Friday, April 3, 2020

Corona 2/3 April 2020

जब नाश मनुज पे छाता है तो विवेक सबसे पहले मर जाता है
सम्बोधन ना हुआ मजाक हो गया
◆◆◆
इससे क्या होगा ? क्या मजाक बना रखा है इस देश के पढ़े लिखें लोगों का - जिस देश के सबसे ज्यादा डॉक्टर्स, सॉफ्ट वेयर इंजीनियर, कुशल लोग दुनिया भर में काम करते है, जिस देश में IIT, IIM,BARC, CAT, IIE, Atomic research centers, Medical Colleges से लेकर चोटी के शिक्षा संस्थान है वहाँ घोर अवैज्ञानिक माहौल - घण्टा बजाओ, दिया जलाओ, मोमबत्ती जलाओ - क्या हो गया है आखिर हम सबकी सामूहिक चेतना को - हम सब विक्षप्त हो गए लगता है
5/4/20 - 9 बजे - 9 मिनिट ....
कोई वैज्ञानिक बताएं - उस समय कोई बड़ा संकट होने वाला है क्या ? और अब फिर उस दिन 9 मिनिट के बाद हुड़दंग तो नही होगा ?
कुछ पल्ले नही पड़ रहा - विरोध नही समर्थन है पूरा पर क्या निहितार्थ है इसके, कुछ विज्ञान की बात करो भिया , इमोशनल अत्याचार मत करो - अंधकार करके दिया और मोमबत्ती जलाना
अंधेरा क्यो ? अब मतलब प्रशासन उपरोक्त समय पर बत्ती गुल कर ही देगा अर्थात, दया कुछ तो गड़बड़ है - इतना छोटा सन्देश और सारगर्भित भी !!!
स्थितियां नियंत्रण से बाहर हो गई है और हो सकता है यह सामूहिक क्रंदन और शोक का पूर्वाभ्यास है - 5 तक संख्या कितनी हो जाएगी कहा नही जा सकता
◆◆◆

कही मालूम तो नही पड़ गया कि मेरा जन्मदिन है उस दिन और पूरा देश रात को मोमबत्ती जलाकर मुझे " हैप्पी बड्डे बोले "
भोत भोत धन्यवाद - जीवन मे पेली बार 130 करोड़ मेरे भगिनी बन्धु मेरे कूँ जन्मदिन की बधाई देंगे
लभ यू हमेंशा रहेगा आप पर मोदी जी
***
खुदा ना खास्ता, ईश्वर, अल्लाह, जीसस, वाहे गुरु ना करें कि
किसी मंत्री, किसी मुख्यमंत्री की कोरोना से अपढ़, मूर्ख, गरीब, भिखमंगी, मजदूर, सड़कों पर नंगे पांव चलने पर उतर आने वाली घटिया किस्म की और बेबस जनता का बचाव करते समय मृत्यु हो जाये
यदि हो गया तो कितना मुआवजा उसके परिवार को मिलेगा - अनुकम्पा नियुक्ति, पेंशन, पीपीएफ, ग्रेज्युटी, आदि कितनी होगी
और महत्वपूर्ण कि कौनसी सरकार देगी
बहुत कन्फ्यूज हो गया हूँ - कृपया ज्ञान दें
***
हे कोरोना नरेश, सर्वशक्तिमान, विश्वव्यापी सम्प्रभु - एक करम कर - हम हिंदुस्तानियों को तेरी जात बता दें
ताकि हम अपनी औकात और ताकत के अनुसार तेरी आवभगत कर सकें - यदि तेरी जात के कुछ अनुष्ठान , विधि विधान हो तो वो भी बता ताकि तेरी सेवा -सुश्रुवा में कोई कमी ना रहें
अभी हम लोग समझ नही पा रहें - सगुणी - निर्गुणी, द्वैत - अद्वैत , साकार -निराकार, सिया - सुन्नी, दरगाह और तब्लीगी, मरियम - जीसस, ईश्वर- अल्लाह में उलझे हम लोग बेहद शंकित है
मानव सभ्यता के विकास और भलाई के लिए मेहरबानी करके यह और बता दें तो कृपा होगी
***

Sunday, March 29, 2020

Posts of 20 to 29 March 2020 including Declaration of testing and experimentation , Corona etc

टीवी रामायण का तो पता नहीं, तुलसीकृत मानस मेें राम जरूर कहते हैं -
" जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी,
ते नृपु अवसि नरक अधिकारी "

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कबीरा सोई पीर है - जो जाने पर पीर
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हम पीड़ाओं के सामूहिक शिकार है - एक भद्दे लोकतंत्र और आवारा मौलिक अधिकारों के पीछे के बदरंग चेहरों को पहचान नही पा रहें है - संविधान में निहित और वर्णित कर्तव्यों को और नीति निर्देशक तत्वों को भी कड़ाई से लागू नही करवाया जाता - तब तक यह बेख़ौफ़ आवारापन बना रहेगा देश में
अपने आसपास देखिये कितने लोग है जो सरकारी सेवा में है और इस समय जरुरी सेवाओं में व्यस्त है या ड्यूटी कर रहें है छोटे से छोटे जिले की आबादी 3 से 4 लाख तो होगी, जनसँख्या विस्फोट की अभी बात करना बेमानी है, पर इस 3 या 4 जनसँख्या के लिए कितने डॉक्टर्स है, पुलिसकर्मी है और प्रशासन के लोग है -यह सँख्या औसत के हिसाब से भी निकालेंगे तो न्यून या नगण्य होगी
एक हम है कि उत्पात मचाये हुए है नाक में दम कर दिया है, घूमना है, खरीदी करना है, जन्मदिन मनाने है , कर्फ्यू देखना है, भजन करना है सुंदर कांड करने है , जुम्मे की नमाज पढ़ना है, चर्च की प्रार्थनाएँ करना है, अरदास करने जाना है, प्रदर्शन करना है और इस सबके पीछे ताकत है - संविधान जो धर्म को मानने की छूट देता है - धर्म निरपेक्ष के बरक्स
सब हो - बिल्कुल हो, पर किसकी कीमत पर अपनी जान की या समाज की सामूहिक बलि देने को उतारू है आप - घर रहने में क्या दिक्कत है , आपको हंसी ठिठोली करने को नेट चालू है ना , घर के लोगों के साथ समय बीताईये ना - कुछ भी करिये पर बाहर मत निकलिए - इस समय सब भूल जाईये ना
थोड़ा गम्भीर होकर सोचिए कि इतने चंद लोग जो व्यवस्थाओं में लगे है - वे आपातकालीन व्यवस्थाओं से निपटे या भीड़ का मार्गदर्शन और निदर्शन करें - हमने अपने आकाओं पर कभी रिक्त पदों को भरने के लिए दबाव नही बनाया, बाद में तदर्थवाद हावी हो गया - हर कोई तदर्थ हो गया तो इस वृहद देश की स्थाई समस्याओं के लिए विजन और मिशन वाले स्थाई लोग कहाँ से आते
आज इन चंद मुठ्ठी भर लोगों के प्रति एहसान जताते हुए मौलिक अधिकारों को भूलिए और अपने कर्तव्यों की याद करिये - यह अनुशासन का पर्व है - संयम और उदारता बरतने की घड़ी है, आपके पार्टी और नेता प्रेम से ज्यादा आपके असली एवं व्यवहारिक देश प्रेम की जरूरत है - क्योंकि आपने जिसे भी चुना है देश के लिए चुना है , जब देश ही नही रहेगा तो आपकी निष्ठा और राजनैतिक प्रतिबद्धता का क्या अर्थ रह जायेगा
हम सबकी लापरवाही का नतीजा यह हुआ है कि करोड़ों भारत माताएं अपने नौनिहालों को लेकर दो - दो सौ किलोमीटर सूखी छाती से चिपकाए पैदल चल घर पहुंचने के उपक्रम कर रही है, करोड़ो कर्मवीर और श्रमिक दिन- रात अथक चलकर घर पहुंचने की जद्दोजहद कर रहें है , बच्चे सड़कों पर है बगैर पेट में एक दाना लिए चल कर घर लौटने को है , बुजुर्ग खाँसते हुए धूप बरसात सहकर लौट रहे है घरों की ओर - पर आपकी उद्दण्डताओं के कारण कर्फ्यू लगाना पड़ा है देश में और ये सबसे ज्यादा भुगत रहे है
शर्म करिये जरा, सोचिए दिल्ली से बिहार के पूर्णिया की दूरी या नागपुर से जबलपुर की दूरी - बड़ा मजदूर वर्ग पैदल चल रहा है - कैसा भारत बना दिया है हमने और यह सब ढाँकने और सुचारू रूप से मैनेज करने को अरबों रुपये जो हमारे घाम और मेहनत से बने है - खर्च हो रहें है, सरकार का नही - हमारा आपका रुपया है यह - इतनी समझ नही आपकी, कमाल है
जिस देश में हर राज्य में लगभग प्रबंधन के श्रेष्ठ आईआईएम है, आईआईटी है, हजारों महाविद्यालय है, सैंकड़ों विश्व विद्यालय है , हजारो शोध संस्थान और विश्लेषणकर्ता है - बावजूद इसके हमारी योजनाओं और क्रियान्वयन का यह हाल है - 73 वर्ष की आज़ादी , जग सिरमौर बनने की होड़ - उफ़
मित्रों , घर में रहिये हो सकता है कि 25 दिन बाद हममें से कोई यह पढ़ने को भी शेष ना रहे , मैं भी लिखने या कोसने को ना रहूँ - आपके घर वीरान हो जाये , मोहल्ले सूने और गलियां अंधेरे बंद "डेडएंड" में तब्दील हो जाये फिर क्या होगा - किसके झंडे लेकर घूमेंगे, कैसा उत्सव मनाएंगे
संयम, सहानुभूति, समानुभूति और समर्पण जैसे मूल्य सीखे है ना - आईये हम अपने को तिरोहित कर दें वरना फिर किसी नूह को एक नाव लेकर निकलना होगा और याद रखिये अबकी बार उसकी नाव में हर प्रजाति का एक जोड़ा तो होगा पर मनुष्य नही

