप में कर रहा था किसी का इंतज़ार
तो कोई
समुद्र के अंदर मछलियों की रंग- बिरंगी दुनिया के बीच

तुम नहीं जानती
कामनाओं के एक सीले हुए पटाखे के भीतर
आशंकाओं की हिलती हुई दीवार से टिकाकर पीठ
इतिहास की प्रेमगाथाओं के मलबे के नीचे दबकर
मैंने किया तुम्हारा इंतज़ार

मैं जानता था
जर्जर हो चुकी थी तुम्हारे प्रेम की लौ
सूखे पीले पत्तों के शोर से भरा अब मेरे जीवन का भी नेपथ्य
एक छोटी सी गांठ की तरह था मेरे ज़िस्म के अंदर जो तुम्हारा प्रेम
बदल चुका था एक बड़े टृयूमर में
फेंकता मेरे शरीर के खून के अंदर रेशे नए
फिर भी बुझे हुए चिराग से निकलते
अंधेरे की एक प्रखर किरण के सहारे
मैंने किया तुम्हारा इंतज़ार।

नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा III

ये एक लगभग खाली बस थी जो नर्मदा के किनारे बसे शहर से राजधानी जा रही थी. वो लगभग पचपन साल का आदमी होगा, शरीर पर एक खादी की बंडी, नीचे पीले रंग का धोतीनुमा कपड़ा लपेटे, पाँव में दो अलग अलग स्लीपर और बाल बेतरतीब से बढे हुए, ललाट पर लंबा सा चन्दन और आँखों में कही खालीपन था. जैसे ही उसके पास जाकर बैठा तो पूछने लगा रेलवे का ड्राईवर तो दो लाख कमा लेता है हर माह, पर ये वकील को कितनी तनख्वाह मिलती है........मैंने कहा कि नहीं अगर नौकरी करे तो तनख्वाह मिलेगी नहीं तो खुद की प्रेक्टिस करते है....फ़िर बोला तो फ़िर हलवाई को डेढ़ दो लाख मिलते होंगे, मैंने कहा नहीं उन्हें तो रोज के हिसाब से मजदूरी मिलती है अगर बड़े होटल में हो तो बात अलग है....हैरान था फ़िर बोला तो डाक्टर को भी मजदूरी मिलती है या वे धंधा खोल लेते है..........और बेचारे नाई की तनख्वाह कितनी कम है, सुतारों को छठा वेतनमान अभी तक नहीं मिला, लुहार साले केन्द्र के बराबर महंगाई भत्ता उठा रहे है......इतनी गैर बराबरी क्यों है तुम्हारे इस देश में,  मै परेशान हो गया ससुरा रेडियो मिर्ची नहीं सुनने दे रहा मैंने कहा बाबा दिक्कत क्या है चुप बैठो नहीं तो यहाँ से उठ जाओ.......थोड़ी देर बाद मुझे कंधे झिन्झोड़ता हुआ पूछने लगा "क्या जिदंगी प्यार का गीत है......? मैंने देखा कि उसकी आँखों में आंसू आ गये थे ..मै भी थोड़ा सहम गया एकदम से मैंने कहा नहीं ऐसा सबके साथ नहीं होता ऐसा......बस अपनी -अपनी किस्मत है.........मै अपने कान में हेड फोन लगाकर गाने सुनने लगा पर वो जोर- जोर से गाने लगा......जिसका जितना हो आँचल यहाँ पर ..अचानक उसकी आवाज़ बढ़ गयी, सारे यात्रियों ने उसे चुप कराने की कोशिश की पर नाकाम, आखिर  बस के कंडक्टर ने उतारा उसे और बीच घाट में उतार दिया और उस पर मानो असर ही नहीं पड़ा. उतरते समय भी वो जोर से गा रहा था..."है अगर दूर मंजिल तो क्या, राहे काँटों से मुश्किल तो क्या...."(नर्मदा किनारे बेचैनी की कथा III)

नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा II

माननीय प्रातः स्मरणीय श्री एन डी तिवारी जी के अदम्य साहस को प्रणाम और उनकी हिम्मत को जो लगातार नकारती रही रोहित को, और उस जज्बे को जिसने बत्तीस साल तक एक बाप को छुपा रखा जमाने से............अब सवाल यह है आने वाले बत्तीस सालों में कितने रोहित होंगे मेरा मतलब है आज के नेता आने वाले समय में क्या गुल खिलाएंगे............देश में कितने रोहित........अब सरकार को डी एन ए टेस्ट की प्रकिया को सरल और विकेन्द्रित ढंग से करना चाहिए और सभी पंचायत स्तर पर परीक्षण प्रयोगशालाएं स्थापित करना चाहिए............हमारे पास एनआरएचएम में "अन्टाईट" फंड होता ही है, बस कर दो स्थापित, म् प्र में तो जगह जगह जीवन आरोग्य केंद्र खुल ही रहे है बस देश भर में इस मॉडल को रेप्लीकेट करते हुए डी एन ए टेस्ट भी शुरू कर दे और मेरा विनम्र अनुरोश है कि यह नेक काम शीघ्र शुरू करें क्योकि आधे से ज्यादा रोहित अँधेरे में है और इन सबको एन डी तिवारीयों से स्वीकृती दिलवाने में समय तो लगेगा क्योकि १९९३ से पंचायती राज के प्रतिनिधि आये है और इसके पहले से विधायक और सांसद रहे है और फ़िर इसके बाद हमारे ब्युरोक्रेट्स भी तो नंबर लगाकर खड़े है और पूछ रहे है .......मेरा नंबर कब आएगा.................??? (नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा II )

Wednesday, July 25, 2012

नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा I

एक रात है और एक लंबी ट्रेन है जो काली रात में घनघोर पानी की तेज बूंदों के बीच नागिन सी सरसराती जा रही है, खूब लंबी ट्रेन है, यात्री बेसुध सो रहे है और बाहर पानी तेज हो रहा है अचानक घाट पर सिग्नल ना मिलने के कारण घाट पर यह नागिन रुक जाती है और दूर कही सदियों से ना सोया यात्री यंत्रवत सा उठता है और अपना सामान लेकर उतर जाता है... बगैर यह जाने कि उसके सामान  में कई दीगर महत्वपूर्ण सामान के साथ उसकी जान से प्यारा लेप टॉप भी है, एक अदद मोबाईल जिसमे उसके दोस्तों परिजनों के नंबर और फ़िर अपनी ज़िंदगी का पूरा बोझ... बस उतर जाता है यह यात्री और चलने लगता है बेसुध लगभग नींद में चलने के माफिक .....लोग चिल्ला रहे है पर जाने वाले कभी सुनते है किसी की ??? बस चल दिया पूरी नर्मदा की घाटी को पार करके वो सतपुडा से विन्ध्याचल की जमीन पर आ गया जब शहर की चकाचौंध में पहुंचा तो खम्बों की रोशनी में तेज बूंदें देखी, बस अपने घर (जिसे वो घर कहता था) जो सिर्फ चार दीवारों से बना था और कुछ जरूरी सामान थे जीवन जीने के या यूँ कहे कि जीवन को मारने के..........तमाम संसाधन ........रात गहरा रही थी तसल्ली यह थी कि वो लौट आया है एक लंबी यात्रा से दुःख देने वाले जीवन से... किसके लिए यह तो नहीं पता पर लौटना सच में लौटना होता है क्या? (नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा)

अरविंद का आत्मघाती कदम.......



अन्ना आंदोलन से मेरे वैचारिक मतभेद रहे है पर आज जब अरविंद को भूख हडताल पर बैठे देख रहा हूँ तो दुःख इसलिए हो रहा है कि वो शक्कर की बीमारी के मरीज है वो भी घातक स्तर की शक्कर, यह मै खुद जान सकता हूँ कि यह कितना आत्मघाती कदम है क्योकि मै खुद भी इसी लाईलाज बीमारी का शिकार हूँ और यदि दो से तीन घंटे में कुछ खाया नहीं तो हालत पस्त हो जाती है और लगता है कि अब गया कि तब गया...........एक व्यक्ति के रूप में वो बेहद अच्छे इंसान है और इस बीमारी के साथ लड़ते हुए वे अनशन पर ना बैठे या कम से कम तरल फलो का ज्यूस लेते रहे यही कामना और अनुरोध है. मै खुद इस समय इससे लड़ रहा हूँ अपने माँ और पिता को शक्कर की बीमारी से खो चुका हूँ.............इससे घातक और कोई बीमारी नहीं है आज सुबह जब एनडीटीवी पर उनके माता पिता कह रहे थे तो मुझे एक पल के लिए लगा कि ये क्या हो रहा है इस देश में........सब भूल गया मै और सिर्फ शुगर के मरीज को देखते हुए मुझे यह लगा कि अरविंद को अनशन नहीं करना चाहिए हर हाल में नहीं..........उन्हें समझाओ भाई ........
Sushobhit Saktawat की दीवार से साभार बहुत ही प्रेरक पंक्तियाँ ....पढ़ो और समझते रहो.......

सैद्धांतिक रूप से सुख की एक संपूर्ण संभावना है : अपने भीतर के उस एक तत्‍व में भरोसा रखना, जिसे कभी नष्‍ट नहीं किया जा सकता, और कभी उसकी कामना न करना।

[काफ़्का]

Tuesday, July 24, 2012

कविता का चरम !!!

आज होशंगाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान इस सदी के महानतम संचालक महोदय (स्थानीय विधायक के भाई द्वारा विभूषित) को यह कहते सुना कि "जब कविता अपने चरम पर पहुँच जाती है तो वह भजन बन जाती है" और उन्होंने इसके तर्क भी दिए जैसे रामायण, महाभारत, गीता आदि..........हे अशोक पांडेय, कुमार अम्बुज, राजेश जोशी, देवताले जी, बोधिसत्व, जितेन्द्र श्रीवास्तव, बहादुर पटेल, आभा निवसरकर मोंढे, सुनीता, ज्योति, अनुज लुगुन, और ढेर सारे हिन्दी के मूर्धन्य कवियों आप लोगों की कविता भजन कब बनेगी..................ताकि हम हारमोनियम तबले पर झूम झूम कर गा सके और बजा सके तालियाँ.....................

