Saturday, February 28, 2015

जूते बजट और जेटली - सन्दर्भ 2015



भारत के गरीबो एक हो जाओ

जूते सस्ते और मुखिया के दांत दर्शनीय हो गए है।



अस्सी घाट पर भी सुना कि जूतों की बरसात हुई आज।
बनारस में लोग कह रहे है।



छग सरकार के 2015 में होने वाले साहित्य समागम में इस वर्ष कम दिग्गज जाने की संभावना है।
सबने सुन लिया है कि जूते सस्ते हो गए है ।
सुन रहे हो ना पदम् विभूषितों , ज्ञानपीठियों, भारत भूषणियों , और मोहल्ले, गली- गाँव के टट पुंजिये मास्टर टाइप कवियों, गद्यकारों और कहानीकारों !!!


मेरे लिए हर आदमी एक जूता है माई बाप
यह कविता की पंक्ति किसी प्रगतिशील कवि ने , जो ज्ञानपीठ की आस में मुंह धोकर बैठा होगा, ने आज जेटली को सुना दी और जेटली ने सरकार पर से दे मारी !!!


क्या राहुल को पता था कि जूता सस्ता होने वाला है ? शुक्र है आज सदन में नहीं है वरना इटेलियन लैदर से बने जूते का इस्तेमाल ....
उफ़ !!!!


जूता, जेटली और जर्रा जर्रा 
हाल हमारा जाने रे 

पत्ता पत्ता बूटा बूटा !!!


भारत के भक्तो और घोषित बुद्धिजीवियों सावधान हो जाओ
जेटली ने जूते सस्ते कर दिए है।



Friday, February 27, 2015

यह नटखट था ही ऐसा



कुछ यूँही चलते चलते........

यह नटखट था ही ऐसा कि बरबस ही ध्यान खींच लिया इसने आज, गनेशधाम इंदौर की एक आंगनवाडी में ...... नाम था रूद्र , शुरू में थोड़ा रोया, फिर मुस्कुराया और फिर हंसने लगा और अंत में मुझे जीभ दिखाकर ताली पीटने लगा..........बस आते समय जी भरकर आशीष देकर आया हूँ आज कि रूद्र बाबू, खुश रहो, लम्बी उम्र जियो और जमाने को जीभ दिखाते रहो मुस्कुराते हुए !!! किसने कहा कि मॉडल बेबी बड़े और अच्छे घरों में पाए जाते है...........? बस ये ही बच्चे तो हमारी धरोहर है ...........

इंदौर 26 फरवरी 15 




झुग्गी वालों को वोट बैंक या हितग्राही समझना बंद करो



मजे का देश और मजे के देशवासी है. इंदौर के बाण गंगा क्षेत्र में एक बस्ती है  गणेशधाम  कहने को तंग बस्ती, झुग्गी या "स्लम" है, परन्तु अगर आप घूमेंगे तो पायेंगे कि आलीशान मकान बने हुए है सब पक्के और शानदार. लगभग हर चौथे घर में लेथ मशीन या कोई ना कोई उद्योग धंधा चल रहा है. हर घर में दो पहिया और सातवें घर में चार पहिया. जब हम लोग महिला सुरक्षा के सन्दर्भ में सेफ्टी ऑडिट कर रहे थे तो पाया कि चार पांच घरों में शौचालय की सुविधा नहीं है. घर के लोग बस्ती के एक कोने में बने शौचालय में जाते है जो सार्वजनिक है और इतना गंदा कि अगर आप सौ फीट दूरी से भी निकल रहे हो तो आपकी नानी मर जाए दुर्गन्ध से. ये शौचालय विहीन लोग यहाँ आते है किशोरवय से लेकर जवान लड़कियां यहाँ आती है अपनी माँ या दादी के साथ. जवाब में युवा वर्ग से लेकर बूढ़े तक छेड़ने के लिए पुरी बेशर्मी से वहाँ अड्डा जमाकर खड़े रहते है. लोगों को सारे फायदे चाहिए घर पक्का बनवा लेते है पर शौचालय सरकार बनवा कर दें भला क्यों? ऐसे ही हालत शिवशक्ति नगर के है या ग्वालियर में कम्बल केंद्र के या जबलपुर में चौधरी मोहल्ले के या भोपाल में भदभदा स्थित बस्ती के, कब तक इनके स्थायी हालात सुधारने की बात नहीं होगी या इन्हें राजनैतिक रूप से इस्तेमाल किया जाता रहेगा? हर बस्ती में लगभग यही समस्या है, सीवेज, निकास , पीने के पानी की लाइन में नाली का पानी घुस रहा है, संडास नहीं, बिजली के खम्बे है अपर उन पर लट्टू नहीं, और लगा भी दिए तो मनचले जवान निशाना लगाकर फोड़ देंगे, छेड़छाड़ एक स्थायी बीमारी, स्मैक, हेरोइन, गांजा, भांग और तमाम तरह के नशीले पदार्थ आसानी से उपलब्ध, पुलिस की मिली भगत से सारी गतिविधियों का सफल संचालन, ह्यूमन ट्राफिकिंग जैसी चीजे बेहद आम है. 

