Tuesday, August 27, 2013

भोजन का अधिकार पारित होने पर.

मेरी आज की एक टिप्पणी भोजन का अधिकार पारित होने पर.

"भोजन के अधिकार वाले देखते रह गये, हर्ष मंदर, एन सी सक्सेना और सुप्रीम कोर्ट में बरसो से पेंडिंग याचिका धरी रह गई, तमाम राज्यों में फैले हुए सलाहकार कुछ नहीं कर पाए और सब आंकड़े और रणनीतियाँ भी खोखली साबित हो गई. हाँ हुआ यह कि इस बीच एक्शन एड से लेकर कई दीगर संस्थाओं और तथाकथित कंसल्टेंट्स ने खूब माल, नाम, जमीन बंगलें और यश बटोर लिया ........खाद्य सुरक्षा के नाम देश में इतने वर्कशॉप और सेमीनार पिछले दस बरसों में हुए है कि एक पूरा प्रदेश कम से कम पांच साल खाना खा सकता था बैठे बैठे, हवाई यात्राएं और बाकि छोटे मोटे खर्च तो अलग है

कुल मिलाकर सब फेल, सरकार पास..."

Sachin Kumar Jain "संदीप भाई, आपकी एक पोस्ट के सन्दर्भ में कुछ सूचनाएं देना चाहता हूँ ताकि कोई गताल्फह्मी न रहे. आपने सर्वोच्च न्यायालय आयोक्तों और सलाहकारों के बारे में अपने मत व्यक्ति किये हैं. तथ्य यह है कि पिछले १३ सालों में आयुक्तों ने अपने काम के लिए कोई मानदेय या वेतन नहीं लिया है; सलाहकारों की भूमिका और काम भी अवैतनिक है. इतना ही नहीं कोई भी सलाहकार इस काम के लिए किसी भी तरह की फंडिंग नहीं लेता है. अपने मौजूदा काम के साथ समन्वय करके यह काम किया जाता रहा है. कोई कुछ कर पाया या नहीं, यह एक वस्तुनिष्ठ विचार है. इस विचार में कोई दिक्कत भी नहीं है, पर साथ में विचारों की वस्तुनिष्ठता को भी जांचते रहना चाहिए. कम से कम इतना तो गर्व है कि इनमे से कोई भ्रष्ट नहीं रहा. यह भी गर्व है कि हम एक अस्वीकार की जाने वाली सच्चाई को आवाज़ दे पाए. कल यदि आपने संसद की बहस सुनी हो और आयुक्तों या अभियान के काम का अध्ययन किया होगा तो तो आप इस काम का प्रभाव और महत्त्व दोनों समझ पायेंगे; स्वीकार करें या न करें, यह कोई मसला नहीं है. चूँकि मैं भी इस व्यवस्था का एक हिस्सा रहा हूँ, इसलिए कहने से रोक नहीं पाया खुद को!

आज बहुत पेट दर्द होगा कुछ दोस्तों को; कुछ भी हो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित जो हो गया. कुछ और न सही, हम सरकार को यह स्वीकार करने के लिए तो मजबूर कर पाए कि वह आर्थिक नीतियों की आग में भूख और गरीबी की कड़वी सच्चाई को न जलाए. हम उसके दावे झुठला पाए. मैं नहीं समझ पाया इन दोस्तों के पक्ष को; ये किसानों की आत्महत्या और खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश पर मौन रहते हैं. ये गरीबी की परिभाषा पर चुप हो जाते हैं. ये नियमागिरी, विदर्भ, जी एम् तकनीक की राजनीति और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून की राजनीति के परस्पर सम्बन्ध भी नहीं समझ पाते हैं.....ये बस व्यक्तिगत खाज में खुजाई का काम करने में माहिर हैं; इन्हें पहचान लेना भर पर्याप्त है.
Sandip Naik यह एक तंज है जो यह कहता है कि आखिर में सरकार और बहुमत ही जीतता है जो निहायत ही घटिया है. किसी को टारगेट बनाना उद्देश्य नहीं है. बात तो सही है बोस यदि तुम इसे मेरी टिप्पणी पर कमेन्ट करो या मुझे इजाजत दें तो इसे वाल पर पेस्ट करू दूँ क्योकि इसमे सचिन जैसे लोग कम से कम शामिल नहीं थे जो खाद्य सुरक्षा के नाम पर गडबड करते रहे है और एक्शन एड का नाम अपने अनुभवों और विकास संवाद के जन्म के आधार और समय और कालान्तर में उनके नजरिये और देश में जगह जगह हुए सम्मेलनों में उनकी भूमिका, उन्नी डेनियल जैसे लोगों का एक्शन एड में रहना और फ़िर एड एट एक्शन में रहकर एकदम भिन्न स्टेंड लेना यह सब मेरे दिमाग में शामिल था, इसलिए उनका नाम जान बूझकर लिखा था जो हम सबके साथ हुआ था उन लंबी लंबी बहसों में. इससे शायद वे लोग सामने आये जो सच में अथक प्रयास करते रहे और दूसरा वे लोग बेनकाब हो जो सिर्फ खाते रहे.
मैंने तुरंत तो कुछ कहा नहीं फ़िर अभी लंबा सोचा और अपने लिखे तुम्हारे "खाज की खुजली" को फ़िर से पढ़ा और यह लिखा है...............
और यह भी कहना था कि सरकार नामक घड़ियाल पर इतना करके भी कुछ फर्क नहीं पडता................
तीसरा अब याचिका जो लंबित है उसका क्या..........? यहाँ न्याय की भी भूमिका पर प्रश्न चिन्ह है.................

सचिन जैन : संदीप भाई, मैं आपकी बात को समझता हूँ, पर आप भी जानते हैं कि आज की तारीख में यह बहस बहुत संवेदनशील है. बहुत अच्छा या पूरा अच्छा कुछ नहीं है, पर जो थोडा अच्छा भी है उसमे से क्या निकलता है, यह देखने की कोशिश जरूर है. निःसंदेह इसका मतलब मध्यमार्गी होना नहीं है. यह महत्वपूर्ण हैं कि हम अपना पाला तय करें और फिर लड़ें. दिक्कत यह है कि हममे से कुछ लोग राजनीतिक पक्षधरता को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते हैं. और इस कारण से उन्हे दलीय राजनीति से जोड़ कर देखा जाता है. मैं सहमत हूँ कि इससे वैचारिक लड़ाई कमज़ोर भी होती है; लेकिन वह व्यक्तिगत प्रवर्ति नहीं है, वह एक राजनीतिक प्रवर्ति है.
मैं तो बस अपनी बात आपसे कहना चाहता था, सो कह दी थी. हालाँकि किसी ने उस पर कुछ कहा नहीं था पर मेरे मन में थी तो आपको सीधे लिख दिया था.

कोई दिक्कत नहीं यदि आप इसे वाल पर डालें तो...

संदीप- अच्छा लगा और भाई अगर झगडना या मत व्यक्त करना होंगे तो हम आपस में ही करेंगे तीसरे आदमी से नहीं करेंगे जिसे हम जानते नहीं है

सचिन - कोर्ट केस का जीवन इस क़ानून के साथ जुड़ा है. मौजूदा बैंच मानती है कि यदि सरकार यह क़ानून बना दे तो केस का अंतिम फैसला दे दिया जायेगा. और इसके बाद यदि कोई समस्या हो तो नए क़ानून के सन्दर्भ में कोर्ट जाना होगा नए सिरे से.
आपसे सहमत हूँ.

संदीप - अफसोस यह हुआ कि बिराज से लेकर सचिन तक जो लंबा लड़ रहे थे वो अंदर से टूटते है जैसे मेधा सुप्रीम कोर्ट के बाहर रोई थी जब कोर्ट ने बगैर पढ़े फैसला दे दिया था उससे जमीन पर काम कर रहे लोगों को तकलीफ होती है मेरी इस पीड़ा को भी दर्ज करें..................

सचिन - शायद हम सब भी चाहते हैं कि कोर्ट सी बात अब बाहर आना चाहिए.......कब तक कोर्ट के सहारे चलेंगे! अब अपनी ताकत को परखना जरूरी है.....जब तक यह केस खत्म नहीं होगा शायद हम भी योजनाओं के ट्रेप से बाहर नहीं आ पायेंगे......यह भी तो जाल ही है न!
एक भी व्यक्ति - आयुक्तों से लेकर सलाहकार तक यह नहीं चाहते कि अब यह व्यवस्था और चले....क्योंकि अपने आप में इसका कोई अस्तित्व नहीं है.
जहाँ तक मेरी आज की पोस्ट का सवाल है, वह उनके बारे में हैं, जिनका अपना कोई नजरिया नहीं है.....जो खुद तय नहीं कर पा रहे हैं कि सही क्या है और गलत क्या है?

Sunday, August 25, 2013

ज़िंदगी में दौडते दौडते इतना थक गया हूँ

ज़िंदगी से जब सब कुछ खत्म हो जाता है तो एक विदूषकीय चरित्र बन जाता है अच्छा भला आदमी, बेहतर है इसे खुद स्वीकार लें बजाय इसके कि कोई और कहें.

नहीं, मेरा दर्द तुम कभी नहीं समझ पाओगे, एक दिन तुम्हें कहूँगा कि संदीप नाईक के खिलाफ संदीप नाईक का मुकदमा लड़ो संदीप नाईक...........

ज़िंदगी में दौडते दौडते इतना थक गया हूँ कि अब कही थक कर बैठने से डरता हूँ कि खामोश देखकर मौत अपने पंजे ना फैला दें और ठीक इसके विपरीत दौडते दौडते स्वप्नों की अंधी दौड़ में शामिल ना हो जाऊं कही..........

किसी से क्या नाराज होना, अपने आप से नाराज होकर अगर हम मोक्ष का सोच रहे है तो क्या गलत है............और फ़िर वही तो करना है जो बसका अंत में होगा, बेहतर है चुन लें अभी से बजाय घसीट घसीटकर जीने से..............

हम सब लौटना ही तो चाहते है इसी ओर, इसी दिशा में, इसी प्रारब्ध की ओर फ़िर काहे को संकोच , फ़िर काहे का लोभ और माया, फ़िर काहे की देरी.............चले आओ, लौट आओ, बस एक बार सिर्फ एक बार लौट आओ........ सुनो जीवन यही से शुरू होगा फ़िर एक बार सुना है ना फीनिक्स पक्षी के बारे में...............??? लौट आओ, बस एक बार, यही से साँसों का सफर खत्म होता है और अनहद नाद भी .........

