Sunday, March 12, 2017

UP Election a Few Points to be kept in Mind for ensuing Elections in country.



ये जो मायावती उर्फ़ बहनजी उर्फ़ मसीहा की बात जो कर रहे हो कि वो हार गई है ना, वह ना राजनीति की समझ रखती है - ना जेंडर का कोई उभरता हुआ रोल मॉडल है। अवसरवाद, पीठ में छुरा भोंपने और सवर्ण व्यवस्था से अपना व्यक्तिगत फायदा लेने का दूसरा नाम मायावती है। यह आज नहीं तो कल और साफ होगा ।
सिर्फ इतना कि कबीर ने संभवतः इसी के लिए लिखा होगा ;-
"माया महाठगिनी हम जानी"
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बीमारू राज्यों की श्रेणी से मप्र, राजस्थान, झारखंड, उड़ीसा, बिहार, छत्तीसगढ़ निकल ही चुके है। गुजरात पहले ही उन्नत और प्रोन्नत के दर्जे में था, उप्र बचा था सो अब वो भी पिछड़ेपन से उबरने की चाह में सीढ़ी पर आ खड़ा है। एक चमकीली राह और मेट्रो की नींव पर खड़ा आज यह राज्य नए जातीय समीकरणों, जातीय भेदभाव से ऊपर उठकर अपने आकाओं और पूर्वाग्रहों को त्यागकर सफलता की कहानी लिखने को उद्धत है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। निश्चित ही केंद्र और भाजपा का खेमा सन 2019 के मद्देनजर इसे एक दो वर्ष में सफलता का मॉडल बनाकर देश की राजनीती में, खासकरके दक्षिण में, इसे परोसना चाहेंगे ताकि पुनः सत्ता पर चमत्कारिक बहुमत से काबिज हो सकें। इसलिए अब उप्र को छोड़कर जो भी भाजपा शासित राज्य है उन्हें और वहां के मुख्य मंत्रियों को अब श्रीयुत मोदी और केंद्र से मदद की उम्मीद छोड़ देना चाहिए और मप्र की तरह से व्यापमं, अवैध खनिज, डीजल पेट्रोल पर सर्वाधिक टैक्स लगाकर अपना रेवेन्यू बढ़ाने के उत्तम प्रयास करना चाहिए। इन्वेस्टर्स भी अब चतुर हो गए है और फंडिंग की एजेंसियां भी जो माले मुफ्त दिले बेरहम की तर्ज पर अनुदान बांटती है - अब उप्र का रुख करेंगी। सो उप्र के अतिरिक्त भाजपाई राज्य अपने समीकरण और भिन्न खुद हल करें और रहा सवाल जीत हार का उसकी चिंता ना करें गुजरात में सोमनाथ के दर्शन से अवतारी पुरुष ने प्रचार का अभियान शुरू कर ही दिया है और उन्हें हर जिले और पंचायत में भेजकर चुनाव जीता ही जाएगा इसमें शक नही, दूसरा लोगों के पास कोई विकल्प भी है नहीं तो अब ये सारे मुख्य मंत्री आराम से रुपया भी बना लें, सो भी लें और कुछ ना भी करें तो बेचारे अमित शाह और मोदी जी सब कुछ कर ही देंगे। हाँ उप्र को तैयार रहना चाहिए - अम्बानी अडानी से लेकर हर तरह के विकासात्मक अनुष्ठान के लिए।
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चार माह पूर्व एक घनघोर कामरेड देवास में थे, हम लोग बैठकर बियर पी रहे थे साथ में घोर वामपंथी लेखक और कवि और कुछ समाजसेवी थे। उस साथी ने कहा था कि उप्र में 50 लोग वामपंथ की तरफ से खड़े होने को नही मिल रहे। पिछले दिनों में ये वामी खत्म हो गए है और अब वे सिर्फ भक्तों की गालियों, उवाच और कुछ कबूतरों की बीट के बीच सड़ गल रही किताबों में ही मिलते है। पंजाब जैसे राज्य में जहां बड़े बड़े कामरेड जैसे सुरजीत, पाश, लाल से लेकर शिव बटालवी तक हुए- में सुपड़ा साफ़ हो गया तो मणिपुर में क्या खाकर आते ? वामपंथ तरक्की पसंद लोगों के लिए सौंफ और पान बहार मसाला है जो गरिष्ठ भोजन के बाद तले गले ज्यादा खा लिए भोजन को पकाने का साधन है जिसे अपच से बचने के लिए चलते फिरते खाया जाता है । और बाकी तो सरकारी नौकरी करके लच्छेदार भाषा में कहानी उपन्यास लिखकर थोथी वाहवाही लूटने और पुरस्कार बटोरने से लेकर हवाई यात्राओं से दीन दुनिया से संबंध बनाने का एकमात्र रास्ता रह गया है। बाकी तो वामपंथियों से बड़ा शातिर, अवसरवादी और घमंडी कोई है नहीं। जो कामरेड्स महंगे गजेट्स लेकर गरीबी का रोना रोते है, कार के नीचे पाँव नहीं रखते और नौकरी के बदले हरामखोरी कर छल्ले उड़ाते रहते है और ज्ञान की ब धि या बाँटते रहते है उन मूर्ख और घोर अवसरवादियों को क्या इज्जत देना और मार्क्स का वंशज समझना , इनकी असली औकात तब पता चलती है जब मुफ्त की बियर के दो घूँट गले से उतरते है।
