Thursday, July 28, 2011

प्रशासन पुराण १५

पुरे प्रशिक्षण की गंभीरता को इस बात से समझा जा सकता है कि गणित के हिसाब से सारे अधिकारी लगभग ६५% समय तक अपने मोबाइल पर बात कर रहे थे जबकि उच्चाधिकारी बार बार निवेदन कर रहे थे कि सब अपने मोबाइल वाइब्रेशन पर रख दे कुल मिलाकर मजा आ रहा था बड़े बूढ़े "धूम मचा दे से लेकर सेनोरिटा" जैसी धुन लगाए हुए थे, सीखना बदस्तूर जारी था और बीच में उठती संगीत की स्वर लहरिया पूरे वातावरण को मदहोश बना रही थी और योजना पर समुदाय को इन्वोल्व कर जिले को श्रेष्ठ बनाने का काम जारी था( प्रशासन पुराण १५ )

प्रशासन पुराण १४

उम्र की ढलान पर शक्कर रक्तचाप और किडनी की बीमारी से ग्रसित वो सिर्फ अपने रूतबे से अधिकारी था जब यहाँ राजधानी में आता तो सारी जांचे करवा कर लौटता था हर बार उसे कहा जाता कि बस अब छोड़ दे और भजन पूजन करे पर मासिक तनख्वाह, ३-४ लाख की आमदनी फ़िर गाड़ी घोड़ा, हर बार वो सोचता पर फ़िर बिफर जाता एक जतन और कहकर खींचता रहता काम होता नहीं बस सरकारी था तो सब धक् रहा था बस डीएम के सेट करना होता था (प्रशासन पुराण १४)

प्रशासन पुराण १३

इन दिनों देश में प्रशासन के कई बड़े अधिकारी इस्तीफा देकर समाजसेवा में लग गए है, बीस साल बाद जब पेंशन और ग्रेज्युटी का जुगाड हो गया तो यकायक समाजे के प्रति आस्था जाग गयी और वो सब एनजीओ के कंसल्टेंट बन गए अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के दल्ले क्योकि सरकार में रहकर नियम कायदे जानते थे जिस आदमी से घिन करते थे उसे गले लगाकर वो अब अपने प्रोडक्ट और वेबसाईट की मार्केटिंग करते नजर आते है देश सुधर रहा है ये सब मलाई का मतलब अच्छे से जानते है(प्रशासन पुराण १३)

प्रशासन पुराण १२

यह राज्य की एक बड़ी कार्यशाला थी जहां सभी जिलो की योजना बनाने पर सिखाया जाना था प्रदेश की राजधानी में जिलो के सबसे बड़े अधिकारी मौजूद थे, दूर से प्रशिक्षक आये हुए थे कुल मिलाकर महँगा सौदा था, पर हाल में नींद ने अपना साम्राज्य पसार दिया था, बूढ़े और लाचार कंप्यूटर से अनभिग्य, अंगरेजी में लूले, हाल के एसी में बैठकर नींद आना स्वाभाविक था बस सब हो रहा था सिर्फ योजना की बातें ऊपर से उड़ रही थी और सबसे बड़ी खीज यह थी कि साला लोगो के समुदायों को इस सबमे इन्वोल्व करना था अब इतने बड़े अधिकारी और दो कौड़ी के लोगो के पास जाकर चिरौरी करे सत्यानाश हो इन पैरवीकारो का (प्रशासन पुराण १२)

Monday, July 25, 2011

प्रशासन पुराण ११

she was a voluptuous woman and use to work with office of Government but every one used to look at her with a lust and she would use this opportunity to do her own work in premises as she knew that she was the Woman and very fluent in English and except her no one was aware of this Language and every one was banking upon her for all works and I-Net. She is close to each heart from lowest to highest person in the system. (प्रशासन पुराण ११)