तुमने तो कहा था चलने का, लगा भी था कि तुम दौड़ रहे हो, पर ये क्या तुम तो वही हो जहाँ मै छोड़ आया था...........क्या रेंग भी नहीं पाए इतना कि इन कछुओं से ही बाजी लगा सको.......? ये कछुए जो पीठ पर मोटी चमड़ी लिए यहाँ वहाँ अपना जमीर और मुँह दोनों अंदर ढांककर लगातार खरगोशों से रेस लगाकर जीतने के दिवास्वप्न देख रहे है ...............

सुन रहे हो ना.... तुमसे ही कह रहा हूँ कुछ भी नाम हो सकता है तुम्हारा.........अजय, विजय, विकास, गगन, आकाश या अनिल, सुनील, भास्कर, सचिन या मोहन, सोहन या लीला, रेखा, अनिता, सुनीता या और भी कुछ जो दूर तक गूँज रहा हो महानता के आगोश में डूबकर ........


वहाँ इतनी बारिश और यहाँ इतना सूखा, जीवन भी कैसा होता है, कभी कुछ सार्थक होता घटते हुए देख पाउँगा..... अब जब समय की सुईयां इतनी तेजी से अपने मंतव्य की ओर बढ़ चुकी है जिन्हे पकडना अब नामुमकिन है ............सुन रहे हो, कहाँ हो तुम.......

यदि किसी से आपको जलन हो रही है तो यह अच्छी बात है यकीन मानिए................एक बार दिल भरके जल भुनकर देखिये...............

रातें आ रही है और फ़िर चली भी जायेगी, बचेंगी तो सिर्फ यादें और एक दिन यह भी होगा कि रात, रात ही में ढह जायेगी और हम कभी आँख नहीं खोल पायेंगे और सुबह का सूरज नहीं देख पायेंगे.............ऐसी ही एक रात के इंतज़ार में ........आमीन.......

कोशिश तो फ़िर भी करना होगी कि हम आखिरी सांस के समय सचेत रहे और देख सके कि हमने क्या पाया और क्या खोया नहीं, सिर्फ पाया था............जिसे अब सहेजे नहीं बल्कि छोड़कर चले ही जाना है........बस ऐसी ही किसी सांस के इंतज़ार में..........

आमीन.

Saturday, August 17, 2013

जनज्वार मे मेरा आलेख 17 अगस्त 2013 गांधी का चरखा चबा गये, भरे पेट पर देश खा गये

Amar Ujala, Lucknow, 12 Aug 2013

गांधी का चरखा चबा गये, भरे पेट पर देश खा गये

इंदौर से निकालने वाले सर्वोदय प्रेस सर्विस मे अभी एक समाचार पढ़ा कि सरकार ने गांधी जी के समस्त कामों, यात्राओं और लिखे पढ़े को डीजिटाईजेशन करने के लिए बयालीस करोड दिए है और एक समिति बनी है. समिति के एक सदस्य ने यह जानकारी दी कि इस बयालीस करोड का क्या, कैसे इस्तेमाल किया जाएगा इसमे भारत सहित उन सभी देशों की यादों को भी एकत्रित किया जाएगा जहाँ जहाँ गांधी जी गये थे. मेरे दो-तीन मासूम सवाल है, यह समिति किसने बनाई और कौन इसका निर्णय करेगा कि गांधी की वसीयत क्या है और अब उसमे और क्या दस्तावेजीकरण किया जाना शेष है क्योकि इतना लिखा गया है गांधी के नाम पर कि देश के पेड़ खत्म हो गये है कचरे को छाप-छापकर. दूसरा, आप कब तक इस देश मे गांधी और गांधी परिवार और गांधी के नाम का दुरुपयोग करते रहेंगे? तीसरा आप कस्तूरबा स्मारक को करोडो की ग्रांट बजट मे देते है, गांधी शान्ति प्रतिष्ठान को पालते है, वर्धा मे गांधी के नाम पर बेमिसाल संपत्ति को ढोते है और उसे पालते पोसते है, मेंटेन करते है, और अब यह नया शिगूफा, आखिर क्या हो गया है इस देश को कब गांधी - गांधी चिल्लाकर रूपया ऐंठते रहेंगे ये गांधीवादी. मेरा दावा है खादी और अंदर से चार-चार तौले सोना पहने वाले, जोकी को धारण करने वाले और बैंकों मे करोडो की व्यक्तिगत एफ डी बनवाने वाले, हवाई यात्राओं मे घूमने वाले, जुबाँ पर अंग्रजी और व्यवहार मे घोर व्यवसायी गांधीवादी लोग क्या सचमुच गांधी है या इनमे कितना गांधीवाद बचा है. गांधी का चरखा चबा गये, भरे पेट पर देश खा गये, फ़िर भी ये भूखे के भूखे मांग रहे अनुदान........... अब इनसे कहो कि अपनी रोटी कमाकर खाए बहुत हो गया चुतियापा, देश का बहुमूल्य रूपया जो गिर-गिरकर इतना नीचे चला गया है कि कीमत ही नहीं बची, बच्चे भूखे मर रहे है, गरीबी मे सारा देश परेशान है और इन तथाकथित गांधी वादियों को ऐयाशियाँ सूझ रही है, करेंगे क्या गांधी के नाम पर दस्तावेजीकरण करके किसको दिखाना है, कौन देखना चाहता है और किसे पसंद है आज गांधी ? सब बेवक़ूफ़ बनाकर मोटी कंसलटेंसी वसूल कर अपनी धन संपदा बढ़ाना चाहते है बुढापे मे पैर कब्र मे, मुँह मे दांत नहीं, हाथ पाँव काम के नहीं, दिमाग पूरी तरह से सठियाया हुआ, जुबाँ पर पुराना माल बेचने वाला स्लोगन, जीवन मे किया एकाध ढंग के काम को ताउम्र बेचते रहना, चार नौजवानों को अपना गुलाम बनाकर उनके कंधों पर अपना भारी भरकम बोझ ढोना, पाईल्स और गठिया के मरीज ये गांधीवादी सुबह उठाकर चरखा या तकली काटने का नाटक जानते है बस और कुछ नहीं. भाई साहब बयालीस करोड बहुत होता है और ज़रा हिसाब लगाएं इनके पास संपत्ति कितनी है और इसका उपयोग कौन करता है , कभी जाकर देखिये गांधी शान्ति प्रतिष्ठानों मे कि आपको एक रात वहाँ टिकने भी दिया जाता है क्या? सब अड्डे बन गये ऐयाशियों के और बौद्धिक जुगालियों के कर क्या रहे है. अब ये मत पूछना कि मै क्यों इतना निगेटिव हूँ और फ़िर मेरे विचारधारा क्या है और मै एनजीओ के खिलाफ और कारपोरेट के खिलाफ, और सारी पार्टियों के खिलाफ तो किसके साथ हूँ.........बस एक इंसान हूँ जहाँ घपला दिखता है उसके खिलाफ हूँ ........बंद करो और शर्म करो महात्मा के भेष मे छुपे समाज के असली दुश्मनों ..............बंद करो महात्मा को बेचना, पूछो कि क्या वे लिंकन को बेच रहे है, वे क्या रूसो को बेच रहे है, क्या मार्क्स को बेच रहे है वे, क्या मंडेला को बेचा, क्या केनेडी को बेचा, क्या कास्त्रो को बेचा??? तुमने तो पूरी ज़िंदगी गांधी के नाम पर बीता दी मक्कारों कुछ काम नहीं किया कभी, सात तिया इक्कीस पीढ़ी के लिए इकठ्ठा कर लिया फ़िर भी हवस शांत नहीं हो रही?

Thursday, August 15, 2013

लौटना रुधिर होना है. लौटना पृथ्वी होना है.


प्रतीक्षा की बंद मुट्ठी में ललक के आकाश को भींचे लौट रहा हूँ. स्मृतियों के मौन युद्द्ध में लौटना एक संधि-

प्रस्ताव है. एक शरणार्थी समय के अपदस्थ वर्तमान के बीच लौटना, माँ होना है. विवशताओं के नाखूनों से 

आशाओं के ज़ख्म कुरेदती इस जानवर रात में लौटना, अपनी मनुष्यता की भोर में सभ्यता का जागना है.

लौटना रुधिर होना है. लौटना पृथ्वी होना है.

देवास लौट रहा हूँ.

Subodh Shukla की दीवार से स्टेटस को चोरी करते हुए माफी सहित..........

Sunday, August 11, 2013

"इस बार फ़िर गलत होने को मन करता है"



अक्सर यह होता है कि चौराहों पर से 
गुजरते हुए सही रास्ता जो मै सोचता हूँ 
वो आगे जाने पर गलत निकलता है,
जो उम्मीद मै लगाता हूँ वो अक्सर 
नाउम्मीदी मे बदल जाती है मित्रों.

जब भी कही कुछ अच्छा होने की 
संभावना दिखती है वही सब चौपट 
हो जाता है और सब कुछ नष्ट प्रायः सा 
दूर कही से आते बादल पास आकर 
एक धूल भरे बवंडर मे बदल जाते है.

जब खेतों से गुजरता हूँ खड़ी फसलें बिछ 
जाती है अक्सर सूख जाता है उनका रस 
पानी के पास से गुजरता हूँ तूं तो रीत जाते है स्रोत 
बस्तियों से गुजरता हूँ तो चीखें सुनाई देती है 
प्यार की उम्मीद मे अक्सर जहर मिलता है. 

छोटे बच्चों से मिलता हूँ प्यार से तो तडफ उठते है   
गीत और सौग गाती महिलाएँ क्रंदन करने लगती है 
हंसते लोग अक्सर दुखडा सुनाने लगते है 
उडते पंछी लहुलूहान होकर गिर जाते है जमीं पर 
मै अच्छा सोचता हूँ सबके बारे मे बावजूद इसके 

अक्सर कहते है मित्र कि साला पनौती है
शुभ मौकों पर दूर कर देते है मुझे
मोहित कहता है काली जुबान अक्सर 
घर द्वार मे बोलने से रोक दिया जाता है 
कह नहीं सकता पर सच कहता हूँ मै.

आजकल सारे लोग एक उम्मीद के सहारे 
जीवन और समाज की खुशियों के स्वप्न  
देख रहे है और इसके पीछे दमक रहा है 
एक तानाशाह का विद्रूप चेहरा, जो हंसता है 
मुझे लगता है ऐसा हो जाये ताकि मै फ़िर गलत होऊ 

जनसत्ता मे 10 अगस्त को बी ए पास बनाम वक्त का दस्तावेज.................

Thursday, August 8, 2013

मदरसों मे गीता के बहाने नैतिक शिक्षा की पडताल.