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महत्वपूर्ण बात यह भी है कि भारतीय संदर्भ में किसी राज्य के चुनाव, वहाँ के परिणाम और परिस्थितियां पति पत्नी के बेहद निजी और गोपनीय रिश्तों की तरह है जिसे हम सामाजिक लोग अपनी नाक घुसाने कही से भी चले जाते है एक टुच्चे से अख़बार या चैनल के घटिया और निकृष्ट पत्रकार की खबर के आधार पर विनोद दुआ के बाप बनकर टिप्पणी कर देते है - जबकि वहाँ के लोग सच्चाई भी जानते है और कैसे ठीक करना है, कौन करेगा और कितनी होने की संभावना है , भी तय करते है। हम आप सिर्फ तमाशबीन हो सकते है पर टिप्पणीकार नही। इरोम शर्मिला के 90 वोटों की कहानियां आ रही है पर 16 साल जिस जिद और अकड़ में वो अनशन पर रही क्या आम लोग यह नहीं सोचेंगे कि यह महिला हमारे कोई काम नहीं करेगी, आम आदमी नेता के पास जाता ही तभी है जब काम सीधी ऊँगली से ना हो रहा हो वरना तो भ्रष्ट प्रशासन में दो कौड़ी का बाबू 300 रुपया लेकर जमीन भी आपके नाम कर देता है। इरोम का हारना ही ठीक था और अब उसे भी ये सब विरोध और प्रदर्शन की नौटँकी बन्द कर कुछ मेहनत मजदूरी करना चाहिए ताकि अपनी बूढी माँ की देखभाल कर सकें। सत्ता का चरित्र अगर वो 16 सालों में नहीं समझ सकी तो वह अण्णा से भी ज्यादा मूर्ख है और उसे अपने ही राज्य और अपने ही समाज की समझ नही है, इससे तो उप्र में सातवी आठवी पास लोग ठीक है जो विधायक बन गए या पंजाब के वो कांग्रेसी जो नशा मुक्त राज्य बनाने के हवाई नारे में जीत गए या सिद्धू जैसे लोग जो कपिल शर्मा जैसे शो में घटिया शेर सुनाकर भौकाल बन गए। यह कोई तमाशा करने और नट की तरह रस्सी पर चलने का पुरातन समय नहीं है , आज जब सूचना तकनीक, भांड मीडिया और नोट बन्दी जैसे हथियारों को अपना कर या ट्रम्प को इम्प्रेस कर सरताज बनने की होड़ है, अपनी ही पार्टी के लोगों को धकेलकर खुद आत्म मुग्ध होकर मेहनत से स्वयं को लम्बे समय तक स्थापित करने का हौंसला है उसमे तुम जैसी नग्न होकर प्रदर्शन करने वाली स्त्रियों की नग्नता कोई मायने रखती है इरोम और आखिर आज ही तुरन्त तुमने राजनीति से पल्ला भी झाड़ लिया। इरोम तुम एक साधारण सी स्त्री हो और यही बनी रहो।
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जिन मुस्लिमों को हम जी भरकर काफ़िर, म्लेच्छ, पाक की औलादें और कटवे से लेकर तमाम तरह के उदबोधनों से नवाज़ते रहें और हमेशा दोयम दर्जे का मानते रहें उसीका नतीजा यह रहा कि वे और पक्के देशभक्त बनते गए और कुछ अपवादों को छोड़ दें -जिन्होंने रोज़ी के लिए, दहशत फैलाने के लिए अपने आसपास आतंक फैलाया और तस्करी से लेकर बाकी सब गैर कानूनी काम किये, जो भारत में हर कौम के लोग करते है, तो आम मुस्लिम मजबूत हुआ और ज्यादा देशभक्त भी। ये देवबंद से लेकर जो भी उदाहरण दिए जा रहे है वे यही दर्शाते है और यक़ीन मानिए उनका सत्ता में अच्छा खासा स्टैक है और वे हर स्तर पर हर तरह के नफ़ा नुकसान में बराबरी से शामिल है। अब सेक्युलर ताकतों को अपने नज़रिये में थोड़ा परिवर्तन करना चाहिये इस संदर्भ में कि वे पूरी ताकत के साथ काबिज है हर जगह और शिद्दत से भी। और जो गरीब गुर्गे है वो हर कौम में है इसलिए अब 70 साल बाद असलियत जानकर और यह मानकर कि वे यहां है और यही रहेंगे - जिसे श्रीयुत मोदी भी स्वीकार कर चुके है, अपनी धारणाओं पर स्वस्फूर्त भावना से विश्लेषण कर मुस्लिमों को लेकर राय बनानी चाहिए ।
हिन्दू राष्ट्र की ओर बढ़ते देश में वोट के प्रतिशत को ना देखिये पर यह देखिये कि अब सत्ता,मीडिया और उसका फायदा लेने वाले कौन है, निश्चित ही मेहनतकश मध्यमवर्ग नहीं है जो इतना टैक्स देता है कि कुछ पूछने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता।

