Tuesday, November 21, 2017

"तुम्हारी सुलू" का टैक्स फ्री होना जरुरी 21 Nov 2017

"तुम्हारी सुलू" का टैक्स फ्री होना जरुरी
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कल जब फिल्म देखकर लौटे तो मनीष ने कहा कि घर चलकर एक कप चाय पीते है, इस ठन्डे मौसम में और बेहद ठंडी फिल्म देखकर एक कप चाय तो बनती है ना, घर जाते ही मनीष की पत्नी शक्ति ने ही जाते पूछा कि भैया फिल्म कैसी है "तुम्हारी सुलू", तो मै दो मिनिट के सोच में पड़ गया कि क्या कहूं.......
मेरी जानकारी में भारतीय फिल्म इतिहास में संभवतः पहली फिल्म होगी जिसमे एक भारतीय पत्नी पति को कहती है "सुनो पाँव दुःख रहे है , ज़रा दबा दो ना" और पति बनें मानव कौल बहुत सहज भाव से पत्नी के पैरों की हलके से मालिश करने लगते है. यह फिल्म का वह टर्निंग बिंदु है जो पूरी फिल्म का आगाज़ है और धीरे धीरे जेंडर, स्त्री अस्मिता, मायाजाल, बाजार, घर, परिवार, समाज, रिश्तेदारी, अपार्टमेन्ट की दुनिया, स्त्रियों का गिल्ट और स्त्री स्वतन्त्रता के बदलते मायने, रेडियो जैसे उपेक्षित माध्यम का एक ताकतवर माध्यम में उभरना और समाज के घटिया या निम्न वर्गीय चरित्रों का चित्रण आदि के बीच बच्चों की वाजिब चिंताएं और सरोकार को एक सूत्र में "बहुत आहिस्ते से अपनी पेस" पर चलती फिल्म है "तुम्हारी सुलू"
ऐसा नही कि यह स्त्री अस्मिता पर बनी पहली फिल्म है मुझे याद आती है फिल्म अनुराधा जहां एक डाक्टर अपने शोध की दीवानगी में पत्नी को लगातार उपेक्षित कर अपने काम में लगा रहता है और जब उसका सुपरवाईजर आता है काम को जांचने तो उसे घर आकर कुछ चित्र देखता है और उसकी पत्नी को गाना गाने को कहता है और फिर फिल्म अपना राग और ढर्रा बदलती है. यहाँ मुआमला थोड़ा अलग है, एक मध्यमवर्गीय छोटे से परिवार में जीवन की कशमकश है रोज की. यह परिवार अमूमन महानगरीय प्रवृत्ति का है पति पत्नी और एक बेटा पर एक बेटी कि तमन्ना है पर महंगाई और सिमित जगह के कारण हिम्मत नही कर पा रहे है. तिन कमरों का मल्टी में मकान है और छोटी सी गृहस्थी पत्नी के पिता और दो बड़ी बहनें है जो हर पल हर बात और निर्णय में टांग अडाने के लिए हरदम तैयार है, तीन बहनों में दो बैंक में और एक गृहिणी है जिसे हर पल ताने सुनाये जाते है और वह बगैर बोले चाय बनाकर परोस देती है इन सबको जो उसे लगातार उसकी काम पढाई का उलाहना देते रहते है. ऐसे में यह छोटी बहन जीवन में बेहद छोटी छोटी उपलब्धियों से खुश है जिसमे एल ई डी बल्ब से लेकर प्रेशर कूकर भी शामिल है जो बाजार की चालाकियों कि ओर इशारा करता है कि किस तरह से कम्पनियां दोपहर में घरों में लगभग फ्री रहने वाली महिलाओं को अपने जाल में फंसाकर अपना उल्लू सीधा करती है.
इस फिल्म में पति - पत्नी के बहुत सामान्य रिश्ते है जिसमे रोमांस भी मौसम की तरह ही उभरता है और जल्दी ठंडा होता है, अड़तीस चालीस की उम्र पर पहुंचे जोड़ों की असली हकीकत बताना निर्देशकीय सुझबुझ है , स्कूल में जाते और किशोर वय के बच्चों की मानसिकता को दर्शाया गया है जहां बच्चे सेक्स, फिल्म और अश्लीलता के प्रति जल्दी ही आकर्षित होते है और इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार है जाहिर है ऐसे में माँ बाप के पर्याप्त ध्यान देने के बाद भी बच्चे बिगड़ ही जाते है क्योकि यह दुनिया है ही ऐसी, स्कूल में प्राचार्य का माँ बाप को बुलाकर डाँटना और पत्नी को अपराध बोध होना या पति द्वारा करवाया जाना भी स्वाभाविक ही है और इस समय में पत्नी द्वारा भी इसे एक स्वयं का अपराध मान लेने का जो अभिनय विद्या ने किया है वह एक औसत भारतीय स्त्री की छबि को दर्शाने के लिए पर्याप्त है, पर एक समय आने पर वह फटती भी है और पूछती है क्या बच्चे की जिम्मेदारी सिर्फ मेरी है? ऐसे कुछ छोटे छोटे प्रसंगों से सुलू ना सिर्फ सवाल करती है बल्कि वह रेडियो जोकी जैसे व्यवसाय में रात्रिपाली की नौकरी करके पूरी व्यवस्था को भी चुनौती देती है.
रेडियो में नौकरी करना एक वैकल्पिक रोजगार और आजीविका का बड़ा क्षेत्र है इस बात को भी समझना जरूरी है जिसे प्रायः हमारी युवा पीढ़ी भूल रही है या उपेक्षा कर रही है इसी के साथ सुलू को लेने जो महिला ड्राईवर आती है वह भी एक नए प्रकार का प्रतीक है- देर रात में एक महिला ड्राईवर का लेने और छोड़ने आना वो भी एकल महिला ड्राईवर का वह बहुत बड़ा सन्देश है जसी शायद हम नगण्य मान लें पर यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव है बगैर शोर के किया गया संगठित प्रयास, और इसके लिए निर्देशक प्रशंसा के पात्र है. मुझे याद है मेरी मित्र और साथी मीनू वढेरा और राजेन्द्र बंधू दिल्ली और इंदौर में महिलाओं को वाहन चालन में प्रशिक्षित कर आजाद फाउंडेशन के माध्यम से अभी तक सैंकड़ों लड़कियों को रोजगार दिला चुके है. यह भी एक सार्थक सन्देश है इस फिल्म में . इसी के साथ तेजी से ग्लोबल होते जा रहे बाजार के दौर में छंटनी और कारपोरेट में विश्वस्त कर्मचारियों को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर बाहर निकालने की प्रक्रिया को बारीकी से दर्शाया गया है. ऐसे में विकल्पों की भी बात की गई है बशर्ते आप किसी काम को छोटा या बड़ा ना समझे .
आपकी सुलू फिल्म भारतीय फिल्मों में फार्मूलाबद्ध तो नहीं अपर रोचक संदेशों वाली एक अच्छी फिल्म है जसी परिवार के साथ देखा जा सकता है और स्त्री स्वतन्त्रता के नए बिम्ब और उभरते ट्रेंड्स को समझा जा सकता है. यह फिल्म युवा होती लड़कियों के लिए एक पाठ्यक्रम है और युवा लड़कों के लिए मानव कौल जैसे अभिनेता का पति के रोल का आदर्श देखना चाहिए जो बेहद कूल है . मेरी नजर में इस फिल्म को टैक्स फ्री किया जाना चाहिए ताकि आसानी से समाज के हर तबके का आदमी देख सकें. विद्या बालन से ज्यादा मुझे मानव ने प्रभावित किया क्योकि विद्या तो मंजी हुई कलाकार है ही परन्तु मानव कौल ने जो परिपक्वता मंच से उठाकर फ़िल्मी परदे पर रखी है वह अप्रतिम है, दो जोड़ी कपड़ों में - घर में काला चेक का पायजामा और बाहर फेक्ट्री का पिंक शर्ट पहनकर वे इतने स्वाभाविक है कि लगता ही नही कि उन्हें कुछ करना पडा होगा अभिनय जैसा. ऐसी फ़िल्में भारतीय समाज की धरोहर है जो परिवर्तन की कहानी बहुत धीमे से लिख रही है और लोगों के अन्दर एक चिंगारी पैदा कर रही है.

