Saturday, September 22, 2018

Posts of 20- 21 Sept 2018

राफेल डील कोई बड़ा मामला नही है
कांग्रेस के हाथ चिन्दी लगी है जिसे लेकर वे उचक रहें हैं
असली बात यह है कि मोदी सरकार लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ करवाना चाहती है इस खेल में सब शामिल है और जो नही उनके पीछे सीबीआई को छू कर दिया गया है - समझिए इसे
इसमें राहुल जिस तरह से "गली गली में शोर है, देश का चौकीदार चोर है " के नारे लगाकर जनता में भाषण दे रहें हैं वह शोचनीय है , उन्हें इस तरह की भाषा नही बोलना चाहिए, ये दीगर बात है कि राहुल बोफोर्स में लगे आरोपों का जमकर खूनी बदला ले रहे है और अब फ्रांस के जिम्मेदार व्यक्ति के खुलासे के बाद मोदी और अमित शाह की संलिप्तता से इनकार नही किया जा सकता ,अम्बानी को शर्म है नही तो क्या हम देश वासियों को तो है, रॉबर्ट वाड्रा से बडे वाले निकले ये लोग
मायावती को सीबीआई के ख़ौफ़ से अमित शाह ने चुप करवा ही दिया है, सपा, नीतीश कुछ बोलेंगे नही, कामरेडों ने 5 लोगों के घर मे बन्द रहने के नमूने देख ही लिए है और ममता का कोई स्पष्ट मत नही बाकी गधों को समझ नही और जनता का नुमाइंदा लालू जेल में है
अब बात पता नही कितने मजाक, चुटकुलों और उजबक व्याख्याओं के जनक नरेंद्र मोदी की - तो मोदीजी थोड़ा समझिए और स्वीकार कर लीजिए कि आप हर मोर्चे पर भयंकर फेल हो गए है और भलाई इसी में है कि आप बची खुची इज्जत रखना चाहते है अपनी माँ की नजरों में - देश गया भाड़ में, तो इस्तीफा दे दीजिए और सन्यास ले लीजिए, आपको संघ से लेकर भाजपा और गुजरातियों से लेकर ट्रम्प ने पर्याप्त इस्तेमाल कर लिया है, हे हिन्दू राष्ट्र के नायक अब भी समय है - सुन लो मोहन भागवत को , शिवराज को और वसुंधरा को , रमणसिंह या अजित जोगी को - ये सब तुम्हारे हितैषी है (!!!) बस निकलो महाराज घर जाओ
और इधर बुरी खबर यह भी है कि मप्र के मालवा में भयानक पानी गिर रहा है ऐसे समय मे जब सोयाबीन खेतों में पककर खड़ी है या खलिहान में आ रही है तो वर्षा ने "कांस फूलने" के बाद भी वर्षा किसी सद्य नवयौवना की तरह छा रही है, बरस रही है - गेहूँ चना ले नही सकते क्योंकि पानी औसत से कम गिरा है और यह हाथ आई फसल भी बर्बाद हो गई
किसान का बेटा, प्रदेश का मामा और कृषि कर्मण अवार्ड के रेकॉर्ड तोड़ विजेता क्या करेगा कल कोई नही जानता
बहरहाल- मोदी जी, राहुल , मायावती - बात समझ मे आई या मुलायम लालू की तरह आई गई हो गई
करवा लो इकठ्ठे चुनाव फिर देखें किसमे दम है कहने का अबकी बार किसकी सरकार ........
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मायावती के मुगालते और सीबीआई के ख़ौफ़
छग और मप्र दोनो जगह डूबेगी - 
पूरी जमीनी हक़ीक़त समझे बिना और यह देखें कि मामा के स्वागत का क्या हाल और कांग्रेस की क्या स्थिति है, सपाक्स वाले विरोध पर आमादा है और शिवराज जी ने आज ट्वीट कर मोदी सरकार के एट्रोसिटी एक्ट को भी तुष्टिकरण से निपटाने की कोशिश की है फिर भी पूरे राज्य में अकेले लड़ने का फैसला - गजब के मुगालते भई, बघेलखण्ड और चंबल मतलब मप्र नही है

और कांग्रेस का तो क्या कहना
जब बंट रही थी तो कहाँ खड़े थे बै, कसम से अक्ल के अंधों की कमी नही
अब बाकी छुटपुट और कुकुरमुत्तों को भी अभी से अपने बिल में घुस जाना चाहिए क्योंकि जमानत के रूपये बचा लो सब्जी भाजी के काम आयेंगें