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दलित आंदोलन को अपने भीतर से चालाक और अवसरवादी दलितों को पहचान कर मनुवादियों के हाथों में सौंपना चाहिए या पूरा दलित वर्ग और खेमा चालाक हो गया है जो मनुवाद भी ओढ़ना चाहता है और जय भीम , ज्योतिबा और सावित्री फूले के नारे लगाकर अवसर का लाभ लेना चाहता है। वैसे मुझे लगता है कि दलितों ने अपने तई सारे प्रयास कर लिए और अब अंत में अपने को मान लिया कि इसके बिना कोई और चारा नहीं है और इसलिए यह धूर्तता नहीं, कपट नही बल्कि एक रणनीति के रूप में यह नया हथियार है जो क्या गुल खिलायेगा इसका विश्लेषण थोड़े इंतज़ार के बाद। पर यह निश्चित है कि शिक्षा और एक्पोजर के बाद भी पढ़े लिखे लोग आरक्षण बन्द होने के खतरे भांप रहे है और यह भी एक वजह है कि वे इस नए उदार पूंजीवादी व्यवस्था के लाभ को लेने या भकोसने का लोभ संवरण नहीं कर पाएं। दलित को थका हुआ, डरा हुआ या कमजोर या अशिक्षित मानने की गलती ना करिये , आज अपने 32 साल के जमीनी काम को नए एंगल से सीखने देखने का मौका मिला है और खुले रूप से कह रहा हूँ कि दलित अब इस्तेमाल की कला में निपुण नहीं पारंगत हो गया है।
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#उप्रचुनावपरिणाम

Saturday, December 17, 2016

Posts of 14 to 16 Dec 16



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इमारतों का अपना दर्द होता है ठीक किसी मनुष्य की तरह कि कोई आये, दुलारे, सुनें और फिर आहिस्ते से पुचकार कर चल दें ! पर ठहरना वही है सदा के लिए, जड़ हो जाना है और एक अवचेतन में चले जाना है ताकि कही से कुछ और फिर ना दोहराया जाये।
यह जीवन, यह सांस का सफर, यह संताप, यह शुष्कता और इस सबमें एक देह का सफर और एक यातना की त्रासदी भी शायद इमारत के पुराने आख्यान की तरह है।
इन इमारतों से गुजरना किसी खोखली देह से सटाक से गुजर जाने जैसा है यायावर की तरह और फिर बचे रहना है किसी मंजर की तरह।
(लक्ष्मीपुर, जिला पन्ना, मप्र का किला जिसे पन्ना के 
पूर्व महाराज लोकेंद्र सिंह के पिता ने दो सौ साल पहले बनवाया था, बाद में बुन्देलखण्ड के प्रसिद्ध डाकू मूरत सिंह को सुधारने के लिए इस किले को खुली जेल में तब्दील कर दिया गया था। आज यह किला अपने वैभव के साथ खड़ा तो है पर खामोश है। सरकारी चौकीदार मुड़ी सिंह रैकवार ने बताया कि कुछ करिये साहब लोग सब उखाड़ कर ले जा रहे है यहां से, मैं क्या करूँ ?)

#MPTourism ध्यान दें।

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छतरपुर - मप्र, की बात है, एक आदिवासी महिला का बच्चा कुपोषित था वह पोषण पुनर्वास केंद्र लेकर आई, डाक्टरों ने कहा कि कुछ नही हो सकता और इसे ग्वालियर ले जाओ। डाक्टर ने भगा दिया और अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली, बच्चे की हालत बिगड़ी तो फिर एक संस्था की मदद से पुनः उस माँ को समझाया कि बच्चे को पोषण पुनर्वास केंद्र ले आये, बड़ी मेहनत मशक्कत के बाद वह तैयार हुई और वह दोबारा बच्चे को पोषण पुनर्वास केंद्र लेकर आई।
बड़ी मुश्किल से पांच सौ के दो नोट उधार लेकर आई थी। जब बच्चा भर्ती था तो केंद्र में किसी ने उससे कहा कि नोट बंद हो गए है, कर्ज में डूबी में वह महिला घबरा गई और बगैर किसी को बताए वह रात में बच्चे को लेकर चुपचाप गाँव चली गई। अगले दिन वह बच्चा इलाज के अभाव में मर गया।
नोट बंदी का असर सिर्फ शहरों, एटीएम और नगदी तक ही नही पड़ा है - बहुत गहरे तक इसने नुकसान किया है देश में, ये कहानियां कही नही दर्ज होंगी क्योकि ये भुगतने और बर्दाश्त करने वाले बड़बोले और वाचाल नही है, वे चौराहों पर रो नही सकते !!!
ये अबोध बच्चे किसी की नजर में नही आएंगे क्योकि एक तो वे मूक है, दूसरा दलित आदिवासी है, तीसरा इनका कोई माई बाप नही है।
क्या आपके पास कोई ऐसी कहानियां है, क्या आपको ये परेशान करती है, क्या आपको इसमें कोई राज -समाज और सत्ता का चरित्र नजर आता है, क्या आपको इसमें मेरा मोदी विरोध नजर आता है, क्या आपको दिल - दिमाग के किसी भी कोने में कुछ महसूस होता है, क्या आपके बच्चे को आपने हाल में जेब खर्च के लिए दस बीस या सौ रुपये दिए तो कुछ ऐसे लोगों या वंचित समुदाय के लिए ख्याल आया ? हाँ या नहीं ? तो क्या आगे करना है अपने इस महान देश का ?
देश सच में बदल गया है।

