Monday, December 31, 2012

अम्बर रंजन पांडेय की नई कवितायें.

पानी-१

आलोकधन्वा, प्रभात की
पानी पर कविताएँ
पुल बन गई हैं। पूछूँ यदि तुमसे
तो तुम कहोगे नाँव। आजकल बहुत ऊपर से
निकल जाती हैं रेलगाड़ियाँ। हवा बीच ही भख
लेती है-
गर्भवती का वमन
तर्पण का कलदार

तुम्हारे घड़े में कितना जल है, सुनो
तुम्हारे लोटे में कितना?

मेरे एक अध्यापक है संदीप नाईक
होशंगाबाद में नर्मदा के घाट रहते थे पहले
सुनते है- एक उलाँक**जल में रह रहकर
कोमल पड़ गया था जिसका पाट
माट्साब के पाँव धरते ही
हिलसा हो गई थी।

मानोगे क्यों तुम! गल्पकला कहोगे
किन्तु यह
पानी जितना ही सत्य है बंधु।

**उलाँक- नौका का एक प्रकार।

पानी-२

भीतर जैसे मंूगे की बेल
फल गई हो।

इतना भर गया था
कवि के फेफड़ों में जल, रोज़ अस्पताल
में नली से निकलाने जाते स्कूटर पर।

ग्रीष्म के दिवस, शिप्रा बस गोड़डुबान
लोटा भर पानी भी स्वप्नवत् लगता था
फिर एक समय
जल के सभी लक्षण प्रकट हुए कवि पर-
मत्स्य, नौका, कलश, धान
और पिपासा

एक समय कवि अंजुरि भर जल
रह गया जग में।

पानी-३

कुल्ले के जल की मार से जब
मुच गई थी आँखें- उसी टाईम तुम
मुझे सबसे अच्छे लगी थी। खारे जल की
पुतली- आँखे, जिह्वा, काँख, योनि-सब में
केवल अाब अौर नमक ही था; फिर क्यों कोई
कवि मुझसे पूछे बिना तुम्हें नदी कह दे!
समुद्र में बढ़ी ककड़ी से अधिक नहीं हो तुम
कुछ। समुद्र में देर तक नहाने पर त्वचा में
जो खिंचाव, खारापन, और नींद आती है-
उससे अधिक क्या हैं मन में!
प्लीज़ क्वां़तम-थ्योरी और प्रेम में कोई पुलिया
मत जोड़ो तुम फ़िज़िक्स की छात्रा।

तुम्हारी उँगलियों के बीच जो
नमक और स्तनों के नीचे जो स्वेद की
गंध है- उससे तो कम ही गंधा़ता है
बेचारा हवा की बेल पर ककड़ी सा पकता समुद्र।


तेल-१

सोनागाछी की एक बालिका वय-१५
को लेकर मैं गया था हुगली।
वासना में इतना अंधा हो जाता
है कोई जबकि पढ़ता था दास काॅपितल।
₹४० फी घंटा भाव था उसका।

नाँव में दारू और सेक्स के कारण
केवट के सम्मुख ही उसके ब्लाउज की
आस़्तीन नीचे कर काट लिया मैंने उसका कंधा।
फिर पूछा नाम। वह बोली 'तरनि'।
कंधे का स्वाद सिंघाड़े जैसा लगा। कलाई खींच
उसे मैंने चूमना चाहा। वह चिढ़ गई।
रोने लगी।
उसके होंठ ताल-मखाने लगे दाँतों को।

वासना में कोई कितना अंधा हो जाता
जब हम नाँव में थे
तो तुम क्या तुम थे मैं क्या मैं था
हवा कुरण्ट** जितनी भारी थी
कोई सरसों के तेल में नैन*** तलता था।



**कुरण्ट- पत्थर का एक प्रकार।
***नैन- मीठे जल की एक मछली का प्रकार।

Saturday, December 29, 2012



दामिनी का आख़िरी खत आप सबके नाम.......
दामिनी का आख़िरी खत आप सबके नाम......
www.kharinews.com
मेरा मरना कोई नया नहीं है अपने देश में बस फर्क इतना है कि आज आप सब मेरे बाद मेरे साथ हो, मेरे बलात्कार के बाद, मेरी मौत का इंतज़ार करते, रायसीना की पहाडियों पर पुलिस की बर्बरता के बीच पानी के छींटों के और आंसू गैस के गोलों के बीच आप अब मेरे साथ

दामिनी का आख़िरी खत आप सबके नाम

मेरे देश के प्रबुद्ध लोगों,
 सलाम !!!
मेरा मरना कोई नया नहीं है अपने देश में बस फर्क इतना है कि आज आप सब मेरे बाद मेरे साथ हो, मेरे बलात्कार के बाद, मेरी मौत का इंतज़ार करते, रायसीना की पहाडियों पर पुलिस की बर्बरता के बीच पानी के छींटों के और आंसू गैस के गोलों के बीच आप अब मेरे साथ हो. क्या यह सब भी एक इवेंट है इस देश में मुझे अब लगता है कि मेरे मरने से आप लोग चलो एक बार ही सही, इकठ्ठा तो हो गये हो, उस दिन ना सही पर आज तो हुए हो, चलो मुझे इसका संतोष है कि मरने से मै कुछ तो कर पाई. बस अब यही कहूंगी कि अपने इन बेशर्म सांसदों को, विधायको को और ब्यूरोक्रेट्स को सम्हाल लो, सम्हाल लो पुलिस को जो आजाद भारत में आजादी के इतने सालों बाद भी आजादी का अर्थ नहीं समझ पा रहे है, और देश को अपने बाप की बपौती मानकर जेब में रखकर चल रहे है.
 
मुझे अफसोस है कि जिस देश के मंत्री, नेता, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की बेटियाँ हो और ये इसका बखान भी मेरे बलात्कार के बाद कर रहे हो,  उस देश के उन जगहों का क्या होगा जहां किसी बेटी का बाप कोई रसूखदार पद नहीं रखता. थाने में जाकर बलात्कार की रपट दर्ज कराने वाली लडकी यदि छिनाल, रांड या चालू है तो पुलिस क्या है जो ऊँचे लोगों और नेताओं की रखैल है.
 
मीडिया क्या है जो मेरी मौत को बेच रहा है और देश भर के लोग लगे है ज्ञान देने में. जानना चाहते है मेरे घर के बारे में, मेरे माँ-बाप के बारे में, मेरे ब्यॉय फ्रेंड के बारे में, मेरे बचपन के बारे में, मेरे किस्से के बारे में , जानना चाहते है कि मैंने कब अपने दोस्त के साथ किस पार्क में चूमा चाटी की है, कैसा लगा था पहली बार सेक्स करते हुए, मै वर्जिन मरी हूँ या पहले ही निपट गई थी, बाद में कैसा लगा जब छः-छः लोग मेरे ऊपर चालू बस में चढ गये और चलती बस के मजे के बारे में ........हाय साली पहले ही मर गई सब बताने से पहले ....यह सब बताने के पहले क्यों मर गई मै यह मुझे भी लगता है. 

देश ने जब मुझे अपनी जिम्मेदारी छोड़कर सिंगापुर भेज दिया तो मुझे भी लगा था कि शायद मेरी सरकार मेरा भला ही चाहती होगी पर यह समझने के पहले ही मै गुजरती जा रही हूँ क्षणे-क्षणे .चेतना में कही दर्ज है बचपन से गाये हुए गीत- सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा, जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गात अपि गरियसी, याद आ रहे है मन्त्र तंत्र जो कहते है स्त्री तो माँ बहन और भार्या होती है, जहां नारी की पूजा होती है वहाँ देवता बसते है.........
 
मै तो पढने आई थी दिल्ली अपने माँ बाप के सपने पुरे करने, दिल्ली जो देश की राजधानी है, इस महादेश की प्रजा के रूप में मै वो थी जिसने वोट दिया था सरकार को कि वो अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरा करेगी, और सबको समानता का अवसर देते हुए मुझे शिक्षा का अवसर देगी, यहाँ-वहाँ आने-जाने की छूट देगी, क्या प्यार करना पाप है, क्या कपडे पहनना पाप है क्या अपने दोस्त के साथ घूमना पाप है, मै तो इस देश में फिजियोथेरेपी पढकर लोगों की अपंगता को दूर करना चाहती थी पर मुझे पता नहीं था कि देश पूरा पागल है , मानसिक रूप से विकलांग है. देश के नेता, शीर्ष पदों पर बैठे लोग, पुलिस, कानूनविद, प्रशासन सब घोर बीमार है. सब लोग, सरकार भी  मेरे मरने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थी अब  यह बहुत सच  लगता है.
 
देश में महिलायें सत्ता के लिए कुछ भी करने को तैयार है समझौते और सब कुछ कि सत्ता में हमेशा बनी रहे, राज करें और देश संवारें पर ये महिलायें अब महिला होने से ऊपर हो गई  है चाहे वो सोनिया हो, सुषमा स्वराज हो, मायावती हो, जय ललिता हो, ममता हो, हेमा हो, मीरा कुमार हो, अम्बिका सोनी हो, स्मृति इरानी हो, किरण बेदी हो या कोई और बस ध्यान नहीं है तो अपने होने पर, अपने जैसी महिलाओं पर जो रोज दरिंदगी का शिकार होती है दिल्ली हो या दूर दराज के गाँव, सवर्ण हो या दलित, गरीब हो या अमीर. बस ये महिलायें पार्टी में एक शो पीस है और "बारगेन'करने का हथियार जिसे पुरुष इस्तेमाल करते है. जिस देश में इंदिरा गांधी और प्रतिभा पाटील जैसी महिलायें देश के वरिष्ठतम पदों पर आसीन रहकर कुछ ना कर सकी वहाँ अब मूक और कठपुतली बने प्रधानमंत्री क्या करेंगे, राष्ट्रपति जो महामहिम है क्या करेंगे जो अपने ही बेटे को काबू में नहीं रख सकते,  यह मेरे लिए सवाल है जो हमेशा मेरे साथ रहेगा.
 
