Wednesday, August 15, 2018

गुदा के द्वारे बैठी हिंदी की कविता बकौल अम्बर पाण्डेय और मोनिका कुमार 15 Aug 2018


गुदा के द्वारे बैठी हिंदी की कविता बकौल 
अम्बर पाण्डेय और मोनिका कुमार 
अम्बर पांडेय और मोनिका कुमार की ये कविताएं पढ़िए और बताईये कि कविता, भाषा, कथ्य, शिल्प, मुद्दें और सबसे ज्यादा शुचिता और सन्देश क्या है
इस वेब साईट, पत्रिका और पत्रिका के लोगों की समझ पर भी प्रकाश डालें तो और स्पष्टता आयेगी
यह मैं नही कई लोगों ने पूछा है , पहले आप बताइए फिर मैं बताऊंगा कि मुझे क्या लगा पढ़कर

एक बात जरूर कहूँगा कि कुछ लोग "स्कैंडल क्रिएट" करने के लिए भी किसी हद तक जाते है और इसका इलाज सिर्फ उपेक्षा है - घृणा और चुहलबाजी और चर्चा नही है , ये सिर्फ अम्बर और मोनिका की बात नही है हिंदी में लाखों में कुंठित कवि है जो रोज अपनी या दूसरों की कविताओं को चैंपकर लड़कियों के फोटो लगाकर पोस्टर बनाते है - ठेलते है और अपनी हवस और अपराध बोध का सार्वजनिक प्रदर्शन करते है यही नही उन्हें वाट्स एप के समूहों में ग्रुप आईकॉन बनाने से लेकर देर रात तक द्विअर्थी शब्दों में ठिठोली करने से गुरेज़ भी नही तो फिर बदनाम करने का ठीकरा इन दो पर ही क्यो, इन कम्बख्तों को भी नंगा किया जाये जो चुन चुनके देश भर की औरतों को इकट्ठा कर समूह में जोड़ते है जिसकी समझ भले कुछ ना हो या पापड़ बड़ी या ननद भौजाई या तीस पैंतीस पर कविताएं बघारती हो
दो कौड़ी की समझ वाली ये औरतें उर्फ कवि बनी और रोज लाइक्स और कमेंट्स के लिए कुछ भी कूड़ा कचरा लिखने वाली भी दिल्ली से लेकर दूर दराज तक उत्तर मेनोपॉज संसार मे जी रही शाब्दिक सुख लेने में कोई कम नही - हिंदी का जगत भरा हुआ है इनसे
मोनिका का तो नही मालूम पर अम्बर को यह सब लिखवाने वाली ऐसी ही कुछ महिलाएं है जिन्होंने उसे इतना चने के झाड़ पर चढ़ाया की वह "यह" भी लिख बैठा फिर भी अभी यह लिखा कविता में आता है और उसके होने के अपने तर्क और विचार हो सकते है - असहमतियां भी पर गुदावर्ष घोषित करवाने की मांग करने वाली मोनिका कुमार पर सवाल नही है कोई क्योकि मुआमला जेंडर का हो जाएगा
और अपनी समझ पर भी सवाल उठाइये और पूछिये कि कहानी कविता की जमीन पर आपकी अपनी क्या औकात है - क्या इतनी भी है कि मलाई चाटने रज़ा फाउंडेशन तक जा सकते है

वे कविता में शिल्प, रवानगी, तुकांत - अतुकांत की बात करेंगें
तुम 2018 से लेकर भारत भूषण अग्रवाल, और नोबल पुरस्कार में कविता के गुदाद्वार पर ही अड़े रहना


हिंदी के बड़े कवि आग्नेय जब साक्षात्कार से गये तो बहुत दिनों तक खबर नही थी, यहां वहां घूम घामकर लौटें तो सदानीरा नामक महंगी पत्रिका शुरू की जिसमे कविताओं के बदले अनुवाद छपते थे बेसिर पैर की कविताएं विश्व कवियों की और उन्हें अनुवाद करने वाले और भी घटिया गए गुजरें
अभी ताजा मामला इस सदानीरा के वेब एडिशन में "2018 को गुदावर्ष घोषित कर दो" जैसी कविताएं छापी है जिन पर विवाद है - एक कविताओं के शीर्षक और कथ्य को लेकर, दूसरा दोनों कवियों को लेकर जिनमे छद्म नामों से लिखकर प्रसिद्ध हुए और अपने नाम से भी लिखने वाले Ammber Pandey और मोनिका कुमार के प्रति पूर्वाग्रह को लेकर
अम्बर इधर हिंदी में तेजी से उभरे कवि है जो अपने तरह का लिखते है - धर्म, पेड़, अनुष्ठानों, बंगाली से लेकर आदिवासी संस्कृति उनकी कविताओं के विषय रहें है. मोनिका कुमार कौन है - मैं नही जानता , इसलिए कमेंट नही - पर अम्बर को जानता हूँ इसलिए यही कहूंगा कि ये कोई अनोखी कविता अम्बर के लिए नहीं है , पर यह भी बात है कि सदानीरा के जिस तथाकथित सम्पादक ने ये कविताएं छापी है - उसने 'अम्बर की कविताएं' छापी - यह मेरे लिए आश्चर्य की बात है और अचरज भी !!! क्या सेटिंग है और षड्यंत्र की कि वो अम्बर को छाप रहा है तिस पर से वाणी प्रकाशन से अम्बर की किताब आने की घोषणा भी एक विस्फोटक खबर ही है मेरे लिए - क्योकि विदुषी स्व द्रोपदी सिंघाड़ से लेकर स्व तोताबाला और स्वयम अम्बर की कविताओं को पुस्तकाकार में लाने के लिए मैं, आशुतोष, चन्दन , शशांक, मनीषा जैन से लेकर कई लोग बरसों से पीछे पड़े है पर वो हमेशा यह कहकर टाल जाता है कि एक पेड़ कटेगा और किताब का क्या फायदा
ये कविताएं चुभ रही है स्वाभाविक है पर जो महिला कवि इन्हें पढ़ने से बचे रहो टाईप सलाह दे रही है - वे भी घर से भागी लड़कियां , पन्द्रह - बीस साल की किशोरियों के स्तनपान से लेकर चालीस साला औरतों के रसोई, नाखून में आटा, माहवारी और सैंतालीस साला औरतों के मेनोपॉज पर भी तो लिखकर यहां वहां चैंपती रहती है और ईनाम और यश के लिए डोरे डालती रहती है साथ ही हमारे हिंदी के मर्द पुरुष कवि खीं खीं कर दुलारते सराहते रहते है
इन कविताओं में जो प्रतीक और बिम्ब इस्तेमाल किये गए है वे इस भयावह समय को दर्ज कर रहें है और गुदा को जिस खूबसूरती से पूरे परिदृश्य और फलक को प्रतिबिंबित कर रहें है उस पर कोई गौर नहीं कर रहा अफसोस यह है कि अभिदा, व्यंजना और लक्षणा के बीच रहने वाले कवियों की मोटी बुद्धि क्यों जड़वत हो गई है और मजे से सब पढ़ चुके और शेयर भी किया , सेव भी कर ली , पर उँगली कटाकर, शुचिता की दुहाई देकर अब नैतिक बन रहे है
मजाक और नैतिकता के द्वंद में फंसे , लोकप्रियता को तरस रहें ये ब्रीड कसमसा रही है और अब कुल मिलाकर उसी गुदा में फंसकर रह गये है - जहां अम्बर और मोनिका इन्हें अंततोगत्वा घेरकर ले जाना चाहते थे और बदबू के बीच बजबजाते हुए छोड़ना चाहते थे - ठीक वही ये सब पहुंच गए है , द्वैत और अद्वैत का भेद मिट गया है और अब बात कविता पर नहीं कुंठा और जलन की है , ना लिख पाने का , नई भाषा ना सीख पाने का, कविता ना सध पाने का अफसोस भी है इन्हें और ये जायज - नाजायज गुस्सा निकल रहा है संगठित रूप से
किसी ने मुझे यह भी कहा कि "अम्बर को इस वर्ष भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार ना मिल पाने का भी अफसोस है और यह उसी का प्रतिफल है जो पूरी हिंदी कविता के संसार को वह एक गुदा में लाकर बन्द कर देता है" हो सकता है सही हो यह बात कि लो हिंदी के महानतम लोगों यह रही तुम्हारी कविता, पर क्या इससे कुछ हल निकलेगा - कवि तो लिखेगा पर यदि आग्नेय जैसे मंजे कवि अपनी बागडोर किसी के हाथ मे देंगे और सम्पादक के अधिकार डेलीगेट कर देंगे तो आगे आपको और भी अंडाणु, शुक्राणुओं, यौन से भरी पूरी कविताएं मिलेंगी इसके लिए तैयार रहिये
मुझे तो लगता है सम्पूर्ण हिंदी जगत इस समय गुदा के द्वारे बैठा है और बदबू एवम गन्दगी को एक दूसरे पर फेंकते हुए फाग की मस्ती में झूम रहा है