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प्रेम बाड़ी ना उपजे
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संवाद, प्रलाप, संताप, अवसाद, दूरी, आलाप, अनहद नाद, एकांत, निर्जनता जैसे शब्द लगता है कि जीवन का स्थाई भाव बनते जा रहें है
न पढ़ने की इच्छा, न लिखने का जुनून, फ़िल्म, गीत, खेल, गपशप, ना कुछ और - एक अजीब सा तनाव तारी हो गया है दिल दिमाग पर - एक मेंटल असाईलम यानि पागलखाने में कैद है जिंदगी
कोरोना का जो होगा सो होगा पर 15 अप्रैल के बाद समाज में मानसिक रोगियों का एक वृहद वर्ग ऐसा तैयार होगा -जो स्वकेन्द्रित, स्वसंचालित और स्वेच्छाचारी होगा - निरंतर हाथ धोता, अपनो से दूरी रखता, शंका और अविश्वास से परखता और संदेह के सर्वोच्च शिखरों पर अपने को अभेद्य किलों में कैद करता सा
यह तमाम लड़ाईयों और असंख्य छोटे बड़े विश्व युद्धों की विभीषिकाओं को झेल चुके और मौत का तांडव देखकर उबरे समाज से घातक होगा जिसे ना कोई कार्ल युंग लिख सकेगा ना फ्रायड - अब हमारे पास ज्यां पाल सात्र नही ना हक्सले और ना कोई बनना भी चाहेगा
इस उत्सव प्रिय और अति सामाजिक भारतीय समाज की ऊब तीन चार दिन में ही जिस तरह से सामने आई है - वह बेहद चिंतनीय है और डर यह है कि खुदा ना खास्ता यदि 15 अप्रैल के बाद एक दिन भी यह तथाकथित कर्फ्यू आगे बढ़ा तो लोग अपनी मौत की कीमत पर सड़कों पर आ जाएंगे - बाकी सब तो छोड़ ही दीजिये
फेसबुक पर प्रबुद्ध लोगों से लेकर आम जनों के पोस्ट [ यहाँ तक कि मैं खुद भी ], एक संक्रमित , बीमार और असहाय लाचार हो चुके नैराश्य भरे समाज के प्रतिफल नजर आ रहें है और यह दर्शाता है कि हम आदर्श रूप में भले ही कितना मुक्ति, आध्यात्म, वैराग्य, निर्मोही,सन्यास, जप, तप , ध्यान, विपश्यना या त्याग की बात करें - योग और सन्धानों की बात करें पर वस्तुतः हम निहायत ही कमज़ोर, पाखंडी और बेबस समुदाय है - जो कबीलाई संस्कृति में ही जी सकते है
और शायद यही हमारी ताकत है -लड़ना झगड़ना, तर्क वितर्क, राजनीति अनाचार और इसी से उपजता है प्यार और संगठित रहने की क्षमता, वैचारिक मतभेद, आगे बढ़ने की होड़, प्रतिस्पर्धा, गला काट दौड़, निंदा, स्तुति और ऐसे तमाम मूल्यों के बीच जीवन का अर्थ तलाशते और एक दिन चुपचाप मौत की नींद में सो जाने वाले हम लोग ऐसे ही है सहज, सरल और प्रेम, ईर्ष्या, द्वंद और कटुता से भरे हुए और मुझे "हम सब " एक समुदाय के रूप में ऐसे ही स्वीकार्य है
सबसे लड़ता हूँ पर अपने भीतर सबको गहराई से महसूस करता हूँ - सबके लिए प्रेम है सहानुभूति और समानुभूति है और लड़ने झगड़ने से हर कोई दिमाग मे रहता है और उनके तर्कों से सीखता हूँ पर अब इस निर्जन वास में बेहद अकेला महसूस कर हैरान हूं कि कैसे चार दिन निकल गए
मित्रों सम्हालिये अपने को और विश्वास रखिये कि ज़िंदा रहे तो इंशा अल्लाह फिर मिलेंगे - स्थगित जीवन का संगीत और राग भैरवी - झपताल और काली चार से निकल कर गाईये और झूमते रहिये
गुरुजी मैं तो एक निरंतर ध्याऊँ जी
दूजे के संग नही .....

