Friday, January 18, 2019

Posts of 17/18 Jan 2019 Young Poets of Hindi Second Decade


Post of 17 Jan 2019
एक मित्र ने पूछा कि इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में आप किन युवा कवियों को पढ़ रहे है तो तुरंत नाम जो दिमाग़ में आये वो है -
अनुज लुगुन
सुघोष मिश्र
अदनान कफील दरवेश
शैलेन्द्र शुक्ल
विहाग वैभव
कुमार मंगलम 
उपासना झा
स्मिता सिन्हा 
शैलजा पाठक
अमित आनंद पांडेय 
अम्बर पांडेय

अभी बहुत से और नाम है पर जो बिहार से बाहर के है ( मित्र , जो बिहार के पटना से है, का कहना था कि बिहार से तो वो वाकिफ है, हालांकि बिहार से अनुज अंचित, मुकुट, अभिषेक अर्थात मिथिलेश कुमार राय भी मेरे पसंदीदा युवा कवि है )
बाकी और लिखता हूँ, आप भी मित्र की मदद कर सकते है

Sandip Naik द्वारा जारी की गई इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में सक्रिय युवा कवियों की सूची और उस पोस्ट पर आई टिप्पणियों को पढ़कर मन में तीव्र वितृष्णा का भाव पैदा हुआ। मेरा विनम्र निवेदन है कि संदीप दादा आप मेरा नाम हटा लें। मैं किसी होड़ में शामिल नहीं हूँ, न रहा कभी। ये तमग़ा उनके लिए ही बचा कर रखा जाए जो उसके लिए 'गलाकाट प्रतिस्पर्धा' में शामिल हैं। अंत में एक छोटी-सी कविता और ये तस्वीर :
"अपनी पीड़ा की नुमाइश करके
बेहिसाब तारीफ़ें बटोरीं
ऐ मेरी आत्मा 
मेरे निकट आ 
और मुझपर थूक दे !"

___________
[दरवेश]
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वित्त मंत्री अरुण जेटली और वरिष्ठ नेता एवं कुशल प्रबंधक अमित शाह के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ , दोनो अपने ही देश के अनुभवी और बड़े जनसमुदाय से जुड़े नेता है और कुशल और दक्ष व्यक्तित्व है, विचारधारा और कार्यपद्धति अलग होने से दुश्मन नही कोई
दुखद है कि वे बीमार है, उनके स्वास्थ्य को लेकर मजाक उड़ाया जाना ठीक नही और लोकतांत्रिक कतई नही, जो भी मित्र यह कर रहें है उन्हें संवेदनशील होना चाहिए किडनी फेल्योर हो या स्वाइन फ्लू , बीमारी में इंसान बहुत कमजोर हो जाता है और निसहाय, इस समय उसे अपने आप से ही लड़ना पड़ता है - किडनी फेल्योर होने का दर्द मैंने अपने भाई को 13 वर्ष तक लड़ते हुए और अंत मे उसे खोकर देखा और भुगता है
वैचारिक मतभेद अपनी जगह है पर हारी बीमारी में हम सब साथ है, हम इस देश के सहोदर है और ऐसे कठिन समय में मनुष्य मात्र होना चाहिए जो समानुभूति से समझ पाए दुख दर्द और बेचैनी
दिल से दुआएँ और प्रार्थनाएँ कि दोनों स्वस्थ हो और पुनः मुख्य धारा में लौटे ताकि देश हित का काम कर पाएं
आमीनHIndi Poets of Secodn Decade 

Monday, January 14, 2019

Sawai Singh Shekhawat, Opportunists, Ashu's Birth day card, May Election 2019 - Posts of Jan II week 2019