Tuesday, September 18, 2018

मोहन भागवत के कन्फेशन और संघ का मोदी शाह से मोह भंग 18 Sept 2018


संघ प्रमुख ने सम्भवतः पहली बार मुक्त कंठ से कांग्रेस की तारीफ करते हुए कहा कि आजादी के आंदोलन में कांग्रेस का योगदान महत्वपूर्ण है और कई महान व्यक्तित्व कांग्रेस ने देश को दिए है
यह बात महत्वपूर्ण भी है और संघ के खुलेपन का भी प्रतीक है , इस खुलेपन की बयार में हमने प्रणव दा को सम्बोधित करते सुना और दिल्ली में चल रहे विचार मंथन और भारत के भविष्य में संघ की भूमिका कार्यक्रम में विपरीत विचारधारा के लोगों को अपने बीच बुलाकर सुनना भी संघ के इतिहास में पहली बार हो
मोहन भागवत इस बहाने संघ को पुनः सांस्कृतिक मंच और सांगठनिक संस्थान घोषित करवाना चाहते है वे अपने पर पिछले चार वर्षों में भाजपा पर रिमोट से सरकार के आरोप को खाफीज करना चाहते हैं साथ ही वह अपने कार्यकाल को भी अब पाक साफ रखकर शांति से विदा लेना चाहते हैं जाहिर है.
2019 में सरकार तो भाजपा की ही बनेगी परंतु इस दौरान उन्हें जो प्रशासनिक आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और न्यायिक तौर पर जो फैसले करवाने थे वह करवा चुके हैं और तंत्र में संघियों की पर्याप्त घुसपैठ भी करवा चुके हैं इसलिए अब उन्हें 2024 तक बल्कि और ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है हिंदुओं को, अब और असुरक्षा का भाव है - यह प्रलाप करने की आवश्यकता नहीं है.
मोहन भागवत का कांग्रेस को यह कहना कि वह देश में सशक्त हैं और उनकी जड़े इतिहास में है, खास करके आजादी के आंदोलन में - तो वे यह भी कह कर एक तरह का कन्फेशन कर रहे हैं कि संघ को आजादी के आंदोलन में कहीं न कहीं हिस्सेदार होना था और अगर हेडगेवार और गोलवलकर यह काम करते हिंदुओं को संगठित करने के साथ-साथ तो सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने में और तत्कालीन राज्यों में पहुंचने तक उन्हें 71 बरस नहीं लगते, शायद नेहरू की पहली पांच सरकार के बाद ही संघ दीनदयाल उपाध्याय के नेतृत्व में भारत और भारत के तत्कालीन राज्यों पर कब्जा करके सत्ता हासिल कर लेता और आज यह राष्ट्र एक हिंदू राष्ट्र होता और जो सपना गुरु जी ने देखा था वह संभव हो पाता यानी अखंड भारत का जिसमें पाकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान और नेपाल भूटान आदि भी सम्मिलित होते और सच में भारत जग सिरमोर होता पर अफसोस यह हो न पाया, कांग्रेस में खुद बहुत तरह के विभाजन थे - हम सब जानते थे, "हू आफ्टर नेहरु जैसे नारे से लेकर हू आफ्टर इंदिरा" तक की एक लम्बी श्रृंखला है.
अब सवाल यह है कि मोहन भागवत का यह कथन और सरेआम एक राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में जिसकी प्रतिष्ठा और यशोगान करना चाहते हैं मिद्दिया और अपने समानांतर माध्यमों से वह बेचैनी दिखाता है संघ की कि वे मोदी और अमित शाह के कार्पोरेटी मॉडल से संतुष्ट नही है और एक आम स्वयं सेवक जिस तरह से आम गरीब और निम्न मध्यम वर्गीय लोगों के बीच शाखा लगाकर काम करता है उसकी फीडबेक है कि अच्छे दिन के दुश्स्वप्न ने लोगों को भाजपा से दूर कर दिया है, पेट्रोल डीजल के भावों ने लोगों की कमर तोड़ दी है, और अब जब चुनाव एकदम सर पर है तो मोहन भागवत को भी यह समझ आ रहा है कि वे संघ के जमीनी कार्यकर्ता की ना उपेक्षा कर सकते है ना नजर अंदाज - जाहिर है इतने बड़े लोक और 130 करोड़ के विशाल जन समुदाय और वृहत्तर मानसिकता वाले विविध संस्कृतियों के देश और जन अपेक्षाओं को 2019 में संबोधित करने के लिए थोड़ा ही नही बल्कि पूरा सॉफ्ट होना पडेगा ताकि मोदी को या भाजपा को संघ के 100 बरस पूरे होने का जश्न मनाने के लिए सरकार नामक हतियार को पुनः केंद्र में लाया जा सकें.
यह संघ का मोदी और कार्पोरेट्स से मोहभंग का भी नाटक है जिसमे दिल्ली में करोडो रुपया खर्च कर विचार मंथन किया जा रहा है, भारत का भविष्य बहुत ही खतरे में है जिस तरह से वैश्विक अर्थ व्यवस्था और राजनैतिक समीकरण है उसके बरक्स भारत जैसे निर्भर देश की कोई तैयारी नही है और संघ को यह काम क्यों करना पड़ रहा है यह मेरी समझ से दूर की बात है जबकि नरेंद्र मोदी अपना जन्म दिवस और इस बहाने से अपनी जड़े और जमीन टटोलने के लिए काशी की गलियों में कबीर की भाँती लिये लुकाठी हाथ घूम रहें है - जाहिर है मोदी और अमित शाह इस समय भाजपा और संघ से एकदम अकेले है और सिर्फ अपने पद और अम्बानी अडानी और मोदी बंधुओं की संपत्ति के सहारे पुरी पार्टी को हांक रहें है.
यह मोदी से लेकर शिवराज, वसुंधरा, रमनसिंह , सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी, उमा भारती और अमित शाह को भी समझ आ गया है कि विपक्षी एकता - बावजूद तमाम फूट और मतभेदों के, मजबूत है और अबकी बार क्लीन स्वीप नही मिलना है , इनके मोब लिंचिंग से लेकर बीफ, मन्दिर और कश्मीर के मुद्दे नहीं चलेंगे, ना ही 15 लाख जैसे टटपूंजिया स्लोगन, बाबा रामदेव ने एन डी टीवी के कार्यक्रम में खुले आम धमकी देते हुए कह दिया है कि महंगाई सरकार को खा जायेगी और इसलिए उन्होंने अपने को अलग कर लिया है साथ ही लगभग जेटली जैसों को चुनौती देते हुए कहा है कि यदि उन्हें सरकार पेट्रोल पम्प दे दें तो वे 30 से 40 रूपये में पेट्रोल डीजल बेचकर दिखा देंगे मेरा ख्याल है कि किसी सरकार के लिए इससे बड़ी शर्म की बात नही होगी . दुर्भाग्य यह है कि यह दावा देशप्रेमी अम्बानी या अडानी को करना ही नही था बल्कि अपने आउट लेट्स से बेचकर दिखाना भी था तो जनता उन्हें भी देवता मानती......
बहरहाल मोदी अमित शाह और पुरी कार्पोरेटी पूंजीपति भाजपा को मोहन भागवत के इस बयान को गभीरता से समझने की जरुरत है कि अलग ध्रुव पर खड़ा संघ आज कांग्रेस को क्यों महत्त्व दे रहा है - निश्चित ही राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद और राहुल के तूफानी हमलों के बाद संघ को समझ आ रहा है पर राफेल डील के दलालों को यह अभी समझ नही आ रहा है

Monday, September 17, 2018

बच्चों को बख्श दो मालिक 16 Sept 2018


बच्चों के साथ और बच्चों के लिए काम करना बहुत जरूरी है उन्नत राष्ट्र, वर्तमान के समाज में मूल्य बनाएं रखने को और सुसंस्कृत राष्ट्र के भविष्य के लिए
पर यह सेफ पैसेज है कामरेड्स , बहुत आसानी से कम्फर्ट ज़ोन्स में रह सकते हो और गुजर बसर बहुत ही सुलभ सरलता से हो सकता है ताउम्र
असली चुनौती समाज के दीगर क्षेत्रों की है , इन दिनों रोज कॉलेज जाता हूँ तो उज्जड, भयानक बदतमीज और हर छोटी सी बात पर लड़ने और माँ - बहन करने पर उतारूँ युवाओं को देखता हूँ जो किसी की भी बात सुनने को तैयार नही और इतना ख़ौफ़ है इनका कि ना प्राचार्य, प्राध्यापक , प्रशासक और ना ही पुलिस कुछ भी करने में सक्षम है और ना वो बर्रे के छत्ते में हाथ डालना चाहते हैं, इतने भयावह हालात है कि महिला प्राध्यापक तो कांपने लगती है - कक्षा में बातचीत, मोबाइल का इस्तेमाल, चाहे जब आना जाना, चलते व्याख्यान में अपने मवाली मित्रों को बुलाकर गुटखा खाना और ना जाने क्या क्या, पाठ्यक्रम से लेकर मास्टरों की अयोग्यता को भी कोई देखें जो दो लाख ले रहे है पर ना ज्ञान ना सीखाने के तौर तरीके , बेहद भयावह है उच्च शिक्षा के चक्रव्यूह
बताईये कोई है जो इनके साथ काम कर रहा है, कोई पत्रिका निकाल रहा है, कोई संस्कार शिविर लग रहे हैं , कोई एनजीओ दम ठोंककर मैदान में है या सरकारी या गैर सरकारी शिक्षाविदों के काफिलों में हिम्मत है, हिम्मत तो ग्यारहवीं बारहवीं के बच्चोँ के साथ काम करने की भी नही , कोई राजनैतिक दल या काडर - बल्कि अब तो हिंदी के चुके हुए साहित्यकार भी बच्चों की तरफ लौट आएं है और उन संस्थाओं और पत्रिकाओं को उपकृत कर रहें है मंच शेयर कर रहें है जो उनके कचरे को छापकर हर माह पांच दस हजार पकड़ा दे रहा है और कार्यशालाओं में ये बुढऊ चार से छह दिन ज्ञान पेल रहें है - यह भ्रष्टाचार का स्वीकृत और मान्य रूप है जिसे समाज विज्ञानी नहीं देख पा रहें है और इस खेल में रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक, एक्टिविस्ट भी शामिल है जो और बड़ा दुर्भाग्य है , मजेदार यह है कि मीडिया के प्रवचनकार भी इस खेल में अब शामिल है - बंधी बंधाई तनख्वाह है और करना कुछ नही कॉपी पेस्ट और ज्ञान के सोते बहाना है - दस से पाँच के समय में
आप कुछ भी करें वो आपकी छूट है और रुचि पर फिर बच्चों के बहाने सेफ ज़ोन में रहकर समाज पर टिप्पणी मत करिए यदि आप कोई बड़े ज्वलन्त मुद्दे पर काम नही कर रहें, सिर्फ अनुवाद - पाठ्यक्रम या धंधेबाज बनकर प्रशिक्षण कर रहें है और अपने आपको सौ लोगों की भीड़ के साथ बन्द कमरों में समेट लिया और इतिहास की बात कर अब रायता फैला रहें हैं तो बहुत हुआ गुरु निकल लो - तुमसे तो राजनैतिक दल भले जो डंके की चोट पर हर बात पर बाहर निकल आते है , आप लोग विशुद्ध पाखंडी है
बच्चो के साथ काम करो - खूब करो- सेक्सुअल एब्यूज़ से लेकर पोषण कुपोषण और शिक्षा में नवाचार तक, विज्ञान के सस्ते प्रयोग से लेकर नुक्कड़ नाटक की नौटँकी तक पर हरियाणा में जो अभी बलात्कार हुआ उसके हीरो देखें जो कमसिन किशोर और विशुद्ध युवा है, है कोई मर्द जो आगे आये और काम करने का हुंकारा भरें , यह सब आसान है और इसमें किसी को ना दिक्कत है ना कोई ये मुद्दे खत्म होंगें, तमाम बड़े लोग बच्चों के नाम पर जीवन खपा देते है और मजे मजे में जीवन के मूलभूत सुख सुविधा जुटा लेते है - नोबल तक पा ले रहे है, पर ना ये रेडिकल है ना प्रयोगधर्मी
यूनिसेफ से लेकर तमाम पेज थ्री के ये संभ्रांत लोग सॉफ्ट टारगेट पर काम कर अपनी नौकरी, संस्थाएं और विभाग ही बचा रहें है, अनुदान जुगाड़ कर जीवित है और भारत जैसे पिछड़े देशों में तो यूएन के हरामखोर लोग टैक्स फ्री तनख्वाह लेकर सिर्फ आंकड़े बाजी कर रहें है और चन्द रुपयों का लालच देकर योग्य लोगों का इस्तेमाल कर रहें है और समाज के बड़े मुद्दों की साजिशन उपेक्षा करवा रहें हैं


