Tuesday, February 10, 2015

पैन्ट, जिप और पल्लवी



रेड लाईट एरिया था, मेरे पास कीमती सामान और बहुत सारे रूपये थे, परन्तु फिर भी मै घूस गया, कई रंग- बिरंगे पर पुते हुए चेहरे थे जो आवाज दे - देकर पुकार रहे थे, पल्लवी, संगीता और अल्पना, कर्नाटक, केरल, वर्धा, धूले, इंदौर, छिंदवाड़ा और ना जाने कहाँ - कहाँ से आई थी, एक पतली गली के कोने में पहुंचा तो मुझे घेर लिया उन सबने, मेरी मर्दानगी को ललकारा और मुझे उत्तेजित करने के लिए चूमा भी और मेरे शरीर पर हाथ भी फिराए.  फिर किसी ने कहा कि हटो मुओ, टुच्चों इतने छोटे बच्चे को लूट लोगे क्या, यह पूना के बुधवार पैठ में आया है तो इसे अच्छा और आजीवन याद रहने वाला अनुभव देना चाहिए और मुझे उस भीड़ से खींचकर वो अपने 4 X 6 के कमरे में ले गयी - जो एक बड़ी से हवेलीनुमा घर में एक ओर बना हुआ था. ....यह कहते हुए वह हांफने लगा फिर धीरे से पानी  पीते हुए बोला कि पल्लवी बहुत प्यारी थी, मै कुछ करने नहीं गया था, बस जानने की इच्छा थी उस दुनिया को जो मै बचपन से सुनता आया था. 

फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा और गुदगुदी सी की और मै सन्न था उसकी इस घटिया हरकत पर, वह समझ गयी, फिर वह उठी और एक कप चाय बना लाई. कल शाम हल्की सी ठण्ड थी, चाय में अदरख तेज था और बहुत मीठी वाली शक्कर पडी थी खूब सारी, मानो उसने अपनी मिठास भी उस चाय में मेरे भोलेपन पर उंडेल दी हो, मै एक सांस में पी गया. उसने कहा कि कुछ करोगे, मै सुनता रहना चाहता था, अचानक उसने अपनी रोती हुई बच्ची को उठाया और दूध पिलाने लगी. मै हैरानी से किसी जवान स्त्री को बच्ची को दूध पिलाते पहली बार देखा रहा था, उस खिड़की से तेज आती शफक की रोशनी में डूबी किरणें, उसके चेहरे पर जो सुखद भाव दिखा रहे थे वे मेरे लिए किसी मरियम से कम नहीं थे, जो एक बच्ची को दूध पिलाते हुए उभर रहे थे, उसके दोनों बड़े - बड़े और लगभग लटक चुके उरोज चमक रहे थे और मुझे वासना नहीं, वात्सल्य की अनुभूति हो रही थी, मै उठा तो उसने बच्ची को हटा दिया और नीचे ठंडी जमीन पर पटक दिया और मुझे मेरी ठोडी से पकड़कर बिठा दिया, अपने चेहरे को बेहद पास ले आई थी और अपने मुंह से साँसों का एक लंबा निश्वास छोड़ते हुए बोली तुम कहाँ उन किन्नरों के पास चले गए, असली औरत मै हूँ देखोगे, अपने कपडे खोलने लगी....

पर इस बीच मै सम्हल चुका था, मैंने कहा, सुनो पल्लवी -  मै तो एक शौकिया फोटोग्राफर हूँ और बच्चों के  लिए काम करना चाहता हूँ , आज इधर से गुजरा, तो सोचा कि देखता चलूँ कि बच्चे किन परिस्थितियों में रहते है, वे क्या करते है जब तुम जैसी औरतें धंधा करती है...........मै तो "गाडीवालों का कटरा" पढ़कर आया था और एक संस्था के बारे में सुना था - जो इन बच्चों के साथ काम करती है. मै अपनी कमाई का एक हिस्सा देना चाहता हूँ, हाँ, मुझे भी वह सब करने की इच्छा तुमने जगा दी है पल्लवी पर तुम.........अचानक वह उठ बैठी और बोली निकलो.......मै कुछ नहीं बोला, जमीन पर पडी उस बच्ची को देखा और बिस्तर पर एक पांच सौ का नोट रखकर निकल आया. वह अपनी साडी सम्हाल रही थी और मै अपने दोनों हाथो से पेंट को संवारते हुए सड़क पर आ गया, पसीना निकलना बंद हो गया था और अब चिंता थी कि इस अनजान शहर में कोई देख ना लें, वरना इज्जत का क्या होगा.....

( "पैन्ट, जिप और पल्लवी" - लिखी जा रही कहानी का एक अंश) 

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