Wednesday, September 30, 2015

Posts of 30 Sept 15


कभी उगते हुए सूरज को देखना, लगेगा कि एक साथ असंख्य सूरज उग रहे है व्योम में धीरे धीरे सभी एक साथ एक उगकर सिर्फ एक ही में समाहित हो जाते है जैसे एक जिन्दगी में कई कहानियां एक साथ समाहित होकर अंतिम सांस के साथ खत्म हो जाती है आहिस्ते से....

सुबह जब आती है तो लगता है मानो एक सांस लौट आई हो, जैसे लौट आती हो किसी सदियों से पडी निर्जीव देह में किंचित सी झुरझुरी

एक सदी बीत जाती है एक सेकण्ड की याद भूलाने में और तुमने तो एक जिन्दगी दे दी थी ...........



जब देश का प्रमुख व्यापारी विदेश में अपने प्रोडक्ट के गुणगान कर रहा हो, सत्ता की पार्टी का प्रमुख बिहार चुनाव में लगा हो और विपक्षी दल नपुंसकों की तरह से बैठे हो तो दादरी में एक मुसलमान परिवार का मरना कम है सिर्फ एक परिवार जो साले 20 % है यानी लगभग 25 करोड़ .

सही करते है हिन्दू राष्ट्र के लोग मांस खाना और खाने वालों को मार देना चाहिए.

अजगर वजाहत का नाटक "सबसे सस्ता गोश्त" याद आ गया.

अधिकांश ब्राहमणों का सरनेम शर्मा होता है, ओशो कहते है कि शर्मा शर्मन का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है यज्ञ में बलि देने वाला शख्स .......अब बताईये कि कौन क्या है.........?

यह गृह युद्ध है और इसका हल सिर्फ यह है कि जनमानस का ध्यान एन्ड्राईड में लगाओ, फेस बुक में लगाओ, और दौरे करों विदेश में अपनी वाह वाही बटोरो और मूल मुद्दों से ध्यान हटा दो...............

कौन है ये लोग, भक्त तो नहीं, वे भक्त ईश्वर से डरते है कम से कम, ये कमीने लोग है जो किसी से नहीं - डरते मोदी से भी नहीं और सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं और अखिलेश से भी नहीं जो सिर्फ गिरगिट जैसा मुख्यमंत्री है जो कुछ नहीं करता ......

शर्मनाक है मुझे शर्म आती है इस देश का नागरिक होने पर, कोई मेरी नागरिकता समाप्त कर दें

रविश तुम क्यों हमारा समय बर्बाद कर रहे हो, साधो ये मुर्दों का गाँव , राजा मरी है - परजा मरी है, मरी है सारा गाँव.........कबीर कहते थे ....

Monday, September 28, 2015

डिजिटल इंडिया की दीवानगी मुबारक Posts of 28 Spet 15

भारत में यह मोदी पहला प्रधानमंत्री है जो विश्व व्यापार के चतुर सुजानों को आमंत्रित करके यहाँ के अर्थ व्यवस्था, घरेलू काम धंधों और निजी जानकारियों को भी विश्व फलक पर ले जाने और बेचने के लिए बेताब है. मन मोहन सिंह ने तो सन 1991 पैरेस्त्रोईका और ग्लास्नोस्त के फार्मूले पर सिर्फ मिश्रित अर्थ व्यवस्था को ख़त्म किया था, सोना गिरवी रखा था, और कर्ज लिया था देश हित में परन्तु यह आदमी देश को नीलाम करने निकला है और हर बार निवेश के नाम पर एक सौदा करके आता है.

क्या आपको लगता है कि आई आई टी भारत में पढ़ने वाला और ब्रेन ड्रेन का सशक्त उदाहरण सुन्दर पिचाई सच में देश भक्त है यदि होता तो अपनी मेधा से यही रहकर कुछ कर लेता जैसे हमारे पंजाब के अनपढ़ किसानों ने जुगाड़ बनाया और आज वह हर जगह काम आ रहा है, या छोटे लोगों ने तकनीक से अपना दिमाग लगाकर देश और समाज हित में काम किया.

विश्व बाजार का भारतीय सुन्दर पिचाई विश्व बाजार का नया मोहरा है, जिसे गूगल ने हाल ही में भारत में बाजार और स्टेशन से लेकर हर जगह सत्ता कायम करने के लिए नियुक्त किया है या यूँ कहें कि जिसके सहारे हमारे बाजार और विश्व के दो नंबर के जनतंत्र पर कब्जा करना चाहता है अमेरिका, यह ठीक वैसा है जब 91- 95 में सौन्दर्य में हमारी एश्वर्या रॉय या अन्य काली लड़कियां साजिश के तहत विश्व सुंदरियां बनाई गयी थी और आज दूर दराज के आदिवासी गाँवों में ब्यूटीफुल होना एक परम्परा है.

मार्क, सुन्दर, मर्डोक, सत्या नडेला, जॉन चेम्बर्स, पौल जैकब्स अरबों रूपये के पॅकेज वाले ये लोग हमारे मित्र नहीं बल्कि वे उन देशों के गुलाम और लुभावने सेल्समन है जो भारत की सत्ता पर काबिज होना चाहते है. ये दुनिया के बड़े लूटेरे है.

ध्यान रहे मित्रों अब लड़ाई हथियारों से नहीं, पानी और भाषा से नहीं बल्कि सूचना प्रोद्योगीकी से लड़ी जानी है और हम सब अब गुलाम है फेस बुक से लेकर वाट्स अप पर, तमाम तरह के उपकरण और तकनीकी से हम अब एंड्राइड तक. बेरोजगारी, किसान समस्या, कुपोषण, आत्महत्या, बलात्कार, साम्प्रदायिकता जैसी विकराल समस्याएं कैसे हल होंगी यह तो नहीं मालूम परन्तु ग्लोबल व्यू में यकीन करने वाले हम गरीब लोग कब तक कैसे लड़ेंगे यह भी नहीं मालूम परन्तु देश जिस ओर भी जा रहा है और चमक दमक के सहारे सारे इतिहास को धो पोछकर अपना ब्रांड बनाने की जो हरकतें है निदा पुराण करके, और आत्ममुग्ध होकर वह शर्मनाक है.

अब तक हम टाटा, अजीम प्रेम, जिंदल, अम्बानी और अडानी से जूझ रहे थे, और अब सतर्क रहिये नए वेश में नए सुन्दर और आई टी में दक्ष और कौशल से परिपूर्ण "सेक्सी" लूटेरे आ रहे है जो अपनी निजी जिन्दगी में ताक झाँक भी करेंगे और आपके बेडरूम से लेकर आपके खातों पर भी टेढ़ी नजर रखेंगे, और ये सब राज्याश्रय वाले ठग होंगे और आप कुछ कर भी नहीं पायेंगे - क्योकि जो इस समय इनके खिलाफ बोलेंगे वो सब मारे जायेंगे.

सारा सोशल मीडिया नया पड़ोस है पर अपने घर में हम इरोम शर्मिला को मार डालेंगे जैसे पानसरे, दाभोलकर या कलमुर्गी को मारा था। जो इस डिजिटल इंडिया में शामिल नही होंगे या फेसबुक पर चित्र नही बदलेंगे , मारे जाएंगे। आपको क्या याद है कि ये वही स्टाइल है जिसमे मार्क ने अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर फेसबुक को रंगीन किया था ?


सूचना तकनीक वाले मित्र या भक्त बता पाएंगे कि मप्र के व्यापमं और कुपोषण से कैसे मापेंगे श्रद्धेय मोदी जी के डिजिटल इंडिया में ?

खैर , डिजिटल इंडिया की दीवानगी मुबारक।

Friday, September 25, 2015

Posts of 25 Sept 15 Motilal's sad demise


मोती यह गलत बात है, पहले चारु और अब तुम धोखा देकर गुजर गए........यानी राजस्थान में अब हमारा कोई संगी साथी नहीं रहा? 

बारां जैसे पिछड़े जिले के मामोनी और किशनगंज जैसे भयानक पिछड़े इलाके में तुम काम कर रहे थे.  मुझे याद है सन 1991 में हम पहली बार किशनगंज में मिले थे अनिल बोर्डिया, बजरंग लाल, अदिति मेहता आदि के साथ डा बी शेखर उस समय मसूरी से आकर लोक जुम्बिश ज्वाईन ही किये थे. रात के अँधेरे  में जब हम सब संकल्प संस्था पहुंचे तो वहाँ एक टपरा था मुझे हंसी आई कि ये साली कोई संस्था है पर सहरिया आदिवासियों के बीच तुमने और चारु ने जिस प्रतिबद्धता से तीस चालीस साल काम किया,  देशी विदेशी शिक्षाविदों को ज्ञान पिलाया और अदभुत काम करके अपनी देशव्यापी और विदेशों तक पहचान बनाई वह शायद ही कोई और कर पायेगा. 



अभी लगता है तुम दाढी खुजाते हुए आओगे और कहोगे  "यार संदीप ये लिख दो........साला ये लिखना मुझसे होता नहीं अब और अब यही सब चलता है". चारु की दुखद मृत्यु के बाद जयपुर में हम मिले थे, फिर अनिल बोर्डिया जी के श्रद्धांजली में, फिर अभी उस दिन बात की थी जब मै शिवपुरी में था और मैंने मजाक में कहा था कि नौकरी खोज रहा हूँ तो तुमने कहा था "आ जाओ यह सब सम्हाल लो, मुझसे नहीं होता ....."

