Sunday, August 23, 2009

डॉक्टर संजय भालेराव और चेन्नई का सफर





चेन्नई यानि की मद्रास से मेरा बहुत पुराना रिश्ता है मुझे याद पड़ता है १९८२ में पहली बार अपना राष्ट्रपति पुरस्कार लेने गया था बड़ा सा मैदान था किसी क्रिश्चियन संस्था में कार्यक्रम था । जाने के पहले हम लोगो ने सोचा यहाँ तक आए है तो तिरुपति बालाजी भी हो चले। सो वहा भी चले गए थे तब तमिलनाडु में ऍम जी रामचंद्रन का शासन था और अमूमन पुरे तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध अपने शबाब पर था । हम लोग तिरुपति में सबको देखकर कबीट कबीट चिढा रहे थे क्योकि दक्षिण में तिरुपति में बाल देने का रिवाज है और हमारे लिए यह आश्चर्य जनक था क्योकि महिलाओं को बाल देते कभी देखा नही था। खूब मार खाई थी फ़िर हमारे स्काउट मास्टर ओंम प्रकाश जोशी ने पुलिस थाने में जाकर बताया की ये बच्चे राष्ट्रपति पुरस्कार लेने आए है तब कही जाकर तमिलनाडु पुलिस ने हमें एक विशेष वन में बिठाकर नीचे ले जाकर छोड़ा। आठ दिन में उस लंबे मैदान में समय कब निकल गया पता ही नही चला हां आज पहली बार कह रहा हूँ कि मेघालय कि एक लड़की मेरी जोसफ से पहली बार मिला था और शायद जिसे पहली नज़र का प्यार कहते है हुआ था । जाते समय बहुत रूअंसासा हो गया था और मेरी की हालत मेरे से ज्यादा ख़राब थी पर क्या कर सकते थे आने के बाद कुछ दिनों तक चिट्ठी पत्री चलती रही पर ये समझ आ गया था कि कुछ होना सम्भव नही है क्योकि तब ब्राह्मणी संस्कार थे और वो एक तो दूर थी, दूसरा ईसाई थी । बस भूलना पड़ता है आज यह लिखने बैठा हूँ तो सब याद आ गया है , कहाँ हो मेरी ????

दूसरी बार मद्रास में ८७ में गया था तब हम केरला जा रहे थे और वहाँ से जब ८ दिन बिताकर लौटे तो ऍम जी रामचंद्रन कि मृत्यु हो गई थी हजारो लोगो ने सर मुंडवा लिए थे सारे स्टेशन पर खाने की दुकाने बंद थी और हमें ब्रेड भी नही मिली थी आज की जयललिता उस समय की प्रमुख अभिनेत्री थी और उसने ऍम जी आर का पुरा काम अपने प्रभार में ले लिया था । यह राजनीति नही जानती थी ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव गाँधी बिल्कुल भोले भाले थे। जैसे तैसे खम्मम आया और हमने भूखे शेरो की तरह से इडली वडा खाया था और नागपुर आने पर पुरी सब्जी पर टूट पड़े थे । क्या दिन थे वो भी.............

तीसरी बार माँ के साथ गया था जब इंदौर देवास में डॉक्टर ने उसे दिल का मरीज बताया था और में पागलो की तरह से देवास इंदौर अकर्ता रहा था जेब में उतने रुपये भी नही थे पापा की मृत्यु और मकान के कर्ज ने माँ को और हम तीनो भाइयो को तोड़ दिया था सिर्फ़ बड़ा भाई नौकरी कर रहा था और में सिर्फ़ १२०० रुपये कमा रहा था छोटा तो पढ़ ही रहा था । सरकार से ऑपरेशन के लिए रुपये मिलते तो थे पर राज्य शासन से बाहर जाकर इलाज करवाने की अनुमति लेना पड़ती थी क्योकि तब मध्य प्रदेश के किसी भी अस्पताल में बायपास का ऑपरेशन नही होता था न ही अस्पताल इतने एडवांस हुआ करते थे कोई भी डॉक्टर इलाज की ग्यारंटी नही
लेता था। बाईपास की सुविधा देश के चुनिन्दा अस्पतालों में ही उपलब्ध थी अपोलो उसमे से एक प्रमुख था जहाँ कम से कम ऑपरेशन फ़ैल होते थे । अस्पताल के पास डॉक्टरो गिरीनाथ , सुब्रामनियम, और सत्यमुर्थि जैसे काबिल डॉक्टर थे जो चौबीसों घंटे ही अस्पताल में रहकर अपनी सेवाए देते थे और किसी मरीज को किसी भी डॉक्टरो का घर मालूम नही था न ही वो इस बात को प्रोत्साहित करते थे कि कोई मरीज उनके घर तक आए मुझे याद है कि मैंने उन तीनो डाक्टारो को अस्पताल में ही देखा था रात के २ बजे हो या सुबह के ५ !!!
मेरे साथ सारे रिश्तेदारों का एक हुजूम गया था नाना काका, लीलू आत्या , बड़े मामी, मंदा मोउशी, नंदू क्योकि नंदू का ब्लड ग्रुप "ओ" नेगेटिव था , माँ का भी "ओ" नेगेटिव था, नए शहर में एकदम से डोनर कहा से लाते , इसलिए नंदू को ले लिया था । रात को जब इंदौर कोचीन ट्रेन से उतरे तो प्लेटफोर्म पर डॉक्टर कमल लोधया मिल गए जो मेरे एकलव्य की वजह से दोस्त बने थे और वो मद्रास विश्व विद्यालय के भारतीय गणित संस्थान में प्राध्यापक थे । स्वभाव से सहज कमल ने हम सबको घर चलने को कहा था, रात के दो बजे एक आदमी एक अनजान आदमी के कुनबे को घर चलने को कह रहा हो यह तो अब अविश्वसनीय लगता है पर यह समय का सच था। पर हम गए नही॥ हम भी शरीफ ही थे लगभग........
लाला रूपचंद अपने मकान देता था यह बात मुझे डॉक्टर नवलाखे ने बताई थी जो कुछ दिन पहले ही बाईपास करवाकर आये थे। हजारो प्रकाशो वालो इलाके में है ये अपोलो अस्पताल ग्रांट ट्रंक रोड पर मद्रास में । साफ सुथरा बिल्कुल होटल जैसा पाँच सितारा होटल जैसा उस ज़माने में इतना भव्य था तो आज कैसा होगा जबकि बाजार इतना घुस गया है सब जगह पर भगवन का शुक्र है कि अब वह जाने का काम नही पड़ता और न ही पड़े तो बेहतर है , वैसे भी अब इंदौर भोपाल में ऑपरेशन हो जाते है एकदम से ठीक ठाक ।