Janani parivahan a reality in Hoshangabad

I was in Govt hospital just to see what all is happening for IMR and MMR. I just entered today at 815 PM in Call center of janani parivahan. There was a call at 835 PM the operator informed the janani Driver to reach in some near by village which was 45 KM away from Dist HQ. The driver took it very casually when I asked, he said am going and want to go but there is no Petrol in my Van, I have consumed all petrol while coming from Bhopal the owner will reach hospital in 15-20 minutes and then I will start for village. It was 840 PM by this time and then I show little anger and finally he took van and went out of the premises at 855 PM. When asked the operator why this van had gone to Bhopal he said every day the Doctors are referring 4-6-8 cases as SNCU is having only 20 beds for infants and they dont want to take any risk. Now district hospitals has only two vans for janani parivahan and if both are going to Bhopal with referred cases who will take care of Women of Rural areas, also the Drivers are taking 2 to 3 trips to Bhopal in a day, even the poor drivers are nt getting time to eat Lunch or Diner. Now questions are why dont we increase Vans, why cant we extend seats/beds in SNCU and whats the interests of Doctors for referring the cases in Bhopal which is very risky as road is often blocked at Ghat section and it takes minimum two hours. I was really shocked .......who will take care of this??? Same Doctors living in vicinity of 30 to 45 KM and doing up down to District hospital use the same Van to pick and drop them in hospital from the house. How do they make entries of this God knows........

यानी कि हिन्दी के लोग ही हिन्दी के दुश्मन................है???


Saurabh Arya says

सरकारी स्‍तर पर होने वाली खरीद के संबंध में राजभाषा विभाग, भारत सरकार का नियम कहता है कि प्रति वर्ष एक मंत्रालय/विभाग/ किसी भी केन्‍द्रीय कार्यालय द्वारा खरीदी जानी वाली कुल पुस्‍तकों की राशि का न्‍यूनतम 50 % हिन्‍दी पुस्‍तकों पर व्‍यय होना चाहिए. बस यहीं से इस गोरखधंधे की शुरूआत हो जाती है. इसमें कोई संदेह नहीं कि राजभाषा विभाग ने यह नियम हिंदी पुस्‍तकों और हिंदी को बढ़ावा देने के लिए किया है. परंतु इन कार्यालयों के लिए पुस्‍तक चयन समिति के कोई मानदण्‍ड निर्धारित नहीं किए हैं. हालांकि राजभाषा विभाग एवं एकाध सरकारी समिति कुछ श्रेष्‍ठ पुस्‍‍तकों को अनुशंसा जरूर करती हैं पर यह नियमित आधार पर नहीं हो रहा है एवं उसमें नई और उत्‍कृष्ट पुस्‍तकें अपना स्‍थान नहीं बना पा रही हैं. आम तौर पर विभागों के अधिकारी अपने यारों-प्‍यारों की पुस्‍तकों और कमीशन देने वाले प्रकाशक से पुस्‍तकें थोक में खरीद रहे हैं. पाठकों ने किन पुस्‍तकों को कितना पढ़ा, पाठकों की इन पुस्‍तकों के स्‍तर पर प्रतिक्रिया को भी सरकारी खरीद के समय मद्देनज़र रखा जाना चाहिए. इस बारे में दो-चार आर टीआई तो मेरे दिमाग में भी घूम रही हैं. आप लोग भी अपने आस-पास इस बारे में सचेत रहें और पुस्‍तकालयों को कचराघर बनने से बचाएं.

यानी कि हिन्दी के लोग ही हिन्दी के दुश्मन................है???

मन की पुतलियों में बसा रहा मिलन स्वप्न - जितेन्द्र श्रीवास्तव

अमृतलाल वेगड-सहज, सादे और बहुत ही आत्मीय

जहां भी गये अहम छोड़ आये
सलोने सलोने गम छोड़ आये

Sunday, July 22, 2012

Impose rule of Returning the Amount Incurred in your education

सब कुछ तो है जिससे जिन्दगी बनती है

Kushagra Kadam की दीवार से साभार.......अदभुत पंक्तियाँ .....देर रात की बेचैनी और संताप के बाद लगा कि भाई सही कह रहा है.......गोया कि अपना क्या है इस जीवन में सबसे लिया उधार..........

थोडा डर गया था, थोडा सहम गया था
फिर रात आई, मैं अपने पास आया
बात खोली और स्थिति टटोली
हाथ वहीँ, पैर वहीँ, उम्मीद वहीँ और
ताकत अपनी भी तो अपने ही भीतर है
सब कुछ तो है जिससे जिन्दगी बनती है
फिर क्या?

Saturday, July 21, 2012

कफस हवा का ही परवाज़ खा गया मेरी *

असुविधा पर मेरी कोशिश हमेशा से नए से नए रचनाकार को स्पेस देने की है. मुझे संतोष है कि आज प्रिंट तथा ब्लॉगदोनों क्षेत्रों में अपनी जगह बना चुके तमाम रचनाकार सबसे पहले या अपने बिलकुल आरम्भ के समय में असुविधा पर छपे थे. आज इसी क्रम में आदित्य प्रकाश की यह पहली कहानी पेश करते हुए एक गहरा आत्मसंतोष हो रहा हैयह इसलिए और कि मैंने पिछले दो सालों में आदित्य के भीतर के मनुष्य और रचनाकारदोनों को बनते हुए और बदलते हुए देखा है और इस कहानी की रचना-प्रक्रिया में कहीं न कहीं शामिल भी रहा हूँ. काल सेंटर में काम करने वाले एक संवेदनशील युवा की कशमकश को यह कहानी बहुत  सहजता से दर्ज करते हुए नवउदारवादी आर्थिक व्यवस्था के इन नए प्रेक्षागृहों के भीतर पनप रही उस नयी संस्कृति के उस भयावह चेहरे को बेपर्द जिसे सतरंगे रैपरों में लपेट कर पेश किया जाता है. इस कहानी में जो चीज मुझे सबसे अधिक अपील करती हा वह है किस्सागोई का शुद्ध एशियाई तरीका. इसपर फिलहाल किसी बड़े लेखक का प्रभाव दर्ज नहीं किया जा सकता. साथ ही आदित्य ने जो विषय  उठाया है वह उसके आसपास का है और हिन्दी में अब तक अछूता. असल में मुझे यह बड़ी दिक्कत लगती है कि हमारी समकालीन रचनाओं में  नयी आर्थिक व्यवस्था के बाद बने ये नए क्षेत्र बहुत कम आये हैं और जहाँ आये भी हैं वहाँ एक बाहरी दर्शक या फिर संवेदनशील,लेकिन अपरिचित आलोचक की निगाहों से देखे हुए ही दीखते हैंजहाँ सैद्धांतिक आलोचनाएं तो होती हैं लेकिन वह ज़रूरी आत्मीयता और अंतर्दृष्टि नहीं होती जिसके सहारे एक पाठक उस दुनिया में प्रवेश कर अपनी निगाह से उस पूरे परिदृश्य को देख सके, समझ सके और फिर उसमें खुद को लोकेट कर सके. आदित्य की यह कहानी उस ज़रूरी काम को करने की करने की श्लाघनीय कोशिश करती है और भविष्य के लिए उम्मीदें जगाती हैं. https://www.facebook.com/kumarashok75



कफस हवा का ही परवाज़ खा गया मेरी *

बार बार फोन निकाल के देखने में डर लगता हैं, कहीं कोई देख न ले कि यह फोन ले के आ गया हैं आज फिर, पर मजबूरी हैं घडी जो नही हैं.अब ऐसा भी नही हैं कि खरीद नही सकता लेकिन कुछ और बात हैं इसलिए नही पहनता... अरे भाई लड़की का चक्कर नही हैं. पिछली बार भी जब इस नो पेपर ज़ोन में फोन के साथ पकड़ा गया था तब भी यही जवाब दिया था गंजे मैनेजर को. पता नही सबको यहीं क्यूँ लगता हैं कि लड़की का चक्कर रहा होगा इसलिए नही पहनता लेकिन कैसे बताऊ कि दसवी पास होने पर मामा ने जो घडी दी थी, १२०० कि थी टाइटन वो भी गोल्ड प्लेटेड, लेकिन बेरोजगारी के दिनों में पाठक ने उसे गुम कर दिया था. बड़ी कोफ़्त हुई थी उस रोज अपने आप पर, उसी दिन पता नही किस खीझ में कसम ले ली कि अब कभी घडी न खरीदूंगा और न ही पहनूंगा.  लेकिन आज तो बार बार चिढ सी हो रही हैं फोन कि तरफ भी देखने में. भूख के मारें दिमाग खराब हुआ जा रहा हैं और ब्रेक नहीं मिल रही हैं. कहने को तो ये अब बहुराष्ट्रीय कंपनी बन गयी हैं लेकिन काम अभी भी वहीँ बनिए के दूकान जैसा. कब से बैठे हैं लेकिन ब्रेक नहीं हैं इसलिए जगह से उठ नहीं सकते. कालसेंटर कि जिंदगी भी न और वो भी टेकसपोर्ट में काम करना तो जी का जंजाल हैं. लेकिन क्या करते बीए करने के बाद और क्या मिल जाता. एमबीए के लिए पिताजी के पास पैसे नहीं थे और मन भी नहीं था. लेकिन अब तो सब भूलगया बीती बातें. अच्छी तनख्वाह हैं और पिछले साल प्रमोशन भी मिल गया था. बस रात भर जागना पड़ता हैं और हफ्ते में दो दिन कि छुट्टी. क्या चाहिए इसके अलावा. सब ठीक तो हैं. गांव में तो लोग यही जानते हैं कि बढ़िया नौकरी हैं और गाड़ी से आता जाता हैं. जब प्रमोशन मिला था दो साल के बाद तो कार के भी सपने आने लगे थे लेकिन अब सब धुंधले पड़ गए हैं. रोज रोज कि इस चिक चिक से तबाह हो गया हूँ और ऊपर से राणा साहेब कि रोज कि नसीहतें भी नहीं बर्दाश्त होती हैं. लेकिन क्या करें फिर से एजेंट नही बनना हैं कहीं और जाकर इसलिए टिके हुए हैं. अब तो धीरे धीरे सब्र साथ छोड़ रहा हैं. थोड़ी सी देर में ये सब सोचतें हुए झल्ला गया और सीट से उठ बैठा. पास ही दीपक खड़ा था. दीपक और मैं साथ साथ कालिंग करते थे लेकिन उसने बीटेक करी थी इसलिए उसे पहले प्रमोट कर दिया. अब टीम लीड हैं दूसरे टीम का. पुरानी कहावत हैं यहाँ कि जब आप काम करने लायक नहीं होते या हरामखोरी बढ़ जाती हैं तो आपको प्रमोट कर दिया जाता हैं क्यूंकि तब आप पर अपने जैसे ही कुछ लोगो को संभालना और काम करवाना पड़ता हैं तो सब समझ में जाता हैं. दीपक के भी साथ यही हुआ था लेकिन अभी भी दोस्ती हैं वो भी बढ़िया वाली.. गाली दे दो तो बुरा नहीं मानता. 