Sunday, December 11, 2016

Posts of 10 Dec 2016


कालाधन निकला - नही
370 का कुछ हुआ - नही 
समान आचार संहिता का - नही 
राम मंदिर बना - नही
पाक से बात बनी - नही
अमेरिका ने कुछ दिया - नही
इत्ता घूमे माल आया मतलब निवेश - नही
पड़ोसियों से रिश्ते बनें - नही
नेपाल का कुछ - नही
पार्टी में सब खुश है - नही
शिवराज, रमण, वसुंधरा का कुछ - नही
घपले और राज्यों के भ्रष्टाचार का - नही
पर्सन ऑफ़ द ईयर बनें - नही, नही, नही !!!

तो फिर क्या किया
50- 50 पूरी बेशर्मी से जो दुनिया में कही नही हुआ
भक्त पैदा किये
नकली सदस्य बनाये
धमकाया सवाल करने वालो को
छात्रों को बर्बाद किया
आपस में लड़े भिड़े
हम दोनों ने देश चलाया
खूब घूमे फिरे ऐश किये
गाय, बीफ फ़ालतू के मुद्दे उछाले
सबसे ज्यादा कांग्रेस को कोस कोसकर बेवकूफ बनाया
देश के नागरिकों को चूतिया बनाकर लाइन में खड़ा किया 
नकली नोट बन्दी कर अपने आकाओं को फायदा दिया
नजीब को गायब किया 
अखलाख को मारा
कश्मीर में अफजल के रिश्तेदारों के साथ सरकार बनाई
पूर्वोत्तर में पंगे किये 
मप्र में व्यापमं और एनकाउंटर किया
छग में नक्सल के नाम पर आदिवासियों को हकाला, मारा
और अंत में राष्ट्रगीत से मनोरंजन किया 
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मन की बात कार्यक्रम समाप्त हुआ 
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केवल तर्क से बात करने वाले यहां आये, गंवार और भक्त तो बिलकुल नही।

Posts of Dec 4 to 9, 2016 - Bhopal Vijay Bhoge, Delhi , Anil Badnikar and others ......