Wednesday, August 12, 2009

एक संभावनाशील प्रशासनिक अधिकारी की असमय मौत यानि कि एक सपने का खत्म हो जाना

आज ही दिल्ली से लौटा हू दिल्ली के तीन दिन बेहद थकाऊ थे, ना मात्र काम के हिसाब से, बल्कि सूअर बुखार और चिपचिपी गर्मी के कारण , ये तीन दिन मेरे लिए बहुत ही उबाऊ थे । एक साक्षात्कार के सन्दर्भ में राजीव गाँधी फाउंडेशन दिल्ली में गया था । पद चूकि बहुत आकर्षक था इसलिए चला गया था । वह पहाड़गंज के एक होटल में रुका था हालांकि एसी लगा था फ़िर भी गर्मी इतनी खतरनाक थी कि बताया नही जा सकता मेरे चेहरे पर निशान पड़ गए। साक्षात्कार में दो दिन की प्रक्रिया थी चयन होने की पुरी उम्मीद है पर मामला रुपयों पर आकर रुकेगा वैसे भी दिल्ली के हालात देखकर मुझमे हिम्मत नही है की मै वहा जाऊ और काम करू । पता नही क्या होगा , हां यदि आठ लाख का पैकेज मिला तो हिम्मत जुटाई जा सकती है क्योकि मेरा मानना है कि पैसा छठी इन्द्री है जो पाँच इन्द्रियों को नियंत्रित करता है , खैर जो होगा देखेंगे.....

इस बीच मोहित का फ़ोन आना दिल्ली में सबसे सुखद था ,"बिल्कुल रेगिस्तान में पानी मिलने के जैसा" । उस दिन १० तारीख को जब मै लौटने ही वाला था कि उसका फ़ोन आ गया। मैंने कुछ पूछा नही सिर्फ़ पूछा कि कैसे हो बेटू । फ़िर वो बोला क्या हो रहा है कैसा चल रहा है और क्या नया मैंने बताया कि दिल्ली मै हूँ और बस रात मै बात करता हूँ। उसने बताया कि वह १४ तारीख को नही मिल पायेगा क्योकि चाचाजी के साथ वो मुंबई जा रहा है पता नही कब आना होगा और कब मिलना । ऐसा लगा कि आवाज कही दूर से आ रही हो गहरे कुए से और कही से भटकती हुई ......... पता नही क्यो में बैचैन हो उठा था , पर कुछ नही पूछा , बस हूँ हाँ करता रहा, हाँ मैंने कहा कि मुझे खून चाहिए और जाने के पहले दे जा ...... उसने हाँ कहा और बस ये कहा कि अपना ध्यान रखना मैंने कहा कि दिल्ली में अगर चयन हो गया तो मेरे साथ कौन रहेगा तो बोला घर वाले ये सब कहा समझते है में अपने चाचा के पास जा रहा हूँ ताकि उनके साथ ठेकेदारी में हाथ बटा सकू काम तो करना ही है ना सेम ???

वो एक बेहद संभावनाशील व्यक्ति है और उसमे जिस तरह की संभावनाए है , उससे इनकार नही किया जा सकता । मैंने बचपन से उसमे एक प्रशासनिक अधिकारी की छबि देखी थी और उस संभावना को लेकर में अभी तक जिन्दा था । में यह मानता हूँ कि दुसरो से वो उम्मीदे रखना बेकार है जो हम ख़ुद अपने आप से पुरी नही कर पाए ,पर , क्या करता मैंने उसे बचपन से वो ख्वाब दिखाया और उसे ख़ुद भी देखता रहा । आई आई टी के पुरे साढे चार साल तक हम दोनों यही ख्वाब देखते रहे और उसने खूब तैय्यारी भी इसमे कोई शक नही है पर क्या हो गया नही पता पर उस दिन सचिन ने बताया कि परिणाम आ गए है तो मैंने पुनीत से रोल नम्बर पूछा और देखा तो पाया कि चयन नही हुआ है बस एकदम से निरुत्साहित हो गया और सारा उत्साह ही मानो खत्म हो गया फ़िर रात में मोहित का फ़ोन आया तो मैंने कह दिया कि नही हुआ है बस ४-५ दिन बातचीत बंद रही सारे दोस्त मुझसे पूछ रहे थे अमितोष , सचिन, अनूप और भी सब............. उसने किसी का फ़ोन नही उठाया बस शांत रहा और आखिरी में समर्पण कर दिया कि अब जो चाहो जो कर लो में तैयार हूँ और घर वाले उसे अब मुंबई ले जा रहे है...............

रुक जाओ मोहित और इम्रे साथ दिल्ली चलो हम फ़िर से सब शुरू करेंगे बेटू और फ़िर अगले साल तुम वहा दमकोगे पर थोडी सी ज्यादा मेहनत और एक खवाब एक सार्थक जिंदगी तुम्हारा रास्ता देख रहा है ...................... रुक जाओ मोहित और ना मेरे लिए ना किसी के लिए अपने आप के लिए अपनी प्रतिभा के लिए थोडी सी मेहनत कर लो और थोड़े समय बाद सब ठीक हो जाएगा और मेरे साथ दिल्ली चलो मुझे भी जरुरत है........ अपूर्व को नौकरी करना ही पड़ेगी में अकेला नही रह सकता उस बेरुखे शहर में............ तुम्हारे सारे दोस्त भी यही सोचते है हम सब तुम्हे वहा ........... शिखर पर देखना चाहते है मोहित................ रुक जाओ मोहित............

