Friday, August 23, 2019

दृष्ट कवि III week of Aug 2019

घटिया से कस्बे में कब प्रतियोगिता हो जाती है और कब परिणाम घोषित हो जाते है मालूम ही नही पड़ता, कविता प्रतियोगिता के ईनाम घोषित हुए तब अखबार से मालूम पड़ा कि एक ही कवि को ग़ज़ल, अतुकांत, छंद और गीत के लिए प्रथम, द्वितीय और तृतीय के साथ सांत्वना भी दे दिया, सिर्फ अखबार में आया
मालूम पड़ा कि कुल 3 - 4 इंट्री ही आई थी तो आयोजक भी क्या करते - ख़ैर, पुरस्कार वितरण समारोह में { जिसमें 20 टुच्चे लोग चाय सुड़कने आये थे } में बापड़े कवि को एक बेशर्म का फूल भी नही दिया, आयोजक ने खुद ही नारियल पकड़कर, शाल ओढ़कर और दस रुपये वाला हार पहनवा लिया दो चार लोगों के बीच
इसे कहते है कवि की भयंकर वाली बेइज्जती पर आत्म मुग्ध तो तब भी हुआ जा सकता था, कवि के लँगोटिये ने जब मामला समझा तो सोशल मीडिया पे पेला, ठेला कि बहुमुखी प्रतिभा के शनि सॉरी, धनी को 5 पुरस्कार मिले तब कही जाकर कुछ लाइक - कमेंट आयें और पुरस्कृत कवि को कब्ज के बाद साफ शौच हुई बगैर इसबगोल लिए
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कार्यक्रम में यदि किसी राजनैतिक पिठ्ठू और आर्षद पार्षद टाईप को भी बुला लें आयोजक तो कार्यक्रम दो घँटे लेट होगा, इसके अलावा इनके लग्गू भग्गू और चूतिये टाईप छर्रे कार्यक्रम की मैय्यत ही निकाल देते है - ऊपर से इनके श्रीमुख से निकले उद्बोधन तो राम नाम सत्य से भी भयावह होते है
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संचालक यदि गधे से भी गया बीता हो तो उसे उसी मंच पर उल्टा लटकाकर मिर्ची की धूनी दे देना चाहिए, बेवकूफ किस्म की हरकतें करता रहता है - महिलाओं को ताकते हुए और माईक को दोनो हाथ से पकड़कर ऐसे चिपक जाता है जोंक की तरह कि ससुरा हटेगा ही नही
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किसी भी कार्यक्रम में मुख्य कार्यक्रम और मुख्य अतिथि को छोड़कर स्थानीय लफंगे और उजबक टाईप के मूर्ख बकलोली करते है और बारी बारी से खुद को हार फूल और कफ़न ओढ़वाते रहतें है - वह अक्षम्य है, ये मूर्ख लोग मंच पर बैठकर लोगों को प्रताड़ित करते रहते है
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प्रायोजित सम्मान कितने भद्दे लगते है और लेने वाले कितने गलीज हो जाते है लेते समय, उनके चेहरे पर जो भाव चिपके होते है वे अश्लीलता से भी भयानक है
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एकदम चोखे धन्धे की जगह थी जहां एक बड़ा सा हाल था कवियों - कहानीकारों के लिए, चारो तरफ गुटखा तमाखू की दुकानें थी, पेट्रोल पंप था लगा हुआ और सामने सांची पॉइंट और हाल के ठीक नीचे खाना बनता था , चौराहे के दूसरी ओर सोमरस, आमरस भी उपलब्ध होता था
कविता की आत्माएं हाल में बिल्कुल कम, गुटखा तमाखू की दुकान पर थोड़ी, साँची पॉइंट पर और ज़्यादा और खाना बनने वाली जगह पर सबसे ज्यादा घूमती थी अतृप्त मानो सारे खण्डकाव्य आज खा - पीकर ही मानेंगी
इस तरह हिंदी कविता का उत्तरोत्तर विकास हो रहा था
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23 लोगों की भीड़ में कहानी पाठ कर रहे रचनाकार को शुगर की बीमारी थी और वह 47 पेज की एक छोटी सी लघुकथा पढ़ने के दौरान 3 बार पेशाब करने गया, हाल से लगे पेशाबघर में जिसकी बजबजाती खुशबू पूरे वातावरण को रोमांटिक बना रही थी, जब चौथी बार जाने लगा तो साढ़े तीन महिला कवि हंस दी - तो उठने के बजाय उसने कहानी पढ़ने का स्वांग फिर चालू कर दिया
थोड़ी देर में नत्थूलाल की कचोरी वाली दुकान के ओटले जैसे बने स्टेज से नाला बह निकला और सारे श्रोता नाक पे उंगली रख च - च - च करते निकल पड़े
कहानी के पौने सैतींस पेज बाकी थे
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और फिर शहर के टूच्चो ने तेजी से वट वृक्ष बनते जा रहे कवि की सारी मौलिक रचनाओं को मलयालम, पश्तों से अनुदित करार देते हुए उसकी हत्या कर दी
बाजारीकरण के कठिन दिनों में आजकल वो चिर युवा "अपना स्वीट्स" के एकदम ताज़े खुले आउटलेट पर वेरी नाइस तरीकों से लहसन की सेंव और सोन पापड़ी तौलकर बेचता है
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फिर रचनाकार उर्फ कवि ने अपनी 13 कविताएं पेलकर आहिस्ते से लजाते हुए कहा कि आज इस अगस्त ऑडियंस से भरे सभागार में जो सुख मिला वह अप्रतिम है और आप सबको प्रणाम करते हुए मैं अध्यक्ष जी और अग्रज संचालक की अनुमति के बगैर अपनी नन्ही सी कोमल बिटिया को मंच पर बुला रहा हूँ कि वो आये और आप सबका आशीर्वाद लें
यह धृष्टता करने की माफी पर अभी अभी इसने 153 कविताएं पूरी की और आपके बीच बैठे जगत प्रसाद जी जो प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका "निर्गुणी" के संपादक है , ने बिटिया से कहा था कि कभी सुनाए कुछ - तो उनके आग्रह पर बिटिया को बुला रहा हूँ , आप सबकी दुआओं से यह पटना भी जा रही है 26 जनवरी को कविता पढ़ने
आपका सबका आशीर्बाद और दाद चाहूँगा - अपनी डायरी सम्हालते वे मुश्किल से माईक छोड़कर मंच पर बैठ गए
श्रोताओं में बैठे वसन्त सकरगाये ने भिन्नाते हुए चिल्लाकर पूछा लड़का पैदा नही किया क्या , चार पांच सम्पादक और बुला लेते , और इस कविता पेलू कवि की नसबंदी हुई कि नही या अभी भी चल्लू है काम काज
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Himanshu Bajpeyi, Gobar Goumutra and media, Shahi karela et Posts fro 13 to 23 Aug 2019