हम जानते है कि चारु की मृत्यु के बाद तुम एकदम अकेले पड़ गए थे, सब संगी साथी छुट गए थे और तुमने लोक जुम्बिश, दूसरा दशक के काम भी विचारों में परिवर्तन और काम करने के तरीकों को लेकर छोड़ दिए थे, क्योकि इन संस्थाओं में अब ज्ञानवान लोग आ गए थे जो काम नहीं सिर्फ रपट चाहते थे.  पर इस तरह से उस पूरे काम को एकाएक छोड़कर जाना ठीक नहीं है मोती........हम लोगों ने जो एक दशक से ज्यादा राजस्थान के मामोनी कसबे में लंबा काम किया वह सब तो ख़त्म हो गया ना...........तुम गए, चारु गयी, लवलीन गयी, खैरुलाल गया, भुर्जी उर्फ़ गोपाल भाई गए,  नीलू का कुछ पता नहीं कि वो कहाँ है आजकल है भी या नहीं? 

मोती यह ठीक नहीं हुआ ...........बहुत याद आओगे तुम अब संकल्प जाने पर कौन मिलेगा और कौन मोटी रोटियाँ खिलाएगा और शिक्षा पर हमारे फंडे साफ़ करेगा.............? मोती लाल छाबडा यही नाम था ना तुम्हारा, पर अब कौन याद रखेगा इस नाम को......भारत की शिक्षा के इतिहास में तुम्हारा नाम भले ना हो पर हजारों लाखों बच्चों के लिए तुम हमेशा एक आदर्श पुरुष और रोल मॉडल बने रहोगे.......सहरिया समुदाय को तुम पर हमेशा नाज रहेगा कि : गुरूजी ने हमारे लिए कितना काम किया है" 

आज संकल्प का इतना बड़ा कैम्पस है कि उसमे पूरी दुनिया समा सकती है पर जब तुम नहीं, चारु नहीं तो अब जाने का मन ही नहीं है...........वापिस आ जाओ मोती, यार हम लोग फिर से गायेंगे, रचेंगे और नया कुछ बुनेंगे...........आ जाओ प्लीज़..........

Thursday, September 24, 2015

Posts of 24 Sept 15




पन्ना बुंदेलखंड का अभिन्न हिस्सा है. वहाँ काम करने वाले साथियों ने बताया कि रोजगार ग्यारंटी योजना एक छलावा साबित हो रही है, पलायन की समस्या सबसे बड़ी है जिससे कई स्तर पर असर हो रहा है, जरधोबा, जनकपुर, पुरुषोत्तमपुर की पंचायतें खाली है, लोग गाँव छोड़ गए है, छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना से दिल्ली के लिए सीधी बसे है, भोपाल से भी नहीं है. .... पन्ना में जहां खदाने बंद हो गयी है, हीरे का काम बंद है, रोजगार का काम नहीं है, लोग दिल्ली जा रहे है, एक स्थानीय एनजीओ द्वारा गठित मनरेगा मजदूर संगठन के साथी भी जानते है कि कुछ नहीं हो रहा, मजदूरी का भुगतान नहीं हो पा रहा, पंचायत और जिले के बड़े अधिकारी कहते है कि काम तो हम करवा लेते है पर भुगतान करवाना हमारी जिम्मेदारी नहीं है , जब से भोपाल के सर्वर से रोजगार ग्यारंटी का भुगतान हो रहा है लेट लतीफी बढ़ गयी है और वे सब मजबूर है वे सिर्फ FTO जारी कर सकते है पर भुगतान नहीं. अब खेतों में फसले भी नहीं , सब बर्बाद हो गया है तिल्ली भी ठीक नहीं हुई, काम ना मिलने और खेती की ग्यारंटी ना होने से अब कोई भी पॅकेज काम नहीं करेगा चाहे रोजगार ग्यारंटी में150 दिन कर दो पर उससे क्या होगा? राजनीती बंद करके लोगों के लिए काम करो और कुसुम महदेले से लोग भयानक नाराज है जो केबिनेट मंत्री है और स्थानीय विधायक.
#Bundelkhandpackage 

Posts of 24 Sept 15


I

सर पर यादों की पोटली
आँखों में गीले सपनो की चमक
होठों पर निशब्द प्रार्थनाएं 
दिल में ज्वर का हिलोर 
और पाँव मुड़ रहे है आसमान में 
समय धीरे धीरे थम रहा है
और सब कुछ खत्म हो रहा है
ये प्रस्थान बिंदु है ठहरता सा
जीभ पर कुछ पिघलता है
चेहरे की झुर्रियां काँप जाती है
हाथों पर रोएँ सिसक उठे है 
नदी शांत है समुद्र में मिलकर 
एक नीम बेहोशी में है पीपल
झींगुर गश खाकर गिरे है यही 
जुगनू रात में बूझ गए है और 
इस समय में एक आत्मा दीप्त है.


II


सिर्फ एक मुट्ठी गीले सपने लेकर 
तुम तक आया था
सूख गए सब यहां तक आते आते ...
अब आँखों में धूल है, 
सर पर सपनो की दहशत 
और दिल में
कुछ नदियां अब भी बह रही है 
अपनी सुनहरी रेत के सायों में
मानो ख़ौफ़ज़दा रातों में अँधेरे को चीरकर 
फिर से सूरज निकलेगा.





आदिवासियों को मुख्यधारा में लाये बिना कुपोषण से मुक्ति असंभव है - संदीप नाईक





पिछले दिनों मप्र के शिवपुरी में कुपोषण का मामला बहुत गर्माया और इस तरह से मप्र में कुपोषण की जमीनी हकीकत सामने आई. लगता है मप्र में कुपोषण एक स्थाई समस्या बन गया है लगता है और तमाम तरह के प्रयासों के बावजूद इस मुद्दे से निजात पाने में सरकारी प्रयास असफल लग रहे है बावजूद इसके कि महिला बाल विकास से लेकर स्वास्थ्य विभाग के अमले ने इसे ख़त्म करने की ठान रखी है. दरअसल में आदिवासियों के बीच यह समस्या बहुत ज्यादा है, जैसाकि हम सब जानते है कि मप्र में आदिवासियों की संख्या सबसे ज्यादा है और प्रदेश के कई  जिले आदिवासी बहुल जिले है और शिशु मृत्यु दर की मात्रा इन्ही जिलों में है. थोड़ा सा गंभीरता से देखें तो हम पाते है कि इन जिलों में आंगनवाडी सेवाओं का संजाल तो बहुत दूर डोर तलक फैला हुआ है, स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी भी पदस्थ है परन्तु सेवाओं का जो सतरत होना चाहिए वह पर्याप्त रूप से नहीं होने के कारण कुपोषण से योजनाबद्ध तरीके से नहीं लड़ा जा रहा फलस्वरूप बीच बीच में ऐसे केस आने से सारे प्रयासों पर पानी फिर जाता है. एक तो आंगनवाडी कार्यकर्ताओं की दक्षता का सवाल है क्योकि आदिवासी इलाकों में शिक्षित कार्यकर्ता मिलना बहुत मुश्किल है, मसलन शिवपुरी के पोहरी ब्लाक में मडखेडा, देहदे जैसे गाँव में कार्यकर्ता अशिक्षित है. खंडवा के खालवा ब्लाक के कई गाँवों में कार्यकर्ता बहुत बुजुर्ग हो गयी है. 

प्रदेश के कई आदिवासी जिलों में कई कार्यकर्ता या तो अपंग है, मानसिक रूप से बीमार है या रिटायर्डमेंट की कगार पर है, इसलिए उनके बदले परिवार का कोई भी सदस्य आकर खाना परोस देता है और बस काम चल जाता है. कई गाँवों में कार्यकर्ता अप डाउन करती है और सहायिका के भरोसे केंद्र चलता है. जबकि बच्चों के बीच में कुपोषण की पहचान करना और उन्हें चिन्हित करके पोषण पुनर्वास केंद्र पर भेजना एक महत्वपूर्ण तकनीकी तरह का काम होता है. दूसरा आंगनवाडी केन्द्रों पर टीकाकरण की स्थिति भी ठीक नहीं है - जहां एएनएम माह में आकर बच्चों के स्वास्थ्य का परीक्षण करती है टीका लगाती है और रेफर करती है साथ ही गर्भवती माताओं को गर्भावस्था के दौरान सेवाएँ उपलब्ध करवाती है. टीके को लेकर आदिवासी समुदाय में बहुत तरह के भ्रम अभी है मसलन बुखार आने पर वे इसे दैवीय प्रकोप मानने लगते है, और वे फिर टीका नहीं लगवाते. उनके बीच सलाह यानि काउन्सलिंग की बहुत ज्यादा जरुरत है परन्तु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पा रहा है. 

हाल ही दिनांक 12 सितम्बर को मै सिवनी जिले के घंसौर ब्लाक के गाँव रूपदौन में गया था जहां एक शिक्षिका ने बताया कि गाँव में दो मृत्यु हो गयी है जिसकी वजह से गाँव के लोगों ने चालीस हजार इकठ्ठा करके एक तांत्रिक को बुलाया है जो कल आकर पूजा करेगा और गाँव से विपत्ति भगाएगा. मैंने गाँव के लोगों से और उन आदिवासी शिक्षिका से लम्बी बात की पर वैज्ञानिक चेतना के अभाव में आखिर गाँव के लोगों ने  दुसरे दिन सुबह कही से तांत्रिक को बुलाकर पूरा अनुष्ठान संपन्न किया और फिर वे महिला अध्यापिका हमारे प्रशिक्षण में आई.