अंबर पांडेय की कविताएँ

मेरी प्रेमिका के गुदास्थान का विवरण

रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए मैं इसे नहीं लिखना चाहता। अपनी प्रेमिका को यह लिखकर मैं अचंभित भी नहीं करना चाहता क्योंकि अचंभा कोई ऐसा मनोभाव नहीं जिस पर प्रेमी का एकाधिकार हो—जिस तरह उसके गुदास्थान पर मेरा अधिकार है। साहित्य के आलोचकों को चौंका देने के लिए भी मैं यह नहीं लिखना चाहता। गुदास्थान पर लिखने में समस्याएँ भी बहुत हैं, ख़ासतौर पर तब जब इसे लिखने वाला मुझ जैसा कोई धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति हो। अधिकतर बिंब खाद्य पदार्थ या धर्म संबंधित होने के कारण मेरे लिए व्यर्थ हैं।
जिसकी जिह्वा काट ली गई हो, जिसके दाँत तोड़ दिए गए हों… वैसे मुख से गुदा की उपमा दी जा सकती है, किंतु वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए तब यह कहना पड़ेगा कि देश के बहुसंख्य लोग मुख के स्थान पर गुदा लिए हुए अपना जीवन काट रहे हैं। तब विषय गुदास्थान न होकर राजनीतिक हो जाएगा जिससे मुझे बचना है।
उसके गुदोष्ठ संसार की सबसे कोमल वस्तु हैं और स्पर्श से किंचित संकुचित और फिर फैल जाने वाले—श्याम, अरुण और हरित वर्ण। मनुष्य जाति गुदास्थान के प्रति प्राचीनकाल से ही बहुत संवेदनहीन रही है। वायु ने ही इसके प्रति हमेशा संवेदना दिखाई है। उसके गुदास्थान का व्यक्तित्व उसकी नाक की तरह ही अभिमानी, लेकिन भीतर से भावुक है और जिस तरह यह गुदाद्वार यंत्रणा का स्वागत करता है, उससे यह ज्ञात होता है कि इसकी यंत्रणा अन्य सांसारिक यंत्रणाओं से नितांत भिन्न है।

गुदा का अपमान करना संभव नहीं

वह यूरोपियन पुनर्जागरण काल के चित्र-सी
स्थिर और नग्न थी।

उसने कहा, ‘‘मुझे अपमानित करो जितना मध्यकाल में स्त्रियों को अपमानित किया जाता था, जितना दूर भारतवर्ष में अब भी स्त्रियों को अपमानित किया जाता है, जितना गुदा का अपमान किया जाता है संसार की प्रत्येक भाषा में।”
अपमान की इच्छा
अपमान से अपमान को घटा देती है।

‘‘गुदा का अपमान
करना संभव नहीं
क्योंकि गुदा का अपमान
गुदा को कंटकाकीर्ण कर देने वाले
आनंद से भर देता है’’

ऐसे ही जब उसने
अपमानित होने की इच्छा की
उसे अपमानित करने का
आनंद जाता रहा।

गुदा से स्त्री की उपमा देने पर भी उसे अपमानित नहीं कर सका।
माँगे गए अपमान को
चुंबन की तरह देना पड़ा।

बहुत समय तक अपमानित होते-होते
मनुष्य में भी गुदा जैसा लचीलापन उत्पन्न हो जाता है
मार मनमोहक लगने लगती है।

गुदा में अँगुली डालकर तुम क्या जानना चाहते हो

क्या
जानना
चाहते
हो
तुम्हारे प्रेम में मेरी भूख नष्ट हो गई?
निद्रा के विषय में गुदा मौन है

या किसी नष्टप्रायः, पुरातन छंद को
पुनर्जीवित करके तुम मेरी गुदा की उपमा
मेरे ही कमलनयनों से दोगे

हमारे आलिंगन के बहुत बीच में आए मेरे ये उन्नत स्तन
ये मेरे स्त्री होने के सबसे पुरुषोचित साक्ष्य
जिनमें जाने का मार्ग नहीं, जो अपने दसों ओर से
बंद हैं ऐसे स्तन, जो पुरुष को इतने प्रिय हैं
क्योंकि पुरुषों जैसे ही हैं

स्पर्श को लेकर
किसी सद्यप्रसूता मादाव्याघ्र की भाँति चौकन्नी
जिसमें कितना ही खोजो
जहाँ पहुँचने के कितने ही तुम प्रयत्न करो
नहीं मिलेगा तुम्हें संसार का उद्गम

यहाँ तक मेरे केवल हाथ जाते हैं
दृष्टि नहीं इसलिए यह सृष्टि से विलग है
कमल की तरह इसे भी ब्रह्मा ने नहीं रचा

अंतोनिओ ग्राम्शी की कविता

उन्होंने मुझ लोर्का बना दिया
इसलिए नहीं कि मैं कुछ लिखने का प्रयास किया करता था
इसलिए कि वे मुझे मार सकें—
गुदा पर गोली

उन्होंने कहा कि मेरी भाषा नक़ली है
क्योंकि कविता में मैं स्त्री होने का प्रयास
कविता में मैं आदिवासी होने का प्रयास
कविता में मैं मुसलमान होने का प्रयास कर रहा था
ऐसा करके वे बन गए आलोचक, बहुत प्रयास
किए उन्होंने मुझे चुप कराने के और जब मैं
चुप नहीं हुआ तो वे हो गए चुप
जैसे अन्यायी हो जाता अंतत:
जैसे राह चलते मँगते की कबीरबानी सुनकर
भीतर रियाज़ करती शास्त्रीय गायिका मौन हो जाती है
घृणा से भर उठता है उसका कंठ, उसकी शिराएँ

उनकी किताबें छप चुकी थीं
उन्होंने पुरस्कार आपस में बाँट लिए थे
जैसे गिरोह चोरी का धन बाँट लेता है
वे सरकारी अनुदान प्राप्त पत्रिकाओं में
सरकार के विरोध में लिखकर
सरकार की उचित सेवा कर रहे थे
उनका वामपंथ संगठित था कलकत्ते की पुरानी पेढ़ियों की तरह
जहाँ पर नाक रगड़े बिना कोई कवि नहीं हो सकता था
उनके पास भाषा थी, उनके पास
मृतकों की लंबी सूची थी जिस पर उन्हें
रास्ता पार करते नहीं बल्कि मंच पर
कविता पढ़ते रोना आ जाता था
मेरे पास मेरे जीवन को छोड़ कुछ नहीं था
जिसे ख़त्म करने का उनका कोई इरादा नहीं था
क्योंकि जीवन अपने आप चुक जाता है जैसे चिमनी में
नेह चुक जाता है रात्रिभर अंधकार से लड़ने के बाद
और कविता भी चाहे मुक्तिबोध की कविताओं की तरह
लंबी हो, आख़िर ख़त्म हो ही जाती है
सत्ता का विरोध करते-करते
उन्हें पता ही नहीं चला कि वे विपक्षी पार्टी हो गए हैं
वे उतने सजग नहीं थे जितने होते हैं कवि
जितने होते हैं आलोचक
वे रो नहीं रहे थे, वे रुआँसी आवाज़ में गुनगुना रहे थे—
एक कवि को गुदा पर गोली मारने का शोकगीत
वे भूल गए थे कि कवि अभी तक मरा नहीं है।

*
monika kumar hindi poet
मोनिका कुमार

मोनिका कुमार की कविताएँ

[एक]

जो जीवित है वह अपनी देह में केवल दिल लिए नहीं घूमता-भटकता,
कि कोई हो जो उसके दिल को प्यार करे
उसकी देह में गुदास्थान भी है
प्रेम पाने के लिए आतुर और प्रेम का अधिकारी,
दिल का अपमान करता है कोई
तो गुदा पीड़ा से सिकुड़ जाती है
गुदा का सुख दुःख भी अटूट जुड़ा हुआ है दिल से,
कभी ऐसा नहीं हुआ दुनिया में
किसी ने किया हो दिल से प्रेम
और गुदा गौरवान्वित न हुई हो उस प्रेम में।

गुदा से प्रेम करने का अर्थ है
मनुष्य की गहराई से प्रेम करना,
उसके अँधेरों से प्रेम करना
उसके दुःख से प्रेम करना
गुदा से प्रेम करने का अर्थ है,
दुःख में केवल दुखी नहीं होना
बल्कि प्रेमी के दुःख में प्रवेश करना और उसे सुखलोक में ले जाना।
प्रेमी की निष्ठा का प्रमाण माँगना हो तो
केवल यह मत देखना कि होंठ कैसे तप जाते हैं प्रेमी के दर्शन से
दिल की धड़कन कितनी बढ़ जाती है प्रेमी के स्पर्श से
प्रेमी के लक्षणों का जब तुम करो अन्वेषण
गुदास्थान की राय भी शुमार करना
कि यह प्रेमी गुदा का मर्मज्ञ होगा या नहीं

[दो]

जीवन बीत रहा है
और अभी तक मैं गुदास्थान के चरित्र से अनजान हूँ,
अनभिज्ञता की ऐसी स्थिति में
क्या मुख लेकर जाऊँगी स्वर्ग में,
द्वारपाल पूछेंगे गुदास्थान के रहस्य
और मैं उलझी हुई व्याख्याओं से,
उनका समय और अपना भविष्य नष्ट करूँगी।

जीवन बीत रहा है
और मैं अभी भी टाल रही हूँ जीवन के वास्तविक प्रश्न,
नितंबों को अभी तक नहीं पूरी तरह अपनाया मैंने
युगों से गुदास्थान ने सहन की है अवहेलना,
आने वाले युगों में गुदास्थान की न्यायोचित प्रशंसा हो
तो उम्मीद बँधे,
मनुष्य समझदार हो रहा है
अपनी गहराइयों से अब उसे इनकार नहीं है
वर्ष 2018 को गुदावर्ष घोषित कर दो तो यक़ीन आए
अपने रहस्यों से मनुष्य अब शर्मसार नहीं है।

जीवन बीत रहा है
लेकिन भ्रम नहीं बीत रहे,
सामने वाले की नज़र में क्या है
उसे अभी आँखों से परखती हूँ,
गुदास्थान के दर्शन को अभी आत्मसात नहीं किया है।

[तीन]

