Tuesday, December 26, 2017

राजनीति, सत्ता और संस्कृति के बरक्स साहित्य - - संदीप नाईक


राजनीति, सत्ता और संस्कृति के बरक्स साहित्य
-  संदीप नाईक
युद्धे , युद्धेवहे , युद्धामहे
(अर्थात मैं युद्ध कर रहा हूँ, हम दोनों युद्ध कर रहे है और हम सब युद्धरत है।)
-      प्रकाशकांत की एक कहानी से
राजनीति, सत्ता, संस्कृति और साहित्य पर लिखने से पहले हमें वैश्विक परिदृश्य को समझना होगा। तभी शायद हम समग्र दृष्टि से समकालीन भारतीय परिदृश्य को जान सकेंगे। क्योंकि वर्तमान समय की बहुलतावादी राजनीति ने विश्व के जनमानस और समुदाय को बृहद स्तर पर प्रभावित किया है। यह प्रभाव आर्थिक स्तर से होता हुआ समाज, व्यवहार, संस्कृति और अंत में साहित्य पर अपनी छाप छोड़ रहा हैं। अगर देखा जाये तो बीते हुये समय में जिस तरह तानाशाही ताकतों और सवर्णवादी शक्तियों ने अपनी बेजा हरकतों से दुनिया में बदलाव और विकास के नाम पर विध्वंस का तांडव रचा है, वह बेहद चिंताजनक है। संयुक्त सोवियत रूस के विघटन के बाद वैश्विक शक्ति के नाम पर शेष एक मात्र देश अमेरिका में पिछले समय में हुए राष्ट्रपति के चुनाव पूर्व, चुनावों के दौरान और अब जिस तरह का माहौल बदला है वह बहुत मायने रखता है। अमेरिका की नीतियों से लेकर विश्व के छोटे देशों के साथ जो व्यवहार हुआ है वह यह दर्शाता है कि हम कहाँ थे, कहाँ है और कहाँ होगे? इसी क्रम में भारत में सन् 2014 के बाद का पूरा भारतीय परिदृश्य भी बदला है। भारत में तेजी से एक भयावह संक्रमण से गुजरते जा रहे समाज में जो कुछ घटित हुआ वह यह समझने के लिए पर्याप्त है कि भारत की तस्वीर कैसी उजली होने वाली है? शाईनिंग इंडिया से लेकर ‘इनक्रेडिबल इंडिया’ के नारों की गूँज के बीच मीडिया और संस्कृति का ह्रास होता गया है और एक प्रवृत्ति विशेष को थोपने के जो कुत्सित प्रयास चल रहें है वे बेहद चौकाने वाले हैं। यह सिर्फ इसलिए नहीं कि यहाँ समाज में बदलाव विकास के नाम पर हो रहे हैं। विकास के नाम पर भारत के बहुसंख्य दलित और पिछड़े वर्ग को हाशिये पर धकेला जा रहा है। अत्याचार सुसंगठित और राज्याश्रय पर हो रहे हैं। अल्पसंख्यकों को सुनियोजित तरीके से निपटाया जा रहा है या पुरस्कार वापसी गैंग को भी अब सी.बी.आई. जैसी एजेंसियों के माध्यम से जांच के घेरे में लाकर मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का खेल खेला जा रहा है। यह संभवतः दुनिया के इतिहास में पहली बार हो रहा होगा कि देश के बुद्धिजीवी वर्ग को निशाना बनाकर सत्ता ने अपने लिए सुरक्षा के घेरे बढ़ा लिए हो।
विश्व के परिदृश्य पर नजर गड़ाकर देखेंगे तो पता चलेगा कि पूरी दुनिया में यह बेहद उठापटक और खलबली मचने वाला समय रहा है। जिसे साधारण भाषा में हम संक्रमण कह सकते हैं। परन्तु इस संक्रमण काल में इतिहास में कभी ना घटित हुई घटनाओं ने समूची मानवता को प्रभावित किया और एक बेहतर दुनिया को देखने का महास्वप्न भंग होने लगा है। इन षडयंत्रों को जानने के लिए निश्चय ही हिन्दी या विश्व की किसी भी भाषा का साहित्य एक दृष्टि प्रदान करता है। सन 1991 में गोर्बाच्योव के ग्लास्तनोस्त और पैरेस्त्रोईका ने जिस तरह से रूस का खात्मा किया, वह बहुत ही कठिन समय था जिससे सदी का महास्वप्न भंग हुआ है ऐसा यह मेरा मानना है। ठीक इसी समय से दुनिया के परिदृश्य पर एक नजर डालें तो हम देखते हैं  कि उदारवाद, सुधारवाद और वैश्विकीकरण के दौर में श्रमजीवी समुदायों को हाशिये पर धकेलने का काम बहुत सुसंगठित तरीके से किया जाने लगा था और एक संघर्षशील वर्ग को धीरे-धीरे पूरे विकास से हटाने का काम किया गया। जिस पूंजी को एक अभिशाप मानकर एक नई दुनिया देखने का स्वप्न हमने संजोया था, वही पूंजी राजनीति पर हावी होती गयी और अंततः सर्वोपरि हो गई। नए उद्योग घरानों का प्राकृतिक संसाधनों पर सत्ता के साथ मिलकर उदय और फिर पूरी दुनिया से सर्वहारा वर्ग के हकों, लड़ाईयों और ट्रेड यूनियनों को सिरे से नकार कर ठेकेदारी प्रथा के मार्फ़त मानव श्रम को हांकना, टास्क आधारित काम पर पूंजी का वितरण आदि भी इसी वर्ग की एक चाल थी। मजदूरों को ना मात्र खत्म किया गया बल्कि उन्हें ज़िंदा रहने के लिए भी नहीं छोड़ा। अमेरिका और रूस की द्वीध्रुवीय व्यवस्था के ख़त्म होने के बाद जन विश्व संस्था के रूप में यु.