Monday, October 30, 2017

मेरा स्कूल - संगत में न्याय के संस्कार

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मेरा स्कूल - संगत में न्याय के संस्कार
देवास रियासत दो हिस्सों में बंटी थी जूनियर और सीनियर। यह सीनियर देवास का न्याय मन्दिर है जहाँ न्याय मन्दिर यानी स्टेट के समय मे पवार वंश का कोर्ट हुआ करता था। आज इसे देखकर मन भावुक हो गया और उस समय के मित्र, सहपाठी, शिक्षक और सारा देवास तरोताज़ा हो गया। खारी बावड़ी और अखाड़ा रोड़ पर बसा मेरा यह स्कूल कितना मनोहारी था आज यह सोचकर ही मस्तक गर्व से उठ जाता था।
इसी के ठीक पीछे बड़ा सा मन्दिर है जिसमे पवार वंश के कुलदेवता है, और जहाँ हर जन्माष्टमी पर आठ दस दिन पहले से चौबीसों घंटे भजन होते थे / है और देवास महाराज भी आते थे। जन्माष्टमी के दिन दिंडी यात्रा पूरे शहर में निकलती थी परंपरागत वेशभूषा में।
ई एम फास्टर ने इसका जिक्र अपनी किताब "ए पैसेज टू इंडिया" में भी किया है।
यह सरकारी स्कूल था विशुद्ध हिंदी माध्यम का। यही मराठी प्राथमिक विद्यालय लगता था जहाँ से मैंने पाँचवी पास की और छठवीं में इसी न्याय मन्दिर में प्रवेश लिया। 
कभी सोचता हूँ कि ये विद्रोही तेवर, अन्याय के खिलाफ बोलने और कर्म के संस्कार कहाँ से पड़े तो अब समझ आता है कि बालमन और किशोरावस्था में इस न्याय मन्दिर की भीत पर लिखे निर्णयों और जमाने से दर्ज इतिहास की कहानियाँ कही अंकित और टंकित हो गई।

आज यह बिल्डिंग खस्ताहाल है अवशेष बचे है पर सच मे भवनों का और उसकी दीवारों पर लिखा इतिहास हमारे अवचेतन पर असर तो डालता ही है।
लगता ही नही कि यह देवास है और एक शहर जो मेरे अंदर हिचकोले लेता है , धड़कता है और सांस लेता है। इस शहर ने बहुत कुछ दिया है और यहाँ के हर बाशिंदे और ज़र्रे - ज़र्रे से मुझे प्यार हैं।
तस्वीर सौजन्य मित्र अरुण पड़ियार का है जो आठवी तक और बाद में नारायण विद्या मंदिर में ग्यारहवीं तक साथ पढ़ते थे। वे बेहद सक्रिय और प्रतिभावान छायाकार है।

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Wednesday, October 25, 2017

गिरिजा देवी - भारतीय संगीत की मनीषी का अवसान 24 अक्टूबर 2017


गिरिजा देवी - भारतीय संगीत की  मनीषी का अवसान 
24 अक्टूबर 2017 


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वे गाती हैं
आत्मा की अंगीठी परचाती
देह की बनती हुई राख के पायताने
सबके जीवट को तपाती
गाती हैं वे...…...


1
बनारस,
चारों-पट गायन के चौमुखी दीये का अंतिम दीवट भी आज तिरोहित हुआ...

पहला दीया : रसूलनबाई
दूसरा : बड़ी मोतीबाई
तीसरा : सिद्धेश्वरी देवी
चौथा दीया : गिरिजा देवी...
चारों की ज्योति मिलाओ तो
जगमग काशी..
चारों की आवाज़ से
पवित्र होती गंगा और मंगलागौरी...
2
एहिं ठइयाँ मोतिया हेराय गइली रामा
कहवां मैं ढूंढूं...

