Sunday, August 23, 2009

डॉक्टर संजय भालेराव और चेन्नई का सफर





चेन्नई यानि की मद्रास से मेरा बहुत पुराना रिश्ता है मुझे याद पड़ता है १९८२ में पहली बार अपना राष्ट्रपति पुरस्कार लेने गया था बड़ा सा मैदान था किसी क्रिश्चियन संस्था में कार्यक्रम था । जाने के पहले हम लोगो ने सोचा यहाँ तक आए है तो तिरुपति बालाजी भी हो चले। सो वहा भी चले गए थे तब तमिलनाडु में ऍम जी रामचंद्रन का शासन था और अमूमन पुरे तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध अपने शबाब पर था । हम लोग तिरुपति में सबको देखकर कबीट कबीट चिढा रहे थे क्योकि दक्षिण में तिरुपति में बाल देने का रिवाज है और हमारे लिए यह आश्चर्य जनक था क्योकि महिलाओं को बाल देते कभी देखा नही था। खूब मार खाई थी फ़िर हमारे स्काउट मास्टर ओंम प्रकाश जोशी ने पुलिस थाने में जाकर बताया की ये बच्चे राष्ट्रपति पुरस्कार लेने आए है तब कही जाकर तमिलनाडु पुलिस ने हमें एक विशेष वन में बिठाकर नीचे ले जाकर छोड़ा। आठ दिन में उस लंबे मैदान में समय कब निकल गया पता ही नही चला हां आज पहली बार कह रहा हूँ कि मेघालय कि एक लड़की मेरी जोसफ से पहली बार मिला था और शायद जिसे पहली नज़र का प्यार कहते है हुआ था । जाते समय बहुत रूअंसासा हो गया था और मेरी की हालत मेरे से ज्यादा ख़राब थी पर क्या कर सकते थे आने के बाद कुछ दिनों तक चिट्ठी पत्री चलती रही पर ये समझ आ गया था कि कुछ होना सम्भव नही है क्योकि तब ब्राह्मणी संस्कार थे और वो एक तो दूर थी, दूसरा ईसाई थी । बस भूलना पड़ता है आज यह लिखने बैठा हूँ तो सब याद आ गया है , कहाँ हो मेरी ????

दूसरी बार मद्रास में ८७ में गया था तब हम केरला जा रहे थे और वहाँ से जब ८ दिन बिताकर लौटे तो ऍम जी रामचंद्रन कि मृत्यु हो गई थी हजारो लोगो ने सर मुंडवा लिए थे सारे स्टेशन पर खाने की दुकाने बंद थी और हमें ब्रेड भी नही मिली थी आज की जयललिता उस समय की प्रमुख अभिनेत्री थी और उसने ऍम जी आर का पुरा काम अपने प्रभार में ले लिया था । यह राजनीति नही जानती थी ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव गाँधी बिल्कुल भोले भाले थे। जैसे तैसे खम्मम आया और हमने भूखे शेरो की तरह से इडली वडा खाया था और नागपुर आने पर पुरी सब्जी पर टूट पड़े थे । क्या दिन थे वो भी.............

तीसरी बार माँ के साथ गया था जब इंदौर देवास में डॉक्टर ने उसे दिल का मरीज बताया था और में पागलो की तरह से देवास इंदौर अकर्ता रहा था जेब में उतने रुपये भी नही थे पापा की मृत्यु और मकान के कर्ज ने माँ को और हम तीनो भाइयो को तोड़ दिया था सिर्फ़ बड़ा भाई नौकरी कर रहा था और में सिर्फ़ १२०० रुपये कमा रहा था छोटा तो पढ़ ही रहा था । सरकार से ऑपरेशन के लिए रुपये मिलते तो थे पर राज्य शासन से बाहर जाकर इलाज करवाने की अनुमति लेना पड़ती थी क्योकि तब मध्य प्रदेश के किसी भी अस्पताल में बायपास का ऑपरेशन नही होता था न ही अस्पताल इतने एडवांस हुआ करते थे कोई भी डॉक्टर इलाज की ग्यारंटी नही
लेता था। बाईपास की सुविधा देश के चुनिन्दा अस्पतालों में ही उपलब्ध थी अपोलो उसमे से एक प्रमुख था जहाँ कम से कम ऑपरेशन फ़ैल होते थे । अस्पताल के पास डॉक्टरो गिरीनाथ , सुब्रामनियम, और सत्यमुर्थि जैसे काबिल डॉक्टर थे जो चौबीसों घंटे ही अस्पताल में रहकर अपनी सेवाए देते थे और किसी मरीज को किसी भी डॉक्टरो का घर मालूम नही था न ही वो इस बात को प्रोत्साहित करते थे कि कोई मरीज उनके घर तक आए मुझे याद है कि मैंने उन तीनो डाक्टारो को अस्पताल में ही देखा था रात के २ बजे हो या सुबह के ५ !!!
मेरे साथ सारे रिश्तेदारों का एक हुजूम गया था नाना काका, लीलू आत्या , बड़े मामी, मंदा मोउशी, नंदू क्योकि नंदू का ब्लड ग्रुप "ओ" नेगेटिव था , माँ का भी "ओ" नेगेटिव था, नए शहर में एकदम से डोनर कहा से लाते , इसलिए नंदू को ले लिया था । रात को जब इंदौर कोचीन ट्रेन से उतरे तो प्लेटफोर्म पर डॉक्टर कमल लोधया मिल गए जो मेरे एकलव्य की वजह से दोस्त बने थे और वो मद्रास विश्व विद्यालय के भारतीय गणित संस्थान में प्राध्यापक थे । स्वभाव से सहज कमल ने हम सबको घर चलने को कहा था, रात के दो बजे एक आदमी एक अनजान आदमी के कुनबे को घर चलने को कह रहा हो यह तो अब अविश्वसनीय लगता है पर यह समय का सच था। पर हम गए नही॥ हम भी शरीफ ही थे लगभग........
लाला रूपचंद अपने मकान देता था यह बात मुझे डॉक्टर नवलाखे ने बताई थी जो कुछ दिन पहले ही बाईपास करवाकर आये थे। हजारो प्रकाशो वालो इलाके में है ये अपोलो अस्पताल ग्रांट ट्रंक रोड पर मद्रास में । साफ सुथरा बिल्कुल होटल जैसा पाँच सितारा होटल जैसा उस ज़माने में इतना भव्य था तो आज कैसा होगा जबकि बाजार इतना घुस गया है सब जगह पर भगवन का शुक्र है कि अब वह जाने का काम नही पड़ता और न ही पड़े तो बेहतर है , वैसे भी अब इंदौर भोपाल में ऑपरेशन हो जाते है एकदम से ठीक ठाक ।

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