देश की लडकियों जाओ, विरोध करो,  उखाड फेंको व्यवस्था को.... क्यों आत्महत्या कर रही हो तुम दोषी नहीं हो, इस व्यवस्था में सिर्फ पुरुष दोषी नहीं है, जाति और सामंतवादी व्यवस्था पर बने समाज में जब तक तुम आगे नहीं आओगी  तब तक कुछ नहीं होगा. छोड़ दो इन रीति रिवाजों को जो तुम्हें इंसान होने से रोकता है, जो तुम्हें दोयम दर्जे का मानता है, जो तुम्हें गैर बराबरी मूलक समाज में सिर्फ उपभोग की वस्तु मानता है और निरोध से लेकर दाढी बनाने के ब्रश के विज्ञापन में इस्तेमाल करता है. 

सिर्फ इस छः लोगों को सजा नहीं मुझे पुरे देश से बदला लेना है उन सबसे जो इरोम शर्मिला को बारह सालों तक भूखा रखते है, मणिपुर में नग्न प्रदर्शन कर रही महिलाओं के गुप्तांगों को जिज्ञासा से देखते है, नक्सलवाद के नाम पर महिलाओं को थानों में गिरफ्तार करके सामूहिक बलात्कार करते है, नर्मदा के विस्थापित परिवारों में सबसे पहले महिलाओं को निशाना बनाते है और जेलों में ठूंसकर जबरन पिटाई करते है, सोरा सोनी के गुप्तांग में पत्थर डालते है, जो विधायक बलात्कार के बाद अपनी सभाओं में बच्चे के साथ तुम्हें बुलाते है और तुम्हारी कहानी  प्रदर्शित करते है, जो अपनी हवस मिटाने के बाद तुम्हें रांड, छिनाल और चालू कहते है. जो अपनी पत्नी और माँ-बहनों को संपत्ति मानकर सुरक्षा के नित-नए उपाय खोजते है इसमे वो भी शामिल है इंदौर का शख्स जो अपनी पत्नी के गुप्तांग पर ताला लगा देता था रोज-रोज कई बरसो तक कि वो काम पर जाता है. क्या कहूँ और क्या ना कहूँ ....???
 
अच्छा हुआ मै मर गई और तुम सबको एक सूत्र में पिरो गई हूँ. बस अब मेरे नाम पर सियासत करना बंद करके कुछ ऐसा करो कि इस देश से ये पितृ सत्ता खत्म हो जाये जिसमे सब रंगे हुए है.
यह खत लिखकर मै थोड़ा सुकून महसूस कर रही हूँ. बस देख रही हूँ कि मौत अपने आगोश में लेने के लिए आ रही हूँ, काश कि मै अपने देश में आख़िरी सांस ले पाती. भारत माता  की लाडली मै, सीता सावित्री और द्रोपदी के देश में जी पाती या जीना तो हो नहीं पाया कम-से-कम मर ही पाती, खैर.......
 

मेरे  जनक और मेरी माँ मै माफी चाहती हूँ कि मै तुम्हारे सपने पुरे नहीं कर पाई नहीं बन पाई एक फिजियोथेरेपिस्ट , एक कर्ज है मेरे सर पर  पर मै वादा करती हूँ कि अगली बार इसी देश में सच में एक दुर्गा बनकर  जन्म लूंगी और फ़िर बताउंगी कि लडकी होना क्या होता है .......
आपकी अपने ही देश की जिम्मेदार नागरिक 

दामिनी

हम पुनः हजार साल पीछे लौट गये है एक आदिम और बर्बर युग में- सन्दर्भ दामिनी की मौत

 
हम पुनः हजार साल पीछे लौट गये है एक आदिम और बर्बर युग में................और इसका कारण मै, तुम, आप हम और वो सब है........
 
मेरा सर अपने देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसदों, मुख्य मंत्रियों, विधायकों, नेताओं,ब्यूरोक्रेसी, जन प्रतिनिधियों, मीडियाकर्मियों, के कृत्यों से झुका हुआ है. आप सबने और हमारी सड़ी-गली मान्यताओं ने दामिनी का खून किया है.
 
आज की सुबह ने हमारे लिए कई सवाल छोड़े है आज़ादी के बाद हम कहाँ आ गया है और क्या पाना चाहते है, महिलाओं के लिए भद्दे इशारे, चुटकुले, छेड़ छाड, मजे लेना और बलात्कार जैसे कृत्य आखिर में एक लडकी की मौत या आत्महत्या को मजबूर कर देना यही सब हम चाहते थे, यही हमारा लक्ष्य था, यही हममे निहित है, ये है महिला आरक्षण और पंचायतों में पचास प्रतिशत भागीदारी और शिक्षा दीक्षा के परिणाम? साल के अंत में जो कुछ हुआ उससे पूरा देश शर्मसार है और दुनिया के सामने हम पुनः एक पाशविक समाज के रूप में उभरे है.
 
कितने अहिंसक हो गये है हम कि इतने सब होने के बाद भी कहा जा रहा है कि उसकी लाश दिल्ली लाने के बाद भी दिल्ली पुलिस उसके शव का पोस्टमार्टम करने के बाद ही परिवार को सौंपा जाएगा. अब पोस्टमार्टम क्यों....प्लीज़ अब क़ानून की दुहाई नहीं दें और प्रक्रिया की बात ना करें .....
 
देश के नौजवानों और लोगों से मै अपील करता हूँ कि इस देश में इतनी शान्ति का माहौल बना दे कि देश के नेता शर्म से डूब मरें बजाय उसकी मौत पर राजनीति करने के, कोई त्यौहार ना मनाये, ना ही नए साल का जश्न, यह हम सबके लिए एक असहनीय घड़ी है.
 
मुझे अब कोई उम्मीद नजर नहीं आती जिस तरह से सरकार ने अपने आप को बेच दिया है और बेशर्मी से इस सरकार के नेताओं ने और बाकि सभी दलों के नेताओं ने बयान दिए है और घटिया "वर्ग चरित्र" दिखाया है उससे लगता है इन सबको भी सरे आम फांसी दी जाये. सबसे पहले संसद, विधान सभाओं, और बड़ी संस्थाओं में बैठे बलात्कारियों को खींचकर बाहर निकाला जाये और फ़िर दूर दराज के गाँवों में पहुंचा जाये.
पीडिता के लिए सिर्फ श्रद्धांजलि देने से काम नहीं चलेगा अब सबको एक गंभीर तरीके से लड़ाई लड़ाना होगी.
 
मीडिया का रोल भी नए सिरे से परिभाषित करके मीडिया के मायने समझने होंगे ताकि हम वो ना देखे जो "सबसे पहले और इसी चैनल पर" की मानसिकता से टीआरपी के लिए दिखाया या परोसा जाता है.

तुम हम सबके बीच में हो कही नहीं गई हो दामिनी और मै तुमसे कहता हूँ कि संसद के हर कोने में तब तक रहना जब तक ये नेता और बड़े लोग जो क़ानून बनाते है, अपने असली काम ना करें
देश की संसद का आज विशेष सत्र बुलाया जाये , सारी विधान सभाएं बुलाई जाये और सभी लोग अपने काम बंद करके यह विचार करें कि कैसे हम महिलाओं को बराबरी का वास्तविक दर्जा दें और उन्हें समाज में पूरी आजादी और छूट दी जाये. जब तक इसे गंभीरता से नहीं लिया जाएगा तब तक इस देश में कोई काम नहीं होगा. बंद करें चोचलेबाजी और संजीदगी से विचार करें और अमल भी करें.

Sunday, December 23, 2012

प्रतिछाया - बहादुर पटेल





 आदिवासी जीवन में भी अब लडकियां जो एक "असेट" हुआ करती थी अब वहाँ भी हमारी सभ्यता ने घुसपैठ कर ली है. जन्म लेती एक लडकी अपने होने से पहले ही चिंतित है. जल-जंगल-जमीन को लेकर जो उसके होने के अर्थ बयाँ करते थे और उसकी अस्मिता वही से आती थी पर उसकी जिजीविषा को सलाम कि वो बचाना चाहती हूँ अपने को ,जंगल जमीन को, जीने की हर कोशिश को.

Bahadur Patel की एक नायाब कविता, इस बार बहादुर अपने परम्परागत तेवरों को छोड़कर एक नए मिजाज़ और अंदाज़ में एक गहरी चिंता उस बड़े समुदाय से जो महानगरों में नहीं रहता और इनके लिए किसी दिल्ली या देवास में कोई प्रदर्शन नहीं होते. आदिम संस्कृति का कोई "सभ्य कवि" नहीं लिखता इनकी आवाजें, किसी साहित्य पुरस्कार में दर्ज नहीं है ये दस्तावेज और किसी सजिल्द पुस्तक में नहीं चीन्हीं गई गई है ये करुणा की आप्त गूँज और कोई कथ्य या गल्प नहीं बुना गया है इस बात को लेकर कि......