गिरिजा की मोतिया कहीं गुम नहीं हुई ,न ही उनके राम के फूलों के सेहरे की लड़ियाँ ही खुलकर बिखर सी गयीं हैं..
वो सब, ठीक से बचा कर सहेज गयीं अप्पा..
काशी का ख़ज़ाना कभी लुटता नहीं,
क्योंकि उसे कुबेर नहीं, सुर- देवियाँ सिरजती आयीं हैं...
3
आपकी डोलिया कौन उठा पायेगा अप्पा जी?
चारों कहाँर मिलकर उठाएं भी, तो भी ठुमरी, दादरा, कजरी और चैती को कौन उठा पायेगा?
किसमें सामर्थ्य कि मणिकर्णिका से कह सकें,
थोड़ा कम बहा कर ले जाना..
थोड़ा सा छोड़ देना हमारी गिरिजा मां को..
शायद अग्नि और जल मिलकर थोड़ा छोड़ दें
अपनी लीक पर ज्योति की मानिंद
ठुमरी के सनातन प्रवाह को....
4
रसूलनबाई और सिद्धेश्वरी देवी,
नैना देवी के द्वारा दूरदर्शन के लिए बनाए जा रहे एक कार्यक्रम में
बनारस की पूरब-अंग गायिकी पर आपस में 
आज से लगभग आधी सदी पहले बतिया रहीं थीं..
अचानक रसूलनबाई ने पूछा- 'हम दोनों के बाद आगे की पीढ़ी में क्या बचेगा?'
आश्वस्त सिद्धेश्वरी जी ने कहा -
'अपनी गिरिजा है ना !'....
5
गूँध-गूँध लाओ मालिनिया
फूलन के हार..

आपको कौन से फूलों का हार
पहनाना सुख से भर देगा?
पारिजात की तरह, सेनिया घराने की डाल पर उगे हुए पीलू ,
कौशिक- ध्वनि, पहाड़ी, खमाज और झिंझोटी
से बने हुए और कभी न कुम्हलाने वाले
सुर-वैजयंती के हार....

6
उन्होंने सहज ही भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
की 'दिलजानी 'को अपनी चपल, हीरे की कनी सी आवाज़ से रिझाकर
'राधारानी 'बना डाला..
फ़िर क्या था!
कुछ बहुत सुन्दर और शालीन हुआ इस तरह...
कहनवा मानो ओ राधारानी !
निशि अंधियारी कारी बिजुरी चमकत
रूम-झूम बरसत पानी
तुम्हीं अकेले बिदेस जवैया
हरिचन्द सैलानी....
गिरिजा देवी को जैसे भारतेन्दु में जयदेव मिल गए...

7
तक-तक बाट निहारूँ सजना
आवन कहि गए क्यूँ नहिं आए
छाँड़ि गए मोरी सुधि बिसराई
तक-तक बाट निहारूँ....

उस्ताद अमजद अली खां के साथ
सरोद की लय पर तीनों सप्तकों में घूमने वाली
गिरिजा देवी ने ये दादरा जैसे विरह की सबसे गहरी
दशा में जाकर सम्भव किया था...
ऐसे अनेकों दादरे अप्पा जी के कंठहार रहे हैं..
राग सिंधु भैरवी का यह सलोना रंग
दरअसल अब उनकी बाट जोहने का
शाश्वत गीत बन गया है...
अप्पा की शिष्याओं को इस दादरे का मर्म
शायद अब कुछ अधिक दुख दे जाए। पीड़ा में
भी गिरिजा देवी की तालीम बेजोड़ कुछ रचकर प्रतीक्षा
को और भी मानवीय बनाएगी..
यतीन्द्र मिश्र 

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Tuesday, October 24, 2017

इस सरकार को संविधानिक संस्थाओं को नष्ट करने को याद रखा जाएगा.