प्रशासन पुराण १०

दफ्तर के फोन से सारे दिन बड़े आधिकारियों की जी हुजूरी करता फ़िर पेपर और फ़िर सबके टेबल पर काम ना करने के नुस्खे बताता और फ़िर अपने इअर फोन से रेडियो मिर्ची के गाने सुनता फ़िर तीन चार बार चाय एक राउंड नीचे के दफ्तरों में हो आता बस वो एक ही काम में माहिर था पेंशन प्रकरण बनाने में उसका कोइ सानी नहीं था और उसके वो १० प्रतिशत के हिसाब से लेता था बस काम के नाम पर यही करता था और सब उससे बुढापे के बाद की चिंता से डरते थे(प्रशासन पुराण १०)

प्रशासन पुराण ९

अजीब सी मक्कारी थी उसके खून में, वो जब भी मुस्कुराता था तो एक शैतानी उसके चेहरे पर चमक जाती थी और फ़िर वो किसी को निलंबित किये बिना मानता नहीं था, उसे लगता था कि बाद नियंत्रण हो राशन की दूकान परिवहन हो या मत्स्य अधिकारी सबको वो एक ही घेरे में लेकर एक लाठी से हांकता था और फ़िर बाद में वसूली एजेंट अपना जाल बिछाते और सब सुलट जाता वो बस एक ही बात से डरता था शहर के पुराने गणेश मंदिर में नित्य बुधवार को जाकर लड्डू चढ़ा देता(प्रशासन पुराण ९)

प्रशासन पुराण ८

उसे लगता था कि वो सबको डाट फटकार के सब सुधार देगा पर ये निठल्लो की फौज थी जो बरसो से जिले में डटी थी और इनके चलते ना सफाई होती ना जनता के काम सब कमाने में लगे थे और शहर की कमान एक टाकीज, दारू के ठेके, रिसार्ट और बार चलाने वाले के हवाले थी. सारे कर्मचारी और दलाल इस परिवारों के भडवे थे और इस तरह से ये शहर प्रशासन के नाम पर मुखिया का जिला कहलाता था सो कोइ हाथ नहीं डालता था किसी काम में, नामर्द और निरापदो का प्रशासन(प्रशासन पुराण ८)

प्रशासन पुराण ७

यह देश के स्वतन्त्रता दिवस के पूर्वे तैय्यारी बैठक थी जिले के अधिकारी जमा थे और अब यह गुपचुप चर्चा हो रही थी कि किसको क्या प्रोग्राम मिलेगा, जैसे जैसे जिलाधीश ने कार्यक्रमों का दायित्व बांटा वैसे ही हंसी और गम दोनों हाल में पसर गए, आखिर बड़े माल वाल काम दूसरों को मिला था और कुछ को तो सिर्फ साले बूढ़े स्वतन्त्रता सेनानियों को घर से लाने ले जाने का और कुछ को शहीदों की विधवाओं को लाने का, साला मजा ही किरकिरा हो गया.(प्रशासन पुराण ७)

Thursday, July 21, 2011

जिंदगी ना मिलेगी दोबारा

जिंदगी ना मिलेगी दोबारा एक बेहद उम्दा फिल्म है जो ३ इडियट्स का विस्तार है जहां वे जीवन की शिक्षा और करियर की बात करते है यहाँ ये तीन दोस्त जिंदगी में सेटल होने की जद्दोजहद में अपने सपने और रोज हैरानी से भरी एक चुनौती पूर्ण जिंदगी की बात करते है फिल्म बहुत ही बढ़िया है बड़े दिनों बाद दिल को छूने वाली फिल्म देखी. तमाम माफियों के साथ यह फिल्म समर्पित है तुम्हे.....अपने पूर्वाग्रहों और Possessiveness को छोड़कर....

Tuesday, July 19, 2011

कल छुट्टन कह रहा था -धीरज कुमार सिंह की एक बेहतरीन कविता

मुंबई में हमले हुए और राजनीति शुरू हो गयी. हर जगह ये बहस शुरू हुई. मेरे मन भी एक बहस आरंभ हुई लगा कोई मन के अन्दर एक बच्चा है जो मुझसे कई सवाल कर रहा है और इस बच्चे का नाम मैंने छुट्टन दिया.