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बचपन में स्व सुधीर फड़के की गीत रामायण हर मराठी घर मे बजती थी 12 कैसेट का सेट आता था, मेरे यहाँ अभी भी पड़ा है, सुधीर फड़के इस धरा पर तब तक जीवित रहेंगे जब तक संसार है और यह सिर्फ गीत रामायण की वजह से - एक आदमी एक जीवन में कितना काम कर जाता है
दादी, नानी सुनती थी, सुबह पाँच बजे से ये कैसेट शुरू हो जाते थे, बाद में माँ ने भी यह परम्परा जारी रखी, कई मराठी घरों में सुबह गीत रामायण और शाम को दिया बत्ती के समय राम रक्षा का पाठ आज भी होता है बस अब मोबाइल, तुमनली { youtube} पर बजते है
आज देवास के राजकवि स्व झोकरकर जी की पुण्यतिथि पर उनके परिवार ने सुधीर फड़के के सुयोग्य पुत्र और प्रसिद्ध संगीतकार श्रीधर फड़के का गीत रामायण का कार्यक्रम रखा है
अदभुत है यह कार्यक्रम - अभी लाइव सुन रहा हूँ तो स्मृतियों के कोनो कोनो में पड़े गीत, सुमधुर धुनें याद आ रही है, हॉल भरा हुआ है , हिंदी मराठी मिलाकर दो हजार लोग होंगे - सबके मुंह से गीत निकल रहें है
लोक धुनें कितने गहरे घर कर जाती है बचपन में सुनी हुई - यह एहसास हुआ आज
फिर कहता हूँ कि गायक हमेंशा ज़िंदा रहना चाहिए और सिर्फ गाये, राजनीति नही करें कम से कम
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लीजिये जनाब पेश है - शाही करेला
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● करेले को बारीक काट लें, और फिर उसमें नमक, नींबू का रस और हींग स्वादानुसार मिलाकर दो घँटे ढाँककर रख दें - इससे कड़वाहट निकल जायेगी और दिव्य स्वाद हो जाएगा
● राखी पर आयें नारियलों में से एक को फोड़कर बारीक टुकड़े कर लें, चार छह हरी मिर्च, दो इंच अदरख के साथ मिक्सी में थोड़ा सा पानी मिलाकर बारीक पीस लें
● कढ़ाई में सरसों का तेल गरम करें, राई, जीरा और साबुत मैथीदाने के बीज का तड़का लगाएं अब इसमें करेले डाल दें
● दस मिनिट बाद बारीक किया नारियल, अदरख और मिर्ची का पेस्ट डालकर लाल मिर्च, हल्दी, धनिये का पाउडर डालें और थोड़ी देर बाद गर्म मसाला और स्वादानुसार नमक डाल कर रख दें
● लगभग पंद्रह मिनिट में कुरकुरे शाही करेले की सब्जी तैयार हो जाएगी - यह बहुत स्वादिष्ट, पौष्टिक और स्वास्थ्य वर्धक है, इसे घी लगी गर्मागर्म रोटी के साथ खाएं
सावधानी - सब्जी को चलाते रहें वरना जल गई तो बदबू से स्वाद बिगड़ेगा और मजा नही आएगा खाने में , गैस की आँच मद्धम रखें
असल में राखी पर 20 के करीब नारियल आते है, इनका सही उपयोग नही करेंगे तो सूखकर सड़ जायेंगे और बर्बाद होंगे - बेहतर है कि कुछ ना कुछ चटपटा बनाकर खा लिया जाये जो शरीर को भी लगें
आज के आनंद की जय
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कल जल संरक्षण पर विधि महाविद्यालय में भाषण प्रतियोगिता हुई, अपुन ने भी भासण दिया, अपने 34 साल के अनुभव, देश दुनिया में जल संरक्षण के उपाय एवं किये जा रहे प्रयासों के बारे में साथ ही नर्मदा आंदोलन, जल भराव से बड़वानी के गांवों में हो रही हानि पर बात की, इस तरह से ज्ञान गंगा बहाकर अपुन पेला नम्बर ले आये भिया
हवो, मजा आया खूब 🤣🤣🤣🤣
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गुड़, गोबर, गौमूत्र, गौशाला और नारद मुनियों के बीच हिंदी अख़बार
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रविश कुमार ने आज आर्थिक विश्लेषण करते हुए कहा है कि अंग्रेजी पढ़िये, हिंदी अख़बार यह सब नही बताएंगे
हिंदी अख़बार है कहाँ - जैकेट के पुलिंदे है , गुप्त रोग, संगम और जापानी तेल, डाक्टर शाहनी या चोपड़ा के विज्ञापन, लिंग वर्धक उपकरण, मनपसंद बातें करें के फोन नम्बर, फिल्मी पेजेस और शादी डॉट कॉम से भरे है - बाकी जो भी न्यूज़ है वह लिफाफों की बदौलत है और फीचर, सम्पादकीय सब प्रायोजित है ; जब मीडिया हाउसेस के सीईओ अपने पदनाम के साथ हफ्ते में 3 दिन फीचर लिखें तो लेखक, विचारक की जरूरत क्या है, अखबार में बैठे स्तम्भ के मालिक अपने चाटुकारों को उनके कुत्ते बिल्ली और सूअरों के नाम से भी आलेख हफ्ते दर हफ्ते लगाने लगे - बच्चों, पत्नियों को तो छोड़ दीजिए, न्यूज़ चैनलों से हकाले गए चोर उचक्कों की बनाई न्यूज एजेंसियों की मनगढ़न्त खबरे उठाकर चेंप दे तो क्या उम्मीद करें मीडिया से
पत्रकारिता के प्राध्यापक विधुर होकर प्रजापति ब्रह्मा कुंआरियों के आश्रम में शरण ले लें और कमरों में , पीपल बरगद के नीचे उन्हें भूत चुड़ैलें नाचती दिखाई दें और वे बेहद आक्रामक होकर वर्जनाएं तोड़कर बेशर्म हो जाये तो आप छात्रों से क्या उम्मीद करेंगे
विवि में अकादमिक ज्ञान के बजाय गौशाला, गोबर और गौमूत्र पर चर्चा हो और कुलपतित पर गिरफ़्तारी के वारंट जारी हो तो क्या कौशल, दक्षता और ज्ञान की उम्मीद आप अख़बारों से करेंगे जिनके छात्र अखबारों में आकर धंस जाते है किसी बीट पर, डेस्क या पेज पर अंगद की तरह
पत्रकारों ने पढ़ना छोड़ दिया, हिंदी नही आती, मातृभाषा नही आती - अंग्रेजी तो छोड़ दीजिए , मुंह मे गुटखा, बगल में मसाले या गुलाब का देशी पाव दबाएं थानों और दफ्तरों के बाहर मिमियाते ये लोग है क्या - विशुद्ध दलाल
और अंत में प्रार्थना - बाकी सब तो है ही नारद भगवान के भरोसे सम्पूर्ण पत्रकारिता जगत और इन्हीं को इष्ट मानकर पत्रकारिता विश्व विद्यालय चलने लगें तो क्या कहना फिर हिंदी अखबार की क्या औकात गौ पट्टी में
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एक विधि के प्राध्यापक का ज्ञान
मदर टेरेसा मद्रास की थी, पंजाबन थी और जीवन भर अस्पताल में सेवा करती रही, अंत में उसकी चर्च में हत्या हो गई तो ईसाई घोषित कर दिया
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सल्फास है क्या किसी के पास, बहुत मन है खाने का - अब दिल नही लगता ज्ञान में
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नया शब्द बनाया है हम कुछ भी करें नाटक, गाना - बजाना, गीत कविता, कहानी या बैंड बाजा बारात और जहां डालें वहाँ आप देखें उसे आज से कहा जाये
"तुमनली" अर्थात - Youtube
बॉस अपुन का कॉपी राइट है समझे ना
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*देश को इस समय लाखों हिमांशु चाहिए ❤️
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अंकित चड्ढा के बाद दास्तानगोई में अभी कोई युवा उस्ताद है तो हिमांशु वाजपेयी - किस्सा किस्सा लखनौवां के लेखक और फन में माहिर
दो दिन से इंदौर में थे किस्सागोई करते पर जाना कल ही हो पाया, राखी के कारण घर मेहमानों से भरा था, पर कल थोड़ा सुकून मिला तो पहुंचा
प्रजातंत्र अखबार का आयोजन था, बहुत लोग थे - ख्यात लोग राजनीति, समाज सेवा और मीडिया के भी, कई मित्रों से लंबे समय बाद मुलाकात हुई