शिक्षा मे नैतिक शिक्षा, मूल्यों की शिक्षा की बहुत बात होती है. और अक्सर इसे धार्म से जोड़कर देखा जता है, मुझे याद है जब मै आर्मी स्कूल मे था तो अक्सर नवमी के बाद बच्चे यह कालांश गोल कर देते थे और जब उनसे मै पूछता था कि क्या बात है क्यों गोल कर दिया तो कहते थे अरे सर वो......मेडम तो कल रात मे ऑफिसर्स क्लब मे फलाने ब्रिगेडियर के साथ  दारू मे झूम रही थी और आज सुबह हमें नैतिक शिक्षा पढायेगी, देवास के विन्ध्याचल अकादमी मे था तो बच्चे कहते थे वो सर क्या गरीबों से हमें सीखने की सलाह देते है जो खुद कार मे आते है और थोड़ा सा भी पैदल नहीं चल सकते. दूसरा छोटी कक्षाओं के बच्चे अक्सर आदर्श और वास्तविकता मे बहुत अंतर् पाते है, हम कहते है झूठ मत बोलो और घर मे पापा मोबाईल पर अक्सर कहते है कि आज कानपुर मे हूँ या दिल्ली मे हूँ, तो अब सवाल यह है कि नैतिक शिक्षा क्या किताबों से मिल सकती है , 

इसमे यह भी ध्यान रखना होगा कि पाठयपुस्तकों के अलावा स्कूल ये किताबें बहुत महंगे दामों पर पालकों को खरीदने के लिए मजबूर करते है और इसका मोटा कमीशन स्कूल संचालक या प्राचार्य को सीधे सीधे जाता है अब यहाँ से नैतिक शिक्षा की शानदार शुरवात होती है. इन किताबों मे धर्मनिरपेक्षता के नाम पर  कौरव, पांडव, श्रीकृष्ण या पंचतंत्र की कहानियां होती है. और फ़िर गौतम बुद्ध , महावीर स्वामी गुरु गोविन्द सिंह की कहानियां, नीति के दोहे या किसी वीर बालक की कहानियां कही कोई महिला की कहानी आ जाये तो आप एहसान समझिए लेखक का वरना सारे आदर्श काम और ज्ञान की बातें तो पुरुषों ने ही कही है. अब आईये चूँकि मजबूरी है सप्ताह के स्कूल टाईम टेबल मे इसे जगदेने की तो हर जगह जहाँ बच्चे गणित या विज्ञान जैसे विषयों से उब रहे हो तो एक रिलेक्स या कॉमिक रिलीफ देने के लिए इसे डाल दिया जाता है और जिस शिक्षक की ड्यूटी इसे पढाने मे लगी रहती है वह उस कक्षा मे अमूमन बैठकर या तो कुर्सी पर अपनी टेस्ट की कॉपियां जांचती है या थोड़ा सुस्ता लेती है, ताकि अगले पीरियड की तैयारी कर पाए. और बच्चे मजे लेते है और या तो वे भी अपना काम करते है या चुहलबाजी करते है. कुल मिलाकर सप्ताह मे एक या दो दिन नैतिक शिक्षा का हो हल्ला रहता है, अब आप बताईये कि क्यों आखिर इतना हल्ला चाहे स्कूल मे गीता थोपने की बात हो या रामायण की या मदरसा मे कुछ थोपने की बात हो. 

सबसे महत्वपूर्ण है कि नैतिक शिक्षा कभी भी किताबें पढकर नहीं आ सकती या मूल्य किताबों से नहीं विकसित किये जा सकते क्योकि जिस तरह के समाज मे हम रह रहे है वहाँ यह सब अब बेमानी हो गया है. असल मे जिस तरह से बच्चों मे अनुसरण की प्रवृत्ति होती है वे अक्सर इस तरह के दोहरे मानदंडों को जल्दी पकड़ लेते है और जहाँ तक किशोरों की बात है उनके रोल माडल और आईकोन अलग होते है तो ऐसे मे हम किस तरह की नैतिकता की बात कर रहे है, तीसरा हमने एक लंबा समय देख लिया है शिक्षा मे जितना नवाचार, व्याभिचार और प्रयोग भारत मे हुए है उतने दुनिया के किसी देश मे नहीं हुए होंगे चाहे वो पाउलो फ्रेरे ने ब्राजील मे किये हो, समरहिल मे हुए हो, या छोटे मुल्कों ने किये हो.  यहाँ तो शिक्षा मे प्रयोग और खाकरके नैतिक शिक्षा मूल्य शिक्षा को करने थोपने और अपनी विचारधारा को पाठयक्रम मे समाहित करने की बात का जो चस्का एनसीआरटी से लेकर राजनैतिक दलों को है वहा कही नहीं होगा. 

अकादमिक नवाचार और विषय संबंधी नवाचार को लेकर मप्र की संस्था एकलव्य के विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम, प्राथमिक शिक्षा या सामाजिक कार्यक्रम को लेकर मुझे कही कोई और पहल सार्थक रूप से नजर नहीं आती जिसमे सुबीर शुक्ला से लेकर अंजलि, सुब्बू, अरविंद, टूलटूल , राजेश, रश्मि, विनोद, अनिता रामपाल, ह्रदयकान्त दीवान या कमल महेन्द्रू या दिल्ली विवि के तमाम वो लोग या टीआईएफआर या प्रो अनिल सदगोपाल जैसे लोगों ने काम किया है. परन्तु नैतिक शिक्षा का जो कबाडा हुआ है उसकी यह परिणिती है कि आज देश मे नैतिकता बची ही नहीं है और इसके नाम पर वाक् युद्ध से लेकर सब तरह के युद्ध जारी है. आज अजीम प्रेमजी जैसे बड़े महंगे विवि खुल गये है पर इनकी भी मेल आती है तो अक्सर उसमे नैतिक शिक्षा के बारे मे व्याख्यान आदि का ही ज्यादा जिक्र होता है और उसमे भी विदेशी प्राध्यापकों के नाम ज्यादा होते है. 

मुझे लगता है कि दरअसल मे हम बहुत गडबड कर रहे है. नैतिक शिक्षा एकदम भिन्न है और धर्म और गीता थोपना भिन्न पर सरकारों मे बैठे लोग इसे एक ही मानते है राजनीतिज्ञों को यह नैतिक शिक्षा विषय एक ऐसा ओपन एवेन्यू दिखता है जहाँ से वे अपना हर तरह एजेंडा थोप सकते है साथ ही अपनी बात मनवा भी सकते है. कोई भी शिक्षा सिवाय अकादमिक विषयों के, बल्कि किसी हद तक अकादमिक विषय जैसे भाषा विज्ञान गणित भी, व्यावहारिक रूप से दैनंदिन जीवन से सीखी जा सकती है. धर्म हो या नैतिकता क्यों ना हम बच्चों  को अपने समुदाय, परिवार, पालकों, अपने दोस्तों,  जिसे हम पीयर्स कहते है, या शिक्षकों से सीखने के अवसर दें. यदि गीता सच बोलने या कर्म करने का पाठ पढाती है या मोहम्मद साहब इल्म की ताकत की बात करते है महावीर अहिंसा की बात करते है बुद्ध अप्प दीप भवो की बात करते है तो क्यों ना वे अपने जीवन से सीखें उन लोगों से सीखे जो इन शिक्षाओं को अपने वास्तविक जीवन मे उतार चुके है ? 

एक बार फ़िर से सही समय है कि इन मुद्दों को शिक्षा मे फ़िर परिभाषित किया जाये और टटोला जाये ताकि ये स्थाई बहस और घटिया राजनीती कम से कम शिक्षा के परिसरों से दूर हो. 

अमर उजाला 7/8/2013

Wednesday, August 7, 2013

मृत्यु जीवन के सबसे सुन्दर भाग से भी खूबसूरत है

आशिकी दो देखी ................हीरो का मर जाना मुझे सबसे अच्छा लगा. जीवन की सबसे अच्छी सखी मौत ही हो सकती है और अगर घसीट- घसीट कर जीना पड़े तो मौत स्वीकारना बुद्धिमता है.

इसकी समीक्षा मे इसके सिवा और कोई बात नहीं है.... ज़िंदगी का असली सच मौत से मिलना और ज़िंदगी का सबसे बड़ा कर्म अपने आपको उस मौत से गले लगाना है जिसके लिए ताउम्र मेहनत करते है. 

दरअसल मे राहुल का मरना हो या हर्ष का मरना (मुझे चाँद चाहिए) दोनों ही हीरो है दोनों ही जीवन की उन परिस्थितियों मे से गुजरते है जहाँ जीवन और मौत एक हो जाता है, जीवन और मौत के घालमेल मे जीवन मे सुख का पलडा भारी हो यह बिलकुल गलत है और ऐसे मे अगर हर्ष और राहुल मौत को जितने गर्व से गले लगाते है वो कोई गलत नहीं बल्कि मेरे लिए यह एक मात्र आदर्श स्थिति है जहाँ जीने के बजाय या घिसटते जाने के बजाय सहज और सम्पूर्ण हो जाता है. 

मै इसी को चौरासी करोड योनियों से मुक्त होने का फल मानता हूँ अगर यह मान्यता है तो. जैसे गुनाहों के देवता का हीरो बिनती के साथ ही शेष बचा जीवन जीने को अभिशप्त रहता है. जीवन से सुधा का जाना, आरोही या वर्षा का सफल होना - एक जलन नहीं, बल्कि एक तरह का ठहराव है और शायद अपने सिसकते दर्प और अहम के संतुष्टि का असर होता है, जो पुरजोर तरीके से सिर्फ और सिर्फ मौत की ही मांग करता है. 

हम सब अपने अपने जीवन मे हीरो होते है और एक समय ऐसा आता है जब हम मौत के स्वरुप को स्वीकारते है और जीवन के बहरुपिया भाव को नकारते हुए सिर्फ शाश्वत सत्य को अपनाना चाहते है. इस समय हम दुनिया की ना पर्वाह करते है, ना किसी और बात की या दर्शन की वेल्यु, बस हमें लगता है कि यही सच है और यकीन मानिए जिस समय आपको यह भाव लगने लगे वह सम्पूर्णता है वही वस्तुनिष्ठता है और वही परम सत्य....इसे आप डर, कमजोरी, अपराध बोध या कोई भी तत्सम तद्भव के नाम दे दीजिए पर सच आप भी जानते है और आपका मन भी ........

मुझे लगता है मृत्यु जीवन के सबसे सुन्दर भाग से भी खूबसूरत है और इसलिए मै हर्ष, राहुल की मौत को तर्कसंगत मानता हूँ. आप ना माने वो आपकी अपनी परिस्थिति से भागने या पलायन करने की मनोवृत्ति है.