मेरा गुदास्थान आतंकित और सहमा हुआ है,
वह सदमे और शोक में निराश पड़ा रहता है।

जीवन से पस्त होकर
मैनें बहुत बार कहा है कि हाथ-पैर सलामत हैं तो सब कुछ बचा हुआ है,
वंचना को सहनीय बनाने के लिए भी बहुत बार कहा है
ईश्वर ने हाथ पैर दिए हैं तो सब कुछ दिया है,
ईश्वर के प्रति कृतज्ञता के क्षणों में
गुदास्थान के निमित्त हमेशा उपेक्षा और चुप्पी बरती है।
सत्य जबकि यह है कि
मेरा अस्तित्व अब गुदास्थान में सिमट चुका है—
आतंकित, सहमा हुआ और शोकग्रस्त।

मन की बात कहने से प्रेम बढ़ते हुए नहीं देखा
मन की बात कहने से अपार घृणा अवश्य बढ़ जाती है।

मुझ में अब और घृणा सहने की हिम्मत नहीं है,
मेरा अब और संकुचन संभव नहीं
मेरा अस्तित्व अब गुदास्थान में सिमट चुका है।

गुदास्थान अस्तिव को मल की तरह समेट कर रखता है,
अस्तित्व जो अब केवल एकांत में क्रियाशील और सहज होता है।

चिता पर जब मेरा शव लिटा दिया जाए,
तो कपाल पर प्रहार करने से किंचित मत घबराना
अपराधबोध से ग्रस्त मत होना,
कपाल मृत्यु से पूर्व भी परित्यक्त और मुक्त था,
चिता पर पड़े मेरे कपाल पर प्रहार करते हुए प्रार्थना करना
मेरा बिंदुतुल्य अस्तित्व गुदास्थान से स्खलित हो जाए।

[चार]

सिर्फ़ माँ ने स्वीकार किया
कि मेरा गुदास्थान भी मैं हूँ।
उसने धोया-पोंछा
लाल हुआ तो तेल भी लगाया
माँ ने गुदा को मेरे हृदय से कम ज़रूरी नहीं समझा,
मुझे गर्भ में रखकर,
उसने रुदन करते हुए शिशु के स्वस्थ होने की प्रार्थना की
कई बार देवता केवल उच्चारित शब्दों जितना ही वर देते हैं
माँ ने शिशु के स्वस्थ हाथ-पैर और स्वस्थ हृदय की बजाय स्वस्थ शिशु का वर माँगा,
प्रार्थना निपुण मेरी माँ ने इस प्रकार मेरे स्वस्थ गुदास्थान का वर माँग लिया।
आर्द्र भाव से उसने मुझे रोज़ नहलाया-सजाया
मेरी माँ ने मेरे हृदय और गुदास्थान में कोई भेदभाव नहीं किया।

माँ की गोद के बाहर सभी कुछ खंडित है
माँ की गोद के बाहर गुदा को अपमान ही अपमान मिला,
हृदय चाहिए गुदा नहीं चाहिए
रोशनी चाहिए अँधेरा नहीं चाहिए
सहमति चाहिए असहमति नहीं चाहिए
चुंबन चाहिए पीड़ा नहीं चाहिए

प्रेमी चाहते हैं कि प्रेमिका उन्हें अपनी माँ से अधिक प्रेम करे,
प्रेमिका भी चाहती है प्रेमी को सबसे अधिक प्रेम मिले
लेकिन गुदा को प्रेम किए बग़ैर प्रेम खंडित रहने के लिए अभिशप्त रहा।
प्रेमिकाएँ बिछती रहीं हर रोज़ पलंगों पर ख़ुशी से
पर बंद आँखों से बाट जोहती रही उन प्रेमियों की,
जो गुदास्थान को उर्फ़ उसके अँधेरों को
माँ से भी अधिक प्रेम करें।

***
अंबर पांडेय और मोनिका कुमार दोनों ही हिंदी की नई नस्ल से वाबस्ता कवि-लेखक हैं। इनके पहले कविता-संग्रह इस वर्ष ‘वाणी प्रकाशन’ से आ रहे हैं। इनसे क्रमशःammberpandey@gmail.com औरturtle.walks@gmail.com पर बात की जा सकती है। इस प्रस्तुति की फीचर इमेज ‘द गार्जियन’ से साभार।
Link is http://www.sadaneera.com/hindi-poems-of-amber-pandey-and-monika-kumar/

Tuesday, August 14, 2018

LL B Admission in Govt law College, Dewas, MP 13 August 2018



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जिस धरती पर रह रहे हैं वहाँ का कानून जानना जरूरी है अंग्रेज़ी में कहते है one must know Law of the Land
अपने कॉलेज में सन 1989 के बाद आज पुनः लौटा हूँ - आज एल एल बी में प्रवेश प्रक्रिया पूर्ण हुई और अपुन प्रथम वर्ष के नियमित छात्र बन गए
इधर कई वर्षों से लग रहा था कि पुनः विद्यार्थी बनना चाहिए ताकि विनम्र बनें रहें और सीखने सीखाने की प्रक्रिया जीवन मे अनवरत चलती रहें देवास आया तब से उधेड़बुन में था कि क्या करूँ, आखिर लॉ पढ़ने का निश्चित किया और लम्बी प्रक्रिया और बहुत सारी कागज़ी कार्यवाही करने के बाद 10 अगस्त को जब फीस भरी तो कन्फर्म हुआ
आज तीन कालांश में भी उपस्थित रहा , अब टेबल के सामने एकदम बीस इक्कीस बरस के बच्चों के साथ अटपटा लगता है, जब कक्षा ने घुसा तो सब खड़े हो गए उन्हें लगा कि माटसाब आएं और जब उनके साथ जाकर बैठा तो वे सहज हो पाए - फिर एक भेंजी और दो माटसाब ने पढ़ाया तो चुप नही रह पाया बोलता रहा, जिज्ञासाएं शांत करता रहा
अंत मे बच्चे आकर बोलें " अंकल - क्यों पढ़ रहे हो इतना , इस उम्र में भी " तो मैं जोर से हंस दिया और सबसे दोस्ती कर लौटा
B Sc, B Ed, MA - Eng Literature , MA - Rural Development, TISS Mumbai से एक विशेष पाठ्यक्रम और M Phil - Future Studies करने के बाद थोड़ी और पढ़ाई - एक दो विदेशी भाषाएं सीखने की तमन्ना है पर हमारे देवास गांव में व्यवस्था नही है
अच्छा लग रहा है एक छात्र बनकर और पहले दिन का निचोड़ यह है कि कानून मज़ेदार और शैक्षिक विषय है और इसे थोड़ा थोड़ा बचपन से हर स्तर पर समावेश कर पढ़ाना चाहिए ताकि तीन वर्षों के छह सेमिस्टर में 28 विषयों को ठूँसकर दिमाग में भरने के बजाय बचपन से ही सीखने पढ़ने और समझने का मौका मिले
एक बात और - अब उलझना मत भिया 

Sunday, August 12, 2018

Malini Gautam is Awarded with Gujrat Sahitya Academy award for 2016 for her Poetry book

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मालिनी गौतम को गुजरात साहित्य अकादमी के सन 2016 के पुरस्कार के लिए हार्दिक बधाई
डॉक्टर मालिनी गौतम झाबुआ , इंदौर, उज्जैन से अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ी है और अंग्रेज़ी साहित्य में ही पीएचडी है, इन दिनों वे गुजरात के संतरामपुर में एक महाविद्यालय में अध्यापन करती है
इसके अलावा वे देश भर में अपनी ग़ज़लों, गीत और कविताओं के लिए एक अलग पहचान बना चुकी है, एक कवि होने के साथ वे बेहतरीन इंसान और सबसे ज़्यादा अच्छी संवेदनशील दोस्त है

यह हम सबके लिए बेहद प्रसन्नता की बात है जिस कविता संग्रह [एक नदी जामुनी सी] को पुरस्कृत किया गया है उसका विमोचन देवास में Madan Kashyap और राजेश जोशी ने किया था और तभी से उनसे हमारा साहित्यिक मित्र के रूप में नया साथ जुड़ा - अन्यथा मैं और मालिनी विक्रम विवि, उज्जैन के अंग्रेज़ी विभाग के बहुत पुराने सहपाठी है , बाद में हमने कई जगहों पर काव्य गोष्ठियों में मंच साझा किए है और अभी भी साहित्यिक क्षेत्र में साथ साथ है और परस्पर ऊर्जा लेकर सीखते है, मेरी हिंदी की वर्तनी सुधारने में वो कोई मौका नही छोड़ती पर बेहद शालीनता से !!!
इन दिनों मालिनी ने गुजराती कवियों की कविताओं का हिंदी अनुवाद करके हिंदी के बड़े जगत तक इन कविताओं को पहुँचाया है जो बहुत ही बड़ा काम है, अनुवाद सिर्फ शाब्दिक नही वरन विरल और दृष्टि सम्पन्न कार्य भी है जिसके लिए भी वो बधाई की पात्र है
मालिनी को मप्र हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा भी वागीश्वरी पुरस्कार देने की घोषणा हुई है, मेरा मानना है कि पुरस्कार ज़्यादा जिम्मेदारी लाते है और इससे एक ओर जहां हौंसला बढ़ता है, प्रतिष्ठा बढ़ती हैं , प्रोत्साहन मिलता हैं - वही नया सृजन करने और नित नूतन रचने की और बड़े स्तर पर साहित्य को 'मास' तक पहुंचाने की जवाबदेही भी बढ़ती है
मालिनी निश्चित ही इस जिम्मेदारी और सृजन के लिए उपयुक्त व्यक्तित्व भी है और सक्षम अधिकारिणी भी - आशा है आने वाले समय मे वे ये सब काम बहुत खूबसूरती और रचनात्मक ढँग से करेंगीं
बहरहाल, बहुत स्नेह, दुलार और शुभकामनाएं मालिनी को
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Posts between 5 to 12 August 2018