और ये सिर्फ इंदौर नहीं प्रदेश के चार बड़े शहरों में मै यह ट्रेंड देख रहा हूँ, बस्ती वाले इंसान नहीं सिर्फ वोट बैंक, एनजीओ के लिए बेनिफिशरी, नगर निगम के लिए कचरे का ढेर, प्रशासन के लिए गैर कानूनी अड्डे, और आम लोगों के लिए हरामखोर जो मध्यम वर्ग से लेकर उच्च वर्ग तक के घरों में झाड़ू पोछा लगाने का काम करते है. 
बड़े सुविधाजनक मकान और पर्याप्त रूप से कमा कर खाने वाले ये बस्ती के लोग भी इस देश में रहने का हूनर जान गए है हर घर में सोफा, रंगीन टीवी, फ्रीज, तीन से चार मोबाईल जैसी चीजें, जो एक जमाने में विलास की वस्तु थी, अब इन घरों में आसानी से सबके पास उपलब्ध है. इसलिए अब हमें इन बस्ती बनाम बीपीएल कार्ड धारकों के बारे में फिर से समझ बनाने की जरुरत है. मैंने भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर चारों शहरों में बस्तियों को पिछले आठ महीनों में बहुत बारीकी से देखा, परखा और समझा है. गरीबी और भुखमरी अब कालातीत बातें है, लगभग बच्चे पढ़ रहे है, युवा कमा रहे है और नशे में खर्च कर रहे है, महिलायें घर में काम करके बाहर भी कमा रही है, शराब का उपयोग जितना ये लोग कर रहे है उतना कोई नहीं, और इसमे इनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा खर्च हो रहा है. 

अब इन लोगों को मेहरबानी करके वोट बैंक और हितग्राही समझना बंद करें और एक आम नागरिक की तरह से देखे. इनसे ज्यादा संघर्ष सामान्य आदमी कर रहा है और ये लोग सिर्फ सुविधाएं लेकर असुर हो गए है. अब एनजीओ को भी कोई और धंधा देखना चाहिए बजाय इनको परोसने के और ग्रांट उगाहने के. 

Thursday, February 26, 2015

Philosophy



अगर अपने पास भी बचपन में रुपया और जवानी में समय होता तो आज कुछ नहीं कर पाते, मै या हम जैसे लोग इन दो चीजों की ना होने की वजह से ही "सेल्फ मेड" हो पाए है और परिवार की सीख थी कि हारना मत, कुछ भी हो जाए, क्योकि मुश्किलों में भी मैंने / हमने अपने माता - पिता को मुस्कुराते हुए ही देखा था और आज यही काम आ रहा है कि कितना भी मुश्किल समय हो एक जगह खड़े रहना सब कुछ गुजर जाएगा और सब कुछ ठीक ही होगा...........

- एक मुश्किल समय अपने आप को दिलासा देते हुए.
 — feeling alone.



जब आपसे एक दोस्त जुड़ता है तो यकीन मानिए आपका खर्च बढ़ने वाला है, जैसे परिवार में एक सदस्य के जुड़ने से खर्च बढ़ता ही है ना !!!

ज़रा सम्हल कर, महंगाई का ज़माना है मित्रों, दोस्ती सोच समझकर करें.

Wednesday, February 25, 2015

20 फरवरी 15 को ओव्हर नाईट एक्सप्रेस में इंदौर से जबलपुर की ट्रेन में एक दुखद अनुभव



20 फरवरी 15 को ओव्हर  नाईट एक्सप्रेस में इंदौर से जबलपुर की ट्रेन में एक दुखद अनुभव 

जबलपुर जा रहा हूँ II AC के कोच में इंदौर से पता नहीं कहाँ के 5-6 जज साहेबान बैठे है.हाई कोर्ट में कोई परीक्षा देने जा रहे है. छह बजे से अभी तक जिस भयानक आवाज, मस्ती और मजाक में IPC और CRPC का मख़ौल उड़ा रहे है, किस तरह से संविधान की हंसी उड़ा रहे है, पोस्ट मार्टम रिपोर्ट, बाबू राज में सेटिंग, वकीलों से सांठ-गाँठ के किस्से चल रहे है, विधायक के केस, पुलिस से लेन देन और सही भाव, जमानत और पेरोल के रेट्स, उससे मेरा सर शर्म से झुक गया. और तो और एक जवान है पुलिस का जिससे बारी बारी से सबने चाय पानी की सेवा तो करवाई साथ में अपनी मोटी चर्बी की मालिश भी करवा ली. वीभत्स सामन्तवादी मानसिकता. रहने वाले छतरपुर, खरगोन , शाजापुर, रीवा, सतना और बालाघाट के है भाषा से स्पष्ट हो जाता है, जैसे "आंगे". सब अंगरेजी ना आने दुखी है, एक कोई बी ए पास लग रहा है जो सबको सुप्रीम कोर्ट की रपट बांचकर और भयानक शैली में व्यंग्यात्मक अनुवाद में समझा रहा है. बीच बीच में वाट्स अप के "श्लील वीडियो" भी देखे जा रहे है। सबकी उम्र लगभग पचास है और बीस से पच्चीस साला अनुभव है क्योकि बातचीत में 91, 94 का या 87, 89 का जिक्र आ रहा है. 


