Monday, August 14, 2017

70 साल की आज़ादी का जश्न और एक मूल प्रश्न



70 साल की आज़ादी का जश्न और एक मूल प्रश्न 
आजादी का 70 वां साल आ रहा है। तरक्की यह है कि संसद, विधानसभा से लेकर नगर निगम, नगर पालिका, ग्राम पंचायतों और छात्र परिषदों में अपराधियों का प्रतिशत लगभग 60 से 70 है - जिनपर बाकायदा नामजद मुकदमे दर्ज है।
निहालचंद्र जैसे बलात्कारी व्यक्ति जिन्हें पुलिस भी गिरफ़्तार करने से डरती है - डेढ़ साल तक केबिनेट मंत्री बना रहता है। कई राज्यों के अकुशल और अयोग्य लोग - जो कई गम्भीर किस्म के अपराधों मसलन हत्या, नर संहार, दंगे, देश विरोधी गतिविधियों, बलात्कार, बलवा आदि में संलग्न है , आज प्रतिष्ठित पदों पर ससम्मान विराजमान है न्यायालयों से छूट भी गए है और जिले, प्रदेश और देश का मान दुनिया मे बढ़ा रहे है - बस फर्क इतना है कि वे अकुशल और अयोग्य है और कुछ लोग कुशल और दक्ष है जो काम करते है और एक बेहतर समाज बनाना चाहते है।
बहरहाल, अब आगे यह प्रश्न है कि क्या हम इसी तरह से चुन चुनकर अपराधियों को अपनी किस्मत का , हमारे इस देश के भविष्य का निर्णय लेने के लिए इन निर्णायक संस्थाओं में भेजते रहेंगे ?
सवाल इसलिए और बड़ा है कि वरिष्ठ वकील शांति भूषण ने द वायर पर देश के सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ लेने जा रहे जस्टिस दीपक मिश्रा को भी लेकर प्रश्न किये है कि एक अपराधी मुख्य न्यायाधीश कैसे हो सकता है जबकि उस पर ढेरों कानून के उल्लंघन और अपराधों की कहानियां दर्ज है, ऐसे में हम न्याय किससे मांगेंगे और सरकार यानी ये चुने हुए जनप्रतिनिधि बेहद शातिराना तरीके से संगठित तरीकों से नित्य नये उपक्रम कर देश और हमें गर्त में हर पल धकेल रहे है !
सवाल एक ही है कि क्या हम अभी भी अपराधियों को निर्णायक भूमिका में देखते है और उन्हें अपना कर्णधार मानकर अपनी नियति सौंप दे ?
मुझे नही पता, मैं सवाल कर सकता हूँ जवाब विद्वजन दें।

कांग्रेस से 60 साल भयानक भ्रष्टाचार किया, दलाल पैदा किये, देश बेच दिया।

आजादी के आंदोलन में हिस्सेदारी करके देश को आजाद भी कराया और पूरा मूल्य भी वसूल किया पर आखिर लोगों ने हर कोने से उन्हें बाहर कर दिया अब वे बाहर है और संतुष्ट है रोजी रोटी के इतने संकट नही है, लोग भी खुश है कि भ्रष्ट लोग बाहर है।

कुछ लोगों ने आजादी के समानांतर जहर बोने का काम किया - कौमों में , मासूमों में और सियासतों में और 60 साल के कड़े संघर्ष के बाद जहर के अविजित , अभेद्य और अपराक्रमी किलों पर सवार आज वे सर्वस्व हासिल कर सब पा लेना चाहते है।

अफसोस यह नही कि ऐसा क्यों , अफसोस यह है कि नशे की आदतों की तरह बुद्धिजीवी जो काल और समय से परे देखते है, कदमों की आहट पहचानते है और जानते, बुझते और समझते है कि जहर खुरानी के ये विशाल और अपराजेय के वट वृक्ष एक दिन उन्हें भी निगल लेंगे । 

देश , समाज और मनुष्य मात्र की काया में लगी ये दीमकें उन्हें शनै शनै चट कर रही है , उनकी आत्मा के पोर पोर को सूखा देंगी - फिर वे कायल है एक अवतार के, इस जहर बोने  की प्रवृत्ति के इतने हिमायती हो गए है कि अपनी ही संततियों में खुद जहर  बोकर आने वाली पीढ़ियों को विकृत कर रहे है । अपना तन - मन - धन,  अक्ल और सदियों से पार झांक लेने की दृष्टि जो मानव कल्याण के लिए उपजी थी - उसे भी जाया कर रहे है। 

इससे भयानक समय महाभारतीय या रामायण काल मे भी नही रहा होगा। मुझे ऐसे सभी रीढ़विहीन और मजबूर मित्रों से बेहद प्यार हो गया है , वे अपना ऐसा कुछ रचने में व्यस्त है जो उन्हें इस काल मे कालजयी करेगा और अमरता प्रदान करेगा। "समय लिखेगा उनका भी अपराध" ऐसी तटस्थता को मैं प्रणाम करते हुए बेहद आश्वसत हूँ , मुतमईन हूँ कि ऐसे मित्र यह जरूर मानेंगे कि लोक अपने अनुभवों और इतिहासबोध से सीखकर बहुत बड़े परिवर्तन करते है, साथ ही इन जहर खुरानी के ठेकेदारों पर भी स्नेह वर्षा करके पुचकारने और दुलारने का मन करता है कि ये यह नही देख रहें कि कोई और है काल के इसी समय मे जो गर्भस्थ अभिमन्यु की तरह हर प्रकार की युद्ध कलाएं तुम्ही से सीख रहा है और कल ही सामने तनकर खड़ा होगा।

#खरी_खरी


Saturday, August 12, 2017

गोरखपुर में राज्य प्रायोजित 60 बच्चों की हत्या -जिम्मेदार कौन?

गोरखपुर में राज्य प्रायोजित 60 बच्चों की हत्या - जिम्मेदार कौन ?




जिस देश मे सरकारें, कार्यपालिका और न्यायपालिका बच्चो की परवाह नही कर सकती और दुर्लक्ष करके संगठित रूप से हत्या के जघन्य अपराध में शामिल होती है उस देश का भविष्य तो क्या वर्तमान भी अंधेरे में है । यह राष्ट्रीय शर्म का दिवस है।


डरपोक मीडिया में दिलेरी से सबूत के साथ कहने वाले भी है। 60 मौतें 4 दिन में ! किस जगह शासन कर रहे हो और नर्क को नरक बना रहे हो ? ये कुशासन है और घोर अराजकता की भयावह स्थिति। 
अब बोलों , साबुन से हाथ धुलवाने वालों पोंगा पंडितों !! किस धर्म मे बच्चों की हत्या को जायज कहा गया है।

जो लोग ऑक्सिजन नही दे सकते वो अच्छे दिन देंगे, मूर्ख है देश के लोग जो इनसे उम्मीद करते है। मप्र में सरकार बताये कि एम व्हाय अस्पताल की जांच का क्या हुआ जब 18 बच्चे मरे थे इसी कारण से अभी !
सुना है अयोध्या में पत्थरों की सप्लाई निरन्तर जारी है!!!

जो कम्पनियां अस्पतालों में पेमेंट ना मिलने से ऑक्सिजन रोक दें आखिर वो पाकिस्तान या चीन की तो नही होगी ना, सीधी बात है कमीशन की डील पक्की हुई नही होगी। 

अगला सवाल है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का अरबों का रूपया, यूनिसेफ से लेकर ढोंगी सपोर्टर समूह और तमाम सॉफ्ट हारटेड स्वास्थ्य के रखवाले क्या कर रहे थे ?