बच्चों के साथ बहुत कर लिया , अब बख़्श दो उन्हें और मैदान में आओ - बहुत बड़े बड़े मुद्दे है - तुम सब जानते हो, पर सवाल यह है कि कम्फर्ट ज़ोन छोड़ने को तैयार हो तब ना
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माल हो तो ही बिकेगा लेखक या कवि का
किताब हो, नाटक हो, कविता हो आलोचना हो या कोई और प्रोडक्ट
और ध्यान रहें कि हर माल का खरीददार और पारखी भी रंगरेज हो तो माल बिकेगा, पुरस्कृत होगा या निरादृत होगा, कोई भी पारखी अपनी बेइज्जती नही करेगा बाज़ार में इसलिए वह समादृत करेगा हर सड़े गले माल को
एक बार बिक गया तो ब्रांड बनोगे कॉमरेड फिर किसी टेके की जरूरत नही
बेचो , बेचो और खूब बेचो गुरु
बाकी तो कुछ और साफ़ कहने की जरूरत नही

Tuesday, September 11, 2018

पत्थरों और लोहे पर सपने साकार करता कलाकार - नीरज अहिरवार 10 Sept 2018


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ये है नीरज अहिरवार, उम्र 38 वर्ष, भोपाल से चित्रकला में मास्टर डिग्री और रचनात्मक व्यक्तित्व -कला के लिए समर्पित, बीना के रहने वाले नीरज अब कला नगर भोपाल के हो गए है और यही साधनारत है
भदभदा रोड पर एक खुले मैदान में अपना काम करते है, कड़े और अबोले पत्थरों को आकार देकर दुनियाभर में चर्चित बना देते है कलाकृति मानो बोल पड़ती हो, यह एकाध बीघा में फैला नवनिर्मित पार्क है जो कुशा भाऊ ठाकरे जी के नाम पर है, यहां झुग्गियां थी और नीरज कहते है कि झुग्गियों में जुआ, अवैध शराब आदि गलत काम होते थे इसलिए उन्हें तोड़कर यह पार्क विकसित किया गया है, पार्क में लगी स्व कुशा भाऊ ठाकरे की प्रतिमा भी नीरज ने बनाई है
दो दिन भोपाल में था तो इनके काम के बारे मे पता चला, मित्रों के साथ कल सुबह इनका काम देखकर हैरानी हुई और खुशी भी
इन दिनों ये एक घोड़े पर काम कर रहें हैं पांच टन लोहे को तोड़ मोड़कर और मोल्ड करके एक विशाल घोड़े को इन्होंने तैयार किया है जो लगभग तैयार है और भोपाल में एम्स के नजदीक किसी चौराहे पर यह जल्दी ही स्थापित किया जाएगा, इस घोड़े को इस तरह से लगाया जाएगा मानो यह एक दीवार को तोड़कर पूरे उद्दाम वेग से बाहर आ रहा है दीवार भी टूटी हुई होगी और प्रचंड वेग से आता यह घोड़ा अपने जोश और ताकत से बाहर की ओर कूदता दिखाई देगा यह शानदार काम स्मार्ट सिटी भोपाल में नगर निगम द्वारा प्रायोजित है जिसे पूरा करने में नीरज को छह माह लगे है
नीरज मूल रूप से चित्रकार है पर बजाय केनवास के पत्थरों पर अपनी अभिव्यक्ति को उकेरना ज्यादा पसंद करते है , राजस्थान से लेकर दूरदराज के क्षेत्रों से भारी पत्थर लाकर वे उन्हें अपनी साधना और मेहनत से आकार देते है, कल उन्होंने बताया कि इस कार्य में वे कई परम्परागत कारिगरों की मदद भी लेते हैं और युवाओं को कौशल सीखाते हुए उन्हें लगभग एक वर्ष तक आजीविका भी उपलब्ध कराते है
वे कहते है कलाओं के संवर्धन और संरक्षण और फैलाव का काम समाज का है और राज्याश्रय से क्षणिक आर्थिक मदद मिल सकती है परंतु कलाओं को प्रोत्साहित करना, बच्चों युवाओं और लोगों में कलाओं के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करने का बड़ा काम कलाकारों और समाज का ही है
बहरहाल नीरज को बधाई और शुभेच्छाएँ
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Posts between 5 to 10 Sept 2018