या
माझ माहेर पंढरी ....
या
लग जा गले कि फिर ये हसी रात हो ना हो
***
"नाटक के पहले भाग में जो बंदूक दिखाई देती है उसका उसी नाटक के तीसरे हिस्से में दागा जाना अवश्यम्भावी है"
◆ अंतोन चेखव
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शायद अभी इस पूरे नाटक का तीसरा अंक शेष है - ना जाने यवनिका के आँचल में और क्या है
***
मित्रों
आज प्रधानमंत्री जो भी बोलेंगे उसको मेरा अभी से समर्थन है, बस बता देना करना क्या है
***
गम्भीरता से पूरे होशोहवास में यह घोषणा कर रहा हूँ कि यदि एम्स, Institute of Immunology या अन्य किसी भी संस्था को टीके बनवाने हेतु जीवित मानव की जरूरत हो तो मैं निशुल्क अपना जीवन, शरीर देने को तैयार हूं

मैं शक्कर , ब्लड प्रेशर का गम्भीर मरीज हूँ और लगभग 54 का हो चला हूँ - कुल मिलाकर Highly Vulnerable हो सकता हूँ - इसलिए देश मे गम्भीर संकट को देखते हुए मैं प्रस्तुत हूँ
I am damn serious on this issue. Ultimately some body has to initiate and i here by present my self. I will not charge any amount. Friends who know or work in R & D please proceed further and fulfill the formalities as soon as possible.
[ इस पोस्ट को अभी पब्लिक किया है इसे शेयर करिये ताकि किसी न किसी के माध्यम से मुकाम पर पहुँचे और सम्भवतः मैं, मेरी देह काम आ जाये - प्रचार प्रसार की लालसा कतई नही है मित्रों यह ध्यान रहें ]
***
जैसे "एक डाक्टर की मौत" अप्रतिम फ़िल्म थी वैसे ही हाल ही में अपने एक दोस्त यशस्वी लेखक / पत्रकार की बौद्धिक मौत से सदमे में हूँ
अब समझ आया कि आस्थाएं और विश्वास लोगों के होते है प्रतिबद्धताएं नही - पापी पेट, नौकरी और मजबूरी इंसान से सब करवा लेती है फिर यह तो विशुद्ध जुझारू पत्रकार ही था - कस्बों से रिपोर्टिंग करते हुए दर दर की खाक छानते हुए अपना मकाम बनाया था उसने
अक्षर से शब्द और फिर भाषा का संसार बुना था जिसमे चमत्कार ही चमत्कार थे और सम्भवतः इसी मायावी लोक में कुछ आयोजन , कुछ सरकारी मठों और कुछ निजी गढ़ों में फंस गया - चुलबुली महिलाओं के झाँसे में आने से मुगालते हो गए हो
और निजी स्पेस, जगहों का मोह भी आदमी से सब करवा लें जाता है, मराठी में हम कहते है कि जीवन में अक्सर हम पोपट बनते ही है और कोई चतुर काग या नार या घाघ अपने साथ बहा ले जाता है उद्दाम वेग से
कुछ नही कहना और - दुआएँ, प्रार्थनाएं
***
A Literary Appeal
◆◆◆

Wash Hands Like LADY MACBETH.
Seclude Yourself Like MISS.HAVISHAM.
Postpone Your Tasks Like HAMLET.
Eat Like FALSTAFF.
Wear Masks like BENEDICT.
Be Proud Like DARCY and Avoid Dancing With LIZZIES.
Don't Touch Or Steal Others' Kerchiefs Like IAGO.
Unlike ROMEO, Avoid Meeting JULIETs Who wait in the Balconies. Let Them Wait Till Morrow.
Don't Wander Around Like Ulysses.
Be Wise Like Beatrice.
Let The West Wind Blow
Listen to Nightingales,
Admire Daffodils.

Stay Home, Stay Safe.
***
जनता कर्फ्यू के आगे
◆◆◆

कल के थाली पीटो अभियान, 2024 के चुनाव जीतने की अग्रिम खुशी और शर्मनाक हरकतों के बाद 20 घण्टों की प्रशासनिक और मोदी जी की अपील व्यर्थ रही, हम मूर्खों ने मान लिया कि 12 - 14 घँटे घर मे रहकर कोरोना की त्रासदी खत्म हो गई
यह कर्फ्यू अब "जनता कर्फ्यू नही प्रशासनिक कर्फ्यू " हो कम से कम 31 मार्च तक पूरे देश में अनिवार्य रूप से - सुयोग्य पुलिस अधिकारियों के नेतृत्व में और इस सावधानी के साथ कि पुलिस की सुरक्षा भी सर्वोच्च हो स्वास्थ्यगत :-
●उन्हें हर तीन घँटे में विश्राम आवश्यक
● दवाई / सेनिटाइजर देना
● पर्याप्त मास्क आदि का प्रावधान हो
● कर्फ्यू के दौरान पौष्टिक भोजन
● जीप, छायादार वाहनों की व्यवस्था हो

उन्हें सभी प्रकार की भीड़, ध्वनि विस्तारकों को जब्त करने की प्रशासनिक ताकत, वाहनों को राजसात करने की ताकत और आवश्यक वस्तुओं के नाम पर दुकान खोल बैठे अड्डेबाजी कर रहे लोगों को भगाने की ताकत दी जाए
[ ताकत से यहाँ तात्पर्य state sponsored power से है ]
वे भी हमारे ही वृहद परिवार के हिस्से है पर बुजुर्गों की तरह जो सही ग़लत बता सकते है
स्थिति बहुत गम्भीर है और कल के जश्न को देखते हुए लगता है कि हम अभी मैच्योर नही कि किसी जननेता की अपील को सही मायनों में समझ सकें - सीधी सी भाषा में कहूँ तो लातों के भूत बातों से नही मानते
***
ट्रेन बंद कर दी
75 शहर लॉक डाउन है
कई राज्य भी इसी तर्ज पर है
डॉक्टर्स, नर्स, पैरा मेडिकल स्टाफ है नही
लेब नही, दवाईयां नही, बजट नही ढाँचे नही
गम्भीरता से मुद्दों को लेने के बजाय देश को जमुरा बना रहे है और कार्यवाही के नाम पर कुछ नही - धन्य है सरकार बहादुर - बहुत खूब , हम भी सभी सेवा कर्मियों के प्रति आजीवन आभारी रहेंगे पर नौटँकी बाज नही हम
कुछ नही कर पा रहे तो बंद करने के अलावा कोई विकल्प नही, डर यह है कि लोग अस्पताल जाएंगे तो दंगे, प्रदर्शन होंगे, तोड़फोड़ होगी - लोग सवाल पूछेंगे और जवाब नही है किसी के पास
अब कांग्रेस को भी दोष नही दे सकते 6 साल कम नही होते और अधिकांश राज्यों में खुद है या गठजोड़ की सरकार और जहां नही वहाँ रुपये की महिमा से खरीद ली
तो घण्टा बजाने के अलावा है क्या और सरकार के पास , जो लोग आज थाली और घण्टा बजा रहें है उनके हाथ में आखिर में सिवाय 🔔🔔🔔 के कुछ आना नही
पहले कार्यकाल में बड़ी आपदाओं से निपटे है आपकी ही सरकार ने इससे बड़े मामले भूकम्प हो या केदारनाथ त्रासदी तब ताली नही बजाई, घँटे नही बजे - आज स्वास्थ्य विभाग पर ये अचानक मेहरबानी क्यों - इमोशनल अत्याचार करके उन्हें चुप रखने की साजिश कि वे व्यवस्थागत कमियां जनता को ना बताएँ और बीमा कंपनियों का फायदा करवा दें इस दौर में
बवासीर के मरीज को शँख बजाना मना है और इस देश को बवासीर की बड़ी बीमारी है बजाइये घण्टा, गाली दीजिये आपकी समझ ही उतनी है ना घण्टा जितनी तभी थाली और तालियां पीट रहें है
आईये गाली दीजिये और अपना कूड़ा कचरा फैलाइये
आभारी हूँ कि इसे लिम्का गिनीज बुक में नाम लिखवाने की जिद नही की कम से कम उतनी मेहरबानी की - धन्य हो गया देश
***

