Central Government, enough is enough. Pack up your arrogance, your indifference and your utter failure of governance—and get out
I have been unable to sleep, watching the visuals from the Delhi incident: the cries, the grief, the helplessness, and the young lives lost, Every frame is a reminder of the human cost of a system that seems to have forgotten compassion
And while families are mourning and the country is struggling to process the tragedy, the Home Minister is busy inaugurating a party office
What a shocking display of priorities, When citizens are grieving, a government should stand with them—not carry on with political celebrations as if nothing happened
This is not leadership, It is political insensitivity at its most disturbing,
Uff… How much more indifference can a democracy endure
4.4 am
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केंद्र सरकार, अब बहुत हो चुका, अपने अहंकार और शासन की विफलता की जिम्मेदारी लीजिए—और सत्ता से बाहर जाइए
दिल्ली की घटना के दृश्य देखकर रात भर नींद नहीं आई—चीखें, पीड़ा, बेबसी और जान गंवा चुके युवा - यह उस व्यवस्था की मानवीय कीमत है, जो संवेदना खो चुकी है
जब परिवार शोक में डूबे हैं और देश त्रासदी से उबरने की कोशिश कर रहा है, गृह मंत्री पार्टी कार्यालय का उद्घाटन करने में व्यस्त हैं
इससे अधिक चौंकाने वाली प्राथमिकताएँ क्या होंगी, नागरिकों के शोक में सरकार को उनके साथ खड़ा होना चाहिए, न कि राजनीतिक आयोजनों में व्यस्त रहना चाहिए
यह नेतृत्व नहीं, राजनीतिक संवेदनहीनता है
एक लोकतंत्र इतनी संवेदनहीनता और कितनी सह सकता है
सुबह 4:40 बजे
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अपने बच्चों को अपने पास रखिए - मत भेजिए बाहर, शिक्षा में चालीस साल काम करके यही समझ आया है कि मटके में पानी उतना ही आयेगा - जितना घर के नल में - आप चाहे उसे समंदर में रख दो
अबोध किशोर या युवाओं को किसके भरोसे बाहर भेज रहे हो आप, इस सरकार के - जो खुद गैर जिम्मेदार, लापरवाह, भ्रष्ट निकम्मी, और हरामखोर है, न्यायपालिका के भरोसे - जिसके न्यायाधीश करोड़ों के नोट जला देते है और फिर भी नौकरी करते रहते है, मीडिया के - जो दलाली के अलावा कुछ नहीं कर रही
बच्चे आपके बुढ़ापे का सहारा है, आपने मन्नतों से पैदा किया, हसरतों से पाला - अपना पेट काटकर और भेज दिया - एक गैर जवाबदेह तंत्र के भरोसे, गलती बच्चों की नहीं - आपकी है, या तो आप खुद जाकर साथ रहिए या फिर उन्हें अपने पास रखिए - जैसा भी हो आधी रोटी खाकर गुजर - बसर करिए, पर अपनी महत्वकांक्षाओं के लिए अबोध बच्चों की बलि मत चढ़ाइए मेहरबानी करके
देवास का यह किशोर देखिए कितना छोटा है और दिल्ली या कोई भी महानगर लील जाते है जीवन, हम सबको पता है - फिर भी आपको समझ नहीं आ रहा
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रक्षाबंधन मनाकर लौटा था देवास का अर्पित कल सुबह ही साढ़े नौ बजे दिल्ली पहुंचा और दोपहर डेढ़ बजे खत्म हो गया - उफ्फ, कितना दर्दनाक है यह सब, दो लाख के मुआवजे से क्या यह सरकार हमारे शहर का किशोर लौटा सकेगी, कब तक हम नागरिक के रूप में चुप रहेंगे और हिंदू - मुस्लिम, मंदिर - मस्जिद में उलझ कर अपने जीवन से समझौते करते रहेंगे, अस्सी साल के बाद मूल सुविधाएं और देखरेख का तंत्र यदि हम ईजाद नहीं कर पाएं है तो लानत है ऐसी सरकार पर और पूरे तंत्र पर, डूब मरो कही जाकर नालायकों