आदिवासी जब पोषण पुनर्वास केंद्र पर अपने गंभीर कुपोषित बच्चों को लेकर आते है तो कई प्रकार की समस्याएं उन्हें होती है. सबसे पहले तो अधिकाँश परिवार एकल परिवार है जिनमे पांच से लेकर आठ बच्चे है, एक बच्चे को पुनर्वास केंद्र में भर्ती कर देने से माँ को भी पूरे चौदह दिन वहाँ उस बच्चे के साथ रहना पड़ता है जोकि उसके लिए संभव नहीं होता, क्योकि उसके दूसरे बच्चों की देखभाल कौन करेगा? केंद्र में बच्चे के साथ सिर्फ माँ ही रह सकती है बाकी बच्चों के लिए जगह नहीं है और प्रावधान भी नहीं है लिहाजा अन्य छोटे बच्चों की फ़िक्र में वह नहीं रह पाती. दूसरा माँ को रहने का खर्च मिलता है जोकि अपर्याप्त होता है. यदि वह घर में है तो मजदूरी के साथ वह परिवार के साथ साथ अपने खेत, जानवरों की भी देखभाल कर पाती है. केंद्र के शहरी माहौल में वह आसानी से अपने को समायोजित नहीं कर पाती कि चौदह दिनों तक वह बच्चे के साथ रह सकें. हालांकि गंभीर कुपोषण के मामले में पोषण पुनर्वास केंद्र से बेहतर कुछ हो नहीं सकता, बीच में महिला बाल विकास विभाग ने सेक्टर स्तर पर गाँवों में हफ्ते हफ्ते के शिविर लगाकर कुपोषण से ग्रस्त बच्चों को ठीक भी किया था. तीसरी महत्वपूर्ण समस्या है पलायन, हाल ही मैंने पन्ना, सिवनी, मंडला, डिंडोरी, झाबुआ और आलीराजपुर जिलों के दूर दराज के सघन जंगल में बसे गाँवों में यात्रा की है. पलायन एक बड़ी समस्या है क्योकि पानी के अभाव में पड़े सूखे से गाँवों में काम नहीं है, रोजगार ग्यारंटी के काम है नहीं, लोगों ने इस योजना में अपने आस्था खो दी है इसलिए इस त्राहिमान समय में जब उनके अपने खेतों की फसलें भी सूख रही है तो वे दिल्ली, मुम्बई, कानपुर, गुडगाँव, अहमदाबाद, सूरत जैसे शहरों में पलायन कर रहे है. मंडला, पन्ना में  पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों ने बताया कि पलायन एक बड़ी समस्या है, रोजगार ग्यारंटी योजना के भुगतान देरी से मिलने के कारण आदिवासी इसमे काम करना पसंद नहीं करते, वे पलायन कर जाते है और चार से छः माह बाद लौटते है, और इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ता है जब वे पलायन से वापिस आते है तो बच्चे और कमजोर हो जाते है जिन्हें ठीक करना हमारे लिए बड़ी चुनौती हो जाता है. 


अब सवाल यह है कि व्यापक स्तर पर कैसे लोगों के बीच काम कर रहे एनजीओ और लोग सक्रीय होकर आदिवासियों के बीच जागृति का काम करें ताकि वे अपने बच्चों में कुपोषण जैसी गंभीर समस्या को लाकर सचेत हो सके और इससे स्थाई मुक्ति मिल सकें. जरुरत है समग्र स्तर पर प्रयास करने की. शिक्षा का प्रसार, सलाहकार सेवाएँ, जागरूकता अभियान, सेवा देने वाले कर्मचारियों में सेवा भाव और निष्ठा से काम करने का जज्बा पैदा करना और सेवाओं की पहुँच में गुणवत्ता सुनिश्चित किये बिना हम आदिवासियों को ना मुख्य धारा में ला सकते है ना उनके बच्चों को कुपोषण या अन्य बीमारियों से बचा सकते है. 

“कविता भाषा में मनुष्य होने की तमीज है” - संदर्भ उत्तर शती की कविता : समाज और संवेदना -बहादुर पटेल-


जब हम साहित्य या साहित्य की किसी विधा की बात करते हैं तो हमें उसके इतिहास के साथ साथ समग्रता में उसके विकास की बात भी करनी होगी . यहाँ जब हम उत्तर शती की हिंदी कविता पर बात करते हुए समाज और संवेदना के बरक्स कविता की क्या भूमिका रही और कविता पर क्या प्रभाव पड़े यह भी देखना पड़ेगा . किसी भी विषय पर बात करते समय हम यह तय भलें ही कर दें कि उत्तर शती पर बात करें . लेकिन हमें पीछे भी जाना होगा . देखना होगा कि आखिर यह यात्रा उत्तर शती तक किस तरह आई होगी . तभी हम मुकम्मल समझ विषय के बारे में बना पाएंगे . फिर यह भी है कि हमारा समाज, देश और यह विश्व भी तो उस साहित्य या कला के समानान्तर अपनी दूरी तय करते हैं और एक दूसरे पर प्रभाव भी डालते हैं . कविता की बात करें तो कविता अपने समय का सन्दर्भ होती है . हम उसमें वह समय देख सकते हैं जब उसकी रचना हुई . उस समय का समाज और उसके भीतर की हलचल सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक किसी भी रूप में हो हमें देखने मिलेगी. इसीलिए हर समय की कविता दूसरे समय से अपने को अलग करती है . कविता की इन प्रवृतियों को हम हिंदी साहित्य के इतिहास में कालखंडों के रूप में देखते ही हैं . इसी तरह यदि हम उत्तर शती की कविता पर बात करेंगे तो हम उस समय को भी पकड़ना होगा और उसकी पड़ताल भी करनी होगी.

आज़ादी के चार दशक तक की यात्रा में हम जिस तरह का सपनों भारत बनाना चाह रहे थे . वैसा वह बना तो नहीं था . पर उम्मीद और विकल्प हमारे सामने जरुर थे जिनसे हम गैरबराबरी दूर कर एक खुबसूरत दुनिया और उसके भीतर बेहतर इंसानों को गढ़ने का सपना देख रहे थे . लेकिन हम देखते हैं की उत्तर शती में परिवर्तन जिस तेजी से हुए हमें संभलने का मौका ही नहीं मिला . वैश्विक स्तर जो बदलाव आये जिससे भारत ही नहीं पूरे विश्व में मानवीयता का ह्रास हुआ और साम्राज्यवाद ने अपने पंजे फैलाना शुरू किये . बहरहाल उत्तर शती की कविता को देखने पर हमें तीन खास संदर्भ दिखेंगे.

पहला यह कि सोवियत संघ में साम्यवादी व्यवस्था के एक मॉडल का पतन जिससे एक नए समाज का सपना भंग हुआ . जिसका प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ा लेकिन सबसे बड़ा झटका तीसरी दुनिया के विकासशील देशों को लगा . ये सारे देश अपने बनने की भरपूर प्रक्रिया में थे . भारत भी इससे अछूता नहीं रहा . बल्कि हम जिस व्यवस्था का सपना देख रहे थे वह वह भी भरभरा गया . यह उत्तर शती की शुरुआत का समय था . इस समय में जो बदलाव आये वे हमारे वर्तमान समाज को बनाने में नींव की ईंट का काम कर रहे थे . उदारीकरण, आर्थिक सुधारवाद और भूमंडलीकरण की शुरुआत का समय था . इस समय सरकारों ने तेजी से यह कोशिश की कि जो राज्य नियंत्रित हमारे उद्योग थे और उनकी जो व्यवस्था थी उनको खोलने की शुरुआत की . विदेशी पूँजी का निवेश और खासकर विश्व बैंक और विश्व मुद्रा कोष का नियंत्रण और दिशा निर्देशन जिनको मानना शुरू किया . जिससे हमारे हाथ से जो श्रमजीवी वर्ग के लिए एक उम्मीद बन रही थी बेहतर समाज की वह छूट गयी . इन सारे बदलाव से हमारे उस समय की कविता जूझ रही थी और आगाह भी कर रही थी . उस दौर की कविता में हम उस समय को आसानी से पकड़ सकते हैं . यही नहीं उस समय की कविता हमें दूरगामी परिणाम भी बता रही थी जहाँ आज हम खड़े हैं . वे कविताएँ अपने लिखे जाने के पच्चीस साल बाद भी प्रासंगिक है . यही तो करती है कविता अपने समय को तो दर्ज करती ही है बल्कि उनके प्रभाव लम्बे समय तक बने रहते हैं . इस तरह वे अपने समय में तो हस्तक्षेप करती ही हैं साथ ही आने वाले समय में अपना पक्ष रखती है और बदलाव की चेष्टा भी करती है.

