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मप्र में हिन्दी सम्मलेन- अपेक्षा और समझ की दिशा-दशा का इंतज़ार 9 Sept 15



विश्व हिंदी सम्मेलन: अपेक्षा और समझ की दिशा-दशा का इंतज़ार

मप्र में विश्व हिन्दी सम्मलेन का आयोजन निश्चित ही स्वागत योग्य कदम है और प्रदेश सरकार के इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए इन मायनों में कि जब पूरी दुनिया से क्षेत्रीय भाषाएँ दम तोड़ रही है और बोलियाँ खत्म कर दी जा रही हो, तब किसी सरकार द्वारा एक भाषा जिसे राष्ट्रभाषा मानने के मुगालते में आधे से ज्यादा उत्तर भारतीय ज़िंदा रहते है, को बचाने या मान देने के लिए किया जाने वाला आयोजन निश्चित ही प्रशंसनीय है. वैसे मूल सवाल यह भी है कि क्या लोगों की चुनी हुई सरकारें भाषा या बोलियों को बचाने का काम कर सकती है या यह करना उनके दायित्व और कर्तव्यों में आता है, या यह जिम्मेदारी समुदाय या वहाँ के लोगों की होती है? अगर हाँ तो यह सवाल थोड़ा और गहराई से सोचना लाजमी है क्योकि इस समय जिस तरह से भारत की विकास की चाल है, या जिस अंदाज में उद्योग घरानों को प्रश्रय मिल रहा है, आई टी उद्योग अपने पाँव फैला रहा है या भारत जैसे मुल्क के सुन्दर पिचाई को गूगल एक सुन्दर सुबह अपना मुख्य कार्यपालिक अधिकारी घोषित कर देता है और वे एकाएक दुनिया के प्रभावशाली लोगों में आ जाते है और पूरी दुनिया इसे एक कौतुक के रूप में देखती है वह सब क्या इंगित करता है? इस समय भारत पुरी दुनिया के सामने एक ताकत के रूप में उभर रहा है, भले ही अंदरुनी हालातों से लड़ने में भारत अभी बहुत कमजोर है और कुपोषण से लेकर बेरोजगारी और महिला हिंसा के बड़े मुद्दों पर यह देश असफल हो रहा है परन्तु दुनिया की नजरें इस समय भारत पर है ऐसे में यहाँ के बाहुबलियों को विश्व से संवाद करने के लिए एक स्पष्ट और सीधी भाषा की जरुरत है “जो यस को यस समझे” और कोई अर्थ ना दें, जाहिर है अंग्रेजी इसमें बाजी मार ले गयी है रूस से लेकर बाकी सभी छोटे छोटे मुल्कों की भाषा के साथ वहाँ की सभ्यता और संस्कृति को जिस तरह से ख़त्म किया गया विश्व फलक से, वह चिंतनीय है. इसलिए यह विश्व सम्मलेन वो भी हिन्दी जैसी भाषा को लेकर जो भारत में भी बहुत बड़ा तबका नहीं बोलता - समझता है, अति महत्वपूर्ण है. अब सवाल यह है कि क्या ताजा राजनैतिक हालातों में यह सम्मलेन हिन्दी की दुर्दशा पर कुछ ठोस कदम उठा पायेगा मसलन, अंग्रेज़ी के बोलबाले का खात्मा, जनमानस के मन में बसी आंग्ल भाषा के प्रति सहानुभूति या नौकरी दिला पाने का लालच, कंप्यूटर के लिए संवाद का सशक्त माध्यम आदि ऐसे मसले है जिन पर तफसील से बात की जाना जरुरी है.


उम्मीद की जाना चाहिए कि कल देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो गुजराती अस्मिता, भाषा को स्थापित करके दुनिया को गुजराती व्यापारी मानसिकता का लोहा मनवाने का सुनहरा ख्वाब दिखाकर दस साल तक समृद्ध गुजरात में राज करते रहे और इसी आधार पर देश में चुने गए पूर्ण बहुमत से, ऐसे में वे कल हिन्दी को लेकर क्या कहते है या घोषणा करते है, जानना दिलचस्प होगा साथ ही भाजपा के वैचारिक ढाँचे में बसे संघ परिवार की हिन्दी को लेकर क्या अपेक्षा है या समझ है देश की शिक्षा, तकनीकी शिक्षा को लेकर उनकी क्या आगे की रणनीती है साफ़ होगी. 

http://kharinews.com/2014-09-29-14-59-55/52672-2015-09-09-16-55-04#.VfBvVPSpscI.facebook

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