दुख करुणा से भरा है जो हमें माँजता है
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हम सब लोग खत्म हो रहे है हर पल , हर क्षण - इसलिए अपनी बात शुष्क ढँग से कहता हूँ
जीवन तुम्हारा है इससे सबक लो और सीखो कि मौत और जीवन के बीच छोटा सा फासला है और इसी में जीवन का सार निहित है और इसी छोटे से एक पल में जीना है
मैं जो हंसता हूँ और सबसे मिलता जुलता हूँ यह भयावह अकेलापन ही है जो सबके बीच रहकर सालता है और यही माँजता भी है
निराशा अच्छी है, शरीर टूटने के बाद और बिस्तर पर लंबे समय तक पड़े रहने के बाद अपने और परायों में पहचान बहुत आसान हो जाती है और यही से मनुष्यता के मूल गुण और मूल्य भी समझ आते है, व्यवहारिक जीवन के फ़लसफ़े और भीमकाय भाषा के प्रच्छन्न मुहावरे भी पर यही से एक झीनी शुरुवात भी है
लौटना सबको होता है सारी निराशा और बहुत हतोत्साहित होकर भी पर क्या किया जाएं, भाव प्रवीण होकर या सघन अनुभूति में कुछ छोड़ा भी नही जा सकता ना
जीवन इस सबके बाद भी श्रेष्ठ है अनंतिम है और सुहाना है, हम सबको जीना ही होगा मरने तक इसलिए नही की हमें या मुझे जीना है बल्कि इसलिए कि रक्त गंगा बहनी चाहिए, वसुंधरा पर हमारे वंशज बनें रहें
ये दीगर बात है कि किन्ही निजी प्रेम प्रसंगों के चलते उससे कह दिया था कि मेरा बीज इस धरा पर नही उगेगा ताकि मेरे बाद तुम्हे याद रखने वाला कोई नही हो और यह कहानी खत्म हो जाएं पर तुम अभी शैशव काल मे हो और बहुत जल्दी जीवन का कड़वा घूंट पीना पड़ा है अस्तु निराश हो गए
मैं समझ सकता हूँ कि इस कच्ची उम्र में जब हड्डी और मज़्ज़ा का सहसम्बन्ध बना ही हो और वे टूटकर बिखर जाए लोहे की कड़ियाँ बाहर से लगानी पड़ें कष्ट देकर तो मौत का रास्ता पीड़ा झेलने से आसान नजर आता है पर यह पीड़ा और मौत भी कोई इलाज और स्थाई तो नही ना
खैर, लौट आओ सब ठीक हो जाता है, जब सभ्यता के दामन में बड़े बड़े परिवर्तन हो गए तो यह सब सामान्य है और फिर आज प्रगति तो बहुत है विज्ञान, चिकित्सा और भौतिक में तो तुम तो बेहतरीन जगह हो इस समय
हम सब राह तक रहें हैं लौट आओ जल्दी हम फिर झगड़ेंगें और जंगल की सैर करेंगे
आंखों में आँसू लेकर जीवन के लिए प्रार्थनाएँ नही की जाती, आँसू तो जीवन की उपलब्धियों और खुशी के मौकों पर सदैव अपनों के साथ बहाये जाते है, दुख अस्थाई है और जीवन शाश्वत है इसलिए अपने आँसू सम्हालकर रखों कि अभी बहुत कुछ अच्छा होना बाकी है और खुली आँखों से उन पलों का इंतज़ार करों
[तटस्थ]
( मित्र और अनुज Birendra Gautam पिछले दिनों करंट लगने से गम्भीर रूप से घायल हो गए और 15 दिनों से नागपुर में भर्ती हैं, शरीर अस्त व्यस्त हो गया है, टूट फुट गया है, पीड़ा - सन्ताप और दर्द के भयावह दौर से गुजर रहे है ; रोज की जांच, ऑपरेशन और तकलीफ ने उन्हें थोड़ा निराश किया है आज वाट्स एप पर उन्होंने इस दर्द को बयाँ किया तो मैं यह सब एकालाप की तरह लिख रहा हूँ - क्योंकि वे बहुत उम्दा काम ही नही कर रहे बल्कि आदिवासियों की आवाज को संगठित कर सशक्त तरीके से फैला रहे है, पेशे से इंजीनियर है और उमरिया जिले में काम करते है
आइये दुआ करें कि यह 27 साला युवा जल्दी ठीक होकर मैदान में आएं )

