Tuesday, August 6, 2013

"एक स्थगित होती दुनिया की कविता"


शाम होते ही शाम ढल जाती है और रात की शुरुवात मे ही रात भयवह लगने लगती है और फ़िर शुरू होता है एक दुष्चक्र, एक युग से लडने का, एक दृष्टा बनकर सब कुछ सहने का और फ़िर इंतज़ार एक भोर का जो शायद उजाला लेकर आये...........


जब तक सोचता हूँ कि कुछ करूँ 
तब तक रेल के हजारों यात्री देश के
दूसरे कोने मे पहुँच जाते है 
जब तक उठकर चलना शुरू करता हूँ 
तब तक कई हवाई जहाज पूरी 
पृथ्वी का एक चक्कर लगा लेते है 

जब तक कुछ करता हूँ शुरू 
दुनिया मे लाखों लोग अपनी
अंतिम सांस ले चुके होते है
अपनी ज़िंदगी की लड़ाई हार चुके होते है

मै बहुत कुछ करना चाहता हूँ
पर हर बार देर हो चुकी होती है
दोस्तों से बात करने लगता हूँ तब
तक आधी दुनिया आपस मे
लड़ चुकी होती है एक बड़ी जंग

अपने दुश्मनों से लडने की रणनिती
बनाता हूँ तब तक लाखों बच्चे एक
उम्मीद के साथ जन्म ले चुके होते है
और करोडो फूल खिल चुके होते है

कितना कुछ स्थगित कर रहा हूँ
मसलन मिलना- जुलना
लड़ना- भिडना, रोना मुस्कुराना
लिखना- पढ़ना और वो सब जो
जीवन जीने के लिए जरूरी होता है

पर अब फ़िर से सोचता हूँ कि इस बार
यह आर-पार का मामला बनाना है
बगैर किसी पल को गंवाएं कर लेना है
वो सब जिसे करने को मै यहाँ था

पर हर बार फ़िर से हार जाता हूँ
अपने आपसे, पता नहीं क्यों
दिखने लगा है कही दूर अस्त
होता सूरज और आसमान के
एक कोने मे गर्द का बादल

उसे रंगने के लिए आज कूची भी
उठाई है, रंगों की दुनिया को एक कोरे
कैनवास पर उकेरना है पर
फ़िर देर हो रही है मित्रों

और ये देखो कितनी बदल चुकी है
दुनिया, फ़िर हंस रहा है तानाशाह
फ़िर खतरा है नौनिहालों की हंसी पर
कलियाँ फ़िर खतरे के मुहाने पर है

वो आ रहे है कि सब स्थगित हो जाये
सब खत्म हो जाये कि कही कुछ
शेष ना रह जाये, किसी को मियाद ना मिलें
कि वो अपने मन का कर लें, जी लें

सब खत्म हो रहा है मित्रों
और देखिये इतनी देर मे
आप भी कितना बदल गये है
कैसे मै उम्मीद करूँ कि आप
साथ है मेरे....???

(लखनऊ की एक उदास शाम मे खत्म होती जा रही ज़िंदगी का बयान)

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