एन.ओ. जैसे संगठन एकाएक ताकत बनकर उभरे और इन्होंने रूस के खात्मे के बाद अमेरिका के बढ़ते वर्चस्व को विश्व में स्थापित किया। यहाँ तक कि एक ठोस उदाहरण से अपनी बात कहूं तो ईराक पर किया गया हमला बगैर सहमति के किया गया और सिर्फ तेल पर अपना दबदबा कायम करने के लिए हजारों जानें ली गयी। इसी से दुनिया में तेल की राजनीति पनपी जिसने कालान्तर में दुनिया भर में रिसेशन या मंदी थोपी जिसका नुकसान ज्यादातर गरीब मुल्कों पर हुआ जो संसाधनविहीन थे। इस मंदी में इन्हें अपना सब कुछ बेचना पड़ा। भारत जैसे देश को अपना सोना भी गिरवी रखना पड़ा है।
नब्बे के बाद विश्व फलक पर तेजी से बदलते रहे परिदृश्य के दौरान दुनिया के इतिहास में सभ्यताओं के संघर्ष बढ़ गये जो अपने आप में बेहद रोचक, डरावने और बहुत कुछ सिखाने वाले रहे हैं। दक्षिण एशिया में उभरे गुट निरपेक्ष आंदोलनों की महत्ता ख़त्म हो गयी और एशियाई देशों के सामने चुनौतियां अपने पड़ोसी मुल्कों और गरीब देशों से ही मिलने लगी। लिहाजा वे अपनी सारी ताकत बनिस्बत विकास, गरीबी, बेरोजगारी या महिला समानता, दलित और वंचित लोगों की भलाई करने के नामपर आपस में ही लड़कर ऊर्जा और संसाधन ख़त्म करने लगे। जिससे वे खुद लगातार गरीब होते चले गए। गृह युद्धों की स्थिति में जी रहे इन देशों के सामने अमेरिका के समक्ष घुटने टेकने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा और अमेरिका अपने हथियार बेचने के लिए एक से दूसरे मुल्क में यात्राएं करता रहा। अमेरिका किसी सिद्धहस्त खिलाड़ी की तरह बाजार में अपने प्रोडक्ट परोसता रहा और दुनियां के बाजार में छा गया। उसने दूसरे देशों के स्थानीय उद्योग धंधों को ख़त्म कर अपना वर्चस्व स्थापित कर की चाल चली। उत्तरशती में हमने यूरोप के राजनैतिक नक़्शे में हुये बदलाव को भी देखा है। जहां एक ओर दोनों जर्मनी का एकीकरण हुआ और सीमाओं की दीवारें टूटकर गिरी। वही युगोस्लोवाकिया, चेकोस्लोवाकिया और सोवियत संघ जैसे देशों का या शक्तियों का विघटन हुआ जो कि बहुत चिंतनीय था। परन्तु बदलती अर्थ व्यवस्था और राजनैतिक ध्रुवीकरण के समय में कही से कोई आवाज उठाने वाला नहीं था। इसका असर अभी तक मौजूद है। हाल ही में एक छोटे से देश को विश्व मुद्रा कोष ने खरीदने की बात की थी परन्तु अच्छी बात यह थी कि जन मानस ने पूरे जनमत के साथ इसे नकार दिया।
विश्व में हो रही उथल-पुथल के दौरान अगर भारतीय परिदृश्य पर एक नजर डालेंगे तो पता चलता है कि भारत जैसा देश भी वैश्विक आघातों से अछूता नहीं रहा है। पिछली सदी के अंतिम कुछ वर्षों में लगभग पचास साल की आजादी के बाद देश ने करवट बदलना शुरू किया था और यहाँ के लोग जब आजादी का मतलब समझ ही रहे थे कि आर्थिक मंदी ने उनके जीवन पर प्रभाव डालना शुरू किया और सब कुछ तहस-नहस हो गया। यह बहुत पुरानी बात नहीं है जब डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि “लम्हों ने खता की है और सदियों ने सजा पाई है” लिहाजा देश को गिरवी रखकर आर्थिक सुधार करना होंगा। विश्व बाजार को अपने आँगन में बुलाकर मिश्रित अर्थ व्यवस्था के मॉडल को हमने एक झटके में तोड़ दिया। उदारवाद की बयार में छोटे मोटे लोग बह गए और एक ग्लोबल विश्व और मॉल संस्कृति की चकाचोंध भरी दुनिया उभरी। इस नई संस्कृति ने मध्यमवर्ग को लुभावने सपने दिखाकर संघर्ष की चेतना को सिरे से खत्म कर दिया। इस समय में मिश्रित या यूँ कहें कि गठबंधन की सरकारों का दौर शुरू हुआ जिसने समूचे राजनैतिक ढाँचे को एक अजीब स्थिति में ला खड़ा किया। इस गठबंधन से ना मात्र आर्थिक बदलाव करना पड़े बल्कि सामाजिक और राजनैतिक बदलाव एक अनिवार्य तत्व की तरह से आये जिसने भारतीय विकास के सोपान में नये अध्याय