Sunday, December 23, 2012

प्रतिछाया - बहादुर पटेल





 आदिवासी जीवन में भी अब लडकियां जो एक "असेट" हुआ करती थी अब वहाँ भी हमारी सभ्यता ने घुसपैठ कर ली है. जन्म लेती एक लडकी अपने होने से पहले ही चिंतित है. जल-जंगल-जमीन को लेकर जो उसके होने के अर्थ बयाँ करते थे और उसकी अस्मिता वही से आती थी पर उसकी जिजीविषा को सलाम कि वो बचाना चाहती हूँ अपने को ,जंगल जमीन को, जीने की हर कोशिश को.

Bahadur Patel की एक नायाब कविता, इस बार बहादुर अपने परम्परागत तेवरों को छोड़कर एक नए मिजाज़ और अंदाज़ में एक गहरी चिंता उस बड़े समुदाय से जो महानगरों में नहीं रहता और इनके लिए किसी दिल्ली या देवास में कोई प्रदर्शन नहीं होते. आदिम संस्कृति का कोई "सभ्य कवि" नहीं लिखता इनकी आवाजें, किसी साहित्य पुरस्कार में दर्ज नहीं है ये दस्तावेज और किसी सजिल्द पुस्तक में नहीं चीन्हीं गई गई है ये करुणा की आप्त गूँज और कोई कथ्य या गल्प नहीं बुना गया है इस बात को लेकर कि......

"हक की शाखें लगातार छांगी जा रही थी
माँ का भय नदी पर बनाये जा रहे बांध की तरह सख्त
होता जा रहा था
डूब में जीने का भरोसा डूबता जा रहा था"



          प्रतिछाया 

छः बेटियों के बाद जब मेरा जन्म हुआ
माँ की एक उम्मीद पर फिर से पानी फिरा
एक जन्म जैसे मरण हुआ
उसकी कराह में मेरे लड़की होने का दर्द ज्यादा था
धरती जैसे फट गयी थी
जिसमे समा जाना चाहती थी वह मेरे साथ

जन्म देने के बाद
मेरी मरियल देह से नाउम्मीद से भरी

इतनी लड़कियों को पालना
उनकी शादी करना
कैसे हो पायेगा चार बीघा जमीन में
नदी और जंगल के भरोसे
अब बच्चे जनना कठिन हैं
क्योंकि जंगल से बेदखल करने की सरकार
की पूरी तैयारी थी

हक की शाखें लगातार छांगी जा रही थी
माँ का भय नदी पर बनाये जा रहे बांध की तरह सख्त
होता जा रहा था
डूब में जीने का भरोसा डूबता जा रहा था
इतना बड़ा कुनबा कहाँ जायेगा
धरती का कौन सा हिस्सा थामेगा इसे
कोर्ट कचहरी के झमेले में उलझी थी
वह चार बीघा जमीन भी
ठीक उसी समय मेरा जन्मना
सबके लिए किसी सदमे से कम नहीं था

एक आदिवासी परिवार में कैसा दखल था
बाहरी दुनिया का
हमारी दुनिया पर अतिक्रमण की कोशिश से हतप्रभ थे हम
यहाँ कटेंगे तो कहाँ जुड़ेंगे
हमारे सारे देवता बेबस थे

माँ ने सोचा क्या जियूंगी में
आज नहीं तो कल मर ही जाउंगी
वह मुझे फ़ेंक आई थी घुडे पर
मुझमे रोने की ताक़त भी नहीं थी
लड़की होने का श्राप जो था
घुडा भी क्या झेलता मुझे
धरती तो हमारी थी ही नहीं

पर मुझे तो जीना था न इसी दुनिया में
मेरी माँ की भी माँ
याने मेरी नानी
जैसे किसी किस्से में होती है
वही आई थी मुझे बचाने
चुपचाप उठा लाई घुडे से
मेरी मरियल देह पर मालिश कर करके बचाया मुझे
श्राप मुक्ति तो नहीं पर नानी की बदौलत
दाखिल हुई मैं इस दुनिया में

मेरे बाद भाई का जन्म हुआ
सारे संघर्षों के बीच देख समझ रही थी मैं इस दुनिया को
अपनी जगह की तलाश की मैंने
बाधाओं की दीवारे लांघकर
अपने हक को छीना मैंने
फिर भी जीवन के ऐसे समुद्र में हूँ जहाँ
कई मगरमच्छों से घिरी पाती हूँ अपने आपको

मेरे जैसी कई लड़कियों ने
दम तोड़ दिया होगा घुडे पर
मैं अपनी नानी की प्रतिछाया देखती हूँ अपने में
बचाना चाहती हूँ अपने को
जंगल जमीन को
जीने की हर कोशिश को .


1 comment:

Anonymous said...

धन्यवाद संदीप भाई .
यह तीनों छायाचित्र चित्रकार श्री महावीर वर्मा के सौजन्य से प्राप्त हुए जिनसे कविता प्रभावशाली हुई.
उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद.