Wednesday, October 17, 2018

Post of 15 Oct 2018

मुद्दा यह नहीं है कि अकबर ने इस्तीफा दिया या नहीं दिया, मुद्दा यह भी नहीं है कि महिलाएं सही बोल रही है या गलत, मुद्दा यह भी नहीं है कि महिलाएं उस समय क्यों नहीं बोली और अब कि वे अब क्यों बोल रही हैं , मुद्दा यह भी नहीं है कि सक्षम पत्रकार 10 -15 सालों तक मुंह दबा कर क्यों बैठी रही , मुद्दा यह भी नहीं है कि "मीटू" का अर्थ व्यापक संदर्भ में क्या है और आने वाले समय में क्या होगा, मुद्दा यह भी नहीं है कि मोदी क्यों नहीं बोल रहे हैं - अकबर से पार्टी इस्तीफा क्यों नहीं ले रही और विपक्ष खामोश क्यों हैं
मुद्दा यह है कि पांच गरीब राज्यों में चुनाव है और समूचा विपक्ष चुप है , मुद्दा यह है कि पेट्रोल डीजल से लेकर सब्जियों के भाव बुरी तरह से बढ़े हुए हैं और कोई बोल नहीं रहा, मुद्दा यह है कि राफेल हमारी प्राथमिकता नहीं है और राफेल में अंबानी को फायदा मिलने से हमारा कोई भला बुरा होने वाला नहीं है - हमारा भला बुरा रोजमर्रा की छोटी मोटी चीजों में है जिसके बारे में निर्णय लेने से सरकार भी बदनाम होती है और लोगों का जीवन भी मुश्किल हो जाता है, मुद्दा यह है कि स्त्री पुरुष के मुद्दे समाज में हमेशा बने रहेंगे आप कब तक जीवन की बुनियादी चीजों को छोड़ कर इन पढ़ी लिखी सुसभ्य और सुसंस्कृत महिलाओं के और उच्च वर्गीय कुलीन पुरुषों के - जिनके लिए रोजी-रोटी कोई समस्या नहीं , उनके बारे में बकवास करते रहेंगे
हमारे समाज के स्त्री पुरुष, युवा बुजुर्ग विकलांग और बच्चे मानसिक रूप से इस समय भयानक प्रताड़ित है - उनके सामने कोई विकल्प सामने ही नहीं आ रहे और वह एक समय का भोजन पाने के लिए जिंदगी के सबसे मुश्किल दौर में संघर्ष कर रहे हैं, मुद्दा यह है कि उन्हें पटेल की चीनी प्रतिमा से कोई लेना देना नहीं है , उन्हें राफेल से कोई लेना देना नहीं है , उन्हें राहुल गांधी कहीं जाते हैं तो कोई लेना देना नहीं है - उन्हें रोजी-रोटी चाहिए - नौकरी चाहिए - काम चाहिए और खुली हवा चाहिए - जहां वे सांस ले सके, आपस में बात कर सके , अपने सुख दुख बांट सके , अपने परिजनों के साथ स्वस्थ सुखी एवं चिंता मुक्त रह सकें
मुद्दा यह है कि क्या भ्रष्ट कांग्रेस , उससे ज्यादा भ्रष्ट भाजपा, उससे ज्यादा बसपा, उससे ज्यादा सपा और सबसे ज्यादा वामपंथी लोग इस समय चुप क्यों हैं - जब दो लोग रोज एक नया मुद्दा बनाकर जनता में धकेल देते हैं और हम लोग मूर्खों की तरह से यहां बहस करते हैं - जिसका ना अंत है , न कोई ठौर ठिकाना और वे दो लोग आने वाली 70 पीढ़ियों का धन-धान्य इकठ्ठा कर अपना जीवन सुखी बना रहे हैं
क्या किसी में इतना नैतिक साहस बचा है कि इन सारे भटकाने वाले मुद्दों से अलग हटकर जीवन की बात करें और यदि नहीं तो इस समाज में अकबर हमेशा बने रहेंगे, आलोक नाथ बने रहेंगे वे बड़बोली कुलीन महिलाएं बनी रहेंगी जो ऐशो आराम करती रही और जब सुविधाएं मिलना बंद हुई तो चिल्लाने लगी
इस समाज की मूल समस्याओं को नजरअंदाज करके जो लोग यहां वहां भटक रहे हैं और एक बड़े जन समुदाय को भटका रहे हैं - वे भी उतने ही दोषी हैं जितने वे दो लोग - जो कारपोरेट के इशारे पर इस देश की महाप्रजा को वैज्ञानिक चेतना से दूर रखकर पूंजीवाद और सामंतवाद के खतरनाक खेल में शामिल करके निशाना बना रहे हैं , राहुल गांधी से लेकर मेनका, ममता, मायावती , सुषमा, जया, हेमा, अखिलेश और सारे फर्जी कॉमरेड यह सब जानते हैं कि यह क्या कर रहे हैं परंतु यह सब भी गले गले तक डूबे हुए हैं इसलिए चुप है और समय इनका इतिहास दर्ज कर रहा है

यूँ बिसूरने को बैठें तो सात जनम कम है - प्रकाश कान्त की स्व नीम जी पर किताब Post of 17 Oct 2018

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यूँ बिसूरने को बैठें तो सात जनम कम है 
द्वार द्वार पर दूत , मसनदों पर लेटे यम है
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स्व नईम यूँ तो बुंदेलखंड के रहने वाले थे परंतु मालवा में आकर बस गए , कालांतर में उनका ससुराल भी शाजापुर रहा और वे देवास के होकर रह गए

डा प्रकाश कांत उनके सबसे सुयोग्य शिष्य रहे हैं जिन्हें उनका पितृवत सानिध्य मिला और उनकी देखरेख में वे लेखक बने अगर यह कहे तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, नईम जी की मृत्यु के पश्चात सबसे ज्यादा विचलित होने वाले व्यक्ति ने उनको लेकर 144 पेज की एक किताब लिखी है "एक शहर देवास, कवि नईम और मैं " - यह सिर्फ किताब नहीं ,यह शहर का इतिहास नहीं, यह नईम की बायोग्राफी नहीं, यह नईम के कार्यों का मूल्यांकन नहीं, यह कविता का मूल्यांकन नहीं , यह सामयिक कविता यव नवगीत का परिदृश्य नहीं , यह गीत छंद की बहस नही - बल्कि एक जीवंत इतिहास है जो सेंधवा से लेकर दिल्ली तक फैला हुआ है जिसका केंद्र लंबे समय तक 7/6 राधागंज, देवास, मप्र रहा - जहां तमाम तरह की बहस, चर्चाएं , साहित्य और लोगों की जीवन शैली बनती बिगड़ती रही जो स्व नईम का घर था
यह किताब एक ऐसे शख्स ने लिखी है जो उनका शिष्य ही नहीं रहा बल्कि पुत्रवत रहा और उसने अपने जीवन में जो कुछ भी हासिल किया - उसे अंत में अपने गुरु को समर्पित कर दिया, इस किताब में गांव से कस्बा और कस्बे से शहर होते धड़कते देवास की कहानी है - जिसमें बारी बारी से पात्र आते हैं और अपना रोल अदा करके चले जाते हैं, यह पात्र जीवित है - मृत है - ललित कलाओं से लेकर साहित्य में अजर और अमर है - चाहे वह स्व प्रो विलास गुप्ते हो स्व शिवमंगल सिंह सुमन, अशोक वाजपेई, कुमार गन्धर्व हो, हिंदी के लेखक या फिर मौजूदा परिदृश्य में साहित्य की नाव चलाते खिवैय्ये
इस किताब में बहुत रोचक और विस्तृत ढंग से डा प्रकाश कांत ने एक व्यक्ति का चित्रण इस तरह से किया है कि वह लगता साधारण है - परंतु गहराई से पढ़ने और समझने पर यह यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि एक आदमी जो 1935 में जन्मा था - अपने जीवन काल में इतना बड़ा काम कर गया कि ना मात्र साहित्य , बल्कि लोगों को भी गढ़ गया - विविध कला अनुष्ठानों और शिक्षा के कार्य से जुड़ा वह शख़्स नईम ही हो सकता था - इसमें कोई शक नहीं
जिस अंदाज में प्रकाश कांत ने अपने संघर्ष के दिनों को , कड़ी मेहनत को और उसी नाव में सवारी करते मित्रों के साथ जीवन के संघर्ष को दर्शाया है - वह दिखाता है कि एक योग्य व्यक्ति के मार्गदर्शक होने पर कैसे हम ना मात्र मित्रता को श्रेष्ठ मानकर आगे बढ़ते हैं , बल्कि अपने जीवन में भी एक अलग तरह की अलग उपलब्धि हासिल करते हैं , उनके कन्फेशन यह दिखाते हैं किस तरह से संघर्ष से ही सब कुछ हासिल किया जा सकता है साथ ही यह भी कि पढना - लिखना इनमे से किसी ने छोड़ा नही और आज ये तीनों अपने अपने क्षेत्रों के माहिर और ख्यात लोग है जो दूसरों का मार्गदर्शन कर रहें है
स्व नईमजी पर लिखी किताब रोचक और पठनीय है अन्तिका प्रकाशन, गाज़ियाबाद से आई यह ₹185 की है, किताब हाल ही में छप कर आई है जिसे जरूर पढ़ा जाना चाहिए - ताकि एक किताब के माध्यम से संगीत, कला और साहित्य को ना सिर्फ समझा जा सके - बल्कि बारीक विश्लेषण भी करने में और समझ बनाने में मदद मिले
और अंत मे स्व नईम जी का एक गीत -
चिट्ठी, पत्री खतों किताबत के मौसम फिर कब आएंगे 
रब्बा जाने सही इबादत के मौसम फिर कब आयेंगें