लिखना आरम्भ किया। इस उथल-पुथल भरे समय में ही हमने मिश्रित अर्थ व्यवस्था की विदाई की और मध्यप्रदेश जैसे राज्य के एक छोटे से जिले बडवानी से उभरे नर्मदा आन्दोलन ने विकास और विनाश के प्रश्न उछाले। इससे जमीनी आन्दोलनों से पूंजी का जहां महत्त्व बढ़ा वही पूंजी के प्रति एक नफ़रत भी समाज ने देखी। पूंजीविहीन समाज का एक बड़ा तबका सामने आया और बेहद प्रतिबद्धता से जमीनी आन्दोलनों में नेतृत्व के रूप में उभरा। फिर एक बार नक्सलवाद, माओवाद, एक्टिविज्म को परिभाषित किये जाने की मांग उठी। ठीक इसके विपरीत जातिगत ध्रुवीकरण और हिन्दू-मुस्लिम शक्तियों के कारण समाज में कमजोर और वंचित समुदाय को लगातार हाशिये पर धकेला गया। इस साम्प्रदायिकता में सबसे ज्यादा नुकसान गरीब और शोषित वर्ग का हुआ। इसी के साथ-साथ राजनीति में दलित और हाशिये के वंचित वर्ग ने अपनी जगह बनाई। इनकी राजनीति और निर्णय में बहाली भी इसी दौर की उपज है। दूसरा संदर्भ देखें तो यह समय भारतीय समाज के ध्रुवीकरण की शुरुआत का समय भी है। भारतीय समाज एकरूप समाज के लिए जाना जाता रहा है। हिंदी की महत्त्वपूर्ण ‘पहल’ पत्रिका तो इस देश को महादेश कहती है और इस महादेश में तो कहा जाता है कि कई समय और कई समाज एक साथ रह रहे हैं। इतने बड़े समावेशी समाज में ध्रुवीकरण खतरनाक होता है जैसे कि हम देखते हैं कि उत्तरशती का जो आख़िरी का समय है वह समाज को अधिक से अधिक ध्रुवीक्रत करने वाला रहा है। इस समावेशी समाज में धर्म, सम्प्रदाय और जातियों के ध्रुवीकरण लगातार हो रहे हैं। हिन्दू अधिक हिन्दू हो गया है और मुसलमान अधिक मुसलमान हो गया है। इनके रंग-ढंग भी अलग-अलग दिखने लगे हैं। यदि कोई जाति अपनी संस्कृति का निर्वाह करती है तो कोई बुराई नहीं है लेकिन वह दूसरी जाति के विरुद्ध कुछ क्रियाकलाप करती है तो यह खतरनाक है। इसी तरह एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के ख़िलाफ़ सिर्फ़ यह दिखाने के लिए खड़े होते है कि हमारा धर्म श्रेष्ठ है। यह धर्मांधता मनुष्यता के लिए घातक है। ध्रुवीकरण की यह प्रवृत्ति मनुष्यता के लिए बहुत घातक है। इस तरह उत्तरशती ही हमारे लिए मनुष्यता का सबसे बड़ा संकट भी लेकर आई जिसमें भारतीय समाज ज्यादा से ज्यादा ध्रुवीक्रत हो गया। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव उन समाजों पर ज्यादा पड़ा जो हाशिये पर थे और धीरे-धीरे मुख्यधारा में आने का प्रयास कर रहे थे। फलस्वरूप हाशिये के समाज और ज्यादा हाशिये पर चले गए। इससे साहित्य को बहुत नुकसान पहुंचा है। क्योंकि साहित्य समाज के भीतर मनुष्यता पैदा करता है और जीवन के पक्ष में खड़ा होता है। मनुष्यता और जीवन पर जो खतरे हैं वे हमारे साहित्य और संस्कृति के भी बड़े खतरे हैं। सोवियत रूस के पतन के बाद जो परिस्थितियाँ बहुत तेजी से बदली और अमरीका को खुलकर अपनी मनमानी करने का मौका मिला उससे भारतीय मानस भयाक्रांत हुआ था जिससे उभरने के लिए साहित्य ने नई चेतना पैदा की है और एक वैकल्पिक समाज की कल्पना करते हुए मनुष्यता का पक्ष प्रबल किया है। अगर देखा जाये तो सबसे ज्यादा उत्तरशती की कविताओं में अमेरिका के आर्थिक एवं सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का पुरजोर विरोध मुखर हुआ है। अमेरिका जैसे देशों की अतिवादी और दोहरी राजनीति के ख़िलाफ़ लिखा ही नहीं गया बल्कि इनके ख़िलाफ़ प्रदर्शन भी किये गये हैं।