Friday, November 17, 2017

कवि कुँवर नारायण जी को सादर नमन विनम्र श्रद्धांजलि 16 नवम्बर 2017

हिंदी के महत्त्वपूर्ण और वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण हमारे बीच नहीं रहे। विनम्र श्रद्धांजलि।

जन्म : 19 सितम्बर 1927
अवसान : 15 नवम्बर 2017


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'कहीं कुछ भूल हो
कहीं कुछ चूक हो कुल लेनी देनी में
तो कभी भी इस तरफ़ आते जाते
अपना हिसाब कर लेना साफ़
ग़लती को कर देना मुआफ़
विश्वास बनाये रखना
कभी बंद नहीं होंगे दुनिया में
ईमान के ख़ाते।''

'.....एक शुभेच्छा की 
विघ्नहर विनायक छाया में 
अगर झुकते माथे जुड़ते हाथ 
तो उस जुड़ने को हम प्रेम कहते''

“ अमरत्व से थक चुकी
आकाश की अटूट उबासी
अकस्मात टूट कर
होना चाहती है
किसी मृत्यु के बाद की उदासी ! “

अबकी अगर लौटा तो 
हताहत नहीं 
सबके हिताहित को सोचता 
पूर्णतर लौटूंगा

"समय हमें कुछ भी 
अपने साथ ले जाने की अनुमति नहीं देता, 
पर अपने बाद 
अमूल्य कुछ छोड़ जाने का
पूरा अवसर देता है...."

अभी भी बचे हैं कुछ वर्ष।

आने जाने के उलटफेर में
कौन जाता है पहले, कौन बाद में -
कुछ पता नहीं ।

तुम्हारा इत्मीनान
और मेरी आशंका
दोनों ही निर्मूल हैं।

आओ, आयोजित करें तब तक
कौंधती बिजलियों की तीव्रता से
एक जीवनोत्सव और...।

फ़ोन की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
और करवट बदल कर सो गया
दरवाज़े की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
और करवट बदल कर सो गया
अलार्म की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
और करवट बदल कर सो गया
एक दिन
मौत की घंटी बजी...
हड़बड़ा कर उठ बैठा-
मैं हूँ... मैं हूँ... मैं हूँ..
मौत ने कहा-
करवट बदल कर सो जाओ।

अबकी बार लौटा तो
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अबकी बार लौटा तो 
बृहत्तर लौटूंगा 
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं 
कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं 
जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को 
तरेर कर न देखूंगा उन्हें 
भूखी शेर-आँखों से 

अबकी बार लौटा तो 
मनुष्यतर लौटूंगा 
घर से निकलते 
सड़को पर चलते 
बसों पर चढ़ते 
ट्रेनें पकड़ते 
जगह बेजगह कुचला पड़ा 
पिद्दी-सा जानवर नहीं 

अगर बचा रहा तो 
कृतज्ञतर लौटूंगा 

अबकी बार लौटा तो 
हताहत नहीं 
सबके हिताहित को सोचता 
पूर्णतर लौटूंगा।


Thursday, November 9, 2017

Khari Khari 9 Nov 2017









अपनी ख़ामोशी में ही अपने को समझे और जो इस सर्द ख़ामोशी में खलल डालें उस आवाज को हमेशा के लिए या तो दबा दो या ऐसी जगह दफ़न कर दो कि वो सिर्फ एक इको बनकर रह जाये संसार मे ताकि वो त्रिशंकु की भांति यही बना रहे खत्म ना होने के लिए।
***
हम जितना अपने करीबी परिजनों, मित्रों, सहकर्मियों और ख़ास लोगों से फ़ासला रखेंगे उतना ही दिमाग़ी सुकून मिलेगा जीवन में।
***

आपके जीवन मे यदि कोई व्यक्ति विशेष दखल दें, परेशान करें और आपकी डिग्निटी या निजता में झांकने का काम करें तो सबसे पहले उसे फेसबुक से ब्लॉक करें, वाट्स एप से हटाए उसका नम्बर ब्लॉक करें और उससे संबंधित सारी स्मृतियां भूला दे - मुश्किल है पर कठिन भी नही। अगली बार वह नामाकूल मिलें तो उसे दुर्लक्ष कर उसकी इतनी उपेक्षा करें कि वह आपको भी अपने ज़ेहन से निकाल दें। 