इस सरकार को संविधानिक संस्थाओं को नष्ट करने को याद रखा जाएगा.
-संदीप नाईक-


इस सरकार को संविधानिक संस्थाओं को नष्ट करने को याद रखा जाएगा.
-संदीप नाईक-
टी एन शेषन का नाम किसने नहीं सुना होगा मेरा ख्याल है नब्बे के दशक के बाद थोड़े जागरुक नागरिको को इनका नाम याद होगा क्योकि 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 तक वे भारत निर्वाचन आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त रहें और शायद उन्ही का कार्यकाल था जब हम जैसे लोग प्रौढ़ होकर थोड़ा थोड़ा चुनाव समझ रहे थे और राजनीति के खेल भी, बाजारीकरण और खुलेपन का दौर था, सरकार के सामने देश कि अर्थव्यवस्था के लेकर बड़ी चुनौतियां थी और राजनैतिक दलों के क्रिया कलापों पर एक लगाम कसने की भी शिद्दत से जरुरत महसूस की जा रही थी. टी एन शेषन की नियुक्ति से चुनाव सुधारों को जहां एक मंजिल मिली वही आम लोगों तक चुनाव आयोग क्या होता है और इसकी ताकत क्या होती है इस बात की पुख्ता जानकारी भी मिली. चुनाव में कसावट लाने के उनके सारे प्रयास बहुत ही सार्थक साबित हुए और राजनैतिक दलों को एक तरह का भय भी चुनावों से लगाने लगा. कालान्तर में चुनाव आयोग एक संविधानिक बॉडी है यह बात जनमानस के दिलों दिमाग में समां गई और राजनैतिक दलों पर एक अंकुश लगा जो भारतीय गणतंत्र के लिए एक वरदान साबित हुआ.
यह दुखद है कि भारतीय लोकतंत्र में पिछले कुछ वर्षों से संवैधानिक संस्थाओं के साथ सत्ताएं और सरकार अपनी मनमर्जी के हिसाब से छेड़छाड़ कर रही हैं विभिन्न प्रकार के आयोग रिजर्व बैंक सीबीआई का प्रयोग या तो अपने राजनीतिक दुश्मनों को ठिकाने लगाने के लिए किया जाता है या उन्हें निपटाने के लिए जिस तरह का माहौल धीरे-धीरे बन गया है वह बेहद खतरनाक है खास करके भारत के संघीय ढांचे में ऐसा होना और मात्र 5 साल के अस्थाई सरकारों द्वारा इन संवैधानिक संस्थाओं के साथ छेड़छाड़ एक गंभीर अपराध ही नहीं बल्कि गलत परंपरा भी है
वर्तमान सरकार ने गुजरात चुनाव के बहाने चुनाव आयोग जैसी संस्था को कुल मिलाकर चुनाव विभाग बना दिया है जो संविधानिक ना होकर शासन के अंतर्गत और शासन के दिशा-निर्देशों पर काम करने लगा है, अपने हर निर्णय के लिए केबिनेट पर निर्भर हो गया है. चुनाव आयोग एक सरकारी विभाग है और मोदी इसके स्वतंत्र प्रबाहर वाले राज्य मंत्री जो हर तरह के निर्णय अपने हित में लेते है. मौजूदा चुनाव आयोग के प्रमुख को जब नरेंद्र मोदी गुजरात से दिल्ली लाए थे तभी यह मंशा समझ में आई थी कि किस तरह से वह इस व्यक्ति का उपयोग अपने निजी हित और पार्टी के फैलाव में करेंगे.  यदि आप चुनाव आयोग के ढांचे को देखें तो पाएंगे कि वहां 3 चुनाव आयुक्त होते हैं जिनमें एक प्रमुख होता है, यह ढांचा इसलिए बनाया गया था कि यदि कोई एक व्यक्ति निरंकुश होकर तानाशाही पूर्वक निर्णय लें तो बाकी दो लोग उसके निर्णय को पलटकर सही निर्णय को लागू करवा सकते हैं परंतु जीते जिस तरह से ज्योति के साथ में ओपी रावत और तीसरे आयुक्त निर्णय ले रहे हैं - वह दर्शाता है कि यह सब मिलीभगत है और और एक पार्टी विशेष व्यक्ति विशेष और धर्म विशेष को चुनाव आयोग साफ-साफ मदद कर रहा है. यह निहायत ही घटियापन और साफगोई वाला मामला नहीं है. गुजरात में चुनाव की घोषणा को करवाने के लिए तारीखों को लगातार टाला जा रहा है.  यह दर्शाता है कि चुनाव आयोग के निहितार्थ क्या है और ये किस तरह से खुलकर मोदी सरकार को समर्थन दे रहा है और डरकर या समर्थन कर एक गलत आदर्श स्थापित कर रहा है। चुनाव की घोषणा के बाद भी राहत कार्य किये जा सकते है यह कोई नई बात नही है, कश्मीर जैसे राज्य में जहां हमेशा ही चुनाव करवाना रिस्क होता है वहाँ भी चुनाव समय पर होते है, छत्तीसगढ़ में हमेशा ही नक्सल का ख़तरा बना रहता है फिर भी चुनाव होते है फिर गुजरात को क्या दिक्कत है.