दो दिन भोपाल के दो - एक साहित्यिक सम्मान समारोह में था, पूरे दो दिन संचालको ने भी भयानक ज्ञान बांटा, मुख्य समारोह में तो पूरे कार्यक्रम में संचालक नाम का बन्दा अकेला ही 40 से ऊपर मिनिट खा गया , इसके पहले छिंदवाड़ा, नागपुर, सेवाग्राम, मुंबई, बड़ौदा, मेरठ, दिल्ली, गांधी नगर, अहमदाबाद, बनारस, इलाहाबाद और जबलपुर में भुक्तभोगी रहा हूँ- भोत बुरे अनुभव है भिया - कसम से
एक अध्यक्ष बनें तो दो तीन कविताएं अपनी भी पेल दी, एक सम्मानित ने तो जीवन भर का ज्ञान और वेद ऋचाएं पढ़ा दी ! अरे भाई श्रोता, पाठक या दर्शक मूर्ख नही है, एक कवि सम्मेलन में मेरे सहित गजब के कवि थे मतलब जमावड़ा ऐसा कि हरेक नोबल का अधिकारी - तो अब कविता भी नही सुननी, कहानी तो सुनना ईच नई - बिल्कुल नही - साला 25 से 37 मिनिट कोई कहानी सुनाती है क्या , अपुन का भेजा डायवर्ट होता है मालिक और इनका पेट ही नही भरता पेल पेलकर भी
बहुत साल पहले देवी अहिल्या विवि सभागार में इंदौर के एक ख्यात तथाकथित लेखक और किसी बैंड वाले जैसा बहुरूपिया स्थानीय मुहल्ले के एलाउंसर टाईप बन्दे ने संचालन करते हुए हर वक्ता और कवि के बीच अपने ठिठके और थोथे ज्ञान का भौंड़ा प्रदर्शन शुरू किया , विदेशी लेखकों को उद्धत करना आरम्भ किया तो शशांक ने उसे मंच पर ही सबके सामने जमकर लताड़ा और कहा कि "हमने सब पढ़ा है - आगे बढ़" और इसी बुद्धिजीवी को बाद में और अभी भी कई बार इस तरह की लताड़ खाते देखा है पर यह अभी भी नही सुधरा है
और कालजयी वक्ताओं को तो समय का भान ही नही रहता, घर वाले उन्हें भेजकर मुक्त हो जाते है और ये श्रोताओं की बैंड बजा देते है, सम्मान अपनी जगह है पर इनके चक्षु सामने उबासी लेती भीड़, गपियाते लोग और हॉल के बाहर से आती भीड़ का अलभ्य कोलाहल भी सुन नही पाते, सरस्वती जिव्हा पर आ घायल हो बिराजति है और बाकी इंद्रियां तटस्थ होकर क्षीण हो जाती है - यह भी बहुत घातक है
मेरी व्यक्तिगत राय है कि 60 - 62 के पार लोगों को किसी भी आयोजन विशेषकर साहित्यिक आयोजन में बुलाना ही नही चाहिए - उन्हें बुलाओ पर श्रीफल देकर सबसे अंततिम पंक्ति में बिठा दो - दीवान बिछाकर ताकि वे लेटे रहें और चुपचाप खाँसते रहें , 60 पार के साहित्यकार हो, पत्रकार, फर्जी एक्टिविस्ट या कोई अन्य - इनके पास अतीत की कहानियों, निंदा, द्वैष और नए लोगों को कोसने के सिवा कुछ नही, हॉल या मंच पर बार बार पेशाब करने उठते है, सामने बिठाओ तो बात करते है और माइक दे दो तो छोड़ते नही है
साहित्यिक समारोह अब ज़्यादा प्रोफेशनल होने चाहिए बजाय लिजलिजी भावनाएं उकेरने के और ज्ञान सरिता बहाने के, मार्क्स हो , गांधी हो , अंबेडकर हो या गुरुजी गोलवलकर किसी भी वाद को सुनना ही नही, ना बोलना - ना सूँघना, ना सुनना - नईं मतलब नई - आप होंगे कोई भी तुर्रे खान,
अभी सेवाग्राम , जबलपुर और छिंदवाड़ा में तो कई लोग रात के 8 - 9 बजे तक झिलवाते रहें - फिर दूसरे दिन सुबह भी वही से चालू हो गए - बहुधा ऐसे कार्यक्रमों में संचालकों को उद्धेलित होकर झगड़ते और गाली गलौज पर उतरते भी देख लिया है, कई बार यह गुस्सा भोजन के समय टेबल पर निकलता है - एक बुजुर्ग किस्म के स्वयम्भू एक्टिविस्ट सह संचालक तो हाथापाई पर उतर आते है, गत 10 - 12 वर्षों से यह प्रवृत्ती लगातार बढ़ते हुए देख रहा हूँ , खुद अपडेट होंगे नही दूसरों को अपढ़ और मूर्ख समझेंगे - अपने को ज़्यादा पठन पाठन में संलग्न समझेंगें - अन्य को दारूबाज और निठल्ला और आत्ममुग्ध इतने कि सब सिर्फ और सिर्फ इन्हीं की मानें और हथियार लेकर जंग में कूद जायें - कुल मिलाकर गजब का खेल हो गए ये कार्यक्रम - निहायत ही फरेबी और मसखरे
अपुन ने तो 52 की इस परिपक्व जिंदगी के पड़ाव पर ही यह पक्का तय किया है जो भी साहित्य की या पत्रकारिता की सेवा करना है निजी तौर पर करेंगें - ना सुनने जायेंगें , ना पेलने - हाँ मिलना जुलना है मित्रों से तो पहले मिल लो या बाद में - पर झेलेंगे नई - भगवान , अल्ला, वाहे गुरु और जीसस की कसम
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जो सरकार पेट्रोल डीजल के भाव नही सम्हाल सकती तो ना उसे शासन चलाने का हक है ना दुनियाभर में हीरोपंक्ति करने का नैतिक अधिकार है
दुनियाभर के मूर्ख और विध्वंसक नेताओं को हमारे पवित्र त्योहारों पर अतिथि बनाकर बुला लेते है और बाद में हमारी मेहनत की कमाई का रुपया उन्हें सौंपकर हथियार हजार गुना दामों पर खरीदकर उपकृत करते है - ऐसे नेताओं का बहिष्कार किया जाना चाहिए
बहरहाल, यदि अन्तर्राष्ट्रीय भाव का मुकाबला करो और निकम्मों अपने बस में जो है टैक्स , वह तो कम करो - मसलन मप्र में शिवराज सरकार देश मे सबसे महंगा पेट्रोल डीजल बेच रही है, रोज जूते खा रहे है जनता से फिर भी अक्ल नही आ रही
ये सरकार नही सरेआम अपनी ही जनता को लूटने वाली संगठित भ्रष्ट व्यवस्था है जो जिले से लेकर दिल्ली तक विराजमान है और अब भी समझ नही आ रहा जब पूरा देश छात्रों, किसानों, जातीय और वर्गों के समूह सरकार के खिलाफ सड़कों पर है फिर भी इन तानाशाहों को दिख नही रहा