और अंत में जौक 

लायी हयात आये, क़ज़ा ले चली, चले
अपनी ख़ुशी न आये, न अपनी ख़ुशी चले

हो उम्र-ए-ख़िज़्र भी तो हो मालूम वक़्त-ए-मर्ग
हम क्या रहे यहाँ अभी आए अभी चले

नाज़ाँ न हो ख़िरद पे जो होना है हो वही
दानिश तिरी न कुछ मिरी दानिश-वरी चले

- ज़ौक़






Sunday, October 14, 2018

गुरुग्राम के जज की पत्नी और बेटे की हत्या - Post of 13 Oct 2018


गुरुग्राम के जज की पत्नी और बेटे को गनमैन ने गोली मार दी - यह दर्शाता है कि वरिष्ठ अधिकारियों की सेवा चाकरी में लगे तृतीय श्रेणी के कर्मचारियों की कितनी बुरी स्थिति है, यह हद दर्जे तक शोषण भी करते हैं , निर्धारित समय से ज्यादा काम लेते हैं और जानवरों से बुरा बर्ताव करते हैं
मेरी जानकारी में मध्यप्रदेश के मालवा प्रांत के एक आदिवासी बहुल जिले में जिला मुख्यालय पर एक महिला जज एक प्रौढ़ महिला की (45- 48 वर्ष की है) जो अनुकंपा नियुक्ति पर लगी थी - कोर्ट से अपने घर यानी बंगले पर उसने ड्यूटी लगवा ली और उससे बेदर्दी से काम लेती है - घर के झाड़ू पोछे से लेकर दो बार का खाना बनाना, चाय पानी, आतिथ्य, कपड़े, बर्तन और सारे काम करवाती है - जो शोषण की सीमा से भी बाहर जाकर है . बर्ताव भी भयानक है इस जज का; वह प्रौढ़ एक मराठी ब्राह्मण परिवार की महिला है और बहुत मजबूरी में अपने दो बेटों को पालन पोषण और उनकी शिक्षा के लिए इस तरह का काम करने को मजबूर है, ये कहती हैं यदि मैं कोर्ट में काम करूं तो मेरे काम करने के लिए एक सीमा है, समय निश्चित है - परंतु जज साहिबा घर पर सुबह से बुला लेती है देर रात तक हर तरह का काम अकेली से करवाती है
यहां मराठी और ब्राह्मण का सन्दर्भ इसलिए है कि कैसे वह भी इस तंत्र में प्रताड़ित हो रही है, दलित, आदिवासी और अपढ़ लोगों का ये क्या हश्र करते होंगे यह सोचकर ही सिहर जाता हूँ मैं. मेरे एक मामा भी वर्ग चार में कार्यरत थे जो सेवानिवृत्ति के दिन तक कलेक्टर झाबुआ के बंगले पर तैनात रहें और उनका इतना शोषण हुआ कि बता नही सकता, वो लगभग सायकिक हो गए थे और बातचीत में कलेक्टर, उनके व्यवहार और बंगले की साफ सफाई के अलावा कुछ नही बोलते थे और हम सब लोग उपहास उड़ाते थे, आज समझ रहा हूँ कि कितना विक्षप्त कर दिया सारे नालायक कलेक्टरों ने उन्हें, आज सेवानिवृत्ति के दस वर्ष बाद भी वही सब बड़बड़ाते रहते है और भूल नही पाते
अपने सरकारी कार्यकाल में मैंने फौज के अफसरों से लेकर सीहोर, होशंगाबाद, भोपाल, हरदा, बैतूल, देवास, हरदोई, लखनऊ आदि के तत्कालीन कलेक्टरों यहां तक कि वरिष्ठ कमिश्नर और वामी माने जाने वाले सचिव और मुख्य सचिव तक के कथित सम्भ्रान्त प्रशासनिक अधिकारियों तक को भी इस तरह के नीच कामों में संलग्न देखा है
मुझे लगता है जिस दिन इस प्रौढा को भी बहुत गुस्सा आएगा इस महिला जज को वो गोली मार देगी या खाने में जहर मिला कर दे देगी - फिर समाज को उस महिला को गाली देने का कोई हक नहीं होगा, आज जैसे जज साहब की पत्नी और बेटे को जिस अंदाज में गनमैन ने मारा है और दिलेरी से फोन कर बताया है उसने - वह एक तरह का शोषण के खिलाफ लिया गया बदला है
यही हाल कलेक्टर से लेकर एसडीएम और छोटे बाबू के घरों पर तैनात या विभिन्न जनप्रतिनिधियों के घरों पर तैनात तृतीय - चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के हैं , ये अधिकारी और तथाकथित सभ्य लोग मानवीयता भूल कर हद दर्जे के शैतान हो जाते है और जिसका अंत इस तरह से होता है
मुझे तो लगता है कि अब जिस तरह से उग्रता बढ़ रही है और सामाजिक एवं मानवीय मूल्यों का ह्रास हुआ है उसमें इस सब पर आश्चर्य नही करना चाहिए

Wednesday, October 10, 2018

“मीटू के जमाने में आधी आबादी को संस्कृति के नाम पर सजा”




