Sunday, January 14, 2018

Supreme Court and 13 Jan 2018

Disgusting Incident happened in Supreme Court of India on 13 Jan 2018

मुझे लगता है यह मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ बगावत है और एक सही कदम
4 जजों ने कहा कि 20 साल बाद हमें दोषी ना करार ना दिया जाएं कि आपने अपना काम सही नही किया। दीपक मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट में तानाशाही मचा रखी है और अपनी मन मर्जी से वे फैसले ले रहे है और जनहित को परे रखकर काम करते है जोकि संविधान की मूल आत्मा और न्याय के संगत नही है।
वरिष्ठ वकील शांतिभूषण जी ने इनके शपथ ग्रहण के पूर्व ही इनके कथित कारनामों का चिठ्ठा द वायर में खोला था।
बहुत महत्वपूर्ण स्थिति में एक साथ 4 विद्वान न्यायाधीशों ने आकर जिस तरह से बगावत का बिगुल फूंका है वह दर्शाता है कि देश सच मे इस समय भयानक संकट में है।
महामहिम राष्ट्रपति जी के लिए यह फैसले की घड़ी है जब वे तुरंत कार्यवाही कर देश को इस संकट से निजात दिलवाए।
पिछले छह माहों में आये फैसलों से यह स्पष्ट विदित होता है कि न्याय की स्थिति और सम्पूर्ण न्यायपालिका की स्थिति बहुत गम्भीर है और जिस तरह से अपराधियों और हिस्ट्री शीटर लोगों को बचाया जा रहा है, विचारधारा और व्यक्ति विशेष के दबाव में कुछ खास वर्ग के हितों में निर्णय लिए जा रहे है वह आम आदमी और देश के नागरिकों के लिए बड़ा खतरा है।
देश बदल रहा है। मैं इन 4 न्यायाधीशों का समर्थन करता हूँ और उनके इस कदम की सराहना करता हूँ.
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साढ़े तीन साल में देश के संवैधानिक प्रधानमंत्री ने कोई प्रेस वार्ता नही की जबकि मन की बात से लेकर मीडिया को पिछले दरवाज़े से ज्ञान गणित बहुत दिया ।
आज देश के चार योग्य, पढ़े लिखे, अनुभवी और दीर्घ कालीन प्रशासनिक अनुभव रखने वाले चार जजेस ने जो आरोप लोकतंत्र को लेकर लगाए है तो जाहिर है कि लोकतंत्र के मुखिया को हम सब आज प्रेस से खुले और मुक्त दिमाग़ से बात करते हुए देखना समझना चाहते है।
यह उनके , देश और न्यायपालिका के हक़ में होगा ताकि एक गरीब आदमी की आस्था ना टूटे और भरोसा कायम रहें। यदि अब प्रधानमंत्री जी सामने आकर प्रेस के साथ बगैर पूर्वाग्रह से बात नही करते तो उन पर से भी भरोसा उठ जाएगा। यह नितांत जरूरी ही नही बल्कि आवश्यक है क्योंकि महामहिम राष्ट्रपति जी की ओर से कोई ऐसी सम्भावना नजर नही आ रही, क्योकि उनकी स्थिति से हम सब अवगत ही है।
प्रेस से बात ना करना पूरी मीडिया और जनभावनाओं का सार्वजनिक अपमान है। हमें मालूम है कि रविश कुमार से बात करने की हिम्मत नही आपकी पर और लोग भी है विदेशी मीडिया भी है जिसकी समझ मे आप अवतार है ही।
आज आप हिम्मत करिये और शाम को 7 बजे या कल सुबह पूरे देश के सामने प्रेस से लाइव बात करिये, यह सिर्फ जस्टिस लोया के हत्यारों को बचाने की बात नही बल्कि हम सबकी भावनाओं, आस्थाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के अक्षुण्णता की भी बात है।
यह निवेदन मैं बगैर किसी पूर्वाग्रह या विचारधारा के तहत नही बल्कि इस देश के जिम्मेदार और संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति के तहत और सूचना के अधिकार कानून के तहत जानना चाहता हूँ कि आखिर क्यों ऐसी नौबत आई कि एक नही चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों को जनता के सामने, मीडिया के सामने आकर 7 पृष्ठ की पीड़ा जारी करना पड़ी कि देश मे कुछ भी ठीक नही चल रहा। मैं दुखी हूँ और आहत हूँ क्योकि न्यायपालिका के निर्णयों से नीतियां प्रभावित होती है जो मेरे जीवन पर सीधा असर डालती है।
आशा है आप इस नम्र निवेदन को स्वीकार करेंगें।

Thursday, January 11, 2018

देहलिपि से बाहर 9 Jan 2018


देहलिपि से बाहर 

(दिल्ली पुस्तक मेला 6 से 14 जनवरी 2018 के बहाने कुछ अवलोकन) 


वहां किताबों की खुशबू में रंग था और मासूम सा प्यार, सारी जगहों पर नए कोरे पृष्ठ खोले जा रहे थे, बहुत आहिस्ते से जेब टटोलते और अपने बटुए को सम्हालते हाथों की उंगलियां नास पुटों से उस खुशबू को सूंघ रही थी और हर पन्ना पलटने पर हर्फ़ उचक कर उस हरे कार्पेट पर गिर गिर पड़ रहे थे मानो लेखक की कल्पना से होकर शब्दों, महीन, वाक्यों और पृष्ठों से सजिल्द होती किताबों से बाहर आकर अपनी दास्ताँ सुनाने को बेचैन हो। यह पाठक से रूमानी इश्क था जो बरबस हर जगह नजर आ रहा था। हॉल के बाहर भवन उजाड़े जा रहे थे प्रगति मैदान के गोया कि अब वहाँ सिर्फ किताबों के घर बनेंगे और उनमें प्यार करने वाले अपनी माशूकानुमा किताबों के साथ रहकर ताउम्र शब्द संधान करते हुए जीवन का वितान रचेंगे।

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बिक्री का हाल बेहाल और तिस पर कवियों की किताबों का हाल और भी खतरनाक
मित्र Kavita Verma ने मेरे सामने पुस्तक मेले के एक स्टॉल से 80 रुपये की कोई किताब खरीदी। उसे उस भले प्रकाशक ने एक कवि की किताब निशुल्क पकड़ा दी हार्ड बाउंड और कीमत थी 225/ रुपये मात्र
हे हिंदी के सुजान कवि, रवि की जगह कही भी बगैर बुलाये पहुंच जाने वाले और नितांत गैर उपयोगी ऐसा कचरा जेब से रूपया खर्च कर अपनी किताब छपवाने का ऐसा क्या मोह ? इतनी दुर्गति प्रकाशक कर दें कि नरक भी ना मिले तो क्यों अपनी इज्जत बाजार में उतरवा रहा है !
साल के बीच में कोई प्रतियोगिता करो कहानी -कविता की बच्चों की तरह से और देश भर से प्रविष्टियां बुलवाओ लोगबाग भेजेंगे 7- 8 पेज लिखकर या टाइपकर- बस उसके बाद तीन चार महीने चुप रहो , लेखक बेचारा फोन कर करके पूछेगा कि क्या हुआ - क्या हुआ , परंतु कोई जवाब ना दो।
पुस्तक मेले का मौसम आते ही लेखक को फोन करो कि आ जाओ भैया पहले ही दिन, तुम्हें खास पुरस्कार के लिए चुना गया है । गांव कस्बे का ईमानदार लेखक अपने साथ अपने चुनिंदा 4-5 दोस्तों और औलाद को लेकर मेला पहुंचता है। जाने के पहले प्रेस न्यूज भी देता है कि अब वह बड़ा लेखक है - दिल्ली बुलाया है।
दौड़ते-भागते कोहरे से जूझता हुआ वह भूखा- प्यासा, ट्रेन की लेटलतीफी सहते , अपनी जेब से रुपया लगा कर ट्राफिक कूदकर जैसे तैसे मेला ग्राउंड के लेखक मंच पर पहुंचता है तो वह पाता है कि वहां चार ज्ञानी बैठकर भाषण दे रहे हैं । एक सजी-संवरी महिला संचालन में निबद्व है और सामने बेचारे मेले में घूमकर थके-हारे लोग बैठे हैं ।
वह अपनी संस्था और पोर्टल के बारे में डेढ़ घंटा बोलती है और फिर मंच के ज्ञानी पेलते है भयानक मानो सामने मूर्खों की जमात बैठी है। इसके बाद उद्घोषणा होती है कि लेखकों को पुरस्कृत कर रहे हैं भद्र महिला पंक्तिबद्ध लेखक लेखिकाओं के नाम पुकारती है , कुछ आते हैं और 10 -12 - 15 अनुपस्थित हैं ।
जो पुरस्कृत होने आए हैं, उन्हें कोई जानता नहीं, उनको बैठने के लिए नहीं कहा जाता , उनके लिए कुर्सी नहीं, पानी का नहीं पूछते , एक कोने में चाय का टेबल है टूटी टाँग का - जिस पर फ्रिज में रखी ठंडी चाय है , मांगने जाओ तो वह कहता है गिलास खत्म हो गए।
लेखक का नाम पुकारा जाता है वह आगे बढ़ता है और किसी ग्रामीण पाठशाला में दिए जाने वाला एक प्रतीक चिन्ह पकड़ा दिया जाता है - एक घटिया सा कप - जिस पर महज दो ही दिन में जंग लग जाएं। जिसकी बाजारु कीमत ₹50 से ज्यादा ना हो , प्रमाणपत्र नही, नगद राशि नहीं , कोई किताब नहीं , शॉल नही , श्रीफ़ल नही। साथ आये दोस्त मोबाइल से फोटू हिंचते है और खड़े रहते है भीड़ में अपमानित महसूसते हुए पर क्या बोलें दोस्त है अपना यार !
किस डाक्टर ने लिखकर दिया था बे कि ये उलजुलूल हरकतें करो कमीनों। अबे मूर्खों की जमात के चूतियों क्यों साहित्य की धज्जियां उड़ा रहे हो - अपनी नही तो, उस लेखक की तो कदर करो - एक इंसान की कद्र करो जो तुम्हारे एक फोन पर दिल्ली दौड़ा चला आया। शर्म आती है तुम्हे या नही ?
जितना बड़ा नाम था डाक्टर शाहनी या चोपड़ा टाईप वो तो छोड़ो तुम तो खुद साले साहित्य के भगन्दर बवासीर हो।
खबरदार जो आगे से ऐसे झांसे में किसी गरीब लेखक को रखा तो नाम उजागर कर खटिया खड़ी कर दूंगा ससुरों।
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हिंदी उर्दू पंजाबी मलयाली तमिल और मैथिली मचान भी गया। मजा आया अच्छा लगा कि साहित्य बिक रहा है। विज्ञान प्रयोग की किताबें भी और वो टुच्चे किट भी जो बाबा आदम के जमाने मे बबुल के काँटे से विच्छेदन की क्रीड़ा मयी प्रक्रियाएं सीखाते थे - गांव देहात के बच्चों को फिर एक सरफिरे राजनेता ने बला की खबसूरत प्रशासनिक अधिकारी के कहने में आकर उस एनजीओ की दुकान उठवा दी और वो अब एक अनुवादक घर मे सिमट गया है। उसकी दुकान पर खिलौने और जुगाडू लोगों की भीड़ है पीछे शिक्षा में आई टी के नाम पर भौंडे तरीकों से ए बी सी डी के गानों और कम्प्यूटर सिखाने वालों की दुकान है।
आगे बढिये भगवा , सफेद चोलों में अपनी देहयष्टि को छुपाती बहनों की जमात है जो तमाम तरह के बाबाओं, बहनजियों के फोटो, अंगवस्त्र, अगरबत्ती, पूजन सामग्री और उनके लिखे बकवासी प्रवचनों की दुकान पर ले जाएगी। प्यार से भरी कातिल मुस्कानों में आपका मोबाइल लेकर गूगल प्लेस्टोर से एप डाऊनलोड करवा देगी और आपका मेल आई डी लेकर तुरन्त यूट्यूब पर सदस्य बनवा देगी। ये भगिनियाँ निवेदिता से थोड़ी ज्यादा दक्ष और विदुषी है किसी बड़े गायक की भौंडी आवाज वाली बेटी की तरह या किसी मरे हुए बड़े साहित्यकार की बेटी की तरह जो आज भी उसके नाम को कूट कूटकर भुनाती है और ट्रांसफर नही होने देती अपना शहर से।
सामने तमाम आध्यात्मिक जगत गुरु है और फादर मदर है, मुल्ले है , पण्डित है , संघी है, वामी है और समाजवादी है। दलितों के मसीहा तो स्वयं उपस्थित है और बौद्धलामा अपनी कुटिल मुस्कान के साथ हाजिर है बुद्ध की फ्री किताब बांटते हुए। बाहर शीत में कोहरे में काँपता एक युवा पादरी बल्कि काला पादरी और नया मुल्ला लड़कियों को ताड़ते हुए फ्री में कुरान और बाइबिल के नए - पुराने नियम हिंदी -अँग्रेजी में लेकर खड़ा बाँट रहा है -आपको क्या चाहिए ?विकल्प और भी है -गुरुजी का जीवन या सत्यार्थ प्रकाश ?
हाँ बापू जेल में है तो क्या उनकी दिव्य दृष्टि मेले में उनके भक्तों को मैला खोज के दे ही देगी। सवाल यह है कि प्रकाशक को जगह नही बेचारा थोड़ी सी जगह में कूच काचकर किताबों की नुमाइश कर रहा है पर ये सांस्कृतिक देश अपना परलोक सुधार रहा है।
भीड़ इधर नही उधर है ।
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कुछ काग भुशुण्डी और बौद्धिकता के अभेद किले दिल्ली में विचरते हुए देश दुनिया के न्यून बुद्धि के लोगों को अपनी घटिया पोथी थमा रहे है 700 -800 रुपये में - यह कहकर कि "ले लो मियाँ यह काम इतिहास में अभी तक किसी ने नही किया", सनद रहे कि तीन चार लाख खर्च करके, बेशकीमती समय खर्च कर ये दिमाग़ी मवाद बहाने वाला ग्रंथ जुगाड़ और सेटिंग से आया है।
यह नही बताते कि सरकारी एल टी ए लेकर छुट्टियां खपाकर यहाँ वहाँ से जुगाड़ कर अपनी लोकतांत्रिक गैर जिम्मेदारी वाली दुनियावी प्रतिबद्धता से अनामदास का पोथा रच बैठे हो और दिनभर न्यून बुद्धि के पाठक जुगाड़कर प्रकाशक से रॉयल्टी की खेप सुनिश्चित करवा रहे हो।
अगला भी ले लेता है बेचारा - क्योंकि यारबाश है और कभी दारू के ठेके पे संगी साथी रहा था वरना तो वो एक अध्याय तो क्या एक पृष्ठ को भी समझ लें तो हिंदी के लोग अँधेरे से निकल कर वयम रक्षामहै पढ़ लें । शायद यह पोथा उसकी आलमारी से हाथों की उंगलियों और मुंह के थूक से पलटे जाने वाले पन्नें तरस जाएंगे।
फिर भी कह लेने दो कि लहूलुहान नजारों का जिक्र आया तो शरीफ लोग उठे और एक तरफ बैठ गए।