उस वार्ड में जो भर्ती थे सब मौत का इंतज़ार कर रहे थे, भयावह था वार्ड - मौत मानो चहलकदमी कर रही थी हर बिस्तर के सामने और बिस्तर पर पड़े लोग ख़ौफ़ में थे और हर बार आती जाती मौत को देखकर भयाक्रांत थे.
दूर तक फैले उजाले में मौत के साए से जिंदगी फुसफुसाकर कही दुबक जाने को बेताब थी और लोगों के साथ आये परिजन दुआ कर रहे थे कि यहां कभी ना आना पड़े इसके पहले ही मौत खुलेआम दबोच लें पर यहां आने की नौबत ना आये। अनिल के ठीक पास वाले पलँग पर वह औरत मर गयी आधे घण्टे में, अनिल सारे समय उस बिस्तर को देर रात तक घूरता रहा और आखिर में उसे अंदर ही अंदर ब्लीडिंग चालू हो गई और एक ही दिन में उसी तारीख को रात के दस बजे थे घड़ी में और तीन मिनिट ही ऊपर हुए थे कि अचानक मौत के अट्टाहास ने उसे बेचैन कर दिया और वह खुद ब खुद आहिस्ते से मौत के आगोश में समा गया, मौत की लपलपाती जीभ शांत हो चली थी थोड़ी देर के लिए और अनिल की देह शांत ! वार्ड की गंदगी और लापरवाही को वह बर्दाश्त नही कर पाया।
मेरी बहन, जीजा और बाकी भाई लोग उसकी लाश को उस वार्ड से निकालकर मंदसौर ले जाने की तैयारी कर रहे थे। कोई रोया या नहीं, मैं नही जानता पर सब उस वार्ड से मुक्ति पाना चाह रहे होंगे यह मेरा विश्वास है।
अनिल बदनीकर, तुम बहुत छोटी उम्र में चले गए मेरा दिल्ली से आने का भी इंतज़ार नही किया !
माँ बताती थी कि सबसे छोटी बहन यानि मेरी शोभा मौसी को भी इसी वार्ड ने दबोच लिया था यह वैसा ही भयावह था - जैसा आज है तो फिर सन 1954 से कल 9 दिसम्बर 2016 तक क्या बदला, क्या तरक्की की हमने, क्या व्यवस्था बनाई , सिर्फ मौत को आसान किया है प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल #एमवायइंदौर ने !!! कितना रुपया आया और बर्बाद हो गया , कितनी योजनाएं यह डकार गया पर बदला तो कुछ नही यहां आज भी। यह हमारी नाकामयाबी का क़ुतुब मीनार है और अकर्मण्यता का ताजमहल।
यह मौत नही एक तंत्र के द्वारा की जा रही लोगों के विश्वास और आस्था की हत्या है, यह महंगी पढ़ाई करके आये और मेडिसिन जैसे लोक कल्याणकारी विज्ञान का दुरूपयोग है।
जिम्मेदार लोग ही है - जो यहां ठीक होने दूर दूर से चले आते है।
दुःख है कि घने कोहरे के कारण ट्रेन देरी से आई और इस कारण मैं तुम्हारे अंतिम क्रिया में भी नही पहुँच सका पर अब सिर्फ अफ़सोस ही कर सकता हूँ ।
नमन और श्रद्धांजलि अनिल।
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हिंदी साहित्य में जब आप कुछ नही कर पाते तो गली मोहल्लों में अपनी पुरानी कविता कहानी पढ़ते रहते हो और लौंडे लपाड़े आपको और आपकी महानता को कार में ढोते रहते है और अगली बार मिलने पर आप उन्हें पहचान भी नही पाते कि बेचारों ने स्टेशन से होटल और शहर भर के दारूबाज लोगों के यहां घुमाया था और आखिर में जाते समय आपको अपनी घटिया सी किताब भी पकड़ा दी थी जिसे आपने घर जाकर रद्दी में बेच दिया था, हाँ आपने उन महिला कवियों और कहानीकारों के नम्बर बेशर्मी से मांग लिए थे।
भूल रहे है आप कि आपकी औलादें आपको बोझ मान रही है और बाहर ठेल रही है माह में 20 दिन, और आप अध्यक्षता करते मुगालते में जी रहे हो।
घर में बैठिये जनाब, आपकी लाश पहुंचाने कोई नही जाएगा अब
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जब भाई जैसा यार 1994 के बाद दिल्ली जैसे शहर में समय निकाल कर छुट्टी लेकर गोईला की डेरी यानी इतनी दूर तक मिलने आ जाए तो शुगर का मरीज एक पीस क्या पूरा मिठाई का डिब्बा खा सकता है।
कुलदीप से आज 1994 के बाद मिला, सतना में बी एड के बाद विदा हो रहे थे तो हाजमोला कैंडी दी थी और आज मिठाई, अगली बार जमके खाना खाएंगे भाई और खूब गप्प करेंगे। मज़ा आ गया दिल्ली आना सार्थक हो गया अबकी बार। कुलदीप एक सरकारी स्कूल में बेहद ईमानदारी से पढाते है और इनके बच्चे किसी निजी स्कूल के बच्चों से श्रेष्ठ है। कुलदीप की अपनी लाड़ली बिटिया नेशनल स्तर की एथलीट है जो हम सबके लिए गर्व की बात है।
दुनिया कितनी छोटी और गोल है और हम फिर मिल ही जाते है।
साथ है मित्र सचिन, उत्तम और हरीश



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क्यों रहे इतने शासक, क्यों लड़े इतने बरस
क्यों रहते है इतने लोग, क्या करते है ये लोग
क्यों कवि है, कविता, कहानी और साहित्य यहां पर
क्यों है इतनी दुकानें और क्या बिकता है इनमे
क्यों है गोरे, काले पीले - रंग बिरंगे इतने लोग
जब पूछा बहुतेरों से ये बार बार तो एक जवाब मिला
यह दिल्ली है और दिल्ली दिल वालों को मिलती है
पर हर जगह किले और मजार, अभिलेखागार और स्मारक
क्या दिल्ली होना मजार हो जाना है
क्या दिल्ली होना स्मारक हो जाना है

मैं घर जा रहा हूँ कल सुबह की पहली गाड़ी से 
मुझे नही रहना यहाँ इस दिल्ली में 
जीवन का समाहार दिल्ली नही है।

- संदीप नाईक
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5 Dec 2016 Dainik Bhaskar 