Tuesday, August 6, 2013

"एक स्थगित होती दुनिया की कविता"


शाम होते ही शाम ढल जाती है और रात की शुरुवात मे ही रात भयवह लगने लगती है और फ़िर शुरू होता है एक दुष्चक्र, एक युग से लडने का, एक दृष्टा बनकर सब कुछ सहने का और फ़िर इंतज़ार एक भोर का जो शायद उजाला लेकर आये...........


जब तक सोचता हूँ कि कुछ करूँ 
तब तक रेल के हजारों यात्री देश के
दूसरे कोने मे पहुँच जाते है 
जब तक उठकर चलना शुरू करता हूँ 
तब तक कई हवाई जहाज पूरी 
पृथ्वी का एक चक्कर लगा लेते है 

जब तक कुछ करता हूँ शुरू 
दुनिया मे लाखों लोग अपनी
अंतिम सांस ले चुके होते है
अपनी ज़िंदगी की लड़ाई हार चुके होते है

मै बहुत कुछ करना चाहता हूँ
पर हर बार देर हो चुकी होती है
दोस्तों से बात करने लगता हूँ तब
तक आधी दुनिया आपस मे
लड़ चुकी होती है एक बड़ी जंग

अपने दुश्मनों से लडने की रणनिती
बनाता हूँ तब तक लाखों बच्चे एक
उम्मीद के साथ जन्म ले चुके होते है
और करोडो फूल खिल चुके होते है

कितना कुछ स्थगित कर रहा हूँ
मसलन मिलना- जुलना
लड़ना- भिडना, रोना मुस्कुराना
लिखना- पढ़ना और वो सब जो
जीवन जीने के लिए जरूरी होता है

पर अब फ़िर से सोचता हूँ कि इस बार
यह आर-पार का मामला बनाना है
बगैर किसी पल को गंवाएं कर लेना है
वो सब जिसे करने को मै यहाँ था

पर हर बार फ़िर से हार जाता हूँ
अपने आपसे, पता नहीं क्यों
दिखने लगा है कही दूर अस्त
होता सूरज और आसमान के
एक कोने मे गर्द का बादल

उसे रंगने के लिए आज कूची भी
उठाई है, रंगों की दुनिया को एक कोरे
कैनवास पर उकेरना है पर
फ़िर देर हो रही है मित्रों

और ये देखो कितनी बदल चुकी है
दुनिया, फ़िर हंस रहा है तानाशाह
फ़िर खतरा है नौनिहालों की हंसी पर
कलियाँ फ़िर खतरे के मुहाने पर है

वो आ रहे है कि सब स्थगित हो जाये
सब खत्म हो जाये कि कही कुछ
शेष ना रह जाये, किसी को मियाद ना मिलें
कि वो अपने मन का कर लें, जी लें

सब खत्म हो रहा है मित्रों
और देखिये इतनी देर मे
आप भी कितना बदल गये है
कैसे मै उम्मीद करूँ कि आप
साथ है मेरे....???

(लखनऊ की एक उदास शाम मे खत्म होती जा रही ज़िंदगी का बयान)

हंस की गोष्‍ठी पर वरवर राव का खुला पत्र




अपूर्वानंद-जनसत्‍ता के तर्क ''उदार लोकतंत्र'' की सड़क को हाइवे बना देने की शुरुआत हैं: वरवर राव का दूसरा बयान

''मित्रो, 31 जुलाई 2013 को प्रेमचंद जयंती पर हुए कार्यक्रम में आयोजकों द्वारा सिद्धांतविहीन तरीके से एक हिंदू साम्‍प्रदायिक व्‍यक्ति व वैश्‍वीकरण के समर्थक एक कॉरपोरेट साहित्‍यकार को तर्कहीन बहस खड़ी करने की मंशा से मंच पर वरवर राव के साथ बैठाने का जो असूचित फैसला किया गया और जिसके कारण वीवी ने इसका बहिष्‍कार किया, उसके बाद शुरू हुई बहस के संदर्भ में उन्‍होंने अपनी दूसरी टिप्‍पणी भेजने के लिए मुझे कहा है। इस बात को लेकर काफी अटकलबाज़ी हुई है कि आयोजकों ने उन्‍हें यात्रा का खर्च दिया था, इसलिए यहां यह मसला साफ कर दिए जाने की ज़रूरत है। वीवी ने आयोजकों से यात्रा का कोई खर्च नहीं लिया था। उन्‍हें टिकट बुक करवा कर आयोजन में आने को कहा गया था। उन्‍हें आयोजन के स्‍वरूप के बारे में पहली बार तब पता चला जब आयोजकों ने उन्‍हें लाने के लिए कार भिजवाई। कार में उनकी सीट पर एक आमंत्रण पत्र पड़ा हुआ था जो उसमें बैठते ही उन्‍हें दिखा। वे जैसे ही गंतव्‍य तक पहुंचे, उन्‍होंने वक्‍तव्‍य नहीं देने का फैसला लिया और निकल लिए। इसके बाद उन्‍होंने एक पत्र के रूप में अपना बयान जारी किया। वीवी हिंदी में नहीं लिखते हैं। वे बोलते हैं और उनके मित्र उसे टाइप करते हैं। लेकिन भाषा के बंधन दिलो-दिमाग के अहसास को साझा करने में आड़े नहीं आ सकते। यह वीवी का दूसरा बयान है। यह उनके पहले बयान के बाद जनसत्‍ता में आई टिप्‍पणियों के संदर्भ में है।'' 

(जीएन साईबाबा द्वारा ईमेल से भेजे गए वरवर राव के दूसरे पत्र पर पाद टिप्‍पणी, जिसे अनुवाद कर के लगाने का अनुरोध किया गया है: मॉडरेटर)  


मित्रों के नाम पत्र


वरवर राव 
31 जुलाई 2013 को प्रेमचंद जयंती पर हंस’ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में हिस्सेदारी न करने का कारण मैंने उसी दिन जारी अपने पत्र में स्पष्ट कर दिया था। मैंने मुझे सुनने आए श्रोताओं से माफी की दरख्वास्त की थी। इस पत्र के जबाब में जनसत्ताअखबार के संपादक ने हंस अकेला’ शीर्षक  से संपादकीय लिख दिया। उसके दूसरे दिन अपूर्वानंद ने प्रेमचंद परंपरा का दायरा’ लिख कर मेरी अनुपस्थिति की काफी सख्त पड़ताल की। ब्लॉग पर इस पत्र के आने के बाद टिप्‍पणियां लिखी गईं और मेरे बारे में क़यास लगाया गया कि मैंने किसी के उकसावे या बहकावे में आकर इस तरह का पत्र लिखा। जनसत्ता’ ने तो युवा लेखकों का एक गुट’ की खोज तक कर डाली। मुझे अभी तक ऐसे युवा लेखकों का गुट’ नहीं मिला जो साहित्य और राजनीति में इस कदर हस्तक्षेप कर मुझे सचेत करे। मैं ऐसे किसी भी राजनीतिसाहित्य और विचारधारा से लैस युवा लेखकों का जरूर स्वागत करूंगा जो मेरे होने वाली गलतियों से बचने के लिए हस्तक्षेप करे और हो गई गलतियों की आलोचना करे। यह मेरे ही नहीं बल्कि समाज के लिए भी स्वास्थ्यकर माहौल होगा जब ऐसे युवा लेखकों के गुटों’ का उभार हो और नई ऊर्जा के साथ ठहराव को तोड़कर सर्जना की महान धारा को नेतृत्व करते हुए आगे ले जाय। निश्चय ही मुझे आगामी दिनों में जब भी दिल्ली आऊंगा तो ऐसे लेखक गुटों’ और लेखकों से मिलने की बेसब्री रहेगी।

जनसत्‍ता का संपादकीय ''हंस अकेला'' 
एक बार फिर मैं अपनी बात दुहरा दूं कि प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर हंस’ ने अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता’ विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला में बुलाया था। यह बहस या संवाद का मसला नहीं था। मैं परिचर्चाबहससंवाद के आयोजनों में जाता रहा हूं और अपनी बात रखता रहा हूं। वहां निश्चय ही आयोजक को परिचर्चा में किसी को भी बुलाने की छूट रहती है और भागीदार को भी हिस्सेदारी करने की उतनी ही छूट होती है। आयोजन का स्वरूप,समय और प्रकृति से ही भागीदारी का अर्थ बनता है। इस कार्यक्रम का स्वरूपसमय और प्रकृति इसमें भागीदार वक्ता और आयोजक की मंशा दोनों से ही मेल नहीं खाता। इसलिए यह जरूरी बन गया कि मैं न केवल इसमें भागीदार न बनूं बल्कि अपना विरोध भी दर्ज कराऊं।

प्रेमचंद के संदर्भ में परंपरा और इतिहास के हवाले से मैंने जिन बातों का पिछले पत्र में उल्लेख किया था वह सामंतवाद-साम्राज्यवाद विरोधीफासीवाद विरोधी धारा को साहित्य में मजबूत करने और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए सतत संघर्ष करने से जुड़ा हुआ है। 1930के दशक में भगत सिंहराम प्रसाद बिस्मिल जैसे सैकड़ों क्रांतिकारी आर्य समाज और अन्य धार्मिक धाराओं से प्रभावित और जुड़े रहे थे। इन क्रांतिकारियों की सीख का अर्थ आज आर्यसमाजी होने या आर्य समाज के कार्यक्रमों में हिस्सेदारी करना नहीं है। इतिहास और परंपराएं समय के साथ बनते और मजबूत होते हुए हमारे तक आती हैं और आगे जाने के लिए उतनी ही जिम्मेदारीसतर्कता और सक्रियता की मांग करती हैं। हंस’ जिस परंपरा का निर्वाह करने का दावा कर रहा है वह उसके द्वारा आयोजित किए जा रहे पिछले कुछ कार्यक्रमों से तो फिलहाल मेल खाता नहीं दिख रहा है। शायद यही कारण भी है जिसके चलते ये कार्यक्रम विवाद के घेरे में आ रहे हैं। यह अच्छी बात है कि युवा लेखकों ने हर बार अपना प्रतिरोधप्रतिवाद दर्ज कराया और सवाल उठाकर बहस को आगे बढ़ाया। मुझे खुशी है कि मैं इन युवा लेखकों के प्रतिरोध और प्रतिवाद का हिस्सा बन सका और उनकी उठाई बहस में हिस्सेदार बना।