Friday, August 7, 2009

प्रमोद उपाध्याय का गुजर जाना यानि कि हिन्दी के नवगीत में एक और शून्य का उपजना






आजकल बहादुर के फ़ोन आते ही डर लगने लगता है कि पता नही किसके मौत का पैगाम दे रहा हो । ऐसा ही कुछ आज हुआ दोपहर में बैठा कुछ काम कर रहा था कि उसका फ़ोन आया दिल धक्क से रह गया कि हो न हो मेरे अपने शहर में कुछ गंभीर हो गया है । जैसे ही फ़ोन उठाया वह बोला भाईसाहब एक बुरी ख़बर है मैंने कहा कि साला अब क्या हो गया , तो बोला कि प्रमोद का कल रात बारह बजे इंदौर में देहांत हो गया में चौक गया कि ये सब क्या हो गया, कहा तो वो भोपाल आने वाला था मुझसे हमेशा कहता था कि संदीप तेरे पास आकर रहूँगा और में हंसकर टाल देता था। देवास हमारा अपना कस्बा था जहा मै पढ़ा लिखा और सारे संस्कार लिए। लिखना पढ़ना मेरे अन्दर डालने वालो मे राहुल बारपुते, कुमार गन्धर्व, विष्णु चिंचालकर "गुरूजी", बाबा डिके, कालांतर मे जीवन सिंह ठाकुर डॉक्टर प्रकाश कान्त , प्रभु जोशी और मेरे अज़ीज़ दोस्त बहादुर पटेल और मनीष वैद्य का नाम लिए बगैर सब व्यर्थ हो जाएगा। बाद मे पता चला कि नईम और भी दीगर लेखक थे जो राष्ट्रीय स्तर पर नाम और काम के कारण जाने जाते थे। प्रमोद उपाध्याय उसी गाँव के थे, जहा मेरी माँ ने सन सत्तर के दशक मे बालिका शिक्षा के लिए अलख जगाया था भौरांसा । प्रमोद एक अच्छे नवगीतकार थे यह बाद मे पता चला, पर जब मे एकलव्य मे काम करता था तो अक्सर उनके घर पर मुलाक़ात हो जाती थी जब वो नाहर दरवाजे पर कोठारी के मकान मे रहते थे । पत्नी रेखा भी एक शिक्षिका ही थी और भौरांसा मे पढाती थी दो बच्चे थे विप्लव और पप्पी दूसरे का नाम मुझे याद नही आ रहा , प्रमोद से खूब गप्पे होती थी रवि का ख़ास दोस्त था तम्बाखू की दोस्ती कब करीबी दोस्ती मे बदल गई हमें पता ही नही चला ।

धीरे धीरे प्रमोद को शराब की आदत लग गई और वह बेतहाशा पीने लगा। उसकी तबियत ख़राब रहने लगी स्कूल का जाना आना कम होता गया । हा उसके नवगीत खूब छपने लगे थे । देवास में तब लिखने पढ़ने का बहुत माहौल हुआ करता था । देश में एक जबरदस्त परिवर्तन की आंधी चल रही थी हम लोग खूब पढ़ते थे , सच कहू तो लिखने पढने का संस्कार डालने वालो में जूनून था कि एक नै पौध तैयार करना है और परिवर्त लाना है देश का समाज का विकास करना है सारी सडी गली मान्यताओ को बदलना है , एक अजीब किस्म का खुमार था हम युवाओ पर और ऐसा भी नही कि यह कोई इतिहास में पहली बार हो रहा हो । मुझे लगता है कि में बहुत भाग्यशाली हु कि मुझे राहुल बारपुते, कुमार गन्धर्व, बाबा डीके और विष्णु चिंचालकर" गुरूजी" जैसे लोगो का साथ मिला , मै कह सकता हू कि मैंने इन्हे देखा ,छुआ और इनसे सिखा है । कालांतर मै देवास मे नईमजी के साथ नवगीत क्या होता है यह जाना तब समझ आया कि मुक्तक भी परिवर्तन की एक विधा है और यदि यह छंद पुरी शिद्दत से लिखा जाए तो ना मात्र सिर्फ़ हममे परिवर्तन आता है बल्कि हमें यह दुनियादारी भी समझ आती है । डॉक्टर प्रकाश कान्त का गहरा अध्ययन , जीवन सिंह ठाकुर की पैनी राजनितिक दृष्टि , प्रभु जोशी का एक फंतासी दुनिया मे ले जाना और बार बार हम चमत्कृत से होते उन्हें सुनते रहते थे ......... मेरे प्रिय कवि चंद्रकांत देवताले का नाम लिए बगैर यह सब कैसे पुरा होगा? कुमार अम्बुज , विवेक गुप्ता हमारे मित्रो में से थे जो उन दिनों लगातार लिख रहे थे । दुनिया में परिवर्तन का दौर चल रहा था पुरी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता वर्ष मन रहा था और यह माना जा रहा था कि बस अब विकास सबके हिस्से में ही होगा और हम जैसे बदलाव कि महत्व्कान्षा रखने वालो को लगता था कि सारा पढ़ा हुआ अब हकीकतो में तब्दील हो जाएगा ।

रादुगा प्रकाशन मास्को कि सस्ती किताबे पढ़कर हम बड़े हुए थे , महाश्वेता देवी, शंकर, सत्यजीत राय निर्मल वर्मा जैसे लोगो को पढ़कर हम ना मात्र परिपक्व हुए बल्कि एक मोटी मोटी समझ विकसित हुई . निर्मल वर्मा का संसार हमें एक फंतासी में ले जाता था और पश्चिम की समझ भी विकसित हुई । निर्मल ने हमें पुरी सभ्यता को एक नए ढंग से देखने का नजरिया दिया . हंस , वागर्थ , पश्यन्ति, आजकल , जनमत , गंगा , साक्षात्कार, बहुवचन, और ढेरो पत्रिकाओ ने हमें छपने के मौके दिए। देश में वामपंथी सक्रिय थे ऐसा हमें लगता था और लगता था कि सर्वहारा के दिन अब आने वाले ही है और बस फ़िर क्या था खूब पढ़ना लिखना और खूब बहस करना ............ इस सबमे प्रमोद शामिल होता था अपनी आदतों और दारू के बावजूद भी वो हमेशा होश में रहता था और हम्सबसे खूब बहस करता था। वो बहुत ही अच्छे नवगीत लिखता था ये बहुत बाद में समझ आया । प्रमोद को दिखावे से बहुत चीढ़ थी और इन समाजवादियों को कोसता रहता था । नईमजी को भी गाली देता था ,मुझे यादहै कुमार गन्धर्व समारोह में वो पीछे बैठता था और फ़िर धीरे धीरे हमें कहता था कि नईमजी के गीतों में वो दम नही है , बुंदेलखंड का नाम लेकर ये भावनाओ को कैश कराते है , और अपने संबंधो को भी कैश कराते है, सारे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियो से सम्बन्ध बनाकर रखे है इन्होने .......... प्रमोद नईमजी के गीतों में मीटर और शब्दों की भी गलतिया निकालता था ,और हम उसके भाषा ज्ञान पर चमत्कृत थे और बाद में समझ आया कि उसका भाषा ज्ञान कितन वृहद् था ।

