Wednesday, December 30, 2015

RIP Mangesh Padgaonkar - 30 Dec15



मराठी के यशस्वी कवि मंगेश पाडगांवकर का देहांत हो गया है।
नमन और श्रद्धांजलि। उनकी तीन रचनायें जो मुझे बेहद पसन्द है।
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एक - 
सांगा कसं जगायचं?

कण्हत कण्हत की गाणं म्हणत
तुम्हीच ठरवा!

डोळे भरून तुमची आठवण

कोणीतरी काढतंच ना?
ऊन ऊन दोन घास
तुमच्यासाठी वाढतंच ना?
शाप देत बसायचं की दुवा देत हसायचं
तुम्हीच ठरवा!

काळ्याकुट्ट काळोखात

जेंव्हा काही दिसत नसतं
तुमच्यासाठी कोणीतरी
दिवा घेऊन ऊभं असतं
काळोखात कुढायचं की प्रकाशात उडायचं
तुम्हीच ठरवा!

पायात काटे रुतून बसतात

हे अगदी खरं असतं,
आणि फुलं फुलून येतात
हे काय खरं नसतं?
काट्यांसारखं सलायचं की फुलांसारखं फुलायचं
तुम्हीच ठरवा!

पेला अर्धा सरला आहे
असं सुद्धा म्हणता येतं
पेला अर्धा भरला आहे
असं सुद्धा म्हणता येतं
सरला आहे म्हणायचं की भरला आहे म्हणायचं
तुम्हीच ठरवा!

सांगा कसं जगायचं?

कण्हत कण्हत की गाणं म्हणत
तुम्हीच ठरवा!

*****
दो - 
प्रेम म्हणजे प्रेम असतं


प्रेम म्हणजे प्रेम म्हणजे प्रेम असतं,
तुमचं आणि आमचं अगदी ‘सेम’ असतं !

काय म्हणता ?
या ओळी चिल्लर वटतात?
काव्याच्या दृष्टीने थिल्लर वाटतात ?

असल्या तर असू दे,
फसल्या तर फसू दे !

तरीसुद्धा
तरीसुद्धा,

प्रेम म्हणजे प्रेम म्हणजे प्रेम असतं,
तुमचं आणि आमचं अगदी ‘सेम’ असतं !

मराठीतून इश्श म्हणून
प्रेम करता येतं;
उर्दुमधे इश्क म्हणून
प्रेम करता येत;
व्याकरणात चुकलात तरी
प्रेम करता येतं;
कोन्वेंटमधे शिकलात तरी
प्रेम करता येतं !

सोळा वर्ष सरली की
अंगात फुलं फुलू लागतात,
जागेपणी स्वप्नांचे
झोपाळे झुलू लगतात !

आठवतं ना ?
तुमची आमची सोळा जेव्हा,
सरली होती,
होडी सगळी पाण्याने भरली होती !
लाटांवर बेभान होऊन
नाचलो होतो,
होडी सकट बूडता बूडता
वाचलो होतो !

बुडलो असतो तरीसुद्धा चाललं असतं;
प्रेमानेच अलगद वर काढलं असतं !

तुम्हाला ते कळलं होतं,
मलासुद्धा कळलं होतं !

कारण
प्रेम म्हणजे प्रेम म्हणजे प्रेम असतं,
तुमचं आणि आमचं अगदी ‘सेम’ असतं !

प्रेमबीम झूट असतं
म्हणणारी माणसं भेटतात,
प्रेम म्हणजे स्तोम नुसतं
मानणारी माणसं भेटतात !

असाच एक जण चक्क मला म्हणाला,
“आम्ही कधी बायकोला
फिरायला नेलं नाही;
पाच मुलं झाली तरी
प्रेमबीम कधीसुद्धा केलं नाही !

आमचं काही नडलं का?
प्रेमाशिवाय अडलं का?”

त्याला वाटलं मला पटलं !
तेव्हा मी इतकंच म्हटलं,
“प्रेम म्हणजे प्रेम म्हणजे प्रेम असतं
तुमचं आणि आमचं मात्र सेम नसतं !”

तिच्यासोबत पावसात
कधी भिजला असाल जोडीने,
एक चॉकलेट अर्धं अर्धं
खाल्लं असेल गोडीने !

भर दुपारी उन्हात कधी
तिच्यासोबत तासन् तास फिरला असाल,
झंकारलेल्या सर्वस्वाने
तिच्या कुशीत शिरला असाल !

प्रेम कधी रुसणं असतं,
डोळ्यांनीच हसणं असतं,
प्रेम कधी भांडतंसुद्धा !

दोन ओळींची चिठीसुद्धा प्रेम असतं,
घट्ट घट्ट मिठीसुद्धा प्रेम असतं !
प्रेम म्हणजे प्रेम म्हणजे प्रेम असतं
तुमचं आणि आमचं अगदी सेम असतं !

*****

तीन-

आयुष्य हे विधात्याच्या वहीतील पान असतं....!
रिकामं तर रिकामं,
लिहिलं तर छान असतं...!


शेवटचं पान मृत्यू अन् 
पहिलं पान जन्म असतं...!
मधली पाने आपणच भरायची,
कारण ते आपलंच कर्म असतं...!

होणाऱ्या चुकांना टाळायचं असतं,
कुठलंच पान कधी गाळायच नसतं....!चूक झाली तरी 
फाडून फेकायचं नसतं,
कारण त्यातूनच
आपल्याला पुढे शिकायचं असतं.....!

नाती जपण्यात मजा आहे
बंध आयुष्यचे विणण्यात मजा आहे
जुळलेले सूर गाण्यात मजा आहे
येताना एकटे असलो तरी
सर्वांचे होऊन जाण्यात मजा आहे

नशीब कोणी दुसरं लिहित नसतं 
आपल नशीब आपल्याच हाती असतं
येताना काही आणायच नसतं
जाताना काही न्यायचं नसतं
मग हे आयुष्य तरी
कोणासाठी जगायचं असतं
याच प्रश्नाचे उत्तरशोधण्यासाठी 
जन्माला यायचं असतं

आहात तुम्ही 'सावरायला' 
म्हणुन 'पडायला' आवडते, 
आहात तुम्ही 'हसवायला' म्हणुन
'रडायला' आवडते, आहात तुम्ही 'समजवायला' म्हणुन 
'चुकायला' आवडते,

माझ्या आयुष्यात आहेत तुमच्यासारखे "सगळे ''म्हणुन 
मला "जगायला" आवडत...*

Posts of 29 Dec 15

कितने साल समाज को छलते रहोगे अपने फायदे के लिए । जाति बताओ नया नारा आने वाला है अब कुमार और सिर्फ उपनाम से या किसी फेंकू नाम से काम नही चलेगा