हिमांशु ने बिस्मिल, अशफाकउल्ला खां और काकोरी कांड को लेकर बात करते हुए लगभग ढाई घँटे की प्रस्तुति दी, वेदांत भारद्वाज के गीत, अजय टिपानिया , देवकरण और युवा तबला वादक शायद शिवार्ध की संगति ने ऐसा समां बांधा कि हॉल गूंजता रहा, पूरे शो में सब था - इतिहास, राजनीति, मजाक, इमोशन का तड़का, हंसी, गीत, दुख, ज्ञान, विचारधारा, भावुकता और तारीखें जो कभी मरा नही करती और वो दास्तानें जो बार - बार कब्र से भी निकलकर बारम्बार आती है और इंसानी मज़हब और तरक्की का कॉलर पकड़ती है - पूछती है कहाँ, किधर जा रहे हो, क्या इसी के लिए लाखों लोग शहीद हुए थे, क्या इसी दंगाई माहौल को बनाने के लिए बिस्मिल और अशफ़ाक ने दोस्ती को सर्वोपरि रखा, क्या युवाओं ने आजादी को महज नुक्ती समझ रखा है और बेहतरीन शोषण मुक्त भारत का स्वप्न भूला दिया है और अब एक अंधी भीड़ में अनुयायी बनकर खिलौना बन गए कठपुतली नुमा - सिर्फ दस युवाओं ने सरकारी खजाने को लूटकर ब्रिटिश साम्राज्य के सूरज पर बादल तान दिए थे फिर आज दुनिया के सबसे ज़्यादा युवा संख्या में होते हुए क्यों देश बदहाल है और पूरी व्यवस्था शोषण, भेदभाव भरी और साम्प्रदायिक हो गई है
हिमांशु की हिम्मत की तारीफ करना होगी कि सुमित्रा महाजन से लेकर तमाम भाजपाई विधायकों और भक्त वृन्द के सामने जिस अंदाज से अस्पृश्यता, छुआछूत, हिन्दू मुस्लिम एकता की बात कहते हुए एवं अपनी लाईन देते हुए बिस्मिल और अशफाक की वसीयत लोगों में बांटी और कहा कि एक शहीद की विरासत लेकर जाईये - समता मूलक समाज और शोषण मुक्त समाज का जो सपना है , जिस हिन्दू मुस्लिम - एकता के लिए शहीदों ने कुर्बानियां दी है, उसे मत भूलिए और फिरका परस्त ताकतों को परास्त कर खुशहाल भारत बनाइये - वह गजब था, यह साहस मुझे अभी के परिदृश्य में कही नही दिखता है
पूरे आयोजन में प्रजातंत्र के हेमंत शर्मा जी की सूझबूझ, प्रकाश हिंदुस्तानी जी का संचालन और पूरी टीम का सहयोग और संयोजन काबिले तारीफ था , भयानक बरसात में हॉल भरा होना सफलता की निशानी थी
हिमांशु यारां एक ही दिल है कितनी बार लोगे, लव यू - गज़ब के बंदे हो - खूब जियो और यश कमाओ
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जितने दिन तक बचा सको
बचा लो - स्वतंत्रता
समता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व
सहेज सको तो बचा लो
सोचना कि जो अधिकार खुद के मिलें है
दे जाना अपनी आने वाली पीढ़ी को
बाकी तारीखों का क्या
आती जाती रहती है
15 अगस्त महज एक तारीख है
आजादी तारीखों की मोहताज नही
वो एक मूल्य है जिसकी समझ
मुश्किल है और हरेक के लिए नामुमकिन भी
बहरहाल , जश्ने आजादी मुबारक
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सबसे ज़्यादा भ्रष्ट और अव्यवस्थित, ढीली और घटिया ज्यूडिशियरी से आपको न्याय की उम्मीद है - जो लोवर से उच्चतम स्तर तक की न्यायपालिका वकीलों की दलाली पर चलती है उससे क्या आप पारदर्शिता और न्याय की उम्मीद करेंगें, जहां वकील एक हियरिंग के पांच लाख लेते है वहाँ आप गरीबों को न्याय दिलाने की या विधि के समक्ष सबको समान मानने की बात करते हैं अनुच्छेद 14 - 15 में
जब दस साल एनआईए प्रज्ञा के ख़िलाफ़ कोई भी सबूत अदालत में नही दे सकी, सोचिए एनआईए को दस साल तक कितनी तनख्वाह दी गई होगी और वे बरी हो गई तो पहलू खान के लिए रोना बन्द करिये
आज भी अदालत को कोई सबूत नही मिला यह जाँच एजेंसियों की कुशलता और योग्यता पर सवाल नही उठाता, वीडियो से ज्यादा महत्वपूर्ण है वीडियो बनाने वाला उपस्थित नही था - यह कुतर्क कहाँ का है मतलब व्यक्ति को मारा गया है साक्ष्य मौजूद है पर साक्ष्य बनाने वाला अदालत नही आया है
फैसला अभी पढ़ा नही है पर जो खबरे आ रही है उससे यही लगता है कि लोवर कोर्ट में कुछ भी जाँच एजेंसी दे नही पाई - आजादी का यह तोहफ़ा मुबारक हो
भामाकीजै
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अपनी मेधा नष्ट ना करो, पाट दो अब इसे
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मप्र के नर्मदा बांध प्रभावित क्षेत्रों में मौत का साया है इन दिनों, दो युवा अभी मर चुके है, क्या फर्क पड़ता है किसी को, मुझे भी नही पड़ा बस यह है कि ससुरे सीमा पर मरते तो एकाध करोड़ मिल जाते घर वालों का - देशभक्ति का अखंड चुतियापा है इस देश मे और बुद्धिजीवियों का भी शगल है यह
नर्मदा नेत्री मेधा पाटकर ने एक अपील की है जिसका वीडियो देखा जा सकता है, यह अपील कम मप्र बनाम गुजरात और राज्य बनाम केंद्र के बीच लड़ाई की अपील ज़्यादा करती है , मेधा 36 वर्षों से घाटी में है और संविधान, न्याय, प्रशासन, मीडिया और आदिवासियों को बखूबी जानती है इसके बाद भी अपील मार्मिक और भावुक बनाते हुए जिस अंदाज में कहती है वह आश्चर्यजनक है
एक बात साफ है सरकार कोई भी हो - विकास सर्वोच्च प्राथमिकता है फिर कोई मरें या मारना पड़े बाकी सब बकवास है, घाटी में मुआवजें का बंटवारा हो गया है , जैसे भी हुआ हो वैसे, गुजरात ने निर्णय लिया है कि बांध पूरा भरेंगे तो भरेंगे, कमलनाथ जी का कोई वक्तव्य नही है तो नही है और मीडिया नही उठाएगा तो नही उठाएगा यह मुद्दा -इसलिए शूरवीर लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय है जिसका कुल जमा हश्र लाइक्स, कमेंट्स और व्यर्थ की बहस है
एक्टिविज्म, गांधियन विचारधारा अब स्वप्न है बल्कि हकीकत यह भी है कि ये लोग अब ज़्यादा हिंसक भी है - विचार और कर्म के स्तर पर , ख़ैर 36 साला एक असफल आंदोलन के पुरोधाओं को सोचना भी चाहिये कि आखिर आज उनके ही साथ काम करने वाले कहाँ है, राजधानी में , बड़े शहरों में या अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप लेकर कार्पोरेट्स के पठ्ठों के संग प्रशिक्षणों में या टूट पुंजिया राजनीति में
समय यह है कि किसी को किसी के दर्द का एहसास नही है और देश भर में एनरॉन से लेकर विस्थापन की समस्याओं तक के प्रदर्शन में घूमने वाली शेष बची एकमात्र जीवाश्म मेधा भी हैरान है कि क्या किया जाये - कुछ नही , छोड़ दो इन्ही आदिवासियों ने मप्र से केंद्र में जो प्रतिनिधि भेजे है उनके हवाले कर दो , यही है वे लोग जिन्होंने मेधा को 10000 के ऊपर वोट नही दिए थे मुम्बई में तो अब क्या लड़ना इनके लिए, यही वे लोग है जो साल में 10 माह गुजरात जाते है पलायन पर और लौटकर गुण गाते नही अघाते
सरकारें निजी संपत्ति है अमित शाह, मोदी या अम्बानी या अडानी जिंदल की, अब विश्वास नही है फालतू के आंदोलनों और जल जंगल जमीन के मुद्दों पर - जिस देश मे सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति से लेकर मुहल्ले के पार्षद ही कुछ करने लायक नही वहां क्या खाक कुछ चमत्कार होगा खासकरके उन लोगों के बीच जो बेहद दोगले और मक्कार हरामखोर है जो 360 के करीब मेंडेट उन्हें देते है जो उन्ही को विस्थापित कर उजाड़ने में लगे है
चलिए घर जाईये, खेल खत्म हो गया है
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गाथा जिसपर पारदर्शिता आवश्यक है Aug 2019