दीपक को देख कर कुछ उम्मीद तो जगी कि अब थोड़ी देर कि फुर्सत मिलेगी. शायद वो भी समझ गया और अपने मुस्कुराने वाले अंदाज में बोल पड़ा, ब्रेक मत मंगियो भाई...गंजा बोल के गया हैं कि अगले आधे घंटे तक फ्रीज़ हैं सब कुछ. बैक तो बैक कॉल हैं..सब लाल पड़ा हैं. ये सुनकर रही सही उम्मीद भी जाती रही. मैं भी गुसे में जवाब दिया ..हाँ बे अब तो तुम सिर्फ गंजे कि ही बात सुनते हो. भूल गए बेटा अपने दिन जब ब्रेक के लिए लड़ते थे मोहन से. जबरदस्ती ले लेते थे और मेरा ही सिखाया जुमला कि ब्रेक लेना हमारा अधिकार हैं और जब चाहे तब ले सकते हैं. इसमें हमारी मर्ज़ी चलेगी. दीपक भी जवाब के साथ तैयार था कि लेकिन अभी नहीं मिल पाएगी यू नो बिसनेस नीड. मेरा पास भी जवाब था ..हाँ अब तो सब नीड याद आ गयी होगी तुम्हे ..आगे कि चीज दिख रही हैं न इसीलिए, बढ़िया हैं अच्छे दिख रहे हो रंग बदल कर. उसे मुझसे ऐसे जवाब कि उम्मीद नहीं थी वो भी सब के सामने. दोस्त हैं तो क्या हुआ टी एल हैं. कुछ बोला नहीं अपने सिस्टम में झाँक कर बोला कि जाओ एक डिनर ब्रेक हैं. ले लो लेकिन टाइम से आ जाना. मैंने भी बिना कुछ भाव बदले चुपचाप लाग ओउट किया और सिस्टम लोक करके बाहर निकल आया. शायद उसे मेरा ये रवैया अच्छा नहीं लगा या फिर पुरानी दोस्ती के दिन याद आ गए. पीछे पीछे चला आया. हम दोनों साथ साथ कैफेटेरिया तक आयें. कोई एक दूसरे से कुछ नहीं बोला.  मैंने जल्दी से खाने वालों कि लाइन में लग गया. आधे घंटे में ही सब कुछ करना था. यहाँ खाना और नीचे जाकर सुट्टा भी. दीपक पीछे ही था ...कहना शुरू किया कि पंडित बात समझो ..मेरे हाथ में सब कुछ नहीं हैं. गंजा मेरी जान का दुश्मन बन जाता हैं मीटिंगों में. क्या करूँ तुम्हारी तरह मैं भी मजदूर हूँ. उसकी बातें सुनकर मेरे भी मुह से निकल पड़ा हाँ बे मजदूर मतलब मज़ा से दूर ..कोई बात नहीं. फिर उसने धीरे से कहा कि सबके सामने ऐसे मत बोला कर अब ठीक नहीं लगता. मुझे भी लगा कि कुछ ज्यादे ही हो गया था. मैंने कुछ कहा चुप रह गया. माफ़ी मांगना ठीक नहीं लगा और सोच कि ये तो रोज कि चिक चिक हैं. क्या बात करना इस बारें में. 

खाने के काउंटर पर आज कोई नया वेंडर आया हुआ हैं ....क्यूंकि सब कुछ नया सा दिखाई दे रहा था. सारे बैरे भी नए नजर आ रहे थे. थोड़ी खुशी मिली कि कुछ बढ़िया खाना लायें होंगे पहले दिन तो और आज भूख भी जबरदस्त हैं. दबा के खायेंगे और सुबह दूध के पैसे बच जायेंगे. हर रोज कि तरह मीठे वाले आईटम को नज़रें खोजने लगी. जलेबियां देखकर तो सब कुछ भूल गया मैं. थोड़ी ही देर पहलें मन में नौकरी, दोस्ती, पैसा सबकुछ चल रहा था लेकिन अब सब भूल गया. आदमी का दिमाग भी कैसा होता हैं एक पल पहले क्या क्या था और अभी सिर्फ जलेबियां पाने कि ललक थी. शायद ऊपर वालें ने उसे सबसे बेहतरीन ताकत भूलने कि ही दी हैं. मीठे के काउंटर पर खड़े बैरे को मैंने बड़े प्यार से देखा और उसने बिना कुछ कहें एक कटोरी में जलेबियां रख दी. मेरे ललचाएं मन ने फिर मुह खोलने पर मजबूर कर दियां. मैंने उससे बड़े प्यार से कहा कि अरे भैया थोडा और रख दो...सुने मुस्कुरातें हुए जवाब दिया ..सर जितना दे सकते थे दे दिया. सबका हिस्सा हैं यहाँ पर. मुझे उससे कुछ भी कहना ठीक नहीं लगा. ऐसे लोगो से प्यार से बात करो तो सर चढ जातें हैं. मैं भुनभुनाते हुए आगे बढ़ गया. पीछे खड़े दीपक कि बात सुनाई दी मुझे ...अरे दे देते भैया पंडित जी हैं हमारे. सिर्फ मीठे से ही प्यार हैं इनको. सिर्फ उसकी हसने कि आवाज सुनाई दी. मैंने मूड कर नहीं देखा. 

खैर किसी तरह दिन बीत गया या कहूँ कि रात बीत गयी और दिन निकल आया रोज कि तरह घर आकार सो गया. शाम ढलते ढलते आँख खुली और सुबह शुरू हुई. खाना बनाने वाली नहीं रखा कभी और घर पे कभी कभार ही खाना बनता था. होटल जाकर कुछ खाया और घर आकार गाड़ी का इन्तेज़ार करने लगा. बहुत सारी बातें जिन्हें भूलना चाहता था याद किया बारी बारी ...नौकरी, इन्क्रीमेंट, प्रमोशन, पिताजी का इलाज और शिवांगी को भी. सब मीलों दूर हैं जिस जगह मैं हूँ लेकिन फिर भी हर वक्त आखों के आगे घूमते रहते हैं. कुछ भी कर लो लाख बहाने बना लो भूलते नहीं हैं. कुछ सूझता भी नहीं कोई रास्ता भी नहीं दीखता. वापिस घर भी नहीं जा सकता ..इतनी हिम्मत नहीं हैं मुझमे. कभी कभी घर बहुत याद आता हैं. लेकिन भाग के आया था वहाँ से इसलिए जा नहीं पाउँगा. कोई जवाब भी नहीं हैं और कुछ हैं भी नहीं. शाम घिर आई थी जब बाहर झाँका तो,गुलामी पर जाने का वक्त करीब आ चूका था. रोज ही तो आता हैं. कौन सा आज कुछ नया हो रहा हैं. कई बार तो लगता हैं की कुछ भी तो नही बदला हैं. बेमन से तैयार होकर चला आया हूँ रोज की तरह. फिर से वहीँ सब कुछ करना हैं.

कुछ खास नही हुआ उस रोज बस जोर जोर से हंसना, किसी नयी लड़की के बारें दो चार बातें उसकी भाव भंगिमा को लेकर और किसी युगल को देखकर थोड़ी बहुत इधर उधर की बातें बस. हमारा बढ़िया दिन अक्सर ऐसे ही बीत जाता था. खाने के लिए कैफेटेरिया पहुंचे, फिर से लाइन में लगे और खाना लिया. उस रोज रसगुल्ले थे. वहीँ लड़का अपना जगह पर था. उसने एक हलकी सी मुस्कान दी लेकिन आज मेरा मन नही था. कल इसने सबके सामने मुझे मना कर दीया था और मुझे ऐसे लोगो से बात नही करनी चाहिए. बिना मुस्काए या कुछ कहें मैं आगे बढ़ गया. भरी हुई थाली लेकर मै खाली जगह जा बैठा. मुझे अपने बारें थोडा अजीब लगा लेकिन फिर मैंने ध्यान नही दिया. कुछ और दोस्त लोग भी आ गए और हम फिर अपनी बातों में खो गए. खाना खतम ब्रेक खतम और फिर से वही हेडसेट और चीखना चिल्लाना. किसी अमरीकन बुड्ढे पर अपना दिल खाली किया और बिना बताये फिर से उसी कैफेटेरिया में आके बैठ गया. खाना खतम होने वाला था. सब लोग खा चुके थे. बैरे बर्तन खाली करने में जुटे हुए थे और सिर्फ बर्तनों कि आवाजे आ रही थी. मैं कुछ भी सोचने के लायक नही था उस वक्त ..मैंने देखा कि मिठाई के काउंटर वाला बंदा मेरी तरफ ही आ रहा था और उसके हाथ में एक बड़ी सी कटोरी थी. मेरे पास आकर उसने बड़े धीरे से कहा कि पंडित जी लीजिए रसगुल्ले खाईये. मैंने कहा कि बच गए हैं इसलिए खिला रहे हो ...वो हँसते हुए बोल पड़ा अरे नही पंडित जी मुझे लगा कि आप नाराज हो गए हैं और यहाँ अकेले बैठे हैं. मुझे उसका ये तरीका अच्छा लगा. मैंने कहा आप भी बैठो साथ ही खाते हैं. उसने अपने साथ वाले लोगो को आवाज दी कि जब सब काम खत्म हो जाए तो बता देना. धीरे धीरे हम दोनों में बात शुरू हुई ..मैंने अपने घर के बारें में, परिवार के बारें में थोड़ी बहुत बाते कही उसने भी बताया कि इस कैटरिंग का मालिक एक सरदारजी हैं और वो उनका मुलाजिम. पिछले सात सालों से उनके साथ ही काम कर रहा हैं. मैंने फिर पुछा कि कहाँ के रहने वालें हो आप ...उसका जवाब था कि घर हैं जिला गोरखपुर . मुझे अच्छा लगा ....अरे मैं भी तो पास का ही हूँ ..गोरखपुर में कहाँ.. उसने चहकते हुए जवाब दिया ..गोला बाज़ार के पास, मैंने फिर पुछा कौन गांव हैं जी आपका? उसका जवाब था कि गोला बाज़ार से पच्छू ओर हैं एक गांव सेमरी और सीधे चकरोड जाता हैं कोडरी ...वहीँ हमरा घर हैं.. कोडरी से कुछ याद आया ...मैं गया था वहाँ एक बार और वो पूरा इलाका घुमा भी हुआ था मेरा… अपने बाबा के साथ साईकिल पे. थोडा जोर दिया दिमाग पे तो याद आया कि कौवा चाचा कि शादी में गया था वहाँ. बहुत छोटा था. पहली बार रात भर जाग कर विडियो पर फिल्म भी देखि थी. बहुत दूर चला आया हूँ उन सबसे अब. मैंने फिर कहा कि मैं गया हूँ कोडरी, मेरे चाचा कि शादी हुई हैं वहाँ.. ननिहाल हैं उस गांव में. ये सुनकर उसके चेहरे पर एक खुशी कि लहर आ गयी ...उसने पूछना शुरु किया किसके घर ..अब मुश्किल मेरी और थी बहुत जोर डालने पर भी नाम नही याद आया, चौथी कक्षा कि वार्षिक परीक्षा के बाद गया था वहाँ ...कुछ नही तो कम से कम बीस साल तो हो ही गए होंगे. मैंने धीरे से कहा कि नाम तो नही याद हैं लेकिन घर के बाहर बाग था आम का..प्राइमरी स्कूल भी था उसी के बगल में. आपका घर किस तरफ हैं? उसने कहा कि जरुर मिश्राने में होगा आप के नाना का घर ..हमारा तो बाग के दखिन और चमरौटिया  में हैं. अब पक्का करा लिया हैं. ये कहते हुए उसके चेहरे पे कोई शिकन नही थी. मिश्राने में अब तो कोई रह नही गया हैं. पूरा खाली पड़ा हैं..सबके बच्चे गोलबाजार जाते हैं पढ़ने. उसका एक और सवाल आया मेरे सामने ...आपका बियाह हुआ पंडित जी? अब मेरे मुस्कुराने कि बारी थी ..अरे नही भाई साहेब अभी नही हुई हैं . मैंने सवाल दागा ...आपकी हो गयी हैं कि नही, उसका जवाब आया अरे दो बच्चे हैं यहीं पढते हैं, घरवाली भी यहीं हैं. अम्मा भी हमरे साथ ही रहती हैं यहीं. सरदार जी ने कमरा दीया हैं. मैंने फिर पुछा ..और गांव पे कौन हैं अब? बडके दादा के लड़के हैं ...मास्टर हैं स्कूल में गांव वाले. बोवाई में गया था घर ...परिवार सहित फिर जायेंगे होली के बाद भतीजी का बियाह हैं. मैंने कहा बढ़िया हैं. आप तो घर के ही आदमी निकले. मुझे वहाँ बैठे हुए देर हो गयी थी ...रसगुल्ले भी खतम हो गये  था. अंदर सब तलाश रहे होंगे मुझे. मैंने नमस्कार करते हुए विदा लिया उनसे. जब अंदर आ गया तब लगा कि अरे मैंने नाम तो पुछा ही नही उनका, मैं भी क्या आदमी हो गया हूँ. सब कुछ भूल जाता हूँ. 