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यदि केंद्र सरकार में दम हो तो सब्सीडी के साथ साथ आरक्षण हटाये नहीं तो सुधारों की और विकास की बात करना बंद करें. बहुत हो गई बयानबाजी और मूर्खताएं.
दस लाख से ज्यादा वालों को आरक्षण की जरुरत है नही है शिक्षा, नौकरी और प्रमोशन में और अब जिन लोगों ने ले लिया है उसका लेखा जोखा तो हर विभाग से लेकर हर जगह मौजूद है बस करें उनका खाता खत्म करो और बंद करो.
और अगर यह करने का दम नहीं है तो फ़ालतू बातें करना बंद करो और बुद्धिजीविता मत झाड़ों. क्योकि आरक्षण की मलाई तो वो चाट रहे है जो सवर्ण बन गए है और अपने सरनेम भी शर्मा, भार्गव, कुमार या कविराज स्टाईल में कोई घटिया सा उपनाम लगा कर अपनी जाति छुपा रहे है, तमाम प्रशासन और बड़े पदों पर बैठे बेशर्म लोग अपनी जाति परदे के पीछे छुपाकर फ़ायदा ले रहे है और सिर्फ नौकरी या शिक्षा में प्रवेश नहीं वरन आय ए एस जैसे काडर में भी प्रमोशन ले लेते है या विदेश चले जाते है फेलोशिप लेकर या उच्च शिक्षा प्राप्त करने या आय आय एम् में सरकारी कोटे से और जनता की कमाई से कोर्स करने चले जाते है. यह भी नैतिक भ्रष्टाचार है.
अगर देना ही है तो मंडला, डिंडोरी, झाबुआ, आलीराजपुर, बालाघाट जैसे भयंकर पिछड़े क्षेत्र के आदिवासियों को दो जिन्होंने कभी स्कूल नहीं देखा और सदियों से पीसते चले आ रहे है.

Tuesday, December 29, 2015

Posts of 28 Dec 15


बारहवी पास शिक्षा मंत्री
बलात्कारी केबिनेट मंत्री
सातवी पास ..............
भृष्टतम व्यक्ति वित्त मंत्री
आम लोगों का दुश्मन रेल मंत्री
और सुनाओ .....
अनपढ़ , गंवार मूर्ख सांसद
गाय मांस निर्यात वालों से चन्दा लेने वाली भृष्ट पार्टी
31 प्रतिशत भक्तजनों अब तो मातम मनाओ क्योकि अब ये पूरी भृष्ट और अम्बानी की घोषित गैंग तुम्हारे देश का बजट प्रस्तुत करेगी और साल भर हर चीज के भाव बढ़ाएगी, तुम्हारी जेब में कब्जा कर नृशंस हत्यारों की तरह वहशी नाच करेगी। सब्सीडी में कटौत्री तो शुरुआत है।
तुम्हारे अलीबाबा और उनके सिपहसालार तो तुम्हे 15 लाख देने वाले थे , क्या हुआ ?
मन्दिर बनाओ और घंटे बजाओ , आरतियाँ गाओ और कहो अबकी बार सत्यानाशी सरकार !!!!
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मप्र में चपरासी से लेकर कांस्टेबल भी करोड़पति है तो बाकि का क्या।
शिवराज सरकार ने जितना भ्र्ष्टाचार किया और राज्य को डूबोया उतना तो दुनिया में कोई कभी नही कर पायेगा।
मजेदार यह कि मोदी जैसा "पाक साफ़" भी सबमे शामिल है तभी व्यापमं से लेकर चपरासी, पटवारी, प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस के अदने से सिपाही भी करोड़ो कमाकर राज्य में सुखी और सुरक्षित है क्योकि मामाजी का हाथ सिर पर है, और मामाजी को मोदी या अमित शाह हटा दें इन दोनों कार्पोरेट्स के पिट्ठुओं में दम नही है, क्योकि इनका हिस्सा इनको मिल रहा है ना।
देश के साथ मप्र में भृष्ट सरकार और दुर्भाग्य कि एक भृष्ट वित्त मंत्री बजट पेश करेगा।
जियो 31 प्रतिशत भक्तजनों , जियो ।
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दस लाख से ज्यादा आय वालों की सब्सीडी बन्द कर दी।
मुबारक हो, जरा देख लें अपने गिरेबाँ में भी झाँक कर सरकार !!!!


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डेली न्यूज, जयपुर में किताब "नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएं" 20/12/15

Monday, December 28, 2015

गुजरता साल- पड़ाव दर पड़ाव 2015

गुजरता साल- पड़ाव दर पड़ाव 2015
आज जब बैठकर इस गुजरते हुए साल को देख रहा हूँ तो धड़कनों में एक अजीब सी उहापोह है और साँसों का स्वर अपने आरोह अवरोह के साथ अभी तक ज़िंदा है. सिर्फ तीन दिन बचे है और चौथा सूरज जीवन के उनपचासवें वर्ष की सुबह लाएगा और अड़तालीस वर्ष गुजर चुके होंगे. एक समय था जब मै साल के अंत में लेखा जोखा लिखता था पर अब पिछले बरसों में यह आदत खत्म हो गयी. सारी डायरियां जलाकर ख़ाक कर दी थी पुस्तक मेले से लौट कर आने के बाद फरवरी में. यह एक ऐसा दर्द था जो मैंने एक सद्य प्रसूता की तरह सहा था और फिर जी उठा एक बार फिर से लिखने पढ़ने को और ज़िंदा रहने को. असल में अंतिका से मेरी किताब आई थी "नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएं", उस किताब को लेकर कुछ कहना अब बेकार है. एक दिन हम लोग देवास के समीप मांगलिया में बैठे थे शायद बहादुर का ही जन्मदिन मना रहे थे 17 दिसंबर को. लुणावत जी, सुनील चतुर्वेदी, बहादुर, अलकार और मनीष वैद्य के साथ केदार और भगवान् भी थे. अचानक यह सारी मंडली मुझ पर टूट पडी कि सारी कहानियां इकठ्ठी करो और गौरीनाथ को भेज दो छपने को. मेरी कोई तैयारी नहीं थी ना मुझे कोई कसक थी दिल से पर फिर बहुत बातचीत हुई और तर्क कुतर्कों के बीच यह तय हुआ कि किताब जायेगी और तीन दिन की मोहलत में मुझे अपने स्तर पर पांडुलिपि गौरीनाथ को भेजना थी. यह बड़ी कष्टप्रद प्रक्रिया थी. पुराणी कहानियां जो सन 1995-2005 के बीच लिखी थी वो एकाएक सामने आ गयी, पात्र घूमने लगे और चल चित्रों की भाँति विचरने लगे. मुझे अपने ही पात्रों से जूझना पडा, उन लोगों को, परिस्थितयों और देश काल को याद करके सिहर उठा था. कहानी संग्रह की पांडुलिपि तैयार हो गयी थोड़ा जेब में रुपया था सो, भिजवा भी दिया यह जानते हुए भी कि रुपया देकर छपवाने में कोई अर्थ नहीं है, पर मित्रों ने प्रकाशक की मजबूरी बताई, उसकी गरीबी पारिवारिक जिम्मेदारी का जिक्र किया और देवास से चार किताबों का प्रकाशन तय हुआ. सोनल शर्मा और बहादुर की कवितायें, सुनील भाई का उपन्यास और मेरा कहानी संकलन. कुल मिलाकर यह बड़ा निर्णय था और देवास के साहित्यिक इतिहास में शायद पहली बार ही हुआ होगा कि एक साथ चार किताबें दिल्ली से छपे. इसके पूर्व प्रकाश कान्त का उपन्यास और बहादुर का कविता संकलन अंतिका से आ ही गया था पिछले दो तीन बरसों में. 