प्रमोद ने हमारे भी कई जाले साफ किए थे इसीलिए वो सारी आदतों के बावजूद भी प्रिया व्यक्ति था । बहदुर से उसकी दोस्ती बहुत घनिष्ठ थी । उसके दो बेटे थे , विप्लव और पप्पी -बाद में जब मुखर्जी नगर में प्रमोद ने घर बना लिया तो एक बार गुस्से में एक बेटे ने एक आदमी का खून कर दिया था , उस कारन वो बड़ा परेशां रहा कई दिनों तक, शरीर साथ नही देता था , शिक्षा विभाग का भला हो कि उसे उज्जैन रोड के ही एक स्कूल में ही स्थानांतरित कर दिया था और वह दीक्षा प्रदीप दुबे जैसी भली शिक्षिका थी जिसने सब सम्हाल लिया था , प्रमोद स्कूल कभी जाता ही नही था बस घर पर ही रहता था । हा पीना जारी था बदस्तूर .......... एक ऑटो आखिरी दिनों में ,ऑटो वाला उसे शराब के अड्डे पर ले जाता था और प्रमोद पीकर लौट आता था घर पर एख भाभी ने भी समझौता कर लिया था हालाँकि रखा के साथ लड़ते लड़ते उसकी उम्र निकल गई थी, रेखा भी भौरांसा में पद्धति थी , पर क्या करती आखिर पति परमेश्वर होता है...

प्रमोद कि एक आदत से सब परेशान थे उधार लेने की आदत से ........ वो अक्सर रात में आ जाता था और ले जाता था........ पर एक बात है उसने कभी उधारी बाकि नही रखी किसी की अब का नही पता क्योकि पिछले ५ बरसो से में भोपाल में हू तो जानकारी नही है पर मेरी जानकारी में उसने किसी की उधारी नही रखी..........अपनी बीमारी ने उसे मार डाला था , जीते जी आँखे लगभग अंधी हो गई थी फ़िर भी वो किसी को छोड़ता नही था , कहता था साले सम्पादक भी मादरचोद है सबके सब...... कुछ समझ नही है ,न भाषा की ,न कविता की और यहाँ चोर बैठे है सब ........... । प्रमोद जोर से हँसता था और कहता था की बस यार दिखता नही है बहादुर पटेल अपना पटवारी है और मेरा यार है वही कविताये रखेगा, दिनेश पटेल ने कुछ टाइप कर के रखी थी अब पता नही वो कहा होंगी । अक्सर अस्पताल और घर के बिच वो झूल रहा था बहादुर ही उसे इंदौर ले जाता और ले आता था पर हा अब वो लगभग शांत हो चला था । पिछले बरस मेरी माँ की जब मृत्यु हुई तो वो घर आया था और मुझे सम्जहते हुए बोला "यार संदीप , सबको मरना है प्यारे दुःख कहे को करता है में मरूँगा तो आयेगा कि नही... और धीरे धीरे बोलता रह था अपने बारे में और परिवार के बारे में । उसका बागली का प्रेम खत्म नही हुआ था बागली उसका अपना घर था और लगभग नौस्तल्जिया की तरह बागली उसके अन्दर जिन्दा था पूरी शिद्दत के साथ...........
हंस में रविन्द्र कालिया ने एक कालम शुरू किया था "ग़ालिब छूटी शराब......" उसमे भी प्रमोद ने अपना खूब चिटठा लिखा था ......... देवास में तब लिखने वालो के दो ही समूह थे जो हंस में छपे है और जो हंस में नही छपे है ..........!!!! हम सब लोग धीरे धीरे हंस में छाप ही गए पर ये रविन्द्र कालिया बनाम प्रमोद की बहस को खूब पढ़ते थे और चर्चा भी करते थे।

प्रमोद ने दरअसल में हिन्दी नवगीत को एक नै भाषा दी थी और एक नए तेवर के साथ वो लिखता था......

प्रमोद और नईमजी को बॉम्बे अस्पताल ने लील लिया । नईमजी के मृत्यु के बाद वो भी टूटा था अन्दर से और लोगो की तरह पर कह नही सकता था क्योकि जिंदगी भर तो उन्हें गालिया देता रहा । मुझे नही पता की नईमजी की मृत्यु के बाद मातम पुरसी को गया था की नही पर नईमजी के घर के लोग जरुर जायेंगे उसके घर ये मेरा विश्वास है ।

देवास में दो गीतकार रहे और इंदौर के एक ही अस्पताल ने दोनों को लील लिया यह कोई आतंक से कम है ,पर होनी को कोई टाल नही सकता यही सच है .......... बहादुर ने आखिरी तक साथ निभाया है तो निश्चित ही उसके पास स्मृतिया ज्यादा होंगी पर में सिर्फ़ यही कह सकता हु की प्रमोद तुम्हारे नए गीतों की अभी हमें जरुरत थी.पिछली बार वीर धवल पाटेकर ने अपने एवरेस्ट स्कूल में एक दिन का कार्यक्रम किया था तो हम सब साथ थे पुरा दिन कमोबेश और वो अन्ना ( प्रकाश कान्त )से मुह छिपाता रहा था । मुझसे बोला संदीप मुझे भोपाल आना है तेरे पास रुकूँगा और उस साले राजेंद्र बंधू से भी मिलूँगा जो उसका पुराना साथी था , मैंने कहा था में जब भी सात आठ दिन लगातार भोपाल में रहूँगा तभी बुलाऊंगा ताकि सबसे मिल सको और हम खूब गीत सुन सके और खूब बातें भी कर सके पर कहा हो पता है सोचा हुआ सब ........