मई_2019 तक शांत रहिये और अपना काम करते रहिये, ये उकसाते रहेंगे क्योकि अब चूक गए है चौहान, न्यूज देखना बंद कर दीजिये , गाना सुनिए , कपिल शर्मा शो देखिये, क्राईम पेट्रोल या सावधान इंडिया
और कुछ ना कर सकें तो कविता लिखिए , कहानी लिखिए, यदि आपकी कोई किताब कही से छपी हो योग्यता, सेटिंग, जुगाड़ या रूपये ले देकर तो - उसका प्रचार करिए, आत्म मुग्ध रहिये, पुस्तक मेले में होकर आयें हो तो "याद पिया की आयें .......टाईप वाली तस्वीरें लगाकर लिजिलिजे हो जाईये
अपनी माशूकाओं को याद करिए, रिश्तेदारों को गरियाईये , प्यार - मुहब्बत करिए या अपने विश्व विद्यालय के दिनों को याद कर किसी काली गोरी लड़की के बारे में लिखिए और टपकाईये उद्दाम वेग से अश्रुधार - कई राज्यों में पानी गिरा नही है
आर्य, शक, मंगोल, हूण से लेकर मुग़ल और अंग्रेजों को कोसिये , सिन्धु से लेकर बेबीलोन की सभ्यता का ज्ञान बाँट दीजिये, अपने मोहल्ले के साले शर्मा, वर्मा, सिन्हा, सोलंकी, मालवीय या पांडे, देशपांडे, कुलकर्णी या जोसेफ, कुरैशी, खान को चाय पर बुलाकर भड़ास पेल दीजिये
पर इन लोगों पर कुछ मत बोलिए - भक्तों को इससे ज्यादा आग लगेगी - मुझे हिंदी के कुछ घाघ कवि पसंद है जो देश में आग लगी रही है पिछले चार सालों से तो वे वाट्सएप समूहों में महिलाओं को रिझाने वाली कविताएँ और समीक्षाएं लिखकर अपना 100 % मर्द होना सिद्ध करते रहें है , नाटककार अपनी धार्मिक नाट्य मंडलियाँ लेकर बिछ गए है, जल - जंगल - जमीन के हरकारे भैंस लेकर गाय के नाम पर सूअरों से दो - दो हाथ करके मलाई खा रहें है
चुप रहिये, कुछ मत बोलिए, अपनी किताबें दिल्ली के प्रकाशकों की तरह मैय्यत में लेकर जाएँ और झोले में से निकाल कर बेचिए , विद्वानों को बुलाईयें, चूके हुए घटिया कवियों को दस - पांच हजार देकर पुरस्कृत करें और उनसे मुजरा करवाएं अपने शहर, मोहल्ले या घर की छत पर और यकीनन ये दौड़े चले आयेंगे - कुत्तों की तरह दारु की बदबू सुनकर , नई महिलाओं और कमसिन लड़कियों को कविता लिखना सीखाईये, नये लौंडों को पटा कर अपने काम निकलवाईये , बूढ़ों को बुलाकर घर की रद्दी पढवाईये और अमर बनने के जतन करें, फेसबुक पर सबको नाइस, अदभुत, शुभकामना दीजिये और चंगाई सभा मे शामिल होइए
सरकार काम पर है, विपक्ष एकता बना रहा है, प्रशासनिक गिरगिट सूंघ रहें है , न्याय घूँघरू पहनकर लम्बी जुदाई पर नाच रहा है , पुलिस डंडे पर तेल पिला रही है कि समय आने पर घुसेड देंगे एकदम ठेठ अन्दर और मीडिया के दलाल चैनल पर वामपंथी या दक्षिणपंथी है और फेसबुक पर वृहन्नलाओं की भाँती अपनी कुंठित मानसिकता दर्शा रहें है
समझ गए या बताऊँ कि लोकतंत्र का त्यौहार देश स्तर पर मनाया जाएगा जल्दी ही - आपके ही झोले में है इसके बम, मिठाई और आरती की सामग्री.......
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जन्मदिन की बधाई आशीष Ashish Kekre
दोस्त हो तो ऐसा जो 1996 का दिया बर्थडे कार्ड सम्हालकर रखें , देवास छोड़कर जो गुजरात और अब मुम्बई गया तो मिलना ही दूभर हो गया है पर आज भी लगता है समय वही ठहरा है उन्ही भावनाओं और प्यार में डूबा हुआ
उस जमाने मे जब मोबाईल नही थे तो आर्चीज़ के कार्ड ढूंढते थे, देवास के कोहिनूर स्टोर्स पर ही मिलते थे, खूब तलाश कर उसका लिखा देख पढ़कर खरीदते थे और गिफ्ट देते थे