जनता के बर्दाश्त करने की एक सीमा होती है याद रखिये और सिर्फ प्रधान, जेटली जैसा कारपोरेट का गुलाम एवम कमजोर मंत्री और अकर्मण्य मुख्यमंत्रियों की फौज इस देश के नियंता नही है - जनता वास्तविक अर्थों में निर्णायक है और जब ये सड़क पर आ गई है तो तुम्हारे सारे प्रयास धरे के धरे रह जाएंगे - याद रखना तुम्हारा जीवन सिर्फ पांच साल है और बाकी फिर जनता के हाथ मे है
अम्बानी और अडानी जैसे उद्योगपतियों के हाथों जो सरकारें बिक जाए उसे शासन करने का कोई नैतिक हक नही और दुखद यह है कि इन सरकारों ने पूरा देश और 130 करोड़ लोगों का जीवन दो लोगों के हाथों में गिरवी रख दिया, यह मत भूलो कि ये भी लक्ष्मी के गुलाम है और किसी के सगे नही, अपनी माँ कोकिला बेन को जो औलादें सम्मान नही दे सकी वो तुम्हारे हो जाएंगे, खैर परिवार समझने के लिए रोज जूझना पड़ता है गैस की रिफिल लाने से लेकर सब्जी वाले से भाव करने में और तुममे से अधिकाँश तो समाज के टुकड़ों पर पलें हो तो तुम क्या समझो महंगाई, संघर्ष और जिजीविषा का आख्यान
धिक्कार है तुमपर और शर्म आती है कि साधारण परिवारों से आये तुम लोगों की ऐयाशियों और रुपये की हवस इतनी बढ़ गई है कि समानुभूति, सहानुभूति और औकात भी भूल गए हो - गरीब लोगों की हाय लेकर कहां जाओगे जबकि तुम्हारे अपने लोगों को मरते सड़ते और मौत के लिए तरसते हुए सामने देख रहें हो कि जीवन बख्शता नही किसी को
शर्मनाक, धिक्कार और जनविरोधी नीतियों का विरोध
***
एक भी बन्दा बता दो अम्बानी अडानी सहित इस देश में जो इस उबलते समय में ख़ुश तो दूर संतुष्ट हो
चलो भाजपा या संघी ही बता दो या कोई भक्त भी चलेगा
क्या राज्यपाल या राष्ट्रपति भी एक नागरिक होने के नाते ख़ुश है
अगर हां तो चलने दो जो चल रहा है और अगर नही तो फिर तख्त बदल ताज बदल दो यह भ्रष्टाचारी कुराज बदल दो
और अगर चाटुकारिता, चापलूसी और चारणी करना है तो बने रहो निठल्ले, नालायक और नाकारा और चाटते रहो तलवे , अपनी औलादों को विरासत में देने में तो कुछ रहेगा नही - बेहतर है गला घोंट दो उनका आज अभी
जिस देश में अपने निजी काम के लिए दोपहिया चलाना दूभर हो जाये और निकम्मा वित्त मंत्री रोज सुबह उठकर ब्रश करने के बजाय कमोड पर बैठकर पेट्रोल डीजल के भाव बढ़ा दें वह देश रहने लायक नही बल्कि छोड़ने लायक है , ये जन प्रतिनिधि नहीं जन भक्षक है और ये सेवक नही कार्पोरेट्स के गुलाम है और टैक्स वसूलकर लोगों का संहार कर रहे हैं
धिक्कार, शर्मनाक और जनविरोधी सरकार
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हम लोग फ़ोटू हीचक समाज में रह रहें हैं और यह विडम्बना नही अब गर्व की बात है
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हिंदी के अतुकांत कवियों को तुक और तरन्नुम में कविताएँ सुनाने वालों को चार पाँच घंटे लगातार कविताएँ सुनाना चाहिये
तब सुधरेंगे
क़सम से फाँसी की सज़ा मत दो , बस बिठा किसी सम्मेलन में बिठा दो झकास , ससुर सब सुधरेंगे
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मोदी सरकार हर मोर्चे पर फेल, नाकाम और नाकारा साबित हुई है, जिस अंदाज ने कैबिनेट मंत्री ने पेट्रोल डीज़ल के भावों को लेकर टिप्पणी की है वह बेहद आपत्तिजनक, अकर्मण्य और लापरवाही का घिघौना वक्तव्य है
राष्ट्रपति को तुरंत प्रभाव से सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से सलाह कर सरकार को बर्खास्त कर देना चाहिए
जिस अंदाज में जनता, कर्मचारी से लेकर लोकतंत्र का हर तबके को महंगाई और अव्यवथा ने परेशान कर दिया है वह बेहद गम्भीर और चौकानें वाला है
सरकार को भंग कर अम्बानी, अडानी से लेकर तमाम तरह के उद्योगपतियों और घरानों की चल - अचल सम्पत्ति को राजसात कर बैंक और देश की माली हालत को सुधारें जाने की महती आवश्यकता है
कांग्रेस और 21 दलों की समझ भी आज सामने आई है निहायत ही नासमझ, निकम्मे और नाकारा है विपक्ष जो सिर्फ चुनाव सामने देखकर जबरन का मुजरा कर रहा है जिसे कोई नही देख रहा
यदि यह समझ भी हमारे संविधान के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों में नही है तो मुआफ़ करें हमें इस देश के किसी भी तंत्र, पद और व्यवस्था पर विश्वास नही है
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एक मनमोहन सिंह थे, नेहरू, राजीव, गुजराल, वीपी सिंह, मोरारजी थे और एक ये है जो सरेआम जनता को विशुद्ध बेवकूफ बना रहे है
जिन्हें ना आंकड़ों की समझ है ना ग्राफ लिखने पढ़ने की अक्ल उनसे क्या आर्थिक सुधार की उम्मीद करें , ये सिर्फ संस्थाओं को बर्बाद कर देश के लोगों का जीवन नष्ट कर सकते है और कुछ नही
पर हम तो मोदी को ही वोट देंगे , हम पैदाईशी मूर्ख है और गंवार भी पिछली बार 31 % थे, इस बार 70% हो जाएंगे क्योकि खरपतवार बहुत तेजी से बढ़ती है , सुना नही था कि 600 करोड़ वोटर है देश मे
हर हर मोदी - घर घर मोदी 
नमो नमो नमो नमो नमो का जाप करो
सदियों पुराने देश को बर्बाद कर लोगों का जीना मुश्किल किया