बचपन से हम सब सुनते आये है कि कोई भूत प्रेत होते हैं, चुड़ैल होती है और एक दुसरी दुनिया है जो हम मनुष्य की समझ से परे है और फिर भी उस दुनिया के बाशिंदे हमारे जीवन में बहुत महत्व रखते हैं, ये बाशिंदे सिर्फ महत्व ही नहीं रखते बल्कि कई मनुष्यों के जीवन को प्रभावित करते हैं. विज्ञान कहता है जन्म के बाद एक निश्चित समय बिता कर जीवन खत्म हो जाता है - अर्थात कोशिकाएं और शरीर के विभिन्न अंग अपना काम खत्म करके समाप्त हो जाते हैं और तत्पश्चात  विभिन्न धर्मों के अनुसार इस शरीर का अंत अलग - अलग रीति रिवाजों के अनुसार संपन्न किया जाता है - कहीं जलाया जाता है, कहीं पानी में बहाया जाता है, कहीं मिट्टी में गाड़ दिया जाता है, कहीं कुए में रख दिया जाता है और कहीं शेष बचे शरीर का यानी मिट्टी का उपयोग तांत्रिक और अघोरी अपनी साधना पूर्ण करने के लिए करते हैं. आजकल एक नई प्रवृत्ति ने जन्म लिया है जो अति आवश्यक है और बहुत जरूरी भी कि शरीर के अंत के बाद शरीर के बचे हुए अंगों का दान किया जाए ताकि जिसे आवश्यकता है उसे नया जीवन मिल सकें, उसकी उम्र बढ़ा दी जाए. कुछ लोग पूरा शरीर मेडिकल कॉलेज को दान दे देते हैं ताकि मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों को सीखने में समझने में मदद मिले.
बरहाल धर्म, विज्ञान और अध्यात्म का जन्म जन्मांतर का बैर है, नाता है और सह- संबंध भी हैं इसीलिए मनुष्य जन्म, पूर्व जन्म, अगला जन्म और दुसरी दुनिया के बाशिंदे भूत-प्रेतों की बातें भी अक्सर हमें यहां वहां सुनाई देती है. यह बातें सिर्फ विकसित या अशिक्षित समाज में नहीं - भारतीय पिछड़े देशों में नहीं बल्कि दुनिया के हर कोने में इस तरह के विश्वास, मान्यताएं,  बचपन से सुनता है हर मनुष्य और   कोई भूत पर होते हैं, चुड़ैल होती है. दुनिया में हर सभ्यता की शुरुआत से डर रहे हैं और मनुष्य कसी अनहोनी और डर की वजह से परम शक्तियों की पूजा करता रहा है. वह प्रकृति को कभी देवीय मानकर, कभी असुरी मानकर और कभी एक शक्तिमान कर पूजा करता रहा और समझने की कोशिश करता रहा कि आखिर जन्म क्या है, जन्म के पूर्व और जन्म के बाद क्या है, और इसे समझने में उसकी मेधा, शक्ति, धन दौलत भी कई बार उसने इस्तेमाल की है. इतिहास ऐसी कहानियों से भरा पड़ा है. 21 वीं सदी के मुहाने पर जब इस तरह की बातों को खारिज करने की बात हो रही थी - महाराष्ट्र में श्याम मानव ने अंधविश्वास के खिलाफ एक लंबा अभियान चलाया था, नरेंद्र दाभोलकर और पानसरे जैसे लोग इन अंधविश्वासी ताकतों और लोगों के पीछे हाथ धोकर पड़े थे कि यह सब खत्म करके एक वैज्ञानिक चेतना की बात हो तो - लगा था कि यह सब कभी खत्म होगा और 21वीं सदी की शुरुआत से ही हम एक नए युग में प्रवेश करेंगे, परंतु अफसोस ऐसा हो न सका. आज भी यह सारी ताकत है संविधान में निहित और वर्णित वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार हेतु दिए गए सिद्धांत के विरुद्ध जाकर समाज में अविश्वास फैलाने का कार्य बड़ी कुशलता से कर रही हैं.
भारतीय पंचांग में साल भर तक तीज त्यौहार और तिथियां आती जाती रहती है हर माह एकादशी, द्वादशी, प्रदोष, चतुर्थी, पूनम - अमावस्या आदि का जिक्र होता है, इनका धार्मिक महत्व है. ये त्यौहार और तिथियां अंध मानसिकता, परंपरागत रीती रिवाजों से जुड़ी हुई है और भारतीय जनमानस में इनकी इतनी पैठ है की इन्हें भारतीय जनजीवन से अलग करना प्राय: मुश्किल है. सबसे मजेदार यह है कि इन सभी त्यौहारों और तिथियों का पालन और पोषण करना भारतीय समाज की महिलाओं की मुख्य जिम्मेदारी है जो निर्जला व्रत रखकर भी निभाती हैं और अपने परिवार, पुत्र और पति के लिए अपने जीवन का लगभग एक चौथाई भाग उपवास करके विता देती है. इस सबके बावजूद भी इन्हीं महिलाओं को देवी शक्ति या परा भौतिक शक्तियां परेशान करती हैं और वे इलाज के लिए यहां वहां ले जाई जाती हैं. भारत में ही कम से कम दो हजार से ज्यादा ऐसे स्थान है जहां पर महिलाओं की  बाहरी बाधाओं को ठीक करने के ठिकाने हैं और इन्हीं ठिकानों पर पूरा पुरुष वर्ग एक सत्ता हथियाएँ हुए है - जो पूरी ताकत के साथ ‘महिलाओं को ठीक करता है’. सदियों से शोषित होती है स्त्री पुरी परंपरा का साक्षी है, भुक्तभोगी भी और पीड़ित  भी. दरअसल में भारतीय पुराणों से लेकर धर्म और संस्कृति में स्त्री को जहां एक और देवी दर्शाया गया है, संपत्ति माना गया है, वहीं दूसरी ओर वह पीड़िता भी है जिसका शोषण करने में समाज का आधा हिस्सा हमेशा मजे लेता है.
यह लड़ाई स्त्रियाँ अद्यतन समय से लड़ रही हैं बावजूद इसके कि वे इस लड़ाई में भागीदार होने के लिए अब ज्यादा सक्षम, शिक्षित और मजबूत है परन्तु ग्रामीण ख्सेत्र और हाशिये अपर धकेले गए समाजों में वह अभी भी दारुण स्थिति में है.  पुराणों में जितना महत्व देवियों को है - उतना किसी को नहीं भौगोलिक रूप से देखें तो सारी देवियां और उनके पीठें जमीन से ऊपर उठकर पहाड़ पर बसी  हुई है,  और सारे शक्तिशाली देवता जमीन के नीचे हैं, पर फिर भी समाज के रीती रिवाजों के चलते जो स्त्री है, जो असली देवी है वह प्रतिदिन प्रताड़ित की जा रही है चाहे वह धर्म के नाम पर हो, परंपरा के नाम पर हो या संस्कृति के नाम पर.
ऐसे ही एक त्यौहार में पिछले दिनों जाना हुआ जिसे भूतड़ी अमावस्या या सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के नाम से जाना जाता है. मालवा में नर्मदा नदी का बहुत महत्व है अमरकंटक से निकली और गुजरात की खाड़ी में जाकर समुद्र में मिल जाने वाली यह नदी जब मालवा जनपद से निकलती है तो पूरे इलाकों को हरा भरा करके समृद्ध करके जाती है. नदी किनारे बसे गांव और शहरों में इसकी संस्कृति, सभ्यता और परंपराएं देखने लायक हैं. जहां एक और नर्मदा की सैकड़ों कथाएं लोक में श्रुति के रूप में दर्ज है वहीं कुछ परंपराएं ऐसी हैं जो स्त्रियों के बिल्कुल खिलाफ हैं साल में एक बार आने वाली यह भूतड़ी अमावस्या अर्थात श्राद्ध पक्ष की समाप्ति पर होने वाला यह अवसर मालवा महत्वपूर्ण नदी और जीवनदायिनी माँ नर्मदा के किनारों पर विशेष महत्व का होता है - जहां बड़े-बड़े मेले ही नहीं लगते बल्कि देश प्रदेश से लोग आकर यहां नहान करते हैं और ऐसी मान्यता है कि नर्मदा में नहाने से सारे पापों से मुक्ति मिल जाती हैं और मोक्ष की प्राप्ति का रास्ता सुलभ हो जाता है
देवास जिले के अंतिम छोर पर बसा ग्राम नेमावर, हरदा जिले को देवास से जोड़ता है साथ ही इसके पास में सीहोर जिले की भी सीमा है. यह स्थान नर्मदा नदी के लिए जाना जाता है और नदी के किनारे यहां ऐतिहासिक प्राचीन मंदिर है. साथ ही साथ इन दिनों यहां जैन समुदाय के मंदिरों का निर्माण वृहद स्तर पर चल रहा है कहते हैं नर्मदा नदी में जैन संप्रदाय की 3 प्राचीन प्रतिमाएं मिली थी. उनकी स्थापना को लेकर देवास हरदा और सीहोर के जैन समुदाय में चर्चा हुई और उन्हें एक जगह स्थापित करने की बात तय हुई, परंतु कुछ लोग उससे सहमत नहीं थे अतः यह निर्णय लिया गया कि तीनों प्रतिमाओं को बैलगाड़ियों पर रखा जाए और जहां बैलगाड़ी सबसे पहले रुकेगी उस स्थान पर प्रतिमा को स्थापित किया जाएगा. संदलपुर के अजय जैन बताते है कि श्रुति है कि खुदाई के बाद जब बैलगाड़ी से मूर्तियों को रवाना किया गया तो पहली बैलगाड़ी नेमावर रुकी, दूसरी बैलगाड़ी खातेगांव और तीसरी बैलगाड़ी हरदा रुकी. मूर्तियाँ जैन धर्म के भगवान पार्श्वनाथ, भगवान मुनिसुब्रतनाथ और भगवान शांतिनाथ जी की थी. कालान्तर में जब नेमावर में आचार्य विद्यासागर जी आये तो उन्होंने देखा तो उन्होंने यहाँ मंदिर बनकार मूर्ति को पूर्ण सम्मान के साथ प्राण प्रतिष्ठा करने का निर्णय लिया और आज यह एक बड़े प्रकल्प के रूप में निर्मित हो रहा है. हिन्दुओं का  नेमावर में ऐतिहासिक सिद्धनाथ भगवान की मूर्ति है जिनका एक वृहद और पुरातात्विक महत्व का मंदिर बना हुआ है. इसके अलावा नर्मदा के दोनों घाटों पर असंख्य धर्मशालाएं, मंदिर, सुन्दर घाट बने हुए है और नदी की संस्कृति बहुत गहरे में स्थापित हैं. प्राकृतिक रूप से माँ नर्मदा के नेमावर में दर्शन करना एक सुखद अनुभव है. वर्षभर नेमावर में पूजा आयोजन चलते रहते हैं और लोग लगातार यहां आकर अपनी मनोकामनाएं मां नर्मदा से मांगते हैं और कहते है माँ नर्मदा किसी को खाली हाथ नहीं भेजती है.
नेमावर से लगभग सौ किलोमीटर की धुरी में पांच बड़े - बड़े घाट हैं - जो मां नर्मदा की ख्याति को दूर दूर तक फैलाते हैं. सलकनपुर के पास आंवली घाट, नसरुल्लागंज के पास नीलकंठ घाट, खातेगांव के पास छिपानेर घाट. नेमावर में कई घाट और बागली के पास पीपली घाट. प्रतिवर्ष भूतड़ी अमावस्या पर लोग पांचों घाट पर नहाते हैं और इसके लिए साल भर से तैयारियां की जाती है. सुबह उठकर या तो वे आंवली घाट से शुरू करते हैं या पीपली घाट से और रात बारह बजे तक पांचों घाट में नहाने का क्रम पूरा करते हैं, इस तरह से यह माना जाता है कि उनकी आत्मा मरने के बाद स्वर्ग की प्राप्त होगी और वे मनुष्य योनि से छुटकारा पा जाएंगे और मोक्ष मिलेगा.
मानने के लिए तो यह बहुत अच्छी परंपरा है परंतु इसी के साथ जुड़ा है लोगों के शरीर में देव आना. इस दिन हर घाट पर बड़ी तादाद में ऐसे लोगों का हुजूम आता है जो प्रेतबाधा से ग्रस्त होते है और ठीक इसके विपरीत ऐसे भी लोग यहाँ बहुतायत में आते है जो देव का रूप लिए इन प्रेत बाधा से ग्रस्त लोगों को ठीक करते है.  पडियार लोगों का एक बड़ा हुजूम इस दिन यहां होता है, पडियार अर्थात वो लोग जिनके शारीर में देव आते है और वे इलाज करते है. जिनके शरीर में बाहरी बाधा है वह परिवार और समाज में कुछ अलग तरह का व्यवहार करने लगते हैं. ऐसा कहते हैं कि उन पर बाहरी बाधा है भूत प्रेत या चुड़ैल की छाया है जो उन्हें जीवन जीने नहीं दे रही और अलग तरह से परेशान कर रही है इनकी वजह से पूरा परिवार और समाज भी त्रस्त रहता है. भूतड़ी अमावस्या इन्हें ठीक करने का सबसे मुफीद दिन होता है. इसमें कई प्रकार के अनुष्ठान होते हैं जो भूतड़ी अमावस्या के एक दिन पहले की रात को शुरू होते हैं. जिनको देवता आते हैं वह नर्मदा के पानी में आकर नीर लेते हैं अर्थात लाल रंग का चोला पहनकर पानी में खड़े होते हैं, वे इस चोले को धोकर पवित्र पहनते हैं, माँ नर्मदा की आरती करते हैं. उनके साथ जो लोग जाते हैं उन्हें रजालिया कहते हैं.
नेमावर में इस बार जो भूतड़ी अमावस्या गई, उसमें प्रशासन ने लगभग डेढ़ लाख की भीड़ को साधने के लिए कई प्रकार के इंतजाम किए थे हर घाट को पुलिस और तैराकों से तैयार रखा था सी सी टीवी कैमरों से सुसज्जित किया जाकर निगरानी रखी थी ताकि कोई डूबने न पाए. सिद्धनाथ मंदिर के सामने वाले घाट पर और हंडिया की तरफ से आने वाले घाट पर ऐसे परिवारों की भीड़ थी जिनके यहाँ बाहरी बाधाएं किसी सदस्य को परेशान आकर रही थी. पडियार और उनके रजालिये थे जो घाट पर ढोल, झांझ - मजीरे बजाकर लोगों को आकर्षित कर रहे थे पूरे घाटों पर छोटे-छोटे समूहों में बैठे पडियार फैले हुए थे. कहीं-कहीं तो तीन या चार पडियार भी थे और उनके अनुयाई अर्थात रजालिये बड़ी मात्रा में थे. हर समूह में लगभग अथ से दस पीड़ित थे सबसे दुखद यह था कि इन पीड़ितों में  नब्बे प्रतिशत मात्र स्त्रियां थी जो किसी बाहरी बाधा से परेशान थी.  इन पीड़ितों को उनके परिजनों ने पकड़ कर रखा था, कहीं-कहीं बांध कर रखा था और कहीं-कहीं उन्हें लिटा कर रखा था ताकि वे इधर उधर भाग न जाए. पडियार देवी की आरती उतारकर उन्हें ठीक करने का काम कर रहे थे.
यह लोग सीहोर, हरदा, देवास, शाजापुर, उज्जैन, भोपाल, होशंगाबाद, बैतूल और राजस्थान के बांसवाड़ा, डूंगरपुर, भीलवाड़ा, पाटन आदि जगहों से आए हुए थे. लगभग सभी लोग समाज के निम्न तबकों से थे दलित लोग थे और देखने से लगता था कि ये या तो अनपढ़ हैं या अशिक्षित. पूरे डेढ़ लाख लोगों की भीड़ में बहुत कम ही समाज के उच्च वर्ग से लोग होंगे जो इस मेले में आए होंगे और जो थे भी वे या तो व्यापारी थे या इस मेले को देखने समझने के लिए आए थे.  




बाधा उतारने से पहले पडियार पहले पीड़ित को सामने खड़ा करता है और उसे उसका नाम पता पूछता है यह देखा गया कि पीड़ित यानी वह महिला कुछ भी बोलने से मना कर देती है, साथ ही साथ थोड़ी - थोड़ी देर में वह उठकर भागने की कोशिश करती है तो साथ आए लोग उसे जकड़ कर रखते हैं और कुछ जगहों पर पुरुष उनके बाल भी खींच कर रखते हैं. जब महिला जवाब नहीं देती है तो पडियार और उसके रजालिए उस महिला पर चावल के दाने फेंकते हैं, उसके चेहरे पर सिंदूर और कुंकू बड़ी मात्रा में फेंका जाता है. आरती उतारी जाती है और जोर जोर से उसके सामने झांझ मजीरे बजाए जाते हैं ताकि वह महिला थोड़ी झूमने लगे. इसके बाद वह महिला की आंखें और चेहरे के भाव बदल जाते हैं, आंखें फट जाती है, बाल सारे अस्त-व्यस्त हो जाते हैं बहुत भयानक और विद्रूप चेहरा हो जाता है. वह मुंह से बड़बडाने लगती है और सबको लगता है कि उसके शरीर में भूत पिशाच आने लगा है. इस समय पडियार का असली खेल चालू होता है और वह उसे सवाल पूछता है कि वह कौन है, कहां से आया है, क्यों इस महिला को परेशान कर रहा है, क्या कर्जा बाकी रह गया था, क्या परिवार ने पाप किए हैं और उस महिला को छोड़ने का वह क्या लेगा.  महिला बहुत भौंडी आवाज में जवाब देने लगती है और कहती है कि वह पिछले जन्म का कोई रिश्तेदार है और उसे पितृ पक्ष में भोजन नहीं दिया गया या उसका श्राद्ध नहीं किया गया या उसे जमीन का हिस्सा नहीं दिया गया, उसे या उसके बच्चों को परिजनों ने प्रताड़ित किया है. एक दो महिलाओं पर आई बाहरी बाधा ने असमय हुई मृत्यु और अधूरी इच्छाओं का भी जिक्र किया,   इसलिए वह इस परिवार की बहू पर तब तक लगा या लगी रहेगी जब तक कि उसके साथ न्याय नहीं होता, मै शरीर को नहीं छोडूंगा और अपने साथ ही इसके प्राण ले कर जाऊंगा. ये सारे संवाद जोर जोर से चलते है और फिर पडियार भी खड़ा हो जाता है और हाथों में ढेर सारा सिंदूर या कुमकुम लेकर चावल लेकर पुन: उस महिला पर बार-बार फेंकने लगता है. आरती होने लगती है आसपास की भीड़ ताली बजाने लगती है और इस तरह से इस क्रम में शरीक सभी लोग बेहद रोमांचित होने लगते हैं.
महिला और परिवार के बीच में एक तरह का द्वंद्वात्मक युद्ध की स्थिति बन जाती है और पडियार पीड़ित महिला को नींबू और मिर्ची लगी तलवार दे देता है. प्रेत बाधा से ग्रस्त महिला उस तलवार को हाथ में लेकर बुरी तरह से चारों ओर घूमाने लगती है और भीड़ डरकर पीछे हटते जाती है. पडियार और उसके रजालिए भी डरते तो हैं परंतु पडियार हिम्मत दिखाते हुए आगे बढ़ता है और उसकी तलवार को पकड़ने की कोशिश करता है,  उसे बार-बार ललकारता है कि वह इस महिला को छोड़कर जाए. इसके बदले में जो भी पूजा सामग्री, धन-धान्य, या मन्नत होगी. घर के लोग उस महिला के बाल भी खींचकर रखते हैं जब वह जवाब नहीं देती है तो पडियार और उसके रजालिये उस महिला पर चावल के दाने फेंकते रहते हैं . इधर परिजन लगातार पडियार को कुछ न कुछ भेंट करते रहते हैं जमीन पर रखें जलते दिये, अनेक प्रकार की पूजन सामग्री लगातार उस प्रेत बाधा से ग्रस्त महिला पर फेंकी जाती है और प्रेत को भगाने के प्रयास किए जाते हैं.