दूसरा संदर्भ देखें तो यह समय समाज के ध्रुवीकरण की शुरुआत का समय भी है . भारतीय समाज एकरूप समाज के लिए जाना जाता है . हिंदी की महत्त्वपूर्ण ‘पहल’ पत्रिका तो इस देश को महादेश कहती है और इस महादेश में तो कहा जाता है कि कई समय और कई समाज एक साथ रह रहे हैं . इतने बड़े समावेशी समाज में ध्रुवीकरण खतरनाक होता है जैसे कि हम देखते हैं की उत्तर शती का जो आख़िरी का हिस्सा है वह समाज को अधिक से अधिक ध्रुवीक्रत करने वाला है . इस समावेशी समाज में धर्म, सम्प्रदाय और जातियों के ध्रुवीकरण हो रहे हैं . हिन्दू अधिक हिन्दू हो गया मुसलमान अधिक मुसलमान हो गया . रंग अलग-अलग दिखने लगे हैं . यदि कोई जाति अपनी संस्कृति का निर्वाह करती है तो कोई बुराई नहीं है लेकिन वह दूसरी जाति के विरुद्ध यह क्रियाकलाप करती है यह खतरनाक है . इसी तरह एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के ख़िलाफ़ सिर्फ़ यह दिखाने के लिए कि हमारा धर्म श्रेष्ठ है यह मनुष्यता के लिए घातक है . ध्रुवीकरण की यह प्रवृत्ति मनुष्यता के लिए बहुत घातक है . इस तरह उत्तर शती ही हमारे लिए मनुष्यता का सबसे बड़ा संकट भी लेकर आई जिसमें भारतीय समाज ज्यादा से ज्यादा ध्रुवीक्रत हो गया . इसका सबसे ज्यादा प्रभाव उन समाज पर ज्यादा पड़ा जो हाशिये पर थे और धीरे-धीरे मुख्य धारा में आने का प्रयास कर रहे थे . फलस्वरूप हाशिये के समाज और ज्यादा हाशिये पर चले गए . इससे कविता को बहुत नुकसान पहुंचा क्योंकि कविता बराबरी के समाज के भीतर मनुष्यता और जीवन के पक्ष में खड़ी होती है . मनुष्यता और जीवन पर जो खतरे हैं वे हमारी कविता के भी बड़े खतरे हैं.

तीसरे संदर्भ की बात करें तो यह कि यह समय दो महत्त्वपूर्ण कविता के केन्द्रीय विमर्शों का समय है जिसमें पहला स्त्री की चिंता . क्योंकि स्त्री भी हजारों सालों से अपने अधिकारों से वंचित और दबी कुचली रही . हमारी आधी आबादी हमेशा से शोषित रही और आज भी है . स्त्री के पक्ष में कविता खड़ी हुई बल्कि कविता को ताक़त की तरह स्त्रियों के पक्ष में खड़ा किया गया . उत्तर शती में ज्यादा तादाद में स्त्रियों ने अपना पक्ष रखा . स्त्रियों की और से जो आवाज़ आई वह शोषण के ख़िलाफ़ उनकी अपनी आवाज़ है, इनमे महत्वपूर्ण कात्यायनी, अनामिका, गगन गिल और तेजी ग्रोवर है.  

दूसरा विमर्श दलित की चिंता के रूप में हमारे सामने आ रहा है . दलित और हजारों सालों दबे कुचले लोगों के पक्ष में कविता ने हमेशा अपना काम जिम्मेदारी से किया है . चाहे वह कबीर का समय हो या निराला का समय हो . इसके अंतर्गत बात यह भी उठी कि गैर दलितों की और से उनके शोषण के ख़िलाफ़ कविताएँ आई . उत्तर शती में यह आवाज़ भरपूर ताक़त के साथ मुखर हुई . बल्कि यह हुआ कि खुद दलितों की और से कविताएँ आई और शोषण का पुरजोर विरोध हुआ . जैसा कि मुक्तिबोध ने लेखकीय संवेदना के बारे में कहा कि संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना . दो तरह से संवेदना की अभिव्यक्ति के साधन है . जिसमें दलितों ने खुद अपने भोगे हुए यथार्थ को अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त कर अपने प्रतिरोध को मुखर किया . दलितों के साथ-साथ आदिवासियों की आवाज़ खुद उनकी जुबानी उत्तर शती में हम देख रहे हैं . ये सारे संकेत एक नई लड़ाई नए संघर्ष को जन्म दे रहे हैं.

इन केन्द्रीय विमर्शों के साथ-साथ संसार का तेजी से एक ध्रुवीय राजनैतिक बंदोबस्त सबसे खतरनाक है . सोवियत रूस के पतन के बाद परिस्थितियाँ बहुत तेजी से बदली . अमरीका जैसे देश को खुलकर अपनी मनमानी करने का मौका मिला . एक नयी तरह के साम्राज्य का उदय हुआ . इससे कहीं न कहीं और सारे समाजों को भयाक्रांत किया जो कि एक वैकल्पिक समाज की कल्पना करते थे . उत्तर शती की कविताओं में इस साम्राज्यवाद का पुरजोर विरोध दर्ज हुआ. अमेरिका जैसे देशों की इस तरह की अतिवादी और दोहरी राजनीति के ख़िलाफ़ लिखा ही नहीं गया बल्कि इनके ख़िलाफ़ प्रदर्शन भी किये गए . इस तरह की कविताओं और जनगीतों  का जिसमें टूल की तरह इस्तेमाल भी किया गया.

इसी के साथ यह हुआ कि समाज को विकल्पहीन बनाने के षड्यंत्र का समय भी उत्तर शती में शुरू हुआ . यह इस समय का बहुत घातक विचार है . साम्राज्यवाद और पूंजीवाद दोनों की इसमें महती भूमिका रही . जीवन और मनुष्यता को बचाने के लिए जहाँ एक और कविता अपना काम कर रही थी . वहीँ इस विचार ने एक नए समतावादी समाज स्वप्न को ख़त्म करने और वर्गीय समाज बनाने की कोशिश की . यह बार-बार कहा जाने लगा कि विचार का अंत हो गया और इसी तरह से इतिहास का अंत भी हो गया है यह बहुत भ्रांत विचार है . ये सब कहने के पीछे मंशा यह थी कि हमारे लिए अब कोई विकल्प नहीं बचा . एक ही विकल्प बचता है और वह है पूँजीवाद . इसका नुकसान यह हुआ कि तीसरी दुनिया के विकासशील देशों में जहाँ कहीं वैकल्पिक समाज के खड़े होने संभावना बन रही थी वह ख़त्म हो गयी . समाजवादी विचारक किशन पटनायक कहते थे कि ये दुनिया कभी भी विकल्पहीन नहीं हो सकती . तो सवाल यह उठता है कि यह भ्रान्ति कौन फैला रहे हैं . दरअसल ये वही पूंजीवादी और साम्राज्यवादी ताक़तें हैं जो एक इकहरी और विकल्पहीन दुनिया बनाना चाहते हैं . ये तीसरी दुनिया के देशों को अपना क्लोन बनाना चाहते हैं . जबकि विकल्प हमेशा से रहे हैं और रहेंगे इसी से मनुष्य का विकास होता है और होता आया है . हमारी कविता भी इन विकल्पों को बचाने की कविता है बल्कि हमारे सामने कई विकल्प प्रस्तुत करती है ताकि एक अच्छे और सभ्य समाज का निर्माण किया जा सके.

उत्तर शती की कविता तक आते आते हिन्दी कविता अकविता और नई कविता का एक लंबा रास्ता पार कर चुकी थी. चंद्रकांत देवताले, विनोद कुमार शुक्ल जैसे कवि अपनी कविता को एक नई जमीन पर ला चुके थे. उत्तर शती की कविता हमारे समय की सबसे सचेत कविता है. इन कविताओं ने उत्तर शती की चिंताओं को सबसे ज्यादा पकड़ा . इस समय की हिंदी कविताएँ ही नहीं बल्कि भारतीय कविताओं की भी यही चिंता रही है . एक ही समय में भारतीय कविता चाहे वह किसी भी प्रादेशिक या क्षेत्रीय भाषा की क्यों न हो उनकी चिंता भी इसी समय को लेकर रही है . क्योंकि कविता कभी भी अपने समय से विमुख नहीं होती है . हिंदी कविता ने भी यह किया . भारतीय कविताओं ने इस समय को लेकर जो प्रतिरोध दर्ज किया उसका उजला पक्ष यह है कि वैचारिक रूप से इन भाषाओं की कविताओं ने एक दूसरे को समृद्ध भी किया . उत्तर शती के इन पूरे पच्चीस सालों में तेजी से राजनैतिक घटनाक्रम बदले हैं इसी कारण यह बेहद घटना प्रधान समय भी रहा है . इसी के चलते भारत दुनिया के नक़्शे पर तेजी उभरा भी है जिस पर सभी ध्यान देने लगे हैं और हमारी बातें सुनी भी जाने लगी है . इसकी गूंज हिंदी कविता में सुनी जा सकती है . हिंदी कविता उन क्षेत्रों में भी लिखी जा रही है जो भारतीय क्षेत्र नहीं है . राष्ट्रवाणी पत्रिका जो महाराष्ट्र से ही प्रकाशित होती थी जिसमें हिंदी के लेखक बहुतायत में प्रकाशित हुए . मुम्बई से निकलने वाली कई हिंदी पत्रिकाओं में जिसमें धर्मयुग, सबरंग आदि है कोलकाता से वागर्थ जैसी पत्रिका आज भी निकल रही है . तो इस तरह से हम देखते हैं इस समय की चिंता हिंदी कविता के साथ-साथ भारतीय कविता में भी देखी जा रही थी और आज भी देखी जा रही है.