Sandip Ki Rasoi -- March Last weeek 2020

बैंगन,करेला और आलू भूँजा
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बैंगन, करेले और छिले हुए आलू को साफ धोकर लम्बा लम्बा काट लें ( चार चार करेले बैंगन और आलू मात्र दो )
● मूंग मोगर को धोकर पानी में गला दें
● अब करेले और आलू को हल्दी और नमक लगाकर पंद्रह मिनिट के लिए रख दें
● पंद्रह मिनिट बाद साफ पानी से इन सबको धो लें - हल्का सा सूखा लें और फिर गर्म तेल में डीप फ्राई तब तक तलें - जब तक वो हल्के भूरे और कड़क ना हो जाये
● अब इसी तेल में मूंग मोगर की दाल का पानी निथारकर तल लें कड़क होने तक
● अब सभी को एक बड़े बाउल में मिला लें , ऊपर से सफ़ेद तिल बुरक दें और थोड़ा सा जीरावन और नींबू डालकर गर्मागर्म खाएँ
[ कल सीमा व्यास ने आलू भूँजा की बात की थी , Chaitali Nandy ने भी इसे लोकप्रिय बंगाली डिश बताया था जो माछ भात या दाल चावल के साथ खाई जाती है, पर अपुन ने इसका मालवी संस्करण बनाया एकदम नवाचारी - मूंग मोगर इसलिए डाली कि पर्याप्त प्रोटीन भी मिल सकेगा कार्ब्स के साथ, तिल से तेल यानि वसा और नींबू से विटामिन सी भी, जीरावन इसे स्वाद देगा और पाचक बनाएगा ]
● सभी चीजें सस्ती और सब जगह उपलब्ध होने वाली है
● खाईये खिलाइए और अपनी ऊर्जा सही जगह लगाइए
● शुगर पेशेंट्स के लिए पौष्टिक और परहेज का भोजन है - ध्यान रहें नमक जीरावन कम हो बस
● सभी चित्र विधि अनुसार क्रम में है
***
पौष्टिक चीजोनियन उत्तपम
◆◆◆
● तीन कटोरी चावल और एक कटोरी उड़द दाल साफ करके पानी में रात को गला दें
● सुबह दोनो को मिक्सी में पीस लें और कम से कम चार घँटे या खमीर आने तक ढाँक कर रख दें
● अब एक तवा गर्म करें और एक चम्मच तेल डालकर फैला दें और मिश्रण को गोल आकार में फैलाएं - इसकी परत थोड़ी मोटी रखें
● अब इस पर बारीक कटा प्याज, टमाटर, बंद गोभी और हरी मिर्च का सलाद फैला दें , बारीक कटा धनिया भी डाल दें
● एक ओर सिंकने पर पलट दें और सिंकने दें
● अब पुनः पलट दें और एक चीज़ स्लाइस बारीक टुकड़ों में तोड़कर लगा दें
● बस तवे से उतारकर गर्मागर्म खाएं और घर के लोगों की दुआएँ लें
● निश्चित रहिये कोई दोस्त नही आने वाला - कर्फ्यू जो है
● छुट्टियाँ है किचन में प्रयोग करिये और अपनी ऊर्जा का सार्थक इस्तेमाल करिये, बहुत ज्यादा पढ़ना लिखना भी नही हो सकता क्योंकि यह सकारात्मक समय नही है -दिमाग तनाव में हो तो कुछ सार्थक नही हो सकता, कम से कम मैं नही कर पा रहा
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Monday, March 23, 2020

Corona Govt of India - Policy and Some Notes 19 March to 24 March 2020

उद्दंड आशा और सकारात्मकता ( जो कल देशभर में जुलूस के रूप में प्रकट हुई ) से सतर्कता भरी निराशा और नकारात्मकता हजार गुना बेहतर है और लोकतंत्र में समालोचना करना स्वस्थ और जागरूक नागरिक होने का गुण है - अपनी सरकार, अपने राज्य प्रमुख और देश के नेताओं से सवाल करना कतई ग़लत नही है
उदय प्रकाश जी सही कहते है
"कुछ नही बोलता आदमी

मरने के बाद
कुछ नही सोचता आदमी
मरने के बाद
कुछ नही बोलने और
कुछ नही सोचने से
आदमी मर जाता है "

***
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबरों के हवाले से मित्र संदीप नाईक बता रहे हैं
कुछ कड़वी हक़ीक़तें भी जान लीजिए
◆◆◆

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक
भारतीय स्वास्थ्य सेवा फिलहाल covid 19 के पेंडेमिक से जूझने से लिये विशेष प्रोटेक्टिव क्लोथ्स (PPE that is quality personal protective equipment) से जूझ रही है

इंडियन मेन्युफेक्चर्स का कहना है वे जानते नही उन्हें क्या बनाना हैं उन्हें अभी तक हेल्थ मिनिस्ट्री से स्पेसिफकेशन नही मिले है, उनकी वजह से हेल्थ वर्कर में इंफेक्शन के चांस बढ़ रहे है, उससे मेडिकल फ्रेटरनीटी में असुरक्षा की भावना बढ़ रही है
स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक उन्हें 7.25 लाख बॉडी कवर और 60 लाख N-95 mask और 1 करोड़ 3 प्लाई मास्क चाहिए थे - वो भी वर्तमान हालातो में, राज्यो की अपनी मांग के मुताबिक इसमे बढ़ोतरी होनी तय है
प्रोटेक्शन वियर मेन्युफेक्चर्स एसोसिएसन के चेयरमैन का कहना है वे अलग - अलग ब्यूरोक्रेट्स के किसी निर्णय पर ना पहुंचने के निर्णय से फ्रस्ट्रेटेड हो गए है - " हम उन्हें 12 फरवरी से लगतार लिख रहे है और मिल रहे है, ऐसे में कोई भी कंपनी बिना तय मापदंडो के कुछ बना देगी और स्वास्थ्य कर्मियों को इंफेक्शन का चांस बना रहेगा "
अब बताईये सकारात्मकता कहाँ से लाये कोई और यह खबर मैंने रसोई में नही बनाई है - कल देश ने जिन लोगों को याद करके इतना बड़ा महान काम किया और ताली बजाई - सरकार बहादुर के आव्हान पर क्या हमारे स्वास्थ्य मंत्री त्वरित निर्णय नही ले सकते, इसलिये कहता हूँ कि 73 वर्षों से नागनाथ और सांपनाथों पर भरोसा करना छोड़िए - कथनी करनी के भेद वाले ये लोग महज आत्म मुग्धता के गम्भीर मरीज है और हम आप सब इनके शिकार
***
A Literary Appeal
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Wash Hands Like LADY MACBETH.
Seclude Yourself Like MISS.HAVISHAM.
Postpone Your Tasks Like HAMLET.
Eat Like FALSTAFF.
Wear Masks like BENEDICT.
Be Proud Like DARCY and Avoid Dancing With LIZZIES.
Don't Touch Or Steal Others' Kerchiefs Like IAGO.
Unlike ROMEO, Avoid Meeting JULIETs Who wait in the Balconies. Let Them Wait Till Morrow.
Don't Wander Around Like Ulysses.
Be Wise Like Beatrice.
Let The West Wind Blow
Listen to Nightingales,
Admire Daffodils.