थोड़ा बहुत जो विश्वास न्याय पालिका में था , इन्हें देखकर वो भी ख़त्म हो रहा है. हे भगवान् अब समझा कि कैसे ये लोग कल्लू मामाओं की पैरवी करके कोर्ट में जाते है प्रमोट होते है या अभिषेक मनु सिंघवी जैसे लोग सामने आते है। पर समझ यह आया कि जैसा समाज होगा वैसे ही ये होंगे ना, बेचारे मंगल गृह से थोड़े ही आये है !!!

एक पत्रिका का नवाचारी हो जाना - सन्दर्भ चकमक के नए कविता कार्ड्स




चकमक बच्चों और युवाओं की एक बेहतरीन पत्रिका है इसमे कोई शक नहीं है. बदलते समय और परिवेश में जिस तरह से इस पत्रिका ने अपना कलेवर बदला, संकीर्ण और बंद दिमाग के परम्परागत ढाँचे से निकलकर अब यह पत्रिका जिस खुलेपन से निकल रही है और एक बड़े समाज साहित्य और विज्ञान की दुनिया को कव्हर करती है वह प्रशंसनीय है. बदलते समय के साथ चकमक ने जिस तरह से अपने आप को ढाला है, वह अतुलनीय है. 

दिल्ली पुस्तक मेले के अवसर पर चकमक के सम्पादक द्वय सुशील शुक्ल और शशि सबलोक ने बच्चों के लिए कविता कार्ड छापे  है जो अदभुत और अप्रतिम है, बेहद सस्ते ये कविता कार्ड नामचीन कवियों की रचनाओं को लेकर बनाए गए है जिन्हें आसानी से कही भी सुविधा अनुसार लगाया जा सकता है. प्रभात, प्रयाग सुक्ल, रामनरेश  त्रिपाठी, श्रीप्रसाद, राजेश जोशी, बद्रीनाथ भट्ट, लाल्टू, नवीन सागर, सुशील शुक्ल, रमेशचंद्र शाह जैसे ख्यात कवियों की कवितायें इन कार्ड्स पर छपी है जिन पर बहुत आकर्षक रंगीन चित्र चंद्रमोहन कुलकर्णी और अतनु राय ने बनाए है. ग्लेज्ड पेपर पर छपे इन 12 कविता कार्ड्स का मूल्य मात्र पच्चीस रुपये है. 

इसी के साथ चकमक ने टेबल पर रखने के लिए गुलजार कृत छोटी छोटी चार पंक्तियों का भी एक माहवार कैलेण्डर भी छापा है, जो हर माह के हर मौसम का जिक्र करके आपको उस मौसम की याद और ताजगी से भर देती है. चकमक में यह प्रयोग गत वर्ष किया गया था, गुलजार ये चार पंक्तियाँ लिखते थे और बच्चे उन पर चित्र बनाते थे या लिखते थे, फिर गुलजार अपनी पसंद से छः सात  रचनाओं  का चयन करते थे जिन्हें चकमक में छापा जाता था.  बहुत आकर्षक कैलेण्डर और कविता कार्ड का यह प्रयोग निश्चित ही अनूठा और नवाचारी है. 



सम्पादकद्वय को Sushil Kumar Shukla​ और  Shashi Sablok​ को हार्दिक  बधाई और आपसे अनुरोध कि यदि आप यह लेना चाहे  तो चकमक के पिटारा की वेब साईट पर संपर्क करके मंगवा सकते है. या भी Manoj Nigam​ से संपर्क कर सकते है. 

चकमक के स्वरुप में जो बदलाव आया है वह यदि आज से पांच सात साल पहले आया होता तो यह पत्रिका  दक्षिण एशिया के हिन्दी भाषी देशों में छा गयी होती और सुशील और शशि से दुराग्रह है कि अब प्रदेश, प्रदेशों और देश से निकालकर इस पत्रिका को हिन्दी भाषी देशों में वृहत्तर समाज के बच्चों और किशोरों को पहुंचाने का प्रयास करें.