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*****
दो महान सड़कों और बनारस के पुल का जश्न अभी मना भी नही था कि आज बस्ती का पुल जमींदोज़ हो गया
काँग्रेस ने रुपया खाया पर इत्ता भयानक भ्रष्टाचार नही किया मोटा भाई , अब गुरु टेंशन ये करो कि नितिन गड़पकरी किसके नाम बेनामी रिपोर्ट लिखवाते है
खैर निहाल चन्द्र के बाद इनका तो रेल मंत्री भी रेपिस्ट निकला यार , अपने मोई जी क्या क्या देखें - साला काँग्रेस की बराबरी करते करते दम लगा दें क्या
चिंता मत करो कांवड़िए है, अंध भक्त है और फिर अडानी अम्बानी का रुपया, ईवीएम मशीन दूध देगी , चिंता मत करो सबसे बड़ा कल्लू मामा है जो बीच मे आएगा उसे शूट एट स्पॉट कर देगा कोई लोया नही - सॉरी लोचा नई होने का
भला हो आसंदी का कि कल तुम्हारे बोले और बिके शब्द रिकॉर्ड से हटाए गए - उद्योगपतियों के हाथों बिककर देश के बैंक और मुद्रा को वैसे ही बेच खाये थे 8 नवम्बर को
नेहरू, इंदिरा , राजीव, गुजराल, वीपी सिंह ने लोकसभा में इतनी छिछोरी मसखरी नही की कि उन्हें लेकर किसी को आंख दबाकर हंसना पड़ा हो, लोहिया जयप्रकाश के भाषणों पर हजारों पी एच डी इसी देश के लोगों ने की है और उनके सबके लिखें और बोलें एक एक शब्द संरक्षित है पर अफसोस तुम्हारी मसखरी अदायें और लिखें को सदन की कार्यवाही से हटाना पड़े यह अगर नही सोच रहें तो लानत है ऐसे मूर्ख बुद्धिजीवियों और समर्थकों पर जो विशुद्ध मूर्ख है
आओ, आओ 2019 खाली मैदान है , तुम भ्रष्टन के - भ्रष्ट तुम्हारे
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कल देश का संविधान जलाया गया
मुझे तो लगता है भारत रत्न से नवाज़ा जाए इन्हें
मोदी राज में कांवड़िये और संविधान जलाने वाले राज करेंगे
सुप्रीम कोर्ट पिद्दी का शोरबा बन गया है जिसके आदेशों की कोई बखत नही है
क्या है कि अब भीड़ से समझौता कर लेना चाहिए 4 वर्षों में जो तंत्र और गुंडाराज स्थापित कर लिया है उसे कैसे हटाएंगे और यही भीड़ तो ताकत है , वोट है जो किसी पहलू खान को मारती है, जुनैद को मारती है, बलात्कार का समर्थन करती है , स्थानीय अधिकारियों को काम नही करने देती, अस्पतालों में डॉक्टरों को मारती है, हाई कोर्ट में जजेस के चेम्बर में घुसकर वकीलों को मारती है, कोर्ट में छत पर चढ़कर भगवा झंडा फहरा देती है, सोशल मीडिया पर गाली गलौच करती है, धमकाती है
गुरु मजे करो, अब ये भीड़ किसी के बाप के कंट्रोल में नही आ रही क्योकि इन्हें ना नौकरी है ना काम और रोटी देने की हिम्मत सरकार की नही क्योकि सरकार खुद दीवालिया हो गई है बैंक से लेकर बाजार तक, सभी संविधानिक संस्थाओं को खोखला खुद ने किया है तो अब क्या करोगे
सन 2019 में निश्चित जीतोगे अभी तीन राज्यों में भी पर याद रखना ये ही भस्मासुर तुम्हे खा जाएंगे और तुम्हारे निशान इतिहास तो दूर वर्तमान की जमीन पर नही मिलेंगें
अब बोलो, नंगा सच स्वीकार नही करोगे
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अभी 6 अगस्त को ही लिखा था कि मप्र में भी बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं - आज के समाचार पढ़कर आहत हूँ और दुख भी हुआ कि अभी तक राज्य महिला आयोग, मानव अधिकार आयोग, राज्य बाल आयोग को स्वतः संज्ञान लेकर पूरे प्रदेश में कार्यवाही करना थी
मामाराज में आश्रय और प्रश्रय पाकर कई लोग मजे कर रहें हैं , दुर्भाग्य से सत्ता के शीर्ष एवम ताकतवर लोगों से जुड़े ये लोग अब मूक बधिर महिलाओं को नही छोड़ रहें हैं
लाड़ली लक्ष्मियों का प्रदेश, निकम्मा विपक्ष और कर्मशील भाजपा - क्या उज्ज्वल तस्वीर बनाई है प्रदेश की
इंदौर के एक निजी मेडिकल कॉलेज में दो बेटियां आत्महत्या कर लेती है क्योंकि फीस और दमन इतना ज़्यादा है कि सरकार नाम का डर नही है - गुंडे मवाली मिलीभगत से मेडिकल कॉलेज चला रहे हैं , बाकी विषयों की हालत मत पूछिए, सरकार अभी तक कुछ नहीं कर पाई है और गुंडों की हिम्मत बढ़ती जा रही है, आपके राज्य के विभिन्न बोर्ड के अध्यक्षों ने बड़े बड़े स्कूल कॉलेज खोल लिए और बी एड से लेकर तमाम डिग्रियां बेच रहे हैं
होस्टल चलाने वाले धँधा चला रहे हैं और शासकीय अनुदान ले रहें हैं, आदिवासी इलाकों में ट्रैफिकिंग के मामले उजागर है पर कोई फर्क नही पड़ता किसी को
महिला बाल विकास विभाग की मंत्री के क्षेत्र में ही वेश्यावृत्ति बहुत ज्यादा है महाराष्ट्र बॉर्डर होने से पर कोई कार्यवाही नहीं
इक्वेशन्स और विकास संवाद की एक रपट के अनुसार खजुराहो से लेकर उज्जैन में बच्चों के साथ दुराचार के मामले बहुतायत में है - कौन बोलेगा, जब खजुराहो में एक महिला साथी ने पुलिस के माध्यम से कुछ कार्यवाही करना चाही तो स्थानीय प्रशासन ने संगठित गाइड, होटलों और दलालों के बजाय सही काम करने वाले कार्यकर्ताओं को परेशान और प्रताड़ित किया
आपको लगता है कि NCRB की रिपोर्ट यूँही मप्र को महिला हिंसा में अग्रणी और सर्वश्रेष्ठ बताती है तो आपको गर्व होना चाहिए कि 2006 के मुकाबले महिला हिंसा, बलात्कार और बाकी प्रकरणों में 376 % बढ़ोतरी हुई है
जी हां - यह सुशासन है शिवराज जी का और वे सिर्फ फ्री और निशुल्क शिक्षा, महिला संरक्षण, बेटियों के लिए कानून, नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण, आदिवासी हितों और सुरक्षा की बात करते नही अघा रहें, एक पूर्व ताकतवर नेता तो बाकायदा बेटियों की खरीद फरोख्त में एक एनजीओ के साथ शामिल थे जो अब प्रदेश के बाहर संगठन में सक्रिय है, इनके पेंशन घोटाले की रिपोर्ट तो आजतक सामने आ ही नही पाई
मप्र में व्यापमं, नर्मदा यात्रा, सिंहस्थ, लिम्का बुक रेकॉर्ड के पौधारोपण, खनिज, फर्जी एनकाउंटर से लेकर भर्ती और भ्रष्टाचार, कृषि कर्मण अवार्ड 5 बार लेने के बाद भी किसान आत्महत्या में बढ़त, भावान्तर योजना के घपले, कुपोषण के मामले तो छोड़ ही दीजिये
आगर जिले की गौशाला के हिसाब भी नही गिना रहा अभी जिसका उदघाटन मोहन भागवत जी ने आपके साथ किया था - जिंदा बेटियों की सुरक्षा नही कर पा रहें तो गाय बछड़े को छोड़ ही देता हूँ फ़िलवक्त
15 साल खूब कोस लिए दिग्विजय सरकार को, काँग्रेस के 50 साला शासन को - पर एक बार आईने के सामने खड़े होकर पूछना कि 15 साल आपने क्या किया तो समझ आएगा और भोपाल के दलाल पत्रकार, चैनल्स के घटिया लोग, आपकी चाटुकारिता कर किताब के नाम पर बकवास लिखने वाले मीडियाकर्मी और भास्कर जैसे अखबार को जब समझ आएगा कि आपकी नाव डूब रही है तो वे सबसे पहले भागेंगे याद रखना हुजूर ए आला
जनता सब देख रही है राजनैतिक दलों के आकाओं और अब माकूल जवाब देने का भी समय आ गया है
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एक हिंदी के शोधार्थी ने कहा कि आप हिंदी में बहुत गलती करते हो लिखने में और व्याकरण में, बहुत सारे हिंदी के तथाकथित प्रकांड पंडित और स्वयम्भू हिंदी के फ्रस्ट्रेटेड स्कूल मास्टर उर्फ प्रोफेसरान साहब भी है जो विवि या महाविद्यालय में जा ना पाएं और "अमर घर चल" "जल भर" पढ़ाते - पढ़ाते बूढ़े हो रहे हैं - अक्सर मेरी गलतियों को गिना कर महान बनते रहते है
मैंने कहा - मातृ भाषा मराठी, शिक्षा अंग्रेज़ी साहित्य में - मालवी, निमाड़ी में बचपन के संस्कार मिलें और काम के दौरान उर्दू, भीली, गौंडी, हल्बी, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, अवधी, मैथिली, पूर्वांचल, बघेली, बुंदेलखंडी, गुजराती, आखोमिया, पंजाबी, हरियाणवी, मलयाली, तेलगु, बंगाली, फ्रेंच, जर्मनी, डच और विदर्भ से लेकर मराठवाड़ा की लोक भाषाओं में जमीनी और शैक्षिक काम करते करते 52 की उम्र हो गई - तो अब मैं क्या भूलूँ - क्या याद रखूँ
जहां तक विराम चिन्हों की बात है - विराम चिन्ह नही लगाना सायास है - गलती नही, मेरा मानना है कि भाषा मुक्त है एक नदी के प्रवाह की तरह, समुद्र की लहरों के चिंघाड़ की तरह जो गर्जना करती है और हर पल बदलती है - इसमें ना अर्ध विराम है, ना पूर्ण विराम - ना विस्मय या प्रश्नवाचकता
यह हमने ही दायरे बनाकर सब प्रपंच रचा है, और फिर सबसे बड़ी बात सम्प्रेषण की है - अगर यह सही जा रहा है तो काहे को टेंशन लेते हो, तुम लोगों को तो हिंदी के कफ़न और साये में ही या अपने कुएँ में रहकर वही जली - कटी सुननी और सुनानी है, साथ ही तुम्हारी रोटी और परिवार इसी हिंदी से चलेंगें, पर मैं तो भाषा का खिलंदड़ हूँ - मलंग और मस्ताना - मुझे शुचिता और शुद्धता से क्या
अपनी बात कहनी है - जोर से, पूरे दम से कहूँगा और यूँही गलतियाँ करता रहूंगा, जब अपने जीवन मे बंधन नही पालें तो भाषा में क्यों और आप अपनी मास्टरी अपने पास रखें , मेरी मीठी गलतियाँ ढूंढ़ने के बजाय अपने को तराशें
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यह प्रतिबद्धताओं से खिलवाड़ और वैचारिकी की हत्याओं का दौर है सुविधा के लिए ही नही बल्कि जीने के संघर्ष के लिए - क्योकि डर और खौफ़ ज्यादा हावी है - सिर्फ खुद के लिए नही, बल्कि अपने घर - परिवार और गौत्र के, कुनबे के लोगों के साथ बचे रहने के लिए
आज एक प्रतिष्ठित पत्रकार ने राज्यसभा के उप सभापति का पद ग्रहण किया और उनके मित्रों ने बहुत कुछ गुणगान किया
उनके मित्रों ने मित्र धर्म निभाते हुए आज यशगान तो कर दिया पर राजनैतिक पक्ष पर यह कहकर चुप हो गए कि यह उनका निजी मामला है
एक पब्लिक फिगर का निजीपन क्या है जबकि आप रात दो तीन बजे तक ट्रेडल प्रेस पर प्रूफ चेक करते रहें हो और घनिष्ठ रहें हो, जीवन के अनमोल पल साथ बीताएँ और फिर आज फासिस्ट वादी शक्तियों के साथ - क्यों
पर आज बोलेंगे तो टिकिट कन्फर्म कराने से लेकर बाकी सब सुविधाएं मिलने की संभावनाएं धूमिल हो जाएंगी
सिर्फ अविनाश दास ने दिलेरी से यह सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि सांसद रहते टिकिट कन्फर्म करवाएं, अमृत ने वाजिब सवाल उठाया कि जब बहुत क्रांतिकारी थे, पत्रकारिता के उच्च मानदंड स्थापित किये तो अचानक यह निर्णय क्यों
मुझे लगा कि यह सुविधाएं भकोसने से ज़्यादा बुद्धि का इस्तेमाल करने और सांझे में नही आने पर डर और खौफ़ की तलवार है ऐसे में "मिल ही जाना पड़ेगा कौरवों में" कोई कृष्ण भी नही - जो उन्हें नीति शास्त्र सीखाएं और समालोचनात्मक ढँग से जिन्हें सीखाना था उनकी तो बाँछें खिल गई है अब
अस्तु, डर ही साथ है, सत्ता है और यश है कीर्ति की पताकाएं है जीवन मे और सम्पर्क दोस्ती ही नंगा सच है
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क्या लिखूँ
कविता, कहानी, उपन्यास उतर नही रहें
आलोचना लिखो तो लोगों को दस्त लगेंगे
आलेख लायक मेहनत करने की हिम्मत नही
शोध परक लेखन का अर्थ नही
राजनिती पर लिखने से कुछ होगा नही
व्यंग्य पर धार करने से लोग भौंथरे होंगे
अकादमिक लेखन उबाऊ है 
कोई प्रोजेक्ट लिखूँ तो रुपया कौन देगा