क्या ऐसी कम्पनियों को ठेके दिए भी जाना चाहिए?
और आउट सोर्सिंग करो , सरकार लोगों को सूअर समझती है लोग कुत्ता समझते है और इस लड़ाई में अबोध बच्चे मारे जाते है। 

जब तक सरकारी स्कूल , आंगनवाड़ी,अस्पताल या कोई विभाग की जिम्मेदारी सुनिश्चित नही की जाएगी और इसमें काम करने वालों को पिछवाड़े पर लाल मिर्ची की धूनी देकर नही रखा जाएगा ये हरामी मक्कार सुधरेंगे नही।

क्षेत्र विशेष के जनप्रतिनिधि और मंत्री के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट की जाकर इन्हें तत्काल हिरासत में लेना चाहिए ताकि इन कमीने ऐय्याश लोगों को अपने काम और औकात भी समझ आये।

शिवराज जी , एम व्हाय इंदौर में हुई 18 बच्चो की मौत की जांच रिपोर्ट हमे कब देंगे, कौन जिम्मेदार था, किस कम्पनी का ठेका था, कमीशन की डील कितने पर पक्की हुई थी , कितने निलंबित और बहाल हुए, और आगे ये प्रदेश में ना हो इसके लिए क्या कदम उठाए गए है। 

हे नर्मदा नायक मैं इसलिए पूछ रहा हूँ कि बेचारे आदित्य नाथ योगी नये नये मुखिया बने है और आप 15 साल से राज काज कर रहे हो , व्यापमं से लेकर 6 करोड़ के विश्व रिकॉर्ड वाले पौधारोपण आपने "आसानी से सलटा" दिए है, सी बी आई से भी बच निकले है। 

थोड़ा ज्ञान बांटिए, किताबें लिखिए क्योकि अब पूरे देश मे  मोदी जी और अमित शाह हर पंचायत में मेहनत करके सरकार बनाएंगे ही। इसलिए विनम्र सुझाव था !

शुक्र यह है कि अभी गोरखपुर की दुर्घटना में पाक, आतंक, बीफ खाऊं मुसलमान, आई एस आई एस , कश्मीरी मिलिटेंट का हाथ घोषित नही हुआ है वरना तो ये सब होता ही और कांग्रेस, वामपन्थी आदि भी इसमें शामिल करार दे दिए जाते।

बक्सर के कलेक्टर द्वारा तनाव में आत्महत्या

मुम्बई में महिला का घर मे कंकाल मिला

देवास में 21 साल के युवा द्वारा तनाव में आत्महत्या

सिंघानिया अपने ही घर से बेघर 

60 बच्चों की हत्या /मौत

किसानों की हत्या / मौत 

रागिनी दुबे की सड़क पर हत्या 

कुपोषण से लगातार मौतें

विकास बराला और देश के युवाओं और मर्दों में मर्दानगी चरम पर
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ना राहुल, ना मायावती, ना वृंदा, ना येचुरी, ना ममता, ना दक्षिण ना उत्तर, ना पूरब ना पश्चिम !

ये समाज कौन सुधारेगा, आने वाली पीढ़ियों को तनाव, हिंसा, कचरा, गोबर , गौमूत्र और ये सब देकर जाओगे ? तुम्हारी औलादें किस पर गर्व करेंगी - कभी सोचा है ? 

मीडिया भांड और अकर्मण्य 
एनजीओ अपनी साख बचाने में लगें 
बुद्धिजीवी घर मे बकलोली कर रहें
युवा बीफ, गौ हत्या और गौ रक्षा में व्यस्त
डाक्टर, वकील, प्राध्यापक वैसे ही न्यूट्रल कहूँ या नपुंसक कौम है 
समाज विज्ञानी, अर्थ शास्त्री सरकार में घुसने और विदेश यात्राओं की जुगाड़ में 
वैज्ञानिक सड़क पर अनुदान के चक्कर मे 

बचा कौन ? समाज वृहन्नालाओं से चल रहा है 

डाक्टर कफ़ील एहमद छोड़ दो नौकरी, देश छोड़ दो और कही दूर जाकर किसी पिछड़े देश मे काम करो, तुम्हारी जरूरत वहां ज्यादा है - यहां सब लोग हिन्दू मुसलमान है, इंसान नही और इनके लिए ना यहां पर्याप्त डाक्टर है ना सुविधाएं , लिहाजा हम पशु चिकित्सक बढ़ा रहे है।
कफ़ील साहब आप क्यों इन बेगैरत लोगों के लिए अपना हुनर बर्बाद कर रहे है, ये लोग आपको आरोप, बेइज्जती और दुष्प्रचार के अलावा और कुछ नही दे सकते जनाब !
एक बार फिर कहता हूँ अपने साथ 50-60 होनहार चिकित्सा छात्रों को ले जाओ कम से कम कुछ काम तो कर पाएंगे वहां !



#खरी_खरी


Saturday, August 5, 2017

साहित्य के टुच्चे - 5 अगस्त 2017 एवं अन्य पोस्ट्स


1----
बहुत कोसते थे फेसबुक पर लिखने वालों को - फेसबुकिया, उच्छृंखल, उजबक, फालतू, टाईम पास और ना जाने क्या क्या !!!

बड़े बड़े लेखक बनते थे, अकादमिक और सिर्फ पत्रिकाओं में छपने वाले, प्रकाशकों को तेल लगाने वाले और बड़ी अकादमियों और भारत भवनों में मुफ्त की दारू और आयोजक के मुर्गे चबाकर हमेशा घटियापन की साहित्यिक राजनीति करने वाले बनते थे ना।

सबकी असलियत सामने है - औलादों से, नए नवेलों से, नाती पोतों से ई मेल, ट्वीटर, फेसबुक सीख रहे है , मोबाइल में हिंदी फॉन्ट डालकर अब 70- 75 की उम्र में टाइपिंग सीख रहे है पोपले मुंह के फोटो या कि खपी जवानी के फोटो चैंपकर लुभाने की आदतें फिर जवां हो रही है इन सबकी और अब अपनी बातें, लड़ाई झगड़े और वाद विवाद कर रहे है। कई बार आने जाने का नाटक किया और बड़े मुगालते में रहें कि कोई हाथ पांव जोड़ेगा कि आ जाओ पर लौट आए फिर और अब फिर पेलने में लग गए कविता , गद्य, आलोचना, ब्लॉग, और लंबे उबाऊ आलेख।

समझ आ गया कि पत्रिकाओं और किताबों का जमाना गया कि कोई खरीदे पढ़ें, इंतज़ार करें । यहां लिखों हाथों हाथ प्रतिसाद मिल जाता है और किसी की चिरौरी भी नही करना पड़ती , आत्म मुग्ध भी खूब हो सकते है और जूतम पैजार भी खूब कर सकते हो।

कुछ की अकड़ अभी गई नही है जिनकी नाक बह रही है और कुछ कुटिल किस्म की लेखिकाओं ने या दो टके के प्रकाशकों ने फालतू में सर चढ़ा रखा है वे ही नौटँकी कर रहे है और सोच रहे है उनकी टी आर पी छपे से ही बढ़ती है जबकि हकीकत ये है कि सरकार या कारपोरेट की गुलामी में चौबीसों घंटों  झक मार रहे है, बाकी तो सारे नोबल और बुकर के जायज हकदार ऊँट इस फेसबुक नामक पहाड़ के नीचे है। भारत भूषण पुरस्कार के बहाने इस हमाम में सबको देख लिया बगैर मानसून में नहाए।

खबरदार जो अब किसी ने किसी को फेसबुकिया कहा तो सारे सबूत लेकर बैठे है हर पोस्ट के थानेदार और कलपुर्जे