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पुस्तक मेले में हम पिछले तीन चार बरसों से जा ही रहे है यह लगभग एक शगुन की तरह से वार्षिक तीर्थाटन की तरह था हम चार पांच लोगों के लिए जिसमे बाकायदा हम लोग छुट्टी लेकर जेब से अपना रुपया लगाकर जाते रहे है, इस बार जाने का एक नया आकर्षण था कि हमारी ही किताबें आ रही है. पर दिल्ली पुस्तक मेले का अपना रोना है जहां चार लोग मिलते है प्रकाशक मित्र मिलते है वही इसके दुष्परिणाम ज्यादा हुए मेरे मन पर. अगर आप एक हाल में ही घूम रहे है तो बुरी तरह से थक जाते है, पिंडलियाँ जवाब दे जाती है. समय पास करने के लिए आप यहाँ वहाँ कुर्सी तलाश करते है या अपना सामान रखने के लिए किसी प्रकाशक मित्र का स्टाल. पर कई बार आपके मित्र या जिन संस्थाओं में काम किया हो वहाँ पर नए आये लोग आपको बड़ी बेशर्मी से साफ मना कर देते है, कि यहाँ सामान मत रखो जगह नहीं है. आपको एक प्रकाशक के स्टाल पर बैठे बैठे ऊब भी होने लगती है और आप हसरतों से पानी की ओर देखते हो तो वह भी नसीब नहीं होता. फिर बाहर उठकर जाओ पानी लो और पियो, क्योकि दोस्तों के स्टाल पर जाओ तो यार लोग पानी पिलाने में भी गुरेज करते है क्योकि पानी की बोतल तीस से पचास रूपये तक मिलती है. सवाल पानी का नहीं परन्तु दुःख ये होता था कि जो लोग हमारे शहर में आये थे जिन्हें नाजों से सर आँखों पर बैठाकर रखा, रहने से लेकर शराब और खाने की व्यवस्था की वो लोग इतनी मासूमियत से पलट गए कि संदेह होता था कि ये दोस्त थे या दुश्मन !!! पर फिर भी जाते रहे कि इस बहाने से कवि, कहानीकार, उपन्यासकार और आलोचक मिल जाते है, वर्चुअल दुनिया के फेसबुकिया  दोस्त भी टकरा जाते है, पत्रकार मित्र मिल जाते है पर इन तीन सालों में लोगों को जिस तरह से व्यवहार करते देखा और समझा उससे यह निष्कर्ष निकाला कि यह सिर्फ बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं है, दोस्ती और यारी के मायने ग्लोबल दुनिया में बदल गए है, और हम तथाकथित लोगों की, जो कस्बे या छोटे शहरों से आते है, को दोस्ती यारी और रिश्तों के नए पैमाने और परिभाषा गढ़ने की आदत बनाना होगी. एक बार फिर पुस्तक मेला सामने है और इस बार हम कोई नही जा रहे क्योकि मन उचाट है और धंधेबाज प्रकाशकों और दोस्तों से विश्वास उठ चुका है. जिन प्रकाशकों ने पिछली बार फलां किताब की दस हजार प्रतियां बिकवा दूंगा जैसे मासूम वायदे किये थे, वे अब नए लेखकों को पटाने में लगे है और पुराने लेखक पुस्तक मेले में कही किसी कारपेट के नीचे औचक से देख रहे होंगे. 