समाज को विकल्पहीन बनाने में साम्राज्यवाद और पूंजीवाद दोनों ने महती भूमिका निभाई है। जीवन और मनुष्यता को बचाने के लिए जहाँ एक साहित्य अपना काम कर रहा था, वहीं दूसरी और समतामूलक समाज के स्वप्न को ख़त्म करने और वर्गीय समाज बनाने की कोशिशें भी जारी रही है। नब्बे के बाद बार-बार यह कहा जाने लगा था कि ‘विचारों का अंत’ हो गया है और इसी तरह ‘इतिहास का अंत’ भी हो गया है। असल में यह विचार संभ्रम निर्मित करनेवाले रहे है। इसे दोहराने के पीछे की मंशा यह थी कि हमारे लिए अब कोई विकल्प नहीं बचा है। जो एक ही विकल्प बचता है वह पूँजीवाद है। इसका परिणाम यह हुआ कि तीसरी दुनिया के विकासशील देशों में जहाँ कहीं वैकल्पिक समाज के खड़े होने की संभावना बन रही थी वह ख़त्म हो गयी। समाजवादी विचारक किशन पटनायक कहते थे कि ‘ये दुनिया कभी भी विकल्पहीन नहीं हो सकती’। ऐसे में यह सवाल उठता है कि यह भ्रान्ति कौन फैला रहे हैं? दरअसल ये वही पूंजीवादी और साम्राज्यवादी ताक़तें हैं जो इकहरी और विकल्पहीन दुनिया बनाना चाहते हैं। ये तीसरी दुनिया के देशों को अपना क्लोन बनाना चाहते हैं। जबकि विकल्प हमेशा से रहे हैं और रहेंगे। इसी से मनुष्य का विकास होता है और होता आया है। हमारी संस्कृति और साहित्य भी इन विकल्पों को बचाने की जद्दोजहद है। साहित्य हमारे सामने कई विकल्प प्रस्तुत करता है ताकि एक अच्छे और सभ्य समाज का निर्माण किया जा सके।
साहित्य के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण उत्तरशती की कहानियाँ रही है। इस समय में हिन्दी की चार पीढियां बराबरी से सक्रीय थी। बहुत प्रतिबद्धता से चार पीढ़ियों का एक साथ समान रूप से सक्रिय रहना हमें निकट इतिहास में कही देखने को नहीं मिलेगा। यहाँ तक की क्षेत्रिय भाषाओं में भी ऐसा बिरला उदाहरण देखने को नहीं मिलता है। हिंदी में निर्मल वर्मा, भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वैद, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, मोहन राकेश से लेकर संजीव, राजेन्द्र दानी, उदय प्रकाश, प्रकाशकांत, हरी भटनागर, संजीव ठाकुर, भालचंद्र जोशी आदि कई लेखकों ने बेहद सक्रीय होकर कहानी लेखन किया है। इन्ही के साथ-साथ साठोत्तरी पीढ़ी के सक्रीय दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, रविन्द्र कालिया जैसे कहानीकार भी सक्रीय रहे हैं। जीतेन्द्र भाटिया, रमेश उपाध्याय, मृणाल पांडे, गोविन्द मिश्र, स्वयंप्रकाश, सत्येन कुमार, पंकज बिष्ट, मन्नू भंडारी, रमाकांत श्रीवास्तव आदि प्रतिबद्ध और गैर प्रतिबद्ध दोनों प्रकार के साहित्यकार भी साहित्य सृजन में सक्रीय दिखाई देते हैं। इन चार पीढ़ियों की सघन और रचनात्मक यात्रा में कहानी कई तरह के धरातलों पर चल रही थी। जहां एक ओर राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और भीष्म साहनी, ज्ञानरंजन कहानी को अपने अनुभवों से परिभाषित कर रहे थे, इनके द्वारा नई कहानी की संरचना पर बात हो रही थी वही कहानी के मूल स्वर में महास्वप्न के भंग की आहट हिन्दी में भी बनी हुई थी। नई दुनिया के स्वप्न भंग होने की बात कहानी ने भारत की आजादी के दो दशकों में ही भांप ली थी और इसी तर्ज पर एक भयावह  दुनिया का मंजर कहानी में सामने आने लगा था। औद्योगिकीकरण और तेजी से बढ़ाते जा रहे शहरीकरण के कारण परिवारों का जो विघटन हो रहा था उससे उभारने में कई कहानीकार सफल रहे हैं। इनकी सृजनात्मकता इक्कीसवीं सदी में भी जारी रही है। समाज में जमीनी आन्दोलनों से उभरे मुद्दों ने हिंदी कहानी को प्रभावित किया है। वीरेन्द्र जैन के उपन्यास डूब ने विस्थापन जैसे मुद्दे को उभारा वही उनकी दर्जनों कहानियों ने भारत में फैलते बेरोजगारी के मुद्दे को एक चिंतन के रूप में मुखर किया है जिसने एक बड़े युवा वर्ग को प्रभावित किया और साहित्य से भी जोड़ा है। बढ़ता तथाकथित मध्यमवर्गीय समाज का इस दौर में बढ़ना भी एक संकेत के जैसा है जो अपनी महत्वकांक्षाएं बढाता जा रहा है। उसे लगता है कि बदलाव का यही शार्ट कट सही है जहां उसे ना लम्बी कतार में लगना है, ना इंतज़ार करना है। जेब में अगर रुपया है तो वह दुनिया की हर सुविधा भोग सकता है, खरीद सकता है। मध्यवर्ग के लिए संसार में हर चीज बिकाऊ है। यहाँ तक की साहित्य की मूल संवेदनाएं भी वह खरीद सकता है।  चकाचौंध की दुनिया से प्रभावित मध्यवर्ग हमारे सामने हैं और अब वह सवाल नहीं खोजना चाहता। वह सिर्फ विन विन के सिद्धांत पर जीना चाहता है और बाजार के ट्रेप में, किश्तों के जाल से दुनिया की हर सुविधा को अपने लिए हर कीमत पर हासिल करना चाहता है।