असल मे साहित्य के ये टूटे फूटे और चुके हुए चौहान युवाओं की बढ़ती प्रतिष्ठा और चर्चा में बने रहने से चिंतित है और देख रहे है कि अब घर मे पांव दबाने और मालिश करने कोई आता नही। लिहाजा शक्कर की बीमारी को सम्हालते हुए बी पी नियंत्रित करते आंखों पर मोटा चश्मा लगाकर भी की पेड पर कुश्ती लड़ रहे है और फिर अब यहां वहां आने जाने की , कार्यक्रमों की सेटिंग भी इसी ससुरी फेसबुक से होती है ना।

#साहित्य_के_टुच्चे

*****

अमित शाह जी किसने आपको भड़का दिया और गलत जानकारी दी कि दवाईयां 18 % सस्ती हो गई है।
ये लीजिये आपकी सरकार की एक और (ना) मर्दानगी भरी कार्यवाही।
हृदय का बायपास, किडनी का डायलेसिस , कैंसर और अन्य बीमारियों से पता नही जेटली या आपकी पार्टी के लोगों का पाला पड़ा या नही पर मैंने भुगता है और रोज अपने आसपास के लोगों को देखता हूँ ।
कभी विधायक खरीदने से फुर्सत मिलें तो एक बार किसी दवा की दुकान पर या अस्पताल में चले जाना 2019 के पहले ताकि समझ आ जाये कि भारत माता की जय बोलने वालों की हालत क्या है और ऊपर से ये जेटली नामक प्राणी दिनों दिन उजबक जैसे निर्णय लेता जा रहा है।

कांग्रेस को कहते थे तुष्टिकरण करते थे, और तुम क्या कर रहे हो।
कारण दे रहे है कि शिक्षा में पिछड़ापन है और गरीबी ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा है तो जिम्मेदार तो सरकार और ये समुदाय ही है ना !
अजीब है तर्क और कुतर्कों का कोई जवाब नही। 

फायदा उन्हें मिलेगा जो पहले से सरकारी नौकरी में बैठे है, बगैर कुछ करें धरे मलाई चाट रहे है सातवें वेतन आयोग की।

पढ़ाई, सुविधा और सहूलियत तो तो ठीक था, नौकरी में भी दिया और अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ाते हुए पूरी बेशर्मी से प्रमोशन में आरक्षण देंगे।
सत्यानाश हो इनका, आग लगे ऐसी वोटों की हवस को, जो बच्चे मेहनत करके पढ़ रहे है और कठिन परीक्षाएं पास कर रहे है उनके हक ये मूर्ख और उज्जड गंवार राजनेता जिंदगी भर मारते रहेंगे।
फिर कहता हूँ बच्चों पढ़ो लिखो और इस देश को छोड़कर कही और बस जाओ यहां जीवन भर जाति सम्प्रदाय और राजनीति तुम्हारी हर सांस नरक बना देगी।
मैं इस तरह के नौकरी प्राप्त कर प्रमोशन के लिए भी बैसाखी लेकर जीवन का गुजारा बसर सरकार की दी हुई भीख पर जिंदा रहने वालों, काम ना करके प्रमोशन लेनेवालों, योग्यता, जमीर और खुद्दारी को गिरवी रखने वालों के खिलाफ हूँ और आरक्षण के भी।
ईमानदारी से कोई बता दें कि आरक्षण से आये लोगों ने क्या झंडे गाड़े है , क्या भला किया अपनी ही जाति का और खुद ने नौकरी पाकर कितनी योग्यता बढाई है कि कुछ सार्थक योगदान दे पाए या ये और बता दें कि कितनी पीढ़ियों को आरक्षण नामक दवाई पिलाकर अपनी औलादों को निकम्मा और ठूंठ बनाते रहेंगे ।
अब तो शिक्षा मुफ्त है तो जाओ ना पढ़ाओ और अपनी औलादों को योग्य बनाओ उनमे खुद की योग्यता से जीने का साहस पैदा करो, कब तक रोते रहोगे कि ऊंची जातियों ने शोषण किया, मनु ने ये किया - वो किया। हमारी पीढ़ी ने तो नही लिखी ना मनु स्मृति, कितने ऊंचे वर्ग के घरों में है ये किताब जिसका रोना उठते बैठते गाते रहते हो। या तुमने कभी पढ़ी या देखी है - सिर्फ कुछ नेताओं के पिछ लग्गू बनकर दोहराते रहते हो ?
सवाल यह है कि कब तक आरक्षण पर जिंदा रहोगे ? कभी तो झांक कर देख को अपना हूनर, दक्षता और ज्ञान यदि नही तो हर माह थोड़ी झिझक महसूस होती है या नही जब हाथ मे गिनते हो मक्कारी के रुपये, और फिर वो आदिवासी तो इस प्रपंच से दूर है जो असली हकदार है तुम तो रो धोके लग गए , अब तो छोड़ दो दूसरों के लिए, कब तक झिकते रहोगे ?
कमेंट वही करें जो थोड़ी अक्ल या समझ रखता है मुद्दों की , दलित विमर्श वाले , घटिया आंदोलन चलाने वाले, मुफ्तखोर जो काम करने के बजाय दलितों के नाम पर सुविधा भकोस रहे है कमेंट ना करें और जवाब की उम्मीद ना करें। लाखों का पैकेज गटककर, सेमिनारों और हवाई यात्राओं में दलितों की राख पर दाल बाटी खाने वाले चिंतक भी यहां पांव ना पसारे।

युवा कवि "क" को कविता के लिए भारतीय बुकर पुरस्कार मिला ।
उसी दिन उसके दोनो हाथों में फ्रेक्चर , अस्पताल में भर्ती भयानक जख्मी होकर ।
चार युवा कवियों और तीन आलोचकों के खिलाफ 302 में एफ आई आर दर्ज दिल्ली में ।
देशभर के लेखकों में जलन, 9 युवा कवि किस्म के चापलूस, पी एच डी होल्डर , अधेड़ कुंवारे, कुंठित कवियों और दस बीस कविता संकलनों और हर रोज प्रोफ़ाइल पिक्चर बदलने वाली 6 कवियित्रियों ने आत्महत्या की।
मीडिया ने पुरस्कार वापसी गैंग को लताड़ा।
विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों में रोष।
सोशल मीडिया पर घमासान और अंत मे
मार्क जुकरबर्ग ने हिंदी में कविता लिखना आरम्भ किया।
*****

"घर - घर मिट्टी के ही बर्तन है और टकराने की आवाज से व्योम में हलचल होती है "

एक अलमीरा है, कुछ टांड और चार पांच रेक। एक लकड़ी की छोटी अलमीरा जिसमे सामने की तरफ कांच लगे है जो अब इतने घिस गए है कि आरपार नही दिखता, जिस झिरी में वे फिट थे वो झिरी धूल, मिट्टी और लकड़ी के बुरादे से भर गई है लिहाजा जब भी कांच खोलना होता है तो मशक्कत करना पड़ती है बहुत मानो सदियों से जमे हो और दशकों का श्रम लग रहा हो। वैसे भी बीच के अंधेरे कमरे में पड़ी इस अलमीरा को खोलने के लिए पच्चीस वाट का बल्ब जलाना पड़ता है वरना खतरा हमेशा बना रहता है कि कब कांच फुट जाए चर्र से और हाथ मे लग जाये किरच कोई या बांस की कोई फांस घुस जाए हथेली की नरम बाजू में और फिर खून की एक बारीक से धार निकल पड़े जिसे बगैर आंसूओं के देर तक मुंह मे रखकर चूसना पड़े कि खून बहना रुके और एक काला सा मोटा थक्का जम जाए । काश कि उस दिन जब बांस की मोटी फांस घुसी थी तो जो खून निकला था उसे चूसने के लिए तुम होते या कि एक कपड़ा बांधकर कसकर धार रोकने के लिए कोई तो वह सब नही होता , बहरहाल।