अंदर आते ही लोग सवाल करने लगे ...कहाँ गायब थे, बिना बताएं.मैंने कुछ जवाब नही दिया. एक चुप हज़ार चुप..मन में यही था जो ठीक लगे कर लो. फिर उसी गंजे के पास भेजा गया मुझे ..उसकी वहीँ चिर परिचित मुस्कान और चमकती खोपड़ी याद आई मुझे एक बार को लगा कि गश खा के गिर जाऊंगा...रोज रोज का ये टंटा तो जान पे बन आया हैं. उसके केबिन में भरपूर रौशनी थी..जिसका असर उसकी गंजी खोपड़ी पे साफ़ दिखाई दे रहा था. मैं पहले से ही बहुत जला हुआ हूँ .. मेरे चेहरे पे साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा था. उसने भांप ली ये बात ..बोला मुझसे ..क्या हुआ मेरे रुस्तम ..जाना ही हैं तो बता तो दिया कर ..तेरी खबर तो हो हमें कि कहाँ हैं तू? मैंने कुछ नही कहा ..उसने प्यार से कहा बैठ जा आराम से ..अगर आज तेरा मन नही हैं तो मत कर कालिंग. मैनेजर औक्स ले ले. फिर उसने धीरे से चैट पे किसी को पिंग किया कि इसका लॉगिन करके मैनेजर औक्स पे डाल दो. मैंने जेब से रुमाल निकला और पसीना पोछते हुए उसके सामने बैठ गया. उसने कम्पूटर स्क्रीन कि तरफ निगाह करके कहना शुरू किया ...मैं तुझसे वैसे भी मिलना चाहता था. कुछ बात करनी थी.. कितने साल हो गए तुझे यहाँ? मैंने धीरे से कहा..साढ़े तीन साल से ऊपर . अक्टूबर में चार साल हो जायेंगे. उसने कहा..फिर क्या सोचा हैं तुने ...यहीं रहेगा या कहीं और जाएगा. छोड़ने कि तो नही सोच रहा हैं. मैं फिर चुप रहा. मुझे नही मालूम था कि क्या जवाब दू . उसने लैपटाप मेरी तरफ मोड दिया ..सामने मेल बॉक्स खुला हुआ था. एक मेल भी खुली हुई थी. मैंने बिना कुछ पूछे पढ़ना शुरु किया. अगली आईजेपी कि अनाउंसमेंट थी. अगले दो हफ्ते में पूरी करनी थी टाइम लिमिट भी लिखी थी साथ में.. मैंने गंजे को देखा मेरी आखों में अब कुछ सुकून था ..लगने लगा की कोई रास्ता हैं...मन में कई प्रश्न चक्कर काटने लगे. अब उसकी बारी थी. हम दोनों साथ साथ मुस्कुराये फिर उसने शुरू किया अपना दिमाग ठंडा रखा कर, सबसे लड़ा मत कर वर्ना तेरे जैसे बड़े सारे देखे हमने यहाँ ...कितने आयें और चले गए. मैं भी ऐसा ही था ...बात बात पे सबसे भिड जाता था लेकिन हर चीज का एक वक्त होता हैं. तू अकेला नहीं हैं जो दुखी हैं ...तेरे अपने ही साथ के लोग हैं जो अब तक वहीँ हैं. उनसे पूछ की क्या कर रहे हैं वो ...अभी माहौल बहुत गर्म हैं. छोटी छोटी गलतियों पर पिंक स्लिप मिल रहि हैं रजत पागल हुआ हैं और तेरी तो..मालूम हैं न तुझे. अपनी नौकरी बचा और दिखा की तू कंपनी के लिए सही कैंडिडेट हैं. आज आखिरी बार बता रहा हूँ फिर नहीं कहूँगा ...और मुझे मालूम था की तू कहाँ था इतनी देर. मेरे पास कोई शब्द नहीं था उसके लिए. उसने फिर बोलना शुरू किया की देख मन न हो तो जबरदस्ती मैं खुद भी नहीं करता किसी से ...लेकिन काम हैं तो करना ही पड़ेगा. मोटी मुझे दिखा के और सुना के भी गयी हैं की तू वहाँ बैठा हैं और उस कैफेटेरिया वाले से लगा हैं. क्या जरुरत हैं तुझे उससे बात करने की ..उनसे तेरा क्या काम. बस एक रसगुल्ला ज्यादे मिल जाएगा इसलिए दोस्ती बढ़ा रहा हैं उससे. मोटी तुझसे खुद बात करना चाह रही थी लेकिन मैंने ही मना कर दिया. तभी उसके ब्लैकबेरी बज उठा. उसने फोन उठाया. मुझे नहीं मालूम की किसका फोन था ..एक बार को लगा की मोटी ही होगी उसी के खुजली मचती हैं हमेशा.. फोन रख के उसने फिर बोलना शुरू किया कुछ दिन शांत रहो..काम में मन लगाओ, अंदर किसी को इस बारे में खबर नहीं होनी चाहिए वर्ना फिर रह जाएगा साले एडियाँ रगड़ते..तेरा प्रमोशन इस बार पक्का हैं. मैं अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ कांच के दरवाज़े से बाहर निकलने लगा तो उसने बड़े प्यार से कहा की अब कहाँ जाएगा ..मैंने कहा की लोगिन कर लू जा के. उसने कहा ग्रेट ..एक और काम कर क्या तू वीक ऑफ पे भी आ जायेगा..श्रीन्केज बढ़ गयी हैं टीम की. एक्स्ट्रा लोगिन फायदा ही करेगा तुझे. मैंने दबे मन से कह दिया की बिलकुल आ जाऊंगा. उसने फिर कहा की ओटी नहीं मिलेगी लेकिन. मेरा जवाब था कोई बात नहीं. बस कैब की मेल कर देना आप. उसने कहा निक को बोल देना वो तेरी रिक्वेस्ट ट्रांसपोर्ट को भेज देगा. मैं बाहर निकल आया. वो लैपटॉप में घुस गया. मैं दबे मन से फ्लोर पे वापस आ गया. समझ ही नहीं पा रहा था की खुश होऊ या फिर दुखी. वैसे मेरी ये हालत अक्सर हो जाती हैं ..लगता  हैं जैसे सोचने और समझने की ताकत खतम हो गयी हैं. नहीं जानता की क्या करूँ ऐसी हालत में. रात भर जागने और दिन भर सोने की वजह से तो नहीं हो रहा हैं ये सब..कुछ कर भी तो नहीं सकता हूँ मैं. फ्लोर पे खून बरस रहा था..जब भी हमें क्यु लाल दिखती बड़ी स्क्रीन पे हम यही जुमला दुहराते. हेडसेट फिर से कान पे चढा लिया. सब के सब अपने अपने काम में लगे थे. 

