उज्जैन गया था, भीड़ तो जरुर थी पर अब वह जोश नहीं दिखा, साधू संत और कर्मचारी सब थक गए है इसलिए गन्दगी और कूड़े कचरे ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है, सफाई कर्मचारी घाट का कचरा सोरकर नदी में ही झोंक रहे है. पुलिस के जवान भी थके है. जाहिर है सब इंसान है और कितना करेंगे भीड़, धर्म और आस्था के नाम पर, इन पर अब दया आने लगी है. आज उज्जैन में मुझे सबसे ज्यादा दुःख पुलिस को देखकर ही हुआ, उनकी आँखे लाल थी, नींद ना आने से, रात 12 बजे मुश्किल से ठंडा खाना खा रहे है, सोने की कोई व्यवस्था नहीं है, नहाने को समय नहीं है, लोगों ने उन्हें पागल कर रखा है, कुछ गलीज कमीने लोग वाहन में धक्का भी लगवा लेते है, सामान उठवा रहे है जवानों से अरे जब उठता नहीं तो घर से पूरे जिले का लगेज लेकर क्यों आये? और गालियाँ अलग खानी पड़ती है. बेचारे नई उम्र के अधिकाँश बच्चे / युवा एकदम गल गए है इस गर्मी में , शरीर बेधम हो गया है और ऊपर से निकम्मे साधूओं के नखरे .......उफ़ बहुत बुरी हालत है, सबसे ज्यादा मेहनत और सबसे ज्यदा दुःख पुलिस को, अगर आज व्यवस्थाएं माकूल है और सिंहस्थ सफल है तो इसका सफल होने का पूरा श्रेय पुलिस...
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