Wednesday, March 14, 2012

जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी इतिहास..............

बड़ा अजीब तंत्र है छोटे सरपंचों के जिनके पास खाने का एक दाना नहीं था आज मेरे दफ्तर में वो बोलेरो, स्कोर्पियो लेकर आते है, जिले के छोटे कर्मचारी जिन्हें तृतीय श्रेणी कहा जाता है जो सायकिलो पर घूमते थे वे आज वेगन आर या अल्टो में घूम रहे है, ब्लाक स्तर के अधिकारी बड़ी बड़ी गाडियों में घूम रहे है, कलेक्टर रेट पर काम करने वाले कर्मचारी भोपाल से रोज कार से आते है और जाते है, अपने कार्यालय के साथी की बहन बेटियों की शादी में कर्मचारी वाशिंग मशीन से लेकर लेप टॉप तक गिफ्ट देते है .............वो भी पचास हजार की रेंज में, मेरे दफ्तर के चपरासी हर छः माह में नई डिजाइन की मोटर बाईक खरीद लेते है, पता नहीं सब इमानदारी से काम करते है तो रूपयों का पेड़ इनके घर लगा है क्या या ये कुछ विशेष हूनर वाले है ? मुझे तो ट्रक पर लिखा शेर याद आता है "दूसरे को देखकर परेशान क्यों होता है / खुदा तुझे भी देगा हैरान क्यों होता है"

विनाश काले विपरीत बुद्धि जैसी कहावते अपना दम तोड़ रही है और फ़िर इस संक्रमण काल में लोग कहते है कि यही तो तरक्की है थोड़े से पासिटीव हो जाओ ...........क्या करू उम्र का झटका है या समझ का फेर या सच में मतिभ्रम ..................

जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी इतिहास..............
कोई दु:ख
मनुष्‍य के साहस से बड़ा नहीं

वही हारा
जो लड़ा नहीं

*कुंवर नारायण*

फिर सोचता हूं साला बात करना ही बेवकूफी है..

 
 मेरे दोस्तों, बंधुओ की सूची में और भी युवा है, पत्रकार है, भोपाल के गढ़ माखनलाल विवि की एक लंबी फौज है क्या वे भी लगभग इसी उहापोह में जी रहे है???

मेरी एक पोस्ट पर युवा मेधावी और कर्मठ पत्रकार Sarang Upadhyay की दुखभरी प्रतिक्रया.......बात तो सही है सूचना के युग में जब इतनी जल्दी जल्दी सूचनाएं आ रही है तो क्या करे और क्या ना करें.............

"दादा..आपने पहले भी पूछा था. मैंने कहा था न इतनी जल्‍दी मत बूझो कई बार मैं भी इन बिंदुओ की तरह चलता हूं..आप सोचिए न ये मेरे जैसे युवकों के लिए अजीब सी त्रासदी है कि वे केवल सूचनाओं के युग में जी रहे हैं.. खाते, पीते, सोते, जागते, रोत बैठते, सब जगह सूचनाएं, बेचारे इतनी सूचनाएं झेलते हैं कि विवेक शून्‍य हो गए हैं और अप हैं कि दुनिया की सबसे गहरी बात पूछते हैं. अरे हमारी पूरी पौध ही विचार शून्‍रू और सूखी है.. कहां जाएं हम लोग कि कम्‍बख्‍त चौराहे पर आजकल ओसामा और ओबामा की बातें होती हैं.. जबकि यहां नगरपालिका ने नाक में दम करके रखा है.. फिर ये 4 हजार की ट्रॉली पर कूटकर मरने जैसे हादसे को पूरी दुनिया में ऐसे दिखाया जाता है जैसे वह संसार का एकमात्र सत्‍य है.. फिर एकाएक ध्‍यान उन जंगलों में जाता है जहां एक आदिवासी महिला के साथ बहुत बुरा घटा है लेकिन सामने ही नहीं आया.. फिर सोचता हूं साला बात करना ही बेवकूफी है... राजनीति कुछ नहीं दादा असमंजसता भर है..."
 