देखा यह है कि जब आप लोगों के काम, सदाशयता और ईमानदारी पर सवाल करते है तो वे जवाब देने के बजाय औकात पर तुरन्त आते है।

***
सार्वजनिक जीवन मे उतने ही खुले, स्वतंत्र और निर्भीक रहिये जितना लोहे के पर्दों से पार देखा जा सकता है। (Iron Curtain)
***
यदि आप किसी की मदद कर रहे है तो याद रखिये वो आपको बहुत जल्दी डसने वाला है
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हिन्दुतान में मोबाइल पर बकर करने वालों की कमी नही और इन सबको बात करने की तमीज भी सिखानी चाहिए
इतनी जोर से घंटों तक बकलोल करते है कि जी करता है इनके मोबाइल छीनकर फेंक दो
बातें ऐसी करेंगें कि इनका ना कोई ओर है ना छोर, आप ना सुनना चाहो तो भी मूर्खाधिपति भयानक जोर से बोलते है

अपनी बीबी, गर्लफ्रेंड , बॉस या सहकर्मी से बात करते हुए इन बकलोल पतियों को यह भी ध्यान नही रहता कि अपने निजी जीवन के मसले और गुप्त राज से रोग भी सबको सुना देते है
अब जमाना गया कि आप जोर से बोलकर मोबाइल का रौब गांठ रहे हो किसी पर, अब तो सभ्य और सुसंस्कृत वह है जो मोबाइल पर बहुत कम बात करता हो या बिल्कुल ही नही
सबसे ज्यादा दिक्कत तब होती है जब आप यात्रा में हो और कान में भोपू फंसाकर ये भारतीय बकलोल इतनी जोर से बोलते हो मानो कोई नाक कान विशेषज्ञ आपकी ऑडियोमैट्री कर रहा हो और आप भरमाये से टुकुर टुकुर देख रहे हो
असल मे दिक्कत यह है कि हम सब लोग इतने बड़े बकलोल है कि कह नही सकते चाहे वो खिचड़ी जैसे खाने को उत्सव बनाकर राष्ट्रीय व्यंजन बना दें या चुटकियों में विश्व को परास्त कर दें या अपने कमजोर कुतर्कों से कुछ भी कह सुन लें
हम यह भूल जाते है कि दुनिया मे चुप रहकर ही अधिकांश काम हुए है और चिंतन, आविष्कार या धर्म बने है,मौन रहकर ही मुखर हुआ जा सकता है , मैं और मेरे कई साथी भी बकलोल है और अब मैं बहुत कम बोलता हूँ, लोगों से मिलना लगभग बन्द कर दिया है और अपने मे ही लगा रहता हूँ , बकलोलों से दूरी ही ठीक है
चारो ओर शोर है झूठे, मक्कारों, फरेबियों और फर्जी लोगों का और ये सब महाबकलोल है
#खरी_खरी

राजेन्द्र या ऐसा ही कुछ नाम बताया था, 28 बरस उम्र, बीबी और एक चार साल की बेटी, किराए का मकान और नौकरी पीवीआर में गेट कीपर।
तनख्वाह मात्र 7500/- प्रतिमाह, समय सुबह 1130 से रात 1230 तक, हफ़्ते में एक दिन छुट्टी।
कैसे गुजर करते हो , भाई इस शहर में ?
आप ही बताइए कैसे करें, आप सौ डेढ़ सौ रुपया देकर आये है देखने फ़िल्म !
पिछले दिनों जेएनयू से पी एच डी कर चुके एक कवि, साहित्यकार और युवा विचारक से पूछा था कि ये हिंदी में इतने लोग शोध कर रहे है, इनका क्या भविष्य है।
बुरी तरह से भड़क गया , गाली पर उतर आया - बोला - सहानुभूति मत दिखाइए, सब हो जाएगा, क़िस्मत में खाना लिखा है आप ज्ञान मत बघारिये इतना उत्तेजित हो गया कि लगा ब्रेन हेमरेज ना हो जाएं।
दो साल पहले अपना शोध जमा करने के दूसरे ही दिन हिंदी का विलक्षण छात्र रविशंकर उपाध्याय बी एच यू, बनारस में ब्रेन हैमरेज से मर गया - सासाराम का था --- आपको पता है ? रोहित वेमुला तो याद है ना - कसम से आज तक बिक रहा है ; दलित था।
हिंदी की बात करें - काशी हिंदू विवि में 8 पद आये है ,4000 नेट और पी एच डी वालों के आवेदन है। कर्नाटक केंद्रीय विवि में 2 पदों के लिए 400 आवेदन है सब नेट और पी एच डी है ।
8000 से 14000/- प्रतिमाह में सबसे ज्यादा शिक्षित उपलब्ध है राष्ट्रीय स्तर का "ओके , टेस्टेड" !
पीवीआर में गेट कीपर की नौकरी हो या सफेद कॉलर प्राध्यापक वाली - सब बराबर है।
आइये पदमावती की, गुजरात चुनाव, पाटीदार आरक्षण की बात करें !

Saturday, November 4, 2017

Posts of 3 Nov 17 Bhopal Rape , Krishna Sobati and Dewas MNC SBA


3 Nov 2017 

कौन कहता है कि हिंदी का साहित्यकार दरिद्र होता है।
ए लड़की और मित्रो मरजानो की लेखिका जिन्हें आज ज्ञानपीठ से नवाज़ा गया है उन्होंने कुछ वर्ष पहले रज़ा फाउंडेशन को एक करोड़ का दान दिया था ताकि साहित्य की सेवा की जा सकें।
यह दीगर बात है कि कितनी कहां और कब हुई या किन फर्जी अकादमियों को गांव देहात कस्बों में अन्यदान / अनुदान दिया गया पर यह अशोक वाजपेयी जी की इस घोषणा से हिंदी साहित्य पर , साहित्यकार पर थोड़ा विश्वास बढ़ा है और उम्मीद भी पींगे ले रही है। अब कोई "गरीब मास्टर मर गया , लगता है हिंदी का साहित्यकार था" जैसे ध्येय वाक्य पढ़ने को नही मिलेंगे।
बहरहाल, कृष्णा सोबती जी अब ग्यारह लाख ( बढ़ तो नही गए ये रुपये, मंडलोई जी से पूछो रे) किसे देंगी - यह विचारणीय है, ध्यान रहें सबको कि पंक्ति में दान लेने के लिए यह टुच्चा फेसबुकिया लेखक उर्फ गरीब ब्राह्मण भी खड़ा है