इन सभी अलमिराओं या रेक पर बर्तनों की एक सजावट थी-  कड़छी, संडासी, उचटन, झारा, पली, तलने वाली जाली, अलग अलग आकार के चम्मच, लोहे के काले लम्बे लम्बे अजीब आकार के औज़ार ! तपेलियाँ, डेगची, कढाहियाँ, भगोने, शकुंतला बर्तन, तेल के पीपे नुमा छोटे बर्तन, चाय की तपेलियाँ, डोंगे, कढ़ाव और भी आकार के बर्तन पीतल, स्टेनलेस स्टील और तांबे के, कुछ ब्रान्स और एलुमिनियम के भी थे जो झांक जाते थे यदा कदा !! इसके अलावा दीवार पर जंग लगी किलों के सहारे टँगी रेक में कुछ भिन्न प्रकार की थालियां थी, छोटी प्लेट्स, कुछ कटोरियाँ, कुछ बाउल और अजीब किस्म के बर्तन जिनका नाम भी मुझे याद नही था इसलिए मैं सभी को कटोरी और बाउल की दो श्रेणियों में बांट देता था। थालियां भी बड़ी छोटी होने के साथ साथ आकार, डिजाइन और रंग में अलग थी कोर वाली भी थी और सपाट भी , कुछ में खाने बंटेे थे और कुछ एकदम फीकी सी थी मानो जीवन की तरह कोई हलचल नही !!! ढेर सारे ग्लास थे आकार और प्रकार के - ऊँचे, ठिगने, मोटे ,पतले - पीतल, काँसे और स्टील के पर सब याद रहता था कि कौनसा कहां रखा रहता है और दही किसमें जल्दी जम जाता है।

लकड़ी की बुरादा होती जा रही अलमीरा में कांच के धुंधलकों के पार कुछ कांच के बर्तन थे और बॉन चाइना के कप बसी और केतली जो कोई खास आने पर ही बाहर निकलते थे । इन बॉन चाइना को छूने की मनाही थी और शायद देखने की भी। केतली को फिल्मों में ही देखा था अपने घर की केतली को हाथ लगाना पाप से बड़ा अपराध था । कुछ और बर्तन थे मसलन परात, तांबे का एक बड़ा बम्बा जिसमे ठंड के दिनों में कोयले डालकर पानी गर्म होता था, कुछ तवे थे और हंडे गागर के साथ एक कोने में रखी बाल्टियां जिन्हें इमली से रगड़ रगड़कर चमकाया जाता था और रखा जाता था मानो वो कोई जीने और संस्कारों का तगड़ा पैमाना हो।

--- जारी


अविजित, अविनाश, आदित्य, अभिषेक, अभिजीत, हरेराम, पीलेराम, कालेराम, मुकेश, सुकेश , नीलेश, उमार,कुमार, आ, झा, नित्या , अनित्या, दुःखेश, दुर्गेश, फिरोज, फारुख, अफसाना, रुखसाना, सुनीता, अनिता, दुर्गा, काली, भवानी अला फलां ढिमका आदि अनादि इत्यादि या और कुछ .... ये भीड़ गाय पट्टी से दिल्ली पहुंची अवागर्द है जो मप्र, यूपी ,बिहार ,झारखंड और राजस्थान से है। हिंदी में दो टके की मास्टर डिग्री लेकर प्राध्यापक बनने की चाह में ये दिन रात कोसने के सिवा कुछ नही करते मौजूदा प्राध्यापकों को। जीवन के रस रंग छोड़ चुके ये युवा प्रेम में असफल जीवन की कशिश में नित्य मरते जा रहे है और दया के पात्र है।

भारत भूषण से वंचित ये हिंदी के नए दलित है।
इसमे आप भी जोड़ सकते है कुछ नाम !!!
ये हिंदी के वो युवा कुंठित है जो पुरस्कारों की रज लेने को आपके चरण धोकर पी सकते है। वेब पोर्टलों पर घटियापन परोस कर और अपनी कुंठा में डूबी अवसादग्रस्त कविता, उजबक किस्म के गद्य और निम्नतम श्रेणी के किस्से लिखकर रातम रात हिंदी के बुकर पा लेना चाहते है। ये दिल्ली में किसी दुकान में टाइपिंग कर खुद को सॉफ्टवेयर इंजीनियर कहते है, होटल में वेटर की नौकरी कर होसपेटिलिटी बताते है, किसी पत्रिका में डिस्पेच वाले बाबू स्टूल पर बैठ के अपने को सहसंपादक बताते है। ये हिंदी के बदनाम कवि है जो पुरस्कार पाने को कोठो के लिए कविता लिखकर मंटो समझने का दावा करते है।
इन्हें पुरस्कार तो क्या हिंदी की जीवंत दुनिया से ही बेदखल कर देना चाहिए कि जाओ पढ़ो लिखो चीनी फ्रेंच और अँग्रेजी में इतना कि सीधा नोबल ही मिल जाएं।


Friday, August 4, 2017

ओह, फिर से जीना - महाश्वेता देवी

"ओ! फिर से जीना" - महाश्वेता देवी

शब्द। मैं नहीं जानती कि कहाँ से। एक लेखिका जो वेदना में है? शायद, इस अवस्था में पुनः जीने की इच्छा एक शरारतभरी इच्छा है। अपने नब्बेवें वर्ष से बस थोड़ी ही दूर पहुँचकर मुझे मानना पड़ेगा कि यह इच्छा एक सन्तुष्टि देती है, एक गाना है न ‘आश्चर्य के जाल से तितलियाँ पकड़ना’।इस के अतिरिक्त उस ‘नुकसान’ पर नजर दौड़ाइए जो मैं आशा से अधिक जीकर पहुँचा चुकी हूँ।अट्ठासी या सत्तासी साल की अवस्था में मैं प्रायः छायाओं में लौटते हुए आगे बढ़ती हूँ। कभी-कभी मुझ में इतना साहस भी होता है कि फिर से प्रकाश में चली जाऊँ। जब मैं युवती थी, एक माँ थी, तब मैं प्रायः अपनी वृद्धावस्था में चली जाती थी। अपने बेटे को यह बहाना करते हुए बहलाती थी कि मुझे कुछ सुनाई या दिखाई नहीं दे रहा है। अपने हाथों से वैसे टटोलती थी, जैसा अन्धों के खेल में होता है या याददाश्त का मजाक उड़ाती थी। महत्त्वपूर्ण बातें भूल जाना,वे बातें जो एक ही क्षण पहले घटी थीं। ये खेल मजेदार थे। लेकिन अब ये मजेदार नहीं है। मेरा जीवन आगे बढ़ चुका है और अपने को दुहरा रहा है। मैं स्वयं को दुहरा रही हूँ। जो हो चुका है, उसे आप के लिए फिर से याद कर रही हूँ। जो है, जो हो सकता था, हुआ होगा।

अब स्मृति की बारी है कि वह मेरी खिल्ली उड़ाए।

मेरी मुलाकात कई लेखकों, मेरी कहानियों के चरित्रों, उन लोगों के प्रेतों से होती है जिन्हें मैं ने ‘जिया’ है, प्यार किया है और खोया है। कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं एक ऐसा पुराना घर हूँ जो अपने वासियों की बातचीत का सहभागी है। लेकिन हमेशा यह कोई वरदान जैसा नहीं होता है! लेकिन ‘यदि कोई व्यक्ति अपनी शक्ति के अन्त पर पहुँच जाए तब क्या होगा’? शक्ति का अन्त कोई पूर्णविराम नहीं है। न ही यह वह अन्तिम पड़ाव है जहाँ आप की यात्रा समाप्त होती है। यह केवल धीमा पड़ना है, जीवनशक्ति का ह्रास। वह सोच जिस से मैंने प्रारम्भ किया था वह है ‘आप अकेले हैं ’।