आज मेरी कर्मस्थली पर एक वरिष्ठ जिला अधिकारी ने कहा कि नरेन्द्र कुमार बेवकूफ था जो सिर्फ चार हजार के पत्थरों के लिए कूद पड़ा और अपनी जान गंवा दी अरे चार हजार तो एक मिनिट की बात है अरे जाना ही था किसी का पीछा करने तो करोडो के पीछे जाता वरना किसी बड़े होटल में छापा मार देता..........आजकल के नए उम्र के अफसर दिमाग नहीं लगाते बुढापे में क्या करेंगे और क्या देंगे अपने पूतों को ..........................
मुझे दुःख हुआ कि सुख मुझे नहीं पता चला..........पर दिमाग से सोचने से लगा कि बात तो कुछ हद तक सही है............सिर्फ चार हजार के पत्थर और एक आई पी एस अफसर और मौत.........और फ़िर लंबी राजनीती और फ़िर टुकडो टुकडो में न्यायिक जांच और अन्ततोगत्वा सी बी आई जांच के लिए केन्द्र सरकार से दरखास्त ...............
समझ नहीं आ रहा कि क्या कहू, मराठी में कहते है "हे खर कि ते खर" ..तुका म्हणे उभा राहवे आणि जे जे हुइल ते ते पहावे.....................परमेश्वरा परमेश्वरा ...........!!!!

Sunday, March 11, 2012

फाग, लांगुरिया और मन की लंबी यात्रा............

हवाओं में नरमी है और हवा जिस तरह से चल रही है उससे लगता है कि कुछ होने वाला है, ये लंबे दिन ये पछुआ हवाएं और खेतों से गेंहू की झूमती बालियाँ कुछ कह रही है, सडको पर चलते रहो तो लगता है कुछ दरक रहा है कुछ पिघल रहा है और दूर से चमकती हुई सड़क और सूरज के प्रकाश में लगता है मानो सब कुछ साफ़ होता जा रहा है, शाम होते होते ये सब जम जाता है. जैसे जम जाते है गहरे में कही दर्द और गुनगुनी सी संवेदनाएं. इन लंबे दिनों में सूनी दोपहर में ऊँघता है मन और डोलता है शरीर, पर कहा बस चलता है!!! दिल दिमाग में गूंजते है फाग के असुरी गीत और याद आती है रागिनिया, माच, लांगुरिया और दिलकश सूर्ख लाल पलाशों के फूल, इस सुनसान में किसी दूर बजने वाले संगीत से पूरा तन मन भगोरिया हो जाता है मन निकल पडता है उन्ही मेलो-ठेलो में, घूमने लगता हूँ किन्ही दूर तलक कोनों में...और फ़िर एक खोज और उन सभी स्मृतियों में खो जाता हूँ.... जब कभी रंगों की चटक महक आती थी, रंग बोलते थे और रंग कहते थे, रंग आसपास खड़े हो जाते थे और अपना वजूद दिखा देते थे और ये बावरा सा पागल इंसान झूमकर उन रंगों के साथ चल पडता था - हर क्षण, हर सड़क पर एक नए सफर पर हर बार-लगातार, पर अब क्या हो गया है रंग भी वही है हवाएं भी वही है और तन मन की सुध भी लगभग खो ही गयी है, पर ना रंग बोलते है, ना रंग कुछ एहसास दिलाते है और मै आज भी बावरों की तरह तुम्हे खोजता हूँ इन तेज हवाओं में सब कुछ क्षण-भंगुर होता जा रहा है और ये फाग के गीत है कि कानों में इतनी तेजी से बज रहे है कि लगता है सब कुछ खत्म कर देंगे सब कुछ........सुन रहे हो कहा हो तुम............ये फाग ..ओफ्हो बंद करो ये नगाड़े और झपताल, ये बांसुरी का क्रन्दन और शहनाई की गूँज बंद करो. कान फटे जा रहे है बंद करो भगवान के लिए बंद करो मै पागल हो रहा हूँ और मन फ़िर किसी एक लंबे सफर पर हमेशा के लिए निकल जाना चाहता है..............बंद करो........................