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पुस्तक मेले में जाना और लोगों से मिलना मुझे सबसे ज्यादा भाता है। किताबों का व्यवसाय अपनी जगह पर अपने लोगों से मिलना बहुत ही सार्थक और ऊर्जावान होना होता है।
कवि , आलोचक और प्राध्यापक डाक्टर जितेंद्र श्रीवास्तव जब पुस्तक मेले में आते है तो उनके साथ उनके युवा शोधार्थी भी होते है साथ। जितेंद्र और युवा मित्रों के साथ स्टाल दर स्टाल घूमना, प्रकाशकों से एक अलग तरह की आपुलकी से मिलना, नई किताबों पर बात करना बहुत रोचक, शैक्षिक होता है। यह एक अलग तरह से देखने समझने का नजरिया विकसित करता है जो किताबों के छपने की कथा और उसके भविष्य की दास्तान सुनने जैसा होता है। विषय और उसकी सामयिकता , दर्शन और विविधता पर लम्बी बात होती है विशुद्ध अकादमिक तरीके से।
पिछले पांच छह वर्षों में अरुण पांडे, शम्भू मिश्र, शिवा वावलकर , रेखा, मोहित मिश्र से लेकर कई युवा मित्रों को बढ़ते हुए देखा - छात्र से शोधार्थी, और फिर महाविद्यालय या विश्व विद्यालय में अध्यापन का दायित्व सम्हालते देखा। कुछ घर गृहस्थी में भी आ गए । अच्छा यह है कि ये सभी मेघावी, गहरी समझ वाले बहुत प्यार करने वाले है जो सालभर फोन से सतत सम्पर्क बनाये रखते है । ये सब अब मेरे जीवन का हिस्सा है , ताकत है और इनसे सीखा जाता है अब।
यह सिर्फ इसलिये कि अनुज Jitendra Srivastava बहुत सम्मान देते है - सिर्फ मुझे ही नही बल्कि हर उस शख्स को जो साहित्य से सरोकार रखता है , छोटे से छोटे व्यक्ति या बी ए पढ़ने वाले छात्र को-बहुत प्यार से कहेंगे -मैदान गढ़ी आओ, कोई मदद की जरूरत हो तो बताना दिल्ली में।
वे मूल रूप से सांगठनिक व्यक्ति है - इग्नू में पढ़ने पढ़ाने के अलावा देश भर में निरंतर यात्राएं करते है और सबसे सम्पर्क बनाये रखते है। मैंने अपने जीवन मे जितेंद्र जैसे जीवट आदमी को नही देखा जो इतना सब एक ही जीवन मे कर लें। जैसे अभी कल्पना प्रकाशन से प्रेमचंद समग्र किताब आई है विशालकाय ग्रंथ है। प्रेमचंद जैसे व्यक्ति की सम्पूर्ण 297 कहानियां एक जगह लाकर 45 पेज की समालोचनात्मक टिप्पणी भी लिख लें, प्रकाशक को छापने के लिए राजी भी कर लें -यह एक ऐतिहासिक कार्य है, यह जितेंद्र जैसे ऊर्जावान व्यक्ति के ही बस की बात है। इसी के साथ प्रांजल धर के साथ साथ कई पुरस्कार समितियों का निर्णायक मंडल, पी एच डी की थीसिस जांचना समय सीमा में और वायवा के लिए जाना यह सब अलग है जो मैं गिना नही रहा। घर की दो किशोर बेटियों को पढ़ाई में मदद करना और फिर पत्नी, प्रेम कविताओं की बात !
इसलिए मैं जितेंद्र और उनके सभी युवा छात्रों को विलक्षण मानता हूँ। Shiva Wavalkar की एक किताब अभी आई, एक अभी प्रेस में है। भाई शिवा ने मुझसे हर हाल में एक 12 -13 पेज का आलेख अपनी आने वाली किताब के लिए लिखवा लिया - वरना मैं तो उन्हें लगातार झांसे दिए जा रहा था,मेरे जैसा महा आलसी क्या अकादमिक लेख लिखता पर यह शिवा का ही डर था और आग्रह कि आखिर माट साब को होमवर्क करके देना पड़ा, मेरी वजह से बहुत लेट हुआ उसकी माफी भी मांगता हूं भाई शिवा से।
खैर , मैं जब तक यायावरी कर पाऊंगा तब तक इन जैसे मित्रों से मिलने, बहुत गम्भीर और प्रतिबद्ध प्रकाशकों से मिलने और किताब की दुनिया समझने पुस्तक मेलों में जाता रहूँगा।
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कुछ लोग ऐसे होते है जिनसे आप बहुत ही सहज रूप से मिलते है मानो एक परिवार के सगे लोगों से मिल रहे हो। यह मिलाप ठीक वैसा है जैसे दीवाली होली पर पुरे कुनबे का इकठ्ठा होना।
रमेश उपाध्याय जी और उनके परिवार से पुस्तक मेले में मिलकर लगता है कि नवरात्रि में अपने खानदान की देवी "अष्टमी" पर पूजकर लौट आये हो सबसे मिलकर। रमेश जी बड़े कहानीकार और चिंतक है पर जिस अपनत्व और सहजता से गले लगकर स्नेह दर्शाते हैं वह अतुलनीय है। उनकी दोनो बेटियां भी विदुषी है बेटा अंकित भी एकदम नेक इंसान। दामाद भी अपने घर गांव के दामाद जैसे है ।
ये मेले में जाकर मिलने का ही नही बल्कि सालभर प्रज्ञा की कहानियां पढ़ना, टिप्पणी करना एक आदत है, दिल्ली जैसे शहर में गूदड़ बस्ती लिखना कितना जोखिम का काम है और कितनी सघन अनुभूति का भी यह प्रज्ञा से ज़्यादा कौन जानता होगा जो कॉलेज में पढ़ाती है घर सम्हालती है और रेडियो पर भी नियमित जाती है । संज्ञा के श्वेत श्याम चित्र देखना सुकून देता है जब वो पत्तों से गिरती बूंद को क्लिक करती है तो चित्र बोल उठता है। अंकित का चुपके से मेरी किसी पोस्ट पर आकर लाईक कर जाना या राकेश का प्रज्ञा को प्रोत्साहित करते कोई पोस्ट लगाना या गम्भीर कमेंट। 
हमेशा मिलने पर मैं सबसे चुहल करता हूँ कभी कहता हूँ वो लड्डू कहां है , कभी संज्ञा से मजाक पर हम सब एक वृहद परिवार के हिस्से है तो लगता ही नही कि कोई औपचारिक रिश्ता है।
ये सब हमेशा एक रहते है प्रज्ञा की और हम सबकी लाड़ली बिटिया तान्या की बड़ी होती दुनिया को देखकर उसके लिए एक जीने लायक दुनिया बनाने की कोशिश कर रहे है। साथ रहते है छोटी छोटी चीजों की खुशियां मनाते है साल में ये घूमने जाते है। बस यही संयुक्तपन ताउम्र बना रहे और सारी दुनिया को घर बुलाकर बढिया से बात करते रहै , खाना खिलाते रहै !!! दिल्ली जैसे बेदर्द शहर में ऐसे बिरले लोग देखें आपने , नही ना ? यही मुझ जैसे मानवीयता के गुणों को जीवन मे अपनाने वालो को खोजने और समझने में मदद करता है और रोज इंसानियत में विश्वास पुख्ता करता है।
आप सबके लिए आकाश भर प्यार और दुआएँ - रमेश जी, आंटी जी, Pragya RohiniSangya Upadhyaya Ankit Upadhyaya Rakesh Kumar
प्रज्ञा की टिप्पणी - (Pragya Rohini हम सब एक रचनात्मक परिवार का ही हिस्सा हैं और पहली बार मिलना तो कहीं बीच मे आया ही नहीं। लगातार एक दूसरे को जानते रहे हैं इसीलिये मिलने पर खूब गर्मजोशी रही। आपके संग बहादुर पटेल जी और मनीष जी से भी मिले। जैसा आपकी पोस्ट देखा करते थे उससे बीस ही पाया क्या ज़िंदादिली और क्या उत्साह। सच कहूँ आपकी इस पोस्ट ने भावुक कर दिया है। हमारे परिवार के एक एक व्यक्ति को कितना पढ़ा और समझा है आपने। यकीन जानिए लौटकर आपने अपने घर और सुकून का जो चित्र लगाया मैं देर तक पैरों में थकान के चिन्ह ढूंढ रही थी। आपसे मिलकर अच्छा लगा कहना बहुत बहुत नाकाफी होगा और जो काफी है उसके लिये शब्द नहीं सिर्फ मेरी भावनाएं हैं )

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आज से 22 बरस पूर्व हंस में एक कहानी पढ़ी थी "झौआ बेहार" . आदत थी कि एक पोस्ट कार्ड लेखक को लिखता था अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कि यह ठीक है या अच्छी लगी या गड़बड़ है मजा नही आया.
कहानी जोरदार थी और उस समय के संस्कारों के हिसाब से गजब की भाषा और दृश्य का विवरण देते हुए लेखक ने तत्कालीन बिहार का मजेदार तानाबाना बुना था. लिहाजा चिठ्ठी लिखी गई कहानीकार को जो भागलपुर के किसी टी एन बी कॉलेज में हिंदी पढ़ाते थे. 
बिनय सौरभ भी इसी प्रक्रिया से गहरे दोस्त बने -वह कहानी फिर कभी, खैर इन भागलपुर के कॉलेज वाले माट साब का भी जवाब आया और बात आई गई हो गयी जैसाकि हिंदी में होता है. तब ना मोबाईल था ना फोन और चिठ्टी लिखने के लायक इतने रूपये नहीं होते थे कि साला रोज़ लेखक को प्रेम पत्र लिखा जाएँ.