उस परिवेश से जहाँ से मैं आयी हूँ, मेरा ऐसा बन जाना अप्रत्याशित था। मैं घर में सब से बड़ी थी। मैं नहीं जानती कि आप के भी वही अनुभव हैं कि नहीं, लेकिन उस समय प्रत्येक स्त्री का पहला यौन अनुभव परिवार से ही आता था। और युवावस्था से ही मुझ में प्रबल शारीरिक आकर्षण था, मैं इसे जानती थी, इसे अनुभव करती थी और ऐसा ही मुझे कहा गया था। उस समय हम सभी टैगोर से काफी प्रभावित थे। शांतिनिकेतन में थी, प्रेम में पड़ी, जो कुछ भी किया बड़े उत्साह से किया। तेरह से अठारह वर्ष की अवस्था तक मैं अपने एक दूर के भाई से बहुत प्रेम करती थी। उस के परिवार में आत्मघात की प्रवृत्ति थी,और उस ने भी आत्महत्या कर ली। सभी मुझे दोष देने लगे, कहने लगे कि वह मुझे प्यार करता था और मुझे न पा सका इसीलिए उस ने आत्मघात कर लिया। यह सही नहीं था। उस समय तक मैं कम्युनिस्ट पार्टी के निकट आ चुकी थी, और सोचती थी कि ऐसी छोटी अवस्था में यह कितना घटिया काम था। मुझे लगता था कि उस ने ऐसा क्यों किया। मैं टूट गयी थी। पूरा परिवार मुझे दोष देता था। जब मैं सोलह साल की हुई, तभी से मेरे माता-पिता विशेषकर मेरे सम्बन्धी मुझे कोसते थे कि इस लड़की का क्या किया जाए। यह इतना ज्यादा बाहर घूमती है, अपने शारीरिक आकर्षण को नहीं समझती है। तब इसे बुरा समझा जाता था।

मध्यवर्गीय नैतिकता से मुझे घृणा है। यह कितना बड़ा पाखंड है। सब कुछ दबा रहता है।

लेखन मेरा वास्तविक संसार हो गया, वह संसार जिस में मैं जीती थी और संघर्ष करती थी। समग्रतः।मेरी लेखन प्रक्रिया पूरी तरह बिखरी हुई है। लिखने से पहले मैं बहुत सोचती हूँ, विचार करती हूँ, जब तक कि मेरे मस्तिष्क में एक स्पष्ट प्रारूप न बन जाए। जो कुछ मेरे लिए जरूरी है वह पहले करती हूँ। लोगों से बात करती हूँ, पता लगाती हूँ। तब मैं इसे फैलाना आरम्भ करती हूँ। इस के बाद मुझे कोई कठिनाई नहीं होती है, कहानी मेरी पकड़ में आ चुकी होती है। जब मैं लिखती हूँ, मेरा सारा पढ़ा हुआ, स्मृति, प्रत्यक्ष अनुभव, संगृहीत जानकारियाँ सभी इस में आ जाते हैं।

जहाँ भी मैं जाती हूँ, मैं चीजों को लिख लेती हूँ। मन जगा रहता है पर मैं भूल भी जाती हूँ। मैं वस्तुतः जीवन से बहुत खुश हूँ। मैं किसी के प्रति देनदार नहीं हूँ, मैं समाज के नियमों का पालन नहीं करती, मैं जो चाहती हूँ करती हूँ, जहाँ चाहती हूँ जाती हूँ, जो चाहती हूँ लिखती हूँ।वह हवा जिस में मैं साँस लेती है, शब्दों से भरी हुई है। जैसे कि पर्णनर। पलाश के पत्तों से बना हुआ। इस का सम्बन्ध एक विचित्र प्रथा से है। मान लीजिए कि एक आदमी गाड़ी की दुर्घटना में मर गया है। उस का शरीर घर नहीं लाया जा सका है। तब उस के सम्बन्धी पुआल या किसी दूसरी चीज से आदमी बनाते हैं। मैं जिस जगह की बात कर रही हूँ, वह पलाश से भरी हुई है। इसलिए वे इस के पत्तों का उपयोग करते हैं एक आदमी बनाने के लिए।पाप पुरुष। लोक विश्वास की उपज। शाश्वत जीवन के लिए नियुक्त। वह दूसरे लोगों के पापों पर नजर रखता है। वह कभी प्रकट होता है, कभी नहीं। उस ने स्वयं पाप नहीं किया है। वह अन्य सभी के अतिचारों का लेखा-जोखा रखता है। उन के पापों का। अनवरत। और इसीलिए वह धरती पर आता है। छोटी-से-छोटी बातों को लिपिबद्ध करते हुए। एक बकरा। दण्डित। दहकते सूरज के नीचे अपने खूँटे से बँधा हुआ। पानी या छाया तक पहुँचने में असमर्थ। तब पाप पुरुष बोलता है –‘यह एक पाप है। तुम ने जो किया है वह गलत है। तुइ जा कोरली ता पाप।’वस्तुतः यह एक मनुष्य नहीं है। केवल एक विचार की अभिव्यक्ति है।यह एक दण्ड हो सकता है। उस ने कोई भीषण अपराध किया होगा। शे होयतो कोनो पाप कोरेछिलो। कोई अक्षम्य पाप। और अब वह कल्पान्त तक पाप पुरुष बनने के लिए अभिशप्त है। वस्तुतः केवल एक ही पाप पुरुष नहीं है, कई हैं। उसी तरह जैसे कि इस कथा को मानने वाले प्रदेश भी कई हैं।इस से भी सुन्दर कई शब्द हैं। बंगाली शब्द। चोरट अर्थात् तख्ता। और फिर डाक संक्रान्ति। इस का सम्बन्ध चैत्र संक्रान्ति से है। डाक माने डेके डेके जाय। जो आत्माएँ अत्यन्त जागरुक और चैतन्य हैं, वे ही इस पुकार को सुन सकती हैं। पुराने साल की पुकार, जो जा रहा है, प्रश्न करते हुए। पुराना साल आज समाप्त हो रहा है। और नया साल कल प्रारम्भ हो रहा है। क्या है जो तुम ने नहीं किया है ? क्या है, जो अभी तुम्हें करना है ? उसे अभी पूरा कर दो।गर्भदान। यह बड़ा रोचक है। एक स्त्री गर्भवती है। कोई उसे वचन देता है कि यदि बेटी का जन्म होता है, उसे यह-वह मिलेगा। यदि बेटा होता है तो कुछ और मिलेगा। गर्भ थाकते देन कोरछे। दान हो चुका है जब कि बच्चा अभी गर्भ में ही है। इस कथा का कहना है कि अजात शिशु इस वचन को सुन सकता है, इसे याद कर सकता है, और इसे अपनी स्मृति में सहेज सकता है। बाद में वह शिशु उस व्यक्ति से उस वचन के बारे में उस गर्भदान के बारे में पूछ सकता है जो अभी हुआ नहीं है।हमारा भारत बड़ा विचित्र है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र के परधी समुदाय को लें। एक विमुक्त समुदाय। चूँकि वे आदिवासी समुदाय हैं, बच्चियों की बड़ी माँग है। किसी गर्भवती स्त्री का पति आसानी से अजन्मे बच्चे की नीलामी करा सकता है या बेच सकता है। पेट की भाजी, पेटे जा आछे। जो अभी गर्भ में ही है। नीलाम कोरे दीछे। गर्भ के फल को नीलाम कर देता है।नरक के कई नाम हैं। नरकेर अनेक गुलो नाम आछे। एक नाम जो मुझे विशेष पसन्द है, वह है ओशि पत्र वन। नरक के कई प्रकार हैं। ओशि का अर्थ तलवार है। और पत्र अर्थात एक पौधा जिस के तलवार सरीखे पत्ते हों। ऐसे पौधों से भरा हुआ जंगल। और आप की आत्मा को इस जंगल से गुजरना होता है। तलवार सरीखे पत्ते उस में बिंध जाते हैं। आखिर आप नरक में अपने पापों के कारण ही तो हैं। इसलिए आप की आत्मा को इस कष्ट को सहना ही है।जब भी मुझे कोई रोचक शब्द मिलता है, मैं उसे लिख लेती हूँ। ये सारी कापियाँ, कोटो कथा। इतने सारे शब्द, इतनी सारी ध्वनियाँ। जब भी उन से मिलती हूँ, मैं उन्हें बटोर लेती हूँ।अन्त में मैं उस विचार के बारे में बताऊँगी जिस पर मैं आराम से समय मिलने पर लिखूँगी। मैं अरसे से इस पर सोचती रही हूँ। वैश्वीकरण को रोकने का एक ही मार्ग है। किसी जगह पर जमीन का एक टुकड़ा है। उसे घास से पूरी तरह ढँक जाने दें। और उस पर केवल एक पेड़ लगाइए, भले ही वह जंगली पेड़ हो। अपने बच्चे की तिपहिया साइकिल वहाँ छोड़ दीजिए। किसी गरीब बच्चे को वहाँ आकर उस से खेलने दीजिए, किसी चिड़िया को उस पेड़ पर रहने दीजिए। छोटी बातें, छोटे सपने। आखिर आप के भी तो अपने छोटे-छोटे सपने हैं।कहीं पर मैँ ने ‘दमितों की संस्कृति’ पर लिखने का दावा किया है। यह दावा कितना बड़ा या छोटा, सच्चा या झूठा है ? जितना अधिक मैं सोचती और लिखती हूँ, किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उतना ही कठिन होता जाता है। मैं झिझकती हूँ, हिचकिचाती हूँ। मैं इस विश्वास पर अडिग हूँ कि समय के पार जीनेवाली हमारे जैसी किसी प्राचीन संस्कृतिके लिए एक ही स्वीकार्य मौलिक विश्वास हो सकता है वह है सहृदयता। सम्मान के साथ मनुष्य की तरह जीने केसभी के अधिकार को स्वीकार करना। लोगों के पास देखनेवाली आँखें नहीं हैं। अपने पूरे जीवन में मैं ने छोटे लोगों और उन के छोटे सपनों को ही देखा है। मुझे लगता है कि वे अपने सारे सपनों को तालों में बन्द कर देना चाहते थे, लेकिन किसी तरह कुछ सपने बच गये। कुछ सपने मुक्त हो गये। जैसे गाड़ी को देखती दुर्गा (पाथेर पांचाली उपन्यास में), एक बूढ़ी औरत, जो नींद के लिए तरसती है, एक बूढ़ा आदमी जो किसी तरह अपनी पेंशन पा सका। जंगल से बेदखल किये गये लोग, वे कहाँ जाएँगे। साधारण आदमी और उन के छोटे-छोटे सपने। जैसे कि नक्सली। उन का अपराध यही था कि उन्होंने सपने देखने का साहस किया। उन्हें सपने देखने की भी अनुमति क्यों नहीं है?जैसा कि मैं सालों से बार-बार कहती आ रही हूँ, सपने देखने का अधिकार पहला मौलिक अधिकार होना चाहिए। हाँ, सपने देखने का अधिकार।यही मेरी लड़ाई है, मेरा स्वप्न है। मेरे जीवन और मेरे साहित्य में।