यह अच्छी बात है कि ज्यादातर बहस मेरे पत्र में अशोक वाजपेयी के संदर्भ में लिखी बातों पर हो रही है। गोविंदाचार्य के समर्थन में बातें नहीं आई हैं। जितनी तेजी से दक्षिणपंथी ताकतों का असर बढ़ा है और उन्हें जितनी बेशर्मी से मंच देने का प्रचलन बढ़ा है ऐसे में गोविंदाचार्य के समर्थन में बात न आना थोड़ा आश्चर्य में डालता है। हिंदी साहित्य में दक्षिणपंथी और फासिस्ट हिंदू ताकतों को मंच देने का मुद्दा बार-बार आ रहा है और हर बार इस पर विरोध के स्वर भी बनते दिखते हैं। इस बार हंस’ के इस कार्यक्रम में गोविंदाचार्य को बुलाने पर मुद्दा न बनना आश्चर्य में डालता है।

अपूर्वानंद का जनसत्‍ता में छपा लेख 
अशोक वाजपेयी कारपोरेट घरानों और सत्ता के गलियारे से पूरी तरह नत्थी हैंइस बात से अस्वीकार शायद ही किसी को है। उन्हें धर्मनिरपेक्ष’ बताकर उनकी प्रगतिशीलता सिद्ध करने का तर्क दिया गया है। विनायक सेन की रिहाई के लिए अकादमी में जगह बुक कराने के लिए सहर्ष सहयोग के आधार पर उन्हें प्रगतिशील बताया गया है। अशोक वाजपेयी को प्रगतिशील सिद्ध करने के आग्रह के दौरान उतनी ही बार मुझे संकीर्णभी बताया गया जो सिर्फ अपनोंके बारे में बात करता है औरदूसरों’ के बारे में चुप रहता है। यह तर्क और उसका निष्‍कर्ष जितना गुस्से का परिणाम है उससे अधिक साहित्य और राजनीति में घट रही घटनाओं में पक्षधरता और सक्रियता का भी परिणाम है। लगभग दो साल पहले जीतन मरांडी को निचली अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा के खिलाफ संस्कृतिकर्मियों द्वारा दिल्ली में बुलाई गई मीटिंग में मदन कश्यप ने धर्मनिरपेक्षता को वर्ग दृष्टिकोण से देखने का आग्रह किया था। वे ठीक ही इस बात को रेखांकित कर रहे थे। मैं उनकी इस बात में इतना ही और जोड़ देना चाहता हूं कि भारत की धर्मनिरपेक्षता में धर्म के दृष्टिकोण से भी देखने की जरूरत है। हिंदी साहित्य में इन दिनों सीआईए द्वारा की गई साहित्य सेवा’ के विवाद के केंद्र में जो मुख्य बात दिख रही है वह यह कि साहित्य, साहित्य है। यही स्थिति देश में विकास की राजनीति’ की है जिसे नरेंद्र मोदी करे तो अच्छा और टाटा-अंबानी-एस्सार करे तो अच्छाके राग पर आगे बढ़ाया जा रहा है। यही स्थिति जन हितों की रक्षा का हो गया है जिसके झंडाबरदार आज एनजीओ के गैंग ने उठा रखा है। इनका राजनीतिसाहित्यजनसंगठन के स्तर पर विरोध संकीर्णता के दायरे में रखकर देखा जाने लगा है। इस संकीर्णता’ को उदार लोकतंत्र की जड़ में मट्ठा डालने की तरह देखा जा रहा है। यह एक भयावह स्थिति है। यहां तसलीमा नसरीन पर हैदराबाद में हुए हमले के संदर्भ में मेरे ऊपर लगाए गए एक आरोप का जबाब देना जरूरी समझ रहा हूं। तसलीमा नसरीन को हैदराबाद बुलाने वाले लोग मुस्लिम विरोधीकम्युनिस्ट विरोधी और अमेरीकापरस्त लोग थे। यह कार्यक्रम मुस्लिम विरोध के एक खास संदर्भ में बुलाया गया था। बहरहालइस हमले का मैंने और विप्लव रचितल संघम ने इसकी भर्त्सना और साथ ही आयोजक की मंशा की आलोचना किया।

तेलुगु और हिंदी साहित्य हाल के दिनों में कमोबेश एक जैसी ही घटना और विवाद से ग्रस्त रहे हैं। जब यहां मारुति मजदूरों का आंदोलन हो रहा था तो उसके सामानान्तर कान्हा रिसॉर्ट में वहां की परियोजना से प्रभावित होते लोगों से बेखबर होकर कविता पाठ का आयोजन किया गया। हमारे यहां भी येनम मजदूरों के दमन के समय गोदावरी नदी पर तैरती नावों पर पंडाल बनाकर कविता पाठ आयोजित किया गया। हिंदी में जितना यह मुद्दा विवादित रहा उतना ही तेलुगु में भी यह विवाद जोर पकड़ा। हिंदी के विश्व सम्मेलन जैसी ही स्थिति तेलुगु के विश्व सम्मेलन की स्थिति बन गई है। इस समानता और विभिन्नता के कई बिंदु हैं जिसमें कारपोरेट सेक्टरफासिस्ट ताकतों और सत्ता की घुसपैठ एक मुख्य पहलू है। इनके हस्तक्षेप से साहित्य में तेजी से एक विभाजक रेखा पैदा हुई है और इसका असर तेजी से फैला है।उदार लोकतंत्र’ के हवाले से अपूर्वानंद का तर्क ऐसे ही विभाजक स्थिति को दिखाता है: राव और उनके सहयोगियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली कविता श्रीवास्तवतीस्ता सीतलवाड़शबनम हाशमी या हर्ष मंदर पर हो रहे हमले उतने गंभीर नहीं हैं कि एक क्रांतिकारी कवि अपने वक्तव्य में उन्हें अपने बगल में इनायत फरमाए। (जनसत्ता, 3 अगस्त2013)’ उपरोक्त मानवाधिकार कार्यकर्ता क्या ऐसे ही सोचते हैं जैसा अपूर्वानंद ने लिखा है?क्या उनके संगठन की चिंतन प्रक्रिया भी ऐसी ही है जिसके तहत यह तर्क गढ़ा गया हैया यह विनायक सेन की रिहाई के लिए अपूर्वानंद के किए गए उन प्रयासों से निकाले गए नतीजे हैं जिनमें राव और उनके सहयोगियों’ के लिए कोई जगह नहीं थीयहां इस बात की याद दिलाना जरूरी है कि उपरोक्त जितने भी नाम हैं वे विभिन्न संगठनों से जुड़े हुए लोग हैं और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष उन संगठनों की वैचारिक अवस्थिति से निर्धारित होता है। ठीक वैसे ही जैसे अपूर्वानंद की वैचारिक अवस्थिति निर्धारित होती है। मैं और मेरे सहयोगी’ इस सांगठनिक और वैचारिक अवस्थिति से बाहर नहीं हैं। राव और उनके सहयोगी’ कौन हैं?अपूर्वानंद के शब्दों में स्वतःसिद्ध ब्रह्मांड’ हैं! सरकार की नजरों में देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। कारपोरेट सेक्टर की नजर में उनकी लूट और कब्जे के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा’ हैं। मीडिया की नजर में राव और उनके सहयोगी’ गुड़गांव के मजदूरों से लेकर छत्तीसगढ़ के आदिवासी लोगों तक में घुसे’ हुए हैं। मैं और मेरे सहयोगियों के अधिकार औरउदार लोकतंत्र’ के अधिकार की यह खींची गई विभाजक रेखा सिर्फ बिम्ब का गढ़न नहीं है। यह कॉरपोरेट सेक्टर और फासिस्ट ताकतों द्वारा अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए उदार लोकतंत्र’ की सड़क को हाइवे बना देने के विचार का आरम्भिक तर्क है। धर्मनिरपेक्षता’ में कितना धर्म छुपा हुआ है और उदार लोकतंत्र’ में कितना कॉरपोरेट सेक्टरकितना साम्राज्यवाद समर्थित एनजीओ और कितना सत्ता के दलाल छुपे हैं, इसकी पड़ताल किए बिना एक गोल गोल घूमने वाले दुष्चक्र में हम फंसे रहेंगे।

साहित्य का इतिहास और उसकी परंपरा इस गोल गोल घूमने वाले दुष्चक्र से निकल कर आगे जाने की रही है। प्रेमचंद ने इसी जिम्मेदारी को मशाल की तरह आगे चलने के बिम्ब की तरह ग्रहण किया और इस बात को जोरदार ढंग से कहा। तंलुगु के महान आधुनिक कवि श्री श्री ने इसी जिम्मेदारी को उठाने के लिए सक्रिय भागीदार होने का आह्वान किया। मैं ऐसी ही सीधी भागीदारी का तरफदार हूं। मुझे खुशी है ऐसी सीधी भागीदारी के तरफदारोंखासकर युवा पीढ़ी की काफी संख्या है जो आज के हालात में खड़े होनेबोलने और सक्रिय होने का साहस रखते हैं। ऐसे हमसफर साथियों को क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,

वरवर राव
हैदराबाद
अगस्त 2013

जनज्वार मे मेरा आलेख........

जनज्वार मे मेरा आलेख........

स्पर्म डोनेशन को लेकर बनाई गई फिल्म ‘विकी डोनर’ जहाँ एक ओर पतन और निराशा के माहौल में एक अच्छे सार्थक काम की शुरुआत बनकर आई थी, वहीं ‘बीए पास’ हमारे समाज के नपुंसक हो जाने और पतन की पराकाष्ठा को दर्शाती है. यह कहानी युवा के शोषण की कहानी ही नहीं, बल्कि देश में फ़ैल रही बेरोजगारी और कुछ न कर पाने की बेबसी में फंसे युवाओं के विकल्प खोजने की कहानी भी है.

http://www.janjwar.com/2011-06-03-11-27-26/2011-06-03-11-46-05/4227-mard-ko-bhi-dard-hota-hai-by-sandip-naik-for-janjwar

Monday, August 5, 2013

यह स्कूल नहीं रसोइघर है - मनोज बोगटी



यहाँ किताब जलने के बाद चावल पकता है 
यहाँ पेन्सिल जलने के बाद दाल पकता है 
आप का ताकतवर कविता लिखना कोई बड़ी बात नहीं
इस चुह्ले में आग का जलना बड़ा बात है

सर, यह स्कूल नहीं रसोइघर है।

ओला को नंगे पैर रौंदते हुए गरपगरप यहाँ आ पहुंचना 
आंख खुले रखकर उन्होनें देखा है सपने।

वे मरे हुए सपनों की पूजा करनेवाला जाति हैं 
वे निरक्षर देवताओं के भक्त हैं 
वे जंगल-जंगल कन्दमूल खुदाइ करते हुए यहाँ आ बसे हैं
उन के पगडंडी हैं ये नद-नदी 
उन के पदचिह्न हैं ये गावं