खैर, थोड़े दिन बाद लेखक महाशय का पत्र आया, मेरी "पश्यन्त्ति" में कहानी छपी थी, फिर हंस में सात आठ पेज की समीक्षा छपी थी - स्व. शंकर गुहा नियोगी पर डाक्टर अनिल सदगोपाल और स्व श्याम बहादुर नम्र द्वारा लिखी गई किताब की तो - इन लेखक महाशय ने बड़ी ही प्रशंसा करते हुए जोरदार अंतर्देशीय लिखा - जो 35 पैसे का होता था, बस फिर तो चिठ्ठियों की आमद होने लगी. हम लोग लगा कि आवक जावक बाबू हो गए इधर Binay Saurabh से भी चिठ्ठी पत्री होती थी.
थोड़े दिन बाद भागलपुर में दंगा हुआ और इनकी कुछ हालत खराब हुई , पत्नी सुषमा बैंक में अधिकारी थी सो बड़े लम्बे मशविरे के बाद तय हुआ कि ये साहब नौकरी छोड़ेंगे और पत्नी सुषमा का स्थानान्तरण दिल्ली करवा लेंगे. और यही हुआ , लेखक महाशय ने तय किया कि वे फुल टाईम लिखेंगे और पत्नी नौकरी करेंगी बैंक में. दिल्ली में आये तो गाजियाबाद में बस गए. थोड़े दिन चिठ्ठीपत्री लिखी गई और फिर वे दिल्ली और मै अपने जीवन में व्यस्त हो गया, हम भूल गए.
भूलना मतलब संपर्क से कट जाना , अगर आपसे कोई सम्पर्क नहीं कर सकता, आपसे बात नही कर सकता और मिल नही सकता तो आप संसार में ज़िंदा है या मर गए किसी को फर्क नही पड़ता . संसार की अपनी गति होती ही है और यादें याद रखने वाले को वैसे ही मूर्ख समझा जाता है. एक दिन फेसबुक आया और हम सब वर्चुअल वर्ल्ड के गुलाम हो गए और फिर खोज - खोजकर ढूंढते रहें - जूने पुराने दोस्त और रिश्तेदार. और फिर अचानक देखता हूँ कि एक दिन संजीव ठाकुर की रिक्वेस्ट आई . खोलकर देखा तो ये सज्जन वही थे जो मित्र थे, बस मजा आ गया - झट से एड्ड किया और फोन नम्बर लेकर गपियाने लगें - कमोबेश रोज या हफ्ते में एक बार जरुर. संजीव कहते रहें कि यार दिल्ली आ जाओ, हमेशा आते हो और चले जाते हो बिना मिलें पर हो नही पाया मिलना.
बीच में दो बार भोपाल आये, साँची आये किसी लेखक बनाओ कार्यशाला में, पर मै लेखक था नही - लिहाजा बुलाया नही गया और पूछने पर अगले भाई ने लंबा लेक्चर अलग पिला दिया फोकट में !
ख़ैर, अबकी बार पुस्तक मेले में मोबाइल और सूचना तकनीक का जमकर दोहन किया और जीवन में पहली बार मिलें और दो दिन तक संजीव साथ रहे छाया की तरह से और अपने मित्रों को हम एक दूसरे से मिलवाते रहें और गप्प की. संजीव ने अपनी सारी किताबें भेंट की और आग्रह किया कि पढूं और कुछ लिखूं - जरुर पढूंगा और खूब - खूब लिखूंगा पर अभी बस इतना ही - इतना काम करने वाला लेखक और बहुत ही सज्जन व्यक्तित्व के धनी संजीव का संज्ञान हिंदी जगत ने क्यों नही लिया यह मेरे लिए विचारणीय प्रश्न है.
अगली बार दिल्ली जाउंगा तो सिर्फ इस पर ही बात होगी अभी सिर्फ इतना ही कि Sanjeev Thakur एक बेहतरीन इंसान, संवेदनशील लेखक और यारों का यार है..........जियो मेरे यार .

(चित्र में बीच मे संजीव है और साथ है चन्द्रकान्त जी)
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कब्रगाहों में दफन किताबें और लेखक भी पुस्तक मेले के समय निकल आते है पिशाचों की तरह और आत्मरति और आत्म मुगद्धता में अपने को इतना महान सिद्ध कर देते है कि वाग्देवी भी शर्मा जाएं।
धन्य है हिंदी का संसार जो यहाँ वहाँ से चिरौरी कर लिखवाई गई समीक्षाओं को मुर्दे सा पुनः पुनः जिलाकर परोसता रहता है और इस सबमे वो प्रकाशक मजे लेता है जिसके गोदाम में पड़ी सड़ गल रही , बसाती और जीर्ण शीर्ण किताबें हांफती रहती है और लेखक के होने को कोसती रहती है।
गांव कस्बे और दूर दराज के लोग जो पटना,भोपाल, दिल्ली या कोलकाता में पैदा नही हो पाएं अपने खींसे से धेला खर्च करके महान बनने की पंक्ति में अपनी बारी आने तक अपने मरे बच्चे को छाती से चिपकाए बंदरिया की तरह किताब का यशगान करते रहते है। गरीबी का रोना धोना करने वाले अचानक से मेले के पहले देश भ्रमण पर निकल जाते है और नर से ज्यादा मादाओं के साथ जलवे बिखरते रहते है और ये मादाएं घर की साज सजावट से लबरेज सोफा सेट पर श्रृंगार कर तस्वीरें हिंचकर लेखक से अपनी करीबी का घोषित और तयशुदा एजेंडा सामने रखती है।
यह समय ऐसा होता है कि दुनिया के सभी पौराणिक फीनिक्स भी जन्मना होने से डरते है कि कही कोई किताब ना थमा दें !