तस्वीर में दिखाई गई यह महिला सीहोर जिले के कुसमानिया के पास की है जिसने पडियार से तलवार छीनकर बहुत देर तक आसपास घुमाई और अंत में अपनी जीभ पर लगा कर अपनी जीभ  बुरी तरह से घायल कर ली. जीभ घायल करने के पश्चात उसमें से इतना खून निकला कि लग रहा था कि जीभ टूट कर गिर पड़ेगी परंतु ऐसा नहीं हुआ, थोड़ी देर के बाद कई प्रकार के अनुष्ठान करने के पश्चात वह महिला थोड़ी सामान्य हुई और उसके परिजनों ने और भीड़ ने यह माना कि उसके ऊपर जो प्रेत का साया था वह चला गया. पडियार ने उस महिला को शांत कर बिठाया और फिर दो हरी मिर्च खाने को दी और वह बहुत सामान्य तरीके से खा गई जिससे ऐसा लगाही नही कि उसकी जीभ अभी पांच मिनट पहले बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गई थी और उसमें से खून बह रहा था.
विज्ञान का यह अजूबा शायद समझ से सचमुच परे है परंतु ठीक यहीं पर कई प्रकार के प्रश्न हैं जो शाश्वत है और उनका जवाब तलाशा जाना बहुत आवश्यक है. क्या सच में भूतड़ी अमावस्या जैसा त्योहार या प्रसंग हमें इस समय मनाने की जरूरत है. इस मेले में प्रशासन लाखों रुपया व्यवस्था बनाने के लिए खर्च कर देता है, क्या जनता की गाड़ी कमाई का इस तरह से दुरुपयोग ठीक है. लोगों के त्यौहार में क्या प्रशासन को हस्तक्षेप करना चाहिए - यद्यपि लोगों की आस्था और विश्वास पर चोट ना की जाए, फिर भी जान माल की सुरक्षा के लिए थोड़ा खर्च करके इस तरह के आयोजनों को धीरे धीरे हतोत्साहित करना चाहिए. इस पूरे प्रसंग में समाज का  दलित और हाशिये पर पड़ा हुआ वर्ग ही हिस्सेदारी क्यों करता है - इसका अर्थ यह है कि ज्यादा रूढ़िवाद और परंपरा बोध क्या सिर्फ दलितों में बचा है. श्राद्ध पक्ष में मालवा में संझा माता जैसे त्यौहार मनाये जाने की परंपरा है जिसे बेटियों की भलाई और अच्छे जीवन की कामना में मनाया जाता है,  वहीं क्या इस भूतड़ी अमावस्या पर सभी महिलाओं को जो प्राय: यहां आती है और उन पर बाहरी प्रेत बाधा है यह मानकर इस तरह से क्रूर एवं मानवीय तरीके से ठीक करना बेहतर है, महिलाओं पर जिस तरह के हथियार और डंडों का प्रयोग करके उन्हें मारा जाता है, पीटा जाता है और वाहियात सवाल, जिनमे निजी जीवन के गोपनीय पक्ष भी होते है - एक भीड़ के सामने पूछे जाते हैं - क्या वह वाजिब है? एक ओर जहां “मीटू” की बहस पूरे देश में इस समय चल रही है - उस प्रसंग में ग्रामीण क्षेत्र की इन महिलाओं को आवाज को और इस तरह से प्रताड़ित होने की सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं की जानी चाहिए ? वर्तमान में चुनाव आचार संहिता लगी हुई है तो इतनी बड़ी मात्रा में दर्शक बनी पुलिस और प्रशासन क्यों नहीं इन परिवारों के हथियारों को, डंडों को जप्त कर लेते हैं - क्योंकि यह सब तो इस समय में बिल्कुल ही वर्जित होते हैं,  फिर आखिर इस नेमावर क्षेत्र और आसपास के घाटों पर भूतड़ी अमावस्या के दिन लोगों के पास इतनी बड़ी संख्या में देशी हथियार जैसे तलवार, त्रिशूल, फरसा आदि कहां से आते है और अगर वह लेकर भी आए हैं तो क्या पुलिस का यह कर्तव्य नहीं बनता कि वह इन्हें जप्त कर ले ? बल्कि उल्टा हो रहा है कि पुलिस भी भीड़ के सामने मूकदर्शक बनी है और चुपचाप तमाशा देख रही है. मैंने कई पुलिस वालों को इन देवियों के सामने हाथ जोड़ते हुए देखा. मध्य रात्री को ठीक बारह बजे एकदम ठंडे पानी में सिर्फ एक साड़ी या चोले में महिला को उतार दिया जाता है और घंटी बजाकर आरती की जाती है – नीर लेने के नाम पर इसलिए कि उस पर प्रेत बाधा है, क्या यह महिला मनुष्य नहीं है, इस सब को देखने वाला कौन है ? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल कि प्रेत और बाहरी बाधाएं सिर्फ महिलाओं को ही क्यों परेशान करती हैं और पडियार सारे पुरुष क्यों हैं ?
समाज में महिलाओं की स्थिति दिन पर दिन दयनीय होती जा रही है. मध्यप्रदेश में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार सर्वाधिक अत्याचार होते हैं बलात्कार से लेकर छेड़छाड़ के सर्वाधिक मामले दर्ज हैं.  क्या इस तरह के उत्सव में भेदभाव बड़े आयोजन और संस्कृति परंपरा के नाम पर कूड़ा धोते हम लोग वास्तव में महिलाओं की इज्जत कर रहे हैं और ठीक इसके दूसरे दिन अपने घरों में मोहल्लों में लाखों रुपया खर्च करके घट स्थापना करते हैं और नौ दिन तक कन्या पूजन से लेकर महिलाओं की पूजा तक के चोंचले करते हैं - क्या यह दिखावा नहीं है. वस्तुतः महिलाओं को लेकर हम लोगों की समझ बहुत दोगली है और हम अभी भी तमाम कानूनी प्रावधानों के बाद भी एक पुरुष प्रधान समाज को संपोषित करने में लगे हुए हैं. नर्मदा के पांच घाटों की यह कहानी सिर्फ मध्यप्रदेश की नहीं - बल्कि देश की सभी नदियों – तालाबों पर इस तरह के कुछ न कुछ ऐसे आयोजन जरूर होते हैं जहां महिलाएं सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित होती है और एक भीड़ है जो ताली बजाकर उन्माद में इस तरह की संस्कृति को बढ़ावा देती है. यह समस्याएं सरकार या कानून से हल नहीं हो सकती, इसके लिए हमें व्यापक स्तर पर प्रयास करना होंगे ताकि हम इन औघड़ और अशिक्षित लोगों से अपनी आधी आबादी को बचा सकें.




Posts Between 5 to 9 Oct 2018


अनैतिक रूप और गैर कानूनी तरीकों से छोड़ी गई स्त्री भी #Metoo पर कुछ लिख सकती है क्या - जिसे कोई भरण पोषण भत्ता नही दिया जा रहा , यहां तक कि विधिवत कोई तथाकथित तलाक भी ना लें और दुनियाभर में ताड़ता रहें या ....
मेरे कई मित्र, रोल मॉडल्स इस पुण्य में शामिल है और तो और उन्हें इसकी परवाह नही है और वे लगातार इसमें सक्रियता से शामिल है
सवाल यह है कि क्या सिर्फ बड़ी रसूखदार महिलाएं, पत्रकार या फिल्मी हीरोइन्स बोलेंगी तो ही यह मुद्दा बनेगा या दबी कुचली और विशुद्ध गन्दी भाषा में कहूँ तो ( मुआफ़ कीजिये) "रखैल" / "स्टेपनी" जो खुद शोषित समुदाय - दलित, अल्पसंख्यक या आदिवासी या उच्च वर्ग से अपनी अकूत धन दौलत साथ लिए समर्पण भाव से आती है या विधवा - परित्यक्ता है, को यह कहने का हक नही या जो अभी भी पत्नी के होते सोते सब छोडछाडकर एन्जॉय कर रहें है दूसरी, तीसरी, चौथी और हर पल नया शिकार खोजती निगाह की शिकार के लिए भी उचित प्लेटफॉर्म है
पिछले 25 वर्षों से मीडिया में और 32 वर्षों से एनजीओ में यह खेल देख रहा हूँ, हालांकि इस खेल में महिलाएं भी बराबरी से शामिल है तमाम जोखिम लेकर एन्जॉय कर रही है
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देवास जिले के 3 बड़े और महत्वपूर्ण ब्लॉक बागली, कन्नौद और खातेगांव को देवास से जोड़ने वाली सड़क पर भगवान ना करें कोई यात्रा करें
निकम्मे और अकर्मण्य विधायकों, सांसद और पंचायत प्रतिनिधियों को शर्म भी नही आती कि कही जाकर मुंह जाकर छुपा लें
बागली ने तो प्रदेश को मुख्य मंत्री दिया है पर सिंगल रोड़ है वो भी ऐसा कि कोई प्रसूता बैठे तो मर जाये और स्वस्थ आदमी दचकों से मर ही जाएं, ये प्रतिनिधि "जय हिन्दू राष्ट्र" वाले फ्री इंडिया की बस में बैठ जाये तो मान लूँ कि इनकी अक्ल अभी बची है शेष, कोई बस वाले जानवरों को भी इतना नही भरते होंगे
भीड़ ज्यादा तो बसें क्यों नही चलाते है -सीधा जवाब है कि इनके धंधे बन्द हो जाएंगे और मिलीभगत खत्म
ट्रांसपोर्ट की हालत खराब, नेताओं की बस चल रही है और इनमें मुस्तैद बसों के गुंडे हरेक को इतना डराते है कि कोई कुछ नही बोलते, बागली और दोनों ब्लॉक के लोगों को इनके जन प्रतिनिधियों और प्रशासन के लोगों की पूजा करनी चाहिए जो इन बस वालें गुंडे मवालियों को भेड़ बकरी की तरह भरकर ले जाते है
हर थाने से लेकर आर टी ओ का कमीशन फिक्स है, कल परसो से यहां घूम रहा हूँ और ओवर लोडिंग की बात कर रहा हूँ तो बस वाले गुंडे मवाली कहते है जिससे बनें शिकायत कर लो, हमारा कोई कुछ नही कर सकता, पुलिस भी नपुंसक है जो एजेंट्स को आश्रय देकर हफ्ता वसूलती है
धिक्कार है ऐसे जनप्रतिनिधियों और प्रशासन पर जो जनता को जानवर समझकर ट्रीट करता है, देवास जिला और जिला मुख्यालय नेतृत्व विहीन नपुंसक जिला है जो सिर्फ कमीशन, रिश्वत और गुंडागर्दी पर जिंदा है ऊपर से लिजलिजा प्रशासन और कानून राज , जिला मुख्यालय का अब प्रतिनिधित्व बदलना ही चाहिए, 30 वर्षों से यह शहर ठहर गया है और सिर्फ जी हुजूरी और सामंती प्रवृतियां ज़िंदा है
विधानसभा चुनाव में ये रोज़मर्रा के मुद्दे लोगों को समझ आते है और अगर नही तो मरी हुई कौम से क्या उम्मीद करना और देवास का मीडिया जय जय और दबा कुचला है जो विज्ञापन के लालच में जमीर बेचकर अपनी नौकरी बचाता रहता है
नगर निगम देवास के अंधे लोग एक बार पंजाब नेशनल बैंक के सामने आ जाये या प्रशासन ठीक अपने सामने उस सड़क पर पैदल चल लें जो अस्पताल जाने की सड़क है तब सारी अक्ल ठिकाने आ जायेगी , शहर खोद दिया था ठेकेदार सेटिंग करके भाग गया , शहर खुदा पड़ा है सड़कें विधवा हो गई है - कमिश्नर से लेकर महापौर सब सेट है और मीडिया को चाटुकारिता से फुरसत नही
नही जी, हम कुछ नही बोलेंगें, हमें तो मंदिर वही बनाना है और शिवराज को जिताना है, अत्याचार सहेंगे पर वोट इन्ही निकम्मों और लालचियों को देंगे
जय हिन्दू राष्ट्र 
जय सामन्तवाद
धर्म की जय हो