भूमंडलीकरण के इस दौर में कुछ साहित्यकारों ने बाजारवाद एवं उदारीकरण से आ रहे परिवर्तनों की पड़ताल भी की है। इस सन्दर्भ में स्वयंप्रकाश की चर्चित कहानी ‘मंजू फ़ालतू’ उल्लेखनीय है। इस दौर की महत्वपूर्ण समस्या साम्प्रदायिकता को केंद्रीय तत्व बनाकर कई लेखकों ने सृजन किया है। इस संदर्भ में अजगर वजाहत से लेकर  प्रकाशकांत तक के कई लेखक महत्वपूर्ण है। परन्तु इस मुद्दे पर अखिलेश की कहानी ‘अगला अन्धेरा’ इतिहास में उल्लेखनीय रही है। जहाँ ‘और अंत में प्रार्थना’ जैसी कहानी लिखकर उदय प्रकाश ने समाज, सत्ता, परिवर्तन और संवेदना को एक नया अर्थ दिया, वही प्रियंवद ने ‘बूढ़े का उत्सव’ तथा ‘खरगोश’ जैसी कहानियां लिखी है जो संवेदना के स्तर पर एक अलग तरह का अर्थ ग्रहण करती है। नब्बे के बाद की हिन्दी कहानी में संवेदना दो स्तरों पर देखी जा सकती है- एक नागर संवेदना और दूसरी ग्रामीण संवेदना। नागर संवेदना के तहत निर्मल वर्मा, उदय प्रकाश, जया जादवानी, एस आर हरनोट आदि ने बेरोजगारी, शहरीकरण, एकाकीपन, त्रासदी, प्रेम से उभरी और खत्म हुई त्रासदियों को उभारा है। ग्रामीण संवेदना की कहानियों में गाँव की मूल समस्याएं, बेरोजगारी, विस्थापन, जमीन से बेदखली, खेती की जमीन पर कल कारखानों का उग आना आदि कई मुद्दे उभारे गये हैं। ग्रामीण संवेदना को पुन्नी सिंह, संजीव, महेश कटारे, कुंदन सिंह परिहार, प्रकाशकांत, अखिलेश आदि कई लेखकों ने अपनी कहानियों में दर्ज किया है। संजीव ठाकुर की कहानी ‘झौआ बेहार’ ग्रामीण संवेदना की सशक्त कहानी है जिसमें शहर में आये एक युवा के अस्तित्व खो जाने की विडम्बना मौजूद है। कहानी के क्षेत्र में नये सिरे से प्रस्तुत हुई दलित-आदिवासी संवेदना भी विशेष मायने रखती है। विशेषकर दलित-आदिवासी समाज की चिंताएं ‘युद्धरत आम आदमी’ जैसी कई महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों में मुखर हुई है। इसके अलावा हंस, वागर्थ, आजकल, पश्यंती, सारिका, गंगा, समकालीन जनमत आदि पत्रिकाओं ने भी आमजन पर केन्द्रित अंक निकालकर नए समाज का स्वप्न देखा है। नब्बे के बाद साहित्य के क्षेत्र में विशेषकर कहानी लेखन में दलित और स्त्री विमर्श भी मुख्य रूप से उभरकर आये जिसने जनमानस की संवेदनाओं को प्रभावित किया है। ओम प्रकाश वाल्मिकी, मोहनदास नैमिशराय, विमल थोरात, तुलसीराम, जयप्रकाश लीलवान, द्वारका भारती, दयानंद बटोही, कैलाश वानखेड़े, अजय नावरिया आदि कई लेखकों-आलोचकों ने कविता के साथ-साथ कहानियाँ लिखकर दलित चेतना को मुखर किया और मनुष्यधर्मी चिंतन को सामने लाया है। कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, रमणिका गुप्ता, मैत्रेयी पुष्पा, नासिरा शर्मा, मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल, अनामिका, नीलेश रघुंवंशी, लवलीन, जया जादवानी, प्रभा खेतान, मनीषा कुलश्रेष्ठ, मेहरुनिसा परवेज आदि लेखिकाओं ने स्त्री अस्मिता एवं चेतना को मुखर करके विमर्श की धारा विकसित की है। इस स्त्री विमर्श ने साहित्य के द्वारा स्त्री संबंधों की पड़ताल, स्त्री स्वतंत्रता, मुक्ति की आकांक्षा को नये संदर्भो से व्याख्यायित किया है। सीमोन-द-बोऊवार को एक बार फिर से व्याख्यायित किया, खारिज किया और फिर  स्वीकार भी किया है।
समकालीन समय तक आते-आते हिन्दी कविता एक लंबा रास्ता पार कर चुकी थी। कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, चंद्रकांत देवताले, विनोद कुमार शुक्ल आदि कई कवि अपनी कविता को एक नई जमीन पर ला चुके थे। समकालीन कविता हमारे समय की सबसे सचेत कविता है। इन कविताओं ने समय की चिंताओं को सबसे ज्यादा पकड़ा। इस समय की हिंदी कविताएँ ही नहीं बल्कि भारतीय कविताओं की भी यही चिंता रही है। एक ही समय में भारतीय कविता चाहे वह किसी भी प्रादेशिक या क्षेत्रीय भाषा की क्यों न हो उनकी चिंता भी इसी समय को लेकर रही है। क्योंकि कविता कभी भी अपने समय से विमुख नहीं होती है। भारतीय कविताओं ने इस समय को लेकर जो प्रतिरोध दर्ज किया उसका उजला