Wednesday, December 27, 2017

शिक्षक का रोल प्रतिबद्ध होना चाहिए और राजनैतिक भी

Shashi Bhooshan केंद्रीय विद्यालय में हिंदी पढ़ाते है। मेधावी है और बहुत करीबी मित्र और अनुज है उन्हें तब से जानता हूँ जब वो इंदौर में एम ए कर रहे थे फिर नौकरी, उत्तर पूर्व के स्कूल में काम, उनका लिखा , कहानियाँ और त्वरित की गई टिप्पणियाँ आदि का मुरीद हूँ। रीवा विश्वविद्यालय के होनहार छात्र है और अब हिंदी में स्थापित युवा चेहरा।
मेरी आदत है कि लेखक को छेड़ा जाए और पूछा जाए कि पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है। यह सबको पूछता हूँ। पर शशि ने एक अलग संदर्भ में बेहद संश्लिष्ट और घोषणापत्र की तरह जवाब दिया है जिसे पढ़ा जाना चाहिए।
एक शिक्षक मैं भी रहा और आजीवन रहूंगा क्योकि ये संस्कार और पेशा मुझे माँ से मिला था। सारे संघर्षों को याद करता हूँ तो लगता है कि यही वो जगह थी जहां मैं संतुष्ट था और मनोनुकूल कार्य कर पाता था।
एक शिक्षक को सतही तौर पर ही नही विचार और प्रतिबद्धता के स्तर पर भी स्पष्ट होने की जरूरत है और यह सिर्फ काल्पनिक नही घोषित तौर पर व्यवहार में भी परिलक्षित हो तो ज्यादा फायदेमंद होगा
दुर्भाग्य से हम शिक्षकों ने गत 70 सालों में एक नाकारा, उज्जड, भ्रष्ट और हरामखोर पीढ़ी पैदा की है इसलिए यदि आज शिक्षक की गरिमा खत्म हुई है तो कोई आश्चर्य नही है।
अफसोस नही खुशी भी है कि हम सब जिस समाज से आते है वह सब सिर पर लादे शिक्षा में भी चलें आये और बगैर किसी विचारधारा और समझ के दो दूनी चार रटाते रहें और अपने क्षुद्र स्वार्थों में सुलझे रहें
जरूरी है कि हर शिक्षक को एक सन्दीप शशि की तरह बार बार बेहद अपना समझकर छेड़े और उसे बताएं कि हम सबका काम क्या है क्योंकि अब उम्मीद सिर्फ शिक्षक से ही बची है।
शशि, तुम डाक्टर कृष्ण कुमार, प्रोफेसर यशपाल से भी आगे जाओ और शिक्षा साहित्य में कीर्ति की पताकाएं लहराते हुए कीर्तिमान स्थापित करो और इस सुप्तावस्था में पड़े "माष्टर" को जगाओ। 'माट साब' एक गाली ना होकर सम्मान का और संघर्ष का वास्तविक पर्याय बनें यही शुभेच्छा है। इस मास्टर ने अपने 30-35 बरस के कार्यकाल में 10-15 भी प्रतिबद्ध लोग बना दिये जो सिर्फ सवाल करते हो बाकी कुछ नही तो शायद आगे आने वाली पीढ़ी में कोई संदीप किसी शशि से कुछ नही पूछेगा यह विश्वास है, समझ रहे हो ना।
अच्छा लिखा, बल्कि एक उत्तेजना में लिखा यह एक तरह ऐतिहासिक घोषणापत्र है जिसे हर शिक्षक को अपनी नौकरी ज्वाइन करने के पहले जरूर पढ़ना चाहिए और मढ़वाकर घर, स्कूल, आंगन और ओसारो में टांग देना चाहिए ताकि सनद रहे।
बहुत स्नेह
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आदरणीय संदीप जी,
आपने पूछा है 'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?' और आप दो-तीन बार यह पूछ चुके हैं तो मैं आपसे कुछ कहता हूँ। ध्यान रहे, मैं जो कहने जा रहा हूँ उसका साहित्यिक महत्व कितना है, वह कितनी पोलिटिकली करेक्ट बात है या नहीं हैं और वह कितनी उम्दा या औसत बात हो सकती है मुझे नहीं मालुम। इस बारे में विचार करना भी शायद अभी ठीक न हो। यह मेरा व्यक्तिगत पक्ष, संलग्नता या प्रतिबद्धता है यही सोचकर कह रहा हूं। इसे ध्यान में रखिये और कभी भी इसे घाघ वक्तव्यों से कम्पेयर मत कीजियेगा। मैं कथित निष्पक्ष या बीच का व्यक्ति नहीं हूं। मैंने महान लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी को पढ़कर संतुलित रहने के बारे में यही सीखा है कि संतुलित होना सही-गलत, इसके या उसके बीच में रहे आना नहीं है, बल्कि संतुलित होना जो अधिकतम सही हो उसके पक्ष में होना है। मेरे जवाब को इस तरह पढ़ें कि यह एक शिक्षक का प्रतिबद्ध किंतु तटस्थ अराजनीतिक बयान है-
1. हिंदी जगत के लोगों में दो कथन बड़े मशहूर और मुंहलगे हैं। पहला प्रेमचंद का 'साहित्य राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल है' और दूसरा मुक्तिबोध का 'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?' सब जानते हैं कि मुक्तिबोध का सवाल एक मुकम्मल कथन भी है। अतिरिक्त समझदार इसे ठप्पे की तरह भी इस्तेमाल करते हैं। यह भी सभी को मालुम है कि मुक्तिबोध और प्रेमचंद साहित्यकार ही थे राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं। संयोग से दोनों ही शिक्षक भी रहे। जीवन भर कोई समझौता नहीं किया न विचारों से न अपनी भूमिका से। दोनों महान लेखक हैं। उनका लेखन भी जनशिक्षण ही अधिक है।
2. मैं शिक्षक हूँ। राज्य व्यवस्था में यह पेशवर नागरिक होना और वेतनभोगी कर्मचारी होना दोनों है। मैं इन सब कुछ के साथ और इन सबके बावजूद शिक्षक सबसे अधिक हूँ। अब लिखना-पढ़ना सब मेरे शिक्षक होने के ही पूरक हैं। दोहराने की ज़रूरत नहीं कि लिखना, पढ़ना और पढ़ाना दोनों मेरे काम हैं। कोई-कोई मुझे आलोचक भी समझते और कहते भी हैं क्योंकि विवेचना मेरे स्वभाव में है। स्वीकार हो या अस्वीकार मैं समीक्षा साथ रखता हूँ। मैं तर्कों के पीछे खूब भागता हूँ उनसे दो-दो हाथ भी करता हूँ। एक सही तर्क मुझे किसी कृति जैसा ही महत्वपूर्ण लगता है। लेकिन मुझे जानने वालों को पता है मैं शिक्षक की तरह ही चीज़ों को देखने का पक्षपाती हूँ। मैं यह सोचे बिना रह नहीं पाता कि अमुक रचना आगे किस काम आएगी। इससे किनका भला होगा। मेरी दिली ख़्वाहिश है कि मैं शिक्षक की तरह जिऊँ और मरूं भी। मेरे सामने तोल्स्तोय का महान उदाहरण है। वे अंत में बच्चों के बीच ही चले गए। हालांकि उनका महत्व गांधी के लिए भी उतना ही था। अगर मेरे जाने के बाद लोगों ने कहा कि शशिभूषण मास्टर था और कवि कहानीकार तो मुझे बड़ी ख़ुशी होगी। जब सब लोग शिक्षक होने को नौकरी भी समझते हैं मैं जाने क्यों इसे कुछ बहुत बड़ा मानता हूं। मैं किसी राजनीतिक दल का सबसे विश्वासपात्र होने की बजाय भारत के अच्छे शिक्षकों में गिना जाना चाहता हूँ। मुझे दिल से लगता है वह कौन सा दिन होगा जब मैं प्रो. यशपाल या प्रो.कृष्ण कुमार जैसा बड़ा सोच पाऊंगा। इसके लिए मुझे बहुत पढ़ना और जानना होगा। मेरी सीमा यह है कि समय बहुत कम निकाल पाता हूँ। मैं हिंदी के विश्व प्रसिद्ध लेखक उदय प्रकाश जी की इस बात से कभी निकल नहीं पाता कि लेखक के लिए पढ़ने और सोने का खूब समय होना चाहिए।
3. शिक्षक होकर मैं मानता हूं कि प्रेमचंद की पंक्ति मेरे सबसे अधिक काम की है। लोग इसे बोलते तो बहुधा हैं लेकिन बहुत कम लोगों को पता है यह पद केवल दोहराने से नहीं मिल सकता। इसके लिए जो साधना और त्याग चाहिये वह किसी किसी के पास होता है। प्रतिभा तो सभी शिक्षितों में होती ही है। मेरी समझ यह है कि किसी भी समय में राजनीति राजपुरुषों की होती है। शिक्षक अपने दैनिक कार्यव्यापार में हर वक़्त राजनीतिक नहीं होता। एक बात और थोड़ी अटपटी भी लग सकती है कि राजनीति इतनी महत्वपूर्ण भी नहीं होती कि कोई शिक्षक उसमें अपना जीवन लगा दे। हां वह अच्छी राजनीति के लिए भी प्रेरक और मार्गदर्शक हो सकता है। मेरे विचार से शिक्षक की शिक्षानीति होनी चाहिए। ज्ञान और शोध के प्रति उसका समर्पण होना चाहिए। शिक्षक को यह पता होना चाहिए कि जो भी बदलाव होगा वह विद्यार्थी ही लाएंगे। शिक्षक रहते मैं इस या उस राजनीति का कार्यकर्ता नहीं हो सकता। यह मेरा अनुशासन है। मेरी कक्षा में सब दलों के अनुयायियों के विद्यार्थी बैठते हैं। मार्मिक बात यह कि वे सब नाबालिग होते हैं। उनके मां बाप के भी उन्हें लेकर सपने होते हैं। कोई पिता अपने बेटे को भविष्य में किसी दल का बड़ा नेता ही बनाना चाहता है तो उसकी ख़ुशी। क्या मैं उससे लड़ने लगूंगा? इससे कौन या क्या बचेगा? मेरे या किसी और के शिक्षक रहते कई सरकारें आयी गयीं। लोकतंत्र है, यह चलता रहेगा। सेवा शर्तों, नियमों से भी मैं किसी राजनीतिक दल का सक्रिय सदस्य नहीं हो सकता। हूँ भी नहीं। दूसरे, मैं राजनीति का भी नहीं भाषा का शिक्षक हूँ। साहित्यिक संगठनों से जुड़ाव रखता हूँ। सांस्कृतिक आयोजनों में भाग भी लेता हूँ। मेरी सबसे बड़ी आस्था लोकतंत्र में ही है। दुनिया ने सब प्रकार की राजनीति देख ली है। अब केवल लोकतंत्र ही बचा है जिससे उम्मीद की जा सकती है।
4. यदि फिर भी जैसा कि आप सोचते हैं मेरी राजनीति होनी चाहिए और उसे प्रकट भही होते रहना चाहिए क्योंकि मैं नागरिक हूँ, लेखक हूँ, मतदाता भी हूँ, देश में लोकतंत्र भी है और पिछले कुछ साल से बहुत कुछ भारी गड़बड़ भी चल रहा है तो साफ़ कर दूं मेरी राजनीतिक निष्ठा लोकतांत्रिक समाजवाद की राजनीति की है। जो राजनीति लोकतंत्र के साथ समाजवाद के लिए काम करे या उसे सर्वोपरि रखे मैं उसे पसंद करता हूँ। उसके प्रति मेरा व्यक्तिगत समर्थन है। मेरा न तो धर्म में न ही धर्म की राजनीति से कोई वास्ता है न रहेगा। जात पांत, क्षेत्रीयता आदि मानता नहीं। कोई मुझे उपहास में भी सेक्युलर कहे तो बड़ा गर्व होता है। भारत में रहते अतिवादी ताकतों, अलगाववादी, चरमपंथी विचारों से बचा रहूं यही प्रार्थना है।
5. यह मेरा दुर्भाग्य हो सकता है कि मुझे बड़ी उम्र के बाद पिछले कुछ सालों में लगा यानी इतनी उम्र यों ही बीत गयी तब जाना और मैं जिसे दृढ़तापूर्वक अपने जीवन का लक्ष्य मानता हूं वह है लोकतांत्रिक समाजवाद। मैं समझता हूं मेरा लिखना-पढ़ना, नागरिक आचरण इसी के लिए होना चाहिए, और होगा भी। मैं इसकी कोशिश करता हूँ, तैयारी भी। मैं इसके लिए खूब पढ़ना और जानना चाहता हूं कि इसके लिए खुद से क्या-क्या काम ले सकता हूँ। मैं इस बात को दिल की गहराई से महसूस करता हूँ कि भारत में जो कुछ भी बाढ़ की तरह आया है उसके पीछे एक ही वजह है हमारे देश की शिक्षा फेल हो गयी। ग़ौर करने की बात है कि वे शिक्षा के फेल होने के बाद ही अपनी कथित शिक्षा और स्वव्याख्यात्मक सांस्कृतिक दुरभिसंधि से आये। वे इतने हल्के में कुछ चुनावों से ही जाएंगे भी नहीं। उनके हज़ारों विद्यालय हैं और लाखों विद्यार्थी एवं कार्यकर्ता। पूंजीपति और धर्म के कारिंदे तो सब उनके होते ही हैं।
यही बात हैं जो मैंने ऊपर कहीं। इसके अलावा इस नेता या उस नेता के ख़िलाफ़ या समर्थन में रोज़ कलम घसीटना मुझे बचकाना लगता है। इससे होने जाने वाला भी कुछ नहीं है। सच तो यह है कि हम जिन अपराधी, बचकाने और मनुष्यविरोधी तथा पूंजी समर्थित राजनीतिकों की निंदा कर कुछ कर लेने का दम भरते हैं वास्तव में हम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाने की स्थिति में तो हैं ही खुद को भी यों ही खर्च कर रहे हैं। इसे कहते हैं अपनी ही आग में ख़ाक हो जाना। कोई दावा नहीं है कि मैं बड़ा कर जाऊंगा लेकिन मैं करना तो चाहता ही हूँ। यह भी तय है कि मैं शिक्षक ही रहना चाहता हूं। कोशिश करूंगा और देखूंगा भी कि शिक्षक रहकर मैंने क्या किया। एक शिक्षक वैसे भी रातों रात कुछ नहीं करता।
इस देश और दुनिया के जो भी लोग सामाजिक न्याय, पंथ निरपेक्षता और समाजवाद के लिए कृत संकल्प हैं उनको मेरा बेशर्त समर्थन है। भारत में रहते मैं गांधी, भगत सिंह और अम्बेडकर का सजल उर शिष्य बनना, रहना चाहता हूँ। दुनिया के लिहाज़ से वे सब बड़े और सच्चे लोग तथा राजनेता जिन्होंने मनुष्यता को सर्वोपरि रखा। शोषणविहीन, बराबरी की दुनिया की नींव रखी मेरे शिक्षक हैं। शिक्षक रहते हुए केवल यही विश्वास दिला सकता हूँ कि चरमपंथी, अतिवादी और दक्षिणपंथी कुंओ में कूदकर अपनी बुद्धि, ईमान और मनुष्यता की हत्या कभी नहीं करूँगा। लेकिन वामपंथी हों या किसी समय के विपक्ष के अतिचार उनके सामने भी सर नीचा नहीं रखूंगा।
कृपया मुझे कुछ भी मानने से पहले शिक्षक मानें। शिक्षा ही मेरी नीति और कर्मभूमि है। यह लगभग तय जैसा है कि अब हम लोगों से कुछ खास नहीं होगा। हम एक बड़े फेलयुर से नत्थी लोग हैं। अब जो भी होगा आनेवाली पीढ़ी से होगा, और यह होगा। शिक्षक होने के कारण मैं थोड़ी अधिक उम्मीद में रहता हूँ और किसी से भी थोड़ा ज्यादा भारत को प्रेम करने का दम भी भर सकता हूँ। होता है। यह नेचुरल है। लेकिन याद रहे अब बेहतर तभी होगा जब आनेवाली पीढ़ी हम जैसों पर यक़ीन करेंगी और हमें सही मानेंगी।
यदि संभव हो तो सोचियेगा कि हम कैसे और सचमुच यक़ीन के लायक और मेंटर होने लायक बन सकते हैं। यह देश कैसे अपनी बहुलतावादी, सहिष्णु संस्कृति को बचाये रख सकेगा। नफ़रत सिखानेवालों से हम कैसे आगे निकल पाएंगे। भारत कैसे सबका प्रिय देश बन सकेगा। आखिर इसे महामानव समुद्र और विश्व बंधुत्व का अगुआ यों ही तो नहीं कहा गया है। बताइयेगा मैं पॉलिटिक्स में पड़े बिना शिक्षा के रास्ते लोकतंत्र की उन्नति के लिए क्या कर सकता हूँ। भारत के किस काम आ सकता हूँ।
इतना ही।
-शशिभूषण
27/122017 

Tuesday, December 26, 2017

यादें 27 दिसंबर 2017



असल में इतनी ठण्ड पड़ी ही नही कि वो सब मै भर निकाल पाऊं और दिखा पाऊं कि यह सब भी मेरे पास है मसलन माँ के हाथ बुने हुए कुछ स्वेटर्स, एक बड़ा गुलबंद, एक बन्दर टोपी जो बीमारी के समय पिताजी पहना करते थे, वैष्णो देवी गया था तब के लाये हुए पाँव और हाथ के मोज़े, माँ की आखिरी शाल जो कश्मीरी थी और बहुत महंगी भी जिसे अब तक ओढ़ रहा था, पाँव के घुटनों पर लगाने वाले इलास्टिक के दस्ताने जो मरने तक भाई पहनता था क्योकि बहुत दुखते थे.
ठण्ड के आने के साथ ही इन कपड़ों की धुलाई करता और फिर चकाचक तैयार होकर निकलता जेब में चार छः रेवड़ियां भी रखी होती और डिब्बे में गजक. दाने की पट्टी या गुड पट्टी भी कभी कभी पाकर एक राजकुमार सी फीलिंग होती थी, बरसात के गीले चिपचिपे मौसम से निकलकर खूब सारी लहसन छिलते बैठे हम लोग सोचते अबकी बार गर्मी की छुट्टियों में फलना करेंगे ढीमका करेंगे, स्कूलों में अर्ध वार्षिक परीक्षाओं का दौर शुरू होने को होता पर अल्हड बचपन को कहाँ परवाह होती थी.
यह सुबह उठकर पिताजी के साथ किसी रविवार को मंडी में जाकर अचार के लिए मोटी ताज़ी हरी मिर्च लाने का समय था, पीले पड़ते जा रहे रसीले नीम्बू लाने का काल होता था ताकि कांच की साफ़ बरनियों में रस के साथ शकर मिलाकर गर्मियों के लिए शरबत बन सकें और घर लौटते समय कोने की दूकान से गर्मागर्म जलेबी बांधकर लाने का भी ललचाने वाला समय था. माँ दोपहर में मटर छिल रही होती और खूब गलियाती रहती कि कमबख्त सारे मटर खा गए अब खिचडी में क्या ख़ाक डालूंगी और हम हँसते हुए दौड़ पड़ते दोस्तों की छतों पर हाथों में मांजा लिए पतंग को किसी आसमान के पार पहुंचाने को और जब लौटते शाम को तो सूरज ढल चुका होता.
घर में रामरक्षा का पाठ करवाती माँ हमें खाना परोसकर पिताजी से हमारे बारे में बोलती रहती. कितने स्वप्न देखते थे वे दोनों हम सबके लिए और आज जब सोचता हूँ तो लगता है एक भी जगह खरा नही उतर पाया, आज जब दोनों का साया सर पर नही तो सोचता हूँ गर वो ऊपर भी बैठकर यही सब सोच रहे हो और मेरा जीवन देख रहे हो तो कितना अफसोस करते होंगे कि बच्चों ने कुछ नही दिया उस तीन पैसे के सिक्के के बदले !!!

तुलसी जयंती और क्रिसमस की शुभकामनाएं

साई बाबा हो, श्रीराम हो, श्रीकृष्ण हो, पैगम्बर हो, गुरु गोविंदसिंह हो या जीसस हो - ये सब बहुत ही सामान्य इंसान थे और अपने कर्मों से अपने उच्च आचरण और व्यवहार से इन लोगों ने आदर्श स्थापित किये -निजी जीवन मे भी और सार्वजनिक जीवन मे भी और मानवता के उच्च मूल्यों को अपने जीवन मे ही नही अपनाया - बल्कि वृहद समुदाय को अपने साथ जोड़कर सृष्टि में नवनिर्माण भी किया। इसलिए ये देवदूत है और वंदनीय है आज और हमेंशा।
हम किंचित या उनके कार्यों को करना तो दूर अगर सहज मन से स्वीकार भी कर पाएं या उन्मुक्त मन से प्रशंसा भी कर पाएं तो मनुष्य हो सकते है।
क्रिसमस की शुभकामनाएं आप सबको। दया जैसा उच्चतम मूल्य जिस व्यक्ति ने सीखाया उसके लिए मानवजाति हमेंशा नतमस्तक रहेगी।
उन सबको विशेष बधाई जो रात से तुलसी जयंती की बधाई देते नही अघा रहें। एक लोटा पानी अपने आंगन की तुलसी में रोज डाल दें तो प्रकृति पर कृपा होगी बशर्तें अपने ओसारे में कोई गमला लगा हो तुलसी का !!!

