Wednesday, September 18, 2013

Tuesday, September 10, 2013

सुन रहे हो ना बाबू मै तुमसे ही मुखातिब हूँ आज सिर्फ तुमसे

जब तुम दार्शनिक बन जाते हो और अपने साथ के लोगों को या तो परम ज्ञानी समझने लगते हो या निपट कोरे कागद तो फ़िर तुम्हारा दर्शन भी व्यर्थ है और तुम्हारा जीना भी

किसी ने पूछा कि तुम्हारी दुनिया कहाँ है, बड़ा गंभीर सवाल था गोयाकि घूमते घूमते उम्र हो गई और अब समय भी गुजर रहा है थोड़ा और शेष........या यूँ कहूँ कि समर शेष है बस........

फ़िर सोचा कि सच मे जवाब तो मै भी शिद्दत से तलाश रहा हूँ. अचानक एक जवाब सूझा- दुनिया मेरे से शुरू होती है और मेरे से ही खत्म होती है. बस इस सब मे आप कही किसी से टकरा गये तो ठीक वरना सफर तो अनवरत जारी ही है.

सवाल तब भी उठना लाजिमी है जब तुम दूसरों की हर एक्शन को, हर बात को बहुत गहराई से ऐसे देखते हो मानो यह कोई एलियन है और तुम खुद परम ज्ञानी और फ़िर स्वयं को सिद्ध महात्मा समझ कर श्रेष्ठ समझने का जो कीड़ा तुम्हें काटता है वह किसी और को तो नहीं पर तुम्हें अंदर से एक दिन जरुर खोखला कर देता है बाबू............सुन रहे हो ना.

और अचानक एक दिन तुम पाते हो इन नर पिशाचों मे तुम अकेले ऐसे हो जो श्रेष्ठ हो और बाकि सब तुच्छ तो यही सही समय है जब तुम्हें सब छोड़कर आज के मायावी संसार मे भी वास्तविक जीवन मे वानप्रस्थ आश्रम मे चले जाना चाहिए क्योकि अब तुम्हारा यहाँ रहना व्यर्थ ही नहीं बल्कि इस पुरे समाज पर एक बड़ा बोझ हो तुम बाबू..............सुन रहे हो ना...

और तुम्हें क्या लगा कि यह चोला पहनकर सियार शेर हो जाएगा, चार नई बातें सीखकर तुम दुनिया से तो श्रेष्ठ हो सकते हो परन्तु अपने आप से, अपने अपराधबोधों से और अपने गिल्ट से कब निकलोगे और फ़िर एक ना एक दिन तो भले ही किसी चर्च, मंदिर, गुरुद्वारे या मस्जिद मे ना सही पर अपने शरीर के एक कोने मे धडकते हुए दिल के किसी निर्जन एकांत मे 'कन्फेशन' तो करना पडेगा ना, क्यों बाबू उस दिन आईना देखोगे तो अपने चेहरे से अपना मुँह देख पाओगे ना, बोलो ना बाबू .सुन रहे हो ना.

ये संसार का बड़प्पन है कि यह तुम्हारे जैसे लोगों को भी बर्दाश्त कर लेता है वरना असलियत तो यह है कि तुम जो आज इस बहुसमाज मे एक अमीबा के बराबर भी औकात नही रखते, किस हैसियत से यह स्वप्न देखते हो कि सब तुम्हारा है और सब तुम्हारे, मुझे लगता है बहुत गंभीर मसला है अब समय है कि तुम अपने बनाए घेरों से निकल आओ और वहाँ चले जाओ जहाँ से कम से कम तो कुछ क्षणों के लिए तो अपने हो सको, हाँ बाबू मै तुमसे ही कह रहा हूँ... यह बात इतनी स्पष्टता से भी समझ ना आये तो फ़िर तुम्हारा विद्वान होना और वागीश कहलाना व्यर्थ है, सुन रहे हो ना बाबू मै तुमसे ही मुखातिब हूँ आज सिर्फ तुमसे.......

Sunday, September 8, 2013

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही निशाँ होगा.