जो गणित के मान्य सिद्धांत बदल दें वह हिन्दू राष्ट्र और राष्ट्र के रखवाले महान है - आखिर शून्य के जनक है ना इनके पुरखें तो क्यों किसी के बाप की मानेंगें

Thursday, September 6, 2018

Posts of 2 to 5 Sept 2018



जो सरकार पेट्रोल डीजल के भाव नही सम्हाल सकती तो ना उसे शासन चलाने का हक है ना दुनियाभर में हीरोपंक्ति करने का नैतिक अधिकार है
दुनियाभर के मूर्ख और विध्वंसक नेताओं को हमारे पवित्र त्योहारों पर अतिथि बनाकर बुला लेते है और बाद में हमारी मेहनत की कमाई का रुपया उन्हें सौंपकर हथियार हजार गुना दामों पर खरीदकर उपकृत करते है - ऐसे नेताओं का बहिष्कार किया जाना चाहिए
बहरहाल, यदि अन्तर्राष्ट्रीय भाव का मुकाबला करो और निकम्मों अपने बस में जो है टैक्स , वह तो कम करो - मसलन मप्र में शिवराज सरकार देश मे सबसे महंगा पेट्रोल डीजल बेच रही है, रोज जूते खा रहे है जनता से फिर भी अक्ल नही आ रही
ये सरकार नही सरेआम अपनी ही जनता को लूटने वाली संगठित भ्रष्ट व्यवस्था है जो जिले से लेकर दिल्ली तक विराजमान है और अब भी समझ नही आ रहा जब पूरा देश छात्रों, किसानों, जातीय और वर्गों के समूह सरकार के खिलाफ सड़कों पर है फिर भी इन तानाशाहों को दिख नही रहा
जनता के बर्दाश्त करने की एक सीमा होती है याद रखिये और सिर्फ प्रधान, जेटली जैसा कारपोरेट का गुलाम एवम कमजोर मंत्री और अकर्मण्य मुख्यमंत्रियों की फौज इस देश के नियंता नही है - जनता वास्तविक अर्थों में निर्णायक है और जब ये सड़क पर आ गई है तो तुम्हारे सारे प्रयास धरे के धरे रह जाएंगे - याद रखना तुम्हारा जीवन सिर्फ पांच साल है और बाकी फिर जनता के हाथ मे है
अम्बानी और अडानी जैसे उद्योगपतियों के हाथों जो सरकारें बिक जाए उसे शासन करने का कोई नैतिक हक नही और दुखद यह है कि इन सरकारों ने पूरा देश और 130 करोड़ लोगों का जीवन दो लोगों के हाथों में गिरवी रख दिया, यह मत भूलो कि ये भी लक्ष्मी के गुलाम है और किसी के सगे नही, अपनी माँ कोकिला बेन को जो औलादें सम्मान नही दे सकी वो तुम्हारे हो जाएंगे, खैर परिवार समझने के लिए रोज जूझना पड़ता है गैस की रिफिल लाने से लेकर सब्जी वाले से भाव करने में और तुममे से अधिकाँश तो समाज के टुकड़ों पर पलें हो तो तुम क्या समझो महंगाई, संघर्ष और जिजीविषा का आख्यान
धिक्कार है तुमपर और शर्म आती है कि साधारण परिवारों से आये तुम लोगों की ऐयाशियों और रुपये की हवस इतनी बढ़ गई है कि समानुभूति, सहानुभूति और औकात भी भूल गए हो - गरीब लोगों की हाय लेकर कहां जाओगे जबकि तुम्हारे अपने लोगों को मरते सड़ते और मौत के लिए तरसते हुए सामने देख रहें हो कि जीवन बख्शता नही किसी को
शर्मनाक, धिक्कार और जनविरोधी नीतियों का विरोध
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फिर पगलाया यह
असली भाजपाई है जब भी मोदी संकट में हो ये आ जाता है दल्ला
इसके अतिरिक्त मेरे पास कोई शब्द नही है और यह बुजुर्ग नही बुर्जुआ है एकदम घटिया किस्म का और पगलाया हुआ इसलिये कोई सम्मान नही और इसकी उम्र और कृत्यों को लेकर तो बिल्कुल भी आस्था नही अब, ये वो गांधीवादी, मार्क्सवादी, कांग्रेसी या बुर्ज ख़लीफ़ा बुड्ढों की तरह है जो सोचने समझने की विचार शक्ति तो खो चुके है पर पद और कम्फर्ट ज़ोन छूट जाने के भय से चिपके हुए है - अकूत चल अचल सम्पत्ति से और कोई सच्चाई कह दें तो मंथन तो करते है पर भाग कर फिर फिर उन्हीं अंध गुहाओं में बह जाते है जो इनकी शरण स्थली है, इन्हें सच्चाई से डर तो लगता है पर स्वीकारना नही चाहते, कोई कह दें तो खाज में जलन होने लगती है और नैतिकता की दुहाई देकर ज्ञान के पाठ पढ़ाने लगते है, भाषा और तहजीब सीखाने लगते है
देश मे इसके जैसे सैंकड़ो बुर्जुआ है जो सत्यानाश कर रहें है और युवाओं को भटका रहें हैं, इसके जैसे व्यक्तियों ने इस उम्र तक आते आते अपने दोस्त कम दुश्मन ज़्यादा पैदा किये है और अब खुले आम लोग इनके जैसों के लिए नमक, घी और नींबू मिर्च लिए घूमते रहते है कि मौका मिले और छिड़क दें इस व्यक्ति ने आंदोलन नामक शब्द की गरिमा का भट्टा बैठा दिया है और ये सब जानता है कि क्या कर रहा है
इससे बड़ा धूर्त और काईयाँ कोई नही
कटु शब्द जरूर है और साफ़ कह रहा हूँ कि इसके बहाने मैं कई और को साध रहा हूँ यह भी एकदम साफ़ है और यह भी भाषाई कमज़ोरी नही है और शब्दों के अर्थ और प्रयोगों से भी वाकिफ हूँ
पिछले दिनों गांधी के आश्रम और वहां की गतिविधियों को जब अपने "पूर्वाग्रही चश्मे" से देखा, विश्लेषण किया तो कई गांधीवादी मित्रों को खरी ख़री बहुत चुभी, और कई प्रकार की दुहाई दी - मुझे नैतिकता, भाषा, लहज़ा, बुजुर्गों के सम्मान और तमाम तरह के पाठ पढ़ाये जाने के प्रसंग हुए पर एक सवाल यह भी है कि क्या देश भर के सम्पादक या अन्य लोग एकदम मूर्ख है जो बड़े अखबार या पत्रिकाओं में बैठे है और उन्हें भाषाओं की तमीज और शुचिता का ज्ञान नहीं जो उन्होंने मेरे लिखें को ज्यों का त्यों छापा, ऐसे बुजुर्ग होने से ना होना बेहतर है
सवाल बहुत है पर जवाब सिर्फ एक है कि सच्चाई से भागिए मत और देखिये कि आपके कर्मों का क्या हो रहा है और अण्णा जैसे धूर्त और मक्कार लोग किस कदर जनता को टूल समझकर इस्तेमाल करने पर उतर आए हैं, ख्याल रहें यह आपकी ही गलतियाँ हैं जो भारत भुगत रहा है
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होना तो यह चाहिए था कि 71 वर्षों में राधा कृष्णन के अलावा करोड़ो नाम हमारे पास और साथ होना थे, देश की इस भयावह हालत के लिए मूल रूप से शिक्षक ही जिम्मेदार है जिन्होंने विशुद्ध मक्कारी और हरामखोरी की और पीढियां बिगाड़ कर एक भ्रष्ट, लापरवाह और उज्जड देश बना दिया, अगर हम सच मे मानते है कि शिक्षक ही राष्ट्र निर्माता है और चाणक्य को केंद्र में रखते है, द्रोणाचार्य और सांदीपनि को गुरु का आदर्श मानते है तो
बावजूद इसके आज भी यह नोबल व्यवसाय बना हुआ है और यही वो केंद्र भी है जहाँ से बदलाव की आहट भी सुनाई देती है और क्रांतिकारिता की सम्भावना नजर आती है
मनमोहन सिंह , रघु राम राजन, अरविंद पनगढ़िया, जॉन द्रेज रीज़, इलीना सेन, सुधा भारद्वाज, बेला भाटिया , पुरुषोत्तम अग्रवाल से लेकर देश के कोने कोने में अभी भी कुछ लोग है जो अलख जगा रहे है और इनसे सत्ताएं भी डरती है - क्योकि ये देश क्या है जानते है और देश के संदर्भ में सत्ता से लेकर कार्य पालिका, न्याय पालिका और विधायिका को कैसे मोल्ड करना है - यह भी जानते है
बहरहाल, शिक्षक दिवस की बधाई इस उम्मीद से कि शिक्षकों के लिए आज बड़ी चुनौती समाज , देश और संस्कृति को बचाने की नही बल्कि इसी देश मे विलुप्त हो गए मनुष्यगत मूल्य और मनुष्यता को बचाने की है, बाकी सब तो हो जाएगा हमारे बच्चे, किशोर और युवा अभी इतने नही बिगड़े है कि उन्हें संवारने में सदियां लगेंगी, बस जरूरत है तो सच को सच कहकर दिखाने , समझाने और अमल करने की