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याद करो और सोचो भारत तेरे टुकड़े होंगे की सोच और क्रियान्वयन करना किसकी है
दो लोगों की छोटी सोच ने मात्र 4 साल में देश बर्बाद कर दिया, इन्होंने जेएनयू को बदनाम किया, युवाओं को उच्च शिक्षा से रोका और अब प्रांतों को लड़वा रहे है
ये है अखंड भारत और हिन्दू राष्ट्र का असली चेहरा जो मोदी और अमित शाह बनाना चाहते है - भाजपा या संघ नही , याद करिये भागवत पुराण और आप फिर से इन दो को बढ़ावा देंगे - तरस आता है आपकी अक्ल और गोबर खाद्य खाने की आदतों पर
रोज़गार नही दे सकें और लाठी डंडे गोली दे रहे हैं
जोर से बोलो
अबकी बार फिर सत्यानाशी सरकार
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1989 की मेरी प्रिय शिष्या, बिटिया और वर्तमान में खातेगांव के पास एक बड़े माध्यमिक विद्यालय में प्रधान अध्यापिका से कल 1992 के बाद मुलाकात हुई साथ में थे उनके पति परमेश्वर राजेन्द्र राजावत जो मेरे 1989 से मित्र है
प्रमिला बहुत ही होनहार और व्यवस्थित छात्रा थी और वही बात मैंने कल उसके घर मे देखी - सुंदर सजीला और इतना व्यवस्थित कि जब मैं ऊपर पहुँचा तो लगा ही नही कि मैं खातेगांव में आया हूँ - वैभव, सौंदर्य बोध, वस्तुओं का चयन और सबसे ज्यादा रख रखाव और सफाई
आतिथ्य सौजन्य तो खैर हमारे मालवे की बेटियां बखूबी निभाती ही है , कल जल्दी में था एक चाय पीकर लौट आया हूँ पर अब जल्दी ही दाल बाटी का जो लालच मिला है उसे निभाने आउंगा ☺️
बेटियां कब बड़ी, समझदार, गहन अनुभूति लिए जिम्मेदार गृहस्थन और संवेदनशील हो जाती है पता नही चलता
ख़ुश रहो और यूँही घर में छोटी होकर बड़ी बनकर जिम्मेदारी निभाती रहो, तीनो ख़ुश रहो और खूब यश कमाओ - बेटा, राजेन्द्र और तुम
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अच्छी बात यह है कि गुजरात, उप्र और बिहार में एक ही थाली के चट्टे बट्टे है
कोई कांग्रेसी , सपाई या बसपाई या तृणमयी होता तो पूरे देश का कबाड़ा कर देते ये लोग
शर्म आना चाहिए , वैसे ही उप्र बिहार के लोगों को देश भर में हिकारत की नजर से देखकर हल्का काम दिया जाता है, अब गुज्जु कर लें मेहनत मजदूरी के काम
यह एक बड़ी साजिश है उधर शिवसेना से लेकर देवेंद्र फडणवीस तक कह रहे है मुंबई माझ्या बापाची और मराठी अस्मिता के सवाल उठा रहे हैं
देश के संविधानिक पदों पर बैठे लोगों को शर्म आना चाहिए - कम से कम उन्हें संविधान तो पढ़ना ही चाहिए ताकि देश की समझ बन सकें, मतलब यह तो हद कर दी कमीनगी की - क्षेत्रीयता फैलाकर अब आम लोगों को भिड़वा रहें हो - कहां जाकर भुगतोगे

Saturday, October 6, 2018

6 Oct 2018 Post

शिवराज सिंह जी ने आज सिवनी में मेडिकल कॉलेज का भूमि पूजन किया
छिंदवाड़ा में भी खुल रहा है
जबलपुर में है ही
एकदम अपने पड़ोस के नागपुर में भी है ही

हमारे देवास के बींजाना, सिंगावदा में भी नही है - खोल दो , 10 - 15 छोरा छोरी तो दोनों गांव में मिल ही जायेंगें
मतलब हद यह कि 150 किमी के रेडियस में 4 मेडिकल कॉलेज - साला हायर सेकेंडरी स्कूल या नॉर्मल डिग्री कॉलेज नही है प्रदेश के कई हिस्सों में और ये गजब की बत्ती दे रहें है जनता को
सरकार - किसको बना रहे हो, जो है उनकी मान्यता तो रिन्यू नही हो रही, सरकारी मेडिकल कॉलेज सागर से लेकर ग्वालियर, इंदौर, रीवा, भोपाल के हाल भयावह है यह वहां की फेकल्टी से पूछो
निजी कॉलेज पर बस चल नही रहा - इंदौर , उज्जैन, देवास से लेकर भोपाल के पीपुल्स तक वालों पर - वे गुंडागर्दी कर बच्चों का शोषण कर रहे हैं, बच्चियां आत्महत्या कर रही हैं मनमानी फीस को लेकर
कर्जे में डूबा प्रदेश, और 15 साल के शिलान्यास बचे 4 दिन में निपटाओगे क्या हुजूर ए आला,
बजट देखा या हिसाब देखा प्रदेश का -अभी अक्टूबर है और ओव्हर ड्राफ्ट में भी डूब गए हो, मोदी और आपकी आर्थिक समझ एक जैसी है क्या - कहावत सुनी है "घर में नही दाने और अम्मा चली भुनाने"
क्यों आने वाले किसी जुगाड़ू को बैठने के पहले हार्ट अटैक की व्यवस्था करके जा रहे हो
और ये बताओ कि निजी मेडिकल कॉलेज से निकलकर आपके लाभार्थी उर्फ व्यापमं पुत्र किसकी सेवा कर रहें हैं - डॉक्टरों का तो टोटा पड़ा है , जो है वो नरक में काम कर रहें हैं और अब ऊपर से स्वास्थ्य बीमा की बाबूगिरी भी
गुरु - जनता को बरगलाओ मत , दो चार दिन में आचार संहिता लगने वाली है , अपनी धर्म पत्नी और बच्चों के साथ उस झील के किनारे बसे बंगले में तसल्ली से रहकर यादें संजो लो कि अब अच्छे दिन आने वाले हैं, भारत भवन में जाकर संगीत सुनो, नाटक देखो, आदिवासी कला निहारो, चित्र समझो , कविता सुनो, नृत्य देखो -भोत बड़े बड़े बल्लम वहां आते है - आप सबके मन को शांति मिलेगी - क्योकि अब यही खनिज, मेडिकल और नियुक्तियों के पांसे अब उल्टे पड़ेंगे - असली शकुनि मामा जो तुम्हारे ही घर - बार के है , चौसर खोलकर चाल चल दिये है और अब प्यादों के भरोसे कुछ होना नही है
पहले अपनी बुदनी और उससे पहले जेत गांव और ग्राम पंचायत बचाओ बाकी जो होना है होता रहेगा और अब एक रूपया खर्च करने के पहले सोच लेना

Friday, October 5, 2018

Posts of 4 Oct 2018


आज दोनो ठगों ने अपनी कमाई में से पांच रुपये दान कर दिए गरीब जनों को
तीसरे ने पूछा तो बोला तो मुस्कुराकर बोलें - अभी यही गरीब लोग उत्सव के बाद छककर सो जायेंगें , फिर हम जेब नही - पूरा गला काटेंगे और बहुत आसानी से मौत की नींद सुलाकर इनकी बची हुई संपत्ति भी लूट लेंगे
वे मुस्कुरा रहें थे और लोग पांच रुपये के दान का जश्न मनाने में बारह रुपया खर्च कर रहे थे, भीड़ में उन्माद बढाने की दवा निशुल्क बांटी जा रही थी जिसे लोगों की भाषा मे परसादी कहते है
इति
***

सदियों से इंतज़ार है और दिशाएं भ्रमित है
धूप और छाँह के बीच उम्र के धागे उलझ गए
अब मुंह टेढ़ा कर एकाकी हो गया हूँ ऐसे कि
सूझता नही कुछ सब कुछ खत्म हो गया यूँही