जयुपर साहित्‍य उत्‍सव में 24 जनवरी 2013 को जानी मानी बांग्‍ला कथाकार महाश्‍वेतादेवी का उदघाटन वक्‍तव्‍य -

Gargi Mishra के  सौजन्य से 

Sunday, July 30, 2017

काले बादलों में सुरों का क्रंदन - इतिहास में शास्त्रीय गायिका की मौत - 30 July 2017


gangubai hangal എന്നതിനുള്ള ചിത്രം



kishori amonkar എന്നതിനുള്ള ചിത്രം


काले बादलों में सुरों का क्रंदन - इतिहास में शास्त्रीय गायिका की मौत
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1
मरना तो सबको ही होता है क्योकि बचा कौन है
अमरता का पट्टा कोई नही लिखाकर लाता
आम लोग हो, कलाकार या अभिनेता याकि इतिहासकार
बल्कि आम लोग बहुत धैर्य और शांति से मरते है 
कलाकार या अभिनेता उत्तेजना में मौत से याचना करते है

वो भी मर रही है ऐसे ही उत्तेजित होते हुए बगैर जाने कि
बेगम अख्तर, शमशाद बेगम या गंगुबाई भी मरी होगी
अभी किशोरी अमोनकर भी यूँही मरी थी यकायक
देख रहा हूँ कि वो भी मर रही है ऐसे ही हर पल हर रोज
जबसे उसने गाने के बजाय नकल को धँधा बना लिया

यह बाजार का जमाना है जो हमारे घर मे घुस आया है
यह अपने जन्मनाओं की कला को बेचने का समय है
यह रागों को छोड़कर घराने बनाने का समय है रसिकों
मौत से रुपया कमाकर कला की नुमाइश का समय हैे
देख रहा हूँ कि शास्त्रीयता की आड़ में बिक रही है कला

अब शास्त्रीयता का एक आवरण ओढ़े बाजार में है वह
जहां उद्योगपति जाम लेकर सराहते है कला का मर्म
अधिकारी पढ़ते है कविता बेहूदी सी वाहवाही के लिए
संगीत अब उनके कोठों ने दर्ज है जो अनुशासित है
ऐसे में एक शास्त्रीय गायिका की मौत का अचरज नही मुझे।

2
जब उसने कहा कि मैं संगीत की दुनिया मे स्थापित हूँ
विदुषी से लेकर गुरु के उदबोधन भी छोटे थे उसके लिए
इसी दुनिया की कहानी थी जो मौत खत्म कर रही थी
गायिका को तीक्ष्ण व्यवसायिक बुद्धि में बदल रही थी
यह इतिहास की एक घटना थी जो पृथ्वी पर घटित हुई।

संगीत के इस पृष्ठ पर दर्जनों जगह अंकित है कहानियां
किसी को नही बख्शा इस नामुराद मौत ने, ले गई हर बार
खत्म हो गई उन्ही के साथ उन्ही की रागिनियाँ बन्दिशें
सीखने की बातें और ताल टूटने के सड़ियल किस्से भी
संसार यह याद नही रखता, बल्कि याद रहते है कर्म।

एक शास्त्रीयता जीवन मे भी होती है बारीकी से बुनी हुई
जो मनुष्यता को इतर जीवनानुभवों से अलग करती है
यही से आता है सुरों का आरोह अवरोह और मूल तमीज
बस गर यही खो दिया तो खत्म हो जाता है मालकौंस
भैरवी की दहलीज पर देख दुखी हूं इतिहास बनते पन्ने।

कमसिन उम्र से प्रौढ़ावस्था में पूरे समर्पण का भाव खत्म हुआ 
सीखने की अदम्य लगन भी खत्म हुई इस पड़ाव पर अंत मे
यह दुखद था कि काली चार के सुर एक जगह जाकर फटे
और एक बेसुरे से माहौल में मंद सप्तक पर तीन ताल बिखरे
यह मौत का आनुष्ठानिक स्वस्फूर्त रोजनामचा था जो बुना था 
एक ऐसी चौखट पर जहां संगीत के बाद वणिक बुद्धि काम आती है

मुझे अफसोस ही नही है सिर्फ दो शब्द कहना है - ओम शांति !

