Sunday, October 22, 2017

देवास विधान सभा चुनाव सन 2018


देवास विधान सभा चुनाव सन 2018 
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आगामी विधानसभा के लिए आज से देवास शहर के संभावित उम्मीदवार से एक सवाल रोज करूँगा। एक दो दिन प्रस्तावना, शहर का इतिहास, राजनीति के बरक्स विकास की झलक और कुछ संदर्भ ताकि सवालों को सिर्फ वर्तमान के वैश्वीकरण, आजीविका, बाजार और जाति प्रथा के चरम, धार्मिक आर्थिक सोशल इंजीनियरिंग और उद्दाम वेग से बढ़ते हिन्दू -मुस्लिम ध्रुवीकरण के रिफ्लेक्शन में सवालों को समझा जा सकें ।
यह दुर्भाग्य ही है कि मराठा शासकों की अड़ियल जिद और थोथे अहंकार से इस क्षेत्र का विकास रुका। ग्वालियर से शुरू होकर मालवा के धार तक मराठाओं ने शासन किया , अंग्रेजों के कुछ लोग पिछ लग्गू रहें वही कुछ स्थानीय वीर मराठाओं ने प्रजा मंडल जैसे जमीनी आंदोलनों को भी समर्थन दिया और अंग्रेजों को देश से भगाने में सहयोग दिया। पर जो विकास होना था इस पूरी पट्टी का वो हुआ नही क्योकि लोकतंत्र के बाद भी यहां जागीरी, सामंतवादी प्रवृत्तियां बहुत हावी रही फलस्वरूप जाति प्रथा, छुआछूत, और शोषण समाज के उच्च वर्ग ने जमकर किया और इसमें सब शामिल थे यहां तक कि दलितों में भी एक तरह की शोषण की हायरार्की थी।
देवास शहर दो हिस्सों में बंटा था सीनियर और जूनियर और इस हिसाब से यहां दो राजा थे। जमींदारी का विलीनिकरण होने के बाद जूनियर महाराज परिवार धीरे धीरे अस्त होता गया और सीनियर महाराज परिवार राजनीति में सक्रिय होता रहा। तीस साल पहले तत्कालीन कृष्णाजीराव पंवार के सुयोग्य और शिक्षित पुत्र तुकोजीराव पंवार को देवास शहर के लोगों ने विधायकी सौंपी जो उनकी मृत्यु तक बनी रही और बाद में उनकी पत्नी को भाजपा ने टिकिट दिया और देवास के लोगों ने सहृदयता दिखाते हुए उन्हें ठीक ठाक वोट देकर जिताया।
देवास में सबसे लंबे समय तक विधायक रहने वाले स्व तुकोजीराव डेली कॉलेज इंदौर में पढ़े थे, सहज सज्जन और युवा होने के साथ वे मराठा संस्कृति के अनुसार शहर के महाराज के पद पर भी भव्य समारोह में आसीन किये गए थे और मरने तक उन्हें शहर के पुराने लोग, अस्सी साल के बुजुर्ग भी साष्टांग प्रणाम करते थे क्योंकि सामंती आदतें लोकतंत्र के बाद भी गई नही थी। अधिकांश परिवारों को मैं जानता हूँ ब्राह्मण, मराठा , राजपूत और वणिक जिन्हें तत्कालीन राज दरबार द्वारा जमीन जायदाद और गावों में लगान वसूल करने की जिम्मेदारी दी गई थी , कालांतर में इनमे से कइयों ने जमीन दबा ली और इन उपकारों के चलते वे पूरे अदब से पेश आते थे।
युवा विधायक के पास देवास के साथ साथ देश भर में अकूत संपत्ति जमीन थी इसलिए वे बेहद ईमानदार और नेक थे इस बात में कोई दो मत नही हो सकते। उनके द्वारा किये गए विकास कार्यों की झलक शहर में आज भी कही कही नजर आती है। पिछली सदी के आठवें दशक में पानी की त्राहिमान छबि के लिए देवास जाना जाता है। तत्कालीन विधायक और राज्य सरकार में केबिनेट मंत्री स्व चंद्रप्रभाष शेखर को इसी के चलते सीट हारनी पड़ी थी और भाजपा ने नर्मदा लाने का जुमला देकर चुनाव जीता था । तुकोजीराव ने शहर ने पहले दो तीन कार्यकाल में बहुत ध्यान दिया , उनके महल आम लोगों के लिए खुले थे पर बाद में मंत्री बनने के बाद उनका एप्रोच एडहॉक हो गया था। कुछ निजी कारण और कुछ पार्टीगत आपसी गुटबाजी , नगर निगम के पद और प्रशासन में दखल। उनके रहते शहर में मेरी याद में कोई बड़ा साम्प्रदायिक दंगा या विवाद दर्ज नही है। वे बेखौफ पठान कुआ, खारी बावड़ी या पोस्ती पूरे में किसी भी कार्यकर्ता की बाइक पर अकेले किसी के घर मे घुसकर समझा आते थे। देवास शहर में मुस्लिम उनकी इज्जत भी करते थे और डरते भी थे यह बात कहने में मुझे कोई गुरेज नही है।