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"किताब उत्सव - इंदौर" के बहाने साहित्य के अर्थ और सवाल
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शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन, विस्थापन, रोजगार, प्राकृतिक आपदाएं, देश के सबसे साफ शहर में पीने के पानी में बैक्टीरिया आदि मुद्दों से लेकर वैश्विक मुद्दे हमारे सामने है, नेपाल की बाढ़ से उत्तराखंड में पहाड़ों का धंसना, पर्यावरणीय खतरों से लेकर बढ़ते तापमान, मणिपुर में हुई हिंसा, साम्प्रदायिकता के नए स्वरूप और राजनीति की भाषा और भाषाई राजनीति, बिहार से लेकर उप्र, राजस्थान, मप्र, छग और दीगर राज्यों में हो रही उथल - पुथल, कांवड़ यात्री और इस यात्रा से उपजे प्रशासनिक राजनैतिक पहलू, संविधान पर बढ़ते जा रहें खतरे, किसान, अभिव्यक्ति की आजादी के खतरे जैसे बड़े मुद्दों पर बातचीत कहां है इस किताब उत्सव में और इस सबसे ज्यादा इस किताब उत्सव में हमारे युवा, मजदूर और महिलाएं, विकलांग या किसान कहां है, क्या ये समाज का हिस्सा नहीं है या ये तथाकथित धंधेबाज प्रकाशक और फर्जी लेखक इन्हें अपने बराबर नहीं मानते
इंदौर में राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा आयोजित किताब उत्सव में जो भी स्थानीय या दिल्ली के लोग है क्या वे इतने मट्ठे और मतिभ्रम के शिकार हो गए है कि उन्हें सिवाय किताब बेचने और अपनी आत्म मुग्धता और प्रशंसा के अलावा कुछ और नहीं दिखाई दे रहा, अफसोस यह है कि इंदौर के तथाकथित कुछ लोगों ने आयोजन पर यूं कब्जा कर लिया कि समाज के बड़े मुद्दे गौण हो गए और मेरी कहानी, मेरा उपन्यास, मेरी कविता, मेरी चोली, मेरा घाघरा ही सब कुछ हो गया, जिन लोगों का वृहद समाज से कोई लेनदेन नहीं, जिनका कोई सामाजिक सरोकार नहीं, जो लोग पूंजी, पद या प्रतिष्ठा के बल पर ऐयाशी कर रहें है, जिनका साहित्य से सरोकार नहीं और पत्रकारिता के बैकग्राउंड से आते है - वे साहित्य की बात कर रहे है
यह हम सबके लिए शर्म की बात है कि सिर्फ पुरस्कार, फेलोशिप, हवाई यात्राओं में देश - विदेश घूमने वाले और टेबल सजाकर किताबें बेचने वाले, आदिवासी किशोरियों या महिलाओं को यूज़ करके फेलोशिप बटोरने वालों या पढ़ाना - लिखाना छोड़कर चौबीसों घंटे सोशल मीडिया पर घटिया राजनीति करने वालों को यहां तवज्जो दी जा रही है, मैं तो साहित्य में नहीं और ना ही अब लेखक होने का मुगालता है, पर गांधीवाद की रोटी खाकर सोलह लाख की गाड़ियों में घूमने वालों को क्या ही कहा जाएं और सबसे दुखद यह है कि जिन लोगों की "रीढ़ की हड्डी पूंजी के सामने घिसकर बर्बाद हो गई" - वे यहां साहित्य और सरोकार की बात कम्फर्ट ज़ोन में बैठकर कर रहें है, लिखना - छपना और स्वांतः सुखाय की बात अलग और समाज का "जन लेखक" बनना अलग, अगर यह मामूली फर्क राजकमल वाले भी प्रकाशन का धंधा छोड़कर समझ लेते, तो शायद जो रूपया यहां खर्च हो रहा है - उसे सही जगह लगाया जा सकता था
अफसोस यह है कि जो लोग वहां लिख - पढ़ या बोल भी रहे है - वे अपनी मजबूरी का रोना जरूर रोएंगे और स्व राजेंद्र यादव इन्हीं के लिए कहते थे कि - "बुद्धिजीवी है तर्क तो गढ़ ही लेगा"