"हक की शाखें लगातार छांगी जा रही थी
माँ का भय नदी पर बनाये जा रहे बांध की तरह सख्त
होता जा रहा था
डूब में जीने का भरोसा डूबता जा रहा था"



          प्रतिछाया 

छः बेटियों के बाद जब मेरा जन्म हुआ
माँ की एक उम्मीद पर फिर से पानी फिरा
एक जन्म जैसे मरण हुआ
उसकी कराह में मेरे लड़की होने का दर्द ज्यादा था
धरती जैसे फट गयी थी
जिसमे समा जाना चाहती थी वह मेरे साथ

जन्म देने के बाद
मेरी मरियल देह से नाउम्मीद से भरी

इतनी लड़कियों को पालना
उनकी शादी करना
कैसे हो पायेगा चार बीघा जमीन में
नदी और जंगल के भरोसे
अब बच्चे जनना कठिन हैं
क्योंकि जंगल से बेदखल करने की सरकार
की पूरी तैयारी थी

हक की शाखें लगातार छांगी जा रही थी
माँ का भय नदी पर बनाये जा रहे बांध की तरह सख्त
होता जा रहा था
डूब में जीने का भरोसा डूबता जा रहा था
इतना बड़ा कुनबा कहाँ जायेगा
धरती का कौन सा हिस्सा थामेगा इसे
कोर्ट कचहरी के झमेले में उलझी थी
वह चार बीघा जमीन भी
ठीक उसी समय मेरा जन्मना
सबके लिए किसी सदमे से कम नहीं था

एक आदिवासी परिवार में कैसा दखल था
बाहरी दुनिया का
हमारी दुनिया पर अतिक्रमण की कोशिश से हतप्रभ थे हम
यहाँ कटेंगे तो कहाँ जुड़ेंगे
हमारे सारे देवता बेबस थे

माँ ने सोचा क्या जियूंगी में
आज नहीं तो कल मर ही जाउंगी
वह मुझे फ़ेंक आई थी घुडे पर
मुझमे रोने की ताक़त भी नहीं थी
लड़की होने का श्राप जो था
घुडा भी क्या झेलता मुझे
धरती तो हमारी थी ही नहीं

पर मुझे तो जीना था न इसी दुनिया में
मेरी माँ की भी माँ
याने मेरी नानी
जैसे किसी किस्से में होती है
वही आई थी मुझे बचाने
चुपचाप उठा लाई घुडे से
मेरी मरियल देह पर मालिश कर करके बचाया मुझे
श्राप मुक्ति तो नहीं पर नानी की बदौलत
दाखिल हुई मैं इस दुनिया में

मेरे बाद भाई का जन्म हुआ
सारे संघर्षों के बीच देख समझ रही थी मैं इस दुनिया को
अपनी जगह की तलाश की मैंने
बाधाओं की दीवारे लांघकर
अपने हक को छीना मैंने
फिर भी जीवन के ऐसे समुद्र में हूँ जहाँ
कई मगरमच्छों से घिरी पाती हूँ अपने आपको

मेरे जैसी कई लड़कियों ने
दम तोड़ दिया होगा घुडे पर
मैं अपनी नानी की प्रतिछाया देखती हूँ अपने में
बचाना चाहती हूँ अपने को
जंगल जमीन को
जीने की हर कोशिश को .


Saturday, December 22, 2012

वो साथ है तो जिन्दा हूँ,



वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो है,
ये अगर रस्मो रिवाजों से बगावत है तो है;


सच को मैंने सच कहा जब कह दिया तो कह दिया,

अब ज़माने की नज़र में ये हिमाकत है तो है;


कब कहा मैंने की वो मिल जाये मुझको,

उसकी बाहों में दम निकले इतनी हसरत है तो है;


वो साथ है तो जिन्दा हूँ,

मेरी सांसो को उसकी जरूरत है तो है;


दूर थे, दूर रहेंगे हर दम ये ज़मीन आसमान,

दूरियों के बाद भी दिल में कुरबत है तो है;


मैंने कब कहा वो मिल ही जाए मुझे,

पर गैर न हो जाये इतनी सी हसरत है तो है;.!!



II

आ तू दौड़ के लिपट जा सीने से हमारे
फिर इशारा इस तरफ से होगा ये उम्मीद न रख..

कि एक बार मोहब्बत की भीख मांगी थी तुझसे
बार बार मेरा सर झुकेगे ये उम्मीद न रख..

अच्छा न किया तुने इस दिल को ठुकरा कर
तुझे कोई न ठुकराएगा ये उम्मीद न रख..

बहुत ही तड़पाया गम ने तेरे हमको,
हम यूँ घुट घुट के मर जायेंगे ये उम्मीद न रख...!!


 

हम जो घरों से एक बार बाहर निकले हैं तो अब वहां लौटकर नहीं जाएंगे। - मनीषा पांडेय

पूरी तरह सहमत हूँ मनीषा पांडेय से, आज यह जोखिम लिए बिना मूंछों वाले निकम्मे, नालायक मर्द तुम्हें ना इज्जत देंगे ना स्वतन्त्रता ...........और सरकार से बड़ा नपुंसक कोई नहीं है जो क़ानून के नाम पर हजारों सालों तक लोकसभा-राज्यसभा के दायरे में खेल खेलती रहेगी, जैसे महिला आरक्षण के साथ पिछले कई बरसों से खेल रही है और इसमे वो सारी महिलायें भी शामिल है जो संसद में टसुए बहाने का नाटक करती है और सत्ता के खेल में रोज नए सौदे करती है.
 
लड़कियों !

1- अपने घरों से बाहर निकलो ।
2- पब्लिक स्‍पेस पर कब्‍जा करो। यकीन करो, धरती की हर इंच जगह तुम्‍हारी है और तुम्‍हें कहीं भी जाने-होने-रहने-जीने से कोई रोक नहीं सकता।
3- जान लगाकर पढो, टॉप करो और अपना कॅरियर बनाओ। (करियर टॉप प्रिऑरिटी पर रखो।)
4- अपने पैसे कमाओ, अपना घर बनाओ। अपना कमरा और अपना स्‍पेस।
5- एक गाडी खरीदो, दो पहिया या चार पहिया, कुछ भी चलेगा। और उस पर सवार होकर पूरे शहर में घूमो, दूर दराज के शहरों में भी। चाहो तो पूरे देश भर में।
6- अपनी जिंदगी की जिम्‍मेदारी अपने हाथों में लो। अपने फैसले खुद करो।
7- अमीर पति का ख्‍वाब छोड दो। अमीर पति से मिलने वाली सुविधाओं के साथ गुलामी भी आती है। ये पैकेज डील है। सिर्फ एक चीज नहीं मिलेगी।
8- प्रेम करो, अपना सेक्‍चुअल पार्टनर खुद अपनी मर्जी से चुनो।
9- सजो-संवरो और सुंदर दिखो।
9- किताबें पढो और अच्‍छा सिनेमा देखो। (प्‍लीज लड़कियों, सलमान खान को देखकर आहें भरना बंद करो।)
10- अपने कमाए पैसे जमा करो और उस पैसों से पूरी दुनिया घूमो। सुंदरवन के जंगलों और कन्‍याकुमारी के समुद्र तट पर अकेले जाओ। मेरी यकीन करो, अगर हम समझदार, बुद्धिमान और आत्‍मविश्‍वास से भरे हैं तो हमारे साथ कुछ नहीं होगा। और यदि कुछ बुरा हो भी गया तो इसका ये मतलब नहीं कि अगली बार हम सुंदरवन नहीं जाएंगे।

हम जो घरों से एक बार बाहर निकले हैं तो अब वहां लौटकर नहीं जाएंगे।

हिन्दुस्तान का ऐतिहासिक विरोध एक बलात्कार के विरोध में

देश के माननीय राष्ट्रपति महोदय अपने दडबे और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था से बाहर आओ और कहो कि

"मै सरकार को हुक्म देता हूँ कि बलात्कार के लिए कडा क़ानून बनाए और सजा और क़ानून में राजनैतिक हस्तक्षेप बंद होगा."
"सभी प्रदेशों में यह एक साथ लागू होगा और जिस प्रदेश में सरकार की अयोग्यता साबित होगी उस प्रदेश की सरकार तुरंत बर्खास्त कर दिया जाएगा."

और यह शुरुआत मप्र से हो क्योकि यहाँ महिलाओं के खिलाफ अपराध दर सबसे ज्यादा है पिछले बरस सबसे ज्यादा बलात्कार इसी प्रदेश में हुए है.
 
देश के माननीय राष्ट्रपति महोदय अपने दडबे और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था से बाहर आओ और कहो कि

"कि अगर सरकार यह चौबीस घंटे में नहीं करती है तो मै जन भावनाओं का आदर करते हुए देश की सभी विधानसभाओं, संसद और न्यायपालिकाओं को भंग करता हूँ"

देश को अब सरकार नहीं दबंग राष्ट्रपति की दरकार है अब समय आ गया है कि यह रबर स्टाम्प अपने होने को चरितार्थ करे और जो करोडो रूपया इस पद के चुनाव में बर्बाद होता है उसका चुकारा हो और देश की जनता को मालूम पड़े कि देश में सर्वोच्च पद क्या होता है.
 
दुनिया के सबसे बड़े प्रदर्शन में भारतीय युवाओं को सलाम
यह मेरे हिसाब से चीन के थ्येय्मान प्रदर्शन से बड़ा प्रदर्शन है
अब देश की युवा शक्ति को ये निकम्मे नेता और नपुंसक सरकारें बरगला नहीं सकती.
अब नहीं चलेगी दबंगई और टुच्ची नेतागिरी
सम्हलो भाजपा, कांग्रेस, सपा, और बासी बसपा...........
 

क्या राष्ट्रपति भवन हमारा नहीं है अंदर जाने में क्या दिक्कत है,
देश का गृह मंत्री कह रहा है कि युवा शांत रहे
हद है लाठी मारने वाली सरकार और पानी छींटने वाली सरकार नाकारा है.

मूक प्रधानमंत्रीजी  बाहर आओ अब नहीं बोले तो कभी नहीं बोल पाओगे
यही समय है जब अपनी सरकार के पिछले सभी पाप धूल जायेंगे अब तो बोलो नहीं तो कभी सरकार में नहीं आ पाओगे ............