Monday, February 16, 2015

"इस तरह मरते है हम" - पाब्लो नेरुदा




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मरना शुरू होता है धीरे से
जब तक शुरू ना हो एक यात्रा 
शुरू नहीं करते बांचना जीवन का ककहरा
सुनना शुरू नहीं करते जीवन संगीत और अनहद नाद
शुरू नहीं करते पहचानना अपने आपको
इस तरह मरना शुरू करते है धीमे से
मार देते है जब अपने जमीर को
बंद कर देते है दूसरों से मदद लेना अपने लिए
तो मरना शुरू करते हो आप
अपनी बनाई आदतों के गुलाम बनते हुए
एक ही पथ पर चलाते हुए जीवन को
अगर नहीं बदलते ढर्रा अपना रोजमर्रा का
नहीं खोज पाते जीवन के रंग बिरंगी संसार को
मुखातिब नहीं होते अगर अनजान लोगों से
तो यकीन मानिए आप मरना शुरू कर रहे हो
जान ना पायें अपने आप को और अनजान रहे अपनी ही प्रकृति से
उद्दाम और अशांत भावों को समझने में असमर्थ
समझाने में उन्हें, जिनको देखकर खुद की ही आँखों में चमक आ जाती है
अपनी तेज साँसों के स्पंदन को ह्रदय में उछलता महसूस करो
तब हो जाता है मरना शुरू
असंतुष्टि भी नहीं बदल पाती जीवन का एकाकी राग
पगुराए प्रेम से व्यथित होकर भी नहीं बदलना चाहते
अनिश्चित कल के लिए जोखिम लेने को तत्पर ना हो
दौड़ ना जाएँ एक पनीले स्वप्न के पीछे
भागे ना हो महत्वपूर्ण क्षणों के अवसर पर एक बार भी जीवन में
कुछ ऐसा करने कि जो दिल ने चाहा करें और चाहे
दिमाग कहें कि चढ़ती धुप में एक मदमस्त बेखौफ घोड़े को ना दौडाओ
(अंग्रेजी से अनुवाद संदीप नाईक) मूल कविता का सौजन्य Manoj Pande
Ashish Retarekar भाई यह अनुवाद सिर्फ तुम्हारे लिए

"You start dying slowly " - By Pablo Neruda



You start dying slowly
if you do not travel,
if you do not read,
If you do not listen to the sounds of life,
If you do not appreciate yourself.
You start dying slowly
When you kill your self-esteem;
When you do not let others help you.
You start dying slowly
If you become a slave of your habits,
Walking everyday on the same paths…
If you do not change your routine,
If you do not wear different colours
Or you do not speak to those you don’t know.
You start dying slowly
If you avoid to feel passion
And their turbulent emotions;
Those which make your eyes glisten
And your heart beat fast.
You start dying slowly
If you do not change your life when you are not satisfied with your job, or with your love,
If you do not risk what is safe for the uncertain,
If you do not go after a dream,
If you do not allow yourself,
At least once in your lifetime,
To run away from sensible advice…
Do something your heart wants 
but your mind keeps telling you not to
Ride a wild horse into the sun

Sunday, February 15, 2015

"नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएं" पर ताई अलकनंदा साने की टिप्पणी.











मेरी किताब "नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएं" पर बड़ी ताई अलकनंदा साने की टिप्पणी. बहुत सहज होकर जिस अपनत्व से ताई ने जो भी लिखा है, वह शिरोधार्य है. मै कोशिश करूंगा कि अपने लेखन में सुधार ला पाऊं. आभार और धन्यवाद 

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प्रिय संदीप, 


मैं इसे अपने वाल पर पोस्ट नहीं कर रही हूँ। आप मुखपृष्ठ के फोटो के साथ मुझे टैग कर दें। मैं फोटो नहीं लगा पाउंगी। आदतन थोड़ा - बहुत कटु लिखा है , पर वह होना चाहिए ऐसा मैं मानती हूँ। अन्यथा न लें।


संदीप नाईक की लेखनी की साक्षी मैं तब से हूँ , जब वे अपनी बैचैनी नई दुनिया में 'पत्र संपादक के नाम' में व्यक्त करते थे। जब उनका ''नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएँ'' यह संग्रह हाथ आया तो पहला विचार यही आया कि उस बेचैनी को एक बड़ा कैनवास मिल गया। इस पुस्तक के शुरू के बीसेक पृष्ठों में जो है, वह कथा की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता किन्तु यह स्फुट लेखन आगे की कथाओं के लिए पृष्ठभूमि तैयार करता है। इन पन्नों को तेजी से पलटते हुए जब हम आगे बढ़ते हैं तो किनारे से मुख्य प्रवाह में आ जाते हैं और लेखक के मनोभावों के साथ डूबते-उतराते हैं। पहली कहानी 'मृत्युलेख' एक तरह का आत्मालाप है, तो 'हँसती हुई माधुरी'' फंतासी से यकायक कटु वास्तविकता की ओर ले जाती है। कुल ग्यारह कहानियाँ हैं, जो पढ़ने के साथ - साथ सोचने को भी मजबूर करती है। इस संग्रह की जो कहानी मुझे सबसे उम्दा लगी वह ''अमेय'' है. वैसे तो सभी कहानियाँ प्रथम पुरुष एक वचन में है और सभी भूतकाल की ओर इंगित करती हैं,पर अमेय शायद इसलिए अधिक अच्छी बन पड़ी है कि उसमें बचपन की स्मृतियाँ हैं और ये स्मृतियाँ सभीको अच्छी लगती है। संदीप भी इससे अछूते नहीं हैं। कहन संजीदा है और इस हद तक संजीदा है कि पाठक को लगता है , सब कुछ लेखक के जीवन में घटित हुआ है। संदीप के पास एक वैचारिक दृष्टिकोण है और वह कहानियों में झलकता है। हँसती हुई माधुरी का एक वाक्य देखिए ---''एक ओर महिलाओं की क्या स्थिति है और दूसरी ओर माधुरी दीक्षित। यकीन मानिए मित्रों मेरे पास ग्लानि और हताशा के सिवा कुछ नहीं बचा.'' बचपन का सटीक वर्णन अमेय में है --''बर्फ की सिल्लियों पर रखी लाश को देखना दहशत कम, कौतुक ज्यादा था।'' बड़े सोचते हैं मृत्यु से बच्चे डरते हैं , पर वास्तव में ऐसा होता नहीं है। आखिरी कहानी ''सतना को भूले नहीं'' प्रेम कथा है, पर आम प्रेम कथा से अलग और आँख को नम करती है।