ये तो साहित्य उत्सवों की शुरूवात है, अभी जगह - जगह उत्सवों के बहाने नंगे नाच शुरू होंगे और तेरे - मेरे - इसके - उसके मुद्दे गौण होंगे और ये भांड लेखक चिल्लायेंगे कि किताबें बिक नहीं रही, प्रकाशकों का रंडी रोना होगा कि महंगाई बढ़ गई है और अपने बच्चों को डेढ़ से दो करोड़ का डोनेशन देकर मेडिकल कॉलेजेस में भर्ती करवा देंगे,जब आप आम आदमी के मुद्दे और समस्या की बात नहीं करेंगे तो आपसे जुड़ने और आपकी बकवास सुनने और घटिया चर्चा सुनने का क्या फायदा है, आप तो बुकर लेकर लाखों कमा लिए पर मेरे घर के चूल्हे जलने पर आपने एक शब्द भी लिखा है, हिंदू मुस्लिम करके आप संघ या भाजपा के दलाल तो बन गए पर मेरी मजदूरी पर आपने कभी विचार किया है, आपने खूब पढ़ा होगा पर कभी मेरी झोपड़ी पर लिखी गरीबी की इबारत पढ़ी, अगर नहीं तो भाड़ में जाओ तुम सब
#खरी_खरी
इंदौर में कल से आठ तारीख तक किताब उत्सव हो रहा है - यह बहुत बढ़िया पहल है, स्व अतुल लागू के बाद पुस्तक मेले की परम्परा ही खत्म हो गई थी, अभी छोटे - छोटे स्तर पर ऐसे आयोजन लिखने - पढ़ने की संस्कृति को आबाद करते है और निश्चित ही इससे लोग मोबाइल, रील, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और मॉल से निकलकर पढ़ने के लिए आयेंगे और किताबें खरीदेंगे यह भी उम्मीद की जाना चाहिए
पर मुझे ऐसा क्यों लग रहा कि इस आयोजन में जिन भी लेखकों के नाम वक्ता या चर्चाकार के रूप में दिए गए है - वे इंदौर या मालवे के समूचे लेखकों का प्रतिनिधित्व नहीं है, कुछ खास दो - चार - पांच लोगों का कब्जा है इस आयोजन पर जिनका बकौल डाक्टर Santosh Arsh दाऊद, राजन और छोटा शकील से बढ़िया जुगाड़ है और स्थानीय भभके हुए टाईगर उर्फ टॉमी अपने वालों को बुलाकर कृतार्थ कर रहें है, यह स्थानीय सुपारी लेकर बैठा हुआ परोपकारी समूह पूरा एक विशेष समूह है और राजकमल और सत्यम के मित्र बिरादरी से आता है, माफ़ कीजिए किसी बूढ़े और चुके हुए लेखक, रिटायर्ड या होने की कगार पर बैठे खब्ती प्राध्यापक या मास्टर या हिंदू - मुस्लिम बिरादरी वाले या देश - विदेश में महिला, विकलांग, मेंटल, LGBTQ , आदिवासी दलित मुद्दों की पैरवी कर रोटी खाने वाले को बुरा लगा हो तो, पर क्या है ना अपुन को खरी - खरी की आदत है
और फिर कोई आयोजन हो, विवाद ना हो तो क्या मतलब लाखों रुपए खर्च करने, फाइव स्टार होटल, भोजन, महंगी गाड़ियां, शराब, किस्से - कहानियों की दास्तान गोई का सुकून और दर्शकों में सनसनी फैलाने का जोखिम कैसे कोई लेगा और फिर ऐसे मैले - ठेले याद कैसे रखे जायेंगे इतिहास में, पहले ही विवाद हो जाए तो श्रोताओं उर्फ सोताओं के "हेड काउंट" तो बढ़ेंगे - जिनको मनुहार करके बुलाया जा रहा है पर वे ससुरे अभी तेली और तेल की धार दोनों देख रहे है
कोई अशोक वाजपेयी जी की तर्ज पर सुनने के बीस हजार नगदी दे तो अपुन जाने को एक पांव पर तैयार है
#खरी_खरी
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अपनी महत्ता खोते शिक्षकों के लिए नाम के लिए ही सही सम्मान बना रहें - यही दुआ है बाकी तो सोशल मीडिया, AI, वाट्सअप विवि और दीगर लोग है ही ज्ञान देने के लिए