Wednesday, December 19, 2012

ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा.......डा राकेश अग्रवाल, अमेरिका









यूँ तो सन १९९४ में वो देश छोड़कर चला गया था, वही शादी कर ली थी, तीन बच्चे हो गये थे और आज वो अमेरिका का जाना माना डाक्टर है. लगभग एक साल पहले मेरे ब्लॉग पर एक अनजान आदमी के कमेंट हर लिखे पर आ जाते थे और मुझे घोर आश्चर्य होता कि यह कौन है जो पहचान नहीं बता रहा और मेरे बारे में इतना जानता है और वो बातें जो मेरी किशोरावस्था से सम्बंधित थी, स्कूल, कॉलेज से सम्बन्धित थी, और हर लिखे पर कमेन्ट आता था. पहले मैंने जिज्ञासा वश ध्यान दिया फ़िर जवाब ना मिलने पर छोड़ दिया कि होगा कोई. पर एक दिन इसी फेस बुक पर दोस्ती का एक सुकून भरा आमंत्रण आया और यह राकेश निकला. फ़िर तो बातों का सिलसिला चल निकला और आनन-फानन में उसने यहाँ, देवास, आने का कार्यक्रम बना लिया. तीन माह पूर्व उसने सब तय कर लिया था, मैंने भी उसके वापिस जाने का टिकिट बनवा दिया था. जैसे-जैसे दिन करीब आते गये वो रोज पूछता सब तय है ना, तुने छुट्टी ले ली है ना, सबको बता दिया है ना, ठण्ड कितनी है आदि आदि. और आखिर वो दिन आ ही गया जब वो इंदौर उतरा और देवास आ गया शाम को १६ की. खूब बातें पुराने दोस्तों से जो देवास में ही है पर मै मिल नहीं पाया इनसे. कभी देर रात तक सबके घरों में जाना, इनकी बीबीयों से, बच्चों से जो अब किशोरावस्था पार कर कॉलेज में जाने लगे है, दोस्तों के माता-पिता जो बुढापे के दर पर है, और पुरानी मधुर स्मृतियाँ और सबसे ज्यादा तुम, आप छोड़कर साले कमीने, कुत्ते, तू-तुकारे से बोलने का सहज माहौल फ़िर लौट आया था और साथ पढ़ी-लिखी लडकियों, उनके घर, दुनियादारी, प्लाट, जमीन जायदाद, बच्चों का कैरियर, सपने, उमंगें, हमारे मास्टर और उनके बच्चे और उनकी धरोहर, देश-प्रदेश और अमेरिका, बराक ओबामा और वहाँ यहाँ की राजनीति कितनी सारे बातें हुई है इन तीन दिनों में. अभी राकेश को विदा कर लौटा हूँ भारी मन से. इस बीच सुवीर, विजय, अजय, डा रफत कुरेशी से प्रत्यक्ष मुलाक़ात और आशीष केकरे और शेखर सोनी से फोन पर लंबी-लंबी बातें हुई है इन दिनों, लगा कि बचपन और कैशौर्य लौट आया है बेफिक्री और मदमस्त दिन पुनः लौट आते है अक्सर पुराने दोस्त मिलने पर, काश!!! ये रुक सकते हमेशा के लिए पर कहाँ हो पाता है सब कुछ सोचा हुआ, राकेश ने वादा किया है कि कम से कम वो हर पांच साल में तो एक बार हम सबसे मिलने आएगा ही और अगली बार उसकी पत्नी-रानी , बेटे जुबीन, निखिल और बेटी परी के साथ निश्चित ही आएगा. उससे हमने गंभीरता से पूछा  कि क्या चक्कर है तो बोला, जो बहुत ही मार्मिक था- 

"मैंने इन दिनों वहाँ अपने व्यस्त समय में से समय निकाल कर दो फ़िल्में देखी :थ्री इडियट और ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा"- बस ये तो फ़िल्में थी मै इन्हें जीवन में अपनाने को चला आया. पता नहीं पांच साल बाद क्या हो, कौन मिले, कौन ना मिले.......इन दो फिल्मों ने मेरे अंदर उथल-पुथल मचा दी थी मै देवास का सयाजी द्वार देखना चाहता था, मीठा तालाब, खारी बावडी, एमजी रोड और वो सब देखना चाहता था जो उन दिनों मैंने शिद्दत से जिया था, देवास मेरे अंदर आज भी धडकता है शहर कभी मरा नहीं करते, वे भले ही कितने बदल जाये पर हमारे अंदर बसा हुआ शहर, प्यार और लोग मरा नहीं करते........बस यही प्यार था, सबसे मिलने की बेताबी थी जो यहाँ खींच लाई.......अब पांच सालों बाद लौटूंगा पता नहीं क्या बदलेगा पर......एक बार मिलना है, एक दिन और रुकना है और एक जीवन और जीना है .......क्योकि ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा.......!!!

Tuesday, December 18, 2012

बहादुर पटेल का जन्मदिन और कविता पाठ



















दोस्ती, यारी, संगीत, साहित्य और जिंदगी कितनी हसीन  हो सकती है यह शब्दों में बता पाना बहुत ही मुश्किल हो जाता है कई बार. देवास में हम लोग इस मामले में बहुत सुखी है और इस बात पर हमें गर्व भी है. कल प्रसंगवश बहादुर पटेल का जन्मदिन था और हमारे जीवन काका यानी श्री जीवनसिंह ठाकुर की नई किताब जो पाकिस्तान पर लिखे गये उनके लेखों का संग्रह है भी राधा प्रकाशन, नई दिल्ली से आई है. हम सब लोग आदरणीय डा प्रकाश कान्त जी के यहाँ एकत्रित हुए और फ़िर क्या बात थी, एक शाम कब रात में ढल गई, ताई संजीवनी का अपनत्व, अमेय और पारुल और श्रीकान्त  का स्नेह और मेजबानी , और देवास भर के साथी मोहन वर्मा, ओम वर्मा, समीरा नईम, दीक्षा दुबे, विजय श्रीवास्तव, जीतेंद्र चौहान(इंदौर) केदार, रितेश जोशी, संजय मालवीय, कैलाश राजपूत, रेखा भाभी, कृष्णा, कविता और बहादुर के परिजन, मेहरबान सिंह, सुनील चतुर्वेदी, अभिषेक और ढेर साथी इस महत्वपूर्ण  आयोजन में शामिल थे.

जीवन काका ने अपनी किताब के बारे में बताया और अपनी सारगर्भित टिप्पणी से भारत पाक मुद्दों को लेकर समझ स्पष्ट की. बाद में बहादुर ने अपनी नई ग्यारह कवितायें पढ़ी. इस आयोजन में देवास के वरिष्ठ साहित्यकार डा ओम प्रभाकर जी ने जीवन काका, डा प्रकाश कान्त और बहादुर को शाल ओढाकर सम्मानित किया. यह सबसे सुखद था कि इस निहायत पारिवारिक आयोजन में सब शामिल थे. बाद में साहित्य पर चर्चा हुई.

फ़िर देर रात तक हम ओम प्रभाकर जी से साहित्य और पुराने किस्से सुनते रहे, रात दो बजे उनके घर पर आदरणीय इंदु जी ने हमें मिठाई खिलाए और आंवले के लड्डू खिलाए जो इतने बढ़िया थे कि बता नहीं सकता. ढेरों किस्से-कहानियां और किस्सागोई के माहिर ओम जी ने हमें रचनाकारों और उनकी रचना प्रक्रिया से जुडी कई बातें बताई. यह दिन इस मायने में यादगार था कि एक दोस्त का जन्मदिन कितना सार्थक हो सकता है और जब अपने सब लोग मिलकर इसे रचनात्मक ढंग से मनाते है तो यह अविस्मरणीय हो जाता है. इस अवसर पर बहादुर के परिजन शामिल थे यह भी बड़ी खुशी की बात थी. कब समय गुजर गया पता ही नहीं चला. यह सब इतना भावुक और सुकून देने वाला था कि लगता था समय यही ठहर जाये.

संजीवनी ताई के एक होनहार शिष्य ने कार्यक्रम के आरम्भ में एक मालवी गीत और गजल गाकर इसे बहुत ही रसिक और संगीतमयी बना दिया था. आयोजन में संयोजन सुनील भाई का ना होता तो शायद यह इतना महत्वपूर्ण ना बन पाता, सो वे निश्चित ही धन्यवाद के पात्र है, और ओम प्रभाकर जी के लाडले केदार के बिना तो यह हो ही नहीं सकता था. बकौल सुनील भाई के "मै और संदीप तो उनके सौतेले पुत्र है और बहादुर और केदार सगे वाले है".....हा हा हा, ओम प्रभाकर जी का भी धन्यवाद कि इतनी देर रात तक हम लोगों के साथ रहे. जब घर पहुंचे रात दो बजे तो आदरणीय इंदु जी ने हम सबसे पूछा  कि एक बूढ़े ने चार जवानों को चलाया कि चार जवानों ने एक बूढ़े को चलाया?? शायद इतना खुलापन, ममत्व और सहजपन कही देखने को मिलेगा नहीं, वे सचमुच माँ है हम जैसे बिगडेल बच्चों की.

इस अवसर पर हमने अपने परिवार के सदस्य आदरणीय पदमश्री वसुंधरा ताई, कलापिनी कोमकली, सुल्ताना नईम दीदी, प्रभु जोशी,  भगवान सिंह मालवीय, मनीष वैद्य, पुष्पेन्द्र वैद्य, सत्यनारायण पटेल, दिनेश पटेल, ब्रजेश कानूनगो और इंदौर के साथियों को भी बहुत "मिस" किया जो इसमे शरीक नहीं हो पायें.

लंबी रचनात्मक उम्र जियो बहादुर और यश कीर्ति की पताकाएं फहराते रहो.

Friday, December 14, 2012

जीवन से गायब है प्रेम और सुकून

तुम्हारे लिए................सुन रहे हो...............कहाँ हो तुम..............................

एक बार कुएं ने नदी से, नदी से सागर से, सागर ने आसमान से, और आसमान ने धरती से, और फ़िर धरती ने छोटे- छोटे नालों से, और छोटे-छोटे नालों ने कुएं से फ़िर फ़िर पूछा कि पानी कहाँ गया ?

तो जवाब मिला- नालों में बह गया, कुएं पी गये, नदियाँ पी गई, समंदर ने उलीच दिया, आसमान निगल गया, धरती ने खाली कर दिया !

बस तब से गायब है पानी जैसे जीवन से गायब है प्रेम और सुकून इन दिनों !!!

एक बार फ़िर फराज़...............

 
 
फ़क़त अहसास के अंदाज़ बदल जाते हैं "फ़राज़"
वरना आँचल भी उसी धागे से बनता है और कफ़न भी.
 
दिल कि दुनिया कुछ इस तरह से उजड़ी "फ़राज़"
उसने दर्द का आदी बना के दर्द देना छोड़ दिया...
 