उत्तर शती की कविता की पृष्ठभूमि को देखे तो एक और विशेष बात दिखाई देती है और वह है नक्सल वाद से प्रभावित की गूँज. आलोक धन्वा, वेणुगोपाल, जैसे कवि अपनी कविता में जिस आक्रामक तेवर में दिखाई देते है, वह अपने पूर्ववर्ती धूमिल की कविता की याद दिलाते है. “कविता भाषा में मनुष्य होने की तमीज है” एवं " "कविता ही सिर्फ़ विपक्ष में शेष है" एवं आलोक धन्वा की गोली दागो पोस्टर जैसी कविताएँ एक ख़ास तरह के बदलाव की ओर इंगित करती है. उत्तर शती की कविता को देखें तो हम पाएंगे कि यहाँ विषयों की बहुलता के साथ-साथ कवियों के स्वर भी विविधता लिए हुए हैं . जिसमें हर वर्ण और वर्ग के साथ-साथ विभिन्न पेशों से जुड़े स्त्री-पुरुष अपनी विशिष्टता के साथ अपनी बात या अपने जीवनानुभव कविता में लेकर आये . इससे यह कविता बहुत समृद्ध होकर समग्र कविता है . किसी भी समय में कलाओं में काम कर रहे कलाकारों की चार पीढियां हमेशा सक्रिय रहती है . इस शती में भी उनकी सक्रियता रही और है . और यूँ देखें तो हिंदी कविता के इतिहास और उसके विकास क्रम का इस कविता को यहाँ तक लाने में बड़ा योगदान है . जिसमें तुलसी, कबीर और उसके बाद निराला, महादेवी वर्मा आदि कई नाम तो है ही . जिनकी गूंज हमारे समय की विभिन्न रूपों की कविता में मिलती है . बाद में अकविता के दौर में कविता के बने बनाये स्वरुप में काफी परिवर्तन या प्रयोग किये गए यहाँ तक कि किसी भी तरह से अपनी बात रखी जाये . प्रतिरोध दर्ज किया जाये . उसके बाद कविता ने अपनी पहचान बहुत अलग रूप में बनाई जो आज हमारे सामने समकालीन कविता के रूप में हैं . हमारे पूर्ववर्ती कवियों के प्रतिरोध के स्वर धारदार थे और उन्होंने जोखिम उठाकर कविकर्म किया . इसमें प्रमुख रूप से पंजाबी में पाश थे तो हिंदी में मानबहादुर सिंह जैसे कई कवि हुए हत्याएं हुई . उसके बाद त्रिलोचन, बाबा नागार्जुन, शमशेर, रघुवीर सहाय, धूमिल, मुक्तिबोध जैसे कई कवि हैं जिनकी गूंज बहुत दूर तक जाती है और इस शती की कविता में भी दिखती है . इसके बाद जो पीढ़ी इनके बाद की है और अभी उत्तर शती में भी कविता लिख रही है . वह मार्गदर्शक तो है ही लेकिन अभी हाल ही में लिख रहे ताज़ा या एकदम नए कवि हैं उनके साथ भी हैं और एकदम नए संकट और चिंताओं पर साथ-साथ संघर्ष कर रहे हैं . इस समय की कविता में अपने समय को कहने के लिए कविता की जितनी जोखिम या चुनौतियां हो सकती है सब उठाने की कोशिश की . कई बार इस कारण इस तरह की कविता को कविता होने से भी आलोचकों ने ख़ारिज किया.

उत्तर शती की कविता को जब हम देखते है, तो उसमे राजेश जोशी, लीलाधर मंडलोई, कुमार अम्बुज, देवी प्रसाद मिश्र, बद्रीनारायण, जितेन्द्र श्रीवास्तव इत्यादि जैसे कई महत्वपूर्ण कवियों ने अपनी निजता और सामाजिक सरोकार बहुत गहरे ढंग से एक विशेष प्रकार की यथार्थपरक दृष्टि के साथ अपनी बात कविता में कहने की कोशिश की है. इस शती के अंत अंत तक हमें निशांत, अशोक कुमार पाण्डेय जैसे कवियों ने कविता में इन्ही सरोकारों के निर्वाह का अगला चरण शुरू किया. कविता के संदर्भ में यह कहा जाता रहा है कि कविता हाशिये की विधा है और कविता का समय गया . लेकिन कविता अभी भी केन्द्रीय सच और मनुष्य का सच कहती है . मनुष्य की चिंता को लेकर अभी भी सबसे ज्यादा परेशान विधा है . अभी कविता की संभावनाएँ और कविता इस बदलते हुए समय में जिस तेजी से इस युद्ध के समय में बदल रही है . इसका प्रमाण यह है कि अभी भी कविताओं को लेकर कई विशेषांक पत्रिकाओं के प्रकाशित हो रहे हैं . कविता अपने समय को लेकर अभी भी पूरी तरह से तैयार है . कविता ने अभी हथियार नहीं डाले हैं . जब तक हथियार नहीं डाले हैं तब तक मनुष्य की लड़ाई पर भी हमको उम्मीद बनाकर रखना चाहिए कि अभी भी एक बेहतर मनुष्य की संभावनाएँ अभी भी शेष है . क्योंकि कविता की संभावनाएँ भी अभी शेष है . यह कविता हमें आश्वस्त भी करती है.

(दिनांक 22 सितम्बर 15 को डा जीडी बेन्डाले कन्या महाविद्यालय, जलगांव, महाराष्ट्र में विश्व विद्यालय अनुदान योग, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित ‘राष्ट्रीय हिन्दी परिषद्’ की गोष्ठी में पढ़ा गया पर्चा)

-बहादुर पटेल
12-13, मार्तण्ड बाग़
ताराणी कॉलोनी
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मो. – 9827340666




  

Sunday, September 20, 2015

उत्तर सदी की हिन्दी कहानी : समाज और संवेदनाएं



मित्रों, उत्तर सदी की हिन्दी कहानी का विकास दुनिया के किसी भी साहित्य में उपलब्ध प्रक्रिया के तहत अपने आप में अनूठा होगा इस लिहाज से कि हिन्दी कहानी ने इस समय में बहुतेरी ना मात्र घटनाओं को देखा, परखा और समझा वरन भुगता भी है इसलिए उत्तर सदी की हिन्दी कहानी एक नाटकीयता नहीं, एक कहानी की परम्परा नहीं बल्कि एक सम्पूर्ण इतिहास को व्याख्यित करती है जहां लेखक, इतिहासकार, कलाकर्मी अपने समय से दो चार होते है मुठभेड़ करते है और फिर उस सब होने, देखने और भुगतने का सिलसिलेवार दस्तावेजीकरण करते है और हमें सौंपते है है एक समृद्ध विशाल और बड़ा फलक जिसे हम आने वाले समय में सीखने के लिए सहेजकर रख सकें.

विश्व परिदृश्य

विश्व के परिदृश्य पर नजर डाले तो हम पायेंगे कि पूरी दुनिया में यह बेहद उठापटक और खलबली मचने वाला समय रहा है जिसे साधारण भाषा में हम संक्रमण कह सकते है परन्तु इस संक्रमण के काल में इतिहास में कभी ना घटित हुई घटनाओं ने समूची मानवता को प्रभावित किया और एक बेहतर दुनिया को देखने के महा स्वप्न को भंग कर देने के षड्यंत्रों को देखा समझा. निश्चित ही कहानी को चाहे वो हिन्दी या विश्व के किसी और भाषा की हो, को इस बदलते परिदृश्य ने प्रभावित किया है. सन 1991 में गोर्बाच्योव के ग्लास्तनोस्त और पैरेस्त्रोईका ने जिस तरह से रूस का खात्मा किया वह समय बहुत ही कठिन समय था जिससे सदी का महास्वप्न भंग हुआ यह मेरा मानना है. ठीक इसी समय से दुनिया के परिदृश्य पर एक नजर डालें तो हम देखते है कि उदारवाद सुधारवाद और वैश्विकीकरण का समय में श्रमजीवी समुदायों को हाशिये पर धकेलने का काम बहुत सुसंगठित तरीके से किया जाने लगा और एक संघर्षशील वर्ग को आहिस्ते से पूरे विकास से हटाने का काम किया गया. जिस पूंजी को एक अभिशाप मानकर एक नई दुनिया देखने का स्वप्न हमने संजोया था वही पूंजी राजनीती पर हावी होती गयी और अन्तोत्गात्वा सर्वोपरि हो गयी. नए उद्योग घरानों का प्राकृतिक संसाधनों पर सत्ता के साथ मिलकर उदय और फिर पूरी दुनिया से सर्वहारा वर्ग के हकों, लड़ाईयों और ट्रेड यूनियनों को सिरे से नकार कर ठेकेदारी प्रथा से मानव शर्मा को हांकना, टास्क आधारित काम पर पूंजी का वितरण आदि भी इसी वर्ग की एक चाल थी जिसने मजदूरों को ना मात्र खत्म किया बल्कि उन्हें ज़िंदा रहने के लिए भी नहीं छोड़ा. अमेरिका और रूस के द्वीध्रुवीय व्यवस्था के पराभव का भी यही समय है जन विश्व संस्था के रूप में यु एन ओ जैसे संगठन एकाएक ताकत बनकर उभरे जिन्होंने रूस के खात्मे के बाद अमेरिका के बढ़ते वर्चस्व को विश्व में स्थापित किया यहाँ तक कि एक ठोस उदाहरण से अपनी बात कहूं तो ईराक पर किया गया हमला बगैर सहमित के किया गया और सिर्फ तेल पर अपना दबदबा कायम करने के लिए हजारों जानें ली गयी. इसी से दुनिया में तेल की राजनीती पनपी जिसने कालान्तर में दुनिया भर में रिसेशन या मंदी थोपी जिसका नुकसान ज्यादातर गरीब मुल्कों पर हुआ जो संसाधनविहीन थे और इस मंदी में इन्हें अपना सब कुछ बेचना पडा या भारत जैसे देश को अपना सोना भी गिरवी रखना पडा.