तुलसी के औषधीय पौधे से हम सब परिचित हैं यह पौधा सिर्फ पौधा नहीं बल्कि एक आवश्यक पौधा है जो अमूमन हर घर में पाया जाता है इसके महत्व से हम सब वाकिफ हैं , हमारे यहां संस्कृति में देवउठनी ग्यारस पर तुलसी विवाह की समृद्ध परंपरा है -  हर हिंदुस्तानी घर में लगभग तुलसी विवाह होते हैं । 

मैंने अपनी 50 वर्ष की उम्र में आज तक तुलसीदास जयंती जो जुलाई में आती है और तुलसी विवाह के अलावा तुलसी दिवस के बारे में कभी नहीं सुना, ना इसका जिक्र किसी पुराण या धर्म ग्रंथ में है - ऐसा सुना है फिर अचानक आज सुबह से देश विदेश से वे लोग तुलसी दिवस के संदेश भेज रहे हैं जो तुलसी के पौधे को ना देखे होंगे,  ना कभी चखा होगा या यह सूंघकर देखा होगा !  अपने बच्चों को  गेंहूँ के पेड़ "रूरल एरिया" में होते है सिखाने वाले अचानक तुलसी पर मेहरबान क्यों ? बख्श दीजिये भारत को। 

मजेदार यह है कि यह सब आज यानी क्रिसमस पर याद आ रहा है सबको, क्या हो गया है हम लोगों को कितने घटिया और संकीर्ण हो गए हैं , एक कौम अपना त्यौहार मना रही है और हम वही वैमनस्य फैला रहे हैं बेहद शर्मनाक है यह सब। जबकि हमारे संस्कार तो कंस, शकुनि को मामा कहते है, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम रावण को मारने के पश्चात लक्ष्मण को उसके पाँव पड़कर ज्ञान लेने जो कहते है। 

कैसा समाज हम रचना चाहते है। यह पीड़ा उन लोगों की ज्यादा है जो अमेरिका या इस्लामिक देशों में रह रहे है और मुझे लगता है कि अपने ऊपर अल्पसंख्यक होने और अलग थलग पड़ जाने की पीड़ा से ग्रस्त है और जिस थाली में खाया उसी में छेद करने की प्रवृत्ति दर्शा रहा है। ये युवा हिंदुस्तान में रहे और मेडिसिन स्क्वेयर के भाषण सुनना छोड़कर भारत की हकीकत से वाकिफ हो तो समझेंगे कि देश किसे कहते है। ये जिसकी रोटी खा रहे है, जहां से कमा रहे है उसी देश और समाज से गद्दारी कर रहे है। 

यह सब आने वाले भारतीय समाज के लिए बहुत घातक सिद्ध होने वाला है, कल हम जैन, बौद्ध, सिख, दलितों और आदिवासियों को अलग करके एकाधिकार जतलायेंगे और फिर इस तरह से यह सुंदर रंग बिरंगा देश खत्म हो जायेगा। मेहरबानी करके यह सब रोकिये और इसका विरोध करिये, समझाइये प्यार से, हम विविध है इसलिए एक है, ताकतवर है और आज महाशक्ति है, कल हम कमजोर हो जायेंगे। त्योहारों को त्यौहार ही रहने दें, इन्हें अपनी गन्दी सोच, राजनीती और इमेज बनाने का साधन ना बनाएं प्लीज़ !!!

आयोजन वीर के किस्से और पत्रिकाओं का बुरा हाल पाखी जैसा है


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एक जगह मित्र लोग कुछ बड़ा आयोजन कर रहे थे। अच्छा कार्यक्रम था,सोचा जाऊं कुछ काम करेंगे - मेहनत मजदूरी का और कुछ सीखेंगे। आयोजक मित्र से बात हुई। उन्होंने बड़ी गर्म जोशी से कहा स्वागत है फिर बोले एक दो बातें बता दूं - मैंने कहा जी बताएं....
एक - आपका किराया हम नही देंगे।
मैं - जी, मैंने तो माँगा ही नही और ना माँगूँगा।
दो - हमारी रहने वाली जगह पर सब लोग, कलाकार रहेंगे, जगह नही है हमारे पास, आपको कोई सस्ता सा होटल दिलवा देंगे पर भुगतान आपको करना होगा। यदि आपका कोई यहाँ दोस्त रिश्तेदार हो तो टिक जाना । आपको महंगा नही पड़ेगा।
मैं - जी, वह मैं देख लूंगा चिंता ना करें ।
तीन - हम खाना लिमिटेड का बनाएंगे आपको....
मैं- नही जी, मैं खुद खा लूंगा - आप चिंता ना करें , आपकी चाय भी नही पियूँगा और पानी भी ले आऊंगा।
चार - आप कुछ आर्थिक सहयोग दे देंगे - पांच दस हजार तो मदद रहेगी और रोज के कार्यक्रम अटेंड करने के पांच सौ रुपये। क्या है ना - दिल्ली - मुम्बई से कलाकार आएंगे, स्थानीय कवि भी कविता पढ़ेंगे, कुछ विश्वविद्यालयों के बड़े बड़े लोग आएंगे तो भाषण देंगे - तो खर्चा होगा ना, वो हम कहां से एडजस्ट करेंगे ?
मैंने कहां और कुछ ? बोलें - नही भाई जी, आप आइये, बड़े सम्मानित हो हमारे लिये आपके आने से हिम्मत रहेगी और फिर आप तो घर के हो , हम सब आपको बहुत प्यार करते है। हमारी टीम को आपसे सीखने को मिलेगा। बोलिये कब आओगे ..... हेल्लो , हेल्लो ...हेल्लो !!!
मूर्खो और घटिया लोगों से संसार भरा पड़ा है। आज से इन महान कलावन्तों और पुजारियों का "फेडबुक" अपडेट देखना शुरू किया तो ख्याल आया और रिकॉर्ड की बातचीत सुनी अभी। चूतियों मेरे भरोसे पैदा भी हुए थे क्या ? भगवान की कसम एक से एक नमूने है और फेसबुक के बकलोल। कभी चले मत जाना यहाँ के अपडेट्स देखकर किसी कार्यक्रम में।
है ना गजब !!!
उनको बताना भूल गया कि मैं कोई आई ए एस अफसर नही जो कउता - कहानी लिखता हो .

2
हिंदी पत्रिकाएं लापरवाह और अव्यवस्था की भारी शिकार है।
#पाखी के जून 2017 अंक में मेरी कविताएं छपी थी। आज तक अंक नही मिला - पारिश्रमिक तो दूर। सब विज्ञापन और हिंदी संस्थानों से अनुदान लेकर छापते है, पर लेखकीय प्रति पंजीकृत डाक से ही भेज दें ।
पता नही साहित्यिक समझ वाले सम्पादक है जो खुद भी इस दौर से गुजरे है वो भी इतने खुरदरे हो गए कि असर नही पड़ता । पाखी के सम्पादक साहब को 4 बार बोला, अब साल खत्म होने को है पर कोई एक्शन नही।
सरकारीकरण हो गया है सबका।
कई बार फेसबुक पर इसलिए लिखता हूँ कि यहाँ मित्र लोग पढ़ तो लेते है, तुम्हारी 400-500 प्रतियां तो ढंग से पहुंचा नही पाते देश मे सिवाय कमीशनखोरी के लोगों को , तो क्या पत्रिका आंदोलन जिंदा रखोगे ? एक लेखक को उसकी प्रति नही दे सकते तो दिल्ली में मैनेज कर रहे दफ्तर में बैठे निठल्ले और नाकारा लोग क्या खाक काम कर रहे है, एक पत्रिका पोस्ट नही कर सकते तो क्या अनपढ़ गंवार भर्ती कर रखी है सारी ? आज गुस्सा हूँ इसलिए कि यह पाखी की बात नही और भी लोगों की है।
शर्म आती है कि इतने गैर जिम्मेदार लोग हिंदी के मठाधीश होकर बैठे है और धंधा चला रहे है। 12 माह के चंदे में से आपको 5-6 अंक भी मिल जाएं तो आप गंगा नहा लिए यह मानिए।
खैर , इन्हें जब तक सार्वजनिक नही करेंगे नामजद तब तक कुछ नही होगा। ज्यादा से ज्यादा क्या करेंगे रचना नही छापेंगे - ना छापें कौनसा इनसे रोटी बेटी का सम्बंध करना है। जो लोग अपने दफ्तर की डाक व्यवस्था जिम्मेदारी से नही सम्हाल सकते वे क्या खाक हिंदी के साहित्य संसार को सँवारेंगें।