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1971 में देवास में बैंक नोट प्रेस शुरू होने के बाद जनसंख्या का तेजी से विस्फोट हुआ क्योकि इस करेंसी प्रेस में देश भर के लोगों को यानी कौशल से परिपूर्ण लोगों को रोजगार दिया गया था. उस समय तात्कालिक जरुरत कौशल और दक्षता से परिपूर्ण लोगों की जरुरत थी. तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाशचन्द्र सेठी बाणगंगा से इलाज करवाकर इंदिरा गाँधी के मंत्री मंडल में गृहमंत्री बने तो उन्होंने मालवा को नोट प्रेस की सौगात दी. इंदौर में इतनी जगह नही थी और देवास नया जिला बने हुए दस साल ही हुए थे, देश की पहली महिला मुख्य सचिव निर्मला यादव अर्थात निर्मला बुच यहाँ पहली महिला कलेक्टर थी. खैर, बैंक नोट प्रेस बनने के बाद यहाँ उद्योगों का प्रादुर्भाव हुआ और बहुतायत में उद्योग धंधे खुले. टाटा से लेकर गाजरा गियर्स, किर्लोस्कर, आदि जैसे बड़े उद्योगों से लेकर छोटे मोटे कारखाने खुले और इनके साथ इन्हें मदद करने के लिए छोटी छोटी एंसीलरी भी बनी जिसमे लोगों ने बड़े कल कारखानों से बड़ा काम लेकर कई काम शुरू किये और कई स्थानीय लोगों को रोजगार दिए जो अकुशल और अप्रशिक्षित थे.
बाद में उद्योगों ने इस शहर को मप्र की औद्योगिक राजधानी बना दिया, सन 1971 से बढती हुई जनसंख्या में विस्फोट हुआ और नब्बे के दशक तक आते आते जनसंख्या स्थिर हुई और लगभग सामान्य रूप से बढ़ने लगी. क्या कारण था कि देवास जैसा उर्वर जिला, देश भर के साथ ट्रांसपोर्ट और अन्य सुविधाओं से जुड़ा जिला अचानक क्षीण होने लगा और यहाँ के उद्योग धंधे बाद होने लगे? कारण बहुत साफ़ थे पानी बिजली और सड़क, इसी के साथ पीथमपुर का उदभव हुआ और बहुत जल्दी ही पीथमपुर में बड़े कल कारखाने लगाने लगे हालांकि ये मूल दिक्कतें वहाँ भी थी पर कांग्रेस के डाकटर मन मोहन सिंह सरकार के खुलेपन की निति के कारण और पेटेंट, गेट समझौतें और सेज जैसे अधिनियमों के कारण वहाँ जमीन पर कब्जा करके उद्योग विकसित करने में ज्यादा दिक्कतें नहीं आई, घाटा बिल्लोद भी इसीके साथ विकसित हो रहा था. पर इस सबमे सबसे बड़ी दिक्कत थी कि स्थानीय लोगों की ना मजदूरी में भागीदारी थी ना प्रबंधन में. देवास में कांग्रेस विधायक, सांसदों ने ध्यान दिया ना ही भाजपा के विधायक सांसद ने. स्व बापूलाल मालवीय जी के बारे में तो चुटकुला था कि जब युवा एम ए करके उनके पास रोजगार माँगने गए तो उन्होंने कहा कि “ना बीए और करी लें उका बाद थारे नौकरी लगवाई दुआं” यह दुखद था और इस तरह से देवास शहर में दक्षिण भारतीयों से लेकर बंगाली और विविध प्रदेशों के लोगों ने प्रवेश कर यहाँ की दाल बाटी खाकर मालवी होने का सौभाग्य प्राप्त किया. अनेक ब्राह्मण जो नम्बूदरी थे या आयंगर यहाँ टाटा के कारखाने में चमड़े का काम करके घर आकर शाम को नहाते थे और लंबा सा टीका भाल पर लगाकर बाजार में सब्जी लेने आते थे. हिंदी भाषा की मिठास को भी दक्षिण की स्त्रियों ने सहजता से सीख लिया और वे सब्जी वालों, और छोटे वेंडर्स से मालवी में भी बात करने लगी.
इस सबका दुखद पहलू यह था कि धीरे धीरे काम धंधे बंद होते गए और मजदुर जो थे वे यही रह गए और बाद में शहर का विस्तार हुआ और छोटी छोटी कॉलोनियों में मकान कम किराने की दुकानें या साडी से लेकर बाकी सामान घर घर बिकने लगा क्योकि लोगों के रोजगार खत्म हो गए थे. पलंग लेकर गणपति से लेकर दुर्गा प्रतिमा बेचने वाले ज्यादा हो गए और शहर विकास कर रहा था. जाहिर है ऐसे में पीने के पानी की तकलीफ तो होना ही थी और इसी के नाम पर एक एनजीओ आया जिसने यहाँ बड़े काम किये और बाद में क्या किया इसकी कहानी बाद में, इसका एक सदस्य भारत सरकार में योजना आयोग का सदस्य भी बना, खैर.
देवास में एक भी तकनीकी महाविद्यालय नहीं बना था, ना ही मेडिकल कॉलेज बाकी सब तो छोड़ दो यहाँ का आई टी आई भी बेहद घटिया किस्म का था जब वो मल्हार पर लगा करता था. इस सबके लिए कौन जिम्मेदार है यहाँ का तत्कालीन बौना नेतृत्व जिसने सिर्फ और सिर्फ अपनी इमेज का ख्याल रखा और कुछ नहीं किया. पानी के लिए ट्रेन से पानी आया और बाद में इंदौर नगर निगम से डबल भाव में नर्मदा का पानी लिया जो आज तक बदस्तूर जारी है. इस शहर में आज शहर के लिए पानी भरने की एक टंकी भी नही है बाकी तो नगर निगम के जिम्मेदार लोगों की अक्ल पर क्या बात करना......

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