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Sunday, December 27, 2015

मुंगेली (छत्तीसगढ़) में सामाजिक समरसता का नायाब उदाहरण - 25 दिसंबर 15



ये है फुल्लेश्वरी और इनके पति सूरज प्रकाश, ग्राम बैहाकापा जिला मुंगेली के. आपने विद्या बालन का विज्ञापन सुना होगा कि कैसे वो एक असली हीरोइन के बारे में बताती है जिन्होंने शौचालय ना होने से शादी करने से मना कर दिया था. मुझे भी लगा कि था कि ये महज एक विज्ञापन होगा और मै असली चरित्रों की तलाश में था जो मुझे पिछले पांच बरसों में नजर नहीं आये कभी और मै अपनी धारणा पुष्ट करता रहा कि सब विज्ञापन है और सब सरकारी है, बनावटी और प्रायोजित. पर अचानक एक निजी कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले में जाना हुआ. जिलाधिश श्री संजय अलंग जी, जो मेरे अब तक फेस बुक मित्र थे, ने रात के खाने पर आमंत्रित किया. उन्होंने बताया कि  छात्तीसगढ़ के 27 जिलों में यह छोटा सा जिला एकमात्र जिला है - जो अनुसूचित जाति बहुल जिला है और यहाँ उन्होंने डेढ़ वर्ष की अल्पावधि में कई महत्वपूर्ण कार्य किये है जिसमे स्वच्छता मिशन को लेकर उन्हें समुदाय से भरपूर सहयोग भी मिला है. जिस तरह से सवर्ण वर्ग के वर्चस्व को ख़त्म करके दलित समुदाय ने अपनी अस्मिता और सामाजिक भूमिका को लेकर स्वच्छता अभियान में अपनी भागीदारी निभाई है वह सच में प्रशंसनीय है. संजय जी से सुने इस सोशल इंजिनीयरिंग के मॉडल में यह एक नया मॉडल था हमारे लिए खासकरके इस सन्दर्भ में कि अब तक स्वच्छता मिशन में शौचालय बनाने में संख्या देखी जाती है, टार्गेट देखे जाते है, उसके उपयोग और समुदाय की भागीदारी की बात को कही दर्ज नहीं किया जाता है. हमने इस कार्य में थोड़ी रूचि दिखाई और सोचा कि काश यह काम किसी भी गाँव में एक बार देखने को मिल जाता तो शायद मप्र के अनुसूचित जाति बहुल इलाकों में शायद इसका जिक्र हम कर सकें खासकरके मालवा में जहां छुआछुत और जाति की बड़ी समस्या के कारण कई अच्छे अभियान फेल हो जा रहे है. 
अगले दिन संजय जी ने खुद आगे बढकर सहृदयता से कहा कि पंचायत विभाग, रायपुर से सहायक आयुक्त श्री सुभाष मिश्र जी आये हुए है वे एक गाँव जा रहे है सोशल इंजिनीयरिंग का मॉडल देखने, आप लोग भी चले जाईये. यह हमारे मन की बात थी, लिहाजा मै और डा सुनील चतुर्वेदी उनके साथ चल दिए. मुंगेली की उत्साही और युवा जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी डा फरीहा आलम सिद्दीकी और उनके परियोजना अधिकारी साथ थे. सर्किट हाउस पर भोजन के उपरांत हम लोग गाँव के बारे में निकले. डा फरीहा ने बताया कि किस तरह से वे पहले एसडीएम थी कोटा में, जहां ‘ला एंड आर्डर’ ही काम था डंडा लेकर, पर मुंगेली में इस नई जिम्मेदारी से समुदाय में काम करने का बोध तो हुआ ही साथ ही गरीब, सदियों से उपेक्षित दलितों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने में किस तरह से प्रशासन काम कर सकता है यह सीखा. मुंगेली का जिक्र करते हुए फरीहा जी ने कहा कि यहाँ उन्हें जिलाधीश से पूरा सहयोग मिला और एक फ्री हैण्ड मिला, जोकि किसी भी प्रयोग और अभियान के लिए महत्वपूर्ण होता है. फरीहा जी ने बताया कि सरकार के पूर्ववर्त्ती प्रयास भी थे परन्तु उसमे समुदाय की भागीदारी नहीं थी लिहाजा शौचालय मात्र बनकर खड़े थे, उनका उपयोग हो नहीं पा रहा था और पहले से बने ढाँचे टूट गए थे. इस नए काम में उनकी टीम ने बीस गाँवों को चुना जहां उन्हें समुदाय का सह्योग मिला. पहले लोगों से लम्बी बातचीत की गयी, गाँवों में जिलाधीश और उनकी टीम ने जा जाकर संपर्क किया उनकी बिजली-पानी से लेकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की समस्याएं हल की, फिर स्वच्छता की बात की. सवर्ण  वर्ग की अपनी दिक्कतें थी परन्तु दलितों ने स्वच्छता और शौचालयों को  अपनी अस्मिता का प्रश्न बनाया और जी जान से भिड गए. जिले में राशि कम थी और पहली किश्त में उन्होंने योजना अनुरूप हितग्राहियों को आधी राशि का भुगतान किया और उन्हें डर था कि शायद लोग शौचालय बनवा ना पाए और राशि ख़त्म कर देंगे खा पीकर.........परन्तु उनके आश्चर्य की सीमा नहीं रही, जब उन्होंने देखा कि लोगों से चौदह हजार की राशि की सीमा पार करके तीस से लेकर पैतीस हजार रूपये खर्च करके अपने घरों में साफ़, सुन्दर और व्यवस्थित शौचालय बिलकुल डिजाइन के अनुसार (लीट पीच) बनवाये है. इसके साथ ही महिलाओं ने अपने लिए शौचालय से सटकर या थोड़े दूर नहानी घर भी बनवाये है. 


यह सिर्फ एक शुरुवात थी जिससे इनकी पूरी टीम को हौंसला मिला. फुल्लेश्वरी का ब्याह सूरज प्रकाश के साथ हुआ था, परन्तु ससुराल में आने के बाद जब उन्होंने देखा तो वे वापिस लौट गयी. परन्तु सूरजप्रकाश ने इस बात को समझा, वे कहते है महिलाओं को जो बाहर जाने में समस्या होती है उस पर हमने कभी गंभीरता से सोचा नहीं था, रात के समय यह ज्यादा रिस्की भी है और बरसात में ज्यादा खतरनाक है. लिहाजा मैंने प्रशासन के अधिकारी और जिला पंचायत सीईओ मैडम जब गाँव में आई तो मैंने बहुत डरते हुए उनसे बात की, तो उन्होंने बहुत सहज भाव से मुझे मदद का आश्वासन दिया और आधी राशि भी मेरे खाते में जमा की. बस फिर क्या था हमने अपनी जेब से भी रुपया लगाया और बड़ा, पक्का और सुन्दर शौचालय बनवाया साथ में मेरी पत्नी और घर की महिलाओं के लिए नहानीघर भी बनवाया. यह खबर लेकर मै ससुराल गया और अपनी पत्नी से बात की तो वह साथ आने को तैयार हो गयी. आज मेरी पत्नी घर में हम सबके साथ रहती है और गाँव में लोगों को स्वच्छता का महत्त्व भी बताती है और लगातार सबके साथ बैठकें करती है. गाँव में महिलाओं ने कहा कि शौचालय बनने से उन्हें बहुत फायदे हुए है और अब वे एक अच्छा और इज्जत वाला जीवन व्यतीत कर रही है, बाहर जाने पर जो शर्म आती थी वह समस्या ही खत्म हो गयी है, गाँव में पानी की व्यवस्था नल जल योजना और पर्याप्त हैंडपंप होने से शौचालय साफ़ भी रहते है, हालांकि फिनाईल का खर्च बढ़ा है परन्तु बीमारी में दवाईयों पर खर्च करने से माह में सौ रूपये खर्च करना ज्यादा बेहतर है. बुजुर्ग भी अब बाहर जाने के बजाय घरों में ही शौच के लिए जाते है. गाँव में हमें कही भी मल विसर्जन के दृश्य देखने को नहीं मिलें, एकदम साफ़ सुथरा गाँव था. गाँव के सरपंच राजकुमार भारद्वाज ने कहा कि गाँव में बीमारी आश्चर्यजनक रूप से कम हुई है पिछले छः माह में जल जनित रोगों की संख्या बहुत कम हुई है. बच्चे कम बीमार पड़ रहे है, दस्त, पीलिया, मोतीझरा तो लगभग ख़त्म हो गया है और अब हमें अस्पताल जाने की जरुरत कम पड़ती है. युवाओं से बातचीत में युवाओं ने कहा कि शौचालय वे भी धोते है यह सिर्फ महिलाओं का काम नहीं है क्योकि वे इस्तेमाल करते है. बाहर यदि कोई जाता है तो वे मिलकर समझाते है. सरपंच राजकुमार जी ने यह भी कहा कि इस अभियान से दूसरे कई और फायदे हुए है, गाँव में अब समरसता के लिए हम लोग काम कर रहे है, गाँव में लड़ाई होने पर हम समस्याएं गाँव में ही सुलझाने लगे है, पुलिस थानों तक शिकायतें नहीं जाती और लोगों में आपसी सहयोग बढ़ा है जिससे झगडे भी लगभग खत्म हुए है - खासकरके जमीन विवाद और जाति के विवाद. डा फरीहा ने स्कूल में बच्चों के लिए  जन सहयोग से निर्मित शौचालय भी बताये. 
डा फरीहा ने कहा कि मुंगेली छोटा जिला है और शहरी चकाचौंध से दूर है, माल, बड़े बाजार, सिने प्लेक्स या बड़े टाकीज आदि ना होने से यहाँ आकर्षण का कोई बड़ा केंद्र नहीं है, इसलिए हम लोग और हमारी टीम गाँवों में ज्यादा से ज्यादा समय देती है और कोशिश करते है कि लोगों को सरकारी योजनाओं का फायदा दिला पाए. इस अवसर पर डा सुनील चतुर्वेदी ने गाँव के लोगों के साथ स्वच्छता अभियान की एक रोचक गतिविधि की और साबुन से हाथ धोने का महत बतलाया. सहायक आयुक्त सही सुभाष मिश्र ने पत्रिका पंच जन के बारे में बताया और कहा कि सरकार गाँवों में विकास के नए प्रयास कर रही है और इसके लिए समुदाय को आगे आना होगा.