पक्ष यह है कि वैचारिक रूप से इन भाषाओं की कविताओं ने एक दूसरे को भी समृद्ध किया है। समकालीन समय में तेजी से राजनैतिक घटनाक्रम बदले हैं। इसी कारण यह बेहद घटना प्रधान समय भी रहा है। इसी के चलते भारत दुनिया के नक़्शे पर तेजी से उभरा भी है जिस पर सभी ध्यान देने लगे हैं और हमारी बातें सुनी भी जाने लगी है। इसकी गूंज हिंदी कविता में सुनी जा सकती है। हिंदी कविता उन क्षेत्रों में भी लिखी जा रही है जो भारतीय क्षेत्र नहीं है। राष्ट्रवाणी पत्रिका जो महाराष्ट्र से प्रकाशित होती थी जिसमें हिंदी के लेखक बहुतायत में प्रकाशित हुए। मुम्बई से निकलने वाली कई हिंदी पत्रिकाएं जैसे- धर्मयुग, सबरंग आदि में भी कई कविताएँ प्रकाशित है। कोलकाता से वागर्थ जैसी पत्रिका आज भी निकल रही है। इन सभी पत्रिकाओं में हमारे समय की चिंता मुखर हुई है। यही चिंताएं भारतीय कविता में भी देखी जा सकती है।
हमारे समय में कविता की पृष्ठभूमि को देखेंगे तो एक विशेष बात दिखाई देती है और वह है अपने समकाल और समस्याओं की अभिव्यक्ति। आलोक धन्वा, वेणुगोपाल जैसे कवि अपनी कविता में जिस आक्रामक तेवर में दिखाई देते हैं, वह अपने पूर्ववर्ती धूमिल की याद दिलाते हैं। धूमिल ने लिखा है- “कविता भाषा में मनुष्य होने की तमीज है।” आलोक धन्वा की ‘गोली दागो पोस्टर’ जैसी कविताएँ एक ख़ास तरह के बदलाव को इंगित करती है। अर्थात् कविता में विषयों की बहुलता के साथ-साथ कवियों के स्वर भी विविधता लिए हुए हैं। जिसमें हर वर्ण और वर्ग के साथ-साथ विभिन्न पेशों से जुड़े स्त्री-पुरुष अपनी विशिष्टता के साथ अपनी बात या अपने जीवनानुभव कविता में लेकर आये हैं। आज हमारे सामने समकालीन कविता कई रूपों में हैं। हमारे पूर्ववर्ती कवियों के प्रतिरोध के स्वर इधर के दिनों में धारदार हुये है। अगर जोखिम उठाने वाले पुराने कवियों के कविकर्म को देखेंगे तो पता चलता है कि पंजाबी में लिखनेवाले पाश तथा हिंदी के मानबहादुर सिंह जैसे कई कवियों की हत्याएं हुई। त्रिलोचन, नागार्जुन, शमशेर, रघुवीर सहाय, धूमिल, मुक्तिबोध जैसे कई कवि हैं जिनकी गूंज आज भी बहुत दूर तक सुनी जा सकती है। वे वर्तमान कविता के मार्गदर्शक है। इधर के दिनों में लिख रहे नए कवियों के समक्ष नए संकट और चिंताएँ है जिसका जिक्र समाज में चल रहे संघर्षों के साथ-साथ कविताओं में आ रहा हैं।  समकालीन कविता को जब हम देखते हैं, तो उसमें राजेश जोशी, लीलाधर मंडलोई, कुमार अम्बुज, देवी प्रसाद मिश्र, बद्रीनारायण, जितेन्द्र श्रीवास्तव आदि कई महत्वपूर्ण कवियों ने अपनी निजता और सामाजिक सरोकारों को बहुत गहरे ढंग से एक विशेष प्रकार की यथार्थपरक दृष्टि के साथ मुखर किया है। इस नई सदी में वसंत सकरगाये, बहादुर पटेल,  अशोक कुमार पाण्डेय, निशांत, अरुणाभ सौरभ, उमाशंकर चौधरी, शिवदत्त वावलकर, सुजाता, विमलेंद्र त्रिपाठी आदि कई कवियों ने कविता में सामाजिक सरोकारों के निर्वाह का अगला चरण शुरू किया हुआ है। मनुष्य की चिंता को लेकर अभी भी सबसे ज्यादा संभावनाशील विधा कविता है। इस बदलते हुए समय में बड़ी तेजी से सामाजिकता आहत होने लगी है और मनुष्यविरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया जाने लगा है। इसीलिए इसके प्रतिपक्ष में खड़े होकर कविता के मार्फ़त मनुष्यधर्मी संवेदनाओं संवारने का कार्य विभिन्न पत्रिकाओं के कविता केंद्रित कई विशेषांक प्रकाशित करके किया जा रहा है।