आज आशु ने जब यह पुनः दिया तो आंसू आ गये कि ये सहेजना भी क्या सहेजना है जिस मुम्बई में सामान रखने की जगह नही, इंसान के लिए जगह नही तो एक कार्ड को कोई शख्स बदलती नौकरियों के साथ उठाये उठाये घूमता रहें - सहेजें इससे बड़ा सबूत कोई और हो सकता है क्या मित्रता और परस्पर प्रेम का - साले रुला दिया आज तूने
जियो प्यारे, मेरी उम्र तुम्हे लग जाएं , खूब ख़ुश रहो और यश कमाओ , दोनो बेटियाँ तुम्हारी किस्मत वाली है वाकई जिन्हें मेरे यार जैसा संवेदनशील बाप मिला है
झकास , शानदार , जबरजस्त और ज़िंदाबाद
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अवसरवादिता घातक ही नही भयावह बीमारी है और इधर हिंदी के कहानीकारों, कवियों और लेखकों में बढ गई है
इस आदत की वजह से कुछ लेखक इतने मणिशंकर अय्यर नुमा हो गये है कि उनका नाम सुनकर ही कै हो जाती है, स्वयम्भू खुदा बनकर तस्वीरों को देखकर तो गोली मारने का भी दिल नही करता
छोटे कस्बों और तीन कौड़ी की नौकरी करने वालों ने इस आदत को आत्मसात करके हवाई किलें गढ़ लिए है और उन्हें लगता है कि वे अभेद है और कोई इस धूर्तता , खेल और गलीज़ षड्यंत्रों को पकड़ नही पायेगा - यह मत सोचिए और रचते रहिये कैकेयी और मंथरा नुमा किस्से और खेल, परंतु वे यह भूल रहें है कि जिन्होंने बनाया है और तुम्हारी कीर्ति की पताकाओं में डंडे डालकर ऊंचा किया है - वे बांस की बल्ली भी लेकर बैठे है, माथा उठाकर होली जलाने में देर नही करेंगे - बसी आबादी की बर्बादी करने में देर नही होगी और किसी देस का ना वैद्य काम आएगा ना जड़ी बूटी जैसाकि कबीर कहते है और यह भी सुन लो क्या तन माँजता रे - इक दिन माटी में मिल जाना
जिन कन्धों का सहारा लेकर गिरगिटों के साथ मदारी नृत्य में झूम रहें हो ना - वे नेवले है एक दिन निगलेंगे / डसेंगे ही नही - जलने या दफनाने लायक भी नही छोड़ेंगे तुम्हारी इस माटी की मैली काया को गुरु - ये किसी काम के नहीं है
सोच लो ठाकुर
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अग्रज Sawai Singh Shekhawat जी, जयपुर आज अभी देवास में हम सबके साथ एक निजी महफ़िल में अपना कविता पाठ करते हुए
घर के भीतर घर, पुराना डाकघर, दीर्घायु है मृतक एवं उत्तर राग जैसे कविता संग्रहों के कवि अपने खाते में कई प्रतिष्ठित पुरस्कार रखते है जो उनकी साहित्यिक स्वीकार्यता दर्शाता है
एक कविता -
◆पुराने जूते◆
पुराने जूते सुखद और उदार हैं
किसी पुराने आत्मीय की तरह
अपना विन्यास और अकड़ भूल कर
वे पाँवों के अनुरूप ढल जाते हैं
इतने अपने इतने अनुकूल
गंदले होकर ही कमाई जा सकती है
जीवन की मशक्कत भरी तमीज़
यह केवल जूते जानते हैं
नये जूते बेशक च​​मचमाते शानदार हैं
लेकिन जीवन की आवश्यक विनम्रता
उन्हे पुराने जूतों से सीखनी पड़ती है
कहते हैं 'गेटे' को पुराने जूते छोड़ते हुए
बहुत तकलीफ़ होती थी
प्रिय पुरखे को दफ़नाने की तरह
एक कवि को पुराने जूतों की तरह
आत्मीय और उदार होना चाहिए
केवल तभी उसकी कविता बचा सकती है
जीवन को कंटीले धूल-धक्कड़ से
झुलसती धूप से ठिठुरते शीत से।
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आप हिंदी के वरिष्ठ कवि, चिंतक और प्रतिष्ठित साहित्यकार है
Image may contain: Sawai Singh Shekhawat, sitting and text
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काया जब तक है 
तब तक ही प्रेम है
मरने के बाद नही
ना प्रेम और ना काया 
इसलिए इसी काया में 
कर लें प्रेम जब तक है 