बस दुर्भाग्य यह है कि अस्सी सालों बाद भी हम सिर्फ राधाकृष्णन के नाम पर ही शिक्षक दिवस मना रहे है, होना तो यह था कि हर क्षण किसी शिक्षक के नाम समर्पित होता इतने बड़े देश में इतने शिक्षकों के बावजूद भी सिर्फ़ एक नाम का होना हमारा शैक्षिक फेलियर है
और एक बात शिक्षकों को कि अपने गुरूर और दंभ से बाहर आकर व्यवहारिक रूप से बच्चों को शिक्षा देते "सा विद्या विमुक्ति" वाली तो आज देश भ्रष्ट, मक्कार, हिंसक या बर्बाद नहीं होता
बहरहाल, मुबारकबाद तो ले ही लीजिए आज के दिन
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जीवन मर्यादाओं से नहीं, उन्मुक्तता, उच्छृंखलता, अनुशासनहीनता, भोग - विलास और बहुत स्पष्ट रूप से अपने बनाए नियम और जीवन दर्शन से चलता है तभी कही कोई कृष्ण बन पाता है और जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझ बूझकर गीता ज्ञान दे पाता है
मर्यादा पुरुष बनने से जीवन में कष्ट है, दानव एवं राक्षस है आसपास और सुखों की सत्ता से दूर है, उससे बेहतर है लीलाएँ करते रहना और बारम्बार विवादों में रहते हुए, सत्ता में रहते हुए त्याग करना, अपनी शर्तों पर जीते हुए सब भोगना जो प्रकृति में उपलब्ध है, संसार को नया दर्शन देना ताकि लोग सब कुछ भोगते हुए अंत में मन - वाचा - कर्म के शुद्धिकरण से अनंत मार्ग की ओर निकल सकें
श्रीकृष्ण ईश्वर नहीं - सखा लगते है और उनके पास वह सब है - जो एक सामान्य इंसान अपने जीवन में देखता, भुगतता है और सहजता से सुख - दुख को जीते हुए अपने अंत को प्राप्त होता है
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की बधाई
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घर के आसपास आजकल कई लोग नए मकान बनवा रहे, नवीनीकरण करवा रहे है, लोहे के चद्दर डलवा रहे, तोड़ कर नए बनवा रहे हैं, दरवाजे बदलवा रहे, बिजली के काम से लेकर नल के काम करवा रहे - दिन भर भारी मशीनें चलती रहती है, दिन भर सब्जी वालों से लेकर तमाम तरह के सामान बेचने वाले आते है, स्कूल के बच्चों की बसें भुनभुनाती रहती है, ट्रक - डंपर से लेकर आटो और ई रिक्शा वालों के साथ बाइक - स्कूटर वाले भी जल्दी में दौड़ते रहते है
इतनी आवाज़ें है संसार में कि कही कोई बीमार आदमी चैन से रह नहीं सकता, मंदिरों के आरती और भजन - पूजन अलग होते है, अजान की आवाजें भी कम नहीं है , कभी शादी की बारात और कभी किसी मैयत के रघुपति राघव राजाराम अलग ही सुर में बजते है और आकाश भी पटाखों से भरा रहता है एक बम की आवाज और सब कुछ रंगीन होकर बिखर जाता है
कुल मिलाकर आवाज़ों के बीच जीना हमने मजबूरी में ही सही, सीख लिया है - सोचता हूँ इसके अलावा कोई विकल्प था क्या हमारे पास, जब ये आवाज़े खामोश हो जाती है तो अजीब लगता है - सड़के सूनी हो जाती है तो समझ नहीं आता कि कहां - कब - क्या घटित हो गया और सब स्तब्ध क्यों है ऐसे
फिर याद आती है वह उक्ति की "यह भी गुजर जाएगा" हम सब जैसे एक दिन कुछ क्षणों के लिए सबको चुप और स्तब्ध कर जाएंगे, थोड़ी देर में कोई ठंडे हाथ रखेगा काँधे पर तो पिघलेगा बहुत कुछ और हम बुक्का फाड़कर रो देंगे और फिर आवाजें चालू हो जाएगी जो उस गंतव्य पर जाकर एक चुप्पी वाली बड़बड़ाती भीड़ में तब्दील हो जाएगी