एक जिले में विजन और सकारात्मक ढंग से यदि सुसंगठित प्रयास मिल जुलकर किये जाये तो कसी तरह सामाजिक तस्वीर बदलती है यह देखना हो तो छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले का प्रयोग देखना चाहिए जहां जिलाधीश श्री संजय अलंग के नेतृत्व में एक बड़ी टीम बदलाव के लिए महत्वपूर्ण कार्य कर रही है.

Posts of 25 Dec 15 बहादुर पटेल को मुंगेली में सूत्र सम्मान











बहादुर पटेल को मुंगेली में सूत्र सम्मान प्रदान किया गया आज अभी अभी। छग के पचास रचनाकार उपस्थित मालवा के पांच और राजस्थान के एक साथी के साथ ।इसके पूर्व एक बेहतरीन काव्य सन्ध्या मुंगेली में आयोजित की गयी। हिंदी कविता पर जुटे छत्तीसगढ़ के और मालवा के रचनाकार। मेजबान थे वरिष्ठ कवि और जिलाधीश श्री संजय अलंग जी, जिन्होंने मुंगेली जिले में सामाजिक समरसता के महत्वपूर्ण कार्य अल्पावधि में किये और जिले को एक मुकाम पर लेकर आये है। संजय जी ने छग के इतिहास पर एक अध्येता की भाँति गम्भीर काम करके नई दृष्टि से किताबें लिखी है। संजय जी ने कविता को लेकर भी नए बिम्ब रचे है और सूक्ष्म दृष्टि से यहां के मुद्दे और सरोकार कविता में उठाये है। 
एक महत्वपूर्ण शाम में यह कार्यक्रम लम्बे समय तक याद रहेगा।




Wednesday, December 23, 2015

Posts of 22 Dec 15 (किशोर अपराध की 18 से घटाकर उम्र 16 की गयी - दुर्भाग्य)



उड़ीसा में फादर ग्राहम स्टेन्स को जलाकर मारा था, उसकी पत्नी और बच्चों ने बाद में एक हिंदूवादी संगठन के लोगों को माफ़ कर दिया था। राजीव गांधी के हत्यारों को उनके परिजनों ने माफ़ कर दिया था। नवापाड़ा, झाबुआ में दो नन्स ने अठारह लोगों को बलात्कार करने के बाद माफ़ कर दिया था। गांधी, विवेकानन्द और विनोबा भावे, अम्बेडकर और गोलवलकर, हेडगेवार दीनदयाल उपाध्याय से लेकर विश्व स्तर के चिंतको ने माफी को सबसे बड़ा हथियार, और सबसे बड़ा हिम्मत का श्रेष्ठ कार्य बतलाया है। हमारे ही देश में ऐसे सैंकड़ों किस्से है।
Dorothy Beck सिस्टर जो बरसों से आष्टा के क्षेत्र में गरीब, वंचित और दलितों के साथ काम कर रही है। उनकी एक बात हमेशा याद रहती है, वे कहती है कि हम लोग सूर्यास्त के पहले सारे झगड़े भूला देते है और सबको माफ़ कर देते है। रात का खाना सब लोग मिलकर खाते है।
धर्म और मानवता में माफी सबसे बड़ा गुण है और यह हमे हमेशा याद रखना चाहिए। महावीर, बुद्ध, श्रीराम, कृष्ण से लेकर जीसस, नानक, मोहम्मद साहब तमाम महान लोगों की शिक्षाएं हमारे आसपास बिखरी पड़ी है।
सवाल यह है कि हम हिंसक समाज बनाना चाहते है या आने वाली पीढ़ियों को एक भला, शांत और हिंसा मुक्त समाज सौंपना चाहते है। अगर यह समाज बनाने के लिए आपको नरबलि, फांसी और बदला जैसी कार्यवाही करना है तो माफ़ कीजिये मुझे आपके समाज में नही रहना है। शांत रहिये, सबको, हमको, आपको और उसको भी सुधरने का एक मौका देना होगा।
शांत हो जाइए, ज्योति सिंह के माँ बाप हमारे अपने लोग है , उन्हें भड़काईए नही - समझाइये और उनकी मदद कीजिये। वादा कीजिये कि ज्योति के साथ जो हुआ वो अब नही होगा किसी बहु बेटी के साथ, कोई बच्ची हम सबके बीच जलील नही होगी, हम समतामूलक समाज और बराबरी वाले समाज की बात को क्रियान्वित करेंगे, अपने घर से शुरू कीजिये। दो माह में देश बदल जाएगा, अपने किशोर होते बच्चों को सही शिक्षा दीजिये, कल ऐसा ना हो कि मुझे आपके होनहार, कुलदीपक और चिराग के लिए ऐसी अपील लिखना पड़े।
#संसद में नाबालिग /किशोर अवस्था घटाकर 16 वर्ष की गयी. दुर्भाग्य है. 

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बाबा भारती ने डाकू खड़क सिंह से सुलतान घोड़े का जिक्र करते हुए कहा था इस बात का जिक्र किसी से मत करना वरना कल तुम्हारी बात का और गरीबों पर कोई भरोसा नहीं करेगा..........
अचानक याद आ गयी यह बात, हर दौर में बाबा भारती और डाकू खड़क सिंह, घोड़ा सुलतान रहते है और फेसबुक पर भी है.........
और यह पोस्ट भी इसलिए लिखी है कि प्रेमचंद ने पंच परमेश्वर में लिखा था " बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात भी ना कहें"