इधर के दिनों में हमारे देश की स्थिति गृह युद्ध से ज्यादा घातक है। हर जगह जाति, वर्ग, वर्ण, राजनीति, अर्थ और वर्चस्व के मुद्दों पर हिंसा हो रही है। सबसे घातक इस समय में सत्ता पर आसीन वर्चस्ववादी ताकतों के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठ रही है। जबकि एक बार अपने वक्तव्य में भूतपूर्व महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी जी ने कहा था कि ‘जनता ने सवाल पूछने चाहिए’। सत्ता के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति और सत्ता में बैठे लोगों से सवाल होना चाहिए, खासतौर पर ऐसे समय में जब सबसे ऊंची आवाज में बोलने वालों के शोर में असहमति की आवाजें डूब रही हैं! हमारे देश में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद उभर हुई राजनीति और पिछले तीन वर्षों से आई सत्ता ने देश के जनमानस को बहुत प्रभावित किया है और इससे राजनीति भी प्रभावित हुई है। निष्पक्ष और तटस्थ भाव से देखा जाये तो अनुशासनात्मक आचरण वाली कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं है तथा सत्ता व्यक्तियों पर केंद्रित होकर रह गई है। यह समाज के लिए नुकसानदायक है। समय रहते ही यदि तानाशाही और व्यक्ति केंद्रित सत्ता को नियंत्रित नही किया गया तो अगले दस सालों में अनुशासन की सीमा ख़त्म हो जायेगी और लोग बगावत पर उतर आयेंगे। उसके बाद सबका राजनीतिक अस्तित्व खतरे में होगा। इसकी अनगुंज अभी से धीरे-धीरे साहित्य में उठने लगी है। मतलब राजनीति और सत्ता के प्रतिपक्ष में साहित्य अपना प्रत्याख्यान प्रस्तुत कर रहा है।
वैसे देखा जाये तो हिन्दी साहित्य जगत फूहड़, छिछोरे, नाटकबाज और तथाकथित विचारधाराओं को ओढ़कर चलने की नौटंकी वालों से भरा पड़ा है। कुछ लेखकों एवं आलोचकों द्वारा रोज नया विचार गढ़ा जाने लगा है। यह सिर्फ और सिर्फ प्रसिद्धि (?) पाने के लिए और अपनी कुंठाएं निकालने के लिए किया जा रहा है। रही सही कसर फेसबुक जैसा सोशल मीडिया पूरी कर रहा है। आये दिन मेरे पेज को लाईक करों, मेरा स्टेटस शेयर करो, मेरे स्टेटस पर कमेन्ट करों, मेरी किताब मंगवा लो, मेरे वाल पर टिप्पणी करो, मेरे चित्र देखो आदि बीमारी से हिन्दी के बड़े नामी गिरामी कवि, कहानीकार और उपन्यासकार ग्रस्त है। कई लोग इसी कुंठा में मर रहे हैं। विचारधारा वाट्स एप जैसे माध्यम पर भी लड़ाई का शक्ल ले चुकी है और वहां भी रूठना-मनाना और छेड़ना जैसे मुद्दे जोर पकड़ रहे हैं। इससे रचनात्मकता मर रही है और नये नये साहित्यिक राजनीति के अखाड़े बन रहे हैं। कोई वरिष्ठ लेखक कुछ कहता है और उसका अर्थ कोई और लिया जा रहा है। कई साहित्यकार आपस में ही दोषारोपण करने लगे हैं। इससे निजात पाने की आवश्यकता है। आजकल  तो हो यह रहा है कि बात बात पर किसी साहित्यकार या बुद्धिजीवी को धमकाया जा रहा है। किसी को पाक भेजने की धमकी मिल रही है तो किसकी दिन-दहाड़े हत्या की जा रही है। इस पर अगर इंसानियत के तर्ज पर सोचा जाये तो जो हो रहा है वह समूची दुनिया और मानवता को कई सदियाँ पीछे ले जाने के जैसा है। इस आपाधापी के समय में शिक्षा, स्वास्थ्य, जल, जंगल, जमीन, कुपोषण, भूख, बेरोजगारी और विकास के महत्त्वपूर्ण मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं। सत्ता की कुर्सी को बचाये रखने के लिए अवसरवाद को हवा दी जाने लगी है। इस कठिन समय में अपने परिवार को पालने और ज़िंदा रखने के लिए कड़ी मेहनत करने वालों के जीवन  संघर्ष और जद्दोजहद बढ़ रही है। लम्पट, लठैत और गुंडे मवाली जब सत्ता में आते हैं तो भाषा का सबसे पहले चीर हरण होता है। यह सब दुखद है कि एक सबसे बड़े लोकतन्त्र में भाषा का उचित इस्तेमाल करना भी हम सीख नहीं पा रहे हैं। हमारी संस्कृति बदल रही है और साहित्य के अपने गुट और खेमे बने हुये हैं जहां रोज नया कुछ बनता बिगड़ता है। अगर आपके मन में पूंजी के लिए अदम्य लालसाएं जोर मारती हो, अगर आप सबसे सौहार्द्र की बात करते हुए भयानक तानाशाह है तो आप अच्छे लोकप्रिय और चर्चित साहित्यकार कैसे हो सकते हैं। ज्ञानपीठ, ऑस्कर, बुकर और नोबल तथा बाकी छोटे-मोटे पुरस्कार, प्रमाणपत्र, प्रशस्तियाँ और अमीक्षा-समीक्षा तो यूँही मिल जाती है। बस अपनी रीढ़ की मजबूती को मरोड़ना और बिछने की कला में पारंगत होना होगा। दरअसल पीड़ा वहाँ से शुरू होती है जब आपके अंदर बरसों का जमा मवाद साहित्य बनकर कुंठा के रूप में फूटता है और आप प्रतिबद्ध, पंक्तिबद्ध और छंदयुक्त बनकर सबको एक सिरे से नकारने के लिए किसी एक विधा पर सवार होकर विश्व के पुरस्कारों को फतह करने की आस में निकलते हैं। इन