विश्व के फलक पर तेजे से बढ़ते घटते क्रम में दुनिया के इतिहास में सभ्यताओं के संघर्ष जो इस उत्तर सदी में उभरे है वे अपने आप में बेहद रोचक, डरावने और सिखाने वाले है. दक्षिण एशिया में उभरे गुट निरपेक्ष जैसे आन्दोलनों की महत्ता ख़त्म हो गयी और एशियाई देशों के सामने चुनौतियां अपने पड़ोसी मुल्कों और साथ वाले गरीब देशों से ही मिलने लगी लिहाजा अपनी सारी ताकत वे बनिस्बत विकास, गरीबी, बेरोजगारी या महिला समानता, दलित और वंचित लोगों की भलाई करने के आपस  में लड़कर अपनी ऊर्जा और संसाधन ख़त्म करने लगें जिससे वे लगातार गरीब होते चले गए, गृह युद्धों की स्थिति में जी रहे इन देशों के सामने अमेरिका के सामने घुटने टेकने के अलावा कोइ और चारा नहीं बचा और अमेरिका अपने हतियार बेचने के लिए एक से दूसरे मुल्क में यात्राएं करता रहा और किसी सिद्धहस्त खिलाड़ी की तरह से बाजार में वो सब देता रहा जिससे उसके प्रोडक्ट दनिया के बाजार में छा जाए और वो स्थानीय उद्योग धंधों को ख़त्म कर अपना वर्चस्व दुनिया में शामिल कर पाए. यूरोप के राजनैतिक नक़्शे में बदलाव को भीहमने इस उत्तर सदी में देखा जहां एक ओर दोनों जर्मनी का एकीकरण हुआ, और दीवारें टूटकर गिरी वही युगोस्लोवाकिया, चेकोस्लोवाकिया और सोवियत संघ जैसे देशों का या शक्तियों का विघटन हुआ जो कि बहुत चिंतनीय था परन्तु बदलती अर्थ व्यवस्था और राजनैतिक ध्रुवीकरण के समय में कही से कोई आवाज उठाने वाला नहीं था. इसका असार अभी तक है हाल ही में एक छोटे से देश को विश्व मुद्रा कोष ने खरीदने की बात की थी परन्तु अच्छी बात यह थी कि जन मानस ने जनमत में इस बात को नकार दिया.

भारतीय परिदृश्य

भारतीय परिदृश्य पर एक नजर डालें तो हम पायेंगे कि दुनियावी उथलपुथल से भारत जैसा देश भी अछूता नहीं रहा, पचास साल की आजादी के बाद देश ने करवट बदलना शुरू किया और यहाँ के लोगों ने जब अभी आजादी का मतलब समझा ही था, शासन, प्रशासन और स्वशासन की इकाईयों को समझकर वे 73 वें और 74 वें संविधान संशोधन को अंगीकार करके सुशासन स्थापित कर ही रहे थे कि मंदी ने उनके जीवन पर प्रभाव डाला और सब कुछ विध्वंस कर दिया. यह बहुत लम्बी बात नहीं है जब मन मोहन सिंह ने संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि “लम्हों ने खता की है और सदियों ने सजा पाई है” लिहाजा देश को गिरवी रखकर आर्थिक सुधार करना होंगी, विश्व बाजार को अपने आँगन में बुलाकर मिश्रित अर्थ व्यवस्था के मॉडल को हमने एक झटके में तोड़ दिया. उदारवाद की बयार में छोटे मोटे लोग बह गए और एक ग्लोबल विश्व और मॉल की चकाचोंध भरी दुनिया से सबसे सॉफ्ट मध्यमवर्ग को लुभावने सपने दिखाकर यहाँ भी संघर्ष को सिरे से खत्म कर दिया गया.


इस समय में मिश्रित या यूँ कहें कि गठबंधन सरकारों का दौर चालु हुआ जिसने समूचे राजनैतिक ढाँचे को एक अजीब स्थिति में पाया, इस गठबंधन से ना मात्र आर्थिक बदलाव करना पड़े बल्कि सामाजिक और राजनैतिक बदलाव एक अनिवार्य तत्व की तरह से आया जिसने भारतीय विकास के सोपान में नया अध्याय लिखना आरम्भ किया. इस उथल पुथल भरे समय में ही हमने मिश्रित अर्थ व्यवस्था की विदाई की और मप्र के एक छोटे से जिले बडवानी से उभरे नर्मदा आन्दोलन ने विकास और विनाश के प्रश्न उछाले इस ताः के जमीनी आन्दोलनों से पूंजी का जहां महत्त्व बढ़ा वही पूंजी के प्रति एक नफ़रत भी समाज ने देखी जहां एक बड़ा तबका सामने आया और बेहद प्रतिबद्धता से जमीनी आन्दोलनों में नेत्रित्व के रूप में सामने आया और फिर एक बार नक्सलवाद, माओवाद, एक्टिविज्म को परिभाषित किया जाने की मांग उठी ठीक इसके विपरीत जातिगत ध्रुवीकरण और हिन्दू मुस्लिम शक्तियों के कारण समाज में कमजोर और वंचित समुदाय को लगातार हाशिये पर धकेला गया क्योकि इस साम्प्रदायिकता में सबसे ज्यादा नुकसान गरीब और शोषित वर्ग का हुआ. पर इसी के साथ राजनीती में दलित और वंचित वर्ग ने अपनी घुसपैठ भी बनाई. इनकी राजनीती और निर्णय में बहाली भी इसी दौर की उपज है.


उत्तर सदी की कहानी

सबसे महत्वपूर्ण उत्तर सदी की कहानी की यह थी कि इस समय में हिन्दी की चार पीढियां बराबरी से सक्रीय थी, बहुत प्रतिबद्धता से चार पीढ़ियों का एक साथ सामान रूप से सक्रिय रहना हमें निकट इतिहास में कही देखने को नहीं मिलता, यहाँ तक कि क्षेत्रिय भाषाओं में ऐसा बिरला उदाहरण देखने को नहीं मिलता. निर्मल वर्मा, भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वैद, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, मोहन राकेश से लेकर संजीव, राजेन्द्र दानी, उदय प्रकाश प्रकाशकांत, हरी भटनागर, संजीव ठाकुर, भालचंद्र जोशी आदि जैसे लेखक बेहद सक्रीय होकर कहानी लिख रहे थे. इन्ही के साथ साथ साठोत्तरी पीढी के सक्रीय दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह रविन्द्र कालिया जैसे कहानीकार भी सक्रीय थे. जीतेन्द्र भाटिया, रमेश उपाध्याय, मृणाल पांडे, गोविन्द मिश्र, स्वयंप्रकाश, सत्येन कुमार, पंकज बिष्ट, मन्नू भंडारी, रमाकांत श्रीवास्तव यानी प्रतिबद्ध और गैर प्रतिबद्ध दोनों प्रकार के साहित्यकार थे.


इस चार पीढी की सघन और रचनात्मक यात्रा में कहानी कई तरह के धरातलों पर चल रही थी जहां एक ओर राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और भीष्म साहनी, ज्ञानरंजन कहानी को अपने तई परिभाषित कर रहे थे, नई कहानी की संरचना पर बात हो रही थी वही कहानी के मूल स्वर में महास्वप्न भंग की आहट हिन्दी में भी बनी हुई थी, नईदुनिया के स्वप्न भंग होने की बात कहानी ने भारत की आजादी के दो दशकों में ही भांप ली थी और इसी तर्ज पर एक भयावह  दुनिया का मंजर कहानी में सामने आने लगा था. उद्योगिकीकरण और तेजी से बढ़ाते जा रहे शहरीकरण के कारण परिवारों का विघतन हो रहा था और इसे उभारने में कई कहानीकार सफल रहे जिन्होंने महानगरीय पीड़ा को देखा, शहरीकरण और खत्म होते गाँव, वहाँ की संस्कृति पर शहरी आक्रमण का प्रभाव देखा तो उन्होंने कहानी में भी व्यक्त किया और जो फिल्मों में स्क्रिप्ट लेखन के लिए बंबई की ओर निकल गए वहाँ उन्होंने रुपहले परदे पर भी इस पीड़ा को व्यक्त किया. इस पूरी कहानी के मूल स्वरों में दलित और स्त्री विमर्श मुख्य रूप से दो विमर्शों की तरह से उभरकर आये जिसने कहानी की संवेदना को प्रभावित किया. तुलसीराम, ओम प्रकाश वाल्मिकी, अजय नावरिया आदि जैसे कहानीकारों ने अपनी कहानियों के माध्यम से दलित चेतना को सामने रखा, वही रमणिका गुप्ता, पुष्पा मैत्रेयी, लवलीन, जया जादवानी, प्रभा खेतान, मनीषा कुलश्रेष्ठ जैसी महिला कहानीकारों ने महिला चेतना और विमर्श की बात हिन्दी कहानी में रखी. इस स्त्री विमर्श ने हिन्दी कहानी में स्त्री संबंधों की पड़ताल की, स्त्री स्वातंत्र्य की नए सिरे से व्याख्या की, सीमोन द बाउवा को एक बार फिर से व्याख्यित किया, खारिज किया और फिर  स्वीकार भी किया. इसी समय में इन कहानीकारों ने उदारवाद से आ रहे परिवर्तन की पड़ताल की, इस सन्दर्भ में स्वयंप्रकाश की कहानी “मंजू फ़ालतू” कहानी का उल्लेख आवश्यक है, साम्प्रदायिकता पर लेखन बहुतेरे लेखकों ने किया अजगर वजाहत से प्रकाशकांत तक परन्तु इस मुद्दे पर अखिलेश की कहानी ‘अगला अन्धेरा’ इतिहास में उल्लेखनीय है. जहाँ ‘और अंत में प्रार्थना’ जैसी कहानी लिखकर उदय प्रकाश ने समाज, सत्ता, परिवर्तन और संवेदना को एक नया अर्थ दिया, वही प्रियंवद ने बूढ़े का उत्सव या खरगोश जैसी कहानिया दी जो संवेदना के स्तर पर एक अलग तरह की कहानियाँ थी.