Stay Home, Stay Safe.
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जनता कर्फ्यू के आगे
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कल के थाली पीटो अभियान, 2024 के चुनाव जीतने की अग्रिम खुशी और शर्मनाक हरकतों के बाद 20 घण्टों की प्रशासनिक और मोदी जी की अपील व्यर्थ रही, हम मूर्खों ने मान लिया कि 12 - 14 घँटे घर मे रहकर कोरोना की त्रासदी खत्म हो गई
यह कर्फ्यू अब "जनता कर्फ्यू नही प्रशासनिक कर्फ्यू " हो कम से कम 31 मार्च तक पूरे देश में अनिवार्य रूप से - सुयोग्य पुलिस अधिकारियों के नेतृत्व में और इस सावधानी के साथ कि पुलिस की सुरक्षा भी सर्वोच्च हो स्वास्थ्यगत :-
●उन्हें हर तीन घँटे में विश्राम आवश्यक
● दवाई / सेनिटाइजर देना
● पर्याप्त मास्क आदि का प्रावधान हो
● कर्फ्यू के दौरान पौष्टिक भोजन
● जीप, छायादार वाहनों की व्यवस्था हो

उन्हें सभी प्रकार की भीड़, ध्वनि विस्तारकों को जब्त करने की प्रशासनिक ताकत, वाहनों को राजसात करने की ताकत और आवश्यक वस्तुओं के नाम पर दुकान खोल बैठे अड्डेबाजी कर रहे लोगों को भगाने की ताकत दी जाए
[ ताकत से यहाँ तात्पर्य state sponsored power से है ]
वे भी हमारे ही वृहद परिवार के हिस्से है पर बुजुर्गों की तरह जो सही ग़लत बता सकते है
स्थिति बहुत गम्भीर है और कल के जश्न को देखते हुए लगता है कि हम अभी मैच्योर नही कि किसी जननेता की अपील को सही मायनों में समझ सकें - सीधी सी भाषा में कहूँ तो लातों के भूत बातों से नही मानते
***
कल फिर गैलीलियो और ब्रूनो को मारा और जलाया गया
बस देश अलग था
***