***
जो मोदी और जेटली कह नही पा रहें है
***

सभी देशवासियों को सूचित किया जाता है कि देश के आर्थिक हालात बहुत भयावह हो गए है और देश बुरी तरह से कंगाल हो गया है
ये हालात 1991 से ज़्यादा खतरनाक है जब मनमोहन सिंह को रिजर्व बैंक निदेशक से वित्त मंत्री के रूप में लाया गया था और पूरा सोना - चांदी वर्ल्ड बैंक और आई एम एफ के पास रखा था
दुर्भाग्य यह है कि जेटली जैसे कारपोरेट के दलाल और अनपढ़ सरकार के कारण आज रुपया और शेयर मार्केट की हालत भयावह हो गई है
एक रुपया भी खर्च करने से पहले पचास बार सोचिए यह आर्थिक आपातकाल है और इसके बावजूद भी बेशर्म सरकार ने चुनावों को ध्यान में रखकर घटिया राजनीति शुरू कर दी है
जिस समय भी अम्बानी असल मे कंगाल होगा वह देश का ऐसा भट्ठा बिठायेगा कि सम्हलते नही सम्हलेगा किसी से और कारपोरेट किसी के बाप का नही होता
अनुरोध यह है कि इन नेताओं के चक्कर मे आने के बजाय अपने जेब की चवन्नी भी सम्हाल कर रखिये , आने वाला कल बहुत खतरनाक होने वाला है - यकीन मानिए मेरा

Thursday, October 4, 2018

Posts of Sept last week and Oct First week 2018

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जाता तो कोई कही नही पर भौतिक रूप से घर परिवार और दुनिया से विदा हो जाता है तो हम सच मे बेहद अकेले रह जाते है
एक दिन हम भी चले ही जायेंगे और छोड़ जाएंगे निशाँ यहां , कोई याद करें - ना करें पर जीवन, सभ्यता के दरम्यां जो कुछ हमने किया और समय के वृहद इतिहास में दो पल गुजारे वो साक्ष्य बनेंगें
बचपन से बड़े होने तक की उन प्यार भरी लड़ाईयों, असीम स्नेह और असंख्य मधुर स्मृतियों को तलाशते हुए हर शै में खोजते है - उसे , जो अब कभी आने वाला नहीं है
संसार मे माँ - बाप के बिछोह के दुख के बाद सबसे बड़ा दुख सहोदर के बिछड़ने का होता है जिसकी कोई पूर्ति नही हो सकती
छोटे भाई को गुजरे आज ठीक चार साल हो गए पर भूलता नही कुछ भी - वो यही है पास , मुस्कुराता हुआ, बहस करता हुआ और मुझे डपटता हुआ
नमन और श्रद्धा सुमन
***
कवि , लेखक , कहानीकार, उपन्यासकार, आलोचक, हिंदी का दमघोंटू प्राध्यापक या वेब से लेकर ब्लॉग या घटिया अनियमित पत्रिका का सम्पादक होना महत्वपूर्ण नही है जितना सेटिंगबाज होना , गुरु असली चीज है मार्केटिंग का उस्ताद होना - सारे पुरस्कार, साहित्य की बहस और मुबाहिसे आपके इर्द गिर्द घूमते रहें यह भरसक प्रयास जीवन रहने पर्यंत करते रहें वही सच्ची सेवा है माँ सरस्वती और वाग्देवी की
विष्णु खरे इसके मुझे ताज़ा उदाहरण दिखाई देते है - वे बड़े कवि समीक्षक भी हो पर मीडिया में रहने वाला मरने के बाद भी चर्चित है और सारी व्यवस्थाएं करके गया बन्दा
इसलिए हे लेखक - उपासक नामक भक्त मेहनती, लेपटॉप और मोबाइल के की बोर्ड तोडू प्राणी और मूरख, खल, कामी इतनी कृपा लेखन पर ना करते हुए मार्केटिंग पर करो तो अजर - अमर हो जाओगे , सेटिंगबाज होना बुरा नही और आजकल यह फैशन है तो पैशन भी रखो अमर होने का
जियो लल्ला जियो
***
बच्चे सबसे बड़े सॉफ्ट टारगेट है उन्हें कही भी नचा दो, खड़ा कर दो, वृक्षारोपण की रैली में चलवा दो और यहां तक कि नसबंदी के लिए जागरूकता के कार्यक्रम में भी यूज कर लो
देवास के पर्यटन उत्सव में बच्चों को यूज़ किया जा रहा है - प्रतियोगिता के नाम पर , इस बहाने उनके अभिभावक मुफ्त में भीड़ के रूप में प्रशासन को मिल जाते है
बेहद गंभीर मुद्दें पर कोई सोचें तब तो कोई बात बने वरना तो सदियों से वे इस्तेमाल किये जा रहे हैं हुक्मरान और ब्यूरोक्रेट्स के लिए और फिर हम चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज़ और रेप की कहानियां मजे से सुनते है , यह भी बाल श्रम है
***
लुटेरा
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कैसे उत्साह से
अपनी उन्नति की
खबर वह बताता है
बोलते बोलते, जैसे कि देश की
दरकी हुई धरती पर
कूदता कूदता
उससे कहीं बाहर
जान लेकर भाग जाता हो

- रघुवीर सहाय
[ ताकि सनद रहे ]
***
जब राजा सिर्फ और सिर्फ निंदा रस में निर्लिप्त होकर मूल मुद्दों से हट जाए तो-
अपने राज्य के लोगों को सन्त्रास देने लगे उनके आवागमन से लेकर रोजी रोटी के लिए विपरीत परिस्थितियां पैदा कर दें तो -
राजा के दरबार के सभी नवरत्न विशुद्ध मूर्ख, गंवार और अनपढ़ों से गये बीते हो तो -
राज्य के बच्चों, किशोरों और युवाओं को नैतिक और सही शिक्षा देने के बजाय राजा और उसके गण उनके दिमाग़ में जहर भरने लगें और आचार्यों को मजदूर से गया बीता बनाकर श्रम करवाएं तो -
चरक , सुश्रुत और पतंजलि के देश में लोगों के वात पित्त के दोष निवारण के बजाय राज्य जँगली सियारों और शेरों के हवाले निर्दोष बीमार लोगों को चंद रुपयों के लिए चारा समझकर फेंक दें तो -
राज्य के न्यायाधीश, समस्त जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी भी भांग और नशे में धुत्त होकर उन्मुक्त हो जाएं तो -
जिस राज्य में किशोर, युवाओं को शिक्षा, मार्गदर्शन के बजाय उन्हें गधा मानकर भेड़ो की तरह से हांका जाएं और इस्तेमाल कर फेंक दें तो -
जिस राज्य में देवी स्वरूपा मातृ शक्ति की नित भ्रूण हत्या हो और उनके साथ बदसलूकी से लेकर बलात्कार होना प्रजा का धर्म हो जाएं तो -
जिस राज्य में सूचना संवाहक अपने काम के बजाय गलत काम करने के लिए राजा के खजाने का भक्षण कर अपने परिवार का पोषण करें और अपना जमीर बेच दें तो-
जिस राज्य में राजा को सलाह देने वाले सलाहकार, बायीं ओर बैठने वाले विद्वान भी शुद्र स्वार्थों के लिए राजा के हर काम को नजर अंदाज कर भीष्म की भांति चुप बैठकर सत्ता का चीरहरण देखते रहें तो -
शिखण्डियों की भीड़ जो आये दिन राजा के कुटिल इशारों पर वीभत्स कर्म करके अभिमन्युओं को चक्रव्यूह में घेरकर मार रही हो तो -
श्रीकृष्ण अपनी पटरानियों के साथ रासलीला रचाते हुए बांसुरी बजाकर किसी गांडीव धारी अर्जुन को मादक द्रव्यों में संलिप्त कर अनर्थ और अन्याय का सहारा देने लगे तो -
विदेशी आक्रांताओं को खदेड़ने के बजाय अपने विश्वसनीय भांड और चारणों के निजहित हेतु अपने गुप्त ठिकानों पर प्रश्रय देकर फायदा पहुंचाएं तो -
उस राज्य को शास्त्रों में नरक कहा गया है और ऐसे नरक में ज़्यादा दिन तक कोई राजा राज नही कर सकता, राजा ईश्वर का दूत ना होकर भक्षक है जो ईश्वर के नाम पर कलंक है और समूची प्रकृति का भी दोषी है जो चंद रंगे सियारों के फायदे के लिए सृष्टि का नुकसान कर विध्वंस के पथ पर अग्रसर है
इसमें राजा के साथ इस सृष्टि का हर चर - अचर प्राणी भी इसी नरक का भागी है जो चुप रहकर ईश्वर प्रदत्त जीवन का सत्यानाश कर अपने सुंदर जीवन को कष्टप्रद बना रहा है
समय आ गया है कि निंदा , पाप, दुराचार और आततायी राजा का सिंहासन बदलकर ईश आज्ञा का पालन करते हुए मनुष्य को संरक्षित और संवर्धित रखने वाली प्रणाली की स्थापना की जाएं और नर भक्षियों को राज्य से बाहर स्थाई रूप से वनवास दिया जाये
[ चौकीदारी के आधुनिक धर्म की कथाएं - 1 ]
***
रायपुर में हाल ही में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सम्मेलन का बड़ा मजमा लगा
मेरे एनजीओ फील्ड के साथी पूछ रहे हैं कि मैं क्यों नही गया और वे अपने फोटो यहां शेयर कर रहें हैं - रँग, बिरँगे और हंसते- खिलते मुस्कुराते हुए
सबको बधाई और बहुत बड़ा धन्यवाद कि अपने जीवन के लंबे समय में से 5- 6 दिन आपने इस सम्मेलन, मजमे और यात्रा में दिए लम्बा प्रवास कर आप पहुंचें , इतिहास याद रखेगा आपके इस पुनीत कार्य को पर मेरे कुछ विचार है - उजबक समझकर माफ कर दीजिएगा
वही चेहरे - वही मोहरे और वही लोग जो पिछले 30 वर्षों से हर जगह देख रहा हूँ - गांव की बैठक हो, जिले से राज्य या राष्ट्रीय स्तर की - ये वही लोग और घिसे-पीटे कार्यकर्ता है जो हर जगह मौजूद है - वन अधिकार की बात हो, पोषण - कुपोषण, एच आय वी , एड्स, शिक्षा , स्वास्थ्य, नदी बचाओ, आजीविका , रोज़गार ग्यारंटी योजना, पंचायत ट्रेनिंग, महिला सशक्तिकरण, कानून की व्याख्याएं, जमीनी अधिकार, जेंडर, आदिवासी उत्थान या क्लाइमेट चेंज की - कमाल यह कि एक जीवन मे लोग इतने क्षेत्रों में महारत कैसे हासिल कर लेते है और फिर उसके बाद जमीनी स्तर पर काम
इनमे भी अधिकांश कार्यकर्ता है जो आठवीं दसवीं पास है और छह सात हजार से लेकर बीस हजार रुपया माह की नौकरी बजाते है और जो संस्थान प्रमुख है वे दिन के 24 में से 28 घँटे प्रोजेक्ट जुगाड़ने के चक्कर मे रहते है बेचारे इतने व्यस्त है कि देशभर में होने वाली गोष्ठियों सेमीनारों ने कार्यकर्ता भेजते भेजते थक जाते है, मुझे लगता है कि ये जलसे मासिक, अर्ध वार्षिक या वार्षिक जगहें है जहां लोग मस्ती में आते है और कुल मिलाकर ये सब मिलन समारोह बनकर रह जाते है
कुछ तो गड़बड़ है मेरे में या मेरी सोच में या .... वैसे सच तो यह है कि बेचारे ये सब लोग तो भले ही होते है और सक्षम, उत्साही और दबंग भी और आने जाने का तो ख़ैर जुगाड़ हो ही जाता है परियोजनाओं से
एक उत्सव सा बन गया है इनका जीवन और ये उसके भागीदार, नकारात्मक कमेंट नही पर जो कह रहा हूँ शायद तुम, हम और हम सब समझ पाएं या कोई और तो अँधेरों के बीच से रोशनी की दरार ही नज़र आ जाएं
नए सिरे से सब कुछ करने की जरूरत है बजाय इस तरह की सत्यनारायण की कथाएँ आयोजित कर प्रसाद बांटने से , देश भर के लोगों को इकठ्ठा कर थोड़ी बातचीत, मिलना जुलना, गीत संगीत की महफ़िलें और परियोजनाएँ कबाड़ने के अभ्यास से
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377 के बाद अब 497 भारतीय अपराध दण्ड संहिता से विलोपित करने के भद्दे मजाक और चुटकुले बनें
आज वाट्स एप 497 से गुलज़ार है - एक में तो यहां तक कहा गया कि 'सेवानिवृत्ति के बाद की व्यवस्थाएं की जा रही है अपने' ये कहां आ गए है हम जिसमे अपनी बात मनवाने और थोपने के चक्कर मे तानाशाह बन रहें हैं और जो नहीं सुनेगा उसे जलील करेंगें, मोब लिंचिंग करेंगे और अंत में मार डालेंगे
बहुत ही मानसिक दरिद्रता है हमारे सड़े गले समाज मे और अंततः ये सब पितृ सत्ता के ही संवाहक है ना - जो महिलाओं की समानता नही देख सकते और महिला को आज भी भोग्या और सिर्फ सम्पत्ति ही समझते है , असल मे दूसरों की इच्छा और राय को हम महत्व देना तो दूर - हम उसका सम्मान भी नही करते
फिर आज कहता हूँ कि परिवार, विवाह जैसे सामाजिक संस्थान बुरी तरह से सड़ गए है, मवाद की बदबू नथुनों तक भर गई है और फिर पितृ सत्ता और पुरुष प्रधान समाज इन जैसे बजबजाते संस्थानों को ढोते जा रहा है - बजाय यह देखें समझे नई पीढ़ी, नए मूल्य, नई संस्कृति और नए विश्व में क्या हो रहा है और इनकी जरूरतें क्या है, कब तक हम धर्म, रूढ़ि के नाम पर बकवास और सदियों पुरानी दकियानूसी बातों को थोपते रहेंगें
दुखद है , हालांकि अच्छा यह है कि निर्णयों में कही गई एक बात सबसे अच्छी थी कि "भीड़ के मन मुताबिक और जन मानस की इच्छा से न्याय और निर्णय प्रभावित नही हो सकते"
150 - 170 वर्ष पुराने शोषित करने वाले क़ानूनों से देश को मुक्ति बहुत जरूरी है और सीजेआई जस्टिस दीपक मिसरा के अन्तिम समय में लिए गए फ़ैसले पढ़ने - पढ़ाने वालों के साथ लोवर कोर्ट में बैठे रूढ़िवादी और परंपराओं को ढोते न्यायाधीशों , वकीलों, कानून पढ़ाने वाले जड़ बुद्धि प्राध्यापकों, बार काउंसिंल और अन्य मुद्दों से जुड़े व्यापक जन समुदाय के लिए नज़ीर बनेंगें यह अपेक्षा की जाना चाहिए
नई सुबहों का आगाज़ हो रहा है - बदलाव के लिए तैयार हो जाइए नहीं तो आपको पीछे छोड़कर ज़माना आगे निकल जायेगा और आप लकीर पीटते रहेंगें
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बलात्कार के लिए बालिग होना जरूरी नहीं बच्चे भी पर्याप्त है इस "नेक काम" के लिए, लगातार मोबाईल पर तमाम तरह का ज्ञान प्राप्त कर उनके हार्मोन्स ज़्यादा उत्तेजित होकर कम उम्र में सक्रिय हो रहे है, बच्चियों की मेनारकी की उम्र भी घट गई है और हम 14 - 15 साल के किशोर को बच्चा मानकर ट्रीट कर रहें हैं - यह हमारी कमजोर समझ का नतीजा है , वे हत्या, लूट, डकैती से लेकर बलात्कार में भी सहज शामिल है और हम बाल अधिकारों की बात कर रहें है
नई दुनिया की खबर है आज कि 7 साल की बच्ची के साथ तीन नाबालिगों ने गैंगरेप किया
ये नाबालिक 14- 15 साल के बच्चे हैं - जो सातवीं और नवमी में पढ़ते हैं , अच्छी बात है कि इनमें से एक उसका चचेरा भाई है
देश में मोबाइल में फ्री डाटा की बहार है , प्रातः स्मरणीय अंबानी जी, आदित्य बिरला जी और भारतीय जी के कारण डेढ़ जीबी डाटा रोज निशुल्क मिल रहा है और हम जिम्मेदार अभिभावकों ने अपने बच्चों को स्मार्ट फोन हाथ में दे दिए हैं - बेटा खूब देखो पोर्न फिल्में और मजे करो
हम में से कितने अभिभावक अपने बच्चों के मोबाइल के लॉक पेटर्न जानते हैं, कितनों को पासवर्ड पता है , कितनों ने अपने बच्चों के मोबाइल में गैलरी को झांक कर देखा है
अमा, कहां फुर्सत है - रुपया कमाए , मजदूरी करें या यह साला मोबाइल ही चेक करते रहें- बच्चे भी खुश हैं - पढ़ाई के वीडियो देखने के बहाने खूब देख रहे हैं -धार्मिक, अधार्मिक और जोशीले खेल भावना से ओत प्रोत फिल्में व्हाट्सएप चला रहे हैं और फिर मोहल्ले में लड़की अपने अड़ोस पड़ोस में है ही और कोई नहीं मिली तो साली अपनी बहन है ना - दोस्तों को भी बुलाओ - बड़ा भंडारा करो और एंजॉय करो - जीवन है तो सब सुख है- भाड़ में जाए नैतिकता और बाकी सब बातें
बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर - हमारा समाज
[ अभी तात्कालिक इलाज नज़र आता है तुरन्त वह है कि अपने बच्चो को समय दो, बात करो उनके साथ, घूमो, उनके सच्चे दोस्त बनो और दोस्तो पर नजर रखें और उनके असामान्य व्यवहार पर कड़ी नजर भी रखें और जाईये अपने बच्चों के मोबाइल खोलने की कोशिश करें - नही खुलें तो स्कूल से आने के बाद उससे कहें कि दिखाएं मोबाईल - हां अगर वो छुपाकर स्कूल ना ले गया हो तो ] 