प्रमोद का जन देवास के साहित्य में एक शुन्य का हो जन है सिर्फ़ तीन माह में दो बड़े गीतकारों का यू चुपचाप एक ही अस्पताल में गुजर जाना बेहद खलता है , दोस्तों पर क्या कोई और इलाज है हमारे पास , सिवाय नमन कहने के ........

नईमजी और प्रमोद आप दोनों बहुत याद आओगे .......... श्रद्धा सुमन ..............


Wednesday, August 5, 2009

एक मज़ेदार साक्षात्कार अविनाश के मोहल्ला के सौजन्य से



-आपके यहां टीवी पर एक एड चल रहा है जर्नलिस्ट बनने के लिए। कैसे आवेदन करना होगा?

-आप कहां से बोल रहे हैं?

-लखनऊ से।

-आपका नाम क्या है?

-मेरा नाम दीपक है।

-आप अपना नंबर जरा बताएंगे?

-मेरा नंबर है- .........

-आप लखनऊ से ही बोल रहे हो?

-हां, आजकल लखनऊ आया हुआ हूं।

-आप कहीं काम कर रहे हो इस समय?

-हां, मैंने काम किया हुआ है।

-कहां?

-कई जगह, एमएच1 न्यूज में काम कर चुका हूं, एस-1 चैनल में भी रहा हूं।

-अच्छा, तो आप ऐसा कीजिए कि अपना सीवी channelconnectnetwork@gmail.com This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर भेज दें।

-इसमें और क्या औपचारिकताएं होंगी?

-अभी हम लोग कोर्स कराकर ट्रेनीज रिपोर्टर के रूप में अप्वाइंट कर रहे हैं। कोर्स का कुछ फी है। आप ट्रेनीज रिपोर्टर को स्ट्रिंगर कह सकते हैं।

-लेकिन हम तो सीनियर पोस्ट पर काम किए हैं।

-हां, वो तो ठीक है। मैंने इसीलिए आपको अपना सीवी भेजने को कहा है। जैसे ही कुछ होता है, आपको काल चला जाएगा।


-आपके यहां शायद ब्यूरो चीफ या स्टेट हेड बनने के लिए जगह खाली चल रही है?

-नहीं-नहीं, उसके लिए हमारा दूसरा फंडा है।

-कौन-सा फंडा?

-हमारा जैन टीवी वाला फंडा है।

-वह क्या होता है?

-जैसे, हम लोग जिनको ब्यूरो हेड बना रहे हैं, उनसे पांच लाख रुपये ले रहे हैं। ये पांच लाख देकर ब्यूरो नेटवर्क हमारे यहां जो संभालता है, वह ब्यूरो चीफ कम नेटवर्किंग डाइरेक्टर होता है। आपके पास अनुभव है, इसलिए आप तो पांच लाख रुपये हमे देकर यह काम करोगे नहीं?

-नहीं-नहीं। ऐसी क्या बात है, मैं भी कर सकता हूं। कितने दिनों के लिए पांच लाख ले रहे हैं?

-दिनों के लिए नहीं।

-तो?

-उसके लिए ऐसा है कि आपका तीन साल का पीरियड रहेगा। और उस दौरान आपके अंडर में सौ विधानसभा क्षेत्र यूपी के रहेंगे। जो रिपोर्टर ट्रेनीज के रूप में आपके पास कोर्स करने आएंगे, वे विधानसभा स्तर पर 35,000 रुपये और जिला स्तर पर 50,000 रुपये जमा करेंगे। उसका दस-पंद्रह प्रतिशत कमीशन आपको मिल जाएगा।

-पैंतीस हजार में किसका रहेगा?

-पैंतीस हजार रुपये विधानसभा स्तर का रिपोर्टर बनाने का रेट है। मतलब की कोर्स कराने का है। डिस्ट्रिक्ट स्तर पर पचास हजार का है।

-...अच्छा!! और पचास हजार रुपये में?

-पचास हजार जिला स्तर के रिपोर्टरों का रेट है। अगर आप स्टेट ब्यूरो संभालने के लिए हमे पांच लाख रुपये दे रहे हैं तो कोर्स करने के लिए 35 हजार, 50 हजार वाले जितने ट्रेनी होंगे, उनसे दस परसेंट मिल ही जाएंगे। और उनका कोर्स भी तीन माह का ही होगा। तीन माह बाद उन्हें अगर कहीं नौकरी मिलती है तो वे चले जाएंगे। उनकी जगह खाली होने पर आप फिर अपना नया रिपोर्टर रख सकते हैं।

-उनको ट्रेनिंग कैसे देनी होगी? हमको ही देनी होगी या...?

-नहीं ट्रेनिंग आपको नहीं देनी होगी। पहले हम लोग उसको चार दिन ऑफिसियल कोर्स कराएंगे। दिल्ली के रिपोर्टर उनको रिपोर्टिंग की ट्रेनिंग देंगे। इसके बाद फील्ड में भेजेंगे प्रैक्टिल एक्सपीरिअंस करने। उस दौरान वह जो भी कवरेज करेगा, हम उसे प्रसारित भी करेंगे। हमारा 12-14 चैनलों से संबंध है। आधे घंटे का प्रोग्राम सब पर प्रसारित होगा। फील्ड में भेजते समय उनको प्रेस पहचानपत्र, लोगो आदि भी दिया जाएगा।

-क्या उनको सेलरी भी आप लोग देंगे?

-कोर्स के दौरान हम उनको कुछ भी नहीं देंगे। जो न्यूज वे भेजेंगे, वे चैनल पर चलेंगे उनके नाम के साथ। उसका उन्हें बेनफिट मिलेगा। अन्य चैनलों पर उन्हें काम का अवसर मिलेगा। यदि उन्हें ऐसा अवसर नहीं मिलता है तो वह हमारे साथ चैनल कनेक्ट से जुड़े रह सकते हैं। हर स्टोरी के हिसाब से जो भी हमारे यहां देय तय होगा, वह उन्हें मिलेगा। उन्हें हमको बिजनेस भी देना होगा। ये तो हर चैनल का फंडा होता है न। ...तो जो बिजनेस वह हमें देंगे, उसका दस से पंद्रह प्रतिशत तक उन्हें कमीशन मिल जाएगा।

-अगर स्टेट ब्यूरो हेड के लिए हम आपको पांच लाख रुपये दे रहे हैं तो हमारे काम की सेलरी मिलेगी या किसी अन्य तरीके से कोई भुगतान करेंगे?