राजनीति, सत्ता और संस्कृति के बरक्स साहित्य - - संदीप नाईक


राजनीति, सत्ता और संस्कृति के बरक्स साहित्य
-  संदीप नाईक
युद्धे , युद्धेवहे , युद्धामहे
(अर्थात मैं युद्ध कर रहा हूँ, हम दोनों युद्ध कर रहे है और हम सब युद्धरत है।)
-      प्रकाशकांत की एक कहानी से
राजनीति, सत्ता, संस्कृति और साहित्य पर लिखने से पहले हमें वैश्विक परिदृश्य को समझना होगा। तभी शायद हम समग्र दृष्टि से समकालीन भारतीय परिदृश्य को जान सकेंगे। क्योंकि वर्तमान समय की बहुलतावादी राजनीति ने विश्व के जनमानस और समुदाय को बृहद स्तर पर प्रभावित किया है। यह प्रभाव आर्थिक स्तर से होता हुआ समाज, व्यवहार, संस्कृति और अंत में साहित्य पर अपनी छाप छोड़ रहा हैं। अगर देखा जाये तो बीते हुये समय में जिस तरह तानाशाही ताकतों और सवर्णवादी शक्तियों ने अपनी बेजा हरकतों से दुनिया में बदलाव और विकास के नाम पर विध्वंस का तांडव रचा है, वह बेहद चिंताजनक है। संयुक्त सोवियत रूस के विघटन के बाद वैश्विक शक्ति के नाम पर शेष एक मात्र देश अमेरिका में पिछले समय में हुए राष्ट्रपति के चुनाव पूर्व, चुनावों के दौरान और अब जिस तरह का माहौल बदला है वह बहुत मायने रखता है। अमेरिका की नीतियों से लेकर विश्व के छोटे देशों के साथ जो व्यवहार हुआ है वह यह दर्शाता है कि हम कहाँ थे, कहाँ है और कहाँ होगे? इसी क्रम में भारत में सन् 2014 के बाद का पूरा भारतीय परिदृश्य भी बदला है। भारत में तेजी से एक भयावह संक्रमण से गुजरते जा रहे समाज में जो कुछ घटित हुआ वह यह समझने के लिए पर्याप्त है कि भारत की तस्वीर कैसी उजली होने वाली है? शाईनिंग इंडिया से लेकर ‘इनक्रेडिबल इंडिया’ के नारों की गूँज के बीच मीडिया और संस्कृति का ह्रास होता गया है और एक प्रवृत्ति विशेष को थोपने के जो कुत्सित प्रयास चल रहें है वे बेहद चौकाने वाले हैं। यह सिर्फ इसलिए नहीं कि यहाँ समाज में बदलाव विकास के नाम पर हो रहे हैं। विकास के नाम पर भारत के बहुसंख्य दलित और पिछड़े वर्ग को हाशिये पर धकेला जा रहा है। अत्याचार सुसंगठित और राज्याश्रय पर हो रहे हैं। अल्पसंख्यकों को सुनियोजित तरीके से निपटाया जा रहा है या पुरस्कार वापसी गैंग को भी अब सी.बी.आई. जैसी एजेंसियों के माध्यम से जांच के घेरे में लाकर मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का खेल खेला जा रहा है। यह संभवतः दुनिया के इतिहास में पहली बार हो रहा होगा कि देश के बुद्धिजीवी वर्ग को निशाना बनाकर सत्ता ने अपने लिए सुरक्षा के घेरे बढ़ा लिए हो।
विश्व के परिदृश्य पर नजर गड़ाकर देखेंगे तो पता चलेगा कि पूरी दुनिया में यह बेहद उठापटक और खलबली मचने वाला समय रहा है। जिसे साधारण भाषा में हम संक्रमण कह सकते हैं। परन्तु इस संक्रमण काल में इतिहास में कभी ना घटित हुई घटनाओं ने समूची मानवता को प्रभावित किया और एक बेहतर दुनिया को देखने का महास्वप्न भंग होने लगा है। इन षडयंत्रों को जानने के लिए निश्चय ही हिन्दी या विश्व की किसी भी भाषा का साहित्य एक दृष्टि प्रदान करता है। सन 1991 में गोर्बाच्योव के ग्लास्तनोस्त और पैरेस्त्रोईका ने जिस तरह से रूस का खात्मा किया, वह बहुत ही कठिन समय था जिससे सदी का महास्वप्न भंग हुआ है ऐसा यह मेरा मानना है। ठीक इसी समय से दुनिया के परिदृश्य पर एक नजर डालें तो हम देखते हैं  कि उदारवाद, सुधारवाद और वैश्विकीकरण के दौर में श्रमजीवी समुदायों को हाशिये पर धकेलने का काम बहुत सुसंगठित तरीके से किया जाने लगा था और एक संघर्षशील वर्ग को धीरे-धीरे पूरे विकास से हटाने का काम किया गया। जिस पूंजी को एक अभिशाप मानकर एक नई दुनिया देखने का स्वप्न हमने संजोया था, वही पूंजी राजनीति पर हावी होती गयी और अंततः सर्वोपरि हो गई। नए उद्योग घरानों का प्राकृतिक संसाधनों पर सत्ता के साथ मिलकर उदय और फिर पूरी दुनिया से सर्वहारा वर्ग के हकों, लड़ाईयों और ट्रेड यूनियनों को सिरे से नकार कर ठेकेदारी प्रथा के मार्फ़त मानव श्रम को हांकना, टास्क आधारित काम पर पूंजी का वितरण आदि भी इसी वर्ग की एक चाल थी। मजदूरों को ना मात्र खत्म किया गया बल्कि उन्हें ज़िंदा रहने के लिए भी नहीं छोड़ा। अमेरिका और रूस की द्वीध्रुवीय व्यवस्था के ख़त्म होने के बाद जन विश्व संस्था के रूप में यु.एन.ओ. जैसे संगठन एकाएक ताकत बनकर उभरे और इन्होंने रूस के खात्मे के बाद अमेरिका के बढ़ते वर्चस्व को विश्व में स्थापित किया। यहाँ तक कि एक ठोस उदाहरण से अपनी बात कहूं तो ईराक पर किया गया हमला बगैर सहमति के किया गया और सिर्फ तेल पर अपना दबदबा कायम करने के लिए हजारों जानें ली गयी। इसी से दुनिया में तेल की राजनीति पनपी जिसने कालान्तर में दुनिया भर में रिसेशन या मंदी थोपी जिसका नुकसान ज्यादातर गरीब मुल्कों पर हुआ जो संसाधनविहीन थे। इस मंदी में इन्हें अपना सब कुछ बेचना पड़ा। भारत जैसे देश को अपना सोना भी गिरवी रखना पड़ा है।
नब्बे के बाद विश्व फलक पर तेजी से बदलते रहे परिदृश्य के दौरान दुनिया के इतिहास में सभ्यताओं के संघर्ष बढ़ गये जो अपने आप में बेहद रोचक, डरावने और बहुत कुछ सिखाने वाले रहे हैं। दक्षिण एशिया में उभरे गुट निरपेक्ष आंदोलनों की महत्ता ख़त्म हो गयी और एशियाई देशों के सामने चुनौतियां अपने पड़ोसी मुल्कों और गरीब देशों से ही मिलने लगी। लिहाजा वे अपनी सारी ताकत बनिस्बत विकास, गरीबी, बेरोजगारी या महिला समानता, दलित और वंचित लोगों की भलाई करने के नामपर आपस में ही लड़कर ऊर्जा और संसाधन ख़त्म करने लगे। जिससे वे खुद लगातार गरीब होते चले गए। गृह युद्धों की स्थिति में जी रहे इन देशों के सामने अमेरिका के समक्ष घुटने टेकने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा और अमेरिका अपने हथियार बेचने के लिए एक से दूसरे मुल्क में यात्राएं करता रहा। अमेरिका किसी सिद्धहस्त खिलाड़ी की तरह बाजार में अपने प्रोडक्ट परोसता रहा और दुनियां के बाजार में छा गया। उसने दूसरे देशों के स्थानीय उद्योग धंधों को ख़त्म कर अपना वर्चस्व स्थापित कर की चाल चली। उत्तरशती में हमने यूरोप के राजनैतिक नक़्शे में हुये बदलाव को भी देखा है। जहां एक ओर दोनों जर्मनी का एकीकरण हुआ और सीमाओं की दीवारें टूटकर गिरी। वही युगोस्लोवाकिया, चेकोस्लोवाकिया और सोवियत संघ जैसे देशों का या शक्तियों का विघटन हुआ जो कि बहुत चिंतनीय था। परन्तु बदलती अर्थ व्यवस्था और राजनैतिक ध्रुवीकरण के समय में कही से कोई आवाज उठाने वाला नहीं था। इसका असर अभी तक मौजूद है। हाल ही में एक छोटे से देश को विश्व मुद्रा कोष ने खरीदने की बात की थी परन्तु अच्छी बात यह थी कि जन मानस ने पूरे जनमत के साथ इसे नकार दिया।
विश्व में हो रही उथल-पुथल के दौरान अगर भारतीय परिदृश्य पर एक नजर डालेंगे तो पता चलता है कि भारत जैसा देश भी वैश्विक आघातों से अछूता नहीं रहा है। पिछली सदी के अंतिम कुछ वर्षों में लगभग पचास साल की आजादी के बाद देश ने करवट बदलना शुरू किया था और यहाँ के लोग जब आजादी का मतलब समझ ही रहे थे कि आर्थिक मंदी ने उनके जीवन पर प्रभाव डालना शुरू किया और सब कुछ तहस-नहस हो गया। यह बहुत पुरानी बात नहीं है जब डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि “लम्हों ने खता की है और सदियों ने सजा पाई है” लिहाजा देश को गिरवी रखकर आर्थिक सुधार करना होंगा। विश्व बाजार को अपने आँगन में बुलाकर मिश्रित अर्थ व्यवस्था के मॉडल को हमने एक झटके में तोड़ दिया। उदारवाद की बयार में छोटे मोटे लोग बह गए और एक ग्लोबल विश्व और मॉल संस्कृति की चकाचोंध भरी दुनिया उभरी। इस नई संस्कृति ने मध्यमवर्ग को लुभावने सपने दिखाकर संघर्ष की चेतना को सिरे से खत्म कर दिया। इस समय में मिश्रित या यूँ कहें कि गठबंधन की सरकारों का दौर शुरू हुआ जिसने समूचे राजनैतिक ढाँचे को एक अजीब स्थिति में ला खड़ा किया। इस गठबंधन से ना मात्र आर्थिक बदलाव करना पड़े बल्कि सामाजिक और राजनैतिक बदलाव एक अनिवार्य तत्व की तरह से आये जिसने भारतीय विकास के सोपान में नये अध्याय लिखना आरम्भ किया। इस उथल-पुथल भरे समय में ही हमने मिश्रित अर्थ व्यवस्था की विदाई की और मध्यप्रदेश जैसे राज्य के एक छोटे से जिले बडवानी से उभरे नर्मदा आन्दोलन ने विकास और विनाश के प्रश्न उछाले। इससे जमीनी आन्दोलनों से पूंजी का जहां महत्त्व बढ़ा वही पूंजी के प्रति एक नफ़रत भी समाज ने देखी। पूंजीविहीन समाज का एक बड़ा तबका सामने आया और बेहद प्रतिबद्धता से जमीनी आन्दोलनों में नेतृत्व के रूप में उभरा। फिर एक बार नक्सलवाद, माओवाद, एक्टिविज्म को परिभाषित किये जाने की मांग उठी। ठीक इसके विपरीत जातिगत ध्रुवीकरण और हिन्दू-मुस्लिम शक्तियों के कारण समाज में कमजोर और वंचित समुदाय को लगातार हाशिये पर धकेला गया। इस साम्प्रदायिकता में सबसे ज्यादा नुकसान गरीब और शोषित वर्ग का हुआ। इसी के साथ-साथ राजनीति में दलित और हाशिये के वंचित वर्ग ने अपनी जगह बनाई। इनकी राजनीति और निर्णय में बहाली भी इसी दौर की उपज है। दूसरा संदर्भ देखें तो यह समय भारतीय समाज के ध्रुवीकरण की शुरुआत का समय भी है। भारतीय समाज एकरूप समाज के लिए जाना जाता रहा है। हिंदी की महत्त्वपूर्ण ‘पहल’ पत्रिका तो इस देश को महादेश कहती है और इस महादेश में तो कहा जाता है कि कई समय और कई समाज एक साथ रह रहे हैं। इतने बड़े समावेशी समाज में ध्रुवीकरण खतरनाक होता है जैसे कि हम देखते हैं कि उत्तरशती का जो आख़िरी का समय है वह समाज को अधिक से अधिक ध्रुवीक्रत करने वाला रहा है। इस समावेशी समाज में धर्म, सम्प्रदाय और जातियों के ध्रुवीकरण लगातार हो रहे हैं। हिन्दू अधिक हिन्दू हो गया है और मुसलमान अधिक मुसलमान हो गया है। इनके रंग-ढंग भी अलग-अलग दिखने लगे हैं। यदि कोई जाति अपनी संस्कृति का निर्वाह करती है तो कोई बुराई नहीं है लेकिन वह दूसरी जाति के विरुद्ध कुछ क्रियाकलाप करती है तो यह खतरनाक है। इसी तरह एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के ख़िलाफ़ सिर्फ़ यह दिखाने के लिए खड़े होते है कि हमारा धर्म श्रेष्ठ है। यह धर्मांधता मनुष्यता के लिए घातक है। ध्रुवीकरण की यह प्रवृत्ति मनुष्यता के लिए बहुत घातक है। इस तरह उत्तरशती ही हमारे लिए मनुष्यता का सबसे बड़ा संकट भी लेकर आई जिसमें भारतीय समाज ज्यादा से ज्यादा ध्रुवीक्रत हो गया। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव उन समाजों पर ज्यादा पड़ा जो हाशिये पर थे और धीरे-धीरे मुख्यधारा में आने का प्रयास कर रहे थे। फलस्वरूप हाशिये के समाज और ज्यादा हाशिये पर चले गए। इससे साहित्य को बहुत नुकसान पहुंचा है। क्योंकि साहित्य समाज के भीतर मनुष्यता पैदा करता है और जीवन के पक्ष में खड़ा होता है। मनुष्यता और जीवन पर जो खतरे हैं वे हमारे साहित्य और संस्कृति के भी बड़े खतरे हैं। सोवियत रूस के पतन के बाद जो परिस्थितियाँ बहुत तेजी से बदली और अमरीका को खुलकर अपनी मनमानी करने का मौका मिला उससे भारतीय मानस भयाक्रांत हुआ था जिससे उभरने के लिए साहित्य ने नई चेतना पैदा की है और एक वैकल्पिक समाज की कल्पना करते हुए मनुष्यता का पक्ष प्रबल किया है। अगर देखा जाये तो सबसे ज्यादा उत्तरशती की कविताओं में अमेरिका के आर्थिक एवं सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का पुरजोर विरोध मुखर हुआ है। अमेरिका जैसे देशों की अतिवादी और दोहरी राजनीति के ख़िलाफ़ लिखा ही नहीं गया बल्कि इनके ख़िलाफ़ प्रदर्शन भी किये गये हैं।