यह है काकोरी जो अब सिर्फ ९ अगस्त और १९ दिसंबर को यानी की साल मे दो बार याद किया जाता है. "बच्चे आते है आसपास के स्कूलों के, साहब लोग आते है, अधिकारी आते है, विधायक आते है, पुलिस वाले आते है इन दो दिनों मे मेला लगता है, खूब बड़े बड़े कार्यक्रम होते है, बाकि तो सब ऐसे ही रहता है. कभी कभी कोई दो-तीन लोग आ जाते है. हम तो चौकीदार है अशोक नाम है हमारा, अठारह हजार वेतन है, लोक निर्माण विभाग के कर्मचारी है हम, दिन मे हम रहते है, दूसरा रात मे आता है" 

लखनऊ से बीस किलोमीटर दूर काकोरी कांड की याद मे बना यह शहीद स्मारक आज बेहद शांत था मै हरदोई से आ रहा था. बचपन से पढ़ा था और सुना था आज अचानक इधर आने का मन हुआ और आ गया. १४ बीघा मे बना यह स्मारक बाज नगर मे है. बढ़िया शांत जगह है, बैठने की सुन्दर व्यवस्था है, एक पुस्तकालय है जिसमे शायद पचास पुस्तकें है और फुल टाईम कर्मचारी ना होने से यह साल मे दो ही दिन खुलता है और लोग इसका लाभ जमकर उठाते है. आसपास के लोग क्यों आये भला? 

अब ये देशभक्ति आदि किसी के काम की नहीं है जनाब, मूर्ख थे ये सारे लोग जिनकी तस्वीरें लगी है जो देश की खातिर झूल गये फांसी के तख्ते पर अरे भाग जाते तो आज शान से ट्रेन के ऐसी के टिकिट मे घूमते फ्री मे और मस्त राजनीती करते. खैर मुझे क्या मै अजब यहाँ आया तो कोई था नहीं भरी धूप मे पीने का पानी तलाश रहा था पर ना मिला पानी ना कोई लोग तो बस अपनी कुछ तस्वीरें ले ली ताकि जीवन मे सबुत याद रहे कि चलो उंगली कटाकर हम भी शहीद हुए थे कभी. 

बहरहाल चित्र देखिये और एक बार सिर्फ एक बार इन महान लोगों को याद करिये हाँ दीवारों की हालत पर ध्यान मत देना.

















Saturday, September 7, 2013

उस युवा को सच मे सलाम जो करता तो मजदूरी है पर इतना जागरूक और स्पष्ट कि बता नहीं सकता.

लखनऊ मे एक ऐसे कॉलोनी मे रहता हूँ जहाँ ज्यादा बड़े अफसर, पुलिस वाले और तथाकथित ओहदेदार  लोग रहते है इसमे एनजीओ से लेकर डाक्टर भी शामिल है. आज शाम को जब बिजली नहीं थी तो मेरे पड़ोस मे कुछ लोग बैठे थे जिनमे एक डाक साब थे रिटायर्ड और उन्होंने और कॉलेज की एक मेडम और उनके इंजिनियर पति ने एक गरीब बच्चे को इतनी जोर से तमाचा मारा कि सारे निशान उसके गालों पर  आ गये.

बच्चा घर गया और अपने बड़े भाई को बुलाकर लाया. भाई ने मेरे सामने इन तीन बड़े लोगों की जब क्लास ली तब मुझे पता चला कि क्यों मारा. कारण यह था कि वो बच्चा इन मेडम के घर के सामने से कई बार निकला था क्योकि उसकी आज छुट्टी थी और वो सायकिल चला रहा था, इन्हें शक हुआ कि वो दस बारह साला बच्चा चोर होगा और इनके घर के सामने से निकला है तो कोई गहरी साजिश रच रहा होगा. उस बच्चे के भाई ने कहा कि क्या आपके बच्चे सायकिल नहीं चलाते, क्या हमें सड़क पर घूमने का कोई हक नहीं है, बेचारे मेरे भाई आज होटल की छुट्टी थी इसलिए घर से बाहर घूम रहे थे, वे सुल्तानपुर के पास किसी गाँव से आये है और तेलीबाघ मे किसी दूकान पर लिट्टी चोखा बनाने का काम करते  है.