-आपको बताया न कि पहले आपको वही कमीशन मिलेगा, जो विधानसभा, जिला स्तर के ट्रेनी आप अप्वाइंट करेंगे, उनसे जो पैसा मिलेगा, उसमें आपका दस प्रतिशत हिस्सा। फर्ज करिए कि सौ विधानसभा का पैंतीस हजार रुपये के हिसाब से आपका कमीशन हो जाएगा करीब साढ़े तीन लाख रुपये। यदि आपके ब्यूरो क्षेत्र में 15 जिले पड़ते हैं तो डेढ़-दो लाख उसमें भी मिल जाएंगे। ...तो इस तरह आपको अपना पैसा निकालना है। यदि वे ट्रेनीज बिजनेस भी देते हैं तो उसका दस-पंद्रह प्रतिशत कमीशन आपको भी मिलेगा।

-अच्छा... ठीक है। दिल्ली आकर आपसे मिलता हूं।

-ठीक है जी।



हां हां हां क्या मीडिया है जी वाह क्या बात है.???????

Sunday, August 2, 2009

दो सुहाने दिन बर्बाद हो गए...... ज़िन्दगी के

आज दोस्तों का दिन है और मैंने योजना बने थी पिछले रविवार को कि आज वन विहार जायेंगे क्योकि में जनता था कि आज दोस्ती का दिन है और वह खूबसूरती से मनाएंगे पर कहा हो पता है सब सोचा हुआ ? कल रात को भी साडी योजना बन गई थी कि आज सुबह उठकर बढ़िया नाश्ता करेंगे और फ़िर वन विहार जायेंगे और फ़िर पुरा दिन ऐश ही होंगी वावेस और विंड पर दारू बियर बस ऐश ही ऐश ..........
सुबह ऐसी अपशगुनी होगी मुझे पता नही था पुरा दिन बर्बाद हो गया बल्कि पुरे दो दिन बर्बाद हो गए में यहाँ रुका था कि चलो इसके साथ एक अच्छा दिन बीतेगा पर हम शायद ज्यादा उम्मीद करते है .........
एक कहावत यद् आ गई कि " करेले को घी में घोलो या शक्कर में वो कड़वा ही रहता है " पुरा दिन सोता रहा फ़िर पढ़ाई का नाटक करता रहा फ़िर टेस्ट का बहाना करता रहा जब मेरे दो फ़ोन आए तो कहने लगा कि मुझे परेशानी हो रही है पर थोडी देर बाद कोई महिला मित्र का फ़ोन आया तो उठकर देर तक बातें करने लगा फ़िर जब मैंने कहा कि बहार चलना है तो बोला कि मुझे पढ़ना है आख़िर में ही बाहर चला गया........
बाहर बढ़िया माहौल था मैंने एक बर्गर खाया और दारू का सामान ले कर आ गया.........
एक सिख मैंने ली है कि ज़िन्दगी अपने तै ही जीना चाहिए........ किसी के लिए जीने से कोई फायदा नही है खासकर अब आगे से किसी के साथ नही रहूँगा क्योकि अपने कारन और किसी कि गोपनीयता भी भंग हो जाती है आज़ादी छीन जाती है अपनी और सामने वाले कि भी और फ़िर भयानक किस्म का मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है ज़िन्दगी पर............
तुमने मेरा दोस्ती का एक महत्वपूर्ण दिन और ज़िन्दगी के दो अनमोल दिन बर्बाद कर दिए है ....... मेरा वन विहार देखने का ख्वाब शायद अब कब पुरा होगा मुझे नही पता पर मैंने कई किस्म कि सीखे ली है कि ज़िन्दगी अपनी ही होती है कोई किसी का साथ नही देता न खुशी में न गम में..........
एक बात जरुर समझ ई है कि सारा मामला रूपये पैसो का है..............
हां, हां, हां, हां, हां,!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

My Mother was the Best in the World


Last Sunday 26 July 09, Mom has completed one year of her death..............
Do I really feel about her as she is not with us/me?No way I always feel her beautiful and omnipresence every where in my heart in my life and in my all belongings..........

She was a Pride Mom for me as every one knows that the Lord Almighty could not be every where, hence, he made Mothers on the earth. My Mom was not only a mom but she was a live story of struggles and Success. She was the II number girl child of her parents, 7 brothers and sisters. She passed her Metric Exam and got into the job as the family conditions were not very sound and in the mean time she lost her father too. Mr Narayan dharmadhikari was a typical brahminical character and was working in lower court of Mandleshwar, situated on the banks of river narmada. Mom brought out the family and worked hard she used to walk 40 to 50 KM per day in different villages so as to serve for her job. there were no mass transport available and hence Walking was the only way to complete the works. After getting married with my Pride Father she was forced to continue her job again here the scene was same..... 4 sisters adn three brotheres all studying and no one was earning . Grand Pa used to do a small job and my Grand mother was also heading a preparatory school in Mhow. in spite of 4 persons earning the total income was very less and height of that our uncles and All used to cheat Mom and Dad and take money for all ill practices. I do not feel hesitate to share public ally one of my uncles had stolen Mom's watch, Golden ring as the econimic status was very poor of the family. Being young they wanted to live their lives i can say today but that time it was big shock to Mom and Dad.

All rituals, completing studies , marriages, and remaining rituals of their family these were the things which Mom and Dad had to finish. we were also born and they really did worth for us took us to school and taught us the ebst values and things of the world. Whole Life Mom lived separated from Papa as she was also in job and they could hardly meet in life. I remember in 1985 Papa was transferred to Dewas from Manawar and soon after four years of illness he died on 27 May 1989. We all brothers were studying and in this situation there was a huge loan of newly constructed house of Kalani Bagh, Mom kept working till we guys did not complete studies and finally Sanjay started earning some meager amount and I also started job. After so much works in these years and father's death she was with broken heart and just managing to live for all of us.