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भोपाल बलात्कार कांड में तीन टी आई और एक दो सब इंस्पेक्टर को निलंबित किया गया
एस पी, एएस पी, आईजी, डीआईजी या डीजीपी को क्यों बचा लिया - क्योकि ये बड़े आय पी एस रात को आराम करते है ?
नीचे के स्तर के कर्मचारियों पर निशाना साधकर हमेशा बड़े लोग बच जाते है , इन कर्मचारियों पर विभागीय से लेकर राजनैतिक और छूट भैय्ये नेताओं का भी दबाव होता है और गुंडे मवालियों से लेकर पत्रकारों का भी। बड़ी बड़ी घटनाएं हुई पर कभी किसी बड़े अधिकारी को निपटते नही देखा।
जो डीजीपी कहता हो कि रात 930 के बाद बात नही करूँगा उसे क्या मुख्य सचिव ने या गृह विभाग के प्रमुख सचिव ने मेमो भी दिया है इस तरह का गैर जिम्मेदार बयान देने के लिए या कारण बताओ नोटिस ?
आखिर क्या कारण है कि जो प्रशासनिक अमला फ्रंट में चौबीसों घंटे काम करता है - चाहे वो एस आई हो, बाबू हो, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, एएनएम , लाईन मेन, हैंड पम्प मैकेनिक, संविदा शिक्षक, पटवारी, पंचायत सचिव, सब इंजीनियर या कोई और - इन सबको सॉफ्ट टारगेट मानकर निलंबित या बर्खास्त कर आप जनता की सहानुभूति बटोर लेते हो, घटना पर राख डालते हो पर जो इन सबको 24x7 दबाव में रखकर मनमर्जी का या राजनैतिक फायदे के लिए इनसे काम करवाते है उन पर कोई कार्यवाही नही , ना ही पूछताछ होती है - बस मीडिया में सब ख़त्म हो जाता है।
मेरा अपना अनुभव है कि ये फ्रंट में काम करने वाले ज्यादा मैच्योर, अनुभवी और प्रतिबद्ध होते है बनिस्बत वरिष्ठ अधिकारियों के। इन्ही के दम से विभाग भी चलते है और सरकारों के फ्लैगशिप कार्यक्रम भी। हो सकता है भोपाल में इनसे चूक हुई हो पर महिला हिंसा के मामले दर्ज ना करने का दबाव भी हो। एक वरिष्ठ मित्र से आज लम्बी बात हुई जो इस तरह के मामलों में क्या दबाव होते है उसका बता रहे थे।
एक बार इन दो चार सीनियर आयपीएस को भी झाबुआ, डिंडौरी या जुन्नारदेव घूमवा दो , भोपाल में बरसों से पड़े है और पी एच क्यू के बजाय बंगलों और समारोहों , भारत भवन से लेकर इंदिरा गांधी मानव संग्रहालयों में ज्ञान बांटने से लेकर चापलूसी में जी सर जी सर करते रहते है । इनकी एक बार तोंद ही देख लो या निशाने लगाने का अभ्यास देख लो या श्यामला हिल्स से वल्लभ भवन तक दौड़ करवा लो सारी फिटनेस और चर्बी का गणित समझ आ जायेगा।
कहते है ना कानून की नजर में सब समान है ।
सुना ये भी कि रेलवे, हबीबगंज और न्यू मार्केट थाना बड़े राजनैतिक रसूख और उगाही वाले थाने है
यहां के टी आई और स्टाफ किसी के बाप की नही सुनते क्योकि इनके आका स्थानीय बड़े राजनेता, विधायक और सांसद होते है, यहॉं पोस्टिंग विभाग के अधिकारी नही एक विधायक या राजनेता करवाते है और अब इनके निलंबन से सारे काले धंधे बन्द होंगे !
मौका मिलते ही पी एच क्यू ने तीनों को निपटा दिया और अब शायद वे नियम कायदे से पुलिस और कानून व्यवस्था चला सकें।
गजब के खेल है कार्यपालिका और विधायिका के बीच बारीक लकीर को समझ नही सकते।
( अभी पूर्व पोस्ट पर एक साथी ने यह रहस्योदघाटन किया )

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देवास में स्वच्छता अभियान के तहत आज विश्व रिकॉर्ड बनाने की कवायद चल रही है
जब बात नागरिकों से नही बन रही तो स्कूल के बच्चों को घेरकर एप डाऊनलोड करवाया जा रहा है
अर्थात अब स्कूल में बच्चों को मोबाइल लाने की इजाजत दे दी जा रही है, फिर होंगे झगड़े, लफड़े, लव जिहाद और ब्ला ब्ला !
समझ नही आता कि सरकारी योजनाओं की पूर्ति के लिए सबसे सॉफ्ट टारगेट बच्चों को ही क्यों चुना जाता है
देखते है नगर निगम किस तरह से शहर को एप से स्वच्छ रखती है और 56 से पहले पांच स्थान में भी आ पाती है
जो निगम अपनी साईट पर टैक्स जमा करने के लिए यानी रेवेन्यू कलेक्शन के लिए नियमित मेंटेन नही कर पा रही, सफाई कर्मचारियों पर या स्टाफ पर नियंत्रण नही कर पा रही वो डिजिटल एप को ट्रैक करके स्वच्छता का काम करेगी, अभी के कौशल और दक्षता को देखते जरा शक है ।
जब तक राजनैतिक गन्दगी स्वशासन की इस इकाई और जनप्रतिनिधियों के दिलों दिमाग़ से दूर ना होगी तब तक कुछ नही होगा, एक बार उस ठेकेदार को पकड़ कर शहर के रास्तों पर घूमवा दें जो पूरा शहर खोद कर रुपया लेकर भाग गया, या दो पूर्व कमिश्नरों को नौकरी से बर्खास्त करवा दें जो इस शहर को गत 25 वर्षों में दीमक की तरह चाट गए, तो जाने कि आपकी सरकार भोपाल से दिल्ली तक है वरना तो ये भी आये है लटके झटके दिखाकर निकल लेंगे अपना नाम यश और माल उड़ाकर !!!