पर ये तीनों शरीफ लोग उस पर भी चढ बैठे तब मैंने बीच बचाव किया. तब उस बच्चे के भाई ने कहा कि मै लिहाज कर रहा हूँ वरना गालों पर जिस तरह के निशान  है मै उससे ज्यादा बेहतर निशान आपके गालों पर बना सकता हूँ और पुलिस मे जाकर एफ आई आर करवा दूँ तो सारी शराफत रह जायेगी कल जब मीडिया मे आप लोगों की औकात दिखेगी तो सब समझ जाओगे. यह सुनना था कि ये तीनों खिसक लिए और उससे माफी माँगने लगे. वो भाई बोला कि मै भी इसी कॉलोनी मे रहता हूँ और आप हम मजदूरों  को बेवक़ूफ़ मत समझना हम भी पढ़े लिखे है और सब नियम कायदे जानते है, अगर आई डी प्रूफ चाहिए हमारा  तो थानेदार मांगे आप होते कौन है यह माँगने वाले, आपकी औकात क्या है, चोर तो आप लोग है जो यहाँ महल बनाकर बैठे है गरीबों के हक का रूपया मारकर.

भाई मजा आ गया पहली बार ऐसा तू तडाक करने वाला दमदार युवा मिला जिसने इन तीनों तथाकथित संभ्रांतों को एक ही झटके मे पानी पिला दिया. जियो मेरे शेर जियो.

और सच मे उस बच्चे को इस नालायक डाक्टर ने मारा था वो बेहद गंभीर था, बच्चों पर इतने अधिकार से मारने वाला नालायक डाक्टर मैंने पहली बार देखा है. बाद मे मैंने तीनों से कहा कि आईन्दा आप ऐसी हरकत ना करें और यह सड़क सच मे किसी की बाप की संपत्ति नहीं है और अगर आपको डर है तो अपने घर के आगे सिक्योरिटी लगावाईये ना कि किसी अबोध बच्चे को मारकर अपनी मर्दानगी दिखाए.


उस युवा को सच मे सलाम जो करता तो मजदूरी है पर इतना जागरूक और स्पष्ट कि बता नहीं सकता. अगर ऐसे लोग हो जाये तो हमारे देश की हालत सुधर सकती है.

अमर उजाला मे मेरा आज ब्लॉग 7 सितम्बर 2013

Wednesday, September 4, 2013

उच्च शिक्षा और सीनियर सेकेंडरी कक्षाओं की ज्यादा ध्यान दिया जाये- सन्दर्भ उप्र की शिक्षा व्यवस्था