Saturday, July 29, 2017

इंदु सरकार - मधुर भंडारकर की कमजोर फ़िल्म 29 जुलाई 17



इंदु सरकार मधुर भंडारकर की परिपक्व और गैर जिम्म्मेदार राजनीतिक समझ का भ्रूण है जो असमय "अबो्र्ट" हो गया । वे दरअसल में एक ढुलमुल किस्म की घटिया राजनीति को परोसकर दोनो दलों की थाली में करेला और कटोरी में गुलाबजामुन बने रहना चाहते है इसलिए वे मध्यम मार्ग अपनाकर वामपंथी भी होने की कोरी प्रतिबद्धता आखिर में इंदु के मुंह से अदालत में कहलवाना चाहते है और एक लिजलिजा अंत दिखाकर भारतीय जनमानस की जेब से रुपया भी बटोरना चाहते है।

इमरजेंसी की पृष्ठभूमि में जेपी आंदोलन, विपक्ष और आक्रोश को दिखाने के बजाय वे सीधे संजय गांधी से शुरुवात करते है जो अप्रत्यक्ष रूप से नसबंदी का समर्थन कर एक विषाक्त बीज बो रहे है। पूरी फिल्म में वर्ग विशेष को टारगेट करके वे अपनी ओछी मानसिकता को भी प्रदर्शित करते है जो कि घातक है। वे हर दृश्य में एक एक फ्रेम रखते है जो किसी भी विचार या समझ को नही दिखाती है बल्कि वे एक पैरोनोएड फिलिंग की तरह से एक यथार्थ बुनने की कोशिश करते है जबकि वे अपने आप मे बहुत स्पष्ट है कि वे क्यों यह नरेटिव रच रहे है। मधुर असल मे इस फ़िल्म में कम से कम देश के वर्तमान हालातों को चोट करते हुए अतीत का सहारा लेते है और एक यूटोपिया गढ़ने की राजनीति करते है और इसी बीच बहुत बारीकी से अपने मन की बात हिंसा और डेलिब्रेट हिंसा के मिथक रचकर जनमानस पर थोपकर एक तिलिस्म खड़ा करते है जो हर हालत में स्वीकार नही किया जाना चाहिए। वे अंत मे नेतृत्व की झलक दिखाकर 21 जनवरी 77 को जो 19 माह की काली रातों का अंत बताकर फ़िल्म को बम्बईया मोड़ पर सोढ़ी के मार्फ़त लाते है वह सिर्फ उनकी गुडी गुडी बनने की नाकाम कोशिश है। अब भारतीय जनमानस इतना मूर्ख और कच्चा नही है कि वह यह रूपक और हिडन नरेटिव समझ ना सकें।

यह एक बेहद कमजोर फ़िल्म है जो आंधी या सुधीर मिश्र कृत हजारों ख्वाहिशें ऐसी के मुकाबले कही नही ठहरती। सिर्फ शुरुवात का एक दृश्य रचकर इमरजेंसी की तस्वीर और आखेट बुनना मधुर के बस का कतई नही है - ना उनमे वो समझ है ना दृष्टि इसलिए यह फ़िल्म एक उनकी असफलता का पिटारा बल्कि पेन्डौरा बॉक्स बनकर रह गई है। वे बहुत शातिरी से नाना के रोल में अनुपम को लाते है जिसके निहितार्थ हम सबको मालूम है।

बहरहाल इस फ़िल्म को देखने से बेहतर है कि ₹ 120 या ₹ 150 में एक बियर पी ली जाए या एकाध दोस्त के साथ एक केपेचीनो और ब्राउनी खा ली जाए इस सुहाने मौसम में।

#मधुर_भंडारकर_की_घटिया_फ़िल्म

Thursday, July 27, 2017

पॉल ऑस्टर 27 July 2017



पॉल ऑस्टर


तीन हफ्ते पहले मुझे अपने पिता की मृत्यु की ख़बर मिली। पिता के पास कुछ नहीं था। बीवी नहीं थी, कोई ऐसा परिवार नहीं था जो सिर्फ़ उन पर निर्भर हो। यानी ऐसा कुछ नहीं था, जो सीधे तौर पर उनकी अनुपस्थिति से प्रभावित हो। उनके न रहने का दुख होगा, कुछ लोगों को सदमा लगेगा, कुछ दिनों का शोक होगा और फिर ऐसा लगेगा, जैसे कि वह कभी इस दुनिया में थे ही नहीं।
दरअसल, अपनी मृत्यु से काफ़ी पहले ही वह अनुपस्थित हो गए थे। लोग पहले ही उनकी अनुपस्थिति को स्वीकार कर चुके थे। उसे उनके होने के एक गुण की तरह मान चुके थे। अब जबकि वह सच में नहीं हैं, लोगों के लिए इसे एक तथ्य की तरह स्वीकार कर लेना कोई मुश्किल काम न होगा।
पंद्रह साल से वह अकेले रह रहे थे। ऐसे, जैसे कि उनके आसपास की दुनिया का कोई अस्तित्व ही न हो। ऐसा लगता ही नहीं था कि उन्होंने इस धरती पर कोई जगह घेरी है, बल्कि वह इंसान के रूप में उस बक्से की तरह हो गए थे, जिसमें कुछ भी घुस नहीं सकता। दुनिया उनसे टकराती थी, कभी-कभी टकराकर टूट भी जाती थी, कभी-कभी टकराकर चिपक भी जाती थी, पर कभी उनसे पार नहीं हो पाई। पंद्रह साल तक वह एक आलीशान मकान में भटकते रहे, और फिर वहीं उनकी मृत्यु हो गई।
वह इस मकान में आना नहीं चाहते थे। जब हमारा परिवार यह मकान ख़रीदना चाहता था, तो उन्होंने इसकी क़ीमत पर एतराज़ जताया था, लेकिन मां यही मकान चाहती थी। अंतत: उन्होंने ख़रीद लिया, वह भी पूरे नक़द भुगतान पर। कोई क़र्ज़ा नहीं, कोई क़िस्त नहीं। वे उनके अच्छे दिन थे। वह शाम को जल्दी घर आते थे और डिनर से पहले थोड़ी देर सोया करते थे। वह अपनी आदतों से मजबूर थे। जब इस मकान में आए उन्हें हफ्ता भी नहीं हुआ था, उन्होंने एक बड़ी अजीबोग़रीब ग़लती की थी। एक शाम दफ्तर से लौटने के बाद अपनी आदत के अनुसार, वह इस मकान में आने के बजाय, पुराने मकान में चले गए। बाक़ायदा वहां कार पार्क की। सामने का दरवाज़ा बंद देख पिछले दरवाज़े से अंदर घुसे, सीढिय़ां चढ़ीं, बेडरूम में घुसे और जाकर सो गए। क़रीब एक घंटा सोते रहे। जब उस मकान की नई मालकिन ने अपने बेडरूम में किसी अजनबी को सोया पाया, तो हल्ला मच गया। मेरे पिताजी जाग गए। लेकिन वह वहां से भागे नहीं। वह तो बस आदत के मुताबिक़ उस मकान में घुस गए थे। जब वहां इकट्ठा लोगों को यह बात समझ आई, तो सब बहुत हंसे। आज भी मैं उस क़िस्से को याद कर हंस पड़ता हूं।
धीरे-धीरे समय गुज़रा। मां तलाक़ लेकर अलग हो गईं। हम बच्चे बड़े हुए और अलग रहने लगे, लेकिन पिता उसी मकान में रहते रहे। उसमें उन्होंने ज़रा भी परिवर्तन नहीं किया। दीवारों का रंग वही, सारे फ़र्नीचर भी वही। आख़िर वह मकान उन्होंने अपने परिवार के लिए लिया था। पंद्रह बरसों से वह सिर्फ़ रहते आए, उस मकान में उन्होंने न कुछ जोड़ा, न कुछ घटाया। उसमें चलते हुए लगता, हम किसी अवसाद लोक में चल रहे हैं।
मरे हुए आदमी की चीज़ों का सामना करने से ज़्यादा भयावह कुछ नहीं होता। चीज़ें तो जड़ होती हैं, उनके भीतर अर्थ तो वह जीवन डालता है, जिससे वह जुड़ी होती हैं। जब जीवन ख़त्म होता है, तब चीज़ें भी बदल जाती हैं, भले उनके रूप में कोई बदलाव न आता हो। वे उन भूतों की तरह होती हैं, जिन्हें छुआ जा सकता है। उन कपड़ों का क्या करेंगे, जो ख़ामोशी से उस आदमी का इंतज़ार कर रही हैं, जो उन्हें पहनता आया था, लेकिन जो अब कभी नहीं आएगा। उस रेज़र का क्या करेंगे, जो बाथरूम में टंगा हुआ है, जिस पर पिछली शेव के निशान बचे हैं, लेकिन अब जिसका इस्तेमाल कभी नहीं होगा। उनके हनीमून की तस्वीरें वहां लगी हुई थीं। एक दराज़ में पुरानी चेकबुक्स पड़ी थीं। कुछ में हथौडिय़ां और कभी इस्तेमाल न होने वाली कीलें पड़ी थीं। बाथरूम की एक दराज़ के सबसे नीचे एक पुराना टूथब्रश पड़ा था, जिसे मां इस्तेमाल करती थीं। उसे देखकर ही पता चलता है कि इसे पंद्रह साल से छुआ तक नहीं गया है। हम सब उस मकान से निकल चुके थे, लेकिन हमारी चीज़ें अब भी वहां वैसे ही पड़ी थीं, जैसे हमारे पिता वहां वैसे ही थे। वह हम सबकी स्मृतियों के बियाबान में ठीक उसी तरह थे। पहले जैसे।
उस मकान की एक-एक चीज़ देखकर यह पता चलता है कि पिता ने अपने जाने की कोई तैयारी नहीं की थी। वह अचानक गए। जिस मकान में वह रहना नहीं चाहते थे, उसी मकान में उन्होंने पूरा जीवन गुज़ारा। जब सबने कहा कि यह मकान छोड़ दो, तो उन्होंने किसी की नहीं सुनी। अकेले ही रहे। मरने से एक हफ्ता पहले उन्होंने मकान बेच दिया था, लेकिन उसकी किसी चीज़ को बाहर नहीं निकाल पाए। वह रोज़ उस मकान में रहते थे, लेकिन मरते समय वह उसका सामना नहीं कर पाए। नए लोगों के लिए उस मकान को ख़ाली करने के बजाय उन्होंने अपनी देह को ही ख़ाली करना सही समझा। इसके लिए मृत्यु एकमात्र रास्ता होती है, एकमात्र जायज़ रास्ता।
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संस्मरण पुस्तक ‘इन्वेन्शन ऑफ सॉलीट्यूड’ से. 2013 में किया हुआ अनुवाद.