गाथा जिसपर पारदर्शिता आवश्यक है 
1
किसी भी फेलोशिप को प्राप्त करने के लिए देने वाले का पड़ोसी होना जरूरी है
देने वाले को गाहे बगाहे लिफ्ट देना, उसकी सब्जी भाजी की थैली उठाना, उसके बच्चे की पॉटी धोना और कभी कभी मौका मिलने पर संवेदनाओं का नाटक करना भी बेहद जरूरी है
यदि आपके पास कुछ घटिया कहानी और काम के नाम पर बकवास कहानियां है जिन्हें सुनाकर आप महीनों मुफ़्तख़ोरी कर लोगों को पका सकते है तो आप सर्वथा योग्य व्यक्ति है
यदि आप गांव कभी गए थे - दो चार पांच के साथ गमछा ओढ़कर , राजधानी से किसी के संग लदकर आंदोलनों और एक्टिविज्म के श्राद्ध में और अभी तक आपको एकाध दलित, आदिवासी या कोई और बाबू , पटवारी की कहानी याद हो तो आपको राष्ट्रीय स्तर की फेलोशिप जुगाड़ सकते है
यदि आप किसी ब्यूरोक्रेट को लपेटे में लेकर एकाध बार पब्लिक में उससे तुम, या अपनत्व से बात कर लें और एकाध कभी भी क्रियान्वित ना होने वाला आदेश दो कौड़ी के विभाग से निकलवा दें तो फिर आप 65, 66 या 70 वर्ष के हो जाएं आपको फेलोशिप से जबरन नवाज़ दिया जाएगा
अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी में आप भले ही विशुद्ध ब्राह्मणवादी रहें हो या अभी कान में जनेऊ लपेटकर मूत्र विसर्जन करते हो पर आपको दलितोत्थान, आदिवासी और जाति मिटाने के लिए फेलोशिप मिल जाएगी
व्यक्तिगत जीवन में स्त्री आपकी कमजोरी रही हो , पूरा देश और जगत दुनिया जानती हो कि आप नैपकिन की तरह अपने जीवन में स्त्रियां बदलते रहे हो, बूढ़ा होने पर भी आपकी लार का अंत नही - चाहे पाँव टूटे या हाथ, दिमाग़ ठिकाने भले ना हो, पर जेंडर, महिला समता के नाम पर ज्ञान की बकलोली कर आप बेशर्मी से उन्ही महिलाओं से फेलोशिप ले सकते है जो आपकी नपुंसकता की शिकार रही हो या एक पत्नी (लव मैरिज वाली ) के बाद भी विजातीय या अन्य मुक्ता के साथ रहकर एन्जॉय करते हुए फेलोशिप ले सकते हो2
2
यदि आपने कुछ कभी लिखा और यहां वहां छप गया तो आप पत्रकार हो सकते है , सुबह उठकर चड्ढी पहनकर अखबार के हॉकर बनें और धीरे से एजेंसी लें और स्थानीय किसी ब्यूरो को मारकर आप गद्दी हथिया लें
फिर लेख - आलेख लिखना शुरू करें, यदि थोड़ी समझ हो तो अडोस - पड़ोस में चल रहे मिट्टी, कीचड़, टट्टी - पेशाब से लेकर आंध - बांध, नदी - नालों या ऐस - गैस के आंदोलन से जुड़ जाए - भगवान भला करेगा
करना कुछ नही - खादी भंडार जाइये, दो चार लकदक कुर्ते खरीदिये - 2 अक्टूबर के आसपास छूट में , दो जींस, किसी हाट से गमछा और बस आते - जाते रहिए, टपरी की चाय पीते - पिलाते रहिए और आपके लेख सेटिंग से छप ही रहे है , कोई तेज़ी से बढ़ता अखबार ज्वाइन कर लीजिए और मंत्रालयों में रोज़ ब्यूरोक्रेट्स की आरती उतार आईये - बस हो गए पापुलर जनसेवक, विकास पत्रकार या एक्टिविस्ट
फिर रोज़ अखबार बदलिए, इस बीच कोई ना कोई एनजीओ घास डाल ही देगा , कोई ना कोई मीरा दीवानी बनकर आपके एटीट्यूड झेलने को भगवान भेज ही देगा जीवन में, आप उसको मजे में खूब भोगिये, मीडिया की मीराओं को उनके घर जाकर च च च करते हुए बाम मलिये और काम पर चलिए , हाँ बीयर पिलाना और सुट्टा मारना भी सिखाईये ताकि ये कन्याएं दिल्ली में पहुंचे तो पूर्णतः वर्जनाओं से मुक्त हो जाएं
फेलोशिप लेने के लिए अपनी व्यभिचारी प्रवृत्ति को बरकरार रखते हुए आप यदि ज्यादा ही क्रांतिकारी दिखना चाहते हो तो किसी भी पिछड़े जिले की शुद्र, आदिवासी या अन्य कोई पढ़ी लिखी कन्या से ब्याह की भी नौटंकी रचा लीजिए - फिर आपसे बड़ा सत्यशोधक नही समाज में - मस्त बीड़ी पीकर जिगर की आग बुझाते रहें देश विदेश घूमते रहें किसी का बाप आपको अंतरराष्ट्रीय या यूएन की फेलोशिप मिलने से नही रोक सकता
कामरेड, समाजवादी, गांधियन, कांग्रेसी और संघियों से यारियां निभाते हुए अपना उल्लू सीधा कीजिये - आपको निश्चित ही मिड कैरियर की कोई ना कोई फेलोशिप मिल जाएगी - मजे में तीन माह से लेकर दो साल तक का "सबाटिकल" लीजिए और जी भरकर बकलोली करिए - क्योकि फेलोशिप का अर्थ है खुलापन, फिर चार पांच लाख हड़फ भी जाएं और रिपोर्ट भी ना दें तो कोई खान घण्टा नही उखाड़ सकता, इस रुपये से आप दो चार कुत्ते - कुत्तियाएँ भी खरीदकर ब्रीडिंग का धंधा खोल सकते है - अरे यार कार आदि तो साला दस लाख का खेल है और फिर जरूरी भी है ना - यू नो
फेलोशिप एक स्वर्ण मृग है जो लंका ले जाता है और अंत में फेलो को परम विद्वान ज्ञानी रावण की तरह मरना पड़ता है - और मौत के समय कोई मंदोतरी या सीता भी आखिरी समय में साथ तक नही देती
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1972 का समय था मप्र जैसे घोर पिछड़े आदिवासी दलित प्रदेश में समाज विकास का काम फेलोशिप से ही शुरू हुआ था शीर्षस्थ लोग इस शब्द, इसके मायने और इसके विस्तार से वाकिफ थे, उस्ताद थे इसलिए सरकार को ही चुना लगाकर सीनियर फेलो बनकर यहां चरने चले आये अभी तक सुरक्षित है और प्रोफेशनल चरवाहे है अब तो
उनके रूप रंग, अंग्रेज बीबियां और रुपयों की आमद देखकर कई स्थानीय भी यह हुनर उन पापड़ बड़ी उद्योगों में जाकर सीखने लगें, जो बच्चे लंगोट में सू सू करते थे - वे यह सब गू मूत पी पाकर बड़े और विद्वान बन रहे थे, गांवों से निकलकर शहरों में आयें, नकल की, पास हुए फिर कलम घिससु बनें
एनजीओ में रहें वहाँ संजाल में फंसकर समझें कि शहद किधर है यूनिसेफ में या किसी गोरी चमड़ी में सो कागज आर पार किये और धन संपदा और वैभव के समंदर में लायसेंस लेकर डूबे यह चीखते हुए कि खुसरो दरिया प्रेम का - वाकी उल्टी धार
नया था सो क्या किया एक ही कुलदेवी थी फेलोशिप देवी सो पकड़ लिए पांव और घर भर, बीबी बच्चे, इमोशन, अक्ल, बुद्धि, ज्ञान, अज्ञान, जुगाड़, सेटिंग और कमीशन का भोग लगाकर पहले एक पाई फिर दो और अब कोई जगह नही छूटती जहां से फेलोशिप देवी की कृपा ना बरसें - एक चार लाख की तो दूसरी छह, तीसरी बारह तो चौथी चौबीस की है, कुछ एक साल की तो कुछ पांच - बस ऑलिव ऑइल का मसाज करते रहिए और फल पाते रहिये
पूरी बेशर्मी एनजीओ में सीखी चोरी - चकारी , अकॉन्ट्स में हेरफेर, फर्जी बिल बनाने की पारंगतता, फर्जी रिपोर्टिंग, गूगल देव से कॉपी पेस्ट कर पीपीटी से लेकर रिपोर्ट बनाना, सरकारी सर्वे रिपोर्ट का बेजा इस्तेमाल और यह सब कर संसार के दूरस्थ इलाकों में जाना और ज्ञान की जड़िया बांट आना जिसमें अपने यहां की गरीबी, भुखमरी और आंकडों की बाजीगरी जिसे बेचकर आप राजधानी में दो से तीन बेडरूम के 3 - 4 फ्लैट और मकान खरीद ही सकते है
फेलोशिप के लिए एक बुनियादी शर्त है कि आपमें रीढ़ ना ही हो बाकी सब भालो आछी, सब मजा मा छे