अक्षर के पहुंचने से पहले यहाँ उन का गाना आ पहुंचा 
गानों के आने से ही तो हिल पड़े थे नथनी
अक्षर के आने से पहले यहाँ आ पहुंचा उन का खून 
खून के आने से ही पहाड़ी गर्भवती हुई।

खून से लथपथ गीत गुनगुनाकर उन्होनें
गावं का बुना हुआ बांस के थैली जैसे टेंड़ेंमेंड़े रास्तों पे उन्होनें पेशाब किया है
कन्दमूल के खतम होते ही मां ने पेट में बांधी थी लुंगी की फेर।
उस दिन से ही ये गावं उस लुंगी की फेर को बाँधा हुआ है
लुंगी की फेर बांधा हुआ ये गावं जिस दिन नंगे पैर घुसा संसद भवन
उसी दिन बना था रसोइघर में स्कूल
या स्कूल में रसोइघर।

रसोइघर में
क-एं चावल के लिए कतार बनाते हैं
ख-एं, अ-एं, कुछेक आकर, ऐकर दाल के लिए खड़े होते हैं
किसी दार्शनिक का एक ताकतवर वाक्य किताब के सट्टा थाली उठा लेता है
किसी कवि का कालजयी हरफ पेंसिल के सट्टा चम्मच पकड़ लेता है।

सर, यह स्कूल नहीं रसोइघर है।

उन के दिमाग के हरेक साख में
ज्ञान की अंकुर लगने से पहले ही भूख की फूल फटती है और मगमगाने लगती है

फूलों से निकल कर हरेक बीज आगे बड़ती है रसोइघर के तरफ ही
क्योंकि वहां पकती है खिचड़ी।

शिक्षा का मतलब खिचड़ी ही तो है
सर, यह स्कूल नहीं रसोइघर है।

जब पकती है खिचड़ी
बालक अक्षर थुक निगलते हुए देखते हैं हथेली खुन्ती की।
दाल से उड़ते हुए भाप ढक देती है ब्ल्याकबोर्ड व चक
ढक जाते हैं किताबें व वहां उन के लिए लिखे गए जीवन सारे।

आप ही पुछिए ना
‘पृथ्वी कैसा है?’
बच्चे बोलेंगे- ‘अण्डे की तरह’
क्योंकि आज पढ़्ने का दिन नहीं अण्डा खाने का दिन है।
सर, यह स्कूल नहीं रसोइघर है।

सरकार, अक्षरों में तो जहर डाल दिया आप ने
खिचड़ी कौन सी बड़ी बात है?

डालिए जहर डालिए ना
लेकिन अगर बच जाते हैं कुछ अक्षर और उन से बन जाते हैं कुछेक वाक्य
वे आप का ‘अन्त्य’ होंगे
सर, यह स्कूल नहीं रसोइघर है।
(मनोज बोगटी समकालीन नेपाली भारतीय वाङ्मय में एक चर्चित कवि हस्ताक्षर हैं)
(मूल नेपाली से हिन्दी में अनुवाद- राजा पुनियानी)


''सरकार, अक्षरों में तो जहर डाल दिया आप ने
खिचड़ी कौन सी बड़ी बात है?''

कुछ वर्तनी और व्याकरण की बहुत मामूली अशुद्धियों को खुद ही सुधार कर पढ़ें दोस्तो यह अपूर्व कविता. काश यह कवि 'हिंदी' में होता ...! (लेकिन तब क्या उसका नाम कहीं रहता ?)
-उदय प्रकाश 

Sunday, August 4, 2013

बी ए पास के बहाने से "मर्द को भी दर्द होता है"

"मर्द को भी दर्द होता है", यह सिर्फ एक डायलाग नहीं बल्कि उस पूरे भारतीय  फ़िल्मी इतिहास को चुनौती देकर नया कुछ कर गुजरने की तमन्ना है, जो भरत शाह और अजय बहल "बी ए पास"  जैसी फिल्म लेकर आये है. दरअसल मे यह फिल्म एडल्ट क्यों है मुझे समझ नही आया , इसे 'यु' प्रमाणपत्र देने की आवश्यकता थी क्योकि आज के किशोर जितने इन मुद्दों से दो चार होते है वो हमारे उम्र के प्रौढ़, वयस्क या बुजुर्ग शायद ही होते हो. और फ़िर सब कुछ तो इस समय खुला खेल है फ़िर प्रमाण पत्र देने से भला कौन इसे नहीं देखेगा. यह फिल्म  इस समय की हकीकत नहीं बल्कि गुजरते समय की मांग, बाजार, भोग, रूपया, सूचना प्रौद्योगिकी, महानगर, मध्यमवर्गीय  चेतना, युवाओं की लगातार बढती जा रही जिम्मेदारियां, सामाजिक ताने बाने मे पड़ते जा रहे खलल और बाजार का हस्क्षेप, महिला मुद्दें, असुरक्षा, शिक्षा के नाम पर पसरे अड्डे, और छात्रावासों मे होते अवैध धंधों की कहानी है. रितेश शाह ने "रेलवे आंटी" नामक कहानी का बहुत ही अच्छा स्क्रीन प्ले लिखा है और उसे परदे पर उतारने मे जो मेहनत शादाब कमाल ने की है और अजय बहल ने निर्देशन देकर शादाब से काम करवा लिया है उसकी जितनी तारीफ़ की जाये कम है. राँझना ने एक हीरो की इमेज तोडी थी और यह दर्शाया था कि एक आम आदमी भी अपने जीवन का हीरो होता है उसके शहर, गली मोहल्ले का हीरो होता है और फ़िर यही चरित्र उसे दिल्ली या किसी बड़े आंदोलन मे ले जाता है और वह जीवन सफल करता  है या खत्म करता है. मिल्खा सिंह की कहानी एक आम आदमी की कहानी है जो दूध पीने के लालच जैसी बात को लेकर देश के लिए अंत मे दौडता है. और बी ए पास फिल्म  एक बार फ़िर  इस मिथ को तोडती है कि शम्मी कपूर, अमिताभ, राजेश खन्ना, सलमान, शाहरुख या ऋतिक रोशन का युग चला गया है. साथ ही ये फिल्मे यह भी सिद्ध करती है कि अब बालीवुड सिर्फ हीरो के बल पर नहीं चलेगा, कहानी, सधा हुआ निर्देशन, आम लोगों के एहसास, भावनाएं, रिश्तों की बदलती परिभाषाएँ, शब्द और आम छोटे कस्बों की कहानियां ही चलेगी क्योकि अब दर्शक वर्ग का 'टेस्ट" बदल चुका है. वो दर्शक अब सिंगापुर, मालदीव या स्विटज़रर्लैंड नहीं देखना चाहता वो बनारस या पंजाब का कोई गाँव या दिल्ली का पहाड़ गंज देखना चाहता है जो उसकी देखी भाली लोकेशन है. 

फिल्म की कहानी वासना और पूर्ति की कहानी है जो इन दिनों बहुत प्रचलन मे है. जिस तरह के समाज मे हम रह रहे है वहाँ तनाव और तनाव से जुड़े जीवन ने जहाँ एक ओर सेक्स को बहुत आम और पारदर्शी कर दिया है वही सेक्स की भूख ना मिटने पर जायज- नाजायज तरीकों से अपनी हवस मिटाने का जो रिवाज चल निकला है और बाकायदा इसे सामाजिक स्वीकृती मिल गई है और जिस तरह से समाज के हर वर्ग मे यह बढ़ा है वह इस फिल्म मे चित्रित किया गया है. जिगेलो जैसा अच्छा शब्द कैसे एक गन्दा शब्द बन गया, गे जैसा शब्द जिसका अर्थ आनंद होता है कैसे घृणास्पद बन गया और एस्कार्ट जैसा शब्द भी इसी लपेट मे आ गया. कॉक मतलब मुर्गा, पर आज क्या अर्थ है इसका ज़रा सोचिये,  सिर्फ भाषा और शब्द ही नहीं बल्कि इसके साथ जुड़े वो तमाम तरह के पेशे और हरकतें आज एक चलती-फिरती हकीकत है और हमारे ही समाज मे ये एक बड़ा हिस्सा इससे रोजी रोटी कमा रहा है. जो महिलायें अपने पति से असंतुष्ट है या नपुंसकता का दंश झेल रही है उन्हें भी तो आखिर अपनी सेक्स की भूख मिटाने का हक है और अगर वे किसी युवा के साथ रूपया देकर सम्बन्ध बनाती है तो क्या गलत करती है, यह कमोबेश हर कस्बे, गली और मोहल्ले की कहानी है. आज कई युवाओं से बात करो तो वे साफ़ कहते है कि उनकी पसंद "आंटी" है क्योकि उन्हें वो सब तो मिलता ही है साथ ही रूपया इफरात मे मिलता है और सुरक्षा की भी ग्यारंटी है तो फ़िर इसमे गलत क्या है. बस गलत है तो अंत क्योकि जब मुकेश यानी शादाब को लगता है कि उसे बेहद बुरी तरह से समाज के उच्च वर्ग की महिलाओं ने गलत नाम बताकर इस्तेमाल किया और जब वो पुनः उनसे जुडने की कोशिश करता है तो उसे बुरी तरह ना मात्र दुत्कारा जाता है बल्कि उसकी संचित पूंजी को भी धोखे से छीन लिया जाता है. ध्यान रहे कि यह बारहवीं पास युवा अभी अभी बी ए मे दाखिल हुआ है. जवानी का जोश, मरदाना ताकत, चेहरे पर मासूमियत और सेक्स का नमक उसके पास भरपूर है, नहीं है तो सेक्स की भूख मिटाने का अनुभव और भयानक भूखी और  वासना  की पुजारिन औरतों को संतुष्ट करने का अभ्यास- जो उसे अपनी बुआ की सखी देती है और सिर्फ अनुभव ही नहीं देती  बल्कि उसके लिए वो महिला ग्राहक भी जुटाती है. अंत मे जब वो महिला ग्राहक उसे दुत्कारती है तो वह दिल्ली के भीड़ भरे इलाके मे पुरुष वेश्या बनकर भी किस्मत आजमाना चाहता है पर बुरी तरह से लहुलूहान होकर जख्मी लौटता है. इस बीच उसकी बहनें जो किसी होस्टल मे रह रही है वापिस घर आना चाहती है क्योकि होस्टल की वार्डन उनसे पेशा करवाना चाहती है. मुकेश का एक बार फ़िर पम्मी इस्तेमाल करती है और अपना ही खून करवा लेती है. मुकेश के सामने पुलिस है, दिल्ली स्टेशन पर इंतज़ार करती नाबालिग बहनें है उसके सामने बदनामी का डर है और अंत मे  निराशा के सिवाय कुछ नहीं है. समाज की इन औरतों ने उसे इस कदर निचोड़ लिया है कि उसमे लडने का माद्दा ही खत्म हो गया है, दोस्त ने उसे धोखा दिया है और उसके रूपये लेकर मारीशस भाग गया....अंत मे उसके सामने आत्महत्या के सिवाय कोई चारा नहीं बचता और वह अपने आपको खत्म कर लेता है. फिल्म जहाँ खत्म  होती है वही से शुरू भी होती है कि आखिर उसकी जो दो बहनें स्टेशन पर इंतज़ार कर रही है वो किस दलदल मे फंसेगी, मुकेश के मरने से समाज के उच्च वर्ग या किसी भी तबके के औरतों की सेक्स की भूख नहीं मिटने वाली  तो क्या एक नए मुकेश का जन्म होगा और उसे भी पम्मी जैसी औरतें पारंगत और निष्णात कर देगी ताकि वो एक एस्कार्ट या जिगेलो बनकर समाज मे जीवन बिता सके. स्पर्म डोनेशन को बनाई गई फिल्म "विकी डोनर" जहाँ एक ओर पतन और निराशा के माहौल मे एक अच्छे सार्थक काम की शुरुवात  बनकर आई थी वही यह फिल्म "बी ए पास" हमारे समाज के नपुंसक हो जाने और पतन की पराकाष्ठा को दर्शाती है. यह कहानी युवा के शोषण की कहानी ही नहीं बल्कि देश मे फ़ैल रही बेरोजगारी और कुछ न कर पाने की बेबसी मे फंसे युवाओं के विकल्प खोजने की कहानी है. मेरी राय मे इस फिल्म को टेक्स फ्री करके कम से कम नवमीं से पढ़ रहे किशोरों को अवश्य दिखाई जाना चाहिए ताकि वे अपने भविष्य का फैसला खुद कर सके और बाकि कुछ भले ना करें, सीखे या चरित्र बनाए पर कम से कम अपने आपको को एक वर्ग से और इस तरह की कामुक औरतों से शोषित होने से तो बचा ही लेंगे. जरुर देखे, अपने परिवार के साथ देखे, बच्चों के साथ देखे और उन्हें बताएं कि ये अपने ही समाज की कहानी है इसके  पात्र ना बने, ना ही इसका अनुसरण करें. 