Saturday, July 22, 2017

प्राथमिक शिक्षा और भेदभाव की नीति 22 जुलाई 17 की पोस्ट


कल एनडीटीवी पर प्राइम टाइम पर मप्र के शाजापुर और आगर जिले में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की पोस्टमार्टम परक रपट देखकर बहुत दुख हुआ। प्रदेश में मैंने 1990 से 1998 तक बहुत सघन रूप से राजीव गांधी शिक्षा मिशन के साथ काम करके पाठ्यक्रम, पुस्तकें लिखना, शिक्षक प्रशिक्षण और क्षमता वृद्धि का कठिन काम किया था । अविभाजित मप्र में बहुत काम करके लगा था कि अब आगे निश्चित ही शिक्षा की स्थिति में सुधार होगा, इसके बाद कई स्वैच्छिक संस्थाओं में रहा, प्राचार्य के पदों पर रहा , फंडिंग एजेंसी में रहकर शिक्षा को बढ़ावा देने वाली परियोजनाओं को पर्याप्त धन उपलब्ध करवाया। राज्य योजना आयोग में रहकर भी प्राथमिक शिक्षा माध्यमिक शिक्षा और कालांतर में राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा के लिए काम किया पर कल अपने ही राज्य में इस तरह से की जा रही लापरवाही और उपेक्षा देखकर मन खिन्न हो गया।

ठीक इसके विपरीत केंद्र पोषित शिक्षा के भेदभाव भरे मॉडल। मुझे लगता है कि जिलों में स्थित केंद्रीय , नवोदय , उत्कृष्ट और मॉडल स्कूल एक तरह की ऐयाशी है और शिक्षा के सरकारी पूँजीवर्ग जो सिर्फ एक वर्ग विशेष को ही पोषित करते है। हालांकि यहां दलित, वंचित जरूर है पर अभावों की जमीन पर ये सर्व सुविधाओं से परिपूर्ण टापू है जिनका फायदा जिले में मात्र 1 % लोगों को भी मुश्किल से मिल पाता है।

एक मित्र जो केंद्रीय विद्यालय से जुड़े है जो कहते है कि केंद्रीय, नवोदय विद्यालयों में  RTE में एडमिशन में कोई इनकम क्राइटेरिया नहीं इसलिए यहां भी अफसरों के बच्चे 12वी  तक निःशुल्क शिक्षा में एडमिशन पा जाते हैं। आरक्षण में आर्थिक आधार चाहिए मगर RTE जो गरीबों का भला कर सकता है उसमें लॉटरी यदि यह क़ायदे से लागू हो जाये तो 4 सेक्शन विद्यालय में 40 गरीब बच्चे 12वी तक बढ़िया शिक्षा ले सकते हैं। किताबें और यूनिफार्म, ऑटो आदि का पूरा किराया मुफ़्त ! यानी देखिए कि किस तरह से अफसर , नेता और प्रशासन मिलकर वहां भी छेद करके अपने लिए रास्ते निकाल लेते है। बेहद शर्मनाक तंत्र हमने गत 70 वर्षों में विकसित कर लिया है। इन शिक्षकों को घर आने जाने के लिए हवाई यात्रा भी सरकार मुहैया कराती  है, बड़े स्तर पर क्षमता वृद्धि, रिफ्रेशर और अन्य काम होते है पर हमारे माट साब ढोर बकरी गिनते हुए और पंचों की गालियां खाकर ही नर्कवासी हो जाते है। ना छत, ना पानी,ना शौचालय, ना प्रशिक्षण , ना वेतन , ना भवन और ना इज्जत - बाकी सब तो दिवास्वप्न है।

अब शायद वर्तमान सरकार को यह चुनौती हाथ मे लेनी चाहिए कि हर जगह शिक्षा एक हो और कम से कम ये जो बहुविद्यालय पद्धति और तंत्र है इसे खत्म करें। एक ओर हमारे अतिथि शिक्षक मात्र ₹ 100 प्रतिदिन पर हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी पढ़ा रहे है वही केंद्रीय विद्यालय का चतुर्थ वर्ग का भृत्य तीस से पचास हजार माह के ले रहा है , यह घोर भेदभाव है जो सरकार प्रायोजित है।

शिक्षक संघ फालतू के मुद्दों और बाकी सबको छोड़कर एक देश और एक शिक्षा प्रणाली की बात करें । या तो केंद्र शिक्षा को राज्यों से छीनकर अपने हाथ मे ले लें या पूरी तरह से राज्यों को सौंप दें, अब यह भयानक भेदभाव नही चलेगा और ना करना चाहिए। यह पद्धति समाज मे भयानक खाई बढ़ा रही है और लोगों के जीवन को सीधा सीधा प्रभावित कर रही है।

#Bring_Back_Pride_to_Govt_Schools