मेरे लिए यह सब इसलिए मानिखेज़ है कि इन आवाजों से बहुत घबराता हूँ, पर ये अब अच्छी लगने लगी है, बड़बड़ाती भीड़ और चुप्पी से आवाजों का शोर मुझे उलझाए रखता है, कोशिश, सदमा, उम्बरठा, मासूम, मंथन, गोधूलि, मिर्च - मसाला, पार, पार्टी, ए वेडनस डे या बाज़ार जैसी फिल्में याद आती है, वो नायक और नायिकाएं याद आते है - जो बहुत कुछ कहना चाहते थे - पर अंत में चुप रहकर बहुत बड़ी क्रांति कर गए, "मुझे चाँद चाहिए" का नायक हर्ष याद आता है जो वर्षा वशिष्ठ की बेवफाई से रूठकर आत्महत्या कर लेता है, "गुनाहों के देवता" का चंदन बिनती को अपना लेता है सुधा की मृत्यु के बाद, या Mourning Becomes Electra में पूरा परिवार आखिर में अपने आपको घर में कैद करके खत्म हो जाता है - जीवन जैसे लाक्षागृह हो गया है इन दिनों
ईसाई कब्रिस्तान में काले चोगे पहने लोग याद आते है या नाथ समुदाय के लोग जो लाश को बीच में रखकर देर तक श्मशान में नाचते है, खाना खाते है, मीठा खाते है और फिर शव दहन करके एक दो - पौवा लगाकर झूमते हुए घर लौटते है या वो आदिवासी बेगा समुदाय जो लाश निपटाकर आ जाते है और इतने सामान्य हो जाते है मानो कुछ हुआ ही ना हो, अघोरी याद आते है जो लाश नोच लेते है
कल जब अपने डॉक्टर से लंबी बात कर रहा था तो देर तक उसे सुनता रहा था, वो जहीन था और मुझे समझा रहा था और मैं किसी अपराध बोध में बैठा दो शब्द बोलकर चुप था, आगे दवाईयों, इंजेक्शन और जांचों के किस्से रहेंगे झोली में, पर अभी चुप हूँ और शंकित भी कि अब किसी से कुछ बोलना भी बेकार है और मतलब भी नहीं, दूर हो जाओ सबसे - बस यही एक उपाय है
आवाज़ों के शोर का गवाक्ष बना मन अब चुप हो जाना चाहता है -
"काया काशी श्वास जप, मन ही धूनी धाम,
औघड़ कहै न बाहर खोज, घट ही भीतर राम"
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अग्निवीरों को चार साल के रिटायर्डमेंट के बाद हर गांव, खेड़े, कस्बे और शहर के मंदिरों, चबूतरों, सड़कों के मंदिर और उन सभी बरगद - पीपल के पेड़ों के नीचे स्थित मंदिरों में प्रशासक नियुक्त कर दो
सच के रिया हूँ कि सबको नौकरी का पुनर्वास भी मिल जायेगा, शिकायतें भी दूर हो जाएगी और लोग कम पड़ जायेंगे - ढूंढे नहीं मिलेंगे और अग्निवीर में भर्ती होने का मौका खोजते रहेंगे
यह एक बड़ा मास्टर स्ट्रोक हो सकता है
सोचो, कितना बड़ा फायदा है और दो करोड़ नौकरियां प्रतिवर्ष वाला वादा भी पूरा होगा परम आदरणीय मोदी जी का
2029 के चुनावों में इससे भोत फायदा भी होगा, भगवान कसम खा के रिया हूँ
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रागी की गर्मागर्म इडली खा लो फ्रेंड्स
आजकल गेंहूँ कम खाता हूँ - ज्वार, मक्का, बाजरा, जौ, चना और सबसे ज्यादा रागी
हालांकि रागी के गोले अभी बनाए नहीं है जिसे कर्नाटक में Ragi Balls कहते है वो बहुत साल पहले Srilakshmi ने खिलाये थे और फिर जब भी बैंगलोर जाता तो हमारी मित्र स्व फिलोमीना के संस्थान में खूब मजे से खाता था - साम्भर में डूबे हुए लाल - लाल रागी के गोले
ये इडली बनाना सरल है, रागी को घर पर ही मिक्सर में दरदरा पीस लें फिर एक तीन के अनुपात में भीगी और पिसी हुई उड़द दाल के साथ यह आटा और आवश्यकतानुसार पानी मिलाकर रात भर रख दें, सुबह इसमें बढ़िया खमीर आ जाता है , बस इडली बनाएं और मस्त साम्भर के साथ खाएं
इसी बेटर से आप रागी दोसा भी बना सकते है और मनपसंद चटनी के साथ खाएं
यह पौष्टिक ही नहीं बल्कि पेट के लिए सुपाच्य है और शुगर के मरीजों के लिए वरदान है
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