Sunday, December 9, 2012

अचानक मुझमे असंभव के लिए प्राप्ति जागी

रेल  से गुजरते हुए सुबह की नर्म धूप और वो भी जाड़े की, पहाड़ों पर धूप की आभा मानो उन रूखी- सूखी पहाड़ी चोटियों को सुनहरा बना रही थी, धूप के कतरें मानो किसी ने उन पर चून-चून कर बिछा दिए हो और कही से उग आये छोटे-मोटे पेड़ हरेपन को दिखलाते हुए इठला रहे हो. यह रेल धीमे-धीमे रेंगती जा रही है और एक शहर जिसका नाम अजमेर है- जो ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का शहर है, जहां से कोई कभी खाली हाथ नहीं गया, जिन्होंने हरेक की झोली भरी है,  गुजर रहा है. जब भी किसी परिचित या अपरिचित शहर से यूँ गुजरता हूँ तो आसमान देखने की जिद के साथ मै दूर फैलते जा रहे शहर के विस्तार को भी देखता हूँ, और खोजने की कोशिश करता हूँ कि क्या कही उस भीड़ में इंसान अभी बाकी है, क्या इंसानियत बाकी है, क्या रिश्तों की मिठास और संवेदनाएं बाकी है........ऐसे ही इस समय महसूस कर रहा था जब एक बेहद सर्द रात के बाद  ठन्डे हो चुके लोहे पर रेल के पहिये गुजर रहे थे. आवाजों के शोर में, भयानक कोलाहल में इन पहाड़ियों को देखना सुखद लग रहा था- जब सूरज बस उगा ही था और अपनी पहली रश्मि किरणे इन पहाडियों पर छिटक कर गर्म होता जा रहा था.......बेजान सी पडी पहाडियों पर जीवन जैसे नए अर्थ लेने लगा था और कही दूर से पक्षियों का एक रेला इस सुनहरी धूप को चीरता हुआ निकल गया. ये पहाडियां बेजान तो थी पर जब इनकी प्रतिछाया सुनहरी हो रही थी तो लगा कि कितना सौंदर्य है, कितनी बेचैनी है, कितनी कशिश है, और कितना अपनापन है, खीचती है मानो चुम्बक लगा हो इनके तल में कही!!! काश कि एक पल ठहर जाती यह रेल और मै छू आता उस शिखर को जहां जाने को अब मन मचलने लगा है, उस पार से देखने को जहां सब कुछ एकाकार हो जाता है और सब कुछ शांत हो जाता है. ऐसी ही एक सर्द और गहरी शाम को अपूर्व मुझे बेंगलोर की नांदी हिल्स ले गया था ठीक वैसी ही शान्ति क्या कभी संभव है ? क्या वो पानी का कुण्ड अपनी गहराई में समा लेता मुझे जो नांदी हिल्स की ऊँची पहाड़ी पर बना था  ? पता नहीं, पर शायद इन्ही किन्ही पहाडियों में चारू भी एक दिन ऐसी गई कि फ़िर लौट के नहीं आई. जिंदगी भर वो मामोनी और किशनगढ़ के बीच काम करते हुए अपने अजमेर शहर के इन ऊँचे शिखरों को खोजने निकली थी अकेली और फ़िर गुम हो गई........और गुम तो अनिल बोर्दिया भी हो गये है शायद इन्ही पहाडियों की यह सुनहरी धूप उन्हें भी भा गई होगी और फ़िर यकायक सोचकर निकल गये होंगे कि चलो शिखर छू आये देख आये इस पार-उस पार का सत्य- रेल की कर्कश आवाजों के बीच मुझे करुण क्रंदन सुनाई दे रहा है, सुबह के सात बजने वाले है रेल के पहिये समानान्तर पटरियों पर चल रहे है और धूप कड़ी हो चली है और मै पूछता हूँ अपने आप से कि क्या मंजिल  कभी समानान्तर रास्तों पर चलते हुए मिली है किसी को....पर मै तो निकला हूँ इसी को पाने और फ़िर याद आते है कालिगुला जिन्होंने  कहा था "अचानक मुझमे असंभव के लिए प्राप्ति जागी और मुझे ये-वो कुछ नहीं चाहिए.......मुझे चाँद चाहिए".

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