यह बहुत बड़ा सबक कल रात एक कोरकू समुदाय के पडियार ने सीखाई , खंडवा में कोरकू बोली के भजन में यह बात आती है
और मुझ मालवी कबीर पंथी को अपने कबीर याद आये - जो प्रेम, काया और लगन की बात करते थे - ढ़ाई आखर प्रेम का

Wednesday, January 9, 2019

World Book Fair 2019 - 9 Jan 2019



पिछले सालों में जो किताबें खरीदकर लाये थे - कितनी पढ़ी, नोट्स लिए, कुछ लिखा, कव्हर चढ़ाएं, लेखक को पोस्टकार्ड लिखा या फोन किया, किसी आयोजन में चर्चा की, किसी एक और को पढ़वाई, उन पर किये खर्च का बखान नही किया, सम्हालकर रखी ?
जो लोग फोटू डाल रहें है - जरा आत्म मंथन भी कर लें और इस साल के लिए क्या लेना है इसके लिए सालभर कितनी पत्रिकाएं पढ़ी - समीक्षा वाला कालम, वेब पेजेस पर चर्चा, ब्लॉग्स, और किसी अन्य जगह ?
चिकने चुपड़े चेहरे देखकर, यारी दोस्ती , दूरदर्शन - आकाशवाणी के एंकर्स की वायवीय दोस्तियां, मीडिया के घाघ पत्रकारों का कचरा तो नही उठा ला रहे फिर से
चहकती - फुदकती , मेकअप से लदी महिलाओं के दस से सत्तर साला हिसाब किताब का कूड़ा तो नही ला रहें, वाट्सएप्प पर बेशर्मी से ( मेरी तरह ) किताबों के भौंडे प्रदर्शन पर अपना मन बनाकर तो नही ख़रीद रहें, किसी मास्टर, प्रोफेसर से किसी विवि से व्याख्यान, पी एच डी मिलने की उम्मीद में उसका 800 पेज का कूड़ा ले आये, किसी ब्यूरोक्रेट की भड़ास और धर्म आध्यात्म के पोथे तो नही खरीदे जो उसने तत्कालीन सरकारों को खुश रखने के लिए लिखें थे और अनुदान में थोक से छपवा लिए, दिल्ली वालों से सम्बन्ध बनाने के लिए उनके स्टॉल से बोझ तो नही ला रहें - याद रखिये वो आपकी जेब से रुपया निकालकर पानी तक पी जाएंगे प्रगति मैदान का और आपको पलटकर फोन नही करेंगे जियो नम्बर से
किसी प्रकाशक की कचरा किताबें तो नही ली जो एक माह में 50 शीर्षक छापता है या साल भर गरीबी का रोना रोकर सरकारी खरीद में सब खपा देता है - इन घाघ और मक्कार लोगों के चक्कर में मत फंसना ए ग्राहक - ये अम्बानी के साहित्यिक संस्करण है ये युवा छोरे छपाटो को दो चार हजार का आलच देकर फर्जी समीक्षाएं लिखवाकर प्रचार तंत्र खड़ा करते है और भ्रम फैलाते है , ये सिक्किम से लेकर गुजरात और काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के कचरा अफसाने छाप देंगे और खुद या लेखक के माध्यम से आपको चार - पांच सौ का फटका लगा देंगें, वो भी इसे लोगों को जो कन्याकुमारी का क नहीं जानते वो नार्थ ईस्ट की राजनीति या काश्मीरी पंडितों की व्यथा क्या जानें............
किसी एनजीओ के भाई बहनों के बीच भी मत फंसना ये नए पिस्सू है जो अब फील्ड छोड़कर प्रकाशन के बन्द कमरों में क्रांति की अगुआई में संलग्न है
यह सब खरीदने से बेहतर है घूमिये फिरिए, दिल्ली में मौसम बड़ा मजेदार है, कुछ खरीददारी करिये और खाईये पीजिये सेहत बनाईये, लाल किला देखिये पुस्तक मेले में बस मजे लीजिये काहे बोझ उठाकर आएंगे, लेना ही है तो ऑन लाईन आर्डर करिए
सोचिए - रुपया है आपका, दिमाग है आपका और कचरा प्रकाशक का और कुंठित विचार लेखकों के

#खरी_खरी

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गज़ब का देश है
एट्रोसिटी एक्ट पर विरोध नही
सवर्ण आरक्षण पर भी विरोध नही
जनता भी बेवकूफ, जनप्रतिनिधि झुनझुना, प्रशासन विशुद्ध मूर्ख, कानूनविद धंधेबाज, न्यायालय अंधे और मोची मीडिया सॉरी दलाल मीडिया
चुनावों का उत्सव फिर आ रहा है, सर्दी में आपकी दारू और कम्बल काम आएं माईबाप अब गर्मी के लिए सफेद चादरें और बीयर का जुगाड़ कर दो
138 करोड़ मूर्खों के देश में राहुल ,मोदी, मायावती, पासवान, आठवले, अखिलेश , ममता, प्रकाश करात या नमूने ही जी सकते है

राष्ट्रीय शर्म अब भी बाकी है