शादाब कमाल का अभिनय आश्वस्त करता है कि वे आने वाले समय मे लंबी रेस के घोड़े सिद्ध होंगे. और दीप्ती नवल को इस फिल्म मे देखकर मिस चमको का रोल,  साथ साथ, और भी कई उनकी बेहतरीन फ़िल्में याद आ गई, गाना 'काली घोड़ी द्वार खड़ी' कही नेपथ्य मे गूंजने लगा उनका सबसे अच्छा काव्य संकलन "लम्हे लम्हे" याद आ गया. बाकि निर्देशन कसा हुआ है और एक भी गाना ना होना इसकी विशेषता है. सिर्फ यही कहूँगा कि यह फिल्म नहीं अपने समय का दस्तावेज है जो आने वाले समय मे इस गुजरते समय का साक्ष्य और इतिहास बनेगा. 

आत्ममुग्ध क्रांतिकारिता और वरवर राव : अपूर्वानंद


हर वर्ष इकतीस जुलाई को दिल्ली में ‘हंस’ पत्रिका की ओर से किसी एक विषय पर एक विचार-गोष्ठी का आयोजन किया जाता रहा है. बातचीत का स्तर जो हो, यह एक मौक़ा होता है तरह-तरह के लेखकों, पाठकों और साहित्यप्रेमियों के एक-दूसरे से मिलने का. कई लोग तो वहीं सालाना मुलाकातें करतें है. मेरी शिकायत हंस के इस कार्यक्रम से वही रही है जो दिल्ली में आमतौर पर होने वाले हिंदी साहित्य से जुड़े अन्य कार्यक्रमों से है: इंतजाम के हर स्तर पर लापरवाही और लद्धड़पन जो निमंत्रण पत्र में अशुद्धियों और असावधानी से लेकर कार्यक्रम स्थल पर  अव्यवस्था, मंच संचालन में अक्षम्य बेतकल्लुफी तक फैल जाता है.प्रायः वक्ता भी बिना तैयारी के आते हैं और जैसे नुक्कड़ भाषण देकर तालियाँ बटोरना चाहते हैं.ऐसे हर कार्यक्रम से एक कसैला स्वाद लेकर आप लौटते हैं. श्रोताओं के समय, उनकी बुद्धि के प्रति यह अनादर परिष्कार के विचार का मानो शत्रु है. मैं हमेशा अपने युवा  छात्र मित्रों को ऐसी जगहों पर देख कर निराशा से भर उठता हूँ : ये सब यहाँ से हमारे बारे में क्या ख्याल लेकर लौटेंगे?
यह भी हिंदी के कार्यक्रमों की विशेषता है कि जितना वे अपने विषय के कारण नहीं उतना आयोजन , आयोजक और प्रतिभागियों के चयन से सम्बद्ध इतर प्रसंगों के कारण चर्चा में बने रहते हैं. चटखारे लायक मसाला अगर उसमें नहीं है तो शायद ही मंच पर हुई ‘उबाऊ’ चर्चा को कोई याद रखे. अक्सर सुना जाता है कि फलां को तो बुलाया ही इसलिए गया था कि  विवाद पैदा हो सके. विवाद अपने आप में उतनी भी नकारात्मक चीज़ नहीं अगर उससे कुछ विचार पैदा हो. लेकिन प्रायः विवाद और कुत्सा में अंतर करना हम भूल जाते हैं. विवाद में फिर  भी मानसिक श्रम लगता है, कुत्सा में मस्तिष्क को  हरकत में आने की जहमत नहीं मोल लेनी पड़ती.
नियमानुसार इस वर्ष के ‘हंस’ के कार्यक्रम ने भी विवाद पैदा किया.सूचना ‘अभिव्यक्ति और प्रतिबंध’ नामक विषय पर बोलने के लिए अशोक वाजपेयी , अरुंधती राय , वरवर राव और गोविन्दाचार्य के आने की थी. अरुंधती और राव के न आने से श्रोताओं को बदमजगी हुई. खीज आयोजकों की निश्चिंतता पर भी थी: आधे वक्ता न आएं तो आखिर कार्यक्रम कैसे अपना वांछित उद्देश्य पूरा कर लेगा!
अगले रोज़ अनुपस्थित वक्ताओं में से एक वरवर राव का वक्तव्य प्रसारित हुआ जिसमें उन्होंने अपनी अनुपस्थिति  की सफाई दी: उन्होंने आयोजकों  पर भरोसा करके हामी भर दी थी, इसकी परवाह नहीं की थी कि  कौन , कहाँ बुला रहा है. इतना ही नहीं उन्होंने इसे भी तवज्जो नहीं दी कि  मंच पर उनके  साथ बोलने वाले कौन हैं! तात्पर्य  यह कि उनके लिए उनका बुलाया जाना ही पर्याप्त था क्योंकि यह मौक़ा था अपनी कुछ बात कहने का. लेकिन जब दिल्ली आकर उन्हें पता चला कि उन्हें अशोक वाजपेयी और गोविन्दाचार्य के साथ मंच साझा करना होगा तो कार्यक्रम में शामिल होने के अपने निर्णय को उन्होंने बदला. वे लिखते हैं, “प्रेमचंद जयंती पर होने वाले इस आयोजन में अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य का नाम वक्ता के तौर पर देखकर हैरानी हुई। अशोक वाजपेयी प्रेमचंद की सामंतवाद-फासीवाद विरोधी धारा में कभी खड़े  होते नहीं दिखे। वे प्रेमचंद को औसत लेखक मानने वालों में से है। अशोक वाजपेयी का सत्ता प्रतिष्ठान और कारपोरेट सेक्टर के साथ जुड़ाव आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इसी तरह क्या गोविंदाचार्य के बारे में जांच पड़ताल आप सभी को करने की जरूरत बनती है? हिंदुत्व की फासीवादी राजनीति और साम्राज्यवाद की जी हूजूरी में गले तक डूबी हुई पार्टी, संगठन के सक्रिय सदस्य की तरह सालों साल काम करने वाले गोविंदाचार्य को प्रेमचंद जयंती पर ‘अभिव्यक्ति और प्रतिबंध’ विषय पर बोलने के लिए किस आधार पर बुलाया गया!”
राव के पत्र के पहले हिस्से को याद करें जिसमें उन्होंने कहा है कि निमंत्रण स्वीकार करते समय इसे उन्होंने  तवज्जो ही नहीं दी थी कि  मंच पर उनके साथ कौन होने वाला है! फिर बाद में हैरानी क्यों? एक क्रांतिकारी दल के साथ, जो अपना हर काम मिलिटरी बारीकी और सटीकता से करता है, काम करने वाला व्यक्ति अपना मंच चुनने में कैसे ऐसी चूक कर सकता था ! जैसा पहले हमने लिखा, पत्र के उस हिस्से में वे इस बेपरवाही को अपने उदारचेता होने के एक प्रमाण के रूप में पेश करते जान पड़ते हैं. लेकिन बाद में अगर उन्हें लगा कि इससे इन दो के साथ मंच साझा करने पर उनकी छवि धूमिल हो जाएगी.  लेकिन अगर यह चूक हो ही गयी थी तो क्या उन्हें इसकी कीमत नहीं चुकानी चाहिए थी? जब आप किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में अपनी शिरकत की स्वीकृति देते हैं तो आयोजकों से ही नहीं, उस कार्यक्रम के अन्य  भागीदारों से भी आप प्रतिश्रुत हो जाते है. तो क्या राव अपनी पवित्र क्रांतिकारी छवि को अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य के दूषण से बचाना चाहते थे और इसलिए पत्र के पहले हिस्से को नज़रअंदाज  करने में उन्हें कोई  नैतिक हिचक नहीं हुई?
हम किससे बात करें, किससे नहीं , यह हमारा फैसला है और इस पर  किसी दूसरे का अख्तियार नहीं. लेकिन जब आप सार्वजनिक व्यक्तित्व की भूमिका ग्रहण करते हैं  तो अनेक बार आप सार्वजनिक कर्तव्य के तहत ऐसे लोगों से भी बात करते हैं जिन्हें आप चाय पर कभी न बुलाएंगे. भारत में, जो अभी भी एक-दूसरे से बिलकुल असंगत  विचारधाराओं और विचारों के तनावपूर्ण सहअस्तित्व वाला देश है,किसी विचार को चाह कर भी सार्वजनिक दायरे से अपवर्जित करना संभव नहीं है. उदार लोकतंत्र की यही खासियत है. यही कारण है कि इसकी जड़ में मट्ठा डालने के लिए वरवर राव जैसे लोग भी प्रायः स्वतंत्र हैं, स्वतंत्र ही नहीं राज्य पोषित संस्थानों से आजीविका की सुविधा भी उन्हें है ताकि निश्चिन्त होकर वे क्रांतिकारी काम कर सकें. इसकी भी आश्वस्ति राव जैसे लोगों को है कि अगर राज्य ने अपनी सीमा का अतिक्रमण किया तो ये ‘उदार लोकतंत्रवादी’ अपने विचार से मजबूर राज्य की आलोचना को मुखर होंगे.