Monday, September 3, 2018

कुपोषण के दैत्य से मुक्ति पाए बिना बाल विकास अधूरा 3 September 2018


कुपोषण और बच्चे अब एक दुसरे का पर्याय बन गए है जोकि दुखद ही नही वरन बड़ी चिंता का विषय है. मप्र, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखंड और उडीसा जैसे राज्य पिछले कई वर्षों से कुपोषण की गिरफ्त में है और इनमे मप्र की हालत बहुत ही खराब है. राष्ट्रीय पोषण मिशन द्वारा सितम्बर माह में पुरे देश में राष्ट्रीय पोषण माह मनाया जा रहा है जिसमे पोषण जागरूकता, गर्भावस्था में देखभाल, स्तनपान, स्वच्छता, एनीमिया, सूक्ष्म पोषाहार, बालिका शिक्षा, सही उम्र में विवाह जैसी थीम को लेकर देश की सभी आँगनवाडियों में माहभर गतिविधियाँ आयोजित की जाकर समुदाय को जागृत करने का प्रयास किया जाएगा.
अभी तक समन्वित रूप से कुपोषण को हल करने के कई प्रयास हुए है परन्तु आंकड़ों को देखे तो हालात खराब ही है, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- चार के अनुसार मप्र में कुपोषण की दर अभी भी स्थिर ही है बावजूद इसके कि कई प्रयास किये गए है. विशेषकर आदिवासी जिलों जैसे मंडला, डिंडौरी, छिंदवाडा, झाबुआ, आलीराजपुर, बडवानी, श्योपुर, शिवपुरी आदि में हालात बहुत ही खराब है. कम वजन, ठिगना और दुबला पतला होना कुपोषित होने के घातक लक्षण है. मप्र में कुल कम वजन के बच्चे 42. 8 % अर्थात 4300000 है, ठिगने बच्चे 42% अर्थात 4200000 और दुबले पतले बच्चे  25.8 % यानी 2600000 है. इन तीनों पैमानों के आधार पर देखें तो बडवानी में सबसे ज्यादा कम वजन के ठिगने और दुबले पतले बच्चे है, श्योपुर में लगभग बडवानी के बराबर है और शिवपुरी का नम्बर तीसरा आता है. छत्तीसगढ़ में भी हालात समान ही है बल्कि वहाँ आदिवासी बहुलता होने से बच्चों की स्थिति और सेवाओं का जाल बहुत कमजोर है जिसके कई कारण है. मुख्यमंत्री के जिले कवर्धा में ही लगभग 60 % कुपोषण है और राज्य यह दावा कर रहा है कि उसने 28 % कम किया है जबकि हालात बिगड़े है.
ठिगना (स्टंटिंग) होना कुपोषण का एक महत्वपूर्ण परिणाम है जिसे ठीक करने में सदिया लग जाती है और ठिगनगनेपन  के कारण शरीर का समूचा विकास ही नही रुकता बल्कि यह बच्चों की मानसिकता, सीखने के अवसर, समझने की शक्ति, निर्णय लेने और क्रियान्वित करने के मौकों पर भी नकारात्मक असर डालता है. दुर्भाग्य से इसे एक जीवन में ठीक नही किया जा सकता क्योकि यह आनुवंशिकी समस्या है, दुबले पतले होने के कारण बच्चे शारीरक रूप से अक्षम रह जाते है और वे अक्सर बीमार रहते है इस कारण अपनी प्रतिरोध क्षमता खत्म कर वे शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त करते है. दुर्भाग्य से महिला बाल विकास विभाग के समूचे प्रयास सिर्फ वजन बढाने के है - दुबला पतला और ठिगना होने से रोकने के लिए विभाग के पास कोई कारगर नीति नही है. इसके लिए पोषक तत्वों में सूक्ष्म पोषक तत्व, वसा, प्रोटीन, मोटा अनाज, विविध खाद्य पदार्थों को नियमित रूप से दिए जाने के साथ साथ सुरक्षित गर्भावस्था, संस्थागत प्रसव, स्तनपान और सम्पूर्ण टीकाकरण जैसी महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देने की जरुरत है. अभी हालात ये है कि पोषाहार हेतु जो मेन्यु बना है - आंगनवाडी या मध्यान्ह भोजन का उसी को शिक्षा एवं महिला बाल विकास विभाग ठीक से लागू नही करवा पा रहा. पोषण में स्वास्थ्य की भी भूमिका बड़ी है मप्र और छग में स्वास्थ्य सुविधाओं के हाल से हम सब वाकिफ है डाक्टरों से लेकर पैरा मेडिकल स्टाफ की कमी से दोनों राज्य बुरी तरह जूझ रहें है जाहिर है इससे संस्थागत प्रसव, टीकाकरण, गर्भवती और धात्री माताओं की नियमित जांच पर बुरा असर पड़ता है जिससे भी बच्चे जन्म से कुपोषित पैदा हो रहे है.
सरकारी स्तर पर जंगलों में जाने पर जो प्रतिबन्ध लगा है उससे आदिवासी और ग्रामीणजन जो लघु वनोपज बीनकर ले आते थे और वर्ष भर भोजन की थाली में विभिन्न प्रकार का खाद्यान्न उपयोग करते थे वह बंद हो गया है और अब भोजन में सिर्फ गेहूं, चावल रह गया है, सब्जियां ना के बराबर है, दूध गायब है और मांसाहार भी महंगा होने के कारण माह में एकाध बार ही खा पाते है और इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों के पोषण पर पड़ रहा है. स्थानीय स्तर पर रोजगार में अवसर उपलब्ध ना होने के कारण परिवार पलायन पर निकल जाते है और बच्चों को भी ले जाते है जहां वे देखभाल नही कर पाते फलस्वरूप बच्चे और बीमार होते है और मृत्यु तक हो जाती है. राष्ट्रीय रोजगार क़ानून के अमल को देखें तो पिछले बरस मप्र में औसतन 40 से 42 दिन का काम एक परिवार को मिला है और यदि परिवार की आय ही नहीं होगी तो कैसे कोई पोषाहार की बात सोच सकता है. आवश्यकता इस बात है कि कारगर नीतियों को लागू भी किया जाएँ और समाज में भी बच्चों के पोषण को लेकर जागरूकता बढ़ें ताकि वे अकारण मृत्यु का वरण ना करें

Sunday, September 2, 2018

Posts of Last Week August 2018



एक उदास शाम में विशाल एवम खुले रँग के हर पल बदलते आसमान को भी तन्हा और उदास देखकर साहिर को याद कर रहा हूँ, अपने आप से बात कर रहा हूँ और शिद्दत से लगा कि अब आगे क्या 
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तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम 
ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम

मायूसी-ए-मआल-ए-मोहब्बत न पूछिए 
अपनों से पेश आए हैं बेगानगी से हम

लो आज हम ने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उमीद 
लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम

गर ज़िंदगी में मिल गए फिर इत्तिफ़ाक़ से 
पूछेंगे अपना हाल तेरी बेबसी से हम!