ट्रेन लेट है छः घण्टे करीब। भाई के बेटे के दोस्त का भाभी को फोन आया, जो मात्र 13 साल का है, कि पापा का एक्सीडेंट हो गया है आप तुरंत आओ। जब हम पास के अस्पताल में पहुंचे तो डॉक्टर ने कहा वो मर चुके है। सब 10 मिनिट में खत्म हो गया, वो आदमी नाश्ता करके सब्जी लेने आया था, अटैक आया, गाड़ी से गिरा और खत्म। हम लोग लगे रहे 3- 4 घण्टे आखिर सब कुछ सुलझाकर और माथा फोड़ी करके उसकी लाश को अभी पत्नी और दो छोटे बच्चों सहित अमरावती भिजवाकर आ रहे है। उस भले आदमी को इस भोपाल शहर में कोई जानता नही था और रिश्तेदार भी इतनी दूर आने में परहेज कर रहे थे कैसा होता है मानव मन, स्वभाव और स्वार्थ।
सोच रहा हूँ मेरा क्या रिश्ता था उससे या परिवार से पर उन दोनों बच्चों, उस भली महिला और परिवार के लिए आंसू आ गए जब एम्बुलेंस विदा हुई थी। बुदबुदाता रहा कि इन दोनों बच्चों का भविष्य अच्छा बन जाए और उस महिला में इतनी शक्ति आ जाए कि इस निष्ठुर संसार में वो सब सहकर अपने अबोध बच्चों को पाल लें, पढ़ा लें और काबिल बना दें। आज की स्थिति में उसके पास कुछ नही है, उस आदमी की नौकरी भी निजी कम्पनी में थी, भोपाल में बन रहे फ्लाय ओवर बना रही कम्पनी में था। दुर्दैव क्या यही है ?
सच में इतना रोया हूँ कि बस , उस पर से हमारी पुलिस का रवैया , उफ़ आप समझ सकते है और निजी अस्पताल । सब कुछ लिखना भी त्रासद है !
ऐसी जगह काम मत करो जहां कोई जानता ना हो, या जहां काम करो वहाँ रिश्ते इतने मजबूत बनाकर रखो कि कम से कम एक आदमी आपकी लाश के साथ घर छोड़ने आ जाए ।
उफ़, मौत भयावह है बहुत।
सबकी मदद करते हुए ही जीवन बीत जाए बाकी कुछ नही चाहता, अपने सारे अवगुणों और अड़ियल स्वभाव के बाद भी यह गुण बना रहे इतनी शक्ति बनी रहें, आपकी दुआएँ और स्नेह मेरी ताकत बनी रहें।
(अब स्व विजय महादेव भोगे, 212 एम आई जी, अरविंदविहार, बाग़ मुगलिया, भोपाल मूल निवासी धामनगांव, अमरावती, महाराष्ट्र)
*****
शादी में समय दो पार्टी का और दूल्हा दुल्हन गायब । दोनों ब्यूटी पार्लर में और आये हुए मेहमान मेज़बान को खोजें तो वो भी गायब ।
अरे भाई काहे बुला रखे हो लोगों को जब किसी को समय नही है तो और फिर पत्रिका में क्यों लिख दिया समय ? लिखो ना कि आ जाना तुम लोग टाइम पर - हम मिले ना मिले, खाना मिले या ना मिले, लिफाफा और गिफ्ट किसी को पकड़ाकर या देकर, भले ही बगैर मिलें चले जाना, हम सब लोग तो ब्यूटीपार्लर में व्यस्त रहेंगे।
भाई आपके जीवन का महत्वपूर्ण दिन है पर हजार मेहमानों का क्या दोष जो ठंड में खड़े कुड़कुड़ा रहे है और दुआओं के बदले गलियां रहे है।


Saturday, December 3, 2016

Posts of 2 Dec 2016



उज्जवला योजना के तहत बांटे गए गैस कनेक्शन के लिए माननीय प्रधानमंत्री जी, भारत सरकार, के अनुसार गैस कंपनियां विज्ञापन सीखा रही है कि गैस चूल्हे और टंकी के इस्तेमाल में क्या क्या सावधानियां रखनी है। अच्छा विज्ञापन है बहुत बारीकी से बनाया गया है, मैंने भी सीखा इससे बहुत कुछ।
बस बता रहा हूँ कि 21 वी सदी के डिजिटल इंडिया में हम कहाँ से अभी शुरुवात कर रहे है ;-
शौचालय के इस्तेमाल से

गैस के चूल्हे और टंकी के इस्तेमाल से
जैविक खाद के इस्तेमाल से
कचरा सही जगह कैसे फेंके 
लाईंन में खड़े कैसे हो 
बैंक अकाउंट खोलना और इस्तेमाल करना
आधार कार्ड बनवाने से 
भ्र्ष्टाचार रोकना
देशप्रेम/देश भक्ति को सिनेमागृह में खड़े होकर सीखना

कुल मिलाकर ई ट्रांजेक्शन, ई वॉलेट और ई ट्रांसफर करने में अभी एक युग लगेगा 125 करोड़ लोगों को और तब तक हमारे शिक्षक विहीन स्कूल नए करोड़ों निरक्षर पैदा कर देंगे.
थोड़ा शान्ति से सोचिये नीतिकारों , पैरवीकारों और मेरे महान भारत भाग्य विधाताओं !
जय है, जय है, जय - जय, जय है।
भारत माता की जय ।
1947 से अभी तक जो भी सरकार सत्ता में रही वे सब इस पाप में संयुक्त रूप से शामिल है, आज की सरकार को दोष देना व्यर्थ है।

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क्या कहूँ शब्द नही है इतना प्रासंगिक प्रसंग और बेहद मर्मस्पर्शी आख्यान ना देखा, ना सुना और ना पढ़ा।