छोड़ो यार, मजे लो भाड़ में जाये कौन 70 - 80 कहानी लिखने से नोबल मिलेगा या तीन कविता संकलन आने से बुकर
बस मजे लो, दिमाग़ी और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहो यही बहुत है जो लोग कर रहे है, लिख रहे हैं उन्हें लिखने दें - बटोरने दें यश और धन धान्य !
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कोई पता करो बे। बच्चों के लिए काम करने का दावा कर नोबल पाने वाले कैलाश सत्यार्थी ज़िंदा हैं या टपक गए? दर्जनों बच्चियों का बलात्कार, कुछ की हत्या या बहुतों का लापता होना इसी देश में हुआ है।
मैंने कहा उसे कोई अनुदान या बड़ा पुरस्कार देने की बात करो तो दलाली करने का बड़ा प्रोजेक्ट सबमिट करेगा
एकदम फर्जी आदमी है और घोर चापलूस
बच्चों के लिए काम करने वाली और देश मे बच्चों के अधिकारों के लिए बड़े फंड देने वाली संस्थाएं जैसे Unicef, Save the Children, terres de home, Aide et Action, Action Aid, Equations, Ford Foundation से लेकर राज्यों के विभाग क्या कर रहे है इस पर भी सवाल है
कितनी संस्थाओं ने क्या किया या सोशल आडिट की प्रक्रिया में स्व पहल की है, दुर्भाग्य है कि कुछ एनजीओ ही इस घृणित कार्य मे संलग्न है
कल एक वरिष्ठ साथी ने बताया कि भोपाल के एक बड़े संस्थान जिसके नाम मे ही बचपन झलकता है, के एक कर्मचारी को तीन साल की सजा हुई एक पुराने प्रकरण में और इस कर्मचारी को बचाने के लिए भोपाल के एनजीओ कर्मी लग गए थे - किससे कहें कि पांव के काँटे निकाल दें
ऐसे में कैलाश सत्यार्थी से आप क्या उम्मीद करेंगे वह तो खुद एक बड़ी दुकान चला रहा है और हजारों का स्टाफ लेकर उनके पेट पाल रहा है
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भला हुआ जो मेरी गगरी फूटी
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6 अगस्त को 3-4 वाट्स एप समूहों के बारे में थोड़ा यथार्थ और तीखा लिखा था, कल तीन समूहों में निशाना एकदम सही लगा और इन साहित्यिक लोकतांत्रिक पुरोधाओं ने देर रात मुक्ति दी, मेरा आज इन तीन समूहों से मुक्त होने का स्वतंत्रता दिवस है
दिन भर आतंकित करने वाले और चिल्लपों मचाने वाले 3 समूहों से मुक्ति मिल गई अपने आप
नकल - चोरी चकारी और वेब पोर्टल से माल उठाकर महान बनने वालों को समझ आ गया कि यह "कंट्रोल कॉपी पेस्ट एक्सपर्ट" का खेल समूह में किसी को समझ आता है, अँधे नही है लोग, आपके फुर्सत में होने से और नेट से सीधा सीधा माल उठाकर अपना नाम अंत मे चैंपने की प्रवृत्ति से कोई तो वाकिफ है, हर कोई इतना बावला नही कि चोरी के माल को ग्रुप में पेलने के लिए आपको नोबल लॉरियट मान लें
जब देश में, समाज में चहूँ ओर सब कुछ इतना भयावह हो रहा हो तो आप एक 100 साल पुरानी रचना जो कालजयी है पर अपना दिवालिया दिमाग लगाकर कुतर्क कर उसे घटिया साबित कर रहे है या फिल्मों पर बात कर अपनी फैंटेसी बुन रहे है और रो रहे कि हीरो हीरोइन नही बन पायें
रिटायर्ड, खब्ती, घर बैठे या ऐसा काम कर रहे जिसमे समय ही समय हो और सारा दिन बैठकर तर्क गढ़ते रहें और अन्य को नीचा दिखाने की कोशिश करते रहें यही वाट्सएप का उद्देश्य है
और आखिर कुंठा की हद है - कल दोपहर, शाम और रात में तीनों समूहों के प्रशासकों ने अपुन को मुक्ति दे दी - बोला था ना जिन्हें वक्त ने कुछ नही दिया उन्हें वाट्सएप ने प्रशासक बना दिया तो कुंठा तो निकलेगी ही गुरु, एकदम प्रशासकीय अंदाज में
☺️☺️☺️ जो सहा वो किया, जो झेला वह रिफ्लेक्ट हुआ और जो ना कर पाएं वो वहां किया
गीता सार याद है ना -
* ना मैं तुम्हारे पास आया था कि जोड़ो ना मैंने कहा कि हटाओ
* ना मुझे कुछ फायदा हुआ उस समूह के चूतियापे से
* ना मेरा कुछ बिगड़ेगा उस घटियापन में ना रहकर
* ना मेरा लेखन बिगड़ा, ना सुधरा
* ना कही छपा ना रिजेक्ट हुआ तुमसे जुड़कर
* ना तुम्हारी सिफारिश की जरूरत है ना करूँगा
* ना तुम्हारी बखिया उधेड़ महिला कामरेड्स में रुचि है ना उनका लिखा रसोई घर का आख्यान पढ़ने की तमन्ना
* तुम्हारी उबाऊ कविता, कहानी और कुंठित आलोचनाएं पढ़ने से जरूर वंचित रहूँगा पर मरते समय वेदना ना होगी
जब देश मे स्थिति अराजक हो रही हो और आप अश्लीलता की हद तक एक ही घटिया कविता - कहानी या आलेख पर दो तीन - दिन बहस करें तो दिवालियेपन की क्या बात करें - ऊपर से जिज्जी की साड़ी, नाती की शादी और घर परिवार के लोग और उबाऊ कचरा साहित्य है तो आपको ही मुबारक हो देवताओं खैर,
साहित्य समाज का वह कुंआ है जिसमें आप लोग डुबकी लगाकर अपनी कालिख रोज पोछते है और समूह वो सफलता पाने की वो ओछी सीढ़ी है जिसमे रच बसकर आप सफलता के शार्ट कट ढूंढ़ते है
बहरहाल, मौज मनाइए कि एक दृष्ट दुराचारी और प्रखर निंदक को आपने हिम्मत दिखाकर बाहर किया और अब खूब ठिठोली करिये
किसी को नाम जानने में रुचि हो तो बताईयेगा सार्वजनिक करूँगा पोस्ट्स और ठिठोली के स्क्रीन शॉट्स के उदाहरण सहित
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1987 की बात है हम लोग एक बड़े कार्यक्रम में तत्कालीन राष्ट्रपति जी से पुरस्कार लेकर लौट रहे थे ट्रेन में, मद्रास रेलवे स्टेशन पर पहुंचे तो पता चला कि एम जी रामचंद्रन की मृत्यु हो गई है, हमें क्या फर्क पड़ना था। ट्रेन में बैठ गए लौटना तो था ही, पर फर्क तब पड़ा जब रास्ते भर सिर मुंडे हुए लोगों की भीड़ देखी और चंद्रपुर आने तक कुछ भी खाने को नही मिला
एन टी आर की मृत्यु के समय भी खम्मम और वारंगल से लौट रहा था जब उनकी तबियत ज़्यादा खराब होने की सूचना मिली तो खूब सारा खाने को रख लिया और तीन चार बोतल पानी भी कि ट्रेन में दिक्कत ना हो
जय ललिता की मृत्यु के समय त्रिची और सत्य मंगलम यानी वीरप्पन के जंगलों से लौट रहा था और करोड़ो लोगों का विलाप देखा था - स्त्री और पुरुषों के सिर मुंडे हुए और अखबारों में आत्महत्या की खबरें पढ़ी थी जो भयावह था
वाय एस आर रेड्डी के निधन पर आंध्र में यही हाल था
आज सुबह से करुणा निधि के लिए कावेरी अस्पताल के बाहर भीड़ और उनकी तस्वीरें खरीदते लोगों का हुजूम भी देखा और अब उनकी मौत पर विलाप के दृश्य देख रहा हूँ
यह हमारे देश का दक्षिण भारत ही है - जहां शिवाजी गणेशन, कमल हसन या रजनीकांत या मामूटी को सम्मान भी मिलता है और उनकी बातें भी सुनी जाती है
मुझे याद नही पड़ता कि उत्तर भारत मे महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी या राजीव लोचन नयन गांधी की मृत्यु के बाद जन सैलाब नही देखा और अब सोचता हूँ कि क्या कोई आज की तारीख में कोई नेता मर जाये तो क्या कोई भी तुर्रे खां ऐसी शानदार भीड़ जुटा पायेगा, लोग सिर मुंडाने को तैयार होंगे या आत्महत्या को
थोड़ा तंज लग सकता है आपको पर एक बार मौजूदा चेहरों पर नजर दौडाईयेगा - कश्मीर से होते दिल्ली, उप्र, बिहार, झारखंड, छग, मप्र, उड़ीसा, महाराष्ट्र, प बंगाल, असम, उत्तर पूर्व के राज्य या गोवा गुजरात तो समझ बनें मेरी भी कि जनता का "जननेता" क्या और कैसा होना चाहिए
दक्षिण के चार पाँच उदाहरण मेरे लिए तो नजीर है , उनकी मृत्यु और बीमारी लोकप्रियता का पैमाना भी - आप बताईये कि आपका क्या पैमाना है
बहरहाल करुणानिधि जी को नमन
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तृतीय या चतुर्थ श्रेणी की मानसिकता वाले विशुद्ध कर्मचारी किस्म के लोग अच्छा प्रबंधन, बाबूगिरी या एकाउंट्स तो कर सकते है पर संस्थानों को दिशा या दृष्टि नही दे सकते ना ही किसी प्रकाशन को आगे ले जा सकते है
दुर्भाग्य से मीडिया हाउसेस , पत्रिकाओं, बड़े मुनाफाखोर स्कूलों या एनजीओ में आजकल ऐसे ही लोगों का बोलबाला है जो सबसे बड़े पदों पर बैठे है और ये ही लोग करोड़ों रुपया बगैर रीढ़ दिखाएँ कमा रहें है साथ काम करने वाले भी बोलते नहीं - क्योकि घर परिवार और बीबी बच्चे पल रहें है तो बोलने का जोखिम कौन लें
ऊपर से ये नौकरी नही करते नौकरी से मक्कारी कर यहां वहां मुंह काला करके दूसरे के हक मारने के लिए सदैव तैयार रहते है और बाकी तो आत्ममुग्धता से तो ग्रसित है ही जो ज़मीर बेच चुके है
इसलिए देश में जो माहौल है उसके लिए अकेली सरकार जिम्मेदार नही है हम सब जवाबदेह है इस स्थिति के लिए...