एक संविधानिक आयोग का सरकारी विभाग में इस तरह से बदल जाना कि सरे राह चलता आदमी तंज कसने लगें और गरिमा, मूल्यों और प्रतिष्ठा पर सवाल उठाने लगे यह  कितना शर्मनाक भी है। जिस आयोग का काम समय पर चुनाव करवाने का है वह लापरवाह होकर व्यक्ति विशेष की कठपुतली बन गया है यह घातक ही नही बल्कि भयानक है क्योंकि इससे संविधान के 73 और 74 वें संशोधन अधिनियम के क्रियान्वयन में दिक्कतें होंगी। यदि पूरे देश की स्थानीय शासन की इकाईयों के समयबद्ध चुनाव होने की बात की जाए तो शायद मप्र ही सम्भवतः ऐसा बिरला राज्य मिलेगा जहां पंचायतों, नगर निकायों और सहकारी संस्थाओं के चुनाव, विधानसभा, लोकसभा के उप चुनाव समय पर लगातार हो रहे है। पर यदि हमारा राष्ट्रीय चुनाव आयोग सत्तासीन पार्टी के दबाव और व्यक्ति विशेष की चाटुकारिता करते हुए या मोदी की घोषणाओं का इंतज़ार करते चुनाव की घोषणा करने में टालमटोल करेगा तो बाकी प्रदेश के चुनाव आयोगों में काम करने वाक्यों पर स्थानीय सत्ता चला रहे नेता, लठैत कितना दबाव बनाएंगे इसकी कल्पना ही भयावह है। चुनाव आयोग सरकार की एक बांह हो गई है जो कि बहुत ही खतरनाक है और यह आने वाले समय में दर्ज किया जाएगा कि चुनाव आयोग जैसे बड़े महत्त्व के संस्थान को नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने एकदम नीचे लाकर रख दिया है और यह बाकी सब जगह के लिए एक नजीर बनेगा, एक ठोस नकारात्मक उदाहरण. दूसरा सरकार तो और दो साल बाद खत्म हो जायेगी पर जो पारदर्शिता, संविधानिक मूल्य और गरिमा थी वह खत्म अगर हो गई तो उसे पुनर्स्थापित करने में कितना समय लगेगा.....?
इस सरकार को इस बात का श्रेय दिया जाएगा कि नोट बंदी से लेकर जी एस टी और तमाम तरह के बदलावों से जनता को हैरास करने के साथ साथ सी बी आई , रिजर्व बैंक, चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को भी भ्रष्ट किया है और इसकी सजा जरुर मिलेगी.
मुख्य चुनाव आयोग अधिकारी जोती झूठ बोल रहे है और तमाम नियम कायदों को छोड़कर , संविधानिक पद पर बैठकर संविधान का अपमान कर रहे है।मात्र आठ जिलों के कुछ ब्लॉक्स में बाढ़ का बहाना करके चुनाव की तारीखें टालते रहे और नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार को पर्याप्त समय और अवसर दिए कि वे मतदाताओं को रिझाने के लिए घोषणा करते रहें। यह मैं प्रधानमंत्री की बात नही कर रहा, व्यक्ति नरेंद्र मोदी की बात कर रहा हूँ जो गुजरात मे अपनी असफलता की संभावना देखते हुए गुजरात से ही जोती जैसे अयोग्य और कमजोर अधिकारी को दिल्ली में चुनाव आयोग में लाएं और संवैधानिक पद पर बैठाया
इस व्यक्ति ने चुनाव आयोग को चुनाव विभाग बना दिया और व्यक्ति विशेष के इशारों पर काम कर रहे है। ऐसा कोई नियम नही है कि चुनाव घोषित होने के बाद राहत कार्य रोके जाएं आपदाएं प्राकृतिक और मानव निर्मित हमेशा बनी रहती है - कश्मीर, छग या उत्तर पूर्व के राज्यों में बारहों मास यह समस्या बनी रहती है पर चुनाव हमेशा होते रहे है। जोती ने बाढ़ की आड़ में पार्टी विशेष को मौका दिया , मैं ये भी तर्क मान लेता अगर कल रात तक अरुण जेटली घोषणाओं का पिटारा नही खोलते या जी एस टी की दरों में बदलाव या रिटर्न भरने की छूट नही देते तो पर कल तक जिस तरह की घोषणाएं गुजरात के व्यापारी वर्ग के लिए की या बैंकों को धन उपलब्ध करवाया है वह संदेह के घेरे में है।
जोती ने बहुत गलत परम्परा स्थापित की है गुजरात मे भाजपा की जीत में इस अधिकारी की मेहनत और देश के कानून , संविधान से खुले आम छेड़छाड़ को इतिहास में गलत उदाहरण की तरह याद रखा जाएगा और रिटायर्ड होने के बाद इसका कांग्रेस या अन्य दलों के राज्य में राज्यपाल बनना तय है और यह नजीब जंग की तरह उस राज्य के प्रशासन में भी दखलंदाजी करेगा।
इसके अतिरिक्त इसने भारतीय प्रशासनिक सेवा के उच्च स्तर को भी गिराकर युवा , तेज तर्रार अधिकारियों के सामने गलत नजीर पेश की है , मसूरी के प्रशिक्षण संस्थान के गलियारों में इसके कामों के चुटकुले और उदाहरण युगों युगों तक दिए जाते रहेंगे।
भारतीय संविधान के लिए 2019 तक का समय बेहद भयावह और खतरनाक है और नागरिकों को सतर्क रहने की जरूरत है।