Monday, December 21, 2015

Posts of 21 Dec 15 ज्योति सिंह के अपराधी का छूटना

समाज में पहले बराबरी लाईये फिर सजा अपराध की बात करिए 

ज्योति सिंह का अपराधी छुट गया कल, अच्छा हुआ, आप व्यर्थ ही उसे दोष दे रहे है, दिक्कत हमारी व्यवस्था में है, क़ानून में है, जन प्रतिनिधियों में है , संसद में है जो विधायिका की भूमिका निभाती है .
मेरी नजर में उसे सुधरने का एक और मौका देना ही चाहिए, वरना वह जहां सजा पायेगा, आस पास के माहौल से वह ज्यादा खतरनाक होकर बाहर निकलेगा. साथ ही यदि उसे सजा दी गयी तो देश भर में अठारह से कम उम्र के बच्चों के भविष्य पर बड़ी आंच आ सकती है जो जाने अनजाने में अपराध कर बैठे है. सिर्फ एक बार सोच कर देखिये यदि आपका बच्चा होता तो क्या आप इस सजा की पैरवी करते?
और दूसरा अब जेंडर के जाल से बाहर निकलिए और समानता की बात करिए, उन बच्चियों के ओर ध्यान दीजिये जो मसाज पार्लर, देह व्यापार और वेश्या वृत्ति के धंधे में धकेल दी गयी है और उन्ही के अभिभावक और लोग कमा खा रहे है और शिक्षा के अभाव में ये लड़कियां रुपया कमाने के लिए हर हद तक जा रही है और जाने को तैयार है.
बुंदेलखंड, झाबुआ, आलीराजपुर, भिंड, मुरैना, शिवपुरी, श्योपुर और देश के दूसरे हिस्सों में मैंने देखा है कि पलायन में मजदूरी करने ईंट भट्टों पर या मेट्रो में या अन्य निर्माण कार्यों में जो नाबालिग लड़कियां जाती है दिल्ली, बम्बई, सूरत या कानपुर वो किस तरह से लौट कर आती है और उनके हाथों में महंगे मोबाईल से लेकर कीमती कपडे और गजेट्स होते है और वे गाँव में स्वाभाविक ईर्ष्या का कारण बन जाती है, वे गाँव में मुश्किल से एक महीना भी रहना नहीं चाहती और लौट जाना चाहती है उन्ही शहरों और काम धन्धों में.
थोड़ा गंभीरता से सोचिये और विचारिये, यह एक नाबालिग के जीवन का नहीं बल्कि देश भर के करोड़ों बच्चों का सवाल है जो हमारी आपके सामाजिक व्यवस्था और गलतियों से अपराधी बनते है और हम ही उन्हें शह देते है. कहना आसान है परन्तु निर्वहन कठिन है. ज्योति सिंह के साथ जो हुआ वह तो निंदनीय है ही, इसके लिए हमारी पूरी सामाजिक व्यवस्था दोषी है पर एक को सजा देकर हम सब बच नहीं सकते क्योकि महिला पुरुष में भेद भाव हमने बनाए है, क्यों गैर बराबरी है समाज में और क्यों इज्जत नामक चीज को सिर्फ एक महिला से जोड़ा जाता है? सोचिये और एक बार अपने दिल पर हाथ रखकर कहिये कि मै निर्दोष हूँ.....यदि नहीं तो फिर सदियों से व्याप्त असमता और गैर बराबरी की सजा एक उस लडके को क्यों, क्या किसी ने यह प्रश्न किया कि तिहाड़ जैसी बड़ी जेल में बाकी दो अपराधियों ने आत्महत्या क्यों कर ली या मर गए? क्या हमारी सुरक्षा व्यवस्था की तगड़ी जेल भी इतनी ताकतवर नहीं कि दो जघन्य अपराधियों को बचा सकें.....?
थोड़ा सोचिये और यह बताईये कि क्या ज्योति सिंह के बलात्कार और ह्त्या के बाद दो माह से लेकर नब्बे साल की महिला तक के साथ बलात्कार होना बंद हो गए? क्या सब बालिगों कोर्ट में कन्विक्ट कर सजा दिला पाए है ? क्या मानसिकता में बदलाव आ गया है, यदि हाँ तो फिर उसे इंडिया गेट पर सार्वजनिक सजा दे दो, फांसी पर टांग दो और यदि नहीं तो फिर अपनी सड़ी गली व्यवस्था में बदलाव लाईये समाज को ज्ञान मत बांटिये.
-संदीप नाईक 

Sunday, December 20, 2015

posts of 20 Dec 15 - पता है कि राजा नंगा है.

पता है कि राजा नंगा है. 
आजकल ठीक हूँ एकदम, आपने पूछा तो बताया 
मुल्क कैसा है मेरा यह बताने की हिम्मत नहीं 
रोज दो समय खाता हूँ भरपेट, आपने पूछा है
मुल्क क्या, क्यों और कैसे खाता है, पता नहीं.
स्वस्थ, तंदुरुस्त और ज़िंदा हूँ ठहाकों में अपने 

बच्चों के मरने की खबर रोज आती हो, पता नहीं 
छः सात जोड़ कपडे और कुछ गरम भी है 
मुल्क में लोग ठण्ड से मर रहे होंगे, पता नहीं 
माँ बाप का बनाया मकान है सो छत है 
आसमान के नीचे होंगे या जंगल में, पता नहीं 
थोड़ी सी आमदनी हो जाती है हर माह 
कितनों ने रुपया देखा मुल्क में, पता नहीं
मै, मेरा घर मेरे लोग सुरक्षित है जान लीजिये 
जिस्म बेचती औरतों का सुना, सही है क्या पता नहीं 
मेरे यार दोस्त रिश्तेदारों के पेट भरे है, मजे में है 
मुल्क में लोगों के लोग मर रहे है दहशत से, पता नहीं 
रोज कुछ लिखता पढता हूँ ऐयाशी कह ले जनाब 
तुम्हारे लोग इल्म की रोशनी से दूर होंगे, पता नहीं 
रोज रात में चुपचाप जी भरकर रो लेता हूँ अक्सर 
मुल्क में हर रोज लाखों लोग मेरे साथ रोते है, पता नहीं 
मुझे राजा को नंगा कहना आता है क्योकि रोज कहता हूँ
तुम्हारे मुल्क के लोग इतनी हिम्मत जुटा पायेंगे, पता नहीं.

- संदीप नाईक

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अब समझ रहे है ना देश के वित्त की हालत क्यों महंगा हो रहा प्याज पेट्रोल सीमेंट और बाकी। यह फायदा किसको होता है समझ रहे है ना ?
हे प्रभु इस जेटली जो माफ़ मत करना ये सब जानता है कि इसने क्या किया है और क्या कर रहा है ।


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मप्र जन सन्देश में आज 20 दिसम्बर 15


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एक बात तो तय है प्रकाशकों ने लेखकों को बरगला फुसला कर अपना धंधा चालू कर दिया है। विश्व पुस्तक मेला भरा नही और .....😇😇😇😇🤗🤗🤗🤗🤗🤗 जिस अंदाज में लोग फेसबुक को किताबों का मार्केट बनाते है, पूरा धंधा चलाते है और बम्बई के रेसकोर्स की तरह लेखकों को घोड़ा बनाकर दौड़ाते है, आत्म प्रचार करते है भयानक किस्म से वह सब चकित करने वाला है मानो या ना मानो !!!! और इस पूरे जुएं में लेखक को किताबों की प्रतियां भी रूपये देकर खरीदनी पड़ती है और बातें विचारधारा प्रतिबद्धता और वामपंथ से लेकर दक्षिण पन्थ की करते है। काश कि इन किताबों से दुनिया बदलती तो क्या बात थी...