स्थितियों में हम ये भूल जाते हैं कि जिस सरजमीं से रेंगना सीखा था, उसे दलदल बनाकर वही एक वटवृक्ष बनने का स्वप्न संजो लेते है जिसके नीचे पौधे तो दूर, दूर्वा का एक हरित तिनका भी सांस ना ले सकें! आजकल तो साहित्य की मंडी में छपास की भूख वालों की तमन्ना पूरी हो रही है। इस मंडी सजायी गयी किताबें चुपचाप अपने जिस्म रुपी पन्नों को लहराते बिखराते और इंतज़ार करने लगी है कि उन्हें कोई ग्राहक मिल जाये। प्रकाशक और लेखक के दुःख दर्द, लेखकों की आपसी होड़, जलन, ईर्ष्या, और अपने ही साथ के लेखकों को गड्ढे में धकेले जाने के भयानक षड्यंत्र होने लगे हैं। साहित्य का पूरा माहौल रणनीति और राजनीति में बदल रहा है। इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार करके संभावना की तलाश करने की आवश्यकता है।
साहित्य की उपादेयता को लेकर एक सवाल जिज्ञासावश उभरता है कि सिर्फ कविताओं और कहानियों से क्रान्ति हो पाती तो पाश की ह्त्या कैसे हुई? गोरख पाण्डेय और दुष्यंतकुमार ने आत्महत्या ही क्यों की थी? साहित्यकार कविता, कहानी और साहित्य में क्रान्ति की बातें कर सकते हैं। वे लोक जीवन, भाषा और बोलियों के मिथकों का दोहन और शोषण करके खूब पुरस्कार, यश, नाम और कीर्ति भी छीन-छानकर अपने खाते में बटोर सकते हैं। लेकिन क्या वे वास्तविक जीवन में अच्छे इंसान कह्लायंगे? असल में इस तरह के साहित्यकार राजनीति, सत्ता और व्यवस्था के गुलाम होते हैं। अगर वे अपने लिए बने-बनाये फ्रेम और कम्फर्ट ज़ोन से निकलेंगे तो उन्हें जीवन की हकीकत मालूम पड़ेगी। वस्तुतः ये सब पूंजी को पाने के घटिया और शॉर्टकट वाले तरीके है जो आजकल ज्यादा प्रचलन में है। जनता के हमदर्द बनकर जनता का शोषण करना, पूंजी का मोह मन में लिए चाटुकारिता की दुनिया में छदम रहना या बुद्धि की बात को नकारकर मूर्खों की दुनिया में फ्रेमबद्ध लोगों को सलाम ठोकना कहाँ की कविता या साहित्य है। यह सब तो मोह माया है। असली साहित्य ग़दर का है जिसमें व्यवस्था को नकारकर, घर-परिवार छोड़कर, संसार में रहकर पारंपरिक संस्कृति के विरुद्ध क्रान्ति करने का आह्वान किया जाता हो। असली साहित्य वह है जो छत्तीसगढ़ के जंगलों में अनुराधा कोबार्ड गांधी रचती है तथा पी. साईनाथ जैसा आदमी दुनियाभर में घूमकर असल में हाशिये पर पड़े लोगों का दर्द कोरे पन्नों पर उकेरता है तथा समूचा जीवन एक मिशन की शक्ल में जी लेता है। वह समाज के लिए आईकॉन बन जाता है। महानगरों में रहनेवाले और प्रशासनिक सेवाओं के अफसरों की घटिया कविता, कहानी या थोथे ललित निबंधों में से साहित्य की नश्वरता बघारने वाले स्वयंभू लेखकों की कमी नहीं है। साहित्य के नाम पर चिरौरी करके प्रतिष्ठित होनेवाले लोग रचनाधर्मिता मर्म क्या समझेंगे? इन हालातों के बीच हिन्दी का यह दुर्भाग्य है कि इसमें वह तहजीब नहीं है जो उर्दू या फ्रेंच में होती है। कितने भाषाओं के शब्दों को लेकर बनी यह हिंदी भाषा कुछ शिक्षाविदों एवं राजनैतिक रूप से कमजोर लोगों की महत्वकांक्षा और ऊँचे एम्बीशन की शिकार हो गयी है। हिन्दी की लेखन-परंपरा में से जो भी विश्वविद्यालयों में लिखाया-पढ़ाया जा रहा है वह कालातीत हो गया है। वीर गाथाकाल से लेकर आज तक बंटे हुए साहित्य-समय में और दोहा, सोरठा से लेकर श्रृंगार रस और वीभत्स रस में डूबा हिन्दी का संसार विश्व फलक पर क्यों नहीं छा सकता? हाँ, यह दीगर बात है कि इधर किसी की भी दो-तीन किताबे आने के बाद अब हिन्दी में बुकर, मैगसेस और नोबल के लिए विश्व विचारवान हो रहा है। परन्तु अभी भी यह प्रश्न विचारणीय है कि इन दिनों जो पत्रिकाएं संपादित की जा रही है उसमें आन्दोलन से लेकर जमीनी हकीकतों का यथार्थ परिलक्षित क्यों नहीं होता है? अतः वास्तव में राजनीति, सत्ता और संस्कृति के बरक्स साहित्य को नए परिवेश और सामयिकता के आलोक में देखने-परखने की आवश्यकता है।
(इस आलेख के लिये बहादुर पटेल ने भी अपने विचारों से सहायता प्रदान की है।)

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