Tuesday, August 13, 2019

Interesting Post on Local Measuring Units 10 August 2019

अपनी भाषा के अपने शब्द - एक पसेरी धान, दो धडी ज्वार, आठ आना की कोथमीर, नौवारी लुगड़ो, छह सूत की दीवार, दो गज, दो कोस , एक बिलास, छह अंगुल, दो मुठ्ठी, अंजुरी भर, छटाँकभर, आदि - कितने मीठे शब्द है और अपनत्व से भरे हुए है और मापन और त्वरित समझ का ये मजा आधुनिक मात्रक प्रणाली में कहां

Comments 

कश्मीरनामा पढ़ रहा हूँ वहां एक जिसमें जैन-उल-आब्दीन के समय उत्पादन को एक गधे की पीठ पर ढोये जाने वाले अनाज से नापा जाता था जिसे खरवार कहते थे। एक खरवार यानी एक गधे की पीठ पर जितना अनाज लादा जा सके। साथ ही जमीन नापने के लिए ज़रीब का प्रयोग शुरू किया गया।


और ' रत्ती भर ' तो सब भूल गए। ' धेले भर ' की अकल भी खोजते थे उन दिनों ।

टका सेर भाजी टका सेर खाजा

दो घड़ी" आम लइ आया एक बार हाट में से , मजे को रस करयो ने मजे लइ ने खायो 

नो दन में ढाई कोस


घनानन्द प्यारे सुजान सूनो 
मन लेहो पे देहो छटांग नही


मण भर अनाज



लाख टके की बात कही आपने
सोला आना सई.
सब धान एक पसेरी है आजकल 


खूब सुन्दर, रस भरी और गहरी बात कही सन्दीप भाई। 
इन शब्दों में यह विनम्रता घुली हुई है कि हम दुनिया को अंदाज़ से ही समझते हैं, अपनी ज़रूरत के हिसाब से ही समझते हैं। अन्तिम सत्य किसी के पास नहीं है। ऊँचे-बड़े वैज्ञानिक भी यही बात कहते हैं, लेकिन कई साधारण और अनपढ़ लोगों को इस बात की सहज समझ थी, महँगी शिक्षा के बिना ही। ऐसे-ऐसे कारीगर थे जो बारीक-से-बारीक चीज़ को नज़र से नाप लेते थे। तभी तो "गजधर" शब्द बनाः यानी जो नापने वाले "गज" को "धारण" कर ले। असली उस्तादी नज़र से नापने में होती थी। अगर नाप के नापा, तो कहाँ के उस्ताद? छटाँक-दो-छटाँक में दुनिया नप जाती थी। और ये शब्द हाथ से काम करने वालों के गढ़े हुए लगते हैं, तभी इनके रूपक शरीर के पास से हैं, व्यवहारिक हैं। शरीर की गति और मशीनी गति की तुलना जो गांधीजी ने की, वह भी संभवतः इसी भाव की थी।