Monday, October 30, 2017

मेरा स्कूल - संगत में न्याय के संस्कार

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मेरा स्कूल - संगत में न्याय के संस्कार
देवास रियासत दो हिस्सों में बंटी थी जूनियर और सीनियर। यह सीनियर देवास का न्याय मन्दिर है जहाँ न्याय मन्दिर यानी स्टेट के समय मे पवार वंश का कोर्ट हुआ करता था। आज इसे देखकर मन भावुक हो गया और उस समय के मित्र, सहपाठी, शिक्षक और सारा देवास तरोताज़ा हो गया। खारी बावड़ी और अखाड़ा रोड़ पर बसा मेरा यह स्कूल कितना मनोहारी था आज यह सोचकर ही मस्तक गर्व से उठ जाता था।
इसी के ठीक पीछे बड़ा सा मन्दिर है जिसमे पवार वंश के कुलदेवता है, और जहाँ हर जन्माष्टमी पर आठ दस दिन पहले से चौबीसों घंटे भजन होते थे / है और देवास महाराज भी आते थे। जन्माष्टमी के दिन दिंडी यात्रा पूरे शहर में निकलती थी परंपरागत वेशभूषा में।
ई एम फास्टर ने इसका जिक्र अपनी किताब "ए पैसेज टू इंडिया" में भी किया है।
यह सरकारी स्कूल था विशुद्ध हिंदी माध्यम का। यही मराठी प्राथमिक विद्यालय लगता था जहाँ से मैंने पाँचवी पास की और छठवीं में इसी न्याय मन्दिर में प्रवेश लिया। 
कभी सोचता हूँ कि ये विद्रोही तेवर, अन्याय के खिलाफ बोलने और कर्म के संस्कार कहाँ से पड़े तो अब समझ आता है कि बालमन और किशोरावस्था में इस न्याय मन्दिर की भीत पर लिखे निर्णयों और जमाने से दर्ज इतिहास की कहानियाँ कही अंकित और टंकित हो गई।

आज यह बिल्डिंग खस्ताहाल है अवशेष बचे है पर सच मे भवनों का और उसकी दीवारों पर लिखा इतिहास हमारे अवचेतन पर असर तो डालता ही है।
लगता ही नही कि यह देवास है और एक शहर जो मेरे अंदर हिचकोले लेता है , धड़कता है और सांस लेता है। इस शहर ने बहुत कुछ दिया है और यहाँ के हर बाशिंदे और ज़र्रे - ज़र्रे से मुझे प्यार हैं।
तस्वीर सौजन्य मित्र अरुण पड़ियार का है जो आठवी तक और बाद में नारायण विद्या मंदिर में ग्यारहवीं तक साथ पढ़ते थे। वे बेहद सक्रिय और प्रतिभावान छायाकार है।

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Wednesday, October 25, 2017

गिरिजा देवी - भारतीय संगीत की मनीषी का अवसान 24 अक्टूबर 2017


गिरिजा देवी - भारतीय संगीत की  मनीषी का अवसान 
24 अक्टूबर 2017 


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वे गाती हैं
आत्मा की अंगीठी परचाती
देह की बनती हुई राख के पायताने
सबके जीवट को तपाती
गाती हैं वे...…...


1
बनारस,
चारों-पट गायन के चौमुखी दीये का अंतिम दीवट भी आज तिरोहित हुआ...

पहला दीया : रसूलनबाई
दूसरा : बड़ी मोतीबाई
तीसरा : सिद्धेश्वरी देवी
चौथा दीया : गिरिजा देवी...
चारों की ज्योति मिलाओ तो
जगमग काशी..
चारों की आवाज़ से
पवित्र होती गंगा और मंगलागौरी...
2
एहिं ठइयाँ मोतिया हेराय गइली रामा
कहवां मैं ढूंढूं...

गिरिजा की मोतिया कहीं गुम नहीं हुई ,न ही उनके राम के फूलों के सेहरे की लड़ियाँ ही खुलकर बिखर सी गयीं हैं..
वो सब, ठीक से बचा कर सहेज गयीं अप्पा..
काशी का ख़ज़ाना कभी लुटता नहीं,
क्योंकि उसे कुबेर नहीं, सुर- देवियाँ सिरजती आयीं हैं...
3
आपकी डोलिया कौन उठा पायेगा अप्पा जी?
चारों कहाँर मिलकर उठाएं भी, तो भी ठुमरी, दादरा, कजरी और चैती को कौन उठा पायेगा?
किसमें सामर्थ्य कि मणिकर्णिका से कह सकें,
थोड़ा कम बहा कर ले जाना..
थोड़ा सा छोड़ देना हमारी गिरिजा मां को..
शायद अग्नि और जल मिलकर थोड़ा छोड़ दें
अपनी लीक पर ज्योति की मानिंद
ठुमरी के सनातन प्रवाह को....
4
रसूलनबाई और सिद्धेश्वरी देवी,
नैना देवी के द्वारा दूरदर्शन के लिए बनाए जा रहे एक कार्यक्रम में
बनारस की पूरब-अंग गायिकी पर आपस में 
आज से लगभग आधी सदी पहले बतिया रहीं थीं..
अचानक रसूलनबाई ने पूछा- 'हम दोनों के बाद आगे की पीढ़ी में क्या बचेगा?'
आश्वस्त सिद्धेश्वरी जी ने कहा -
'अपनी गिरिजा है ना !'....
5
गूँध-गूँध लाओ मालिनिया
फूलन के हार..

आपको कौन से फूलों का हार
पहनाना सुख से भर देगा?
पारिजात की तरह, सेनिया घराने की डाल पर उगे हुए पीलू ,
कौशिक- ध्वनि, पहाड़ी, खमाज और झिंझोटी
से बने हुए और कभी न कुम्हलाने वाले
सुर-वैजयंती के हार....

6
उन्होंने सहज ही भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
की 'दिलजानी 'को अपनी चपल, हीरे की कनी सी आवाज़ से रिझाकर
'राधारानी 'बना डाला..
फ़िर क्या था!
कुछ बहुत सुन्दर और शालीन हुआ इस तरह...
कहनवा मानो ओ राधारानी !
निशि अंधियारी कारी बिजुरी चमकत
रूम-झूम बरसत पानी
तुम्हीं अकेले बिदेस जवैया
हरिचन्द सैलानी....
गिरिजा देवी को जैसे भारतेन्दु में जयदेव मिल गए...

7
तक-तक बाट निहारूँ सजना
आवन कहि गए क्यूँ नहिं आए
छाँड़ि गए मोरी सुधि बिसराई
तक-तक बाट निहारूँ....