आप सबसे आज तक कोई निवेदन नही किया आज देशहित में कर रहा हूँ। बेहद शांत चित्त और धीर गम्भीर होकर इस क्षणिका को देखें समझे और विचारें।

video


Friday, December 2, 2016

For you Gaurav Pande, IIT Indore



अनुज गौरव के लिए दुष्यंत कुमार की एक महत्वपूर्ण रचना, इस भरोसे के साथ कि हम सब एक ही नाव में है और हम साथ साथ है......
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हम पराजित हैं मगर लज्जित नहीं हैं
हमें खुद पर नहीं
उन पर हँसी आती है
हम निहत्थों को जिन्होंने हराया
अंधेरे व्यक्तिव को अन्धी गुफ़ाओं में
रोशनी का आसरा देकर
बड़ी आयोजना के साथ पहुँचाया
और अपने ही घरों में कैद करके कहा :
"लो तुम्हें आज़ाद करते हैं ।"

आह !
वातावरण में वेहद घुटन है
सब अंधेरे में सिमट आओ
और सट जाओ
और जितने जा सको उतने निकट आओ
हम यहाँ से राह खोजेंगे ।

- स्व दुष्यंत कुमार (आवाजों के घेरे संग्रह से)
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मुक्तिबोध को याद करते हुए "अँधेरे में" 
गौरव के लिए 
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ज़िन्दगी के...
कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार;
आवाज़ पैरों की देती है सुनाई 
बार-बार....बार-बार, 
वह नहीं दीखता... नहीं ही दीखता, 
किन्तु वह रहा घूम 
तिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक, 
भीत-पार आती हुई पास से, 
गहन रहस्यमय अन्धकार ध्वनि-सा 
अस्तित्व जनाता
अनिवार कोई एक,
और मेरे हृदय की धक्-धक् 
पूछती है--वह कौन 
सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई ! 
इतने में अकस्मात गिरते हैं भीतर से 
फूले हुए पलस्तर, 
खिरती है चूने-भरी रेत 
खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह-- 
ख़ुद-ब-ख़ुद 
कोई बड़ा चेहरा बन जाता है, 
स्वयमपि 
मुख बन जाता है दिवाल पर, 
नुकीली नाक और 
भव्य ललाट है, 
दृढ़ हनु 
कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति। 
कौन वह दिखाई जो देता, पर 
नहीं जाना जाता है !! 
कौन मनु ?

बाहर शहर के, पहाड़ी के उस पार, तालाब... 
अँधेरा सब ओर, 
निस्तब्ध जल, 
पर, भीतर से उभरती है सहसा 
सलिल के तम-श्याम शीशे में कोई श्वेत आकृति 
कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फैल जाता है 
और मुसकाता है, 
पहचान बताता है, 
किन्तु, मैं हतप्रभ, 
नहीं वह समझ में आता।

अरे ! अरे !! 
तालाब के आस-पास अँधेरे में वन-वृक्ष 
चमक-चमक उठते हैं हरे-हरे अचानक 
वृक्षों के शीशे पर नाच-नाच उठती हैं बिजलियाँ, 
शाखाएँ, डालियाँ झूमकर झपटकर 
चीख़, एक दूसरे पर पटकती हैं सिर कि अकस्मात्-- 
वृक्षों के अँधेरे में छिपी हुई किसी एक 
तिलस्मी खोह का शिला-द्वार 
खुलता है धड़ से 
........................ 
घुसती है लाल-लाल मशाल अजीब-सी 
अन्तराल-विवर के तम में 
लाल-लाल कुहरा, 
कुहरे में, सामने, रक्तालोक-स्नात पुरुष एक, 
रहस्य साक्षात् !!

तेजो प्रभामय उसका ललाट देख 
मेरे अंग-अंग में अजीब एक थरथर 
गौरवर्ण, दीप्त-दृग, सौम्य-मुख 
सम्भावित स्नेह-सा प्रिय-रूप देखकर 
विलक्षण शंका, 
भव्य आजानुभुज देखते ही साक्षात् 
गहन एक संदेह।

वह रहस्यमय व्यक्ति 
अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है 
पूर्ण अवस्था वह 
निज-सम्भावनाओं, निहित प्रभावों, प्रतिमाओं की, 
मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव, 
हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह, 
आत्मा की प्रतिमा। 
प्रश्न थे गम्भीर, शायद ख़तरनाक भी, 
इसी लिए बाहर के गुंजान 
जंगलों से आती हुई हवा ने 
फूँक मार एकाएक मशाल ही बुझा दी- 
कि मुझको यों अँधेरे में पकड़कर 
मौत की सज़ा दी !

किसी काले डैश की घनी काली पट्टी ही 
आँखों में बँध गयी, 
किसी खड़ी पाई की सूली पर मैं टाँग दिया गया, 
किसी शून्य बिन्दु के अँधियारे खड्डे में 
गिरा दिया गया मैं
अचेतन स्थिति में !