संदीप नाईक,
स्वतंत्र टिप्पणीकार और सामाजिक कार्यकर्ता. 



Monday, October 23, 2017

प्यार ज़िंदा है तो सपने ज़िंदा है और इस पर सबका हक़ होना चाहिए - सीक्रेट सुपर स्टार


प्यार ज़िंदा है तो सपने ज़िंदा है और इस पर सबका हक़ होना चाहिए
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सपने देखने का हक़ सबको है और होना भी चाहिए क्योकि सपने देखना जीवन है और जीवन सबसे बड़ा होता है . यह बात बड़ी साधारण सी है परन्तु जब भावनाओं की चाशनी में लपेटकर बगावत के सुरों से सम्पूर्ण समाज को धता बताकर एक ऐसे चरित्र द्वारा कही जाती है जिसे हम स्त्री उपेक्षिता कहते है या जिसके लिए बेटी बचाओ और बेटी पढाओं के लम्बे चौड़े अभियान चढ़ाना पड़ते है तो यह बात बहुत गहराई से हमारे अंतस में धीरे धीरे समाती है और बरबस ही सिनेमा देखते हुए हम उस चरित्र, दृश्य और पुरे माहौल से एकाकार होने लगते है और अपने आसपास के परिवेश को सूंघते हुए यह शिद्दत से मानते है कि बात सही और प्रभावी ढंग से कही जा रही है.
दरअसल में आमिर खान एक प्रभावी अभिनेता, निर्देशक और सामाजिक सरोकार वाले व्यक्ति नहीं वर्ना एक चतुर सुलझे हुए राजनैतिक शख्स है जो समय, देश काल और परिस्थिति के अनुसार अपना रचा बुना हुआ बहुत माकूल मौकों पर परोसने में पारंगत है. गुजरात चुनाव के समय बगैर कोई रिस्क लिए या तीन तलाक का मुद्दा साफ़ बचाते हुए बेहद रूमानी अंदाज में कथानक बुनते है. स्त्री स्वातंत्र और खुलेपन की इस हवा में स्त्री विरोधी बात करना मुश्किल ही नही बल्कि बेहद पिछड़ेपन की भी निशानी है.
यह तब और भी मौजूं हो जाता है जब दुनिया की स्त्रियाँ #MeToo जैसे नारों के साथ अपने खिलाफ होने वाली हर तरह की हिंसा को बयान ही नही आकर रही बल्कि सामने आकर दास्ताँ भी बयाँ कर रही है, हालांकि फिल्म रिलीज़ होने के बाद यह मुहीम संभवतः शुरू हुई है पर आज जिस तरह से इसकी पहुँच और ताकत दुनिया भर में बढ़ी है और सोशल मीडिया पर इसकी हलचल से पुरुषवादी ताकतों और परम्परागत सोच वालों के दिलों दिमाग में खलबली मची है वहाँ “सीक्रेट स्टार” जैसी फ़िल्में भी एक तमाचा ही है खासकरके जिस समुदाय और संस्कृति , पुरुषप्रधान समाज के नजरिये से बनाई गई और अंत में एक अनपढ़ महिला पुरे तमाशे के साथ चोट करते हुए बगावत का रुख अपनाती है बगैर इसकी परवाह किये कि वह कल कहाँ रहेगी और कल क्या होगा मुम्बई जैसे शहर में रोज लोगों, प्रतिभाओं और भावनाओं को निगल लेता है. दो छोटे बच्चों जिनमे एक बेटी जो परिस्थिति वश या हिंसा को देखते सहते अपनी उम्र से पहले जवान और वयस्क हो गई और एक छोटा सा बेटा जो उम्र में तो छोटा है पर हिंसा के मायने प्यार के बारास्ते जरुर समझता है.