उस्ताद अमजद अली खां के साथ
सरोद की लय पर तीनों सप्तकों में घूमने वाली
गिरिजा देवी ने ये दादरा जैसे विरह की सबसे गहरी
दशा में जाकर सम्भव किया था...
ऐसे अनेकों दादरे अप्पा जी के कंठहार रहे हैं..
राग सिंधु भैरवी का यह सलोना रंग
दरअसल अब उनकी बाट जोहने का
शाश्वत गीत बन गया है...
अप्पा की शिष्याओं को इस दादरे का मर्म
शायद अब कुछ अधिक दुख दे जाए। पीड़ा में
भी गिरिजा देवी की तालीम बेजोड़ कुछ रचकर प्रतीक्षा
को और भी मानवीय बनाएगी..
यतीन्द्र मिश्र 

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Tuesday, October 24, 2017

इस सरकार को संविधानिक संस्थाओं को नष्ट करने को याद रखा जाएगा.


इस सरकार को संविधानिक संस्थाओं को नष्ट करने को याद रखा जाएगा.
-संदीप नाईक-


इस सरकार को संविधानिक संस्थाओं को नष्ट करने को याद रखा जाएगा.
-संदीप नाईक-
टी एन शेषन का नाम किसने नहीं सुना होगा मेरा ख्याल है नब्बे के दशक के बाद थोड़े जागरुक नागरिको को इनका नाम याद होगा क्योकि 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 तक वे भारत निर्वाचन आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त रहें और शायद उन्ही का कार्यकाल था जब हम जैसे लोग प्रौढ़ होकर थोड़ा थोड़ा चुनाव समझ रहे थे और राजनीति के खेल भी, बाजारीकरण और खुलेपन का दौर था, सरकार के सामने देश कि अर्थव्यवस्था के लेकर बड़ी चुनौतियां थी और राजनैतिक दलों के क्रिया कलापों पर एक लगाम कसने की भी शिद्दत से जरुरत महसूस की जा रही थी. टी एन शेषन की नियुक्ति से चुनाव सुधारों को जहां एक मंजिल मिली वही आम लोगों तक चुनाव आयोग क्या होता है और इसकी ताकत क्या होती है इस बात की पुख्ता जानकारी भी मिली. चुनाव में कसावट लाने के उनके सारे प्रयास बहुत ही सार्थक साबित हुए और राजनैतिक दलों को एक तरह का भय भी चुनावों से लगाने लगा. कालान्तर में चुनाव आयोग एक संविधानिक बॉडी है यह बात जनमानस के दिलों दिमाग में समां गई और राजनैतिक दलों पर एक अंकुश लगा जो भारतीय गणतंत्र के लिए एक वरदान साबित हुआ.
यह दुखद है कि भारतीय लोकतंत्र में पिछले कुछ वर्षों से संवैधानिक संस्थाओं के साथ सत्ताएं और सरकार अपनी मनमर्जी के हिसाब से छेड़छाड़ कर रही हैं विभिन्न प्रकार के आयोग रिजर्व बैंक सीबीआई का प्रयोग या तो अपने राजनीतिक दुश्मनों को ठिकाने लगाने के लिए किया जाता है या उन्हें निपटाने के लिए जिस तरह का माहौल धीरे-धीरे बन गया है वह बेहद खतरनाक है खास करके भारत के संघीय ढांचे में ऐसा होना और मात्र 5 साल के अस्थाई सरकारों द्वारा इन संवैधानिक संस्थाओं के साथ छेड़छाड़ एक गंभीर अपराध ही नहीं बल्कि गलत परंपरा भी है
वर्तमान सरकार ने गुजरात चुनाव के बहाने चुनाव आयोग जैसी संस्था को कुल मिलाकर चुनाव विभाग बना दिया है जो संविधानिक ना होकर शासन के अंतर्गत और शासन के दिशा-निर्देशों पर काम करने लगा है, अपने हर निर्णय के लिए केबिनेट पर निर्भर हो गया है. चुनाव आयोग एक सरकारी विभाग है और मोदी इसके स्वतंत्र प्रबाहर वाले राज्य मंत्री जो हर तरह के निर्णय अपने हित में लेते है. मौजूदा चुनाव आयोग के प्रमुख को जब नरेंद्र मोदी गुजरात से दिल्ली लाए थे तभी यह मंशा समझ में आई थी कि किस तरह से वह इस व्यक्ति का उपयोग अपने निजी हित और पार्टी के फैलाव में करेंगे.  यदि आप चुनाव आयोग के ढांचे को देखें तो पाएंगे कि वहां 3 चुनाव आयुक्त होते हैं जिनमें एक प्रमुख होता है, यह ढांचा इसलिए बनाया गया था कि यदि कोई एक व्यक्ति निरंकुश होकर तानाशाही पूर्वक निर्णय लें तो बाकी दो लोग उसके निर्णय को पलटकर सही निर्णय को लागू करवा सकते हैं परंतु जीते जिस तरह से ज्योति के साथ में ओपी रावत और तीसरे आयुक्त निर्णय ले रहे हैं - वह दर्शाता है कि यह सब मिलीभगत है और और एक पार्टी विशेष व्यक्ति विशेष और धर्म विशेष को चुनाव आयोग साफ-साफ मदद कर रहा है. यह निहायत ही घटियापन और साफगोई वाला मामला नहीं है. गुजरात में चुनाव की घोषणा को करवाने के लिए तारीखों को लगातार टाला जा रहा है.  यह दर्शाता है कि चुनाव आयोग के निहितार्थ क्या है और ये किस तरह से खुलकर मोदी सरकार को समर्थन दे रहा है और डरकर या समर्थन कर एक गलत आदर्श स्थापित कर रहा है। चुनाव की घोषणा के बाद भी राहत कार्य किये जा सकते है यह कोई नई बात नही है, कश्मीर जैसे राज्य में जहां हमेशा ही चुनाव करवाना रिस्क होता है वहाँ भी चुनाव समय पर होते है, छत्तीसगढ़ में हमेशा ही नक्सल का ख़तरा बना रहता है फिर भी चुनाव होते है फिर गुजरात को क्या दिक्कत है.