 

मेरे नदीम मेरे हमसफ़र - साहिर लुधियानवी

मेरे नदीम मेरे हमसफ़र उदास न हो

मेरे नदीम मेरे हमसफ़र उदास न हो
कठिन सही तेरी मंजिल मगर उदास न हो

कदम कदम पे चट्टानें खडी रहें लेकिन
जो चल निकले हैं दरिया तो फिर नहीं रुकते
हवाएँ कितना भी टकराएँ आँधियाँ बनकर
मगर घटाओं के परचम कभी नहीं झुकते

मेरे नदीम मेरे हमसफ़र

हर इक तलाश के रास्ते में मुश्किलें हैं मगर
हर इक तलाश मुरादों के रंग लाती है
हजारों चांद सितारों का ख़ून होता है
तब एक सुबह फ़िजाओं पे मुस्कुराती है

मेरे नदीम मेरे हमसफ़र

जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते
वो जिंदगी में नया रंग ला नहीं सकते
जो रास्ते के अँधेरों से हार जाते हैं
वो मंजिलों के उजाले को पा नहीं सकते

मेरे नदीम मेरे हमसफ़र

-साहिर लुधियानवी

हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है ! शैलेन्द्र की पुण्यतिथि के बहाने

आज महान कवि-गीतकार शैलेंद्र की पुण्‍यतिथि पर उनका यह क्रांतिकारी गीत कितना प्रासंगिक लगता है...
कहाँ गये ऐसे तेजस्वी लोग जो इतना खुलकर लिखते थे और गाते-बजाते थे ..........शायद उस समय ये ससुरी धारा 66 A नहीं होगी वरना सरकार उन्हें फांसी पर टांग देती..............
 
तुमने माँगे ठुकराई हैं, तुमने तोड़ा है हर वादा
छीनी हमसे सस्ती चीज़ें, तुम छंटनी पर हो आमादा
तो अपनी भी तैयारी है, तो हमने भी ललकारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !

मत करो बहाने संकट है, मुद्रा-प्रसार इंफ्लेशन है
इन बनियों चोर-लुटेरों को क्या सरकारी कन्सेशन है
बगलें मत झाँको, दो जवाब क्या यही स्वराज्य तुम्हारा है ?
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !

मत समझो हमको याद नहीं हैं जून छियालिस की रातें
जब काले-गोरे बनियों में चलती थीं सौदों की बातें
रह गई ग़ुलामी बरकरार हम समझे अब छुटकारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !

क्या धमकी देते हो साहब, दमदांटी में क्या रक्खा है
वह वार तुम्हारे अग्रज अँग्रज़ों ने भी तो चक्खा है
दहला था सारा साम्राज्य जो तुमको इतना प्यारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !

समझौता ? कैसा समझौता ? हमला तो तुमने बोला है
महंगी ने हमें निगलने को दानव जैसा मुँह खोला है
हम मौत के जबड़े तोड़ेंगे, एका हथियार हमारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !

अब संभले समझौता-परस्त घुटना-टेकू ढुलमुल-यकीन
हम सब समझौतेबाज़ों को अब अलग करेंगे बीन-बीन
जो रोकेगा वह जाएगा, यह वह तूफ़ानी धारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !

 

Wednesday, December 12, 2012

पंडित रविशंकर जी का यूँ गुजर जाना



पूरी दुनिया में बनारस और संगीत की खूशबू फैलाने वाले पंडित रविशंकर का देहावसान हो गया है जो कि बहुत ही दुखद खबर है. वर्ष के अंत में यह एक और बड़ा झटका है, ना जाने क्यों यह साल कलाकारों विशेषकर गायन विधा से जुड़े लोगों के लिए बहुत ही अशुभ रहा है. पंडित रविशंकर जी का यूँ गुजर जाना एक आघात है पूरी शास्त्रीय परम्परा पर और भारतीय संगीत पर.
भारतीय संगीत के मनीषी को नमन.............
फोटो सौजन्य Dr Akash Dutt Dubey


Sunday, December 9, 2012

अचानक मुझमे असंभव के लिए प्राप्ति जागी

रेल  से गुजरते हुए सुबह की नर्म धूप और वो भी जाड़े की, पहाड़ों पर धूप की आभा मानो उन रूखी- सूखी पहाड़ी चोटियों को सुनहरा बना रही थी, धूप के कतरें मानो किसी ने उन पर चून-चून कर बिछा दिए हो और कही से उग आये छोटे-मोटे पेड़ हरेपन को दिखलाते हुए इठला रहे हो. यह रेल धीमे-धीमे रेंगती जा रही है और एक शहर जिसका नाम अजमेर है- जो ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का शहर है, जहां से कोई कभी खाली हाथ नहीं गया, जिन्होंने हरेक की झोली भरी है,  गुजर रहा है. जब भी किसी परिचित या अपरिचित शहर से यूँ गुजरता हूँ तो आसमान देखने की जिद के साथ मै दूर फैलते जा रहे शहर के विस्तार को भी देखता हूँ, और खोजने की कोशिश करता हूँ कि क्या कही उस भीड़ में इंसान अभी बाकी है, क्या इंसानियत बाकी है, क्या रिश्तों की मिठास और संवेदनाएं बाकी है........ऐसे ही इस समय महसूस कर रहा था जब एक बेहद सर्द रात के बाद  ठन्डे हो चुके लोहे पर रेल के पहिये गुजर रहे थे. आवाजों के शोर में, भयानक कोलाहल में इन पहाड़ियों को देखना सुखद लग रहा था- जब सूरज बस उगा ही था और अपनी पहली रश्मि किरणे इन पहाडियों पर छिटक कर गर्म होता जा रहा था.......बेजान सी पडी पहाडियों पर जीवन जैसे नए अर्थ लेने लगा था और कही दूर से पक्षियों का एक रेला इस सुनहरी धूप को चीरता हुआ निकल गया. ये पहाडियां बेजान तो थी पर जब इनकी प्रतिछाया सुनहरी हो रही थी तो लगा कि कितना सौंदर्य है, कितनी बेचैनी है, कितनी कशिश है, और कितना अपनापन है, खीचती है मानो चुम्बक लगा हो इनके तल में कही!!! काश कि एक पल ठहर जाती यह रेल और मै छू आता उस शिखर को जहां जाने को अब मन मचलने लगा है, उस पार से देखने को जहां सब कुछ एकाकार हो जाता है और सब कुछ शांत हो जाता है. ऐसी ही एक सर्द और गहरी शाम को अपूर्व मुझे बेंगलोर की नांदी हिल्स ले गया था ठीक वैसी ही शान्ति क्या कभी संभव है ? क्या वो पानी का कुण्ड अपनी गहराई में समा लेता मुझे जो नांदी हिल्स की ऊँची पहाड़ी पर बना था  ? पता नहीं, पर शायद इन्ही किन्ही पहाडियों में चारू भी एक दिन ऐसी गई कि फ़िर लौट के नहीं आई. जिंदगी भर वो मामोनी और किशनगढ़ के बीच काम करते हुए अपने अजमेर शहर के इन ऊँचे शिखरों को खोजने निकली थी अकेली और फ़िर गुम हो गई........और गुम तो अनिल बोर्दिया भी हो गये है शायद इन्ही पहाडियों की यह सुनहरी धूप उन्हें भी भा गई होगी और फ़िर यकायक सोचकर निकल गये होंगे कि चलो शिखर छू आये देख आये इस पार-उस पार का सत्य- रेल की कर्कश आवाजों के बीच मुझे करुण क्रंदन सुनाई दे रहा है, सुबह के सात बजने वाले है रेल के पहिये समानान्तर पटरियों पर चल रहे है और धूप कड़ी हो चली है और मै पूछता हूँ अपने आप से कि क्या मंजिल  कभी समानान्तर रास्तों पर चलते हुए मिली है किसी को....पर मै तो निकला हूँ इसी को पाने और फ़िर याद आते है कालिगुला जिन्होंने  कहा था "अचानक मुझमे असंभव के लिए प्राप्ति जागी और मुझे ये-वो कुछ नहीं चाहिए.......मुझे चाँद चाहिए".

Wednesday, December 5, 2012

राजघाट पर बुश का कुत्ता छी छी छी- यश मालवीय

राजघाट पर बुश का कुत्ता छी छी छी
किसके हाथ तुरुप का पत्ता छी छी छी
राजघाट पर बुश का कुत्ता छी छी छी
गांधी जी की रूह रो रही सूने में
अपने तन का खून धो रही सूने में
मनमोहन ने टेका माथा छी छी छी
तुम ही माई बाप, सभी ने गाया है
नरमुंडों की माला पहने आया है
उसकी कुर्सी, उसका हत्था छी छी छी
इसको उसको सूंघ रहा सन्नाटे में
सरकारी पूंजी है सैर सपाटे में
कड़ुआ हुआ शहद का छत्ता छी छी छी
ऐश महल में, अर्थ व्यवस्था घाटे में
आँसू भड़ी गरीबी गीले आटे में
उसकी पौबाड़ा अलबत्ता छी छी छी
होली पर हल्की सर्दी है, गर्मी है
बातचीत में देखो कैसी नरमी है
पोछे नहीं पसीना सत्ता छी छी छी
भरी सुबह रोशनी हुई चितकबरी है
धड़ से अलग अहिंसा वाली बकरी है
धूप के सिर पे छांव चकत्ता छी छी छी
जनगणमन की सुबह कहो क्या शाम कहो
बजट बीच मेहमानवाजी राम कहो
बिना बात का बोनस भत्ता छी छी छी
सच्चाई के सिर पर भारी बक्सा है
मंहगे होटल में भारत का नक्सा है
राशन पानी कपड़ा लत्ता छी छी छी
अपनी कोई शक्ल नहीं आइने में
आग नहीं बस धुआँ भरा है सीने में
संविधान कागज का गत्ता छी छी छी

और लो एक बार फ़िर एफडीआई

मेरे घर के पास किराने वाला पूछ रहा है इसका मतलब क्या ?
अभी एक सब्जी वाला भी पूछकर गया कि भैया ये दस किलो मैथी बिकी नहीं सारे मोहल्लों में घूम लिया हूँ क्या कोई सरकार या एफडीआई वाला इसे ले लेगा क्या, ताकि मै घर जाते समय दूध और बाकी सामान ले जाऊं घर पर बीबी-बच्चे राह तक रहे होंगे!!!!!

अब मै क्या कहू मेरे पास कोई जवाब नहीं है.!!!!

कल सुषमा जी ने आगाज़ कर दिया था कि हम आपको मनाकर जीतना चाहते है हराकर नहीं..........तो अगर प्रस्ताव गिरता है तो किसकी गलती और बसपा और सपा ने अपनी औकात दिखा दी है.