सुबह हुई ..कांच की दीवारों से सूरज की नरम रौशनी आने लगी, मतलब साफ़ साफ़ दिखने लगा की रात बीत गयी और अब निकलना हैं यहाँ से अपने घर की तरफ. कुछ एक दोस्तों के साथ लिफ्ट से नीचे उतरे..रास्ते भर उसी के बारेंमें बातें होती रही की क्या हुआ अंदर ..मेरी शकल देख कर हर कोई यहीं अंदाजा लगा रहा था की आज झाड पड़ी हैं लौंडे को तगड़ी वाली. क्या पता की कुछ और भी होने वाला हो इसके साथ. कई लोगो को बाहर का रास्ता दिखाया जा चूका हैं ..जितने पुराने लोग हैं उनपे गाज कभी भी गिर सकती हैं. सब साले थोड़ी प्रमोट हो जायेंगे. जो चुपेबजी में तेज हैं वो बच जाएगा बाकियों की तो लगेगी. कुछ लोग खुश भी थे और मेरे जैसे लोग मुझसे जानना चाहते थे की क्या हुआ अंदर. ट्रांसपोर्ट ज़ोन में दीपक मिल गया मुझे शुक्ला भी उसके साथ था. मैं और शुक्ला जी साथ साथ ही थे. वो भी दुखी था, डर था की कहीं उसका नंबर न हो अगर नौकरी चली गयी तो क्या करेगा. उसने बड़े प्रेम से पुछा की क्या हुआ पंडित जी ..बुरी खबर हैं क्या? उसकी आखों में साफ़ दिखाई दे रहा था की हम लोगो के भविष्य पे तलवार लटकी हैं. कब गिर जायेगी कोई नहीं जानता? बुरा तो और भी हैं की कोई सुनवाई भी नहीं होती ..किस ज़माने की गलतियाँ खोद निकालते हैं. अब जाके मैं कुछ कहने लायक हुआ था क्यूंकि शुक्ला की ये हालत मुझसे देखि नहीं जा रही थी. मेरे कुछ बोलने से पहले ही वो बोल पड़े , तुमको भी सुना दिया फरमान आज और एहसान जरुर जताया होगा गंजे ने ..मैं तो सोच सोच के मरा जा रहा हूँ की मेरा क्या होगा अगर निकाल दिया तो ..बीवी प्रेगनेंट हैं,  गाड़ी की किश्त भी हैं, पिछले दो महीने से इंसेंटिव भी नहीं आ रहा हैं ठीक से. खर्चा मुश्किल हो गया हैं. दीपक ने रोका उनको अरे इससे पूछो तो साले से की क्या हुआ हैं अंदर..मुझे भी नहीं बताया कुछ. दादा से पूछा तो कहने लगे की तुम्हारे काम का नहीं हैं. अब तू बता बे की क्या हुआ? मैंने बड़ी सफाई से आईजेपी छोड़ के सारी बातें बता दी उसे ..अब शुक्ला के चेहरे का रंग उड़ गया था उसने आहें भरते हुए बड़े धीरे से कहा कि मतलब अभी तुम्हारा नंबर नहीं आया हैं. दीपक की तरफ मुड़कर बोला ..फिर कौन हैं लिस्ट में ऊपर ..दीपक ने चेहरा दूसरी तरफ फेरते हुए जवाब दिया- नहीं मालूम भाई किसका हैं. सिर्फ मोटी और रजत को ही मालूम हैं. वही दोनों मिल के गुल खिला रहे हैं.. मालूम हैं रजत ने क्या कहा मीटिंग में ..सारी गंदगी साफ़ कर दूँगा इस बार कोई नहीं बचेगा. हमपे भी गाज गिर सकती हैं. हम सबके चेहरे मुरझाये थे ..शुक्ला का अपना रीसन था, मेरी छुटियाँ शहीद हो गयी थी, दीपक की खबर नहीं थी हमें. बड़े लोग हैं होगा कुछ. हम तीनो ने अपनी अपनी कैब ले ली और घर की तरफ निकल पड़े. सुबह सुबह रास्तो को जी भर के निहारता रहता था मैं...खास तौर पे खाली रस्ते मुझे बहुत पसंद थे. चाणक्यपुरी और शांतिपथ तक आते आते मैं सब कुछ भूल गया. वीकऑफ जाने का दुख जरुर था लेकिन सोचकर देखा तो लगा की वैसे भी मैं क्या करूँगा दो दिन. अब तो किसी का इन्तेज़ार भी नहीं रहता. उसके कालेज भी नहीं जा सकता. शराब पीता नहीं ..कोई फिल्म ऐसी नहीं आई हैं इनदिनों की देखने जाऊ. हफ्ते के बीच में कोई दोस्त घर पे भी तो नहीं मिलता,कम से कम खाना बनाने से फुर्सत रहेगी इन दो दिनों में.  घर पहुंचा और बिस्तर पकड़ लियां. आज सोचने के लिए बहुत कुछ था और कुछ भी नहीं था. 

शाम हुई और दिन उग आया मेरे कमरे में ..थोडा अजीब ये लगा की मैं अब भी खुश नहीं हूँ इस खबर के बाद भी. आखिर चाहता क्या हूँ अपने आप से ... जान भी पाउँगा? एक बात तो साफ़ थी की कुछ गडबड जरुर हैं वर्ना कुछ तो कहता, भले ही रोता, चीखता, चिल्लाता तो कम से कम लेकिन किस पर..घर तो खाली हैं. ऑफिस में सोच भी नहीं सकता ऐसा कुछ भी. आवाज़ बाहर नहीं आ रही, जिन्हें दोस्त मानता हूँ उनसे भी नहीं और जो दुश्मनों की तरह हैं उनसे भी नहीं ..शायद इसे ही घुटन कहते हैं. आज जागकर बड़ी उलझन में हूँ ..बीती हुयी सारी बातें एक एक करके सामने से गुजर रही हैं ..बचपन, जवानी का उतावलापन, किसी के साथ की उम्मीद, बड़े बनने की कोशिश और तमाम सारे सपने हजारों ख्वाहिशे लिए लेकिन सब हवा  हैं. उम्मीद को चूल्हे पर पानी के साथ खौलाने लगा, एक छोटी सी उम्मीद जैसी प्रमोशन बची थी उसे भी चढा दिया ..असर दिखने लगा. मीठे की शक्कर जैसी आस तो पहले ही खत्म हो गयी थी..खरीदने के लिए कुछ पास नहीं बचा था. काली उम्मीद छान कर पी गया मैं और तैयार हो गया दुहराने के लिए रोज की जिंदगी. ऑफिस पहुंचा लेकिन आज और दिनों की तरह नहीं था मैं ..किसी लड़की को भी नहीं देखा, फब्तियां नहीं कसी. हेडसेट लगने से उथल पुथल शांत सी हो गयी. दिन भागना शुरू हो गया ..किसी ने और भी खबर सुनायी की शुक्ला को अंदर ले गयी थी मोटी, रजत वहीँ था. जब से बाहर आया हैं कुछ बोल नहीं रहा हैं. इसका पत्ता भी कट गया. मैं सबका सब कुछ सुनता रहा ..मेरे पास सुनाने को कुछ नहीं था. हम सब के आस पास मनहूसियत का बसेरा हो गया था. राणा साहेब दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रहे थे. लगता हैं की बिजली उनपर पहले गिर गयी थी लेकिन किसको उनकी फिक्र हैं. सब अपनी संभाले बैठे हैं. बहुराष्ट्रीय जगहों का पारदर्शी सच हम सबके सामने था. हर बात साफ़ साफ़ कही जाती हैं आपसे की.. पिछले इतने दिनों में आप पर इतना खर्च कर दिया हमने और आप अपनी सैलरी जस्टीफ़ाई नहीं कररहे हैं. उनके सामने आपका कोई जवाब सही नहीं होता.. आप कांच की दीवारों के बीच बैठे मजदूर हैं जिसे दिहाड़ी गाली सुनने के बाद ही मिलती हैं..वैसे भी रजत के लिए उसकी गर्लफ्रेंड और उसका तरीका...सिर्फ दो चीजे सही थी दुनिया में. लेकिन मुझे इन सबसे क्या लेना था मेरा नाम तो हैं भी नहीं. खबर तो मुझे मिल ही चुकी थी की मैं निकल जाऊंगा इन सबसे. 

थोड़ी देर बाद एक पिंग आया मैसेन्जर का ...मैं चौक गया. मोटी ने मुझे अपने केबिन में बुलाया था. दीपक ने तुरंत मुझे जाने को कहा. मैं सहमा हुआ उसके केबिन का दरवाजा खोल्कर अंदर घुसा, वो किसी से फोन पे लगी हुई थी. मेरे चेहरे का रंग उड़ गया था, मैं जिस भ्रम में था वो टूटने ही वाला था. मेरा नंबर भी आ गया. उसने इशारे से मुझे बैठने को कहा. मैंने थूक निगलते हुए बिना कुछ बोले चुपचाप सिमट गया उस कुर्सी पर. उसने फोन काटा और फिर जल्दीसे किसी को मैसेज किया साथ ही साथ बोलना भी शुरू किया ..हाउज यू? सिमटा सा जवाब मेरा भी- गुड मैम उसकी आवाज फिर खनकी ..व्हाट हपैंड येस्टरडे मैंने जान संभाल के जवाब दिया नथिंग मैम ..फिर सवाल बट आइ हर्ड समथिंग, टेल मी. मेरी जबान नहीं हिली, आवाज भी नहीं आई. फिर उसी की आवाज आई, यू वेर नाट ऑन फ्लोर एंड यू डीनट इन्फोर्म अन्य्वन. मैं अब भी चुप था उसका बोलना जारी रहा. यू आर सिनीयर इन दिस कंपनी एंड इफ यू विल बिहैव लाईक दिस व्हाट शुड एक्सपेक्ट फ्राम अदर्स. मैं अब क्या कहता ..बिजली गिरी मुझपर अगली बात से  ..रजत वांट्स तो मीट यू ..ही विल बी हियर इन अ मिनट. रेडी विथ अन आंसर. सब खत्म हो गया. रो भी नहीं सकता था. चीख भी नहीं पाया ..इतना मजबूर तो पहले भी हुआ था, कई बार हुआ था. लेकिन तब ऐसा नहीं महसूस किया था जो आज हैं. उस वक्त रोया भी, चिल्लाया भी, झगडा भी किया लेकिन आज तो कुछ नहीं था. 

तभी रजत आ गया, मैं डर के मारे ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था. उसने नाम लिया मेरा और बिना हाथ मिलाये या कुछ कहें सामने पड़ी चेयर पे जम गया. अपने सामने पड़े कुछ पन्ने हाथ में लिए और एक नजर देखा उनको. मैं जम गया था और किसी भी वक्त पिघल सकता था. अब उसकी बारी थी ..कितना टाइम हो गया तुझे यहाँ ..मैंने जान बटोरी और धीर्रे से कहा ..मोर देन थ्री येअर्स ..वो गरजा चार साल होने वाले हैं तेरे ..मैंने सर हिलाया. फिर गरजा पिछले महीने क्या बना था ..धीरे से ईई, रजत- उससे पहले, जवाब- ईई . पन्ने रखकर जोर से बोला ..कभी केसी नहीं बना मैंने नहीं में सर हिलाया. उसने फिर पुछा क्वालिटी में कितना हैं तेरा ..अब मैंने थोडा ढंग से जवाब दिया हंड्रेड परसेंट फ्रॉम लास्ट क्वार्टर. उसने मोटी की ओर देखा और कहा अब बोला ये ...मोटी मुस्काई कुछ बोली नहीं .रजत फिर से ..इतने दिन से क्यूँ नहीं प्रमोट हुआ..मेरे पास फिर कोई जवाब नहीं था. अपनी कुर्सी पर लेटते हुए फिर कहा उसने ..मैं बताऊ तुझे ..नेता मत बन. यहाँ क्रांति नहीं कर पायेगा तू. तू पढ़ा लिखा होगा लेकिन बाकि सारे पढ़े लिखे अनपढ़ हैं यहाँ. अपना काम कर इन्हें कानून मत सिखाया कर. एक मिनट नहीं लगेगा मुझे तुझे यहाँ से भगाने में. मैं अब बिलकुल चुप था. सांस भी नहीं ले रहा था शायद. अब मोटी की बारी थी ...उसने शुरू किया एंड यू नो रजत आवर कैफेटेरिया गाय इस अ गुड फ्रेंड ऑफ हिम. ही सीट्स विथ हिम डयूरिंग शिफ्ट टाइम एंड डोंट इन्फर्म. उसने फिर कहा ..तू कामरेड हैं, तेरी बातें सुनी हैं मैंने. राणा तेरी सारी बातें बताता हैं मीटिंगों में..ये तेरा कालेज नहीं हैं. इट्स ऑफिस एंड रूल्स दैट वी हैव तो फोलो. मैं मर चूका था ..सब कुछ पता हैं इनको ..वो फिर कुर्सी पे आगे आया और लैपटॉप की स्क्रीन में झाँक कर बोला सुमन डिड यू इन्फोर्म हिम..मोटी ने सर हिलाया. उसने कहना शुरू किया. तेरा नाम हैं इस बार लिस्ट में..लेकिन अगर यही हाल रहा तो गायब भी हो जाएगा. रजत पास लेल लेकर बोलता रहा: ये ड्रामे बंद कर और काम कर. फ्लोर पे जाके गाने मत लगियो. नाऊ चीयर अप, खुश हो जा. मैं मशीन नहीं था जो उसके कहते ही मुस्कुराऊ ..लेकिन फिर भी मुस्काया. जान वापस आ गयी थी.  मैं बाहर आ गया था उनके केबिन से...शीशे के पार वो दोनों हंस रहे थे. 