ट्रेन बंद कर दी
75 शहर लॉक डाउन है
कई राज्य भी इसी तर्ज पर है
डॉक्टर्स, नर्स, पैरा मेडिकल स्टाफ है नही
लेब नही, दवाईयां नही, बजट नही ढाँचे नही
गम्भीरता से मुद्दों को लेने के बजाय देश को जमुरा बना रहे है और कार्यवाही के नाम पर कुछ नही - धन्य है सरकार बहादुर - बहुत खूब , हम भी सभी सेवा कर्मियों के प्रति आजीवन आभारी रहेंगे पर नौटँकी बाज नही हम
कुछ नही कर पा रहे तो बंद करने के अलावा कोई विकल्प नही, डर यह है कि लोग अस्पताल जाएंगे तो दंगे, प्रदर्शन होंगे, तोड़फोड़ होगी - लोग सवाल पूछेंगे और जवाब नही है किसी के पास
अब कांग्रेस को भी दोष नही दे सकते 6 साल कम नही होते और अधिकांश राज्यों में खुद है या गठजोड़ की सरकार और जहां नही वहाँ रुपये की महिमा से खरीद ली
तो घण्टा बजाने के अलावा है क्या और सरकार के पास , जो लोग आज थाली और घण्टा बजा रहें है उनके हाथ में आखिर में सिवाय 🔔🔔🔔 के कुछ आना नही
पहले कार्यकाल में बड़ी आपदाओं से निपटे है आपकी ही सरकार ने इससे बड़े मामले भूकम्प हो या केदारनाथ त्रासदी तब ताली नही बजाई, घँटे नही बजे - आज स्वास्थ्य विभाग पर ये अचानक मेहरबानी क्यों - इमोशनल अत्याचार करके उन्हें चुप रखने की साजिश कि वे व्यवस्थागत कमियां जनता को ना बताएँ और बीमा कंपनियों का फायदा करवा दें इस दौर में
बवासीर के मरीज को शँख बजाना मना है और इस देश को बवासीर की बड़ी बीमारी है बजाइये घण्टा, गाली दीजिये आपकी समझ ही उतनी है ना घण्टा जितनी तभी थाली और तालियां पीट रहें है
आईये गाली दीजिये और अपना कूड़ा कचरा फैलाइये
आभारी हूँ कि इसे लिम्का गिनीज बुक में नाम लिखवाने की जिद नही की कम से कम उतनी मेहरबानी की - धन्य हो गया देश
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हो गया जनता कर्फ्यू
पटाखे फोड़कर लग रहा कि युद्ध जीत गए है
सब सड़कों पर है, थोड़ी देर में दुकानें भी खुल जायेंगी और कल से फिर वही
जैसी प्रजा होती है उसको अपनी किस्मत अनुसार राजा मिल ही जाता है
भक्ति, मूर्खता और पिछलग्गू की परीक्षा में हमें 100 / 100 अंक - मुबारक, बधाई
मंगल गाओ , द्वार सजाओ - आज रंग है री
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सच में यह देश विचित्र किंतु सत्य है - तभी ना कोई भी आता है और हांककर ले जाता है - अम्बानी हो, राम रहीम हो, आशाराम हो, चिन्मयानंद या महामहिम
आज मान लिया कि गांधी के बाद आप ही हो जिसकी अपील जनता मान लेती है
जियो हो लल्ला, ऐसी अपील गरीबी, शिक्षा , कुपोषण, जातिविहीन समाज, छुआछूत , महिला समता, समतामूलक समाज और आर्थिक बराबरी के लिए भी कर दो ना तो दुनिया के इतिहास में अमर हो जाओ
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जज़्बाती, मूर्ख और भयानक किस्म के चिपकू अभी भी वाट्सएप पर मंत्र, स्त्रोत, फालतू की बकवास और घटिया वीडियो भेज रहें है , गुरु घण्टाल लोग अलग नही मान रहें अपने भक्तों को विशुद्ध मूर्ख बना रहें है - जो गुरु घण्टाल काजू बादाम ख़ाकर मोटी दक्षिणा वसूल लेते है और छुआछूत करते है आम दिनों में वे आज जन हितैषी बन रहे है
अफसोस है कि मेरे संगी साथी वेद, ऋचाओं, धर्म पुराण, कुरान और ध्वनि के सुप्रभावों की बात करके मेरे जवाब देने पर बदतमीजी कर रहें है, जो लोग विज्ञान में परास्नातक है, विज्ञान के प्रचार प्रसार के नाम पर दुकानें चला रहें है, बड़ी बड़ी फैक्ट्रियों में बड़े पदों पर काम कर रहें है और पूरी तरह से मैकेनाइज्ड मशीनों पर काम कर रहें है - वे भी मूर्खता की पराकाष्ठा पार कर चुके है - शर्म आती है कि ये लोग इतने अंधविश्वासी और मिथक प्रिय है और बल्कि जानबूझकर इस गोरख धन्धे में शामिल है
धर्म गुरु भी अपना धंधा चला रहे है - अजीब अजीब धर्म खातों, पुराणों और कुरान से सन्दर्भ निकालकर बेवकूफियां फैला रहें है जबकि यदि यह सब इतना सशक्त होता और कोई डिवाइन पॉवर सच में होता तो मन्दिर, मस्जिद और गिरजाघरों या गुरुद्वारों पर क्यों ताले जड़ दिए जाते - सुरक्षित रहिये, अरे जिंदा रहोगे - तभी ना नमाज होगी या पूजा पाठ
बहरहाल, इसके अलावा WHO के नम्बर डिलीट कर करके थक गया हूँ , वीडियो के कचरे से मोबाइल हैंग हो रहा है , वैज्ञानिक पक्ष पर बात करने से गालियां अलग खा रहा हूँ - हम सब एक बर्बर युग में जी रहें है
कृपया कोरोना पर ज्ञान बांटना बंद कीजिए इनबॉक्स में आकर ग़दर मत करिए, वाट्सअप पर भी बकवास भेजना बंद कीजिए
मोदी के जनता कर्फ्यू को लेकर शपथ लो और सपोर्ट करो वो विशुद्ध चुतियापा है ही, कुछ बोल दो तो घटियापन पर उतर आते कमीने - भाषा तल्ख ही रखना होगी तब तक इन जल्लादों से मुक्ति सम्भव नही
शर्मनाक है यह सब
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अपील मित्रों, परिजनों एवं साथियों से
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● जो मित्र देवास शहर से दूर है, देश विदेश में है और उनके वृद्ध माता पिता या परिजन यही है और यदि उन्हें किसी प्रकार की मदद की जरूरत है तो कॉल करने, वाट्सएप्प करने या फेसबुक सन्देश देने में संकोच ना करें
● मैं अगली 31 तारीख तक यही हूँ, किसी भी प्रकार की मदद के लिए हिचकियेगा नही - अच्छा लगेगा मुझे
● इसके अलावा शहर में अचानक होने वाली किसी भी सम्भावित त्रासदी और घटना , दुर्घटना के लिए भी मित्रगण सम्पर्क कर सकते है
● हम जहां है जैसे है यदि किसी के काम आ सके तो अतिउत्तम होगा
● सनद रहे
● जो साथी इस मुहिम के साथ जुड़ना चाहे देवास या जहाँ है वहाँ से यहाँ जुड़ सकते है , इनबॉक्स में अपना मोबाइल दे सकते है
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4 दिन बाहर था
आते - जाते समय किसी भी स्टेशन पर कही भी ना स्क्रीनिंग हुई और ना किसी ने कुछ पूछा - देवास या शिवपुरी में
रेल में टीटी साहब भी बेतकल्लुफ़ी में थे , ऐसी अटेंडेंट भी बगैर मास्क और बगैर सावधानी के
हाँ, सफाई कर्मचारी बहुत मुस्तैद थे, हर एक घँटे में सफाई, शौचालयों की सफाई, पोछा और दवाई छींट रहे थे - उन्हें फीडबैक फॉर्म में श्रेष्ठ भी बोला, नगद इनाम भी दिया उन बच्चों को
लोग जनरल में भरकर घरों में जा रहें है उनके लिए कुछ नही
कर्मचारियों की कमी, सरकार की मजबूरी, विशाल जनसँख्या और सीमित संसाधनों की कमी से वाकिफ़ हूँ पर फिर यह कहना कि हम तैयार है, काम हो रहा है, व्यवस्थाएँ माक़ूल है, इंतज़ामात पर्याप्त है - यह सब बेमानी है फिर
सकारात्मक सोच रखूँ ज्ञानी कहते है, भाषा तल्ख है मेरी - मेरे गुरु कहते है, साथी मोदी विरोधी कहते है - एक बात बताईये मेरी क्या प्रधान मंत्री से व्यक्तिगत दुश्मनी है - घूमता हूँ जगह जगह, कमियां देखता हूँ नीति कुछ कहती है और क्रियान्वयन कुछ और दिखता है तो ना बोलूं और तल्ख भाषा नही मुद्दे है, बड़ी आबादी उपेक्षित हो रही है, लोकतंत्र में सवाल करना ग़लत है क्या और क्या प्रधान के बजाय विपक्ष से पूछूँ या किसी ब्यूरोक्रेट से जो आज मछली, कल खनिज विभाग और परसो केंद्र / विदेश में प्रतिनियुक्ति पर चला जाता है और उस जनसेवक की प्रतिबद्धता गत 72 वर्षों से संदिग्ध है
अब कोरोना को लेकर ही देखिये रेलवे लगातार कह रहा है कि हम सब कर रहें है पर इतनी गैर जिम्मेदारी वाला काम है यह, जबकि देवास तो जंक्शन है फिर क्यों सारी बागड़ खोलकर रख दी है
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क्यों स्पेन , इटली के ताली वीडियो से 🔔 के वीडियो अच्छे होना चईये कि नई
तो 21 को कर्फ्यू और 22 को घण्टा घड़ियाल, ढोल, ताशे, तबला, मृदंग, बैंड बाजे, पखावज, भोंपू , शँख, ताली सब बजाओ, दुनिया में सबसे अच्छा अपना प्यारा देश
जिसको पूरी लाल मिर्च लगती है वो यहाँ उल्टी ना करे
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जनता कर्फ़्यू
कल मप्र में कमलनाथ सरकार की डोली उठ रही है, देश भर में बचे खुचे लोकतंत्र के अनुयायी, मुठ्ठीभर कांग्रेसी प्रदर्शन कर सकते है इसलिए भी मोदी ने यह मुमकिन ना हो इसलिये जनता कर्फ्यू का नया शब्द लाकर इशारे किये है कि पुलिस एवं प्रशासन के लिए कि दो दिन है - तैयारी रखें
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सरकार की क्या तैयारी है इस पर एक शब्द नही है
घर में एक दिन रहने के बजाय लगातार यह बना रहे
तीसरा, घण्टा या ताली बजाने का वैज्ञानिक तथ्य क्या है मतलब गणपति को दूध पिलाने जैसा मामला है
कालाबाजारी ना करें कहकर व्यापारियों को रास्ता दिखा दिया , अभी से बाजार में हड़बड़ी मच गई है
सरकार यह बताएं कि राज्य और केंद्र ने क्या ठोस कार्यवाही की - सेनिटाइजर 240 रुपये में बेच रहे है केमिस्ट वो भी नकली कहाँ और किसको शिकायत करें
आवागमन, परिवहन आदि का प्लान क्या है,आवश्यक व्यवस्थाएं क्या है
अस्पताल में जांच के लिए ना जाएं तो क्या सरकार यह मान चुकी है कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था बहुत ही कमजोर और अपर्याप्त है
ब्लेक मार्केट वालों के लिए सजा का प्रावधान या खौफ क्या है
जनता कर्फ्यू रविवार को क्यों - सोमवार क्यों नही जब सब लोग काम पर होते है
थोडा सोचिये फिर कमेंट करिये, उजबक टाईप कमेंट्स का कोई मतलब नही
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22/3 को शाम 5 बजे बालकनी में खड़े होकर 🔔🔔🔔 बजाएं ताली बजाएं
गो कोरोना , गो कोरोना, गो कोरोना वालों की ग़जब समझ
बहुत गम्भीर संदेश दे रहें है हुजुरे आला
घण्टा बजाने का वैज्ञानिक पहलू क्या है - मित्रों आप तो पढ़े लिखें है ना
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जनता कर्फ्यू
मतलब कुछ बड़े खेल होंगे देश में और
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चेरनोबिल, भोपाल गैस त्रासदी, मानव निर्मित त्रासदियाँ है और अब इसी क्रम में एड्स, स्वाइन फ्लू, इबोला के बाद कोरोना नई त्रासदी है और ये सारी हरकतें किसी एक या दो मनुष्य की अपेक्षा, रुपयों की हवस और नया कुछ करने की वजह से उत्पन्न हुए संताप है
हमें विकास के क्रम में यह भी सोचना लाज़मी होगा कि आखिर हम कहाँ जाना चाहते है और अंततः क्या पाना चाहते है कोख से कब्र के सफ़र में कुल मिलाकर पचास साठ बरस का जीवन है और बग़ैर यह सोचें कि हम क्या छोड़कर जा रहें हैं, के बजाय हम इस धरा पर हिंसक और विध्वंसक होते जा रहें है
शिक्षा और सार्वजनिक जीवन से मूल्य समाप्त होना और परिवारों का विघटन इसका एक बड़ा कारण है , आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी आवश्यकताएं सीमित कर वृहद दृष्टि, समझ और कल्याण की बात सोचें, किसी के पिछलग्गू ना बनते हुए अपने लक्ष्य, उद्देश्य और प्राप्ति को पुनः निर्धारित करते हुए जीवन को अपनी बनाई राहों पर चलने का प्रयास करें
यह दर्शन नही बल्कि आज के समय की आवश्यकता है - समझने वालों के लिए है, नासमझों को दूर रहने की हिदायत