Spoan Joshi



Posts of 10, 11 and 12 Aug 2019

कल डिस्कवरी के कार्यक्रम में जानवरों से प्रेम दिखाते हुए श्रद्धेय मोदी जी ने कहा कि हम वसुधैव कुटुम्बकम वाले लोग है तो याद आया कि मोदी सरकार में 89 सचिव है जिनमे
ओबीसी: 00
एससी: 01

एसटी: 03
सवर्ण: 86
और हमारी जनसंख्या का अनुमानित प्रतिशत है
ओबीसी: 60-65%
एससी: 15%
एसटी: 07%
साथ ही एक और छोटा सा सवाल जिस वसुधैव में सबका कल्याण सोचने के लिए माननीय मोदी जी 18 घँटे रोज़ खप रहे हैं बचपन से चाहे चाय बेचते समय, हिमालय में, मगरमच्छ पकड़ते समय , प्रचारक के रूप में या पिछले पूरे पांच साल बगैर छुट्टी के और अबकी बार भी - उस वसुधैव में मुस्लिम नही, दलित नही, अल्पसंख्यक नही और तो और हमारी जसोदाबेन भी नही तो कल्याण किसका कर रहें है
बुरा ना मानियेगा, बस इस कम अक्ल का जिज्ञासा वश पूछा गया सवाल है ,अन्यथा ना लें - मैं मोदी जी के नेतृत्व और निर्णय क्षमता पर अति से भी ज्यादा विश्वास रखता हूँ, पूरी आस्था और सम्मान है दिल दिमाग़ में
***
चाय बेचता था ( पिताजी ज़ेबख़र्च देते थे )
इस्त्री करके कक्षा का सबसे स्मार्ट बच्चा (आज भी है )
क्रोकोडायल की कहानी जारी है
मैं किसी को मारने में यकीन नही करता ( गोधरा में पता नही क्या हुआ)
लकड़ी में जीव होता है ( संजीव भट में जीव नही वह सिर्फ पुलिस वाला है )
प्रकृति जीवन का सहज संसार है ( अम्बानी अडानी तो व्यवसाय है )
इनबिल्ट स्वभाव पोजिटिव्ह है तभी राहुल से लेकर मायावती तक से घबराहट के मारे सीबीआई का तोता लेकर चलता हूँ
हिमालय की कहानी - उफ़्फ़
भाला हिंसक है इसका इस्तेमाल नही करता
पिक्चर अभी बाकी है 😀😁
चलता फिरता मनोरंजन है टेक्स फ्री
एक भी सच नही बोला बन्दा और डिस्कवरी ने भी विश्वसनीयता खोई आखिर में बीयर को प्रार्थना करना पड़ी कि हे प्रभु भारत और नागरिकों को शक्ति दें कि बर्दाश्त कर सकें
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क्या संयोग है कि एयरटेल डिश टीवी पर डिस्कवरी चैनल 420 पर आता है (नॉन एचडी)
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कांग्रेस में अध्यक्ष चुनने को ले कर बड़ा पशोपेश था , कुछ लोग चाहते थे कि पूर्व प्रधान मंत्री स्व राजीव गांधी की विधवा पत्नी अध्यक्ष बन जाएं और कुछ कांग्रेसी चाहते थे पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की मां को अध्यक्ष बनाया जाए , कुछ कांग्रेसियों ने कहा कि प्रियंका रॉबर्ट वाड्रा की मां को भी मौका दे कर देख लें , पर ज्यादातर कांग्रेसियों की इच्छा थी लोह महिला और पूर्व प्रधान मंत्री स्व श्रीमती इंदिरा गांधी की बहू गद्दी संभालें
आखिरकार सर्वसम्मति से कुरुक्षेत्र के जमींदार और कायदे आज़म सर्वशक्तिमान रॉबर्ट वाड्रा की सासुजी का चयन कर लिया गया और इस तरह परिवारवाद की परम्परा टूट गई
इस तरह कांग्रेस का पुर्नजन्म हुआ!! 😂
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सरकार, शाह, मोदी, कश्मीर, लद्दाख, राज्य और केंद्र के साथ साथ अनुच्छेद 370, धारा 370, 35 ए पर बहुत ज्ञान मिल गया , बहुत पढ़ लिया और समझ लिया और पीएचडी भी हो गई , नोबल भी दे दें क्या महाज्ञानियों
अब वेब पोर्टल्स और ज्ञानी लोग प्रवचन देना बंद करें क्योंकि कश्मीर में अब जन जीवन भी सामान्य हो गया है , कर्फ्यू बनाम धारा 144 हट गई है
मालवा में कहते है "सई सांझ के मरया के क़द लक रोवोगा" अर्थात शाम को जो मर गया है उसके नाम कब तक रोवोगे - रात हो गई है , सो जाओ , आराम करो कल नया सवेरा होगा
समझे या नही - बन्द करो बकवास अब, इनबॉक्स में कचरा, लिंक या वीडियो पेलने का काम अब नही करो मित्रों, वरना ब्लॉक कर दूंगा - हद है साला मान ही नही रहें, कॉपी पेस्ट की हद है
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Friday, August 9, 2019