समाज को विकल्पहीन बनाने में साम्राज्यवाद और पूंजीवाद दोनों ने महती भूमिका निभाई है। जीवन और मनुष्यता को बचाने के लिए जहाँ एक साहित्य अपना काम कर रहा था, वहीं दूसरी और समतामूलक समाज के स्वप्न को ख़त्म करने और वर्गीय समाज बनाने की कोशिशें भी जारी रही है। नब्बे के बाद बार-बार यह कहा जाने लगा था कि ‘विचारों का अंत’ हो गया है और इसी तरह ‘इतिहास का अंत’ भी हो गया है। असल में यह विचार संभ्रम निर्मित करनेवाले रहे है। इसे दोहराने के पीछे की मंशा यह थी कि हमारे लिए अब कोई विकल्प नहीं बचा है। जो एक ही विकल्प बचता है वह पूँजीवाद है। इसका परिणाम यह हुआ कि तीसरी दुनिया के विकासशील देशों में जहाँ कहीं वैकल्पिक समाज के खड़े होने की संभावना बन रही थी वह ख़त्म हो गयी। समाजवादी विचारक किशन पटनायक कहते थे कि ‘ये दुनिया कभी भी विकल्पहीन नहीं हो सकती’। ऐसे में यह सवाल उठता है कि यह भ्रान्ति कौन फैला रहे हैं? दरअसल ये वही पूंजीवादी और साम्राज्यवादी ताक़तें हैं जो इकहरी और विकल्पहीन दुनिया बनाना चाहते हैं। ये तीसरी दुनिया के देशों को अपना क्लोन बनाना चाहते हैं। जबकि विकल्प हमेशा से रहे हैं और रहेंगे। इसी से मनुष्य का विकास होता है और होता आया है। हमारी संस्कृति और साहित्य भी इन विकल्पों को बचाने की जद्दोजहद है। साहित्य हमारे सामने कई विकल्प प्रस्तुत करता है ताकि एक अच्छे और सभ्य समाज का निर्माण किया जा सके।
साहित्य के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण उत्तरशती की कहानियाँ रही है। इस समय में हिन्दी की चार पीढियां बराबरी से सक्रीय थी। बहुत प्रतिबद्धता से चार पीढ़ियों का एक साथ समान रूप से सक्रिय रहना हमें निकट इतिहास में कही देखने को नहीं मिलेगा। यहाँ तक की क्षेत्रिय भाषाओं में भी ऐसा बिरला उदाहरण देखने को नहीं मिलता है। हिंदी में निर्मल वर्मा, भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वैद, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, मोहन राकेश से लेकर संजीव, राजेन्द्र दानी, उदय प्रकाश, प्रकाशकांत, हरी भटनागर, संजीव ठाकुर, भालचंद्र जोशी आदि कई लेखकों ने बेहद सक्रीय होकर कहानी लेखन किया है। इन्ही के साथ-साथ साठोत्तरी पीढ़ी के सक्रीय दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, रविन्द्र कालिया जैसे कहानीकार भी सक्रीय रहे हैं। जीतेन्द्र भाटिया, रमेश उपाध्याय, मृणाल पांडे, गोविन्द मिश्र, स्वयंप्रकाश, सत्येन कुमार, पंकज बिष्ट, मन्नू भंडारी, रमाकांत श्रीवास्तव आदि प्रतिबद्ध और गैर प्रतिबद्ध दोनों प्रकार के साहित्यकार भी साहित्य सृजन में सक्रीय दिखाई देते हैं। इन चार पीढ़ियों की सघन और रचनात्मक यात्रा में कहानी कई तरह के धरातलों पर चल रही थी। जहां एक ओर राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और भीष्म साहनी, ज्ञानरंजन कहानी को अपने अनुभवों से परिभाषित कर रहे थे, इनके द्वारा नई कहानी की संरचना पर बात हो रही थी वही कहानी के मूल स्वर में महास्वप्न के भंग की आहट हिन्दी में भी बनी हुई थी। नई दुनिया के स्वप्न भंग होने की बात कहानी ने भारत की आजादी के दो दशकों में ही भांप ली थी और इसी तर्ज पर एक भयावह  दुनिया का मंजर कहानी में सामने आने लगा था। औद्योगिकीकरण और तेजी से बढ़ाते जा रहे शहरीकरण के कारण परिवारों का जो विघटन हो रहा था उससे उभारने में कई कहानीकार सफल रहे हैं। इनकी सृजनात्मकता इक्कीसवीं सदी में भी जारी रही है। समाज में जमीनी आन्दोलनों से उभरे मुद्दों ने हिंदी कहानी को प्रभावित किया है। वीरेन्द्र जैन के उपन्यास डूब ने विस्थापन जैसे मुद्दे को उभारा वही उनकी दर्जनों कहानियों ने भारत में फैलते बेरोजगारी के मुद्दे को एक चिंतन के रूप में मुखर किया है जिसने एक बड़े युवा वर्ग को प्रभावित किया और साहित्य से भी जोड़ा है। बढ़ता तथाकथित मध्यमवर्गीय समाज का इस दौर में बढ़ना भी एक संकेत के जैसा है जो अपनी महत्वकांक्षाएं बढाता जा रहा है। उसे लगता है कि बदलाव का यही शार्ट कट सही है जहां उसे ना लम्बी कतार में लगना है, ना इंतज़ार करना है। जेब में अगर रुपया है तो वह दुनिया की हर सुविधा भोग सकता है, खरीद सकता है। मध्यवर्ग के लिए संसार में हर चीज बिकाऊ है। यहाँ तक की साहित्य की मूल संवेदनाएं भी वह खरीद सकता है।  चकाचौंध की दुनिया से प्रभावित मध्यवर्ग हमारे सामने हैं और अब वह सवाल नहीं खोजना चाहता। वह सिर्फ विन विन के सिद्धांत पर जीना चाहता है और बाजार के ट्रेप में, किश्तों के जाल से दुनिया की हर सुविधा को अपने लिए हर कीमत पर हासिल करना चाहता है।
भूमंडलीकरण के इस दौर में कुछ साहित्यकारों ने बाजारवाद एवं उदारीकरण से आ रहे परिवर्तनों की पड़ताल भी की है। इस सन्दर्भ में स्वयंप्रकाश की चर्चित कहानी ‘मंजू फ़ालतू’ उल्लेखनीय है। इस दौर की महत्वपूर्ण समस्या साम्प्रदायिकता को केंद्रीय तत्व बनाकर कई लेखकों ने सृजन किया है। इस संदर्भ में अजगर वजाहत से लेकर  प्रकाशकांत तक के कई लेखक महत्वपूर्ण है। परन्तु इस मुद्दे पर अखिलेश की कहानी ‘अगला अन्धेरा’ इतिहास में उल्लेखनीय रही है। जहाँ ‘और अंत में प्रार्थना’ जैसी कहानी लिखकर उदय प्रकाश ने समाज, सत्ता, परिवर्तन और संवेदना को एक नया अर्थ दिया, वही प्रियंवद ने ‘बूढ़े का उत्सव’ तथा ‘खरगोश’ जैसी कहानियां लिखी है जो संवेदना के स्तर पर एक अलग तरह का अर्थ ग्रहण करती है। नब्बे के बाद की हिन्दी कहानी में संवेदना दो स्तरों पर देखी जा सकती है- एक नागर संवेदना और दूसरी ग्रामीण संवेदना। नागर संवेदना के तहत निर्मल वर्मा, उदय प्रकाश, जया जादवानी, एस आर हरनोट आदि ने बेरोजगारी, शहरीकरण, एकाकीपन, त्रासदी, प्रेम से उभरी और खत्म हुई त्रासदियों को उभारा है। ग्रामीण संवेदना की कहानियों में गाँव की मूल समस्याएं, बेरोजगारी, विस्थापन, जमीन से बेदखली, खेती की जमीन पर कल कारखानों का उग आना आदि कई मुद्दे उभारे गये हैं। ग्रामीण संवेदना को पुन्नी सिंह, संजीव, महेश कटारे, कुंदन सिंह परिहार, प्रकाशकांत, अखिलेश आदि कई लेखकों ने अपनी कहानियों में दर्ज किया है। संजीव ठाकुर की कहानी ‘झौआ बेहार’ ग्रामीण संवेदना की सशक्त कहानी है जिसमें शहर में आये एक युवा के अस्तित्व खो जाने की विडम्बना मौजूद है। कहानी के क्षेत्र में नये सिरे से प्रस्तुत हुई दलित-आदिवासी संवेदना भी विशेष मायने रखती है। विशेषकर दलित-आदिवासी समाज की चिंताएं ‘युद्धरत आम आदमी’ जैसी कई महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों में मुखर हुई है। इसके अलावा हंस, वागर्थ, आजकल, पश्यंती, सारिका, गंगा, समकालीन जनमत आदि पत्रिकाओं ने भी आमजन पर केन्द्रित अंक निकालकर नए समाज का स्वप्न देखा है। नब्बे के बाद साहित्य के क्षेत्र में विशेषकर कहानी लेखन में दलित और स्त्री विमर्श भी मुख्य रूप से उभरकर आये जिसने जनमानस की संवेदनाओं को प्रभावित किया है। ओम प्रकाश वाल्मिकी, मोहनदास नैमिशराय, विमल थोरात, तुलसीराम, जयप्रकाश लीलवान, द्वारका भारती, दयानंद बटोही, कैलाश वानखेड़े, अजय नावरिया आदि कई लेखकों-आलोचकों ने कविता के साथ-साथ कहानियाँ लिखकर दलित चेतना को मुखर किया और मनुष्यधर्मी चिंतन को सामने लाया है। कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, रमणिका गुप्ता, मैत्रेयी पुष्पा, नासिरा शर्मा, मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल, अनामिका, नीलेश रघुंवंशी, लवलीन, जया जादवानी, प्रभा खेतान, मनीषा कुलश्रेष्ठ, मेहरुनिसा परवेज आदि लेखिकाओं ने स्त्री अस्मिता एवं चेतना को मुखर करके विमर्श की धारा विकसित की है। इस स्त्री विमर्श ने साहित्य के द्वारा स्त्री संबंधों की पड़ताल, स्त्री स्वतंत्रता, मुक्ति की आकांक्षा को नये संदर्भो से व्याख्यायित किया है। सीमोन-द-बोऊवार को एक बार फिर से व्याख्यायित किया, खारिज किया और फिर  स्वीकार भी किया है।
समकालीन समय तक आते-आते हिन्दी कविता एक लंबा रास्ता पार कर चुकी थी। कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, चंद्रकांत देवताले, विनोद कुमार शुक्ल आदि कई कवि अपनी कविता को एक नई जमीन पर ला चुके थे। समकालीन कविता हमारे समय की सबसे सचेत कविता है। इन कविताओं ने समय की चिंताओं को सबसे ज्यादा पकड़ा। इस समय की हिंदी कविताएँ ही नहीं बल्कि भारतीय कविताओं की भी यही चिंता रही है। एक ही समय में भारतीय कविता चाहे वह किसी भी प्रादेशिक या क्षेत्रीय भाषा की क्यों न हो उनकी चिंता भी इसी समय को लेकर रही है। क्योंकि कविता कभी भी अपने समय से विमुख नहीं होती है। भारतीय कविताओं ने इस समय को लेकर जो प्रतिरोध दर्ज किया उसका उजला पक्ष यह है कि वैचारिक रूप से इन भाषाओं की कविताओं ने एक दूसरे को भी समृद्ध किया है। समकालीन समय में तेजी से राजनैतिक घटनाक्रम बदले हैं। इसी कारण यह बेहद घटना प्रधान समय भी रहा है। इसी के चलते भारत दुनिया के नक़्शे पर तेजी से उभरा भी है जिस पर सभी ध्यान देने लगे हैं और हमारी बातें सुनी भी जाने लगी है। इसकी गूंज हिंदी कविता में सुनी जा सकती है। हिंदी कविता उन क्षेत्रों में भी लिखी जा रही है जो भारतीय क्षेत्र नहीं है। राष्ट्रवाणी पत्रिका जो महाराष्ट्र से प्रकाशित होती थी जिसमें हिंदी के लेखक बहुतायत में प्रकाशित हुए। मुम्बई से निकलने वाली कई हिंदी पत्रिकाएं जैसे- धर्मयुग, सबरंग आदि में भी कई कविताएँ प्रकाशित है। कोलकाता से वागर्थ जैसी पत्रिका आज भी निकल रही है। इन सभी पत्रिकाओं में हमारे समय की चिंता मुखर हुई है। यही चिंताएं भारतीय कविता में भी देखी जा सकती है।