हुए हैं कई ब्लास्ट

मरे हैं कई लोग

सूनी हो गयी कई गोद ,

उजड़ गयी कितने मांग फिर से

सो गयी हैं कई साँसे फिर से

इस पर तुम कुछ लिखोगे नहीं भैया

कल छुट्टन कह रहा था

बाबूजी भी कह रहे थे

मिश्रा के पान की दुकान पे भी

सबकी बैठक बंद हो गयी है

शर्माजी के चौपाल पे ताँता था लोगो का

पर आवाजाही ख़त्म हो गयी है

अपनी गली भी सूनी-सूनी हो गयी न भैया

कल छुट्टन कह रहा था

टीवी पे देखत रहे

एक नेता बोलत रहा की

मुसलमानों का हाथ है

कोई बोला की हिन्दुओं की सियासी चाल है

पर जो मरे वो इन्सान है न

उसकी फिक्र किसे है भैया

कल छुट्टन कह रहा था

सलमा के अब्बू का पता नहीं है

राधा की अम्मा भी गुम है कही

खन्नाजी के घर में भी कोई घायल हुआ

हर तरफ रोना-धोना जारी है

मन बड़ा अशांत हो रहा है मेरा

जिम्मेदार कौन है इन सबका भैया

कल छुट्टन कह रहा था

बड़ा अजीब लगे

यहाँ तो लाशों की भी राजनीति है

सबमें है गुस्सा पर चुप सारी आबादी है

कुछ मोमबत्तियां इनके नाम पे जलेगी

कुछ धरने किये-कराये जांयेंगे

फिर कुछ दिन सब यूँ ही भूल जायंगे ना भैया

कल छुट्टन कह रहा था

ना जाने कितने चेहरे इस धुंध में खो गए हैं

पर उन्हें कोई ढूंढता नहीं

क्यूंकि वो अपने खून नहीं है

क्या एक दिन किसी ब्लास्ट में

मैं भी यूँ ही मर जाऊंगा

क्या तब तुम जागोगे भैया

कल छुट्टन कह रहा था

Monday, July 18, 2011

कचोरिया, चाय, घरेलू और बाहरी कुत्तों के बीच चंद्रकांत देवताले के मार-पिटाई के सपने















कचोरिया, चाय, घरेलू और बाहरी कुत्तों के बीच चंद्रकांत देवताले के मार-पिटाई के सपने

(सन्दर्भ -उज्जैन की एक शाम- यार दोस्त के नाम १७ जुलाई २०११ कालिदास अकादमी )

सीहोर में था फेसबुक पर अशोक ने सन्देश दिया कि में उज्जैन में हूँ -कल परसों, मिल लो और इसकी पुरानी आदत है कि ये लोगो को टेस्ट करता है जैसे दिल्ली जाना नहीं पर लिखेगा दिल्ली में हूँ बुला लो जिसको बुलाना हो.....सो मैंने पूछा अपने बहादुर से! साला संसार में एक ही बहादुर है जो नौकरी के साथ कविता भी लिखता है ढेर सारे लोगो से बातचीत और फ़िर देवास में आयोजन आसपास के क्षेत्र में जाना और सबकी लड़ाई सुलझाना, यह सब बहादुरी के ही काम बाकी कामो का चर्चा फ़िर कभी, बहरहाल मैंने पूछा कि क्या माजरा है उसने बताया कि उज्जैन में रमेश दवे का अमृत महोत्सव है और निरंजन क्षोत्रिय कार्यक्रम कर रहे है बारह युवा कवियों की कविताएं, जो इन्होने ने समापवर्तन में छापी है, का विमोचन भी है सब लोग आयेंगे तो आ जाओ, मैंने सोचा चलो अपने बेटू से भी मिल लूंगा और सब दोस्तों से भी मिलना हो जाएगा बस यही सोचकर देवास चला गया और बस दोपहर में बहादुर तीन बजे दिनेश पटेल के साथ हाजिर, में, दिनेश, अपूर्व और बहादुर चल पडे उज्जैन की ओर.