Thursday, December 1, 2016

Posts of 1 Dec 16



#वित्त_मंत्रालय की गाइड लाईंन के अनुसार कल से फेस बुक पर कमेंट और लाईक की सीमा तय की गयी है
विवाहित पुरुष 2 कमेंट और 5 लाईक
विवाहित महिला 5 कमेंट 50 लाईक
अविवाहित पुरुष 5 कमेंट और 100 लाईक
अविवाहित महिला 25 कमेंट और 150 लाईक
युवा सिंगल पुरुष 50 कमेंट और 300 लाईक
युवा सिंगल महिला 100 कमेंट और 1000 लाईक
बेरोजगार लोग 24X7 कमेंट और लाईक ना करने पर फेसबुक से ब्लॉक।
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पुरुष कवि मात्र 2 कविता पेलेंगे 
महिला कवि अधिकतम 25 कविता 
और सभी को महिला कवियों पर लाईक कमेंट अनिवार्य अन्यथा देशद्रोह में अंदर किया किया जा सकता है। 
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ज्ञानी और विद्वान मात्र 4 ब्लॉग के लिंक और अखबार की कतरनें या लिंक लगा सकते है
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बुद्धिजीवी ज्यादा से ज्यादा 3 पोस्ट में ज्ञान बघारेंगे 
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सनद रहे

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लेपटॉप बाबा के आश्रम "कबीर कुल" में दो जिज्ञासु बालक Shubham Vaidya Akshay Pathak
पानी को लेकर ये दोनों युवा साथी नया प्रकल्प शुरू कर रहे है जो अपने तरह का अनूठा काम है। जापान की केंगन तकनीक को प्रदेश में पहली बार इंदौर से शुरू किया है। कल प्रत्यक्ष प्रमाण देखें और पाया कि यह पानी आर ओ या अन्य फिल्टर्स से बेहतर है।
एक बात जो ज्यादा अपील की मुझे कि आप नल का पानी पी लें, परम्परागत स्रोतों से मिलने वाला पानी पी लें या प्लेटफॉर्म से पी लें पर बिसलरी या अन्य ना पीयें और सॉफ्ट ड्रिंक्स तो कदापि नही।
चूंकि अब शीतल पेय की मार्केटिंग शुरू होगी ऐसे में ये दोनों प्रतिभाशाली युवा इंजीनियर कुछ सार्थक काम पानी को लेकर कर रहे है - यह अच्छा लगा।

Saturday, November 26, 2016

लेपटॉप बाबा के आश्रम "कबीर कुल" में पत्रकार Navodit Shaktavat



लेपटॉप बाबा के आश्रम "कबीर कुल" में पत्रकार Navodit Saktawat
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भाषा और समझ के स्तर पर पत्रकार होना और व्यक्ति, भाषा, दुनियावी समझ के साथ धर्म, राजनीति और व्यवहार के स्तर पर पत्रकार होना एकदम भिन्न है। संगीत की अदभुत जानकारी, माइकल जैक्सन से लेकर कर्कश कुमार उर्फ किशोर कुमार , लता मंगेशकर और बाकी सबके बारे में तर्क और विश्लेषण करने वाले नवोदित इन दिनों इंदौर में काम कर रहे है। जीवन की दूसरी नौकरी करने वाले इस युवा की दुनिया, साहित्य और मीडिया को लेकर गहरी पैठ और समझ है। वे कहते है कि बार बार नौकरी बदलना भी एक तरह का प्रोफेशनल प्रोसटीट्यूशन है इसलिए बारह साल भास्कर में काम किया और अब नईदुनिया जागरण में संतुलन बनाकर नौकरी कर रहे है।
पिछले तीन चार वर्षों से इस आभासी दुनिया में दोस्ती थी पर मिलना आज हुआ जब वो घर आये और बहुत तसल्ली से देर तक अनुभव बाँटते रहे बतियाते रहे। राजनीति पर आकर बातचीत ख़त्म तो नही पर आगे मिलने और विस्तृत विश्लेषण के वादे पर रुकी। जाते समय मेरे कमरे की तारीफ़ इतनी की और फोटो खींचे कि मैं लगभग शर्मिंदा हो गया और इतना ही कहा कि अपनी जरूरतों का सामान भर है और जैसे तैसे सफाई कर लेता हूँ कभी खुद कभी किसी की मदद से बाकि तो कुछ लक्ज़री नही है। पर नवोदित को यह "कबीर कुल" अच्छा लगा, मैंने भी कह दिया जब मन करें यहां आ जाना यह जगह सबके लिए है और आओगे तो अच्छा लगेगा। आज हम दोनों ने अपने कार्य क्षेत्र से लेकर निजी जीवन के दुख दर्द भी बांटे तो समझ आया कि हम सब लोग बहुत संघर्ष कर आये है और शायद हम अब सोचते है तो विश्वास भी नही होता कि ये सब दास्ताँ इतनी पीड़ादायी थी और फिर भी हम कर गुजरे।

शुक्रिया नवोदित, जो तुमने जो कहा था याद रहेगा कि हम कमजोर के साथ पूरी विनम्रता के साथ है हमेशा, पर अक्खड़, गंवार, चतुर और धूर्त को जब तक ध्वस्त ना कर देंगे तब तक चैन से नही रहेंगे। राजनीति में लोग कभी अच्छे हो ही नही सकते - चाहें ये हो या वो और हमें दो खराब में से थोड़े बेहतर को चुनना है, बस - बाकि सबका कोई अर्थ नही है, इसलिए हम जहां है वही से उसके साथ खड़े हो जो उपेक्षित और दुखियारा है और सबके जुल्मों का मारा है।