राष्ट्रहित सर्वोपरि Posts of 8 Aug 2019

राष्ट्रहित सर्वोपरि
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Ravish ने आज लिखा है कि युवाओं ने फिर उनसे चिरौरी करना आरंभ कर दिया है कि नौकरियों का अकाल है, परीक्षा ले ली परिणाम नही आएँ या नियुक्तियां नही हो रही
मेरा सुझाव है कि बिल्कुल मदद नही करना चाहिए, कोई अर्थ नही है किसी को मदद करने का - ये लोग सौ जूते खाकर सिर्फ एक गिना जाये ही डिजर्व करते है
मैंने लोगों की मदद करना बंद कर दिया है - सीधा कहता हूँ अपने विधायक या सांसद के पास जाओ, अब ना किसी को राह दिखाता हूँ कि समग्र आईडी के लिए क्या करें या बीपीएल में नाम कैसे जुड़वाएँ या मनरेगा के पोर्टल पर कुछ नही दिखाता या आयुष्मान योजना का कार्ड हो या किसी की सामाजिक सुरक्षा पेंशन का आवेदन लिखता हूँ , अपने मित्रों या सम्पर्कों के सन्दर्भ देना भी बंद कर दिया है - यदि ज़्यादा ही कोई पीछे पड़ जाएं या जिद करें तो फीस मांगता हूँ , कोई समाजसेवा का धंधा नही खोल रखा है - ना ही किसी देशी - विदेशी संस्थान से फेलोशिप ख़ाकर भठियारखाना खोल रखा है घर में
जब भी कोई युवा नौकरी के लिये रिज्यूम भेजता है तो उसे स्पैम फोल्डर में डाल देता हूँ और अंत में एक साथ सिलेक्ट करके डिलीट कर देता हूँ , जिन मूर्खों को राष्ट्र, सत्ता, सरकार और पार्टी में फर्क नही मालूम और ऐसे गधों को जो बारहवीं से लेकर पीएचडी तक शिक्षित है - को तो बुरी तरह से झिड़क देता हूँ
फोकट की मदद करना बंद कर दिया है - ना कोई ग्रामीण भोला है, ना दलित और ना आदिवासी, ना महिला - ना बूढ़ा, ये सब लोग बेहद शातिर है, चतुर है और घाघ होने के साथ घिघौने है लिजलिजे और बासते हुए सेप्टिक टैंक की तरह
युवाओं की मदद तो बिल्कुल मत करो - इनकी जवानी बहुत उबल रही है क्योंकि इन्हें कश्मीरी लड़कियों से ब्याह करना है , श्रीनगर के लाल चौक पर कश्मीरी बेटियों के साथ बलात्कार करके "पोर्न हब" पर वीडियो अपलोड करना है, बाप कमाई से प्लाट लेना है, डल झील में छठ मनाना है
भाड़ में जाने दो, इन्हें कहिये कि अभी कांवड़ यात्रा करें एक माह और गाँजा भाँग चरस पीकर हुड़दंग मचाये, सितंबर में गणेशोत्सव और उसके बाद दुर्गाउत्सव में समय निकल ही जायेगा और साल के आखिर में राम मंदिर बनना शुरू हो जाएगा - वहाँ जाओ श्रमदान करने यह धर्म, देश और समाज की बड़ी मदद होगी
रहा सवाल इनके माँ - बाप का और बाकी शादी ब्याह का तो सरकार माँ , बाप को तीर्थाटन करवा ही देगी और मरने के बाद दो लकड़ी तो कोई दे ही जायेगा और शादी ब्याह करके करेंगे क्या - संगठन में जाओ - सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल हो वनवासी कल्याण में लगो अभी सौ वर्ष का जश्न मनाना है ना और फिर अपनी सरकार को नया संविधान लिखने में भी आपकी प्रखर मेधा बुध्दि की ज़रूरत है मित्रों
जय हिन्दू राष्ट्र
भामाकीजै
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याद रखना पिछली सरकार में और इस सरकार के अभी तक के महत्वपूर्ण निर्णयों में हिंदी का लेखक कहाँ बोला है, कहाँ चुप रहा है, कहाँ लाईक का खटका दबाया है और कहाँ बेख़ौफ़ हंसा है
समय आने दीजिये बताऊंगा सबके नाम और सबकी कारस्तानियां
आप निगाह रखिये कि कितना घटिया और छिछोरापन लेकर वह जानबूझकर प्रकट हुआ है ताकि उसकी राजनीति और कर्म छुप जाएं - वह दिल बहलाने वाली बेहद निम्न स्तर की पोस्ट्स लेकर आया है जिस पर तितलियां मंडराती रहें
हिंदी पत्रिकाओं के सम्पादकों पर नजर रखिये और संगठनों और संगठनों के आकाओं पर भी कि कैसे पुरस्कार बटोरने में वरिष्ठ कवि से लेकर संपादक लगे हुए है
हिंदी का प्रबुद्ध प्राध्यापक वर्ग भी कहाँ है नजर रखिये कि इनकी चाल, इनके गधे - घोड़े और मोहरे किसके इशारों पर चाल चल रहे हैं और ये खुद किन खोल में बैठकर अपने गणित बिठा रहें है
बाकी तो सब साफ ही है
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Tuesday, August 6, 2019

Abolishing Article 370 and 35 A - 5 Aug and 6 Aug 2019 Posts

साहसिक कदम पर देश को देश रहने दें
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मोदी एवम शाह का हिम्मती फ़ैसला