जब उज्जैन पंहुचे तो अशोक ने कहा कि सीधे होटल ही आ जाओ आज सुबह तो वहाँ सिर्फ होम हवन ही हो रहा था और हम भाग आये.....श्रीमाया उज्जैन के फ्रीगंज का भीडभरा इलाका और सुन्दर चौड़ी सडके, याद आया एक बार नलिनी सिंह के साथ एक कार्यक्रम की शूटिंग कर रहा था तो नलिनी ने इसे ठन्डा शहर कहा था तब आचार्य श्रीनिवास रथ, अशोक वक्त, सतीश दवे, हफीज आदि मित्रों ने बहुत आपत्ति उठाई थी और नलिनी को जी बाहर के कोसा था. उज्जैन संस्कृति का शहर रहा है मैंने अपनी एम् ऐ अंगरेजी की पढाई यही से की है और जिले में विज्ञान शिक्षण का भी बहुत काम किया है इस मालवा के शहर से मेरा गहरा नाता रहा है.

जब अशोक के कमरा नंबर २०२ में घुसे तो एक छोटा सा प्यारा सा एक और शख्स मौजूद था अशोक ने परिचय कराया कि यह अमित मनोज है हरियाणा से आया है और कवि है बस थोड़ी सी बातचीत के बाद वह भी घुलमिल गया हिन्दी में कवि होना मेरे लिए तो फख्र की बात है अमित कुरूक्षेत्र से विवि से पीएच डी कर रहा है और बहुत ही सामयिक विषय है कि बाजारवाद के दौर में हिंदी कहानियों में किसानो की स्थिति उसने बताया कि उसने २१० कहानियों का चयन किया है और उसे १७० कहानिया तो १९९० के बाद मिली है, यह बड़ी बात थी कि आज अधिकाँश लोग यह मानते है कि प्रेमचंद के बाद किसी ने किसानो की सुध नहीं ली. अमित का शोध ठीक इसके विपरीत बात कहता है. अच्छा कवि है हरियाणा साहित्य अकादमी से उसका एक संग्रह आया है “कठिन समय में “ उसने बहुत प्यार के साथ मुझे इसकी प्रति भेंट की, अच्छा लगा कि अभी भी हिन्दी में बहुत संभावनाएं बाकी है.

अशोक से पुरानी गपशप कहानी, कविता, मार्क्सवाद, दोस्त यार, फेसबुक, इंटरनेट, प्रकाशन दिल्ली ग्वालियर और भोपाल और फ़िर कुछ कार्यक्रम कविता समय और उसपर उसकी संयोजकीय टिप्पणियाँ और प्रशंसा के पूल और निंदा की नदिया....समय कब धीरे धीरे गुजर रहा था पता ही नहीं चला. अचानक हमने कालिदास अकादमी जाने की सोचा और फट से उठाकर चल दिए वहा राजेश सक्सेना, मुकेश बिजौले, अक्षय आमेरिया, नीलोत्पल जीतेंद्र चौहान भी मिल गए. कार्यक्रम तो बहुत ही अजीब था कोइ टिप्पणी नहीं करूँगा पर रमेश दवे जो पता नहीं क्यों प्रोफ़ेसर हो गए भगवान जाने किस विवि के थे या खुद ही ने लिखना शुरू कर दिया, एक प्राथमिक शाला के अध्यापक का यह अपराध बोध बहुत ही खराब होता है, ऐसे ही एक और मित्र है दामोदर जैन तीकम्गढ़ से जुगाड करके भोपाल में बैठे है अपने आप को जूनियर व्याख्याता कहते है जबकि है वो प्राथमिक के मास्टर पर अपराध बोध उन्हें सोने नहीं देता वो तो और भी हिट है यदि कोइ उन्हें “डाक साब” कहता है तो मना भी नहीं करते. खैर मंच पर विलास गुप्ते, विजय बहादुर सिंह, रमेश दवे और कोइ एक सज्जन बैठे थे और माइक पर सूर्यकांत नागर का लंबा प्रलाप जारी था जह उन्होंने रमेश जी को पता नहीं क्या क्या बना दिया और फ़िर चापलूसी के भी हद है, सूर्यकांत उवाच सुनने के लिए हाल में बमुश्किल १०-१२ लोग बैठे होंगे वो भी मालवा था तो लाज शर्म के मारे आ गए और ये कवि जिन्हें निरंजन ने किराया भाड़े का होटल में रूकवाने का भरोसा दे दिया था किताब के रूप में कवितायें एक बढ़िया काम था ही और फ़िर अशोक, अमित, प्रदीप और जीतेंद्र जैसे सहज लोग बगैर किसी लालच और छलावे के आ जाते है दिल से, यही सहजपन इन्हें ऊर्जा भी देता है और एक बड़े नेटवर्क से जोड़े रखता है आज इन सबका एक बड़ा गेंग है और ये गेंग छोटे बड़े ध्रंधर लोगो को सहजता से ही निपटा देता है चाहे वो कविता का अखाड़ा हो या बौद्धिक विमर्श या विचारधारा का मुआमला हो. ये बड़े प्यार से सबका काम तमाम कर लाइन पर ले आते है और फ़िर किसी की मजाल कि कुछ बोल दे बहादुर भी बहुत प्यार से अपनी अस्वीकृति रखता है इस साल नईम समारोह में नामवर जी के लिए उसका रूख बड़ा सख्त था और समीरा का पक्ष बहादुर के कारण ही कमजोर साबित हुआ और फ़िर देवास के किसी रचनाकार ने तो नहीं मदद की हाँ दूसरे गुर्गे जरूर पहुंचे थे मदद के लिए.........खैर. थोड़ी देर तक हम सब सुनते रहे फ़िर एक एक करके बाहर आ गए और अंदर रमेश दवे की अमर कथा का प्रसारण जारी था. मुकेश बिजौले की कविता पोस्टर प्रदर्शनी लगी थी श्रीराम दवे की कविताएं और इन पुरस्कृत कवियों की शगुन जैसी एक एक कविता-अशोक दुबे की लेखनी और मुकेश के रेखांकन वाह क्या संजोग था.