She had heart problems and I took her to Apollo Hospital Madras for By Pass Surgery. She came back with a strong will power and re gained energy. With three of us she gave a tough fight to all the values and systems of society, established the best rapport in relations and in surroundings. Both the brothers got marrried and had children. Our house was again becoming a heaven........ but she was loosing life and use d to discuss all with me. She was the only Lady with whom i was very comfortable adn could share all my ideas thoughts and all.......

She was a source of my motivation and always encouraged me to participate in public functions, become the best orator, debater, because of her I gained the President Awards and many more prizes which are really prestigious in the world. because of her I am known as a write and intellectual among the mob. Even when I took the decision not to marry she was the lady who respected my decision and gave me permission to live life up to my own expectations...............

I remember she gave me 10 paisa in 1972 when I spoke a speech in Jawahar Chowk, Dewas on 15 August. I wish I could save that coin with me, it would have been the best prize for me . I used to fight with her whever I used to change jobs and inform her that am not well she would say " so you ahve left this job also na.............??? " and with affection she would say come back home my pension is more then enough for both of us and we will live a happy life. I dont need money you take all and njoy live beta, but never compromise for ill practices and corruption. I would really loved to hear this and leave the job, I have changed 8 jobs as I know I can not do wrong things and can not permit also. After Mom's death this is my other job where in 'am getting the best salary, had she been alive , she would have appreciated and would have blessed me........ who knows she must be blessing me right now also???

In her last days she was tensed and had very severe problems as she was fighting with Diabetis for last 38 years and some how managed to live a Life........... just for us , so that we do not face any problems after papa's death she was the only parent of ours and she brought us to very high level of life. All we three brothers were well settled in life earning name and fame and now three kids Siddhrath, Aniruddha and Ojas( Amey0 were adding boon to this. It was a the happiest family. Offcourse there were middle class mentality problems were there but life was at its pace and in full swing. My younger brother got Chronic Renal Failure in March 2004 due to HT/DM and she lost her Himmat. Seeing her own grown up child on a Dialysis Machine twice a week and getting blood every month............ample amount was being spent... Lab tests, Hospitals, Medicines and pathetic condition of family made her weak day by day. She did not share all these with meand finally developed two Big Tumors in her brain.

I was serving in Bhopal and used to travel. I could hardly go and spend time with her. But she would call me every day and in turn I used to talk share all with her. In last days she was in bed, on 26 June 08 I had taken her to Dr Sunil Sharma and he adviced me to go for MRI. Vikas Gupta did it and said "Sir, its emergency, She needs to be operated immediately for her tumors else there is no life ........" I was shocked......

Next day with Mohit I searched Neurosurgeon in Indore and finalize Dr Shrikant Rege, who was a famous surgeon in the vicinity. Indore was observing communal riots and hence we could not take her immediately. On 8 July she left her own house ........ the house she made by her blood and dreams and she fulfilled all her duties......... the house she saw her husband's death, the house she was seeing her Son in a pathetic situation........ the house she was leaving permanently. I never knew that she would not come back...... or I would not have taken her to Butcher's Hospital.She became a victim of corrupt medical profession and gave her life for these money minded Doctors who are unfortunately SATAN, nothing more then this.

Hospital was an awesome experience, every day tests and money and commissions that's it.......She was to be operated on 11 July 08. On 10 July Dr Malpani came and asked me can we really go for operation.........? I said yes....

After 15 days she died........

26 July 09 was a black day for me.......... am still unable to understand why did I take that decision and gave her pains and Death.

Mom please forgive me and frankly telling you I have not accepted your death till now....... you are not gone any where....... youa re with me........ your One Asthi( BONE ) is still with me.......... whenever I feel any problem I would ask and touch that and I get blessings from you.

I know I am not a right person now to comment upon and confess but still I feel you are watching me and forgiving me for all that still am doing ....... and creating a nuisances for the family world and me.

But I know Moms are Mom and you are the best Mom of the world............ I miss you Mom

Please forgive me and take me with you........ I just can nt live without you........... the world is so cruel and values are deteriorated badly and what ever you have taught me, am not able to use it now.............its becoming difficult for me to survive now and I just want to come to you to that world where Love is still on the TOP.........

Mom please call me.................please...........

माँ का होना , न होना और ज़िन्दगी का ख़तम हो जाना

माँ का नही होना जैसे खलता ही नही है
अभी पिछले हफ्ते ही एक साल पुरा हो गे उसे गए हुए , में ही तो गया था हरिद्वार में उसकी अस्थिया लेकर गंगाजी में , पर क्या सचमुच माँ चली गई है मैंने तो एक अस्थि अपने पास रख ली थी ताकि वो सारे योग क्षेम अपने ऊपर लेती रहे जसी पिच्च्ले बरस तक लेती रही थी अस्पताल की उस कोठारी में भी जिसे वार्ड कहते है । माँ के बारे में लिखना बहुत ही कष्टप्रद है मेरे लिए बस एक ही अफ़सोस होता है की मेरे जैसे कमीने के सपनो में एक भी बार नही आई तुम माँ ............ क्यो?
में जानता हू कि तुम मरने के पहले मेरे बारे में क्या सोच रही थी क्या क्या हुआ था उन पन्द्रह दिनों में और उस सुयश अस्पताल ने सिर्फ़ अपयश ही दिया मुझे ज़िन्दगी भर के लिए में अभी भी रातो में चौककर बैठ जाता हू कि मैंने तुम्हारा खून कर दिया न में डाक्टर को इजाज़त देता ऑपरेशन कि न तुम्हे उस मेडिकल तंत्र का शिकार होना पड़ता । पुरी लम्बी रातो में कितना बोलती थी तुम माँ अपने बारे में पापा के बारे में रिश्तेदारों के बारे में , अपनी बहनों के बारे में किस किस को यद् नही किया तुमने और किस किस से नाते नही निभाए तुमने पर क्या काम आया आखिर सबका मोह छोड़कर तुम चली गई न ............ कहा गई हो क्या बही भी मुझे देखती हो इन सारे पाप पुण्य के झंझावातों में ? क्या अब भी वही सब सोचती हो कि मेरा क्या होगा ....... बहुत बेशर्म हो गया हू में एकदम घटिया इन्सान , एक दम नीच पृकृति का , सिर्फ़ जीने के लिए सब कुछ कर लेने वाला दो कौडी का आदमी।
पता है मुझे लग ही रहा था कि मेरे अपने पापो कि सजा तुम्हे ही भुगतना पड़ेगी और वही हुआ आखिरकार तुमने अपनी जान दे दी बगैर बताये ही चली गई .............
अब मेरे लिए जीने लायक कुछ बचा ही नही है बस जैसे तैसे अपने काम पुरे कर रहा हू और बस एक दिन यू ही चला जाऊंगा उस जहाँ में , जहां तुम फ़िर से मेरे सारे सुख दुःख अपने ऊपर ले लोगी........
बहुत याद आती हो माँ
में अकेला नही रह सकता तुम्हारे बिना कोई है ही नही जिसके साथ में कुछ बोल सकू और कह सकू.....
अपने पास बुला लो माँ................