इसी  उदारवाद  से मजबूर अशोक वाजपेयी  महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर होने के बावजूद हिंदी के  पहले  लेखक और कुलपति  थे जिन्होंने 2002 के गुजरात के कत्लेआम का सार्वजनिक रूप से व्यक्तिगत प्रतिवाद ही नहीं किया, संस्कृतिकर्मियों के विरोध को संगठित भी किया. उनके सहकर्मी होने के  कारण  मुझे याद है कि तत्कालीन मानव संसाधन मंत्रालय ने उनसे उनकी इस भूमिका को लेकर जवाब तलब किया था. उसका निर्भीक उत्तर भी मुझे याद है जिसमें अशोक वाजपेयी ने सरकार को यह बताया था कि विश्वविद्यालय का कुलपति कोई सरकार का मातहत नहीं बल्कि  एक बौद्धिक , अकादमिक समुदाय का, जोकि विश्वविद्यालय होता है, प्रमुख है और वह अपने विचार रखने और व्यक्त करने को स्वतंत्र है.
हिंदी में  सत्ता प्रतिष्ठान के पर्याय के रूप में कुख्यात अशोक वाजपेयी ने राज्य संपोषित ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष होते हुए ‘राजद्रोही’बिनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद हुए सार्वजनिक प्रतिवाद में शामिल होने में एक सेकेण्ड का समय नहीं लिया था. जब दिल्ली में बिनायक की गिरफ्तारी के एक साल पूरा होने पर राज्य के दमन के विरुद्ध सार्वजनिक विरोध के लिए जगह की तलाश हो रही थी तो राजकीय अकादेमी का परिसर देने की अनुमति अपने हस्ताक्षर से अशोक वाजपेयी ने दी. जाहिर है, इसे वे अपने उदार लोकतंत्रवाद के कारण सहज ही मानते हों और असाधारण वीरता के कृत्यों की गिनती में न रखें. क्रांतिकारी कदम तो यह किसी तर्क से नहीं कहा जा सकता!
अशोक वाजपेयी का कहना है कि वे  जो यह सब करते हैं इसकी प्रेरणा उन्हें कोई विचारधारा नहीं देती , उनका कवि  होना उन्हें इन निर्णयों की ओर स्वतः ले जाता है. हिंदी में साहित्य की अपनी वैचारिक प्रेरणा की स्वायत्ता के  बड़े वकील हैं. इसके लिए उन्हें निरंतर वाम-भर्त्सना का शिकार होना पड़ा है फिर भी अपने  काव्येतर लेखन में उन्होंने  आदिवासियों के विस्थापन के खिलाफ लड़ रही मेधा पाटकर के पक्ष में एकाधिक बार लिखा, अरुंधती राय की प्रशंसा उनके उपन्यास के कारण जितनी नहीं उतनी उनके निबंधों के लिए लगातार की जो वरवर राव को पसंद हैं. अरुंधती की तारीफ़ करने वाला कारपोरेट-समर्थक   किसी क्रांतिकारी तर्क योजना से ही सिद्ध किया जा सकता है.
वरवर राव कवि हैं. शब्दों का इस्तेमाल जिम्मेदारी से करना कवि  से अधिक कौन जानता है! फिर जब उन्होंने  अशोक वाजपेयी को कारपोरेट-समर्थक कहा तो प्रमाण क्या है उनके पास इस आरोप को पुष्ट करने के लिए? या क्रांतिकारी वचन को भी वेदवाक्य की तरह स्वतः प्रमाण मानना चाहिए?  जल, जंगल, जमीन को पूंजी के हवाले किए जाने का विरोध अशोक वाजपेयी लेखक के तौर पर करते रहे हैं. हाँ!  वे  छापामार दस्ते  में भर्ती नहीं हो सके हैं !
वरवर राव ने प्रेमचंद की परंपरा की याद दिलाई है और उसमें अशोक वाजपेयी की वे कोई समाई नहीं देखते. हिंदी साहित्य के लिए यह परंपरा एक बड़ी समस्या है. प्रेमचंद की परंपरा से क्या तात्पर्य है? लम्बे समय तक और एक तबके में अभी भी जैनेन्द्र और अज्ञेय को इस परंपरा से बाहर रखा जाता रहा है. यह भूल कर कि जैनेन्द्र को प्रेमचंद ने  हिंदी का गोर्की कहा था और  उनके बाद की पीढ़ी में वे उनके  कुछ सबसे निकट के लेखकों में थे. लेखक  के रूप में भी प्रिय!
वह ज़माना कुछ और था जब गांधीवादी जैनेंद्र ने क्रांतिकारी सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन की कहानी जेल से लेकर प्रेमचंद को दी थी और एक अनाम लेखक की रचना को हिंदी के उपन्यास सम्राट ने बिना हिचक सम्पादक के तौर पर छापा था. अज्ञेय नाम उस प्रतिक्रियावादी को सामंतवाद-साम्राज्यवाद विरोधी प्रेमचंद ने ही दिया था जो नापसंद होने  पर भी वह जीवन भर ओढ़े रहा. प्रेमचंद कभी जेल नहीं गए, किसी क्रांतिकारी ने उन्हें इसके लिए  कभी कोसा नहीं! अज्ञेय की कविता उन्होंने  कभी छापी नहीं, कहानी कभी लौटाई नहीं! क्या प्रेमचंद को अपनी परंपरा की  परवाह ही नहीं थी ? या साहित्य का अपना एक विचार होता है जो उसे सहज ही साम्यवाद हो या फासीवाद , किसी के भी दमन के विरुद्ध खड़ा कर देता है? जो उसे हर स्थिति में एक मानवीय संभावना देखने की कुव्वत भी देता है!  ईसाई तोलोस्तोय, संदेहवादी चेखव और सर्वहाराक्रान्ति के तूफानी बाज गोर्की के परस्पर आदर की और क्या व्याख्या की जा सकती है?
राव के पत्र का वह हिस्सा भी पठनीय है जिसमें उन्होंने वह बताया है जो वे ‘हंस’ के मंच से बोलने वाले थे. ‘अभिव्यक्ति और प्रतिबंध’ विषय पर अपने और अपने दल के सहयोगियों के संघर्ष और उनके दमन और उन पर खतरे की धमकियों के बयान के अलावा उसमें कुछ और नहीं. दक्षिण प्रदेश के इस कवि के पत्र में उम्मीद थी कि कालीकट विश्वविद्यालय की  अंग्रेज़ी पाठ्यपुस्तक से हिन्दू दक्षिणपंथी दबाव में आकर एक कविता के हटाए जाने या मद्रास विश्वविद्यालय के इस्लामी अध्ययन विभाग में अमरीकी विदुषी अमीना वदूद का कार्यक्रम रद्द करने के विश्वविद्यालय के अधिकारियों के निर्णय का और आलोचना  होगी . निराशा हाथ लगी. राव जिस हैदराबाद में रहते हैं ,वहीं तसलीमा नसरीन पर हमला हुआ था जिसमें उनकी जान ली जा सकती थी. शायद वह घटना पुरानी हो चुकी थी! राव और उनके सहयोगियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करनेवाली कविता श्रीवास्तव, तीस्ता सीतलवाड़, शबनम हाशमी या हर्ष मांदर पर हो रहे हमले उतने गंभीर नहीं हैं कि एक क्रांतिकारी कवि अपने वक्तव्य में उन्हें अपने बगल में जगह इनायत फरमाए! लेखक और अध्यापक  रुक्मिणी भाया नायर ‘आउटलुक’में   नरेंद्र मोदी की देह भाषा समेत उनकी शैली के अपने अध्ययन के प्रकाशन  के बाद से  धमकियों और गालियों का हमला बिना हाय-तौबा किए  बर्दाश्त कर रही हैं. वह  तो हर लेखक की नियति है!   और अभी भारत को निर्ममतापूर्वक बाजार के हवाले करने वालों की ओर से उदार लोकतंत्रवादी अमर्त्य सेन और ज्यां द्रेज़ पर जो तीखा हमला चल रहा है, वह तो इसलिए उल्लेख योग्य नहीं कि ये दोनों एक उदार राज्य की वकालत करके क्रान्ति की संभावना को और पीछे धकलेने का षड्यंत्र कर रहे हैं!
वरवर राव का पत्र क्रांतिकारी ब्रह्मांड को स्वतःसिद्ध और वैध मानने की प्रवृत्ति का बढ़िया उदाहरण है. इस सिद्धांत के अनुसार दुनिया पवित्र  और अपवित्र लोगों में साफ़-साफ़ बंटी है. जो असहमत है, वह अपवित्र भी है. उसका विनाश एक पवित्र क्रांतिकारी कर्तव्य है. इसलिए दल से असहमत होते ही आपके जीवन की वैधता भी समाप्त हो जाती है. यह आत्मकेंद्रित क्रांतिकारिता अपने अलावा और किसी मानवीय गतिविधि को उल्लेखयोग्य तो क्या ध्यान दने योग्य भी नहीं मानती. इतिहास नामक ईश्वर द्वारा चुनी इस क्रांतिकारिता के पास हर किसी  हर किसी को प्रमाण पत्र देने का प्रश्नातीत अधिकार है. साम्यवादी अतीत ही नहीं उसका वर्तमान भी यही बताता है.लेकिन प्रेमचंद तो कहते हैं कि  हर व्यक्ति में एक देवत्व का अंश है और इसलिए उनके लिए हर चरित्र मानवीय संभावना का एक रूप है.  आत्मग्रस्त और आत्ममुग्ध क्रान्ति में क्या एक समय असुविधाजनक प्रेमचंद के इस पक्ष  का भी अपवर्जन नहीं किया जाएगा?
( A slightly different version has appeared in Jansatta on 3 August, 2013)