- साहिर लुधियानवी
[ प्यासा 1957 ]


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। बोध कथा ।।
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एक जंगल में एक चन्दन-वृक्ष था, जिस पर अन्य पक्षियों के साथ एक हंस का भी बसेरा था । एक बार जंगल में आग लगी । चन्दन का पेड़ भी जलने लगा । सभी पक्षी उड़ गये लेकिन हंस जलते हुये चन्दन-वृक्ष की डाल पर बैठा रहा । चन्दन के वृक्ष ने हंस से पूछा :
"आग लगी बनखण्ड में, दाझ्या चंदण-बंस, 
हम तो दाझे पंख बिन, तू क्यों दाझे हंस"

अर्थात - हे हंस, जंगल में आग लग गयी है और यह चन्दन-वृक्ष भी झुलस रहा है । हम तो बिना पंखों के झुलस रहे हैं, लेकिन तुम क्यों जलकर अपने प्राण गंवाना चाहते हो
तब हंस ने चन्दन-वृक्ष को जवाब दिया -
"पान मरोड्या रस पिया, बैठ्या एकण डाळ 
तुम जळो हम उड़ चलें, जीणों कित्तीक-काळ"

अर्थात - हे चन्दन, मैंने जब चाहा तुम्हारे पत्तों को निचोड़ कर रस पिया । तुम्हारी डाल, तुम्हारी छत्रछाया में रहा - और अब जबकि तुम जल रहे हो, मैं तुम्हें छोड़कर उड़ जाऊँ; यह मुझसे नहीं हो सकता । कब तक कोई जियेगा, आख़िर तो सब को मर जाना है
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राहुल और मीडिया के कुछ जागरूक लोगों के राफेल डील को लेकर किये गए सवाल और राहुल के विदेशों में हुए चौतरफ़ा तेज़ हमलों की बौखलाहट इतनी गम्भीरता से सरकार लेती है - वह तो पप्पू था फिर इतनी हड़बड़ाहट और घबराहट कि कुछ भी करने लगें प्रभु
मुंबई के अपने लोगों की किरकिरी को बचाने का क्या यही तरीका है
पेट्रोल डीजल के भाव बढ़ाने और भुलाने के लिए यही शेष है
अब हमले और तेज़ होंगे, हार का डर यकीन में बदल रहा है मित्रों
उदारवादी दलित, प्रगतिशील सवर्ण और सभी अल्पसंख्यकों को एक होकर रहना होगा - समझ रहें है ना
गुस्से और क्षोभ का समय नही
गाली देने और कोसने का ही समय नही
इन्हें माफ़ कर दो, सच में मुआफ कर दो, बहुत शातिरों को भी माफ़ ही किया जा सकता है
ये सब जानते है कि ये क्या, क्यों और किसके इशारों पर क्या साधने के लिए कर रहे है
अब समय भी नही कि कहूँ जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध
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वो कहां गया रामदेव नामक कालाधन का जनक आज कुछ बोला नही - चतुर ठग , शर्मनाक है कि देश का प्रधान मंत्री झूठ झूठ बोलता रहा, 15 लाख से लेकर नोटबन्दी तक और अभी भी चुप नही बैठ रहा - रोज रोज नए नए शगूफे छोड़कर अब देश के बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों से बदला लेने पर उतर आया , यह सरकार हर बार ध्यान भटकाने को नए औजार ढूंढ़ते है कितना अफसोसजनक है यह सब
यह फर्क होता है पढ़े लिखें नेहरू, शास्त्री, इंदिरा, वीपी सिंह, गुलजारीलाल नंदा या राजीव गांधी में और इस वर्तमान प्रधानमंत्री में, जिसे अपनी डिग्री दिखाने के लिए दिल्ली विवि में जाकर धमकाना पड़े या सूचना के अधिकार कानून को धता बता कर जनता को मना करना पड़े उस पर क्या भरोसा , उर्जित पटेल को भी लाया पर उसकी भी रीढ़ कभी तो सीधी हुई ही होगी और उसकी भी औलादें है और भविष्य है
जिन लोगों को उस दौरान जान देना पड़ी क्या उनकी मौत के लिए इस सरकार के निर्णय लेने पर गैर इरादतन हत्याओं का मुकदमा दर्ज नही होना चाहिए , जिन लोगों को शादी ब्याह से लेकर नौकरी में जलील होना पड़ा या बेरोजगारी का दंश झेलना पड़ा क्या उनके लिए मानहानि का मुकदमा नही बनता, जबकि संविधान सबकी गरिमा की बात करता है
नितिन गडकरी के यहां या कर्नाटक और आंध्रा में करोड़ों की शादी नगदी से हुई उनके खिलाफ कोई मुकदमा नही बनता, जेटली तो बीमार हो गया और छह माह से मुझे लगता है रिजर्व बैंक में यह मामला सुलटाने में लगा था और अब लौटा तो 3 दिन में ही नोटों की गिनती हो गई और सब यही निकला तो मामला क्या है
सिर्फ और सिर्फ उप्र में चुनाव जीतने के लिए यह नाश किया गया और देश को अंधी गुफा में धकेला गया , कमाल यह है कि जो राष्ट्र भक्त थे वही चिरकुट देश भक्ति में देश को अँधेरे में ले गए और अब चेहरे पर शिकन भी नही
ये अकड़ और ये भ्रम, झूठ और खोखलापन कहाँ से लाते हो, ना शिक्षा - ना दीक्षा, ना समझ और ना दृष्टि और इतने बड़े देश को दो लोगों की जिद और तानाशाही ने बर्बाद कर दिया वो भी अम्बानी और अडानी जैसे दो टुच्चे लोगों के लिए
जस्टिस काटजू की उर्फ भारत की मूर्ख जनता को अभी भी यकीन है कि ये ही दो लोग उनके उद्धारकर्ता है तो भगवान करें यह भरम बना रहे जिस दिन सड़क पर नंगे होकर भूख से मरेंगे , अपनी औलादों को रोटी नही दे पाओगे, अपनी बीबी बेटियों की सुरक्षा नही कर पाओगे या खुदको नौकरी धंधों के अभाव में सल्फास खाना पड़ेगी - तब याद करेंगे और कहेंगें कि "एक था मोदी"
अभी भी समय है 31% लोगों की गलतियों का खामियाजा रेलवे से लेकर किसान तक भुगत रहे हैं यदि ये 5- 10 % भी बढ़े तो जीवन मे नरक यही देखना पड़ेगा - वैसे भी अभी कौनसा कम भुगत रहे है , अब तो सुप्रीम कोर्ट भी रोज खुलकर अपनी बात कह रहा है

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वो रामदेव के शिष्य बालकृष्ण के नेपाल निवासी होने का, नकली पासपोर्ट, नागरिकता और बाकी सबका क्या हुआ
उप्र में जमीन विवाद था पतंजलि का, क्या हुआ
रामदेव के अधिकांश प्रोडक्ट क्वालिटी से कम थे उसका कोई अपडेट
रामदेव का सलवार प्रकरण का कुछ हुआ
पतंजलि पीठ में हड्डी का मिश्रण मिलाया जा रहा था, क्या हुआ
पतंजलि पीठ में कार्यरत मजदूरों पर दमन और हत्या के मामले दर्ज हुए थे क्या हुआ
रामदेव की नई प्रोडक्शन यूनिट का उदघाटन मोदीजी करने गए थे केदारनाथ जब गए थे, वहां टैक्स लगाने की बात कर आये थे, क्या हुआ
रामदेव का पुत्रजीवक चूर्ण बन रहा है ना, अपडेट दो भाइयों - बहनों
आजकल लोग कपाल भारती, फूं - फां कम करते है और दोनों हाथों की उंगलियां के नाखून भी कम रगड़ते है - सबके बाल काले हो गए क्या या डॉ बत्रा का तेल रामदेव घर भेज रहा है
एक महिला ने रामदेव पर किताब लिखकर कई संगीन आरोप लगाए थे, क्या हुआ
क्या हुआ, क्या हुआ, क्या हुआ ....
सई परांजपे की फ़िल्म कथा का गीत याद आ गया - सही बोल रहा हूँ ना मैं - क्या हुआ

और अंत मे आर्ट ऑफ जीवन के गुरु घण्टाल पर एनजीटी ने जो दण्ड लगाया था और मुकदमा दर्ज किया था यमुना मैली करने का उस पर कुछ हुआ
मीडिया के खोजी / फेलोशिप डकारने वाले शोधार्थी जाओ बेटा रोज़गार दे दिया - ऐश करो
जागो देशभक्तों जागों , देश खतरे में है ...
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