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News compect 20 Dec 15


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डर तो अभी भी लगता है अपनी ही परछाई से जो धूप में ज्यादा लम्बी, तल्ख और भयावह हो जाती है।

तुम्हारे लिए...........................सुन रहे हो ना ...............कहाँ हो तुम............
काफी दिनों जिया हूँ किसी दोस्त के बगैर
अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो, खैर.

-फिराक.

Saturday, December 19, 2015

संविधान और क़ानून की समीक्षा का समय Post of 19 Dec 15


संविधान और क़ानून की समीक्षा का समय

आज के पटियाला हाउस मामले को मीडिया ने कल से ऐसा प्रचारित किया था मानो यह दिन बहुत महत्वपूर्ण हो, और एक पार्टी विशेष के लोगों को सजा ऐ मौत होने वाली हो या कोई गंभीर किस्म का कानूनी इतिहास बनने वाला हो. यह निहायत ही एक विपक्षी पार्टी का व्यक्तिगत मामला था जिसमे उस पार्टी के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को महज मुकदमा शुरू होने से पहले उपस्थित होकर यह जताना था कि वे कोर्ट की प्रक्रियाओं से ऊपर नहीं है और एक व्यक्ति विशेष द्वारा लगाए गए आरोपों के तारतम्य में वे कानूनी प्रक्रिया शुरू करने के लिए तैयार है. सरकार ने भी पूरी दिल्ली की सडकों को पुलिस और फ़ोर्स से ऐसे तान दिया और छावनी बना दिया - मानो देश में बहुत बड़ी कोई गंभीर "ला एंड आर्डर" की समस्या खडी हो गयी हो, इस तरह से तो न्याय देने वाले न्यायाधीशों उपर मानसिक दबाव बनेगा और वे निष्पक्ष रूप से फैसला नहीं दे पायेंगे. आज की घटना को भारतीय क़ानून, मीडिया प्रचार और आम लोगों की बहस के सन्दर्भ में नए सिरे से देखने की जरुरत है. 
दरअसल में भारतीय कानून को एक गम्भीर किस्म के आत्म मूल्यांकन की जरूरत है। पिछले पंद्रह दिनों में तीन बड़े फैसले लोअर कोर्ट यानी हाई कोर्ट ने सुनाये है जिनमे से सलमान का छूटना, निर्भया के तथाकथित नाबालिग अपराधी का छूटना, कांग्रेस के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का मात्र चार मिनिट में बाहर आना और ठीक इसके विपरीत हम जानते है की हमारे ही देश में आज बरसों से विचाराधीन कैदियों का बगैर सुनवाई के मर जाते है हर वर्ष , इन निरपराध कैदियों का मर जाना दर्शाता है कि हम भले ही कहें कि क़ानून के सामने सब समान है, परंतु देश के नागरिक कितने स्तरों और औकातों में बंटे हुए है यह इन तीन ताज़ा फैसलो से साबित हो गया. जबकि ठीक इसके विपरीत नेशनल क्राईम ब्यूरो के आंकड़ें  दर्शाते है कि अपराध तो बढ़ रहे है परन्तु कोर्ट में फैसलों की गति बहुत सुस्त है. शायद यह भी सही है कि आज हमें अम्बेडकर कृत संविधान को भी बगैर किसी भय और दलित तुष्टिकरण को माने अब पुनः देखना चाहिए और अंग्रेजों के बनाये नियमों को भी विलोपित करके विशुद्ध भारतीय संदर्भ में बदलना चाहिए. दुर्भाग्य यह है कि गुजरात न्यायालय के एक न्यायाधीश जब आरक्षण की पुनर्व्याख्या की बात करते है तो उनकी कुर्सी खतरे में नजर आती है और वोट बैंक की राजनीती उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझती है. 
इस बात की जरूरत इसलिए भी ज्यादा हो गयी है कि क़ानून की व्याख्या मीडिया से लेकर हर कोई ऐरा गैरा नत्थू खैरा करने लगा है और किशोर वय से लेकर युवा और बुजुर्ग भी न्याय का मख़ौल उड़ाने लगे है, साथ ही "अब क़ानून में दम नहीं और सब बिके हुए है" जैसे वाक्य भारत की फिजाओं में गूंजने लगे है जोकि किसी भी राजतंत्र या लोकतंत्र के लिए घातक है. यह बहुत ही कठिन विपदा का समय है जब संवैधानिक पदों पर आसीन लोग (राबर्ट वाड्रा, केजरीवाल, जेटली, सोनिया, आदि योगीनाथ, उमा, निहालचंद्र, अभिषेक मनु सिंघवी या कपिल सिब्बल) क़ानून को जेब में रखकर चलते है और सीबीआई, आईबी या न्यायपालिकाओं का मनमाना उपयोग करते है. इस सबमे उद्योगपतियों का भी कानून का मनमर्जी से उपयोग बहुत ही शर्मनाक है, जो अपने फायदे के लिए और पूंजी को हथियाने के लिए किस तरह से वकील और व्यवस्था को इस्तेमाल करते है. 
आज पूरे दिन की बहस में मीडिया के प्रतिनिधियों ने भी गजब का हूनर दर्शाया और जतला दिया कि वे न्यायाधीशों से बड़े कानूनविद है. ये मीडियाकर्मी सब बता देते है, दो चार ने तो 20 फ़रवरी का फैसला भी सुना दिया और दो चार एंकर ने तो पूरे संविधान को ही घोट रखा हो मानो, ऊपर से पैनलिस्ट भी खतरनाक ज्ञानी है. ये पैनलिस्ट जो एक विचारधारा लेकर चैनलों के मंच पर आते है और रोज कमोबेश इस कर्म को अपना धंधा बना चुके ये लोग हर विषय में सिद्धहस्त है और सर्व ज्ञानी है. वे इस तरह से बंद कमरों में क्रान्ति की बात करते है मानो वे सर्वेसर्वा हो देश के. यदि मीडिया इतना ही सशक्त है तो यार काहे कोर्ट कचहरी में हम आम लोग समय बर्बाद कर रहे है, सीधे चैनल में चले जाए और हाथो हाथ इन सब महानुभावों से न्याय ले लें. 

मुझे लगता है कि नया रचना है तो विध्वंस जरूरी है और इसके लिए यदि मोदी सरकार देश के रिटायर्ड जज साहेबान और अनुभवी वकीलों की अगुवाई में ये रद्द बदल करती है तो हमे मिलकर कम से कम आने वाले भारत के लिए एक स्वच्छ, पारदर्शी और सामान आचार संहिता वाली क़ानून व्यवस्था का स्वागत करने लिए समर्पण करना चाहिए और धैर्य रखना चाहिए।




Friday, December 18, 2015

Posts of 17 Dec 15


सुबह सवेरे 17 दिसंबर 15 में.........