सोनिया जी ने हमेशा की तरह तरकश में रखा सीबीआई का तीर सम्हाल कर रखा ही है ना वक्त - बेवक्त के लिए...........बस अब भुगतो.

कुल मिलाकर एक ही बात समझ आई कि बस सब चोर है और सब शातिर है और इस देश की जनता का भला तो कोई नहीं चाहता बस सबको अभी तक "एक्सपोर्ट वाले माल"का चस्का है और स्विस बेंक दिखता है बाकी तो अब राम ही राखे.

खूब भन्ना रहे थे ना मौन मोहन सिंह पर लो देख लो कि कितनी राजनीति सीख गये है और कितना प्यारा "गेम" खेलते है.......दो बड़े दलों को प्यार से बाहर करवा दिया कोई संविधान विशेषज्ञ बताएगा क्या ऐसे में सांसदों पर वैधानिक कार्यवाही नहीं हो सकती ?

सरकार की इस बात पर तो तारीफ़ करना होगी कि जोर के झटके जोर से दे रही है और सबको अखाड़े में बुरी तरह से पटखनी दे रही है परिणाम चाहे जो भी हो.

बहरहाल इस किराने वाले भाई को और सब्जी वाले को क्या कहूँ मै.?

ये कहीं चमन को जला न दे

मेरे हमनफ़स, मेरे हमनवा, मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे
मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-ब-लब, मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे

 

मेरे दाग़-ए-दिल से है रौशनी, इसी रौशनी से है ज़िंदगी
मुझे डर है ऐ मेरे चाराग़र, ये चराग़ तू ही बुझा न दे

 

मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर, तेरा क्या भरोसा है चाराग़र
ये तेरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर, मेरा दर्द और बढ़ा न दे


मेरा अज़्म इतना बुलन्द है के पराये शोलों का डर नहीं
मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल से है, ये कहीं चमन को जला न दे

 

-शकील बदायूँनी

तुम्हारे लिए.............सुन रहे हो..............कहाँ हो तुम............

सच तो यह है कुसूर अपना है
चाँद को छूने की तमन्ना की
आसमा को जमीन पर माँगा
फूल चाहा कि पत्थरों पे खिले
काँटों में की तलाश खुशबू की
आग से माँगते रहे ठंडक
ख्वाब जो देखा
चाहा सच हो जाये

इसकी सजा तो मिलनी ही थी.

- जावेद अख्तर


तुम्हारे लिए.............सुन रहे हो..............कहाँ हो तुम............



जिधर जाते है सब, जाना उधर अच्छा नहीं लगता
मुझे पामाल* रास्तों का सफर अच्छा नहीं लगता

गलत बातों को खामोशी से सूनना, हामी भर लेना
बहुत फायदे है इसमे मगर अच्छा नहीं लगता

मुझे दुश्मन से भी खुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर, कदमों में अच्छा नहीं लगता

बुलंदी पर इन्हें मिट्टी की खुशबू तक नहीं आती
ये वो शाखें है जिनको अब शजर** अच्छा नहीं लगता

ये क्यों बाकी रहे आतिश-जनों***, ये भी जला डालो
कि सब बेघर हों और मेरा हो घर, अच्छा नहीं लगता .

-जावेद अख्तर

*पामाल- घिसे-पिटे
**शजर- वृक्ष
***आतिश-जनों- आग लगाने वाले

Saturday, December 1, 2012

३ दिसंबर के बहाने गैस पीड़ित भोपाल

मप्र के भोपाल में उत्सवों की श्रृंखला में लों फ़िर आ गया एक और ३ दिसंबर पर ढाक के तीन पांत......................फ़िर अखबार रंगे जायेंगे मृतात्माओं को याद किया जाएगा, एंडरसन का पुतला फूँका जाएगा.........सरकार को गाली दी जायेगी, रैली धरना और प्रदर्शन , मेरे एक मित्र है सुशील जो बेहद ईमानदार से कह रहे थे कि वे कही भी रहे पर ३ दिसंबर को भोपाल में रहते है हालांकि उन्होंने सदिच्छा से कहा था आज तक वे विज्ञान के "जन विज्ञान वाले मार्ग" पर चल रहे है एक साधू सा जीवन जीने वाले सुशील भाई की प्रतिबद्धता पर सवाल ही नहीं है परन्तु जो लोग ३ दिसंबर के नाम पर धंधा कर रहे है १९८४ से उनका क्या....... मुझे लगता है कि अब भोपाल की छबि बदलने की जरुरत है और गैस पीड़ितों को जो भी अनुदान मिला या पेंशन मिल रही है वो....पर्याप्त है जिन्हें मरना था वो मर खप चुके है, रिश्तेदारों के आंसू भी सूख चुके है अब हो रही है तो सिर्फ राजनीती और अनुदान प्राप्त करने की लंबी गहरी चालें................बस यही सच है इसलिए मुझे लगता है कि अब आंसूओं को पोछ कर (वैसे भी आंसू सूख चुके है और पुतलियाँ पथरा गई है) एक नए कल की ओर देखा जाये.............मै जानता हूँ कि मै क्या कह रहा हूँ पर सच यही है. बंद करें गैस पीड़ितों की भावनाओं को भडकाना और उन्हें बार-बार कुरेदना और अपनी रोटी की तलाश इस सुराख में ढूंढना ............यहाँ के कुछ लोग और एनजीओ  इसी भोपाल में इन्ही गैस पीड़ितों के नाम पर चल-अचल संपत्ति बना लिए है, कमा लिए है बड़े- बड़े अंतर्राष्ट्रीय इनाम, अनुदान, किताबें, नाम, यश और चढावें.....सब उनके खाते में है इससे हम सब वाकिफ है............और अंततोगत्वा हुआ क्या सुप्रीम कोर्ट ने भी पन्ने उलट दिए है और सब खत्म हो गया है बेहतर है सब भूलकर एक नए भोपाल और नए कल की शुरुवात करें जहां कोई एमआईसी गैस नहीं होगी, ना यूनियन कार्बाईड, ना एंडरसन, ना अर्जुन सिंह, ना राजीव गांधी... सब इतिहास के काल में काल कलवित हो गये है.... पानी का उद्दाम वेग थम गया है और एक नया सूरज निकल रहा है ...........बंद करो यह सब घटिया राजनीती और गैस पीड़ित लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल.....

गरीबी बड़ी बुरी चीज है आप सब भी जानते है - रामसखी........

ये है रामसखी ..............ग्यारह साल की पचास रुपये रोज मिलते है और पांच से छः घंटे तक सर पर बोझा उठाकर चलती है गालियाँ खाती है सो अलग............बरात जनवासे पहुँच जाती है तो लोग दुत्कार देते है रास्ते भर पानी नहीं पीती और आख़िरी में में एक कप चाय की उम्मीद में बैठी रहती है बरात के दरवाजे पर कि कोई एक कप चाय पिला देगा या कुछ खाना खिला देगा..............स्कूल........अरे वो तो बड़े लोग जाते है हमें क्या ...........हाँ कभी कभी ठेकेदार दस पांच रूपया दे देता है तो फुल्की खा लेती है चटपटी अब अंदर जाकर पार्टी में नहीं खा सकते ना साहब........पचास रूपये..... बाबू ले लेते है कभी घर का सामान ले आते है और कभी पौवा ...........साहब अगर बरात चलते में लाईट बूझ गई तो बाराती के साथ ठेकेदार भी बहुत गाली देता है माँ-बहन की, और फ़िर आठ दिन तक काम पर नहीं बुलाता तो घर में बाप-माँ भी गाली देते है भाई भी मारता है खूब, अब मै क्या करू मै कोई कारीगर नहीं और फ़िर वजन से सर दुखता है.... इन दिनों तो बहुत ठण्ड है साहब.... गरम सूटर भी नहीं है और बाराती देर तक नाच-गाना करते है और बड़े लोग बैंड वालों को, ढोल वालों को, बग्घी वाले को, घोड़े वाले इनाम देते है पर हमें तो चाय भी नहीं मिलती..........क्या करे साहब.............गरीबी बड़ी बुरी चीज है आप सब भी जानते है पर करते कुछ नहीं ना यही.............तो दिक्कत है

एक दिन ड़ा दिनेश कुशवाह और ड़ा प्रहलाद अग्रवाल जी के साथ रीवा में






यह ३० नवंबर की दोपहरी थी जब मैंने प्रिय मित्र, सखा और बंधू ड़ा दिनेश कुशवाह को रीवा में फोन किया और पूछा कि क्या वो रीवा में है तो बोले अरे जहां भी हो तुरंत चले आओ यहाँ ड़ा प्रहलाद अग्रवाल जी भी आये हुए है जिन्हें दिनेश प्यार से आचार्य कहता है, मै वेद के साथ भागा और जा पहुंचा विवि में हिन्दी विभाग जहां मै दर्जनों बार आया हूँ. दिनेश ने बहुत गर्मजोशी से गले लगाकर स्वागत किया और आचार्य जी से परिचय करवाया. बाद में अपनी एक कविता मेरे लिए एवं आचार्य जी के लिए पढ़ी "बडबोले" बहुत ही अदभुत कविता ढेरों सन्दर्भ, प्रसंग और मौजूदा हालात पर कचोट करने वाली बेहतरीन कविता. फ़िर गपशप, और अपनी पुस्तक "इसी काया में मोक्ष" दी, साथ ही जनपथ का ताजा अंक, और "अभिनव कदम" के भाग २७/२८ जो किसान आंदोलन पर केंद्रित थे. दो घंटे तक बहस, साहित्यिक गपशप और फ़िर गर्मागर्म पकौड़े और चाय वाह..........हाँ आचार्य जी के सुपुत्र जिन्होंने दिनेश के साथ ही हाल ही में पीएचडी पूरी की ड़ा उज्जवल अग्रवाल से मिलवाया. उज्जवल की भारतीय ज्ञानपीठ से हाल में किताब भी आई है. कितना कुछ हो जाता है चंद घंटों में हम सोच ही नहीं पाते............फ़िर बाहर आकर चंद तस्वीरें खिचवाई हम सबने और फ़िर विदाई.........इस बीच समीरा नईम से फोन पर बातें की और फ़िर दोनों ने वादा किया कि वे शीघ्र ही देवास आने का कार्यक्रम बनाएंगे .ऐसे मौके बहुत कम आते है जीवन में मेरे लिए ये यादगार भावुक क्षण थे जिन्हें मै हमेशा सहेजकर रखना चाहूँगा.