बाहर आनंद वर्मा अपनी पत्नी हंसा और बेटी कुहू के साथ आया हुआ था थोड़ी देर मिला और फ़िर वो लौट गया परेशान है नई नौकरी के लिए अब चालीस हजार कमा रहा है फ़िर भी “दादा जी उकता गया है सो अब नया काम चाहिए”....यही त्रासदी है सबकी क्या करे मजबूर है सब और हमाम में नंगे...जीतेंद्र जिद करने लगा कि चलो तो फ़िर हमारी टोली निकलने लगी, अचानक मुझे युवा साथियो का एक समूह दिखाई दिया तो मन में सहज जिज्ञासा उठी कि कही ये नाटक वाले बच्चे तो नहीं, कार में बैठकर उतर गया और सबको लेट कर दिया. में पहुँच गया उस छत्ते में पर शुक्र था में सुरक्षित था वो सब बहुत ही संजीदा और कर्मशील लगे नाटक के प्रति उनका समर्पण देखकर मुझे तसल्ली हुई फ़िर अचानक राजा और हाफिज का जिक्र निकल आया तो वो बोले राजा भैया बाहर ही है और आ गए है मिल लो. बस राजा से में लगभग २२ बरसो बाद मिला मजा आ गया खूब सारी बातें हुई और फ़िर नाटक का जिक्र निकला और लगा कि मुझे तो फ़िर से सब मूर्खताएं छोडकर नाटक वगैरह ही करना चाहिए क्या चुतियापे टाईप नौकरी कर रहा हूँ जहां ना समझ है ना कुछ परिणाममूलक काम न विचारधारा ना कामरेडगिरी बस एक गंवार कलेक्टर आता है और सारे प्रशासन को भेडो की तरह से हांकता है और सब गधे पीछे पीछे चल पड़ते है बगैर दिमाग लगाए और सोचे विचारे.

Friday, July 15, 2011

प्रशासन पुराण ६

बहुत ही अजीब सी आदतें थी उसकी रोज केले खाता और बड़े बाबू को बुलाकर कहता था कि यार गरीब अधिकारी हूँ दो केले तो खिला दो और फ़िर धीरे से कहता कि बीबी खाना नहीं बना पाती है सुबह साला कहा से लाउ इतना रूपया दोनों बच्चे पढ़ भी रहे है साला आरक्षण तो मिल गया पर मेडिकल की पढाई कितनी महंगी है और अब ये साला सूचना के अधिकार ने रिश्वत के रास्ते भी कम कर दिये है वरना विधायक निधि से ही खर्च चलता था सेलरी तो बैंक में रहती थी(प्रशासन पुराण ६)