इसके बाद जब भी कैफेटेरिया वाले भाई से आमना सामना होता तो सिर्फ मुस्कुरा कर रह जाता. बात करने की हिम्मत नहीं थी मुझमे. उसकी मुस्कान का जवाब मैं बहुत बनावटीपन से देने लगा था. लेकिन उसकी तरफ से कोई कमी नहीं आई. एक की जगह दो टुकड़े मिलने लगे. फ्लोर पे भी कई लोगो को शक हो गया था की पंडित का चांस हैं इस बार ..अब इसका भी बडबोलापन बंद हो गया. कई तो चिढाने भी लगे थे. वीक ऑफ पर भी ऑफिस आता देख कर कईयों ने भविष्यवाणी भी कर दी मेरे लिए. मैं इतना हारा हुआ कभी नहीं था. जब घर छोड़ दिया था और तब भी जब शिवांगी मुझे छोड़ गयी थी. दो हफ्ते बीतने ही वाले थे ..घर पे खबर कर दिया था की इस बार प्रमोट हो जाऊंगा. हर किसी पर असर हो रहा था इस बार ..मम्मी ने कोई मनौती भी मान ली थी अबकी मेरे लिए. बाबा शादी की बात फिर से करने लगे थे. मैं सपने में फिर से कार देखने लगा था. 

आखिर में वो दिन भी आ गया जब इंटरव्यू हुआ और ढेरो सवाल पूछे गए. कुछ एक बेहद वाहियात और कुछ बहुत ही आसान ..सबसे मुश्किल सवाल था की अगर टीम में कोई बिना नहाये आता हैं उससे सबको दिक्कत होती हैं तो कैसे संभालोगे इसको. क्या कहोगे उससे ..एक बार को तो मैं चौक गया की ये क्या सवाल ..लेकिन कुछ  गोल गोल जवाब दे ही दिया.  नहीं मालूम की वो उससे खुश थे या नहीं. दो दिन बाद लिस्ट भी आ गयी. नाम भी था मेरा उसमे. लोगो ने बधाईयाँ दी, कुछ दोस्त लोगो ने जम के गालियाँ दी और बेइज्जत भी किया. चमचागिरी का आरोप भी लगा और चाटने की प्रशंशा भी की. खैर अब भी मेरे पास कोई जवाब नहीं था. जवाब होना जरुरी नहीं था बल्कि मुझे लगने लगा की देना जरुरी नहीं हैं. 

मैंने अब मुस्कुराना सीख लिया था. आधी बातों के जवाब इसी तरीके से देता था. मैं इसे हंस के टालना नहीं कहूँगा बल्कि हर बात पे खुश होने जैसा ही मानूंगा. अगले रोज सुमन मुझे अपने साथ डिनर के लिए ले गयी उसी कैफेटेरिया में. मैंने उसकी हर बात को बहुत ही ध्यान से सुनना शुरू कर दिया था. वो कहे जा रही थी आई वास वैरी हैप्पी विथ यौर परफोर्मेंस बट समटाइम यू टाक वैरी नानसेन्स. यू नो देयर इज अ दिफ्फ्रेंस बेत्वीन यू एंड अ मजदुर बट यू अल्वेस काल यौर्सेल्फ़ अ मजदुर,  यू आर गेटीग हैंडसम सेलेरी...बट स्टिल. नाऊ गेट आउट ऑफ यौर शेल एंड बिहैव लाईक मैनेजर. स्टार्ट थिंकिंग अबोउट यौर्सेल्फ़ एंड ग्रो उप. कल को तुम्हारे बच्चे तुमसे ऐसी बातें करेंगे तो उन्हें क्या जवाब दोगे ..या फिर कोई शेर पढोगे. दे आल फोल्लो यू एंड तुम उन्हें कुछ सिखाने कि जगह फ़ालतू कि बातें समझाते हो. मैं उनकी कही हर बात को पीता रहा ..धीरे धीरे चाय की तरह ..एक साथ सब अपने अंदर उतार पाना भी मुश्किल था. उसी पल कुछ बेहद अजीब हुआ ..वही कफेटेरिया वाला भाई मेरे पास आकार खड़ा हो गया और सामान्य शिष्टाचार से अनभिज्ञ होते हुए उसने मुझसे कहना शुरू कर दिया ...का हो पंडित जी सुनली हे की तुह्रो परमोशन हो गईल.. तुहो अफसर बन गईला. घरे बतावला की ना हो..आज देखा तुहरे खातिर राजभोग मंग्वले हैं. हम्मे कलिहे दीपक बाउ बतवले रहले लेकिन तू मिलबे ना कईला. किसी गहरी नीद से एकाएक जाग गया लेकिन मैं नहीं जानता क्यूँ पर मैं उस वक्त भी चुप ही रहा ..लेकिन मोटी चुप नहीं रही वो गुस्से से उबल पड़ी ..यू ईडियट ..यू कान्ट सी वी आर इन अ मीटिंग एंड यू ..लुक हाउ दे ट्रीट यू. मिठाई ले के आ गया तुम्हारे लिए. यही लोग हैं ना तुम्हारे अपने ..वंस यू फिनिश विथ हिम ..देन मीट मी, नाउ वि हैव तो थिंक अगेन ...और उठकर चली गयी. मैंने सिर्फ उसे जाते हुए देखा और दूसरों को अपनी तरफ घूरता हुआ. अब चुप ना रहने कि बारी मेरी थी, मैं रोक नहीं पाया खुद को चीखने लगा, गालियाँ देने लगा. मैंने गुस्से में उससे क्या क्या कहा मुझे सब याद हैं. अच्छी तरह से याद हैं मेरा हर शब्द मेरी स्मृति में बैठने लगा उसके चेहरे का हर रंग भी साथ साथ. बरस पड़ा था मैं उसपर ..साले रुक नहीं सकते थे तुम थोड़ी देर ..जात दिखा दि तुमने अपनी यही तो बुराई हैं तुम लोगो में ..थोडा सा बात कर लो तो सर पे चढ जाते हो साले ..अपनी औकात भूल गए हो. तुम्हारी मिठाई बिना मरा जा रहा था मैं तो ..दिखाई नहीं देता किसके साथ बैठा हूँ मैं. धीरे धीर मेरा लहजा बदलने लगा और धीमी पड़ती आवाज में फिर कहा ये क्या बेवकूफी हैं भाई साहेब कम से कम इतनी समझ तो होनी भी चाहिए आप में भी ..अब क्या करूँ मैं ...और भी बहुत कुछ कहा ...जो भी कुछ दबा हुआ था अंदर उसे निकाल दिया. कुछ भी जवाब ना देने की बारी उसकी थी. उसकी चुप वाली शकल मैंने इससे पहले कभी नहीं देख थी. मैं जिस जगह पे खड़ा था वहीँ बैठ गया ..सब कुछ मेरी आखों के सामने ही था. थोड़ी देर पहले ही जिस सब को मैं अपना माने बैठा था ..रेत कि तरह फिसल गया मेरे हाथ से. जैसे ही चेतन हुआ ..मैं चुपचाप सर झुकाए बिना आखें मिलाये बाहर आ गया और सुमन के केबिन कि तरफ चल दिया ...

*इस कहानी को प्रकाशन से पहले पढकर मशहूर शायर 'आदिल रज़ा मन्सूरी ' ने एक शेर कहा

मैं  अपनी आँख में आकाश भर के बैठा हूँ 
कफस हवा का ही परवाज कहा गया मेरी 


शीर्षक वहीँ से

एक एम एन सी में नौकरी करने वाले आदित्य साहित्य के गंभीर अध्येता हैं और सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता. सेव शर्मिला कैम्पेन सहित अनेक मुद्दों पर दिल्ली में उन्होंने गंभीर पहलकदमियां ली हैं. जयपुर में आयोजित कविता-समय 2 सहित अनेक कार्यक्रमों के आयोजन में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. यह कहानी लमही के ताज़ा अंक में छपी है,कुछ और कहानियां जल्द ही अन्य पत्रिकाओं में.  संपर्क   09873146393, e mail : divediaditya@gmail.com 

Wednesday, July 18, 2012

मरने वालों के साथ कोई मरता नहीं

जब दर्द नहीं था सीने में तब ख़ाक मजा था जीने में
अबके सावन हम भी रोये सावन के महीने में,

यारों का गम क्या होता है मालूम न था अनजानों को
साहिल पे खड़े होकर हमने देखा अक्सर तूफानों को
अबके शायद हम भी रोये मौजों के सफीने में

ऐसे तो ठेस ना लगती थी जब अपने रूठा करते थे
इतना तो दर्द ना होता था जब सपने टूटा करते थे
अबके शायद हम भी रोये सावन के महीने में

इस कदर तो कोई प्यार करता नहीं
मरने वालों के साथ कोई मरता नहीं
आपके सामने मै ना फ़िर आउंगा
गीत ही जब ना होंगे तो क्या गाऊंगा
मेरी आवाज़ प्यारी है तो दोस्तों
यार बच जाये मेरा दुआ सब करो
दुआ सब करो.........
http://www.youtube.com/watch?v=du2m9D_NWFg