एक संविधानिक आयोग का सरकारी विभाग में इस तरह से बदल जाना कि सरे राह चलता आदमी तंज कसने लगें और गरिमा, मूल्यों और प्रतिष्ठा पर सवाल उठाने लगे यह  कितना शर्मनाक भी है। जिस आयोग का काम समय पर चुनाव करवाने का है वह लापरवाह होकर व्यक्ति विशेष की कठपुतली बन गया है यह घातक ही नही बल्कि भयानक है क्योंकि इससे संविधान के 73 और 74 वें संशोधन अधिनियम के क्रियान्वयन में दिक्कतें होंगी। यदि पूरे देश की स्थानीय शासन की इकाईयों के समयबद्ध चुनाव होने की बात की जाए तो शायद मप्र ही सम्भवतः ऐसा बिरला राज्य मिलेगा जहां पंचायतों, नगर निकायों और सहकारी संस्थाओं के चुनाव, विधानसभा, लोकसभा के उप चुनाव समय पर लगातार हो रहे है। पर यदि हमारा राष्ट्रीय चुनाव आयोग सत्तासीन पार्टी के दबाव और व्यक्ति विशेष की चाटुकारिता करते हुए या मोदी की घोषणाओं का इंतज़ार करते चुनाव की घोषणा करने में टालमटोल करेगा तो बाकी प्रदेश के चुनाव आयोगों में काम करने वाक्यों पर स्थानीय सत्ता चला रहे नेता, लठैत कितना दबाव बनाएंगे इसकी कल्पना ही भयावह है। चुनाव आयोग सरकार की एक बांह हो गई है जो कि बहुत ही खतरनाक है और यह आने वाले समय में दर्ज किया जाएगा कि चुनाव आयोग जैसे बड़े महत्त्व के संस्थान को नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने एकदम नीचे लाकर रख दिया है और यह बाकी सब जगह के लिए एक नजीर बनेगा, एक ठोस नकारात्मक उदाहरण. दूसरा सरकार तो और दो साल बाद खत्म हो जायेगी पर जो पारदर्शिता, संविधानिक मूल्य और गरिमा थी वह खत्म अगर हो गई तो उसे पुनर्स्थापित करने में कितना समय लगेगा.....?
इस सरकार को इस बात का श्रेय दिया जाएगा कि नोट बंदी से लेकर जी एस टी और तमाम तरह के बदलावों से जनता को हैरास करने के साथ साथ सी बी आई , रिजर्व बैंक, चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को भी भ्रष्ट किया है और इसकी सजा जरुर मिलेगी.
मुख्य चुनाव आयोग अधिकारी जोती झूठ बोल रहे है और तमाम नियम कायदों को छोड़कर , संविधानिक पद पर बैठकर संविधान का अपमान कर रहे है।मात्र आठ जिलों के कुछ ब्लॉक्स में बाढ़ का बहाना करके चुनाव की तारीखें टालते रहे और नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार को पर्याप्त समय और अवसर दिए कि वे मतदाताओं को रिझाने के लिए घोषणा करते रहें। यह मैं प्रधानमंत्री की बात नही कर रहा, व्यक्ति नरेंद्र मोदी की बात कर रहा हूँ जो गुजरात मे अपनी असफलता की संभावना देखते हुए गुजरात से ही जोती जैसे अयोग्य और कमजोर अधिकारी को दिल्ली में चुनाव आयोग में लाएं और संवैधानिक पद पर बैठाया
इस व्यक्ति ने चुनाव आयोग को चुनाव विभाग बना दिया और व्यक्ति विशेष के इशारों पर काम कर रहे है। ऐसा कोई नियम नही है कि चुनाव घोषित होने के बाद राहत कार्य रोके जाएं आपदाएं प्राकृतिक और मानव निर्मित हमेशा बनी रहती है - कश्मीर, छग या उत्तर पूर्व के राज्यों में बारहों मास यह समस्या बनी रहती है पर चुनाव हमेशा होते रहे है। जोती ने बाढ़ की आड़ में पार्टी विशेष को मौका दिया , मैं ये भी तर्क मान लेता अगर कल रात तक अरुण जेटली घोषणाओं का पिटारा नही खोलते या जी एस टी की दरों में बदलाव या रिटर्न भरने की छूट नही देते तो पर कल तक जिस तरह की घोषणाएं गुजरात के व्यापारी वर्ग के लिए की या बैंकों को धन उपलब्ध करवाया है वह संदेह के घेरे में है।
जोती ने बहुत गलत परम्परा स्थापित की है गुजरात मे भाजपा की जीत में इस अधिकारी की मेहनत और देश के कानून , संविधान से खुले आम छेड़छाड़ को इतिहास में गलत उदाहरण की तरह याद रखा जाएगा और रिटायर्ड होने के बाद इसका कांग्रेस या अन्य दलों के राज्य में राज्यपाल बनना तय है और यह नजीब जंग की तरह उस राज्य के प्रशासन में भी दखलंदाजी करेगा।
इसके अतिरिक्त इसने भारतीय प्रशासनिक सेवा के उच्च स्तर को भी गिराकर युवा , तेज तर्रार अधिकारियों के सामने गलत नजीर पेश की है , मसूरी के प्रशिक्षण संस्थान के गलियारों में इसके कामों के चुटकुले और उदाहरण युगों युगों तक दिए जाते रहेंगे।
भारतीय संविधान के लिए 2019 तक का समय बेहद भयावह और खतरनाक है और नागरिकों को सतर्क रहने की जरूरत है।

संदीप नाईक,
स्वतंत्र टिप्पणीकार और सामाजिक कार्यकर्ता. 