उप्र मे हरदोई जैसे जिला मुख्यालय पर सीनियर सेकेंडरी कॉलेज की स्थिति इतनी दयनीय है कि बता नहीं सकता. प्रधानाचार्य मजबूर, बच्चे छत से कूद जाते है यदि वे दरवाजे पर ताला लगाकर रखते है तो, डाईट मे फर्नीचर है पर ४५० शिक्षक अभ्यर्थियों को जमीन पर बैठना पडता है, कालेजों मे हालत खराब, बिजली नहीं पंखे नहीं, और अध्यापकों की भारी कमी. हालत इतनी खराब कि हर कक्षा के तीन चार सेक्शन होने के बाद और कक्षा मे सत्तर से अस्सी छात्र होने के बाद भी राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान की ओर से कोई ठोस पहल नहीं ना बजट ना प्रावधान और शैक्षणिक स्तर का मत पूछिए भा जान बच्चों को कुछ पता नहीं , सितम्बर माह चल रहा है और वे साधे सात पर स्कूल आते है और साढ़े बारह तक मैदान मे खड़े रहते है बस फ़िर ट्यूशन चले जाते है, कभी कोई जाता नहीं देखने परखने . रसायन शास्त्र के व्याख्याता ने जब रसायन की प्रयोगशाला खोली तो लगा कि मै सत्यजीत रे की किसी फिल्म के दृश्य मे आ गया हूँ मकड़ी के जाले और सदियो से जमी हुई धूल और उपकरण टूटे-फूटे मानो किसी ने बरसों से छुआ भी नहीं. कह रहे थे कि क्या करना है साहब ना साधन है ना बच्चे सीखना चाहते है. स्कूलों मे अतिक्रमण प्राचार्य कह रहे थे कि हम पढाए या चाकू लेकर मोहल्ले वालों से लडें ? बड़े हाल मे पानी भरा हुआ और छतें ऐसी कि अभी टूटकर गिर जायेंगी. और यह लखनऊ से मात्र एक सौ दस किमी पर है और राजनैतिक रूप से बेहद जागरूक. सडकों पर बच्चों की भारी भीड़ और स्कूलों मे भी भीड़ पर ना साधन ना गुणवत्ता अब क्या करें कितना बड़ा चैलेज है यहाँ काम करना यह समझ आया. पर इसके विपरीत निजी और मान्यता प्राप्त स्कूलों मे घटिया मैनेजमेंट के कारण शिक्षकों की हालत खराब मैनेजर का इतना दबाव कि बस शिक्षक सांस भी पूछ कर लेता है. उफ़ ये यूपी सच मे उलटा प्रदेश है. हरदोई जिले मे शिक्षकों की बेहद कमी है और मजेदार यह है कि एक इंटर मीडियेट कॉलेज मे उर्दू की एक शिक्षिका विज्ञान विषय पढ़ा रही है. अब बताईये कि कैसा अनूठा संयोजन है और यह सबके संज्ञान मे है, वो कह रही थी कि अब क्या करें? दूसरी ओर बारहवीं के बच्चे हेंड पम्प, मेरी माँ, अखबार, या पानी के जग या कुर्सी पर पांच वाक्य हिन्दी मे नहीं बोल सकते, अंग्रेजी मे बोलना तो बहुत दूर की बात है. पता नहीं संकोच, आत्मविश्वास की कमी, डर, कौशल या दक्षता की कमी है. माट्साब कहते है "साले गंवार है जानवर कही के, कभी नहीं सुधर सकते, साले ढोर ही रहेंगे.........." अब बताईये कौन दोषी है जब नवमी से लेकर बारहवीं तक के बच्चे एक बड़े से पेड़ के नीचे बैठे है. सारे माट्साब गप्प लगा रहे है और बेचारे प्रधानाचार्य अकेले कमरे मे बैठकर बोर्ड परीक्षा के फ़ार्म भर रहे है क्योकि अध्यापक कोई सहयोग नहीं करते. उलटा प्रदेश और राज्य सरकार लेपटॉप बांटकर "पुण्य" कमा रही है और वोटों की फसल काटना चाहती है. मेरे साथ एक मित्र थे उनका एक मासूम सवाल था कि सरकार इन बच्चों के बारहवीं पास कराकर क्यों इनकी जिंदगी से खेल रही है, क्यों इनका जीवन बर्बाद कर रही है, बंद कर दो सारे स्कूल, क्यों इन्हें कचरा बनाकर बाहर प्रोडक्ट के रूप मे शिक्षित की श्रेणी मे दर्ज किया जाएगा..........? ,मुझे लगा कि सवाल तो वाजिब है पर मेरे पास कोई जवाब नहीं था, और अगर ऐसे देखे तो देश के आधे से ज्यादा हाई स्कूल, सत्तर प्रतिशत इंटर मीडियेट कॉलेज, और शत प्रतिशत डिग्री और पी जी कॉलेज बंद कर देना चाहिए क्योकि कोई भी उपयोगी और जीवन परक शिक्षा कही नहीं दी जा रही और हमारे देश के लोग इसका सीधा सीधा परिणाम भुगत रहे है. अब समय है कि देश का ध्यान प्राथमिक शिक्षा से हटाकर थोड़ा बहुत उच्च शिक्षा और ज्यादा ध्यान सीनियर सेकेंडरी कक्षाओं की तरफ दिया जाये.