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माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पिछले हफ्तों - दस दिनों में लिए सभी फैसलों का स्वागत है -आधार के फ़ैसले को छोड़कर - ये है 377 का आंशिक और 497 का खात्मा, आरक्षण का राज्य तय करें और शबरीमाला मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश का और नमाज के लिए मस्ज़िद होना जरूरी नही
ब्रिटिश कानूनों की आड़ में और उदाहरणों में हम अपने देश के लोगों को कब तक छलते रहेंगें
अभी कानून पढ़ रहा हूँ तो देख रहा कि कानून की किताबों में, उद्धहरणों में कितने सड़े गले उदाहरण और निर्णयों की व्याख्या है
इंग्लैड छोटा राज्य था और सीमित जनसंख्या और एक तरह के लोग, हमारे यहां जारूवा आदिवासी से लेकर तथाकथित स्वयंभू उच्च कुलीन लोग है, गहरे अंदर तक फ़ैली हुई अभिशप्त जाति प्रथा है जो मनुष्य मात्र का भयानक शोषण सदियों से कर रही है और यह देश सराहनीय विविधता लिए है विश्व में - जो अपने आप ने अनूठापन है
इसलिए कानून को खुला, सबके लिए समान और मनुष्य मात्र के जीवनोपयोगी होना होगा इसका अर्थ यह भी है कि जो मनुष्यता के मूल मूल्यों को कुचलकर अपराध या किसी और पर अपने निर्णय थोपने की कोशिश करेगा उसे दंडित किया जाना भी आवश्यक है, स्त्री - पुरुष समानता होनी ही चाहिए जेंडर भेदभाव एक बड़ा शोषण का पहिया है जिसने हमारी स्त्रियां सदियों से पीस रही है और यह एकदम सही समय है जब चुनाव भी होने वाले है कि वे अपनी अस्मिता को पहचानकर अपना भविष्य, वर्तमान तय करें - पुरुष की अधीनता से निकलकर स्वतंत्र होकर खुली हवा में सांस लें
मैं कोर्ट के सभी फैसलों का स्वागत और सम्मान करता हूँ अब हमें यह तय करना है कि हम कैसे संस्कार डालें और लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए सशक्त समाज का निर्माण करें
आधार के फैसले से मैं उपरोक्त कथ्य के संदर्भ में सहमत नही हूँ - इसके लिए जस्टिस चंद्रचूड़ को याद रखना चाहूँगा जिन्होंने आधार को सिरे से खारिज करने की बात की है और इसे भी दर्ज किया जाना चाहिए कि उन्होंने तमाम विरोधों के बाद अपना मत तर्कों के साथ रखा
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पटाखा - मनोविज्ञान की मनोरंजक फ़िल्म
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गम्भीर मनोवैज्ञानिक कहानी की विशाल भारद्वाज द्वारा फ़िल्म के रूप में बेहतरीन प्रस्तुति है "पटाखा"
दो बहनों की लड़ाई जो आगे जाकर एक बड़ी मनोवैज्ञानिक समस्या बनकर उनके निजी जीवन और परिवार में त्रासदी के रूप में उभरने ही वाली होती है कि फ़िल्म का केंद्रीय पात्र अर्थात कहानीकार एक अचूक हल देता है
यह फ़िल्म सिर्फ मनोरंजन ही नही - बल्कि राजस्थानी संस्कृति, भाषा, बोली, गीत , तीज त्योहार और पूरे परिवेश का श्रेष्ठ सम्मिश्रण है
आज हम 17 लोगों ने सम्भवतः पहली बार एकसाथ एक फ़िल्म को पूरे मनोयोग से देखा क्योकि यह हमारे मित्र और हिंदी के अग्रज कथाकार और देवास जिनका भी एक लंबे समय से घर है , Charan Singh Pathik की कहानी पर आधारित है
पथिक जी की पिछले एक साल की मेहनत और श्रम इसमें झलकता है , बस इतना पथिक जी कि आपका आज यहां साथ होना था तो मज़ा चार गुना हो जाता
दुर्भाग्य से पथिक जी के और हम सबके अनुज निहाल सिंह का अभी दस दिन पहले उनका आकस्मिक निधन हो गया, वे भारतीय फौज के होनहार अफसर थे