Friday, November 23, 2012

प्रदेश टू डे में प्रकाशित आज मेरा व्यंग्य ........


प्रदेश टू डे में प्रकाशित आज मेरा व्यंग्य ........

मिथिलेश राय की एक प्रभावी कविता "हम ही है"

 

‎ 












  

  



Mithilesh Ray की एक प्रभावी कविता. अच्छी बात यह है इस युवा कवि से मेरा बहुत पुराना परिचय है और इसी ने संभवतः मेरा नाम आज से पन्द्रह साल पहले चाचू रखा था, बचपन में इसकी कवितायें हमने चकमक में छापी है लगातार.........एक बार दिल्ली में मुझसे मिलने आया था, आजकल यह प्रभात खबर में संपादन डेस्क पर है और उम्दा काम कर रहा है. बधाई मिथिलेश कि यहाँ -वहाँ छप रहे हो......अब किताब की तैयारी करो. Ashok Kumar Pandey विश्वविद्यालय से असुविधा मिल ही चुकी है बस अब किताब ही आना चाहिए.......बहरहाल...बधाई....
"हम ही है"

हम ही तोडते हैं सांप के विष दंत


हम ही लडते हैं सांढ से
खदेडते हैं उसे खेत से बाहर

सूर्य के साथ-साथ हम ही चलते हैं

खेत को अगोरते हुये
निहारते हैं चांद को रात भर हम ही
हम ही बैल के साथ पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं
नंगे पैर चलते हैं हम ही अंगारों पर
हम ही रस्सी पर नाचते हैं

देवताओं को पानी पिलाते हैं हम ही

हम ही खिलाते हैं उन्हें पुष्प, अक्षत
चंदन हम ही लगाते हैं उनके ललाट पर

हम कौन हैं कि करते रहते हैं

सबकुछ सबके लिये
और मारे जाते हैं
विजेता चाहे जो बने हो
लेकिन लडाई में जिन सिरों को काटा गया तरबूजे की तरह
वे हमारे ही सिर हैं
परिचय 
24 अक्टूबर,1982 ई0 को बिहार राज्य के सुपौल जिले के छातापुर प्रखण्ड के लालपुर गांव में जन्म । वागर्थ, परिकथा, नया ज्ञानोदय, कथादेश, कादंबिनी, साहित्य अमृत, बया, जनपथ, विपाशा आदि में अबतक बीस-पच्चीस कविताएं प्रकाशित। गद्य साहित्य में भी लेखन। बाल साहित्य में भी सक्रिय। गद्य व पद्य के लिए क्रमषः वागर्थ व साहित्य अमृत द्वारा युवा प्रेरणा पुरस्कार। कहानी कनिया पुतरा व् स्वर टन पर डाकूमेंट्री फिल्म बनने कि तैयारी , आजकल  प्रभात खबर में संपादन डेस्क पर। 
संपर्क-द्वारा, श्री गोपीकान्त मिश्र,जिलास्कूल,सहरसा-852201, (बिहार) 
मोबाइल-09473050546
 

Thursday, November 22, 2012

एक आदमी का गुस्सा.....

अगर इस बार संसद में सांसद नहीं बैठे और काम नहीं किया तो इन्हें हम जैसे लोगों को नैतिकता के उपदेश देने का कोई हक नहीं है साथ ही देश के सुप्रीम कोर्ट से निवेदन है कि इनकी सदस्यता सदनो से समाप्त कर दे ......सबके सब चैनलों पर बैठ कर ज्ञान बघार रहे है परन्तु संसद में बैठकर काम नहीं करना चाहते...............हद है मक्कारी और राजनीति की और बकवास करने की चाहे फ़िर वो भाजपा हो कांग्रेस हो या सपा हो या तृणमूल
या बसपा.................सारे मक्कार रात में चैनलों पर बैठकर बकवास करते है और एंकर और मीडिया के लोग भी फ़ालतू के सवाल करते है बजाय इन्हें सदन में बिठाने के घेर-घार कर ले आते है. इनका चैनलों पर बहिष्कार किया जाये, मीडिया कवरेज देना बंद कर दे और सुप्रीम कोर्ट इनसे पूछे कि क्या किया, या फ़िर सदन की कार्यवाही में लगे हमारे श्रम के रूपयों को इनसे वसूला जाये ....... सब लाइन पर आ जायेंगें...........माननीय मुफ्तखोर............एफ डी आई आदि सब चुतियापा है हम ऐसे लोगों को बरगलाने के लिए, साले मुफ्तखोर, काम नहीं करते साल भर और दिल्ली में बैठकर हमपर राज करना चाहते है और जे मीडिया वाले कम है हर माह लाखों की तनख्वाह खाते है, रोज सारी फ़ोकट की सुविधाएँ भकोसते है, मुफ्त की दारु और मुर्गा खाते है और आम आदमी के सवाल पूछते है इन मुफ्तखोरों से ........इन औरतों को देखो जो सांसद बनी फिरती है उनके चश्मे देखो लाखों के है.................साडी देखो, लटके झटके देखो............
संसद तो अब इनको चलानी ही पड़ेगी वरना हम इन्हे बताएँगे कि वोट कैसे मिलते है................ना चने चबवा दिए तो देख लेना ..........
परधान मंत्री इनको पटाने के लिए घर बुलाकर खाना खिलाते है दस हजार रूपये की थाली, इनके संडास पैतीस लाख के है, इअनके पेट कभी भरेंगे और साले फ़िर भी साल में एक महीना संसद में बैठकर बातचीत करके निर्णय नहीं ले सकते, तो बदल दो यह परजातंत्र की व्यवस्था ..........मर तो हम रहे है महंगाई में और पीस रहे है सरकारी दफतरों में जहां हरामखोर अधिकारी बैठे है जो रूपया खाए बिना बाप को बाप भी नहीं कहते तो क्या फ़ायदा ऐसी व्यवस्था का.........

आओ कसाब को फांसी दे - अंशु मालवीय

उसे चौराहे पर फाँसी दें !
बल्कि उसे उस चौराहे पर फाँसी दें
जिस पर फ्लड लाईट लगाकर
विधर्मी औरतों से बलात्कार किया गया
गाजे-बाजे के साथ
कैमरे और करतबों के साथ
लोकतंत्र की जय बोलते हुए

उसे उस पेड़ की डाल पर फाँसी दें
जिस पर कुछ देर पहले खुदकुशी कर रहा था किसान
उसे पोखरन में फाँसी दें
और मरने से पहले उसके मुंह पर
एक मुट्ठी रेडियोएक्टिव धूल मल दें

उसे जादूगोड़ा में फाँसी दें
उसे अबूझमाड़ में फाँसी दें
उसे बाटला हाउस में फाँसी दें
उसे फाँसी दें.........कश्मीर में
गुमशुदा नौजवानों की कब्रों पर

उसे एफ.सी.आई. के गोदाम में फाँसी दें
उसे कोयले की खदान में फाँसी दें.
आओ कसाब को फाँसी दें !!

उसे खैरलांजी में फाँसी दें
उसे मानेसर में फाँसी दें
उसे बाबरी मस्जिद के खंडहरों पर फाँसी दें
जिससे मजबूत हो हमारी धर्मनिरपेक्षता
कानून का राज कायम हो

उसे सरहद पर फाँसी दें
ताकि तर्पण मिल सके बंटवारे के भटकते प्रेत को

उसे खदेड़ते जाएँ माँ की कोख तक......और पूछें
जमीनों को चबाते, नस्लों को लीलते
अजीयत देने की कोठरी जैसे इन मुल्कों में
क्यों भटकता था बेटा तेरा
किस घाव का लहू चाटने ....
जाने किस ज़माने से बहतें हैं
बेकारी, बीमारी और बदनसीबी के घाव.....

सरहद की औलादों को ऐसे ही मरना होगा
चलो उसे रॉ और आई.एस.आई. के दफ्तरों पर फाँसी दें
आओ कसाब को फाँसी दें !!

यहाँ न्याय एक सामूहिक हिस्टीरिया है
आओ कसाब की फाँसी को राष्ट्रीय उत्सव बना दें

निकालें प्रभातफेरियां
शस्त्र-पूजा करें
युद्धोन्माद,
राष्ट्रोन्माद,
हर्षोन्माद
गर मिल जाए कोई पेप्सी-कोक जैसा प्रायोजक
तो राष्ट्रगान की प्रतियोगिताएं आयोजित करें
कंगलों को बाँटें भारतमाता की मूर्तियां
तैयारी करो कम्बख्तो ! फाँसी की तैयारी करो !

इस एक फाँसी से
कितने मसले होने हैं हल
निवेशकों में भरोसा जगना है
सेंसेक्स को उछलना है
ग्रोथ रेट को पहुँच जाना है दो अंको में

कितने काम बाकी हैं अभी
पंचवर्षीय योजना बनानी है
पढनी है विश्व बैंक की रपटें
करना है अमरीका के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास
हथियारों का बजट बढ़ाना है...
आओ कसाब को फाँसी दें !

उसे गांधी की समाधि पर फाँसी दें
इस एक काम से मिट जायेंगे हमारे कितने गुनाह

हे राम ! हे राम ! हे राम !..."

--अंशु मालवीय

Anshu Malviya

मैं एक आखिरी गीत अपनी धरती के लिये गाना चाहता हूँ ..अनुज लुगुन

भाई अनुज लुगुन  हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि है और बेहद संभावनाशील भी. उनकी  कवितायें एक नया मुहावरा और व्यापक संसार लेकर आती है जो हमें अपने आदिम जीवन से ना मात्र जोडती है बल्कि समाज में हो रहे बदलावों से इस पुरे सन्दर्भ पर क्या असर पड रहा है इसकी भी निष्पक्ष परीक्षा करती है. निश्चित ही यह नयापन, नया गढना, नया मुहावरा और नया विचार एक जटिल प्रक्रिया है जिसे स्वीकारने में अभी भी हिन्दी जगत  में कई प्रकार की दिक्कतें है. खासकरके हिन्दी की परम्परागत कविता के फलक पर कविता को तौलने की प्रवृति अभी  बहुत खुली नहीं है. पर समय को लगभग चुनौती देते हुए अनुज काल से होड ले रहे है और सारे दबावों के बावजूद अपनी सशक्त उपस्थिति से हम सबको चमत्कृत कर रहे है इन दिनों. बधाई भाई अनुज.....आपके लिए प्रस्तुत है अनुज लुगुन की एक नई कविता...