संग्रह के विषय अलग-अलग है,पर देश काल और स्थल कस्बाई है। ट्रेन है , हवाई जहाज है,कलकत्ता है,गौहाटी है,परदेस गया युवा है , संदीप नर्मदा किनारे से कितनी ही लहरों की सैर करवा लाते हैं। सीधा -सादा कथ्य है और वैसी ही सीधी - सादी भाषा शैली है। प्रूफ की गलतियाँ नहीं के बराबर है , लेकिन प्रूफ वाचक मराठी से शायद अनभिज्ञ रहा होगा सो 'आबा' आब हो गए हैं और ''गुलाबाई'' गुलाब बाई। गुलाबाई दरअसल संझा जैसा लड़कियों का त्यौहार होता है। मुखपृष्ठ किताब से अलग देखा जाय तो अच्छा है , पर पुस्तक के संदर्भ में अनावश्यक ख़ौफ़ पैदा करता है। विषय वस्तु या शीर्षक के अनुरूप होता तो अधिक आकर्षक लगता। बहरहाल ये सब प्रकाशन में होता रहता है , बावजूद इसके संदीप बधाई के पात्र हैं। वे ऐसा ही लिखते रहें यही शुभकामना।

Tuesday, February 10, 2015

पैन्ट, जिप और पल्लवी



रेड लाईट एरिया था, मेरे पास कीमती सामान और बहुत सारे रूपये थे, परन्तु फिर भी मै घूस गया, कई रंग- बिरंगे पर पुते हुए चेहरे थे जो आवाज दे - देकर पुकार रहे थे, पल्लवी, संगीता और अल्पना, कर्नाटक, केरल, वर्धा, धूले, इंदौर, छिंदवाड़ा और ना जाने कहाँ - कहाँ से आई थी, एक पतली गली के कोने में पहुंचा तो मुझे घेर लिया उन सबने, मेरी मर्दानगी को ललकारा और मुझे उत्तेजित करने के लिए चूमा भी और मेरे शरीर पर हाथ भी फिराए.  फिर किसी ने कहा कि हटो मुओ, टुच्चों इतने छोटे बच्चे को लूट लोगे क्या, यह पूना के बुधवार पैठ में आया है तो इसे अच्छा और आजीवन याद रहने वाला अनुभव देना चाहिए और मुझे उस भीड़ से खींचकर वो अपने 4 X 6 के कमरे में ले गयी - जो एक बड़ी से हवेलीनुमा घर में एक ओर बना हुआ था. ....यह कहते हुए वह हांफने लगा फिर धीरे से पानी  पीते हुए बोला कि पल्लवी बहुत प्यारी थी, मै कुछ करने नहीं गया था, बस जानने की इच्छा थी उस दुनिया को जो मै बचपन से सुनता आया था. 

फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा और गुदगुदी सी की और मै सन्न था उसकी इस घटिया हरकत पर, वह समझ गयी, फिर वह उठी और एक कप चाय बना लाई. कल शाम हल्की सी ठण्ड थी, चाय में अदरख तेज था और बहुत मीठी वाली शक्कर पडी थी खूब सारी, मानो उसने अपनी मिठास भी उस चाय में मेरे भोलेपन पर उंडेल दी हो, मै एक सांस में पी गया. उसने कहा कि कुछ करोगे, मै सुनता रहना चाहता था, अचानक उसने अपनी रोती हुई बच्ची को उठाया और दूध पिलाने लगी. मै हैरानी से किसी जवान स्त्री को बच्ची को दूध पिलाते पहली बार देखा रहा था, उस खिड़की से तेज आती शफक की रोशनी में डूबी किरणें, उसके चेहरे पर जो सुखद भाव दिखा रहे थे वे मेरे लिए किसी मरियम से कम नहीं थे, जो एक बच्ची को दूध पिलाते हुए उभर रहे थे, उसके दोनों बड़े - बड़े और लगभग लटक चुके उरोज चमक रहे थे और मुझे वासना नहीं, वात्सल्य की अनुभूति हो रही थी, मै उठा तो उसने बच्ची को हटा दिया और नीचे ठंडी जमीन पर पटक दिया और मुझे मेरी ठोडी से पकड़कर बिठा दिया, अपने चेहरे को बेहद पास ले आई थी और अपने मुंह से साँसों का एक लंबा निश्वास छोड़ते हुए बोली तुम कहाँ उन किन्नरों के पास चले गए, असली औरत मै हूँ देखोगे, अपने कपडे खोलने लगी....