Fansi - Some basic questions 20 March 2020

90 % बलात्कार वैवाहिक बलात्कार है, परिजनों द्वारा किये गए है
फांसी दिलवा दो वकीलों , न्यायविदों और फेसबुक के ज्ञानियों

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देश में सुप्रभात है आज
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आखिर 4 लोगों को फांसी दे दी गई आज सुबह
हमारे पास कोई और चारा था ही नही, उस निर्भया की माँ को शांति मिल ही गई होगी जो 7 साल से लगी थी सजा दिलवाने में - खूब मीडिया के सामने तमाशा किया, माँ शब्द के मायने क्या रह गए है अब
वो वकील फेल हो गए जो कल तक जुगाड़ में लगे रहें कि 4 लोग बच जाए, सारी न्याय व्यवस्था भी कितनी पंगु हो गई थी, राष्ट्रपति के पास कोई विकल्प नही बचा था, हमने सुधार के सारे विकल्पों पर पानी फेर दिया है
कितने सभ्य है हम यह भी साबित हो गया , तमाम बहस और मानवतावादी दृष्टिकोण और वसुधैव कुटुम्बकम , विश्व कल्याण की बात करने वाले लोग हम भारत के लोग - चार युवाओं को सुधारने में नाकाम रहे - अब जग सिरमौर बनेंगे - अम्ब विमल मति दें
न्याय हो गया - मुबारक हो, बलात्कार आज से बंद - ख़ुश हो जाओ महिलाओं - आज से पुरूष प्रधान समाज की बंदिशें खत्म है , सब ओर खुशियाँ है
निर्भया की आत्मा को भी खुशी है और वो अब मुक्त हो गई है, स्वर्ग में है और देश की बेटियों को निहार रही है और सुबह 530 के बाद 5 बलात्कार हो गए - कमला भसीन बोली अभी
फांसी बढ़िया और अचूक हल है सबका अब इसे ही एकमेव सदैव जीवित विकल्प के रूप में अपनाना चाहिए - साला कोई भी दुश्मन हो
हम कितने क्यूट है - सुप्रीम कोर्ट ही नही पूरी ज्यूडिशियरी बेहद बर्बर, पाशविक और नृशंस है - यह मान लीजिए और यदि यही निर्भया का भाई करता किसी लड़की से तो उसकी माँ यह मांग करती
इस ज्यूडिशियरी की हिम्मत नही कि आशाराम, चिन्मयानंद , राम रहीम, सेंगर, माल्या, नीरव मोदी से लेकर तमाम राजनैतिक सामाजिक आर्थिक अपराधियों को फांसी दे दे
एक बार दिल पे हाथ रखकर पूछिये कि क्या हमने कोई अपराध नही किया है
हम कानून के विद्यार्थियों को फांसी उचित / अनुचित पर निबंध आता है लिखने को तमाम संदर्भों और प्रसंगों की व्याख्या करनी होती है

Monday, March 16, 2020

Posts of 15 and 16 March 2020 Pahal And Fake Article

पहल के 121 में अशोक अग्रवाल जी का एक आलेख छपा है जिस पर भाई शिरीष मौर्य ने एक पोस्ट में गम्भीर सवाल उठाए है - यह एकदम साफ़ साफ़ झूठ लिखने का मामला है
कल यह अंक पढ़ा तो अजीब लगा था अब लगता है कि " पहल " या तो बंद हो जाये या ज्ञान जी और दूसरे बूढ़े और चुके हुए लोग भी वहां से हट जाएं , हालात बहुत खराब हो गई है, बुढापे का साम्राज्य है और ये बूढ़े भी कुर्सी छोड़ना नही चाहते, पुरानी मान्यताएं लेकर बैठे है और कविता, कहानी, आलोचना में हिंदी की परिभाषाओं से बाहर नही आना चाहते
नये रूप में पहल छपने के बाद यदि समग्र रूप से भी देखें तो कुछ निहायत ही अपरिपक्व और उज्जड लोगों को लंबे समय तक श्रृंखलाबद्ध छापकर हिंदी का बहुत नुकसान किया पहल ने और इन लोगों ने इतना कीचड़ उछाला कि पहल ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है, इसलिये आज तदभव या अन्य पत्रिकाएं ज्यादा विश्वसनीय लगती है, मैं तो ये भी कहूंगा कि ज्ञान जी की पहल अपनी विचारधारा से भी भटक गई है एक एक कहानी, कविता या आलेखों को देख लें
निजी बातचीत में कई बार मैंने ये बातें सबसे सुनी और तर्क में साथ रखते देखी है पर सब डरते है कहने सुनने में - आखिर किस बात का डर है - जेब से रुपया देकर खरीदकर पढ़ते है कोई कागज़ में भी मुफ्त में नही लेते , एडवांस में सालभर का चंदा देते है तो बोलने में क्या दिक्कत है, आखिर पहल जैसी पत्रिका में नही कह पायें तो क्या गायत्री परिवार की कल्याण में बोलोगे, ऋषि प्रसाद में, ओशो टाईम्स में या सामना में लिखोगे
दुर्भाग्य है पर सच है, राजनीति में हम उम्मीद करते है कि बूढ़े जड़ हो चुके लोग हटें और नये युवा आगे आये और नई ऊर्जा से काम करें पर हिंदी की हालत तो बेहद घटिया है - पाँव कब्र में लटके है, अस्पताल में भर्ती है, वेंटिलेटर पर सुप्तावस्था में है पर सम्पादक का मोह नही छूट रहा और बेशर्मी से जमे रहेंगे आखिरी सांस तक , उनकी व्यक्तिगत मेधा और समझ पर सवाल नही पर ये बुढ़ापे में मतिभ्रम और कुछ भी करने की जिद, अकड़ और पद मोह का क्या करें और बात करेंगे वामपंथ की

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" वे वहाँ क़ैद है "
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प्रियम्वद की एक कहानी है - " वे वहाँ क़ैद है " - जिसमे इतिहास का रिटायर्ड प्रोफेसर मुहल्ले के गुंडे युवाओं की अश्लील हरकतों का शिकार होता है और सारा दिन साबुन से हाथ धोता रहता है, असल में मोहल्ले के आवारा लड़के उस प्रोफेसर के घर पर चढ़कर भगवा झंडा लगा देते है और वह प्रोफेसर उनके सामने ही विरोधकर झंडा निकालकर फेंक देता है, बदले में लड़के ना मात्र उसकी पिटाई करते है, उसकी बेटी की बेइज्जती भी करते है और उस बूढ़े प्रोफेसर से अश्लील हरकत भी करते है और इस वजह से उसके हाथ गंदे हो जाते है, यह कहानी सम्भवतः हंस के बहुत शुरुवाती अंक में छपी थी शायद 1992 में बाबरी मस्जिद के ढहाने के बाद किसी अंक में यह कहानी आई थी
इसी तरह का एक अश्लील वाक्या मेरे एक स्कूल में प्राचार्य रहते हुआ था, एक फौजी अधिकारी का बच्चा जब बहुत दिनों तक नही आया जब मैने पता किया तो उसके ब्रिग्रेडियर पिता ने बोला कि पता नही उसे क्या हुआ है वह दिन भर साबुन से हाथ धोता रहता है, उसे बुलाकर प्यार से पूछा तो उसने बताया कि कुछ सिविलियन छात्रों ने उसके साथ मारपीट ना करके अश्लील हरकतें की और वह उस सदमे से निपट ही नही पाया ,आखिर उसने पढ़ाई ही छोड़ दी, मैंने मालूम होने पर 3 छात्रों को स्थाई रूप से निष्कासित किया था
आज सारी दुनिया को दिन भर हाथ धोते देख ये दो वाक्ये प्रसंगवश याद आये, किसी ने तो जरूर कुछ घृणित किया ही है