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इतना बड़ा भ्रष्ट आदमी वित्त मंत्रालय सम्हाल रहा है तभी पेट्रोल, प्याज, दाल और बाकी जरुरत की चीजों की यह हालत है, किसान आत्महत्या, अम्बानी द्वारा बारह सौ करोड़ की गैस चोरी, बैंकों की बड़ी सब्सीडी बड़े लोगों को, और देश के सारे लोगों को मरने की कगार पर लाकर मात्र दो प्रतिशत लोगों को फ़ायदा पहुंचाने में माहिर यह आदमी एक बड़ा बोझ है देश पर, परन्तु अंधभक्तों को यह दिखेगा नहीं क्योकि बोलना पाप है.............और मन मोहन पार्ट टू बोलेंगे नहीं क्योकि अगर यह चला गया तो वित्त की समझ वाला कोई और नहीं है ना..........
अरुण जेटली इस्तीफा नही देंगे बेशर्म आदमी है
जब वित्त मंत्रालय में दीमक लग जाए तो

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एक यारबाश दोस्त और कवि को जन्मदिन मुबारक। यारबाशी फ़ले फूले, टापरी का मिजाज ना बिगड़े और ठेठ देसीपन आबाद रहें और कविता कर्म रचनात्मक बना रहे लम्बी उम्र तक यही शुभकामनाएं, हे काव्यार्थ के जनक बहादुर पटेल।


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चैनलों पर जारी बहसों से तो लग रहा है कि अरुण जेटली भृष्ट है। आप के लोग कल कुछ धमाका करेंगे पर मितरो इस्तीफे की उम्मीद मत रखना , दो कारण है - एक तो बलात्कारी निहालचंद्र अभी तक केबिनेट मंत्री है भोगी आदित्यनाथ टाइप लोग भी सांसद है। दूसरा अम्बानी, अड़ानी को फायदा पहुँचाने वाली वित्तीय समझ के जेटली जैसे कारपोरेट प्रतिबद्ध समझदार लोग नही है बहुमत में ।
सातवी, आठवी या बारहवी पास भाई - बहनजी है जो दूरगामी वित्तीय नियोजन नही कर पाएंगे ऐसा नियोजन जो कारपोरेटी संस्कृति को बढ़ावा दें और अमीरो का फायदा करवाएं।
मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह जैसे लोग बेरोजगार है, कन्सल्टेन्सी ले को मोदी जी !!!!


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गम से अब घबराना कैसा 
गम सौ बार मिला ।


Wednesday, December 16, 2015

Posts of 16 Dec 15


News Concept 16 Dec 15 

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16 मई 14 से लेकर अभी तक जब भी मोदी की व्यक्तिगत रूप से जब भी सार्वजनकि भद्द पीटी है उन्होंने बहुत ही घटिया तरीके से पूरी सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करते हुए अपनी छबी बनाने को कई प्रकार के उपक्रम किये ताकि तथाकथित 31 प्रतिशत लोगों की "बहुमत" वाली सरकार की देश में इमेज बनी रहे......और यह सब प्रबुद्ध लोगों को बताने की जरुरत नहीं जैसे कल सी बी आई का इस्तेमाल किया.........और यह ट्रेनिंग इन्होने कांग्रेस से ली है पिछले 60 साल सत्ता से बाहर रहकर यही तो सीखा है.....
भक्त इसे नहीं समझ सकते इसलिए भक्त यहाँ अपने दिमाग का कचरा ना फेंके, कृपया प्रबुद्ध बने पहले, हाँ संघी बौद्धिक सुनकर प्रबुद्ध नहीं बना जाता यह भी सुन लें..


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सबसे ज्यादा फजीहत बेचारे अरुण जेटली की हो रही है, एक तो पिछले दरवाजे से बेशरमी से आया है, मंत्री बना बैठा है , मोदी जी की हम्माली करता है, देश का आर्थिक भार उठाता है, अम्बानी से लेकर अडानी तक को झेलना पड़ता है और अब ये अरविन्द ने सड़क पर लाकर कचरे कर दिए उसके , इत्ते बड़े मंत्री को दिल्ली क्रिकेट एसोसियेशन में चोर बता दिया दिया......कित्ती बेइज्जती सहेगा रे आदमी हे भगवान............मतलब कोई जमीर ही बाकी नहीं रहा, फिर बन्दे में दम है पूरी तरह से ढीट बनकर कुर्सी से चिपका है .
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सबसे ज्यादा फजीहत बेचारे अरुण जेटली की हो रही है, एक तो पिछले दरवाजे से बेशरमी से आया है, मंत्री बना बैठा है , मोदी जी की हम्माली करता है, देश का आर्थिक भार उठाता है, अम्बानी से लेकर अडानी तक को झेलना पड़ता है और अब ये अरविन्द ने सड़क पर लाकर कचरे कर दिए उसके , इत्ते बड़े मंत्री को दिल्ली क्रिकेट एसोसियेशन में चोर बता दिया दिया......कित्ती बेइज्जती सहेगा रे आदमी हे भगवान............मतलब कोई जमीर ही बाकी नहीं रहा, फिर बन्दे में दम है पूरी तरह से ढीट बनकर कुर्सी से चिपका है .
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हरामजादे, रामजादे, 56 इंची सीना, सहिष्णुता से कायर और सायकोपैथ तक देश का सफर ....
सबको लाईन से नोबल शान्ति पुरस्कार दे दो।


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पहली बार किसी प्रधानमन्त्री को किसी मुख्यमंत्री ने धमकी दी कि मेरे खिलाफ सी बी आई की कार्यवाही करके देखे , मैं डरने वाला नही।
मैं इंदिरा की बहू हूँ इसलिए मुझे कोर्ट भी कुछ ना कहें- सोनिया का यह कथन भी इसी परिपेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
आये दिन आदित्यनाथ या अन्य मूर्ख और घटिया सांसदों द्वारा दिए जाने वाले क़ानून का मख़ौल उड़ाते बयान क्या दर्शाते है।
ये कहाँ आ गए हम, और क्या मूल्य हो गए है, कितना और गिरेंगे। आपको दुःख नही हो रहा इन सारे जन प्रतिनिधियों को देखकर - मोदी, अमित शाह, लालू, राहुल गांधी, केजरीवाल जैसे लोगों ने पूरी दुनिया के सामने देश की क्या इज्जत बनाकर रख दी है, एक ओर बुलेट ट्रेन जैसी आधुनिक सोच दूसरी ओर पत्थर युग के समान आदिम लड़ाईयां। बेहद शर्मनाक स्थिति है और आज बहुत दुखी हूँ।
अफ़सोस सिर्फ यह है कि सर्व शक्तिमान राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट आज चुप है।
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मप्र में सी बी आई क्या कर रही है और मौतों का सिलसिला क्यों बंद गया है.............
शिवराज के खिलाफ कार्यवाही कब होगी........?