यह फिल्म किशोरवय में हमारे सम्पूर्ण पालन पोषण, शिक्षा की दरकार और मार्गदर्शन की ओर भी गंभीर इशारे करती है परन्तु इसके साथ ही एक अनपढ़ माँ का उन पढ़ी लिखी माताओं से बेहतर व्यवहार और परवरिश का भी उत्कृष्ट उदाहरण है जो तमाम प्रकार ही हिंसा को सहते हुए बच्चों के शौक, पढाई और उनके किशोरवय के प्यार को भी स्वीकृति देती है इतना ही नही बल्कि चिंतन के साथ कुल्फी खाने जाते समय कहती है “आज तेरे अब्बू अहमदाबाद गए है देर रात आयेंगे तो चिंतन के साथ घूम लें और शाम तक आना दस मिनिट में नही” यह उन लव जेहाद की मुहीम चलाने वालों पर एक बढ़िया तंज है जो मुस्लिम समाज को दायरों और सींखचों में देखते है या गलत दुष्प्रचार करते है. चिंतन का प्यार अप्रतिम है और हम सबके भीतर एक चिंतन होता है जो फिल्म देखते समय बाहर निकल आता है और बरबस ही रोने लगता है .
दरअसल में फिल्म बाकी सब सवालों के अलावा दीगर बातों का एक जखीरा है जो हमारे दकियानूसी समाज, सड़ीगली परम्पराएं और सोच को पोषित करते है. सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें लोग नामक बीमारी से आमिर बचा ले गए , जब परिवार मोहल्ला छोड़कर जा रहा है तब भी एक खामोश विदाई ही प्रतीकात्मक रूप से समाज के रूप में सामने आया है. स्कूल, बाजार, ट्यूशन और घर के बीच सिमटी फिल्म में जुम्मा जुमा दस बारह चरित्र है. एक दिन में बडौदा से मुंबई जाकर गाना रिकॉर्ड करके लौट आना थोड़ा अतिश्योक्ति है एक पंद्रह साला लड़की का पर बालीवुड का थोड़ा तडका लगाए बिना दर्शक भी नही मानता कि वह सौ रूपये देकर फिल्म देखने आया है.
अदभुत भावनाएं और सहज - सरल भाषा में लिखे संवाद, साधारण कपड़ो और साधारण माहौल में फिल्माई गई यह फिल्म इसलिए भी याद रखी जायेगी कि इसमें संगीत का जो पुट है वह इधर आई कई फिल्मों से श्रेष्ठ है और इसके लिए संगीत निर्देशक को बधाई देना होगी.
आमिर की अन्य फिल्मों की तरह यह फिल्म तारों – सितारों के बीच उन्होंने “ पी के” तो निश्चित ही नही बनाई है और इसके निहितार्थ समझने होंगे, उन्हें चौदह करोड़ के बदले तीन चार दिन में ही पर्याप्त लगान मिल गया है . एन चुनाव के पहले रिलीज होकर वे एक सन्देश भी देते है और एक साफ़ भूमिका से बचते भी है. जायरा वसीम में मै असीमित संभावनाएं देखता हूँ और उन्हें भारतीय फिल्म संसार में लम्बी रेस की घोड़ी मानता हूँ. (घोड़े का विपरीत घोड़ी ही होता है ना ) यह फिल्म देखी जाना चाहिए टेक्स फ्री होना चाहिए और लड़कियों को अनिवार्य रूप से दिखाई जाना चाहिए. जो लोग अपनी निजी कुंठाओं, अपराध बोध और अनुभवों के आधार पर इसकी निंदा कर रहे है उन पर सिर्फ दया की जा सकती है और कहा जा सकता है “गेट वेल सून”
मेरे हिसाब से फिल्म को पांच *****