पर इस बीच मै सम्हल चुका था, मैंने कहा, सुनो पल्लवी -  मै तो एक शौकिया फोटोग्राफर हूँ और बच्चों के  लिए काम करना चाहता हूँ , आज इधर से गुजरा, तो सोचा कि देखता चलूँ कि बच्चे किन परिस्थितियों में रहते है, वे क्या करते है जब तुम जैसी औरतें धंधा करती है...........मै तो "गाडीवालों का कटरा" पढ़कर आया था और एक संस्था के बारे में सुना था - जो इन बच्चों के साथ काम करती है. मै अपनी कमाई का एक हिस्सा देना चाहता हूँ, हाँ, मुझे भी वह सब करने की इच्छा तुमने जगा दी है पल्लवी पर तुम.........अचानक वह उठ बैठी और बोली निकलो.......मै कुछ नहीं बोला, जमीन पर पडी उस बच्ची को देखा और बिस्तर पर एक पांच सौ का नोट रखकर निकल आया. वह अपनी साडी सम्हाल रही थी और मै अपने दोनों हाथो से पेंट को संवारते हुए सड़क पर आ गया, पसीना निकलना बंद हो गया था और अब चिंता थी कि इस अनजान शहर में कोई देख ना लें, वरना इज्जत का क्या होगा.....

( "पैन्ट, जिप और पल्लवी" - लिखी जा रही कहानी का एक अंश) 

दिल्ली चुनाव परिणाम और अरविंद केजरीवाल के रूप में आम आदमी की जीत

अगली लोकसभा में भाजपा और आप पार्टी दो प्रतिद्वंदी है और अगर मोदी जी ने चाहा और कल्लू मामा इसी तरह से तिकडम भिड़ाकर संघ के कांधो पर चढ़कर देश द्रोही काम करता रहा तो अगला प्रधान मंत्री अरविन्द केजरीवाल बनेगा।


जब सारा देश आम आदमी और लोकतंत्र का जश्न मना रहे थे कुछ मद मस्त और मदांध लोग कविता की आवश्यक्ता और मर्म पर बहस में अपनी खुद की महत्ता स्थापित करने में जुटे थे।

NDTV और Om Thanvi जी को कोसने वालों इतिहास तुम्हे माफ़ नहीं करेगा।

बिन्नी या शाजिया को विपक्ष के नेता के लिए आमंत्रित सीट दे दी जाए।
पहला आदेश

अरविंद केजरीवाल 
मा. मुख्यमंत्री, दिल्ली प्रदेश

हे किरण देवी अब सम्हलकर निकलना, सभी भाजपा के कार्यकर्ता भी सतर्क रहे , अब दिल्ली में 1500 कैमरे लगेंगे।
आदेशानुसार
कल्लू मामा
अध्यक्ष, हारी हुई कांग्रेस से गयी गुज़री चायवालो की पार्टी।

मोदी जी सच्चा डेरा मानते हो ?
जी महाराज !!!
चुनाव में किरण बेदी जैसो का और धर्म का इस्तेमाल करते रहो कृपा आती रहेगी।

अम्बानी घबरा रहा है कि ये मफलर वाला वो दर्ज एफ आई आर ना खुलवा दें फिर से और अब तो मोदी भी कुछ नहीं कर पाएंगे।
मोदी जी उ कलुआ अपशगुनी था, हम कहे थे कि मत बुलाओ 26 जनवरी पर खर्चा करवाया और हमें डुबो गया।

देश का नक्सली दिल्ली की विधानसभा में

पाठ्यक्रम से किरण बेदी के पाठ हटाओ। की गयी कार्यवाही से दोपहर बारह बजे तक अवगत कराएं
- विस्मृति ईरानी

Ravish Kumar धन्यवाद और बहुत मुबारक कि पहली IPS और इंदिरा गांधी की कार उठाने की पोल पट्टी खोलने के लिए। हताश , बेबस और अकर्मण्य किरण की सही तस्वीर दिखाने के लिए

मम्मी इटली चले, एक नई कांग्रेस (इटली) बनाएंगे।

अरविन्द यह भी सोचो कि इतना रुपया कहाँ से लाओगे और वाई फाई आदि फ्री करने से दिल्ली में पोर्निग्राफी बढ़ेगी और महिला हिंसा बढ़ेगी। सावधान ।

डाक साहब और गुरूजी की आत्मा को दस लाख के सूट से दुःख पहुंचाने वाले नरेंद्र भाई मोदी, दुनिया के हिन्दू तुम्हें कभी माफ़ नहीं करेंगे।
सुनो जी राम माधव, आज से इनके कच्छे से लेकर पुरे परिधान दिल्ली के संघ कार्यालय से नियंत्रित होंगे ।
- डा मोहन भागवत