दोस्ती का दिन .......... किन दोस्तों के नाम????

दुनिया भर में आज का दिन दोस्ती का दिन कहलाता है । कहते है की अमेरिका में किसी व्यक्ति को शनिवार के दिन फाँसी दे दी गई थी उसके दोस्त ने रविवार के दिन अपने दोस्त की याद में आत्महत्या करली तब से अमेरिकन सरकार ने अगस्त माह के पहले रविवार को दोस्ती के नाम घोषित कर दिया है और दुनिया भर में ये दिन दोस्तों के नाम कर दिया गया है।
मुझे लगता है की सिवाय मुर्ख बनने और बनाने के इस बाज़ार ने हमें कुछ दिया नही है, पिता दिन, माँ का दिन , शिक्षक दिवस प्रेम का दिन और दोस्तों का दिन......... बहरहाल दिन है तो संदेश भी आएंगे और जवाब भी देना होंगे वरना कंजूस की उपाधि से विभूषित कर दिए जायेंगे ।
अपने दोस्तों के बारे में सोचता हू तो इतना याद आता है की एक लिस्ट बने जायेगी तो शायद वेब पेज पर जगह कम पड़ जायेगी और फ़िर भी लिस्ट अधूरी रह जायेगी । स्कूल के दोस्त , कॉलेज के दोस्त , नौकरी धंधो के दोस्त, अपने सुख दुःख दर्द के दोस्त, और वो लोग जो इस राह में मिले और न जाने कहा बिछड़ गए आज याद आ रहे है। एक बार में इंदौर के एक मनोचिकित्सक के पास गया था की मुझे सब भूलना है ताकि एक नए सिरे से अपनी ज़िन्दगी की शुरुआत कर सकू वह थोडी देर तो मुझे समझाता रहा फ़िर बोला दोस्त दुनिया में स्मृतिया सबसे सुहानी होती है मेरे चालीस साल के सफर में तुम पहले आदमी हो जो भूलना चाहते हो यहाँ लोग याद रखने की दवा लेने आते है। क्या भूलू क्या याद रखू , जैसी स्तिथि हो गई है अब तो पर एक बात तो तय है की वो दोस्तिया जरुर चुभती है ठेस देती है पर सुकून नही देती।
उम्र के इस पड़ाव पर जो लोग आज साथ है वो मेरे लिए किसी वरदान से कम नही है। अकेले रहने का फ़ैसला मेरा था अपने गम खुशियों के साथ जैसे तैसे तिर्यालिस बरस निकल लिए और अब तो ढलने की बारी आ रही है पता नही कुछ कुंठा और कुछ गिला शिकवा रहा होगा तभी तो दो प्यारे से बच्चो को गोद ले लिया है अपूर्व और मोहित और बस दोस्ती यारी दुश्मनी इन्ही से निभानी है अब..................
हा कुछ दोस्त शगुन के नाम पर है पर इस भोपाल शहर ने उन्हें भी तोड़ने के कगार पर ला दिया है । एक बात जरुर में कहना चाहूँगा पुरी ईमानदारी से की जिनके साथ आज मेरे घनिष्ठ रिश्ते है वो कभी ना कभी मेरे जुल्मो का गुस्से का शिकार जरुर बने है और यही दर्द हमेशा मुझे सालता रहता है कि ज़िन्दगी अगर रफ कॉपी हो तो में पुनः फेयर काम करने को तैयार हू पर अबकी सफर में ये मेरे साथ होंगे ताकि में दोस्तों कि यादो को साथ पिरो सकू और जिसको जीना कहते है जी सकू।
कल बातो ही बातो में अपूर्व ने जाता दिया था कि उसकी आने वाली प्राथमिकता क्या होंगी और सही भी है उसे उसकी ज़िन्दगी जीने का पुरा हक़ है में क्यो किसी से उम्मीद रखू ......
बस इतना ही कहना है कि अब ये दोस्ती का दर्द सहा नही जाता और अब रिश्ते बनाने की हिम्मत नही है न ही इन रिश्तो को खोने की हिम्मत है अगर ये भी टूट गए तो में खत्म !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
दुनिया भर के लोगो को सच में अगर कोई दोस्ती का मतलब समझता है तो दोस्त दिवस मुबारक
आमीन........ अमर रहे दोस्तिया और प्यार ....... यही ज़िन्दगी है यही मौत है यही खुशी और यही गम है..........

प्यासी बंजर धरती -किसका पेट भरे , भूखे प्यासे बच्चे खेती कौन करे, इनको जीना कौन सिखाये????









हाल ही में हरदा के अंदर के गाँव में गया था वहाँ एक गाँव बदझिरी देखा वह के बच्चो की हालत बहुत ही ख़राब थी , शर्म तो आती है बहुत अपने आप से पर क्या करू ऐसे देश में जहा बच्चो को सरकारी आंगनवाडी के सड़े गले कीडो मकोडों वाले भोजन पर निर्भर रहना पड़ता हो वह किसका देश और कैसा देश किसके नौनिहाल और कैसा भविष्य ..... स्वदेश फ़िल्म का गीत गूंज रहा था कानो में " ये जो देश है मेरा स्वदेश है मेरा........."
हालत सुधरने के बजय बिगड़ते जा रहे है दिनों दिन ................