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फिर भी पूछ लो थोड़ी नैतिकता बाकी हो या गेहूं की रोटी खाते हो.............कि लेख छाप पाएंगे या नही !!!
[एक सहायक सम्पादक को अभी पूछा जब लेख के बारे में कोई सूचना नही मिल रही, तो उस भले आदमी ने कहा कि सम्पादक के टेबल पर है लेख और वो अभी कुछ कहने की स्थिति में नही है - तो मैंने कहा उपरोक्त ]
यही हालत भास्कर प्रायोजित और अब इंदौर से प्रकाशित 'अहा जिंदगी' की है सम्पादिका महोदया नवम्बर 2017 से कविताओं पर बैठी है और अशिष्ट इतनी कि चार बार मेल लिखने पर भी जवाब देना नही है
"दो कौड़ी के चोरी चकारी से कॉपी पेस्ट करने वाले लोग जवाब नही देते और अग्रवालों ओसवालों या जायसवालों से लेकर चौथी फेल लोगों की चाटुकारिता में लगे रहकर अपनी नौकरी बचाते रहते है तो अखबार - पत्रिका का मरण जल्दी हो जाता है या वो सिर्फ बस स्टैंड पर बिकने वाली पत्रिका बनकर रह जाती है" - यह बात इसी पत्रिका के पहले सम्पादक और मित्र यशवंत व्यास ने बहुत साल पहले मुझे जयपुर में इसी पत्रिका के दफ्तर में कही थी - तब हममें से किसी को अंदाज नही था कि इतने नीचे गिर जाएगा इसका स्तर और गेहूं की जगह गोबर भूसा खाने वाले सम्पादक बन जाएंगे
पापड़ बड़ी अचार और पति को रिझाये जैसे आलेखों से मधुरीमा निकालने वाले साहित्य के सम्पादक बन जाये तो यही होगा ना
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दैनिक भास्कर कितने और लोगों की फर्जी रिपोर्ट बनवायेगा
पतित हो गया है , एकदम फर्जी , घोर चाटुकार और सत्ता का दलाल कि राष्ट्रीय प्रतीक पर शिवराज, कमलनाथ और सिंधिया का फोटो चेंप दिया इससे ज्यादा अक्ल की कमी का सबुत होगा कोई, इस पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा नहीं बनता क्या
और इस सबकी जरूरत क्या है, किस डाक्टर ने लिखकर दिया कि चापलूसी इतनी करो कि मोदी / शिवराज को लेकर हर दो माह में नकली और Fabricated सर्वे छापते रहो
दिमागी दिवालिया हो गया है भास्कर
अफसोस कि वहां अभी भी कुछ समझदार है पर वे भी भेड़ बन गए
एक अखबार का क्या काम होना चाहिए जब कोई अखबार यह भूल जाये तो उसका बहिष्कार ही मत करो - वहां के लोगों को सड़कों पर बुलाकर उनकी औकात दिखाओ और मालिकों का हुक्का पानी बन्द कर दो
बुद्धिजीविता के नाम पर चोरी चकारी से रचना कर्म में संलग्न, चरित्रहीन, आत्महत्या तक करने को आतुर,पाँच करोड़ तक देने को तैयार, पीत पत्रकारिता के शिखर जब अखबारों में बैठते है तो किसी भी अखबार को दो कौड़ी का होने में और इस हद तक गिरने में कोई समय नही लगता
यह समय बहुत सम्हलकर न्यूज आईटम, प्रायोजित खबरों और बिके हुए मीडिया के दलालों का है जो रुपये , नाम और यश के लिए सब कर रहे है
हकाले गए पत्रकार घटिया किताबें लिखकर आत्ममुग्ध हो रहे है, पुरस्कार बटोर रहें है , किताबों की गिनती कर रहें है कि आज कितनी बिकी, कुछ अपनी पुरानी सड़ी गली, भूत प्रेत की सदियों पुरानी फेब्रिकेटेड और उलजुलूल तरीकों से बनाई गई कहानियां छापने को बेताब है - जिनका कोई सन्दर्भ नही है और बाकी पत्रकारिता का मुलम्मा चढ़ाकर अपने को बेचने पूरी नंगई और बेशर्मी से बाजार में खड़े होकर भयानक आत्म मुग्ध हो गए है जिसका अब कोई इलाज नही है
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* 60 - 70 साल पुरानी कहानी
* 100 साल पुरानी विदेशी भाषा का चोरी किया अनुवाद
* अपनी या अपनों में से किसी की लिखी कहानी कविता या लेख उठा लो
और थोड़ा सजा धजा के उसे वाट्स एप पर पेल दो और 100 - 120 लोगों के मत्थे उंडेल दो सुबह सुबह
फिर दिन भर ज्ञान की बातें सुनो और सारे ज्ञानी धे ज्ञान पे ज्ञान पेलेंगे और कोई इधर उधर हुआ या विषय से अलग हुआ तो तीन चार प्रशासक किस्म के मुस्टंडे डांटेंगे और कहेंगे कि कहानी, कविता या इस चम्पू के लेख पर ही बात करो और ऐसी बहस, ऐसे तर्क कुतर्क कि पूछो ही मत - भोपाल की भाषा मे बोलूं तो "कोई खान पतला नी मूत रिया"
शाम से रात होते - होते विशुद्ध ठिलवई करो महिला हो या पुरुष अश्लीलता की हद तक और फिर चुप्पी - सुबह उठकर फिर नया माल मसाला और चोरी चकारी का माल
सब बेहद अनुशासन से, बारी बारी से तीन चार लोग ठेठ तानाशाही का दायित्व निभाते हुए कचरा लाएंगे , और तो और लोकतंत्र के नाम पर एक दिन छुट्टे लोगों को अपनी भड़ास पेलने के लिए छूट वो भी कहने को - ये मुस्टंडे उँगलबाज वहां भी सक्रिय रहेंगे
"तू मेरा चाँद मैं तेरी चांदनी" टाईप वाली चापलूसी और हर कोई जिसे कोई काम नही और बड़ी बेशर्मी से घर की बर्तनवाली से लेकर बच्चों के होमवर्क और मेहमानों के आने - जाने के जिक्र होते हुए भी 100 साल पुरानी गैर प्रासंगिक कहानी - कविता पर जो लोग चुतियापा बरसों से कर रहे हो - उसे भी वाट्स एप विवि का ज्ञान ही कहते है
वाट्स एप विवि पर सिर्फ राजनीति या मीडिया की मूर्खताएं ही उज़ागर नही होती - बड़े बड़े बल्लम और उलुकराज, गधत्व में शोध की डिग्री लिए कुपढ़ बैठे है और आप कुछ बोलोगे तो एकाध डेढ़ अक्कल फेसबुक पर आकर आपको रायता दे जाएगा कि क्यों बोलते हो - कम ही तो लोग है जो सार्थक कर रहें है और यह कहकर कान कटा कर बड़ी बुद्धि की जात में शामिल हो जाएगा जो रुपयों के लिए किसी भी जगह बैठकर विष्ठापान कर सकते है
इन चूतियों पर भी प्रतिबंध लगाओ जो ग्रुप बनाकर रोज अरबों टन गोबर करके उसे ही पगुराते रहते है वर्षों तक
और सबसे मज़ेदार ये हिंदी साहित्य के झंडा बरदार है जो साहित्य को बेचकर सत्यानाश कर रहे है, यदि अपराध बोध देखना हो तो इनके एडमिनस को देखिए जो जीवन मे कुछ नही कर पाएं पर समूहों के एडमिन बनकर हिटलर को मात दे रहे है
है आप किसी साहित्यिक समूह में या जुड़वा दूं
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जिस अंदाज में अपने अमित भिया शाह की सक्रियता इन दिनों बढ़ी है और वो मंत्रियों के बजाय हर मुद्दे पर अपना ज्ञान, वक्तव्य और लगभग निर्णयात्मक तल्ख स्वरों में लोकसभा और राज्यसभा में बोलने लगे है वह दर्शाता है कि मोई जी के पीछे सिर्फ अम्बानी नही - अडानी नही अपने जन - जन के लाड़ले अमित भिया भी है
और अपुन लोग फ़ालतू में ईच मनमोहन सिंह को के रिये थे कि सोनिया आंटी और राहुल बाबा की कठपुतली हेगी.........
अमित भिया भोत सई , खूब बोलो, राजनाथ, पियूष गोयल , सुषमा भैनजी , नितिन गप्प्करी और मोई जी की जरूरत कोई नी हेगी सदन में
वैसे भी शर्म की बात है कि देश में जेटली के बीमार पड़ने के बाद कोई इस्थाई वित्त मंत्री नी है और अब समझ आ रिया है कि वो काम भी आप कर रिये हो, बैंक बचाएं - पांच हजार करोड़ फिर इकठ्ठा कर लिए फिर अब किसको भगवा रिये हो
कित्ता काम करते हो यार इन सब के बदले और इन कमजर्फ और मक्कारों से तनख्वाह लेते हो कि नई ? और आजकल कोर्ट कचहरी के फैसले लिखने के लिए कोई रखा कि नई , नी तो तीन चार फुरसतिये वकील मेरे दोस्त हेंगे भेज दूं............एकदम "रंग दें तू मोहे गेरुवा" वाले हेंगे ---
सई भी है नी अब मोई जी तो बिदेस घूमते रहते हेंगे देस में कोई तो मर्द चईये कि नी चईये..............
बोलो बोलो बोलो ..............
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अक्सर किसी का परिचय देते हुए कहता हूँ यदि कोई साथ हो और कोई अन्य पुरुष पूछ लें कि ये कौन तो-
* परिचित है पुराना या नया
* प्रसिद्ध कवि, कहानीकार, आलोचक है
* मास्टर, डाक्टर, वकील, प्रोफेशनल या एनजीओ कर्मी है
* पत्रकार है , दलाल है, अधिकारी है या ब्रोकर है
* भाई है , रिश्तेदार है या मुहल्ले वाला है
* साथ पढ़ा है या चाकरी साथ करता था
* चोर है, लफ़्फ़ाज़ी करता है, कॉपी पेस्ट एक्सपर्ट है
* आत्म मुग्ध है, बुद्धिजीवी है या बड़े पद पर है कहीं
*आत्मग्लानि या अपराध बोध का शिकार है
*महत्वकांक्षी या काँधे पर चढ़ कान में ... वाला है
आज तक बहुत ही कम लोगों के बारे में कहा कि
" मेरा दोस्त है " और ये ही मेरी निज कमाई और उपलब्धि है कम्बख़्त
[ बस जीवन मे लोगों को बहुत बारीकी से पकड़ना और पहचानने का हुनर सीखा है और इसे गंवाना नही चाहता ]