10 फऱवरी को एक झाड़ू वाला आया और सारे चाय वालों के ठेले हटा दिए इस तरह से दिल्ली का अतिक्रमण साफ़।
चायवाला बेरोजगार , अब वो अमेरिका चाचा के यहां या पाकिस्तान में शाल वाले हमजाद के यहां जाने की सोच रहा है। साथ में अपना घरेलू नोकर "बारीक" को भी ले जाएगा।

और रजत शर्मा अरविन्द के घर गए और बोले भैया मैं अपने चैनल का नाम झाड़ू रखना चाहता हूँ और अब भुत प्रेत की कहानी बंद और सूचना के अधिकार की कहानियां दिखाऊंगा।

मोदी जी नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दें मुझे हराने में उनका हाथ है।
-किरण बेदी

शाजिया इल्मी बोली किरण बहन धीरज धरो ये मुआ शुरू से ही ऐसा है। चलो अपन दोनों घर वापसी करते है, अण्णा अपने को मदद कर देंगे

इधर राहुल बाबा ने सोनिया से कहां कि
मम्मी मोदी जी के यहां आज ही बैठ आते है, पहले दिन ही ठीक रहता है बाद में दस दिन तक सूतक रहेगा फिर पूरी पार्टी में। आते समय कृषणा नगर में किरण आंटी के यहां हो लेंगे और आकर नहा लेंगे।

सुना कि देश के सारे आय पी एस अफसरों ने अपनी टोपी निकालकर किरण बेदी को कोसा और उनके अहम् को श्रद्धांजलि दी और कसम खाई कि कल्लू मामाओं को जेल में उलटा टांगकर लाल मिर्ची की धूनी देंगे।

अगली 26 जनवरी पर राजपथ पर किरण झाड़ू लगाएगी और अरविन्द विदेशी मेहमान के साथ अदरक की चाय पिएंगे।
धन्यवाद मोदी जी और कल्लू मामा।


मोदी जी अमित शाह को लेकर विपश्यना में जा रहे है और किरण बेदी बँगला छोड़कर झुग्गी में, अब वे झाड़ू वाली बाई बनकर देश सेवा करेगी।
कांग्रेस को कोई गम नहीं है।

केंद्र सरकार के पीटे हुए प्यादे भी कुछ नहीं कर पाये। शर्मनाक भारत सरकार !!! 

जो हारे हैं, उनके लिए १०० से ज्यादा सांसदों, २० केन्द्रीय मंत्रियों, ४ मुख्यमंत्रियों और राज्यों से आए ३५ मंत्रियों ने कमान संभाल रखी थी. देश का मतदाता सही विकल्प चाहता है. वह अब किसी एक चेहरे या राजनीतिक दल का प्रतिनिधि नहीं है. देश के चुनावों में पिछले २ सालों में जो कुछ हुआ वह कांग्रेस के खिलाफ रहा है. कांग्रेस के खिलाफ घटी घटनाएं भाजपा के पक्ष में गयीं. दिल्ली में सही विकल्प के रूप में लोगों के सामने केवल भाजपा नहीं थी. आप ने वास्तव में केवल चुनाव नहीं जीता है, विश्वास जीता है. यही कारण है कि उनकी जिम्मेदारी अब बहुत-बहुत ज्यादा है.


Monday, February 9, 2015

इसी खुले अम्बर के नीचे




बाहर शाम ढल रही है और एक अजीब से दुःख ने मेरे उद्दाम मन को उदास कर दिया है यह उदासी ठीक उसी तरह है जैसे एक सख्त चट्टान को तपते आसमान के नीचे नंगा रहना पड़ता है, और गर्म होते होते उसे आखिर एक गर्म चट्टान कह दिया जाता है. यह उदास शाम एक बड़ा आजीवन सालने वाला दुःख लेकर आई है. यह दीगर बात है कि इस दुःख की मद्धिम आंच में एक हल्का सा सुख का कतरा कही छुपा है, जो मंद मंद मुस्कुरा रहा है और इक छोटी सी हंसी की तलाश में मै बहुत दूर आ गया हूँ, मानो मेरी कहानी के चलते फिरते चरित्र मुझसे अगरचे मिल जाए तो मै एक कागज़ लेकर अपनी कांपती कलम से उन्हें तराशने बैठ जाउंगा या एक कोरे कैनवास पर सूखे रंगों की कूची लेकर मै बैठ जाउंगा इसी खुले अम्बर के नीचे. दुर्भाग्य यह है कि यह हफ्ता प्रेम के आनंद का हफ्ता है, और जब सारी दुनिया प्रेम के उत्साह में मग्न है तो यह खबर, ओह यह सदियों की उदासी है और सदियों का संताप, एक पक्षी भी तो ऐसे ही उड़ा था जिसका नाम विहंग था और एक चुलबुल चिड़िया जो बहुत महीन गाती थी और मैंने मुश्किल से खोजकर उसका नाम लिनेट रखा था.