मौत तो एक कविता है

 
शुरू दौर में जिन दो लोगों के नाम हम जानते थे, उनमें राजेश खन्ना भी थे। तब हमने टेलिविजन नहीं देखा था। सिनेमा हॉल की कल्पना भर करते थे। तुमने काजल लगाई दिन में रात हो गई टाईप के गाने तब हमें खूब सुनने को मिलते थे और कौलेजिया लड़के आपस में बात करते हुए राजेशा खन्ना-राजेश खन्ना किया करते थे।
हमने राजेश को पहली बार श्वेत श्याम टेलिविजन पर ही देखा। कभी जब वे मूछें लगाकर या दाढ़ी बढ़ाकर पर्दे पर चले आते तो हमें पहचानने में दिक्कत होती। यह सन 1986-87 के आस-पास की बात होगी। जब लोगों के दिलों पर अमिताभ का जलवा तारी था। हमारे जमाने में राजेश खन्ना सीधे-सादे हीरो के रूप में जाने जाते थे।
अपने कम अक्ली में हमने लेकिन अमिताभ को ज्यादा महत्व दे रखा था।
राजेश को सही तरीके से हमने आनंद में पहचाना। फिल्म देखकर हफ्तों परेशान रहे। बार-बार कई बार देखी। इसके बाद अमर प्रेम और अमृत अवतार जैसी फिल्में भी।
खास बात यह कि फिल्म जगत एक अजीब सा जगत है, जहां लोग आते हैं जाते हैं। उठते गिरते सम्हलते हैं। कभी आसमान पर रहने वाला कोई एक अभिनेता आम लोगों के साथ मुंबई की बसों में सफर करता दिखता है। राजेस के साथ वह दिक्क नहीं रही कभी जो भारत भूषण के साथ थी। हां, राजेश आसमान से जमीन पर आए थे। आसमान से जमीन पर आना उनके लिए इतना बड़ा सदमा था जो शायद वे कभी भूल नहीं पाए।
दो दिन पहले ही छोटे भाई से उनके बारे में बात हो रही थी। मैंने कहा कि अब हमें सबकी मौत देखनी है। मेहदी, जगजीत, दारा और अब राजेश खन्ना...। फिर हमारी बारी भी आएगी एक दिन....।

तो जिंदा रहें जितने दिन एक दूसरे से प्यार करें... रंजिश भुला दें..... एकदम खांटी आदमी बनकर रहें...। क्योंकि एकदिन यमराज का चाबुक हमारे उपर भी पड़ने ही वाला है...।

मन थोड़ा उदास हो गया है।

पसंदीदा अभिनेता को आखिरी विदाई....।
किसी के पापा स्मार्ट हैं सिर्फ इस बात से तय होता कि उनकी सालियों ने उन्हें दबी जुबान से ही सही राजेश खन्ना कहा कि नहीं.राजेश खन्ना तो एक ही थे लेकिन वो एक शख्स, एक अभिनेता से कहीं ज्यादा भारतीय समाज के रुपक थे. सांवले,आगे के बाल उड़े, एक पैर से थोड़े भटकनेवाले, थोड़े नाटे चाहे जैसे भी..फुआ और दीदी की मर्जी को जाने बिना लोग उनका जीवन इन आदमियों के साथ बांध देते और एक अकेले रुपक से कि कहो कुछ दीदी,जीजाजी एकदम राजेश खन्ना जैसे मुस्कराते हैं, चलते हैं, बाल बनाते है..वो अरेंज मैरिज में एडजेस्ट करने की कोशिश करने लग जाती..सही भी है, इस देश में ऐसा कौन शख्स नहीं होगा जिसका कुछ न कुछ राजेश खन्ना से नहीं मिलता-जुलता होगा, हां ये जरुर है, कुछ दीदी इस रुपक में जीने की आदतों के बीच सचमुच के बाबू मोशाय से एक बार मिलने की हसरत रखती थी..जिन हजारों-लाखों महिलाओं ने इस राजेश खन्ना रुपक के सहारे जिंदगी खेपती आयी है, उसे आज तुम कुछ ज्यादा ही याद आओगे बाबू मोशाय..
मौत तो एक कविता  है
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको....
डूबती नब्जो में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिए सहा नींद उफ्क तक पहुंचे
दिन अभी पानी में हो रात किनारे के करीब
न अभी अन्धेरा हो न उजाला हो
न रात न दिन
जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को सांस आये
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको.......

*राजेश खन्ना जी ने ये संवाद आनंद फिल्म मैं आनंद बनकर बोला...और कविता से मिल गए खुद....मिलना है सबको कविता से...आज वो मिले कल हम मिलेंगे....जाने वाले चले जाते है...पर छोड़ जाते है एक अशांति पीछे रहने वालो के लिए....याद बहुत आते है वो..













राजेश खन्ना सिर्फ राजेश खन्ना थे-श्रद्धांजलि और नमन

Tuesday, July 17, 2012

सात नाकारा और निकम्मे एक कॉमेडी सर्कस में

सात नाकारा और निकम्मे एक कॉमेडी सर्कस में काम कर रहे है दो साल से ......कोई है जो इन्हें खरीद ले ...........ये सब देंगे प्रतिबद्धता, लगन, इमानदारी, मेहनत और आउटपुट.............असल में कहना यह चाहिए कि ३६ थे धीरे धीरे सब भाग गये जब जैसा मौका मिला..........हुआ यूँ था कि गिरगिट के झुण्ड में, लोमड़ियों के बीच ये ३६ जीजिविषा को लेकर जूझते रहे फ़िर जब लगा कि दाना पानी बसर नहीं हो रहा तो निकल लिए और सबसे मजेदार था कि वो लोमड़ी पहले भाग खडी हुई जो बहेलिया बनकर ले आई थी इस निकम्मों को इस मक्तल में ज़िंदा मारने के लिए.......लोमड़ी आजकल नरसंहार के हीरो के बीच नए शिकार कर रही है और नए गिरगिट ने जगह ले ली है जो खूब चिकनी चुपड़ी बातें कर सबका मन हर लेता है........जंगल में यह शिकारी अब अकेला है और यह चुन चुन कर रोज एक एक जानवर मारता है............

सरकार एक और गया.....

सरकार: कितने आदमी थे................
कालिया: सरकार ३६
सरकार:तो अब क्या है........?
कालिया:सरकार एक और गया............अभी गया ....
सरकार:अरे पिछले महीने ही तो दो गये थें ना.............फ़िर अब एक और गया.............
कालिया:जी सरकार एक और गया ..............
सरकार;तो अब कितने बचे ......
कालिया:सरकार सात और वो भी भागने की तैयारी में है जब मौका मिलेगा तब निकल लेंगे............
सरकार;तो प्रतिबद्धता और लगन और समाज बदलने का स्वप्न जो गिरगिटों ने देखा था राज्य के काँधे पे खडा होकर उसका क्या होगा............?
कालिया:सरकार कुछ नहीं होगा गिरगिट ने अपनी गोटी सेट कर ली है, लोमड़ी तो बरसों से जंगल में बैठी है निकम्मी और नया गिरगिट रंग बदलने में बहुत माहिर है सरकार सब कागजी कार्यवाही पूरी कर लेगा....
सरकार: तो अब प्रदेश में कैसे होगा विकास
कालिया: सरकार वैसे भी कौन कर रहा है विकास माई बाप सब कॉमेडी सर्कस में काम कर रहे है इस देश के ...........
सरकार: जाओ सरकार तुमपे खुश हुआ शाबाशी दी और अब जब एक बचेगा तो राजधानी में बिठा देगा, बाकी कब जायेंगे और ये गिरगिट का क्या होगा रे..............

तस्वीरें जो विलाप, संताप, तनाव पैदा करती है

आज अपनी हार्ड डिस्क, फेसबुक और पिकासा अलबम की सफाई चल रही है, सदियों से ढेर जगह घेरे हुए, समेटे हुए फोटो निकाल रहा हूँ नई तस्वीरों के लिए कही जगह ही नहीं बची है और फ़िर बेचारे गूगल और मार्क को क्यों परेशां करू कि अपनी वजह से उन्हें मेरे लिए वर्चुअल वर्ल्ड में जगह खरीदनी पड़े, सो कल रात से ही मन बना लिया था कि आज सुबह से लगभग सारे तस्वीरें डिलीट कर दूंगा हमेशा के लिए ताकि नई जगह बन् सके..........हालांकि दिल दिमाग में भी कही डिलीट का ओप्शन होता काश................
अब तक 124 जी बी खाली कर चुका हूँ लक्ष्य है 250 जी बी. "स्पेस" लेने का...................बस आपमें से कुछ लोग डिलीट हो गये है ................चित्रमय स्मृतियों में .............
तय यह भी किया है कि बहुत ही जरूर तस्वीर होगी तो सम्हालूँगा वरना देखकर डिलीट मारो और फ़ालतू झमेलो से बचो, ऐसी ही तस्वीरें बहुत रुलाती है और विलाप, संताप, तनाव पैदा करती है..........

Sunday, July 15, 2012

सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में

आज सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष पहुँच गयी है, मुझे लगता है कि अब जेंडर के मुद्दों को नए परिपेक्ष्य में देखने की जरूरत है. कहाँ  प्रायोजित मीडिया विमर्श में हम गौहाटी का मुद्दा, फ़िर महिला आयोग की सजी संवरी गुडियाओं के नाम पर मातम पुरसी करते रहेंगे. दरअसल में सब मीडिया की चाल है अब यह सिद्ध हो ही गया है, और जेंडर वादी बहने भी बहनापा जताकर चुप बैठी है, सब चुप है, अजीब सी बहस चल रही है और देखत देखते अपने काम और लक्ष्य में लगी सुनीता अपने उद्देश्य को पूरा करने निकल गयी किसने आड़े हाथ दिए है करने वालियों को....................हिम्मत है तो करे वैसे भी भले ही निगेटिव पर परोक्ष रूप से इस समय देश में ताकतवर महिलाए सच में अपनी ताकत दिखा रही है तो कुल मिला के कहना यह है कि बहुत हो गया गौहाटी और महिला आयोग के पुराण जिसने कमाना था कमा खा लिया, असली मुद्दों की बात करो और नए सन्दर्भों में बात करो और इन पर काम भी करो...........अभी म् प्र में जिस तरह से थोकबंद तबादले हुए है उसमे कितना रूपया इन्ही अबलाओं ने खाया-पीया-लिया-दिया है किसी ने पूछा...............? छोडो......बकौल रांगेय राधव कि संसार में सबको दुःख होता है और अपना दुःख सबसे बड़ा लगता है.......