Monday, October 23, 2017

प्यार ज़िंदा है तो सपने ज़िंदा है और इस पर सबका हक़ होना चाहिए - सीक्रेट सुपर स्टार


प्यार ज़िंदा है तो सपने ज़िंदा है और इस पर सबका हक़ होना चाहिए
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सपने देखने का हक़ सबको है और होना भी चाहिए क्योकि सपने देखना जीवन है और जीवन सबसे बड़ा होता है . यह बात बड़ी साधारण सी है परन्तु जब भावनाओं की चाशनी में लपेटकर बगावत के सुरों से सम्पूर्ण समाज को धता बताकर एक ऐसे चरित्र द्वारा कही जाती है जिसे हम स्त्री उपेक्षिता कहते है या जिसके लिए बेटी बचाओ और बेटी पढाओं के लम्बे चौड़े अभियान चढ़ाना पड़ते है तो यह बात बहुत गहराई से हमारे अंतस में धीरे धीरे समाती है और बरबस ही सिनेमा देखते हुए हम उस चरित्र, दृश्य और पुरे माहौल से एकाकार होने लगते है और अपने आसपास के परिवेश को सूंघते हुए यह शिद्दत से मानते है कि बात सही और प्रभावी ढंग से कही जा रही है.
दरअसल में आमिर खान एक प्रभावी अभिनेता, निर्देशक और सामाजिक सरोकार वाले व्यक्ति नहीं वर्ना एक चतुर सुलझे हुए राजनैतिक शख्स है जो समय, देश काल और परिस्थिति के अनुसार अपना रचा बुना हुआ बहुत माकूल मौकों पर परोसने में पारंगत है. गुजरात चुनाव के समय बगैर कोई रिस्क लिए या तीन तलाक का मुद्दा साफ़ बचाते हुए बेहद रूमानी अंदाज में कथानक बुनते है. स्त्री स्वातंत्र और खुलेपन की इस हवा में स्त्री विरोधी बात करना मुश्किल ही नही बल्कि बेहद पिछड़ेपन की भी निशानी है.
यह तब और भी मौजूं हो जाता है जब दुनिया की स्त्रियाँ #MeToo जैसे नारों के साथ अपने खिलाफ होने वाली हर तरह की हिंसा को बयान ही नही आकर रही बल्कि सामने आकर दास्ताँ भी बयाँ कर रही है, हालांकि फिल्म रिलीज़ होने के बाद यह मुहीम संभवतः शुरू हुई है पर आज जिस तरह से इसकी पहुँच और ताकत दुनिया भर में बढ़ी है और सोशल मीडिया पर इसकी हलचल से पुरुषवादी ताकतों और परम्परागत सोच वालों के दिलों दिमाग में खलबली मची है वहाँ “सीक्रेट स्टार” जैसी फ़िल्में भी एक तमाचा ही है खासकरके जिस समुदाय और संस्कृति , पुरुषप्रधान समाज के नजरिये से बनाई गई और अंत में एक अनपढ़ महिला पुरे तमाशे के साथ चोट करते हुए बगावत का रुख अपनाती है बगैर इसकी परवाह किये कि वह कल कहाँ रहेगी और कल क्या होगा मुम्बई जैसे शहर में रोज लोगों, प्रतिभाओं और भावनाओं को निगल लेता है. दो छोटे बच्चों जिनमे एक बेटी जो परिस्थिति वश या हिंसा को देखते सहते अपनी उम्र से पहले जवान और वयस्क हो गई और एक छोटा सा बेटा जो उम्र में तो छोटा है पर हिंसा के मायने प्यार के बारास्ते जरुर समझता है.
यह फिल्म किशोरवय में हमारे सम्पूर्ण पालन पोषण, शिक्षा की दरकार और मार्गदर्शन की ओर भी गंभीर इशारे करती है परन्तु इसके साथ ही एक अनपढ़ माँ का उन पढ़ी लिखी माताओं से बेहतर व्यवहार और परवरिश का भी उत्कृष्ट उदाहरण है जो तमाम प्रकार ही हिंसा को सहते हुए बच्चों के शौक, पढाई और उनके किशोरवय के प्यार को भी स्वीकृति देती है इतना ही नही बल्कि चिंतन के साथ कुल्फी खाने जाते समय कहती है “आज तेरे अब्बू अहमदाबाद गए है देर रात आयेंगे तो चिंतन के साथ घूम लें और शाम तक आना दस मिनिट में नही” यह उन लव जेहाद की मुहीम चलाने वालों पर एक बढ़िया तंज है जो मुस्लिम समाज को दायरों और सींखचों में देखते है या गलत दुष्प्रचार करते है. चिंतन का प्यार अप्रतिम है और हम सबके भीतर एक चिंतन होता है जो फिल्म देखते समय बाहर निकल आता है और बरबस ही रोने लगता है .
दरअसल में फिल्म बाकी सब सवालों के अलावा दीगर बातों का एक जखीरा है जो हमारे दकियानूसी समाज, सड़ीगली परम्पराएं और सोच को पोषित करते है. सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें लोग नामक बीमारी से आमिर बचा ले गए , जब परिवार मोहल्ला छोड़कर जा रहा है तब भी एक खामोश विदाई ही प्रतीकात्मक रूप से समाज के रूप में सामने आया है. स्कूल, बाजार, ट्यूशन और घर के बीच सिमटी फिल्म में जुम्मा जुमा दस बारह चरित्र है. एक दिन में बडौदा से मुंबई जाकर गाना रिकॉर्ड करके लौट आना थोड़ा अतिश्योक्ति है एक पंद्रह साला लड़की का पर बालीवुड का थोड़ा तडका लगाए बिना दर्शक भी नही मानता कि वह सौ रूपये देकर फिल्म देखने आया है.
अदभुत भावनाएं और सहज - सरल भाषा में लिखे संवाद, साधारण कपड़ो और साधारण माहौल में फिल्माई गई यह फिल्म इसलिए भी याद रखी जायेगी कि इसमें संगीत का जो पुट है वह इधर आई कई फिल्मों से श्रेष्ठ है और इसके लिए संगीत निर्देशक को बधाई देना होगी.
आमिर की अन्य फिल्मों की तरह यह फिल्म तारों – सितारों के बीच उन्होंने “ पी के” तो निश्चित ही नही बनाई है और इसके निहितार्थ समझने होंगे, उन्हें चौदह करोड़ के बदले तीन चार दिन में ही पर्याप्त लगान मिल गया है . एन चुनाव के पहले रिलीज होकर वे एक सन्देश भी देते है और एक साफ़ भूमिका से बचते भी है. जायरा वसीम में मै असीमित संभावनाएं देखता हूँ और उन्हें भारतीय फिल्म संसार में लम्बी रेस की घोड़ी मानता हूँ. (घोड़े का विपरीत घोड़ी ही होता है ना ) यह फिल्म देखी जाना चाहिए टेक्स फ्री होना चाहिए और लड़कियों को अनिवार्य रूप से दिखाई जाना चाहिए. जो लोग अपनी निजी कुंठाओं, अपराध बोध और अनुभवों के आधार पर इसकी निंदा कर रहे है उन पर सिर्फ दया की जा सकती है और कहा जा सकता है “गेट वेल सून”
मेरे हिसाब से फिल्म को पांच *****