72 वर्षों में सरकार का बेहद साहसिक और हिम्मत भरा निर्णय, हार्दिक बधाई भले ही अलोकतांत्रिक होकर हड़बड़ी और पूरी दादागिरी से लागू किया गया हो
बाकी सब ठीक पर नागरिकों से संयम से रहने की गुजारिश है, कृपया चुटकुलों से और भद्दे संदेशों से किसी को आहत ना करें
हम एक है - यह बोलें ही नही व्यवहार में भी दिखाएं
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सवाल एक नही अनेक है - सबसे ज़्यादा मिलिटेंसी को लेकर है कि क्या सेना के जवानों की मौत में कमी आएगी, क्या बजट में अब पाकिस्तान का डर रक्षा मद में कम होगा और वह डायवर्ट होकर शिक्षा स्वास्थ्य और मानव विकास के सूचकांक बढाने में उपयोग होगा और क्या हम अब सच मे हिन्दू मुस्लिम की मानसिकता से बाहर आकर एक वृहद और वसुधैव कुटुम्बकम की दिशा में सोच को जमीन पर चरितार्थ कर पाएंगे
मुझे लगता है कि लगे हाथों अगले सोमवार को संसद मन्दिर बनाने का भी कानून बनाकर सीपीडब्ल्यूडी को दिसम्बर तक भव्य मंदिर भी बनाने का आदेश दें - ताकि नव वर्ष से हम सिर्फ और सिर्फ विकासोन्मुख कामों को तरजीह दें
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कोख का कर्ज यूं चुकाओगे कम्बख्तों
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पूरे दिन भर से घटिया संदेश आ रहें है , कश्मीरी बेटियों को लेकर जो संदेश वाट्सएप फेक्ट्री से फैलाएं जा रहें है यदि यह काश्मीर का भारत में एक होना है तो यह कभी ना हो
जिस अंदाज़ में युवा वहां की बेटियों को लेकर संदेश, घटिया फोटो और अश्लीलतम फोटो डालकर "चिक्स, एपल, माल और उनके गोपनीय" अंगों के संदेश आ रहे हैं लगता है यह भी एक व्यापक पूर्व तैयारी का हिस्सा था
मोदी, अमित शाह, महबूबा, कांग्रेस, नेहरू और फारुख अब्दुल्ला और उमर को लेकर जो घृणास्पद कार्टून, वार्तालाप आ रहा है वह शर्मसार करने वाला है
जिन लोगों ने अपने गांव, मोहल्ले के अलावा कुछ नही देखा वे कश्मीर के निर्णय पर इतने अधिकार से बोल रहें हैं जैसे इन मूर्ख, गंवारों के नाम चल अचल संपत्ति लिख दी हो
पढ़े लिखे लोग प्लाट बिकाऊ से लेकर डल झील में रिसोर्ट की बात के पोस्टर ठेल रहें हैं और कमाल यह है कि ये सब जानते है कि ये क्या कह रहे है और कर रहें हैं
देश की नब्ज लगातार डाउन हो रही है और स्थिति खराब है, यह सब एक सुनियोजित प्रक्रिया के तहत हुआ है, 370 हटाने के हम भी हिमायती है - ख़ुश भी है पर इस क़ीमत पर कदापि नही
माफ करिये यह सनक और ये युवा कल आपकी अपनी बहू बेटियों को सड़कों पर लाकर रौंदेंगे - शायद अपनी बहनों को भी, हिंदूवाद और हिन्दुराष्ट्र का यह प्रचंड ज्वर किसी को नही बख्शेगा - याद रखियेगा
कश्मीर से कन्याकुमारी एक ऐसा हो जाये कि हमारे बेरोजगार युवा इतने अश्लील, नालायक और इस कमीनगी पर उतर आएँ तो कोई अर्थ नही ऐसे सुधारों का - बेटी पढ़ाओ और हरामखोरों के निशाने पर भेजो अगर यह मंशा और आशय है तो आपकी सभ्यता, संस्कृति और जाहिलपन पर मैं शर्मिंदा हूँ
मुझे दुख है कि ऐसे घटिया लोग मेरे परिचित है
मेरा सवाल है कि आपकी मर्दानगी, दंगों, छुआछूत, भेदभाव और जाति वैमनस्य की शिकार महिलाएं क्यों बनें - क्या आप सारी वैचारिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक लड़ाईयां स्त्री के इर्द गिर्द ही बुनकर संतुष्ट हो लेते है - यदि हाँ तो आपसे बड़ा नपुंसक और नामर्द कोई नही है - डूब मरिये कही जाकर
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जैसे पाँख गिरे तरुवर के
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चार साल पहले की बात होगी जब लव बर्ड्स की एक जोड़ी अनिरुद्ध घर लाया था क्योंकि वह मुंबई जा रहा था एमबीए करने
हम लोग व्यस्त रहें इसलिये एक जोड़ी ले आया कि घर चहकता रहें
पिछले वर्ष भीषण गर्मी में एक चिड़िया मर गई, बची एक जो अपने अकेलेपन की त्रासदी से जूझती रहती थी, इन पूरी गर्मियों में मैं नीचे वाले कमरे में उसके पिंजरे के पास रहता और पंखा चलाकर अपना काम करता रहता वह भी ची ची ची चहकती रहती, खूब बतियाती और शायद गीत भी सुनाती और अपनी उदासी के किस्से भी
कई बार लगा कि एक चिड़िया और ले आऊं, या किसी को दे दूं पर फिर सोचा कि नई चिड़िया से नही बनी और उसने नोच दिया तो या किसी को दे दूं और वह सफाई, दाने पानी और गर्मी का ध्यान ना रखें तो लगा कि दुख सहने से और चौबीसों घँटों की चिकचिक से एकाकीपन ही सौ गुना बेहतर है - सो उसे यूँ ही रहने दिया अपने में मस्त
आज सुबह जब दाना डालने, पानी बदलने और पिंजरा साफ करने गया तो देखा कि उमस के कारण वह प्राण पखेरू छोड़ किसी अज्ञात दिशा में उड़ गई थी
तीन चार साल घर चहका कर वह निर्जन द्वीप में उड़ गई है, मन उदास है और बोझिल भी पर उसके मुक्त हो जाने पर ख़ुश हूँ, कई बार छत पर पिंजरा खोल दिया कि वह उड़ जाए पर उड़ी नही कांधे पर आकर बैठ जाती थी और कानों में शोर मचाते हुए स्नेह जताती थी
आज जब चिड़िया सच में पिंजरा तोड़कर किसी अनथक यात्रा पर निकल गई है तो लगता है एकाकीपन एक ना एक दिन जान ले ही लेता है चिड़िया हो या मनुष्य मात्र
मन व्यथित है लगता है उसकी मौत का जिम्मेदार हूँ मैं
प्रार्थनाएं

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Sunday, August 4, 2019

Posts of 3 and 4 Aug 2019

पेट भर सलाद
◆◆◆
एक ताज़े भुट्टे के (मकई) के दाने निकाल कर पानी मे पांच मिनिट उबाल लें, नीचे उतारकर एक बाउल में रखे
एक शिमला मिर्च, दो हरी मिर्च, एक टमाटर और आधा छोटा खीरा बारीक काट लें
अब इस मिश्रण को मकई के उबले हुए दानों में मिला लें
थोड़ा सा नमक, कूटी काली मिर्च , चाट मसाला , एक बड़ा चम्मच नींबू का रस मिलाकर आधा चम्मच घी या मख्खन मिला दें
स्वादिष्ट और बेहद पौष्टिक सलाद तैयार है
भोजन हो गया अपना आज का
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दूध मांगो तो खीर देंगे
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15 अगस्त का इंतज़ार कीजिये अबकी बार कुछ धांसू होगा - इसके पहले और 15 अगस्त पर सांत्वना वाले भाषण, आत्म मुग्धता के झंडे और दुनिया को बता दिया जाएगा कि हम ही महान है, हमने कश्मीर समस्या सुलझा ली है
संभवतः नए सांसदों के प्रशिक्षण में दो दिवस यही योजना विस्तृत रूप से समझाई गई हो कि अपने इलाकों में लौट जाये और प्रशासन पर काबू रखें , सत्र के तुरन्त बाद अमित भाई कश्मीर में , तब तक घाटी से धर्मावलंबियों को सुरक्षित निकाल लिया जायेगा - एयर लिफ्ट तक करवाया जा रहा है
अच्छी पहल है - खत्म करो, रोज - रोज की चिकचिक और अब अपने असली मिशन पर आ जाओ, आर्थिक हालात तो बर्बाद हो ही गए है, जनता कावड़ियों के भेष धरकर शिवालयों में व्यस्त है ही, बची खुची अर्थ व्यवस्था की भी वाट डाल दो
अदालतें राम मंदिर की सुनवाई रोज़ करेंगी ही तो बाकी लोकहित वाद की अपीलें सुनने को समय कहां होगा, और जनमानस तो कृत संकल्पित है ही कि "कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे" - सारे हिन्दू मुस्लिम मन्दिर - मस्जिद में ही बहस करके ही ज्ञानी बनते रहेंगे
ऊपर बर्फ भी नही है, सेना को मुस्तैद कर ही दिया है, बजट पास हो ही गया है, एनआईए को विशेष अधिकार दे ही दिए है - अब साला कोई मानव अधिकार वाला बोलेगा तो वही के वही निपटा देंगे
बधाई मोदी जी , आपकी सरकार को अग्रिम बधाई, शुभकामनाएं और दुआएँ कि आप कामयाब हो और देश के माथे से कलंक हमेशा हमेशा के लिए मिट जाए - ट्रम्प अंकल 26 जनवरी को पक्का आयेंगे यह वादा है
15 अगस्त को सुबह शेरवानी कौनसे रँग की होगी बता दें - ताकि हम सब भारतवासी तब तक सिलवा लेंगे और झकास झंडा वंदन करेंगें
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊंचा रहें हमारा