देवास के बड़े डाकखाने में बदहाल व्यवस्था जिम्मेदार कौन?



आज जीपीओ देवास में गया था, वहाँ अपनी किताब कुछ मित्रों को रजिस्टर्ड डाक से भेजनी थी, भीड़ बहुत थी सो अपनी आदत के मुताबिक़ व्यवस्था समझाने के लिए और "बेचारी निकम्मी, अनपढ़, गंवार, अपने अधिकारों से वंचित, बेबस और मूर्ख" जनता का दुःख दर्द दूर करने के लिए पोस्ट मास्टर को खोजा तो पता चला कि है नहीं कई माहों से और सहायक पोस्ट मास्टर जैन साहब के भरोसे पोस्ट ऑफिस चल रहा है और ये जैन साहब बेचारे बीमार है और पीछे बैठे है - डाक छंटनी कार्यालय में असहाय से. मैंने जाकर उनसे कहा कि भीड़ बहुतहै जैन साहब, एक काउंटर और चालू कर दें तो रोना रोने लगे कि स्टाफ नहीं है, दूसरे स्थानांतरित पोस्ट ऑफिस में प्रिंटर खराब है, सारे कंप्यूटर भी खराब है, नेट की समस्या है, सर्वर डाउन रहता है, मेरी बिल्डिंग में CPWD ने जो शौचालय बनवाये थे वो गल रहे है और पानी पुरी बिल्डिंग में चू रहा है, फिर जब मैंने कहा कि आप क्या कर रहे है तो बोले मै बीमार हूँ इसके बावजूद भी आ रहा हूँ और काम कर रहा हूँ. सात में से पांच लोग छुट्टी पर है, और काम किससे करवाए, थक गया हूँ, आप शिकायत कर दें तो आभारी रहूंगा. मोफसिल से कह दें फोन कर दें, कुछ तो करवा दें. जिला कलेक्टर को कहें ताकि हमें भी तो कुछ राहत मिलें और हम जनता को मदद कर पायें.

ये हालत है जिला मुख्यालय के सबसे बड़े पोस्ट ऑफिस यानी जीपीओ की, जो रोज केंद्र सरकार को रेवेन्यु कमाकर दे रहा है और सच में कर्मचारी है ही नहीं, पोस्ट मास्टर का कमरा खाली कुर्सियां धुल खा रही है, सारे काउंटर बंद और मात्र दो या तीन चालू है और जनता स्पीड पोस्ट से लेकर बचत खाता और तमाम तरह के काम करवाने आ जा रही है. पुराने पोस्ट ऑफिस सारे बंद हो गएक्योकि कीमती बिल्डिंग में CPWD काम नहीं करवा रहा, कोई अधिकारी रूचि नहीं लेता क्योकि मिलता नहीं ना कुछ. शहर के मध्य में स्थित एक बड़े पोस्ट ऑफिस में ये हालत है, पता नहीं हमारे मीडिया के साथी क्या करते रहते है, उनका दर्द भी कभी जाकर बांटे और छापे या कम से कम जिला प्रशासन से बातें करें. और छत चूने की कहानी तो बनती ही है, जो इन सहायक पोस्ट मास्टर को धमकी देकर गया कि मै बड़े बड़े अधिकारियों को जेब में रखता हूँ , तुम चुपचाप बैठे रहो और जो करना हो कर लो. और ये ठेकेदार देवास का ही होगा, जो बैंक नोट प्रेस में स्थित CPWD में पन्जीकृत होगा. राज्य शासन के विभागों के अधिकारियों को तो आप लोग रोज मीडिया में ससम्मान जगह देते ही है !!!! कभी इन पर भी नजर करें.............

क्या होगा इस देश का जो केंद्र सरकार के विभाग है और जिन्हें पब्लिक से रोज़ रोज़ डील करना पड़ता है उनकी ये हालत है, तो कोई राज्य सरकार के निकम्मे विभागों जैसे शिक्षा विभाग, देवास, का क्या उखाड़ लेगा, जिसके अधिकारी सबसे दांत पड़ने के बाद भी मृत कर्मचारी के परिवार को आज तक देयकों का भुगतान नहीं कर पा रहे. तरस आता है इस देश के लोगों पर - जो भीड़ में हिस्सा बनकर तो रहते है चुपचाप, परन्तु बोलते कुछ नहीं और सहते रहते है.

धिक्कार है ऐसे लोगों और देश पर शर्म भी नहीं आती सब कुछ सहते हुए और मूर्ख बनते हुए,  बहरहाल, मेरा काम पोस्ट ऑफिस के एक सज्जन ने ले लिया, सारी किताबें ली और कहा कि आप अभी जाईये, मै सब कार्यवाही करके शाम को आपको बचे रुपये और रसीदें दे दूंगा.

देवास के मीडिया साथी कुछ करेंगे कभी झाकेंगे या अपनी व्यवस्था में ही ताकते रहेंगे .