मैं घायल शिकारी हूँ
मेरे साथी मारे जा चुके हैं
हमने छापामारी की थी
जब हमारी फसलों पर जानवरों ने धावा बोला था

हमने कारवाई की उनके खिलाफ
जब उन्होंने मानने से इनकार कर दिया कि
फसल हमारी है और हमने ही उसे जोत – कोड कर उपजाया है
हमने उन्हें बताया कि
कैसे मुश्किल होता है बंजर जमीन को उपजाऊ बनाना
किसी बीज को अंकुरित करने मे कितना खून जलता है
हमने हाथ जोडे ,गुहार की
लेकिन वे अपनी जिद पर अडे रहे कि
फसल उनकी है,
फसल जिस जमीन पर खडी है वह उनकी है
और हमें उनकी दया पर रहना चाहिये

हमें गुरिल्ले और छापामार तरीके खूब आते हैं
लेकिन हमने पहले गीत गाये
माँदर और नगाडे बजाते हुए उन्हें बताया कि देखो
फसल की जडे हमारी रगों को पहचानती हैं ,
फिर हमने सिंगबोंगा से कहा कि
वह उनकी मति शुद्ध कर दे
उन्हें बताये कि फसलें खून से सिंचित हैं ,

और जब हम उनकी सबसे बडी अदालत में पहुँचे
तब तक हमारी फसलें रौंदी जा चुकी थीं
मेरा बेटा जिसका व्याह पिछ्ले ही पूरणिमा को हुआ था
वह अपने साथियों के साथ सेंदेरा के लिये निकल पडा

यह टूट्ता हुआ समय है
पुरखों की आत्मायें ,देवताओं की शक्ति छीन होती जा रही हैं
हमारी सिद्धियाँ समाप्त हो रही हैं
सेंदेरा से पहले हमने
शिकारी देवता का आह्वान किया था लेकिन
हम पर काली छायाऐं हावी रहीं
हमारे साथी शहीद होते गये

मैं यहाँ चट्टान के एक टीले पर बैठा
फसलों को देख रहा हूँ
फसलें रौन्दी जा चुकी हैं
मेरे बदन से लहू रिस रहा है
रात होने को है और
मेरे बच्चे , मेरी औरत
घर पर मेरा इंतजार कर रही हैं
मैं अपने शहीद साथियों को देखता हूँ
अपने भूखे बच्चे और औरतों को देखता हूँ
पर मुझे अफसोस नहीं होता
मुझे विश्वास है कि
वे भी मेरी खोज में इस टीले तक एक दिन जरुर पहुंचेंगे

मैं उस फसल का सम्मान लौटाना चाहता हूँ
जिसकी जडों में हमारी जडें हैं
उसकी टहनियों में लोटती पंछियों को घोंसला लौटाना चाहता हूँ
जिनके तिंनकों में हमारा घर है
उस धरती के लिये बलिदान चाहता हूँ
जिसने अपनी देह पर पेडों के उगने पर कभी आपत्ति नहीं की
नदियों को कभी दुखी नहीं किया
और जिसने हमें सिखाया कि
गीत चाहे पंछियों के हों या जंगल के
किसी के दुश्मन नहीं होते

मैं एक बूढा शिकारी
घायल और आहत
लेकिन हौसला मेरी मुठिट्यों मे है और
उम्मीद हर हमले में
मैं एक आखिरी गीत अपनी धरती के लिये गाना चाहता हूँ ..
 

-अनुज लुगुन 18/11/12

नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा 16

आज फ़िर वही नदी है वही पानी, वही उद्दाम वेग, वही धाराएं, वही बहाव, वही उठती-गिरती-पडती लहरें ........सब कुछ गुत्थम गुत्था, आपस में और ऐसे बिखरे और उलझे हुए मानो शब्दों का कोई जाल हो जहां हर कोण से एक नया अक्स उभरता हो.........चारों ओर रेत ही रेत है किनारे पर, किनारे पर पसरी आदमियत की गन्दगी और सदियों से बोझानुमा ढोती हुई ये रेवा कहाँ से इतनी शक्ति ले आई है कि इस सबको अपने अंदर समेट कर बहती जा रही है. दूर कही सूरज डूबने की पुरजोर कोशिश कर रहा है...........लालिमा भी कोने में जाकर दुबक गई है झुरमुट में. सब कुछ अँधेरे में होने को है और एक लाश आई है अपने जीवन की पूरी परिक्रमा करने के बाद और अब यह मनुष्य योनी भी खत्म हो गई आज. जो साथ आये है उसके परिजन है एक भाई है जो बेहद अशांत और उद्दीप्त है पता नहीं क्या बडबडा रहा है कह रहा है "बेबी को ऐसा नहीं करना था .............मालूम नहीं पड़ा किसी को, सामने रहता था और यह सब कैसे हो गया, यह घाट के उस छोर का मकान था जहां मोहल्ले की गली का कोना बंद हो जाता था और फ़िर शुरू होता था भय, जुगुप्सा और घृणा का विस्तार.....बस हमारी बेबी वही धंस गई उसके साथ इस सामने वाले कमीने ने कही का नहीं छोड़ा हमें......कब यह मोहल्ले के रिश्ते गले के उस बंद कोने में जाकर एकाकार हो गये और बेबी के भीतर एक जिंदगी जन्म लेने लगी......कल यानी उसके जीवन की आख़िरी रात को सबके साथ देर तक वो टीवी देख रही थी, पाँव से पायल उतार कर उसने भाभी को दे दी और कहा कि अब तो हो गई है दीवाली, छनछन से घर में कोहराम मचता है और मेरे कानों में कुछ और ही गूंजता है......."  लाश के साथ आये लोग लकड़ी जमा कर रहे थे घी, आटा, काले तिल, जौ, पूजा की सुपारी, हार-फूल, चन्दन, पान का बीड़ा, जैसी तैयारियां चल रही थी लाश के मुँह में पान का बीड़ा ठूंसा जा रहा था. भाई लगभग विक्षिप्त अवस्था में फ़िर तेज आवाज में सामने वाले को ललकार रहा था कि साले ने हमें कही का नहीं छोड़ा, सात भाईयों में यही सबसे घटिया निकला और हमारे खानदान पर ऐसा छींटा मारा है कि यह दाग सात पुश्तों तक नहीं धुलेगा....और बेबी उसे क्या पडी थी......कम से कम बता तो देती, कल रात जब अपनी पायल उतार रही थी तो कितनी गहरी हो गई थी उसकी आँखें और धंस गई थी गहरे भीतर, ना जाने कितने दिनों तक वो बर्दाश्त करती रही यह सब, हार गई होगी उसे समझाकर तब कही एक साथ दो जीव ह्त्या का पाप अपने सर लेना स्वीकार किया होगा........सब के सब बहरे हो गये थे ऊपर टीवी देखते हुए...क्या एक आह भी नहीं निकली होगी बेबी के मुँह से एकदम से झूल गई रस्सी पर और जब माँ ने खोला कमरा तो सीधे माँ की गोद में ही जा गिरी......यह एक वज्राघात था, सन्निपात था.... हम जैसे लोगों के लिए जो कभी अपनी इज्जत को ही सबसे ज्यादा मानते थे और आज भी मानते है, पर बेबी यह तूने क्या कर दिया.......कल तो मै भी पागल था और खूब गलियाता रहा उसकी देह को और आवेश में आकर एक लात भी जड़ दी थी उसके पेट पर तभी खून का स्रोता बह निकला था......एक मांस का लोथडा .........और यकीन मानो वह देखकर सारा माजरा समझ आया था....... ओह.........मै भी जानवर बन गया.....पर खेल तब समझ आया जब इसी बंद गली के आख़िरी कोने में बसे हमारे घर के सामने वाला वह गायब हो गया.......बेबी के पास से कुछ मिला था हाथ की मुठ्ठी में कुछ दबा सा पड़ा था.......आज सुबह पोस्टमार्टम के बाद यह मोहल्ले में हवा की तरह फ़ैल गया सब.......और अब सब कुछ करते- करते शाम हो आई है.........ये रेवा नदी ने कोई सुख नहीं दिया साहब, कोई सुख नही दिया, जब भी दिया आंसू और ग़म ही  दिए है .....लाश धू-धू कर जलने लगी है साथ आये लोग शांत होकर बीडी पीने लगे है और गप्प लगाने लगे है और कपाल क्रिया के बाद सब नर्मदा के जल में नहा रहे है भीगे बदन और फिजां में एक ही आवाज गूँज रही है नर्मदे हर, हर, हर..........(नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा 16)

नर्मदा के किनारे आख़िरी कुछ और दिन..............


 ये नर्मदा किनारे के आख़िरी कुछ दिन है और लगता है कि सब कुछ थम गया है...........पानी, रेत, हवा, भीड़, पूजा-पाठ, घाट, यहाँ तक कि भगवान भी ........लगता है एक सर्द सी जिंदगी इन घाटों पर काईनुमा जम गई है जहां पाँव रखते ही फिसल जायेंगे कदम और फ़िर अपरान्ह की इस चला-चली की बेला में सब कुछ शांत हो गया है.....अब पानी में फेंका पत्थर भी लहरों को पसराता नहीं है, कही कोई जादू होता नहीं दिखता......दूर कही रेतघाट
पर जब एक स्त्री की लाश जलती है तो धुएं के बादल देर तक पानी के ऊपर छाये रहते है और पूछते है कि ये क्यों........जब एक लाश और किसी दूर किनारे पर जलती है तो हवाएं बेचैन हो जाती है...........पर एक उन्माद में डूबा यह पन्द्रह साल का संतोष शर्मा गुनगुनाता है "चंद्रचूड एक राजा जिसकी विपदा हरी, ओम  सत्यनारायण स्वामी.............."