हिन्दी कहानी में जमीनी आन्दोलनों से उभरे मुद्दों ने कहानी को प्रभावित किया. वीरेन्द्र जैन के उपन्यास डूब ने विस्थापन जैसे मुद्दे को उभारा वही दर्जनों कहानियों ने भारत में फैलते बेरोजगारी के मुद्दे को एक चिंतन के रूप में उभारा जिसने एक बड़े युवा वर्ग को प्रभावित भी किया और साहित्य से जोड़ा भी. बढ़ता तथाकथित मध्यमवर्गीय समाज का इस दौर में बढ़ना भी एक संकेत है जो अपनी महत्वकांक्षाएं बढाता जा रहा है क्योकि उसे लगता है कि यही शार्ट कट सही है बदलाव का - जहां उसे ना लम्बी कतार में लगना है, ना इंतज़ार करना है किसी बात का जेब में रुपया है तो वह दुनिया की हर सुविधा भोग सकता है, खरीद सकता है और उसके लिए संसार में हर चीज बिकाऊ है यहाँ तक कि साहित्य की मूल संवेदनाएं भी वह खरीद सकता है.  चकाचौंध की दुनिया से प्रभावित मध्यमवर्ग हमारे सामने है और अब वह सवाल नहीं खोजना चाहता, वह सिर्फ विन विन के सिद्धांत पर जीना चाहता है और बाजार के ट्रेप में. किश्तों के जाल से दुनिया की हर सुविधा को वह अपने लिए हर कीमत पर हासिल करना चाहता है.

संवेदना

उत्तर सदी की हिन्दी कहानी में संवेदना दो स्तर पर मै देखता हूँ, एक नागर संवेदना और दूसरी ग्रामीण संवेदना. नागर संवेदना ने जहां बेरोजगारी, शहरीकरण, एकाकीपन त्रासदी, लगातार प्रेम से उभरी और खत्म हुई त्रासदियों को उभारा वही इस कहानी के खिवैया बने जया जादवानी, एस आर हरनोट, निर्मल वर्मा जैसे लेखक. उदय प्रकाश की कहानी पाल गोमरा का स्कूटर या मोहनदास इस पूरी पीड़ा को व्यक्त करती कहानियां है. वही ग्रामीण संवेदना ने गाँव की मूल समस्याएं अर्ध और पूर्ण बेरोजगारी, विस्थापन, गाँवों का खत्म होना, जमीन का बिक जाना और खेती की जमीन पर कल कारखानों का उग आना जैसे मुद्दे उभारें. संजीव ठाकुर की कहानी ‘झौआ बेहार’ इस ग्रामीण संवेदना को व्यक्त करती कहानी है जहां एक युवा शाहर में आकर किस तरह से खो जाता है. ग्रामीण संवेदना की कहानी को स्वर दिया पुन्नी सिंह, संजीव, महेश कटारे, कुंदन सिंह परिहार, प्रकाशकांत, अखिलेश आदि जैसे लेखकों ने. इसी के साथ कहानी में नई आयी संवेदना में आदिवासी समाज की चिंताएं भी उभरी - खासकरके ‘युद्धरत आदमी’ जैसी इस संवेदना को प्रतिनिधत्व देने वाली पत्रिकाएँ महत्वपूर्ण है. हंस, वागर्थ, आजकल, पश्यंती, सारिका, गंगा, समकालीन जनमत, आदि पत्रिकाओं ने आमजन पर केन्द्रित अंक निकालें. नए समाज का स्वप्न ध्वस्त हो रहा था, टूटने से जो लम्बी परछाईयाँ समाज में पड़ रही थी उसने कहानी को गंभीर किया. सुविधाएं बढ़ी जरुर है पर इसके मायने क्या है और क्या होंगे.


आज की कहानी में संवेदना के स्तर पर शहरी ग्रामीण दोनों समाजों को मूल चिंताओं को कह रही है. इसलिए उम्मीद की जाना चाहिए कि ये नया समाज रचेंगी और धैर्य से हमे सब कुछ एक दस्तावेज की तरह से  पढ़ना होगा.


संदीप नाईक - (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित "डा जी डी बेन्डाले महिला महाविद्यालय, जलगांव, महाराष्ट्र" में दिनांक 22 और 23 सितम्बर 15 को आयोजित की गयी राष्ट्रीय संगोष्ठी में पढ़ा गया एक सत्र के आधार वक्तव्य के रूप में आलेख)

Friday, September 11, 2015

मप्र में हिन्दी सम्मलेन- अपेक्षा और समझ की दिशा-दशा का इंतज़ार 9 Sept 15



विश्व हिंदी सम्मेलन: अपेक्षा और समझ की दिशा-दशा का इंतज़ार

मप्र में विश्व हिन्दी सम्मलेन का आयोजन निश्चित ही स्वागत योग्य कदम है और प्रदेश सरकार के इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए इन मायनों में कि जब पूरी दुनिया से क्षेत्रीय भाषाएँ दम तोड़ रही है और बोलियाँ खत्म कर दी जा रही हो, तब किसी सरकार द्वारा एक भाषा जिसे राष्ट्रभाषा मानने के मुगालते में आधे से ज्यादा उत्तर भारतीय ज़िंदा रहते है, को बचाने या मान देने के लिए किया जाने वाला आयोजन निश्चित ही प्रशंसनीय है. वैसे मूल सवाल यह भी है कि क्या लोगों की चुनी हुई सरकारें भाषा या बोलियों को बचाने का काम कर सकती है या यह करना उनके दायित्व और कर्तव्यों में आता है, या यह जिम्मेदारी समुदाय या वहाँ के लोगों की होती है? अगर हाँ तो यह सवाल थोड़ा और गहराई से सोचना लाजमी है क्योकि इस समय जिस तरह से भारत की विकास की चाल है, या जिस अंदाज में उद्योग घरानों को प्रश्रय मिल रहा है, आई टी उद्योग अपने पाँव फैला रहा है या भारत जैसे मुल्क के सुन्दर पिचाई को गूगल एक सुन्दर सुबह अपना मुख्य कार्यपालिक अधिकारी घोषित कर देता है और वे एकाएक दुनिया के प्रभावशाली लोगों में आ जाते है और पूरी दुनिया इसे एक कौतुक के रूप में देखती है वह सब क्या इंगित करता है? इस समय भारत पुरी दुनिया के सामने एक ताकत के रूप में उभर रहा है, भले ही अंदरुनी हालातों से लड़ने में भारत अभी बहुत कमजोर है और कुपोषण से लेकर बेरोजगारी और महिला हिंसा के बड़े मुद्दों पर यह देश असफल हो रहा है परन्तु दुनिया की नजरें इस समय भारत पर है ऐसे में यहाँ के बाहुबलियों को विश्व से संवाद करने के लिए एक स्पष्ट और सीधी भाषा की जरुरत है “जो यस को यस समझे” और कोई अर्थ ना दें, जाहिर है अंग्रेजी इसमें बाजी मार ले गयी है रूस से लेकर बाकी सभी छोटे छोटे मुल्कों की भाषा के साथ वहाँ की सभ्यता और संस्कृति को जिस तरह से ख़त्म किया गया विश्व फलक से, वह चिंतनीय है. इसलिए यह विश्व सम्मलेन वो भी हिन्दी जैसी भाषा को लेकर जो भारत में भी बहुत बड़ा तबका नहीं बोलता - समझता है, अति महत्वपूर्ण है. अब सवाल यह है कि क्या ताजा राजनैतिक हालातों में यह सम्मलेन हिन्दी की दुर्दशा पर कुछ ठोस कदम उठा पायेगा मसलन, अंग्रेज़ी के बोलबाले का खात्मा, जनमानस के मन में बसी आंग्ल भाषा के प्रति सहानुभूति या नौकरी दिला पाने का लालच, कंप्यूटर के लिए संवाद का सशक्त माध्यम आदि ऐसे मसले है जिन पर तफसील से बात की जाना जरुरी है.


उम्मीद की जाना चाहिए कि कल देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो गुजराती अस्मिता, भाषा को स्थापित करके दुनिया को गुजराती व्यापारी मानसिकता का लोहा मनवाने का सुनहरा ख्वाब दिखाकर दस साल तक समृद्ध गुजरात में राज करते रहे और इसी आधार पर देश में चुने गए पूर्ण बहुमत से, ऐसे में वे कल हिन्दी को लेकर क्या कहते है या घोषणा करते है, जानना दिलचस्प होगा साथ ही भाजपा के वैचारिक ढाँचे में बसे संघ परिवार की हिन्दी को लेकर क्या अपेक्षा है या समझ है देश की शिक्षा, तकनीकी शिक्षा को लेकर उनकी क्या आगे की रणनीती है साफ़ होगी. 

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Posts of 10-11 Sept 15


वन अधिकारी क्या कर सकते है इसकी मिसाल देखनी हो तो किसी भी आदिवासी इलाके में चले जाईये और फिर देखिये इनका उत्पात. झाबुआ के रानापुर ब्लाक के ग्राम नलदी छोटी और टेमरिया में आदिवासियों की खडी फसल पर जेसीबी मशीन चला दी, महिलाओं को मारा और बेइज्जत किया. जानते है क्यों, क्योकि ये आदिवासी वन अधिकार पट्टे मांग रहे थे जिन्हें सन 2014 में मान्य किया जा चुका है वन क़ानून के तहत. आठ सितम्बर को हुई जन सुनवाई में भी इन आदिवासियों ने यह मांग उठाई थी परन्तु कोई जवाब नहीं दिया. अभी इस कार्यवाही के बाद एक स्थानीय संस्था के हस्तक्षेप से पुलिस में एफ आई आर की गयी है परन्तु कोई कार्यवाही अभी वन विभाग के खिलाफ नहीं हुई है. 