प्रशासन पुराण 54

और लों आज म प्र में तबादलों की आख़िरी तारीख थी15 जुलाई 2012  ...........सो खत्म हो गया है समय, नेट पर लोग बाग देख रहे है कि जो सेटिंग हुई थी जितना "लिया-दिया" था उसके सकारात्मक परिणाम निकले या नहीं..............अभी एक दोस्त से बातें हुई उसका तो मामला निपट गया, सो मैंने जम के बधाई दे दी और भोपाल जाने पर एक शानदार पार्टी  अपने नाम बुक कर ली है, मामला ले देके निपट गया और वो वहाँ पहुँच गया -जहां जाने की हसरत लिए पिछले बाईस बरसों से जी रहा था, हाँ इस बार भाव थोड़े नहीं बहुत ज्यादा थे. साला मानसून नहीं आ रहा और बाजार में सब्जी  भी महंगी हो गयी, पेट्रोल महँगा, चुनाव सामने है, फ़िर अब जब पूरी दुनिया में रूपये का अवमूल्यन हुआ है तो सबकी इच्छाएं है कि उनका साला कुछ नहीं तो बेंक बेलेंस बढ़ जाये और फ़िर साले ये प्रोफ़ेसर, मास्टर, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, सहायक यंत्री, राजस्व निरीक्षक, पटवारी, एस डी एम, डिप्टी कलेक्टर, डाक्टर, नर्से, पंचायत सचिव यानी कुल मिलाकर ये जमीनी अमला साला कौन सा दूध का धुला है??? देखो ना अभी अभी खनिज में साले ठेकेदार जैसे दो कौडी लोगों ने जम के मूँड दिया सरकार को भी, तो हम तो सरकारी लोग है, सत्ता में है,  ये जमीनी कर्मचारी  जनता से जम के वसूलते है या मुफ्तखोर है ससुरे, हराम की खाते है सो डेढ़ दो लाख ले भी लिया तो कौन सा पाप हो गया अब कम से कम तीन साल तो अपने बीबी बच्चों के साथ सुख से रह लेंगे. अगली अगला जाने, चाहे सरकार हो या मंत्री का पी ए या सचिव हो हमारी महान भारतीय प्रशासन सेवा का बड़ा सांप (सॉरी बड़ा साहब) पद पे कौन रहेगा भगवान भी नहीं जानता.........अपुन ने तो भैया ले दे के सबका भला कर दिया बिछुड़ों को मिला दिया बस एक ही दिल में हमेशा कसक रहती है ये साले तबादले साल भर क्यों नही हो सकते ............( प्रशासन पुराण 54)

Friday, July 13, 2012

प्रशासन पुराण 53

अभी एक सरकारी दफ्तर में गया था वहाँ दो व्यक्ति साहब के बाहर कमरे की ड्यूटी दे रहे थे बाबा आदम के जमाने के काले रंग के फेड हुए जूते, मटमैले सफ़ेद कपडे, सर पर मटमैली सी टोपी, चेहरे पर सदियों की उदासी और गले में लाल रंग का पट्टा डला हुआ जिसपर पीतल चमचमाता हुआ एक बेच था जिस पर कार्यालय का नाम लिखा था और खूब बड़े अक्षरों में लिखा था "चपरासी". मैंने दोनों से बात की पता चला कि पिछले ३२ बरसों से वो इस पट्टे को धारण किये हुए है और अब उम्र निकल गयी, अब तो इस शब्द को उनके नाम के साथ जोड़ दिया गया है. बेहद अफसोस हुआ कि भारतीय लोकतंत्र में और खासकरके पदों के सम्बोधन  और नामों की विसंगतियाँ अभी भी बनी हुई है, क्या इस पद को कार्यालय सहायक या सेवाप्रदाता या किसी सम्मानजनक नाम से नहीं बुलाया जा सकता? इस तरह के सामंती शब्द और उनके अर्थ ही दरअसल में अफसरों के गर्व और अहंकार को और अधिक ऊँचा कर देते है और इस मारम्मार में अपने घर / दफ्तर में जितने चपरासी होंगे उतना ही अधिक बड़ा रूतबा होगा यह मानसिकता पनपती है. अफसरों की बीबियाँ इन्हें अपने बाप का माल समझ कर नाजायज / बेजा इस्तेमाल करती है और शोषण करती है. सबसे ज्यादा इन लोगों के बच्चों और परिजनों पर क्या बीतती होगी कि वे समाज में चपरासी के बच्चे है या चपरासी की बीबी है. मुझे नहीं मालूम कि सही क्या है, किसने यह शब्द बनाया और इसे कौन हटायेगा, पर उन दो बुजुर्ग व्यक्तियों के चेहरे और हाव भाव देख कर जो मुझे दुःख हुआ उसका शब्दों में बयाँ कर पाना बहुत ही मुश्किल है, मै सोच रहा था कि यदि मेरे सीने पर कोई ऐसा पट्टा जड़ दिया जाता जो मेरे नाम का पर्याय बन् जाता जैसाकि महाश्वेता देवी जी "हजार चौरासी की माँ" में जिक्र किया है तो........
शायद समय आ गया है कि हमें अपने प्रशासनिक पदों और उन पर बैठने वालों को सम्मान जनक संबोधन देना होगा जैसे बाबू, चपरासी, भृत्य आदि ये शब्द भी कही ना कही हमारी जाति व्यवस्था और पितृ सत्ता को मजबूत करते है और बदलते समय में नए अर्थ गढते है. सवाल यह है भारतीय प्रशासनिक सेवा  को सुधारने के लिए ढेरों कमीशन बने है, प्रशासन को और लोक प्रशासन को सुधारने के लिए ढेरों आयोग है पर इन सही अर्थों में काम करने वाले या सर्विस डिलीवरी वाले मेहनतकश लोगों के पदों के नामों में कोई सुधार नहीं है .......बदलिए, बदलिए बजाय इसके कि ये लोग एक दिन राज सत्ता के खिलाफ खड़े हो जाये अपनी इज्जत और अहमियत बताने को.........बदलिए व्यवस्था बदलिये (प्रशासन पुराण 53)

Thursday, July 12, 2012

दारा सिंह जैसे विनम्र शख्स को श्रद्धांजलि

फेस बुक पर दारा सिंह के हनुमान वाले पोस्टर और छबि बनाकर दोस्त लोग गलत कर रहे है वे कभी भी सिर्फ हिंदू धरम के ध्वजवाहक नहीं बने ना ही उन्होंने कभी ऐसा प्रचार प्रसार किया एक महान व्यक्तित्व के धनी और बल के पर्यायी दारा सिंह को सिर्फ हनुमान तक सीमित कर देना हमारी संकुचित सोच का परिणाम है और इस तरह की लेबलिंग मृत्यु के बाद करना घोर अपराध भी है. अभिनय के लिए वे रामायण में आये थे और इस हेतु उनकी जितनी प्रशंसा की जाये कम होगी, बिलकुल व्यावसायिक तरीके से उन्होंने रामायण में काम किया. वे हमेशा कुश्ती के लिए जिए और बहुत सीमित संसाधनों में मिट्टी की सौंधी महक से देश की माटी का नाम ऊँचा किया. वे आज शारीरिक रूप से भले ही हमारा साथ छोड़ गये हो पर देशी कुश्ती के लिए उनके प्रयास और लड़ाई को हमेशा याद रखा जाएगा.

दारा सिंह जैसे विनम्र शख्स को श्रद्धांजलि

Wednesday, July 11, 2012

रादुगा प्रकाशन-एक विचारधारा बनाने में और समझ पुख्ता करने में ठोस मदद

मेरे घर में माँ चूँकि शिक्षिका थी इसलिए उन्हें सोवियत नारी खरीदना पडती थी बड़ी लंबी चौड़ी खूबसूरत पत्रिका होती थी चिकने कलेवर वाली जानकारियों से भरपूर हिन्दी में छपी पत्रिका के आने का हम लोग इंतज़ार करते थे, थोड़े बड़े होने पर एकलव्य के पुस्तकालय से ढेर सारी रूसी किताबें पढ़ी और अब मेरे पास पांच-पांच रूपयों में खरीदे उपन्यासों का एक बड़ा संग्रह है जो आज करोड़ों रूपयों में नहीं खरीदा जा सकता, गोर्की, तोल्स्तोय, चेखोव और ढेर सारी किताबें पढकर बड़ी हुई हमारी पीढ़ी आज भी रादुगा प्रकाशन जैसे संस्थानों के प्रति आभारी है जिसने एक विचारधारा बनाने में और समझ पुख्ता करने में ठोस मदद की. भीष्म साहनी को कहानीकार के रूप में बाद में जाना पहले तो उनके अनुवाद ही पढ़े थे आज मेरे पास बच्चों की ढेर किताबे है जो हाल ही में मैंने पानपाट, कन्नौद स्थित एक संस्था में बच्चों को पढाने के लिए दे दी है. वाह क्या बात थी रूसी जगत और उनके प्रकाशनों की................
मै भी बच्चों की किताबें पचास पैसे या एक रूपया दो रूपये में पढकर बडा हुआ और बाद में तीन तीन संकलनों के उपन्यास पांच या सात रूपयों में खरीदे चाहे वो तोल्स्तोय हो या, रसूल हमजातोव या इवान की कहानियां ..आज यह सब सोचके हैरान हूँ कि कैसे इतनी सस्ती सुन्दर और बहुमूल्य किताबें रूस से आ भी जाती थी बंट भी जाती थी और देवास जैसे छोटे कस्बे में उपलब्ध हो जाती थी ना कुरियर ना स्पीड पोस्ट फ़िर भी सब कितना सहज था और आज तमाम तरह के ग्लोबलाइजेशन के बाद भी सब कितना महँगा, असहज, अलभ्य हो गया है..........अगर इसे नास्टेल्जिया कहे तो कह सकते है पर अतीतजीविता तो कतई नहीं है यह सब, आज को नौनिहालों के लिए दुर्भाग्य से ऐसा कोई माहौल और पुस्तके उपलब्ध नहीं है यह भी एक बड़ा कारण है शिक्षा में अरुचि का और अपढ़ बने रहने का शायद...........


भाई Amit Sharma की दीवार से प्रेरित होकर..........."बचपन की यादें हैं अथाह अनुवादित रूसी साहित्य चारों तरफ बिखरा होता था. रादुगा प्रकाशन की बड़ी खूबसूरत और रोचक रंग-बिरंगे चित्रों से सजी किताबें, लघु उपन्यास और पत्रिकाएं पढ़-पढ़ कर रूस से एक विशेष अनुराग आज तक दिल में है. सुनते थे कि वहाँ भारत को दूसरा घर और राज कपूर को आजीवन प्रधानमंत्री समझा जाता था [;)] क्या हुआ कि सब खत्म हो गया???? इतनी आत्मीयता, प्रेम और इतना गहरा सामाजिक-सांस्कृतिक ऐक्य इतनी जल्दी क्यों धुंधला गया? "