Sunday, March 15, 2020

Posts of March 2020 II week

एक युवा कांग्रेसी मित्र, जो सिंधिया खेमे में था, अवसाद ग्रस्त है पूछ रहा है -
दादा, अब किस ओर से राजनीति करूँ
मेरा जवाब -
निष्पक्ष रहो, देश और समाज का सोचो
तटस्थ रहो , मुद्दों की बात करो
जो जनकल्याण की बात हो, उसे लिखो
लेखक बनो, साहित्यकार नही - राजनीति अपने आप सध जाएगी
***
इन सारे अफसानों में सबसे ज्यादा निराश किया कामरेडों ने, बसपाईयों, सपाइयों और गांधीवादियों ने - मोमता दीदी तो अनथक लड़ ही रही है घर में फासिस्ट ताकतों से लगातार
सबसे टुच्चे निकले कम्युनिस्ट जो बड़े बड़े आख्यान और यहाँ वहाँ घूमकर बकवास का अंबार लगाते थे, जबरन का कूड़ा पेलते थे और कस्बों शहरों में यारबाजी कर खाने पीने की अड्डेबाजियाँ करते थे
ससुरे दारू पीकर ऐसे बहकते थे कि इनको राज्य अभी पैग पूरा होने के पहले ही मिल जाएगा , दूम दबाकर बैठे है 2014 से
इन सबसे बेहतर तो एक्टिविस्ट और एनजीओ कर्मी है - जो चुटका, नर्मदा या किसी जमीनी आंदोलन के माध्यम से सरकारों की नाक में दम कर रहें है - फिर वो कोई भी पार्टी हो
मुलायम, अखिलेश, मायावती तो लगता है अब गौ पालन और अंडे बेचकर आजीविका चला रहे है, कांग्रेस के कमजोर लोग कम से कम लड़ तो रहें है भले एक सीट ना मिले या कोई घास ना डालें
इस सामूहिक आत्महत्या के लिए इन सबको नमन और बहुत हार्ड वाली श्रद्धांजलि
***
कई मित्रों को यह सन्दर्भ मालूम ना हो, उनकी जानकारी के लिए -
●●●
फॉस्ट एक क्लासिक जर्मन किंवदंती का नायक है, जो ऐतिहासिक जोहान जॉर्ज फॉस्ट पर आधारित है एरुडाइट फॉस्ट अपने जीवन से बेहद असंतुष्ट है, जो उसे असीमित ज्ञान और सांसारिक सुखों के लिए अपनी आत्मा का आदान-प्रदान करते हुए, एक चौराहे पर शैतान के साथ एक समझौता करने की ओर ले जाता है

***
अरबों की जायदाद, दून स्कूल से लेकर सिंधिया स्कूल और विदेशों में पढ़कर अपने बाप दादाओं की सम्पत्ति को देखने का शुल्क वसूल लें - वो गद्दार कह रहा है जनसेवा करने की, कभी जाकर इनके किले के नौकरों से पूछो कि शोषण की क्या इंतेहा है, इतनी अकूत सम्पत्ति में से किसी को छह गज जमीन भी दी जो अब सेवा करेगा
भ्रष्टाचार वो नही था जो बगैर किसी पद के ग्वालियर के प्रशासन के लोगों को घर बुलाकर बैठकें की है
अबे अब प्रधान मंत्री में देश का भविष्य सुरक्षित नजर आ रहा है 18 साल अलग अलग पदों पर रहकर खोखला तुमने ही किया देश को और तुम जैसे रजवाड़ों ने सामंतवाद के चलते देश को बर्बाद किया - अब समझ आई ट्यूबलाईट - क्या मतलब इत्ती पढ़ाई लिखाई का - ये प्रधान तो 2014 में आये
हंसी आ रही है कि इतने चिरकुट और कुपढ़ हो , इतनी समझ तो हमारी पंचायत के किसी अनपढ़ पंच को होती है, संघ और भक्त मंडली " महाराज की जय हो " - नारे नही लगा रही, प पू भागवत जी का ट्वीट आया क्या और आज अमित भाई नही थे सिंधिया लोकार्पण समारोह में - क्यों
यह तुम्हारे जैसे अवसरवादियों के लिए आखिरी पोस्ट है क्योंकि तुम पर लिखना मतलब खुद भी कीचड़ में जाना है, बस याद रखना तुम्हारे जिस बेटे को प्रचार में लेकर घूमते हो ना - एक दिन उसके सवालों का जवाब देना मुश्किल होगा - उम्मीद है यह हिम्मत तुममें कभी नही आ पायेगी - एक बार समर्थ रामदास और शिवराया का जीवन चरित्र ही पढ़ कर समझ लेते बाकी तो छोड़ ही दे
[ ज्योतिरादित्य सिंधिया Control + Delete permanently from dictionary ]
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CAA का पहला शरणार्थी आखिर नागरिकता लेने में सफल हुआ
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सोनिया, प्रियंका और राहुल गांधी यदि कांग्रेस छोड़कर राजनीति से कम से कम दस साल के लिए सन्यास ले लें तो फिर कोई संभावना है कि कांग्रेस दस साल बाद रिवाइव कर जाए
दूसरा, कांग्रेस को दलित, आदिवासी और मुसलमानों की सहानुभूति पाने वाली छबि से मुक्त होकर व्यापक देश के मुद्दों पर स्पष्ट बात करना होगी , बेरोजगारी - जाति प्रथा, आरक्षण, धर्म और योजनाओं के प्रशासनिक क्रियान्वयन पर साफ़ सुथरा व्यवहारिक रोड मैप रखना होगा
दलित, आदिवासियों और मुस्लिम नेताओं से परहेज कर मनुष्यों से नाता जोड़े तो बेहतर होगा - अभी सबसे ज्यादा नुकसान इन तीनों किस्म के भ्रष्ट नेताओं ने किया है
रॉबर्ट वाड्रा से लेकर चिदम्बरम जैसे तमाम विवादास्पद लोगों को कानूनी प्रक्रियाओं के तहत फ़ास्ट ट्रेक की अनुमति राष्ट्रपति से लेकर सुप्रीम कोर्ट से त्वरित न्याय करवाना होगा
काँग्रेस और गांधी परिवार में जब तक छत्तीस का [ कम से कम दिखावटी ] आंकड़ा नही दिखेगा तब तक जीर्णोद्धार संभव नही है
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मप्र में कांग्रेस को डुबोने में कांग्रेस के अलावा कोई नही था, जिन नये विधायकों को मौका देकर पार्टी ने सोचा था कि वे शिक्षित है उन्होंने सबसे ज्यादा कमलनाथ के गड्ढे खोदे और जवानी और पढ़ाई की हेकड़ी में सरकार डूबो दी, मज़ा तो अब आएगा जब ये नौकरी और धन्धा छोड़कर अपने अपने क्षेत्रों में जो करोड़ों का इन्वेस्टमेंट करके बैठे है - उसका डिसइनवेस्टमेंट करना पड़ेगा तब ससुरों को होश आएगा
खतरा बसपा, निर्दलीय और सपा वालों से नही था, नव निर्वाचित विधायकों के दलालों और एजेंट्स ने, [ जो मूल रूप से संघी थे और कांग्रेस सरकार में भाजपा के गुप्तचर थे ] ने सरकार के समक्ष इनका उपयोग कर अपनी रोटी सेंकी और इन अबोध बच्चो को कठपुतली की तरह इस्तेमाल किया जो कि शर्मनाक था
अब बजाना घण्टी और फिर बजाना सीटियां - कोई नही सुनेगा याद रखना
***