हमारे समय में कविता की पृष्ठभूमि को देखेंगे तो एक विशेष बात दिखाई देती है और वह है अपने समकाल और समस्याओं की अभिव्यक्ति। आलोक धन्वा, वेणुगोपाल जैसे कवि अपनी कविता में जिस आक्रामक तेवर में दिखाई देते हैं, वह अपने पूर्ववर्ती धूमिल की याद दिलाते हैं। धूमिल ने लिखा है- “कविता भाषा में मनुष्य होने की तमीज है।” आलोक धन्वा की ‘गोली दागो पोस्टर’ जैसी कविताएँ एक ख़ास तरह के बदलाव को इंगित करती है। अर्थात् कविता में विषयों की बहुलता के साथ-साथ कवियों के स्वर भी विविधता लिए हुए हैं। जिसमें हर वर्ण और वर्ग के साथ-साथ विभिन्न पेशों से जुड़े स्त्री-पुरुष अपनी विशिष्टता के साथ अपनी बात या अपने जीवनानुभव कविता में लेकर आये हैं। आज हमारे सामने समकालीन कविता कई रूपों में हैं। हमारे पूर्ववर्ती कवियों के प्रतिरोध के स्वर इधर के दिनों में धारदार हुये है। अगर जोखिम उठाने वाले पुराने कवियों के कविकर्म को देखेंगे तो पता चलता है कि पंजाबी में लिखनेवाले पाश तथा हिंदी के मानबहादुर सिंह जैसे कई कवियों की हत्याएं हुई। त्रिलोचन, नागार्जुन, शमशेर, रघुवीर सहाय, धूमिल, मुक्तिबोध जैसे कई कवि हैं जिनकी गूंज आज भी बहुत दूर तक सुनी जा सकती है। वे वर्तमान कविता के मार्गदर्शक है। इधर के दिनों में लिख रहे नए कवियों के समक्ष नए संकट और चिंताएँ है जिसका जिक्र समाज में चल रहे संघर्षों के साथ-साथ कविताओं में आ रहा हैं।  समकालीन कविता को जब हम देखते हैं, तो उसमें राजेश जोशी, लीलाधर मंडलोई, कुमार अम्बुज, देवी प्रसाद मिश्र, बद्रीनारायण, जितेन्द्र श्रीवास्तव आदि कई महत्वपूर्ण कवियों ने अपनी निजता और सामाजिक सरोकारों को बहुत गहरे ढंग से एक विशेष प्रकार की यथार्थपरक दृष्टि के साथ मुखर किया है। इस नई सदी में वसंत सकरगाये, बहादुर पटेल,  अशोक कुमार पाण्डेय, निशांत, अरुणाभ सौरभ, उमाशंकर चौधरी, शिवदत्त वावलकर, सुजाता, विमलेंद्र त्रिपाठी आदि कई कवियों ने कविता में सामाजिक सरोकारों के निर्वाह का अगला चरण शुरू किया हुआ है। मनुष्य की चिंता को लेकर अभी भी सबसे ज्यादा संभावनाशील विधा कविता है। इस बदलते हुए समय में बड़ी तेजी से सामाजिकता आहत होने लगी है और मनुष्यविरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया जाने लगा है। इसीलिए इसके प्रतिपक्ष में खड़े होकर कविता के मार्फ़त मनुष्यधर्मी संवेदनाओं संवारने का कार्य विभिन्न पत्रिकाओं के कविता केंद्रित कई विशेषांक प्रकाशित करके किया जा रहा है।
इधर के दिनों में हमारे देश की स्थिति गृह युद्ध से ज्यादा घातक है। हर जगह जाति, वर्ग, वर्ण, राजनीति, अर्थ और वर्चस्व के मुद्दों पर हिंसा हो रही है। सबसे घातक इस समय में सत्ता पर आसीन वर्चस्ववादी ताकतों के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठ रही है। जबकि एक बार अपने वक्तव्य में भूतपूर्व महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी जी ने कहा था कि ‘जनता ने सवाल पूछने चाहिए’। सत्ता के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति और सत्ता में बैठे लोगों से सवाल होना चाहिए, खासतौर पर ऐसे समय में जब सबसे ऊंची आवाज में बोलने वालों के शोर में असहमति की आवाजें डूब रही हैं! हमारे देश में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद उभर हुई राजनीति और पिछले तीन वर्षों से आई सत्ता ने देश के जनमानस को बहुत प्रभावित किया है और इससे राजनीति भी प्रभावित हुई है। निष्पक्ष और तटस्थ भाव से देखा जाये तो अनुशासनात्मक आचरण वाली कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं है तथा सत्ता व्यक्तियों पर केंद्रित होकर रह गई है। यह समाज के लिए नुकसानदायक है। समय रहते ही यदि तानाशाही और व्यक्ति केंद्रित सत्ता को नियंत्रित नही किया गया तो अगले दस सालों में अनुशासन की सीमा ख़त्म हो जायेगी और लोग बगावत पर उतर आयेंगे। उसके बाद सबका राजनीतिक अस्तित्व खतरे में होगा। इसकी अनगुंज अभी से धीरे-धीरे साहित्य में उठने लगी है। मतलब राजनीति और सत्ता के प्रतिपक्ष में साहित्य अपना प्रत्याख्यान प्रस्तुत कर रहा है।
वैसे देखा जाये तो हिन्दी साहित्य जगत फूहड़, छिछोरे, नाटकबाज और तथाकथित विचारधाराओं को ओढ़कर चलने की नौटंकी वालों से भरा पड़ा है। कुछ लेखकों एवं आलोचकों द्वारा रोज नया विचार गढ़ा जाने लगा है। यह सिर्फ और सिर्फ प्रसिद्धि (?) पाने के लिए और अपनी कुंठाएं निकालने के लिए किया जा रहा है। रही सही कसर फेसबुक जैसा सोशल मीडिया पूरी कर रहा है। आये दिन मेरे पेज को लाईक करों, मेरा स्टेटस शेयर करो, मेरे स्टेटस पर कमेन्ट करों, मेरी किताब मंगवा लो, मेरे वाल पर टिप्पणी करो, मेरे चित्र देखो आदि बीमारी से हिन्दी के बड़े नामी गिरामी कवि, कहानीकार और उपन्यासकार ग्रस्त है। कई लोग इसी कुंठा में मर रहे हैं। विचारधारा वाट्स एप जैसे माध्यम पर भी लड़ाई का शक्ल ले चुकी है और वहां भी रूठना-मनाना और छेड़ना जैसे मुद्दे जोर पकड़ रहे हैं। इससे रचनात्मकता मर रही है और नये नये साहित्यिक राजनीति के अखाड़े बन रहे हैं। कोई वरिष्ठ लेखक कुछ कहता है और उसका अर्थ कोई और लिया जा रहा है। कई साहित्यकार आपस में ही दोषारोपण करने लगे हैं। इससे निजात पाने की आवश्यकता है। आजकल  तो हो यह रहा है कि बात बात पर किसी साहित्यकार या बुद्धिजीवी को धमकाया जा रहा है। किसी को पाक भेजने की धमकी मिल रही है तो किसकी दिन-दहाड़े हत्या की जा रही है। इस पर अगर इंसानियत के तर्ज पर सोचा जाये तो जो हो रहा है वह समूची दुनिया और मानवता को कई सदियाँ पीछे ले जाने के जैसा है। इस आपाधापी के समय में शिक्षा, स्वास्थ्य, जल, जंगल, जमीन, कुपोषण, भूख, बेरोजगारी और विकास के महत्त्वपूर्ण मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं। सत्ता की कुर्सी को बचाये रखने के लिए अवसरवाद को हवा दी जाने लगी है। इस कठिन समय में अपने परिवार को पालने और ज़िंदा रखने के लिए कड़ी मेहनत करने वालों के जीवन  संघर्ष और जद्दोजहद बढ़ रही है। लम्पट, लठैत और गुंडे मवाली जब सत्ता में आते हैं तो भाषा का सबसे पहले चीर हरण होता है। यह सब दुखद है कि एक सबसे बड़े लोकतन्त्र में भाषा का उचित इस्तेमाल करना भी हम सीख नहीं पा रहे हैं। हमारी संस्कृति बदल रही है और साहित्य के अपने गुट और खेमे बने हुये हैं जहां रोज नया कुछ बनता बिगड़ता है। अगर आपके मन में पूंजी के लिए अदम्य लालसाएं जोर मारती हो, अगर आप सबसे सौहार्द्र की बात करते हुए भयानक तानाशाह है तो आप अच्छे लोकप्रिय और चर्चित साहित्यकार कैसे हो सकते हैं। ज्ञानपीठ, ऑस्कर, बुकर और नोबल तथा बाकी छोटे-मोटे पुरस्कार, प्रमाणपत्र, प्रशस्तियाँ और अमीक्षा-समीक्षा तो यूँही मिल जाती है। बस अपनी रीढ़ की मजबूती को मरोड़ना और बिछने की कला में पारंगत होना होगा। दरअसल पीड़ा वहाँ से शुरू होती है जब आपके अंदर बरसों का जमा मवाद साहित्य बनकर कुंठा के रूप में फूटता है और आप प्रतिबद्ध, पंक्तिबद्ध और छंदयुक्त बनकर सबको एक सिरे से नकारने के लिए किसी एक विधा पर सवार होकर विश्व के पुरस्कारों को फतह करने की आस में निकलते हैं। इन स्थितियों में हम ये भूल जाते हैं कि जिस सरजमीं से रेंगना सीखा था, उसे दलदल बनाकर वही एक वटवृक्ष बनने का स्वप्न संजो लेते है जिसके नीचे पौधे तो दूर, दूर्वा का एक हरित तिनका भी सांस ना ले सकें! आजकल तो साहित्य की मंडी में छपास की भूख वालों की तमन्ना पूरी हो रही है। इस मंडी सजायी गयी किताबें चुपचाप अपने जिस्म रुपी पन्नों को लहराते बिखराते और इंतज़ार करने लगी है कि उन्हें कोई ग्राहक मिल जाये। प्रकाशक और लेखक के दुःख दर्द, लेखकों की आपसी होड़, जलन, ईर्ष्या, और अपने ही साथ के लेखकों को गड्ढे में धकेले जाने के भयानक षड्यंत्र होने लगे हैं। साहित्य का पूरा माहौल रणनीति और राजनीति में बदल रहा है। इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार करके संभावना की तलाश करने की आवश्यकता है।
साहित्य की उपादेयता को लेकर एक सवाल जिज्ञासावश उभरता है कि सिर्फ कविताओं और कहानियों से क्रान्ति हो पाती तो पाश की ह्त्या कैसे हुई? गोरख पाण्डेय और दुष्यंतकुमार ने आत्महत्या ही क्यों की थी? साहित्यकार कविता, कहानी और साहित्य में क्रान्ति की बातें कर सकते हैं। वे लोक जीवन, भाषा और बोलियों के मिथकों का दोहन और शोषण करके खूब पुरस्कार, यश, नाम और कीर्ति भी छीन-छानकर अपने खाते में बटोर सकते हैं। लेकिन क्या वे वास्तविक जीवन में अच्छे इंसान कह्लायंगे? असल में इस तरह के साहित्यकार राजनीति, सत्ता और व्यवस्था के गुलाम होते हैं। अगर वे अपने लिए बने-बनाये फ्रेम और कम्फर्ट ज़ोन से निकलेंगे तो उन्हें जीवन की हकीकत मालूम पड़ेगी। वस्तुतः ये सब पूंजी को पाने के घटिया और शॉर्टकट वाले तरीके है जो आजकल ज्यादा प्रचलन में है। जनता के हमदर्द बनकर जनता का शोषण करना, पूंजी का मोह मन में लिए चाटुकारिता की दुनिया में छदम रहना या बुद्धि की बात को नकारकर मूर्खों की दुनिया में फ्रेमबद्ध लोगों को सलाम ठोकना कहाँ की कविता या साहित्य है। यह सब तो मोह माया है। असली साहित्य ग़दर का है जिसमें व्यवस्था को नकारकर, घर-परिवार छोड़कर, संसार में रहकर पारंपरिक संस्कृति के विरुद्ध क्रान्ति करने का आह्वान किया जाता हो। असली साहित्य वह है जो छत्तीसगढ़ के जंगलों में अनुराधा कोबार्ड गांधी रचती है तथा पी. साईनाथ जैसा आदमी दुनियाभर में घूमकर असल में हाशिये पर पड़े लोगों का दर्द कोरे पन्नों पर उकेरता है तथा समूचा जीवन एक मिशन की शक्ल में जी लेता है। वह समाज के लिए आईकॉन बन जाता है। महानगरों में रहनेवाले और प्रशासनिक सेवाओं के अफसरों की घटिया कविता, कहानी या थोथे ललित निबंधों में से साहित्य की नश्वरता बघारने वाले स्वयंभू लेखकों की कमी नहीं है। साहित्य के नाम पर चिरौरी करके प्रतिष्ठित होनेवाले लोग रचनाधर्मिता मर्म क्या समझेंगे? इन हालातों के बीच हिन्दी का यह दुर्भाग्य है कि इसमें वह तहजीब नहीं है जो उर्दू या फ्रेंच में होती है। कितने भाषाओं के शब्दों को लेकर बनी यह हिंदी भाषा कुछ शिक्षाविदों एवं राजनैतिक रूप से कमजोर लोगों की महत्वकांक्षा और ऊँचे एम्बीशन की शिकार हो गयी है। हिन्दी की लेखन-परंपरा में से जो भी विश्वविद्यालयों में लिखाया-पढ़ाया जा रहा है वह कालातीत हो गया है। वीर गाथाकाल से लेकर आज तक बंटे हुए साहित्य-समय में और दोहा, सोरठा से लेकर श्रृंगार रस और वीभत्स रस में डूबा हिन्दी का संसार विश्व फलक पर क्यों नहीं छा सकता? हाँ, यह दीगर बात है कि इधर किसी की भी दो-तीन किताबे आने के बाद अब हिन्दी में बुकर, मैगसेस और नोबल के लिए विश्व विचारवान हो रहा है। परन्तु अभी भी यह प्रश्न विचारणीय है कि इन दिनों जो पत्रिकाएं संपादित की जा रही है उसमें आन्दोलन से लेकर जमीनी हकीकतों का यथार्थ परिलक्षित क्यों नहीं होता है? अतः वास्तव में राजनीति, सत्ता और संस्कृति के बरक्स साहित्य को नए परिवेश और सामयिकता के आलोक में देखने-परखने की आवश्यकता है।
(इस आलेख के लिये बहादुर पटेल ने भी अपने विचारों से सहायता प्रदान की है।)