Tuesday, August 7, 2018

Fighting with Malnutrition is almost like a Crusade- A Case of Efforts in Tribal belt of MP - A Case of Vikas samvad 7 August 2018

Fighting with Malnutrition is almost like a Crusade- A Case of Efforts in 
Tribal belt of MP 

Vikas Samvad is working in 100 villages of 4 tribal districts of MP where in they are putting up efforts with the help of community participation at a large to come out from the grab of Malnutrition. Here are the three cases which shows the reality of ground level efforts and results. 

Varity Food brought change and no child is severely malnourished.

Village Tummaadar falls under Mali panchayat of Karkeli block of Umariya. Umariya is predominantly a tribal district and known for its mines. Livelihood, malnutrition and migration are major problems and since the villages are situated on hilly areas drinking water scarcity is a permanent problem. Children are biggest sufferers of this multiple and complex problems.
Dastak team when started they did baseline surveys which were shocking in this village too. When the team started growth monitoring in June 2016, 11 children were SAM and 38 were MAM, also rest were weighing low. When in Dec 2017 they did growth monitoring, surprisingly there was no SAM child among 48 children. Only 30 children were found MAM and 15 weighing low which was quite satisfactory.
This was indeed a miracle which took place after many efforts at a large. The team was talking to community regularly, monitoring aanganwadis, services and their food at homes that what was being given by families. Most important was Dialogue on Nutrition during the Dastak yatra, during the yatra a training was organized where in 34 women, 13 men, 8 adolescent girls and 67 children were present. The team made clear about the issues related to nutrition. Also, in addition, talked about food intake they should take on regular basis. The major emphasis was on vegetables, millets and variety of foods in daily meals. They should be incorporate locally available fruits like papaya, guava, blackberry etc in order to get micronutrients in food.  Also variety of cereals will enhance the nutrients in body. Children need special care and also hygiene, safe drinking water should be given. Every family promised that they will take care of such measures and follow it up in their routine life. Aangawwadis were also asked to pay attention on variety of meals.
The aanganwadi worker Sundari bai says I was so busy in administrative works that I was unable to pay attention also no body explained us about the food in such a simple language. Departmental trainings are often about paper work and we cannot do much there. Now after her understanding she also explains to pregnant and lactating women about nutrition and food habits, she advises not to feed anything to six months old child except breast feeding. After six months people have started sift meal to children, immunization takes place on regular basis. Women are putting spoon oil extra in meal.  Most of the adolescent girls help workers in weighing and monitoring children in village.
The most important thing is continuous dialogue with women and community brought the change, the team feels that this regular interaction enhances understanding of issues and help people to take care of their wards.

Effective Planning and Dialogue made Life Easy of Rekha and Vimala

Deep Chandra Singh is staying with his family in village Tummadar of Karkeli block Umariya. He owns 11 acre land but out of 11 acre 5 acre has turn into baron land as there is no produce on this land. He sows Kodo kutki (millet) in 7 acre and hardly gets some crop. Since he owns land so his name is also not listed in BPL list, he hardly gets grains from his baron land which suffices purpose of only six months. Remaining six months he and his wife work in nearby villages.  In spite of working it becomes difficult to run the family. In between they planned a child and after confirmation his wife Vimala, conceived her regular check was done at aanganwadi.
On 19 September 2017, ANM Sawitri Singh checked his wife and found that her hemoglobin is very low it was just 8.6, she informed aanganwadi worker and the worker advised her to eat Mung and green leafy vegetables regularly. ANM also said that in such case she is at danger and during the full term may face severe problems.
Dastak team came to know about the problem of Deepchandra’s wife, immediately the team rushed to his house and talked to her. First the team understood the situation, her income, food habits and registration as pregnant woman on aanganwadi. Then the team explained her nutrition and why e should eat more and take rest adequately. She was eating food on regular basis but intake was of only rice and dal, no added vegetables or any other supplement. In addition, she was not getting rest hence would get tired often. When asked she said vegetables are available only in Monsoon season as they grow little in kitchen garden. She needs to bring water from remote source, also use to work in agriculture land so getting rest is difficult. The team contacted Dr Deepak Dwivedi of Primary health Center Karkeli and made his visit to her home. With the help of aanganwadi worker, ANM and ASHA she was checked on regular interval and given iron Folic Acid tablets course and injection of iron as well. 
Vimla faced labour pains on 2nd Feb 2018 and with the help of ASHA and Janani Transport, she was taken to primary health center Nigahari, she was blessed with a baby girl on 4th Feb 2018. Baby was too weak and weighs only 1.250 Kg, soon after birth the baby was referred to district hospital Umariya. The baby was kept in SNCU immediately and looked after. The baby was called Rekha bai , after 8 days of treatment she was discharged and her weight was 1.26 Kg. Her family had assumed that Rekha will not survive as she was too weak, yell and pale but due to hard efforts of Dastak team members, ANM, ASHA and Aangawnadi worker prepared a strategy in such a way that neither Vimla nor Rekha should any problem. ASHA would go to see daily and visited her home. They will take care of hygiene and regular immunization etc will be on time. This is how the child is safe and happy now. Rekha is trying to come out of malnourished status. She was given massage of Mahamas oil and special Kheer - an innovative initiative of Vikas samvad team for malnourished children in 100 villages.  Today after 4 months Rekha is 3 Kg and 52 CM long.

The Dream Come true after 70 yeas

Ovari is an abundant village which has no facilities at all, the village came in light before two years when 4 children died due to malnutrition and Vikas Samvad  team visited and made a presentation to District Magistrate, Rewa. Immediately visits were made by senior officials and certain actions were taken. DM also declared that the village will be electrified soon and an approach road will be constructed under PM Road scheme.
Ovari falls under Bounsad Panchayat of Jawa block, Rewa district of MP. Since independence the village was facing problems and one of the major was electricity due to which they were not able to do any work for decades. In lieu agriculture was affected badly hence problems related to livelihoods were major. Ovari is surrounded by hills and it’s really difficult to access the village. The village is 60 KM away from block Head quarter, its 8 KM from main road of Hardoli , the road is very dangerous and go along with a river. One can see dense forest across and because of this people are always in danger. Rewa‘s this block is one of the blocks which faces dacoit and dacoity is often held. In 2017 two persons of villages were kidnapped by local dacoits and only after getting money they released them. Hence girls and children are always vulnerable.
It’s a small village consisting 105 families with a population of 599. Children aging 0 to 5 are 92. Yadav, tribes like Khairwar, Koul lives in village. Main livelihood source of villagers is minor forest products which they get from Forest and sell them to big villages in weekly bazaars in the vicinity. MFPs like honey, Char, Anwala, Mahua, Tendu, Dry wood, mushroom and other forest products. Some of the villagers have their own land but they are able to take only one crop as they are completely banking upon Monsoon season, non availability of electricity does not allow they to take second crop of Kharif. 
Mostly they grow Rabi crops like cereals, millets and oil seeds but agains it’s a gamble, if monsoon is up to the mark they get adequate, else they are bound to leave their village for labour and move away. Most of the youngsters go on migration and shaker garh is the destination where in they dig the hill and earns money. Shankar garh is a hill where mineral digging is a work which goes on round the year. Some go to Surat, Mumbai and Ahmadabad for cotton industry work and Sari Industry. Some also get jobs in flour industry in Gujrat. The persons who are left and cannot go so far, go to 15-20 KM every day for daily work and earn petty amount. Some get jobs under MNREGA in village or panchayat.
Since there was no electricity since independence they would face many problems. When Vikas Samvad entered in village with the support from TDH, so many problems were listed and after talking to community the major concerns were drinking water, access road and electricity. With the help of Dastak team people wrote letters to DM and local MLA. In spite of repeated requests no action was taken by district administration even after 6 months. The youth club wrote, met officials and concerned departments but all in vain.
In March 2016 4 children died out of malnutrition, a team of vikas samvad visited and made a detailed report and described all the factors responsible for such negligence, the report was submitted to DM as well as Chief Secretary Govt of MP. A campaign for advocacy was also done in local and state media. The villagers and youth met DM in his office and also went to public hearing which is held on every Tuesday in the state. Still no action and things were pending in offices. It was a sad back but the team did not give up. Dastak yatra was organized in all 100 villages of project area, the Dastak team along with villagers and youth club members went back to DM office and followed it up, applied and kept reviewing the action. In January 2018 Electricity department started to put down polls in village and after toil of all, March 2018 witnessed the first Bulb of happiness in village. It took 70 odd years to get the simplest thing in a remote village.
Mohan Kumar says “we all are very happy after this step, now children can study in nights, we are not afraid of dacoits, and this will also help in irrigation”.
Access road is still a big and major issue for which people are fighting, applying and following with district administration. PM Road scheme is sanctioned for the village but it’s not on road and far from reality. The youths say “as we get electricity, soon we will get road and then we will be also in Developed Village” Entire Dastak team and local community owns the credit of this mammoth task which was completed after many efforts.

Sandip Naik