दुख की इस बेला में हम सब एक वृहत्तर परिवार के रूप में साथ है और दुआ करते है कि परिवार को ईश्वर दुख सहने की शक्ति दें
फ़िल्म की सफलता के लिए खूब दुआएँ और पथिक जी के लिए बहुत सारी शुभकामनाएं कि वे हम सबको अपनी सभी कहानियों की जीवंत फ़िल्में दिखाएँ , भाई साहब हम सब इंतज़ार कर रहें है कि अगली फिल्मों के प्रीमियर आपके साथ बैठकर देखें
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हम लापरवाह लोग
जो मन्दिर थे उनका तहस नहस कर दिया, बेशकीमती मूर्तियाँ जंगल मे पड़ी खराब हो रही हैं और नए ढाँचे बनाना चाहते है
ये चित्र देवबड़ला नामक जगह के है, देवबड़ला - अर्थात मालवी बोली में देवों का ऊँचे स्थान पर या ऊँचे ओटले पर स्थापित होने की जगह
ये मालवा की एक इतनी सुलभ जगह है कि इंदौर भोपाल मार्ग पर ग्राम मेहतवाड़ा से मात्र पन्द्रह किमी अंदर है थोड़ा दुर्गम रास्ता है पर इन परमारकालीन अवशेषों को देखने जाना, समझना और इन्हें सहेजना बहुत जरूरी है
लगभग आठ सौ वर्ष पुराना श्रीराम मंदिर, शिव मंदिर और देवियों की मूर्तियां पूरे प्रांगण में बिखरी पड़ी है, दो कुण्ड है , कोणार्क और खजुराहो की तर्ज़ पर बने मन्दिर थे जो अब जीर्ण हो गए है,
हम भारतवासी संस्कृति पर गर्व करते है, परम्परा की दुहाई भी देते है पर पूछ लो कि जनाब क्या किया - आम आदमी से लेकर, पार्टी, सत्ता या सरकार से तो कोई जवाब किसी के पास नही
आपके पास है कोई जवाब
यही से नेवज नदी का उदगम भी है और इसी नेवज नदी से जैन तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और भगवान पार्श्वनाथ जी की मूर्तियां भी निकली है, अभी भी कई मूर्तियां निकल नही पाई है, जावर के जैन समुदाय के श्री नूतन कुमार जैन ने बताया कि इस नदी में यही पड़ी है कई मूर्तियां, अब सम्भवतः पुरातत्व विभाग सुध ले रहा है
आज का रविवार इस खूबसूरत जगह के नाम रहा , इस यात्रा में मित्र चौधरी सत्यजीत का साथ न होता तो यह सम्भव न हो पाता
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परम विद्वान न्यायमूर्ति श्री दीपक मिसरा की सेवानिवृत्ति के पहले अंत मे उनका विवेक ही जागृत हुआ और उसके आलोक में जो फ़ैसले उन्होंने सुनाएं और अंत मे जो भारतीय न्याय व्यवस्था पर टिप्पणी की वह याद रखी जाना चाहिए कि कैसे आत्मा तड़फती है और सिसकारी उठती है जो कलेजे बींध जाती है - अगर व्यक्ति मनुष्य हो
काश कि एलएलबी की कक्षाओं में विद्वान न्यायाधीशों के फ़ैसले, उद्धहरण और न्यायिक इतिहास पढ़ लें कोई शख्स - तो ना किसी प्रपंच की जरूरत होगी और ना जोकरों की तानाशाही सहने की और ना चापलूसी की, दुर्भाग्य यह है कि जज के पद पर बैठ जाने के बाद व्यक्ति यह भूल जाता है कि यह कुर्सी अर्थात माया महाठगिनी चन्द दिनों की है और सीजेआई का पद तो ओंस की बूंद या सिर्फ रात रानी का फूल है जो क्षण में गल जाने वाला है - ख़ुशबू फैलाने की दरकार है ना कि गुलशन के कारवां को समूल नष्ट करने की
खैर देश याद भी रखेगा, दुआएँ भी देगा और ........
अब अगला सवाल यह है कि देश के सबसे बड़े दलाल, सॉरी - व्यवसायियों और देशभक्ति की बेमिसाल जोड़ी जस्टिस गोगोई साहब को कैसे "कन्विंस" करेंगें - अपने एजेंडों को लेकर और हिन्दू राष्ट्र के मुद्दों को लेकर और जनहित याचिकाएं जो लंबित है उनके हित कितने देश हित मे होंगे, साथ ही मोदी सरकार ने जिन संविधानिक संस्थाओं को नष्ट किया या जिस तादाद में मोदीज़ और हमारे गुज्जु भाई लोग रुपया लेकर भागे है उनको वापिस लाने में उच्चतम न्यायालय पहल करेगा
काला धन आया तो नही पर मेरा - आपका,हम सबका सफेद धन हमें नंगा करके चोट्टे ले उड़े, इनके लिए कोई दिशा निर्देश स्वयं संज्ञान लेकर कानून बनाकर इस भ्रष्ट सरकार से अमल करवाएंगे गोगोई साहब ताकि भविष्य में कोई नोटबन्दी से लेकर संस्थाओं के मूल ढांचों से छेड़छाड़ करने की हिम्मत ना करें कभी
बड़ी चुनौती मन्दिर निर्माण के फैसले को लेकर है और रोस्टर प्रणाली जिसके लिए वे खुद कोर्ट के बाहर आये थे और देश से सीधे बात की थी
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गांधी के देश में चुपके - चुपके
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गांधी ना मरेंगे ना ज़िंदा रहेंगे - जब तक बिकेंगे जिंदा रहेंगें
हाँ, गांधी को बेचने वाले और मारने वाले उन्हें हमेंशा नोचते, खसोटते और खाते रहेंगें - संघी हो, वामी हो , कांग्रेसी या सबसे ज़्यादा गांधीवादी खुद
गांधी अब उन्ही के नाम पर बनें बड़े अड्डों में या छोटे - बड़े नोट में ही कैद है और बूढ़े खूसट खादी का आवरण ओढ़े पूंजीपति और भयानक शोषण के समर्थक गांधीवादियों के कब्ज़े में है जिनसे मुक्त हुए बिना कुछ नही हो सकता
बहरहाल , देश को गांधी की 150 वीं जयंती मुबारक, बजाओ ढोल नगाड़े कि बड़ा फंड कही से किसी को मिल जाये और तमाशे शुरू हो
गरीबों को घर देने या अस्पतालों स्कूलों या बुनियादी तालीम या घरेलू गृह उद्योगों को चलाने के लिए इन सभी गांधीवादी अड्डों को तोड़ों इनसे मुफ्त की ली हुई जमीन पर कब्जा करो और इन पोपले मुंह वाले बीमार भाईजी और दीदियों को निकालें , इन्हें कहें कि बहुत कमा खा लिए तुम लोगों ने और अब नही देंगे जब तक विचारधारा की दुकान बंद करके हाथ से काम नही करते , जब तक 71 सालों का संस्थागत हिसाब और अपनी निजी संपत्ति सार्वजनिक नही करते , जब तक अपने अनुदान के स्रोत नही बतातें और जमीन उन लोगों के नाम नही करते जिनके लिए गांधी लड़ें
ध्यान यह रहें स्वदेशी या अहिंसा के नाम पर , सौहाद्र और साम्प्रदायिकता के नाम पर किसी टुच्चे को कोई अनुदान ना दें सरकार, किसी घाघ और घसियारे को -जो किसी कारपोरेट की गुलामी कर रहा हो को एक चवन्नी ना दें कि वह कोई सड़ियल अख़बार, पत्रिका या फीचर एजेंसी शुरू कर सकें या कोई किताब प्लान कर लें चुपके चुपके , इन झोले झब्बे वालों से सबसे ज़्यादा बचने की जरूरत है जो कर कुछ नही सकते - बस बकवास और कहानियां सुनाने के लिए इन्हें एक अवांगर्द भीड़ की तलाश रहती है , इन्हें सारे आयोजन और प्रसंगों से दूर रखने की जरूरत है
गांधी को हमेंशा प्रासंगिक रखना सत्ता की मजबूरी है और यह हमें यानी जनता को तय करना है कि हम गांधी कौनसा चाहते है - गोडसे का, नेहरू का, वामियों का या वो गांधी जिसको सबसे पहली बार शोषण का सामना करना पड़ा, ट्रेन से उठाकर फेंक दिया गया - एक विदेशी मुल्क में किसी काले के साथ मेरी नज़र में वह पहली बार मोब लिंचिंग की घटना थी जो आज सत्ता के मठाधीशों ने राष्ट्रीय कर्तव्य समझकर अपना ली है - तब गांधी ने कसम खाकर अंग्रेज़ो को भगाया था -आज किसे भगाना है यह हम तय करें इसके लिए हमें खुद गांधी बनना होगा कोई आएगा नही अब मो क गांधी
पहल में छपी एक कविता याद आ रही है "गांधी मला भेटला"
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मायावती को अब सेवानिवृत्त होकर किसी ढोंगी बाबा के आश्रम [ ये दीगर बात है कि उससे और उसके नए आका से बड़ा ढोंगी कोई नही ] में या कही शंकराचार्य जी के पीठ में या वृंदावन मथुरा के महिला सुधार गृह में जाकर बचे दिन सड़ाना चाहिये, यूँ किसी हमाम में साबुन की बट्टी नुमा गल गलकर जीवन जीने से क्या फायदा
ऐसी औरतें और इनकी हरकतों के कारण ही समस्त स्त्रियां बदनाम होती है और तमाम गालियां खाती है जो अभद्रता की श्रेणी में आती है , इसकी राजनीतिक समझ इतनी खराब होगी और दलित आंदोलन के बाकी नेता इस अवसरवादी महिला के नेतृत्व में इसका साथ देंगे - यह समझ से परे था , बहुत ही कायराना और छिछोरी हरकतें करते हुए आखिर में आज इसने अपने असली रंग ढंग दिखाएं
अमित शाह की धमकी जबरजस्त है कुछ भी कहो, सारे दलितों को इस बहाने घेर लिया है और अब बाजी देखना है कि कहां जाकर बैठती है
सपाक्स और अपाक्स की भीड़ अभी और गुल खिलाएगी
तीन राज्यों में दलितों की अगर हार हुई ( जोकि अब निश्चित है) तो समझ लीजिए फिर इस देश मे दलित कभी मुंह नही उठा सकेंगे - ना आरक्षण और ना प्रतिनिधित्व - और यह मौका भी कि कांग्रेस से लेकर सपा और दलित नेता इस औरत को पहचान लें और इसे हर मुद्दे से अलग करें , मेरा यह भी डर है कि मप्र में जयस से लेकर गोंडवाना टाईप संगठन भी थोड़े दिनों में हिन्दू राष्ट्र में विलीन होकर संयुक्त हो जाएंगे और कांग्रेस को 44 सीट लाना भी मप्र में मुश्किल हो जाएगा
अफसोस कि एक डरपोक और कायर नेता ने रुपयों के लालच और सी बी आई की जांच के ख़ौफ़ से पूरे दलित आंदोलन और वंचितों की आवाज को हजार साल पीछे धकेल दिया , भाजपा तो सत्ता पाने के लिए कुछ भी करेगी ही परन्तु इस महिला की महत्वकांक्षा ने जमीनी लड़ाई को खत्म कर दिया जबकि सपाक्स के कारण भाजपा के तीन राज्यों में हाथ पांव और छाती फूल गए थे
मायावती अब दलित नही - भाजपा का चेहरा है, असली भारतीय अवसरवादिता का घटिया मलिन चेहरा
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