कब तक आदिवासी यह सहते रहेंगे, इन्हें शर्म नहीं आई कि जिस समय फसलें बड़ी मुश्किल से पक रही है और पानी की कमी है, भूख और गरीबी की त्राहि त्राहि हर जगह मची हुई है, गरीबी भुखमरी और कुपोषण के शिकार महिलायें और बच्चे हो रहे है,  वहाँ खडी फसलों को इस तरह से जेसीबी मशीन द्वारा नष्ट करना किस अमानुषिक और बर्बर समाज, शिक्षा और विकास का प्रतीक है?

प्रदेश में नेताओं और सत्ताधारी पार्टी को धन उगाहने और झान्कीबाजी चापलूसी से फुर्सत मिलें और विपक्ष जैसे बसपा या कांग्रेस को घटियापन से फुर्सत मिले तो इन आदिवासियों की बात सुने कोई? 

बालाघाट, पन्ना, सिवनी, मंडला,  डिंडोरी, खंडवा, शिवपुरी, आलीराजपुर, झाबुआ यानी लगभग हर आदिवासी इलाके में वन विभाग की गुंडागर्दी से लोग तंग आ गए है और हद यह है कि जिला प्रशासन या कलेक्टर वन विभाग का मामला बताकर चुप हो जाता है.

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बहुत मजेदार है ........जैन समुदाय के कहने पर शिवराज सिंह मप्र के कुपोषित बच्चों को अंडा नहीं दे रहे, जैन समाज के पर्युषण पर्व पर मांस पर देश के हर राज्य में प्रतिबन्ध लगाने में होड़ लगी है. भाजपा के शासन में जैन समुदाय एकाएक इनता ताकतवर हो गया यानी सीधा गणित है भिया कि जैन समुदाय संघ को बड़ी मात्रा में हर साल दो नम्बर का रुपया दान में देता है और अब अपनी मर्जी से देश के बड़े फैसले करवाएगा.....आ जाए अल्प संख्यक से बाहर और सामान्य बनकर देश में सामाजिक काम करें......और बाकी लोगों से निवेदन कि
आप लोग भी "देश के सच्चे नागरिक बनिए" 
tongue emoticon
ये दीगर बात है कि मांस के सबसे बड़े निर्यातक जैन समुदाय के ही अहिंसक, अपरिग्रही और निर्व्यसनी लोग है.


 



खत्म हो रही है ये फसलेँ और शायद कभी मोटा अनाज दूरदराज के आदिवासी गाँवों में भी देखने को भी ना मिले। झाबुआ में पानी के अभाव में नष्ट हो रही ज्वार मक्का।




आदिवासी बचपन और झाबुआ जिले के बच्चे जो स्कूलों में नही इन दिनों अपने खेतो में ककड़ी भुट्टों की रक्षा कर रहे है।


Sunday, September 6, 2015

Posts of 6 Sept 15



मेरे बेटे को शेर ने मार दिया तो वन प्राणी अधिनियम के तहत दस हजार रुपयों का मुआवजा मिला मुझे और गाँव के एक लडके ने शेर को मार गिराया तो उसे उम्र कैद की सजा हुई .........क्या क़ानून है साहब आप लोगों का.......
मालवा में नर्मदा के बाँध के कारण हमारे आदिवासियों को गाँवों से उजाड़कर पानी डाल दिया और यहाँ हम अपने खेतों में जंगल से नहर नहीं ला सकते क्योकि वन प्राणी अधिनियम है.........फसलें सूख रही है हमारी.........कोई देखेगा....
हम भी आदिवासी है और वो भी और देश एक ही है..........आप लोग तो पढ़े लिखे है पर नियम बनाना आप लोगों से सीखे कोई कि कैसे आप लोग मूर्खताएं करते है और हम आदिवासियों पर जुल्म करते है.
नहीं चाहिए हमें आपकी शिक्षा, संडास और सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सडा हुआ गेहूं चावल......हमें अपने खेतों में रहने दीजिये और जंगल से महुआ बीनकर लाने दीजिये -इमली, चार और जलाऊ लकड़ी लाने दीजिये वही बहुत है.
जितने वन विभाग के बड़े अधिकारी है सब भ्रष्ट है और हमारे मुर्गे ले जाते है खडी फसल तोड़ लेते है, हमारी औरतों को परेशान करते है, हमारे बच्चों को मारते है, बुजुर्गों को पीटते है .......अगर यही शिक्षा पाकर वे बड़े अधिकारी बनते है तो हमें ऐसी शिक्षा नहीं देनी हमारे बच्चों को, भाड़ में जाए आपका विकास और आपकी योजनायें.......
एक आदिवासी की व्यथा जिसके 22 बरस के जवान बच्चे को जंगल में शेर ने खा लिया और वह अपने ही खेतों के पचास सागवान के पेड़ों को हाथ नहीं लगा सकता और खेती भी नहीं कर सकता. वन विभाग से त्रस्त यह आदिवासी बुजुर्ग सिवनी जिले के कुरई ब्लाक के दूरस्थ गाँव में मुझे अपनी व्यथा सुना रहा था. और मेरे पास कोई जवाब नहीं था.
सही कहा था किसी ने भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा से बड़े गुंडे है भारतीय वन सेवा के अधिकारी - मद मस्त, भ्रष्ट और अश्लील.

Thursday, September 3, 2015

Posts of 2 Sept 15




‪#‎shivrajchouhanCM‬ lost his hold on administration in MP. My late brother's wife nt getting mercy job for last one year. Shame shame.


मप्र शासन के मुख्यमंत्री ‪#‎शिवराजसिंहजी‬ ‪#‎ShivrajSinghChouhanCMMP‬ सुन रहे है , मेरे भाई की मृत्यु को इस 27 सितम्बर को एक साल हो जाएगा, और उसकी बेवा को आपके भ्रष्ट राज्य में अभी तक अनुकम्पा नियुक्ति नहीं मिली है. लगता है हमें भूख हड़ताल करना पड़ेगी या बड़ा आन्दोलन क्योकि आपके अधिकारी सिर्फ और सिर्फ कागज़ चलाना जानते है. आपके नाम पर चल रही हेल्प लाइन में दुनिया का सबसे बड़ा झूठ और मक्कारी है जिसका कोई ना असर होता है ना फ़ायदा, काहे के मुख्यमंत्री है आप ???
जितनी ऊर्जा मैंने लगाई है उसके देयक लेने में और अनुकम्पा नियुक्ति लेने के लिए उससे एक नए संसार की रचना की जा सकती थी.
बहुत गर्व और शर्म से बता रहा हूँ कि जितने आवेदन मैंने लिखे है और प्रदेश के मुख्य सचिव से लेकर आपको, संभागायुक्त, विभाग के सचिवों को और जिला कलेक्टर - देवास को उससे तो कम लकड़ी में मेरे भाई की चिता जल गयी थी शिवराज जी.
आपको और आपके अधिकारियों को ना हिन्दी आते है ना अंगरेजी इतने बेहूदा, निकम्मे और गैर जिम्मेदार अधिकारी मैंने कही नहीं देखे तभी तो आपके जैसे लोग व्यापमं करने में सफल हो जाते है और टीनू जोशी और अरविन्द जोशी लोग संपोले बन जाते है. शर्म आती है मुझे यह कहते हुए कि सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश सिर्फ और सिर्फ दिखावे के अलावा कुछ नहीं है और आपकी ना प्रशासन पर पकड है ना शासन पर.
पर अफसोस ना शर्म किसी में बाकी है ना किसी में इतनी तमीज कि जवाब भी दे दें और आपको तो फुरसत नहीं कि कुछ ध्यान दें...........
सवाल ये है कि इन सारे अधिकारियों के या राजनेताओं के मर जाने पर इनकी बेवायें कहाँ से कागज़ लायेगी?


"संदीप जी अगर बच्चे ना होते तो मै ये नौकरी छोड़ देता और सड़क पर खड़े होकर अंडे बेच देता, आये दिन पार्टी के विधायकों का, सांसदों का फोन आता है कि इतने बड़े पद पर बैठे हो, तो क्या दो चार लाख चन्दा नहीं दे सकते, और तो और क्या अधिकारी हो, गालियाँ धमकी और बदतमीजी ...........बहुत दुःख है मुझे कि इस शासन व्यवस्था में इमानदारी की सजा यह है कि दो साल में सात बार स्थानांतर किये गए मेरे और अब फिर कहाँ जाना है, कब यहाँ से भी भगा दें - पता नहीं इसलिए मै अपने साथ एक ब्रीफकेस में दो जोड़ी कपडे और साबुन ब्रश तैयार रखता हूँ."
मप्र के एक ब्लाक में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी का रोते हुए बयान जिसने आज बातचीत में मुझसे कहा इस शर्त पर कि उनका नाम जग जाहिर नहीं होने दूंगा वरना उनकी नौकरी चली जायेगी.
और मेरे साथ इस बातचीत के चार गवाह भी है. बताईये कि हम कहाँ जा रहे है और क्या पाना चाहते है. कितना शर्मनाक है इस शासन व्यवस्था में यह सब सुनना. बहुत दुखद और सारा ध्यान सिर्फ व्यापमं पर केन्द्रित हो जाता है जबकि "और भी गम है जमाने में मोहब्बत के सिवाय"
आओ बनाए मध्य प्रदेश ...