Friday, May 31, 2013

थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे -अशोक वाजपेयी


"विदा"

तुम चले जाओगे
पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे
जैसे रह जाती है
पहली बारिश के बाद 
हवा में धरती की सोंधी-सी गंध 
भोर के उजास में 
थोड़ा-सा चंद्रमा
खंडहर हो रहे मंदिर में
अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार

तुम चले जाओगे
पर थोड़ी-सी हँसी
आँखों की थोड़ी-सी चमक
हाथ की बनी थोड़ी-सी कॉफी
यहीं रह जाएँगे
प्रेम के इस सुनसान में

तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति,
छंद की तरह गूँजता
तुम्हारे पास होने का अहसास

तुम चले जाओगे
और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे

-अशोक वाजपेयी

Thursday, May 30, 2013

माधुरी बहन पर लिखा मेरा आलेख..........जनज्वार में

माधुरी बहन पर लिखा मेरा आलेख..........जनज्वार में

http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-08-56/81-blog/4024-sarkar-aapki-mansha-kya-hai-by-sandeep-naik-for-wwwjanjwarcom

Tuesday, May 28, 2013

An Epitaph


एक नया जीवन चाहिए होगा, नए लोग, नई प्रेरणाएँ, नए स्वप्न, और नई जमीन - जहाँ जाकर सुप्तावस्था से जागकर पोषित - पल्लवित होना होगा तभी बात बनेगी............आज 'ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा' पांचवी बार देखकर लगा कि हम नए अध्याय तभी लिख सकते है जब अपने अंदर के डर निकाल दें और फ़िर दूर कही गहरे पानी पैठें या ऊँचे आसमान में निर्द्वंद उड़े !!! अपने कच्चे पक्के सपनों को ऊँची उड़ान देना जरूरी है. बस सपने साफ हो, कही से मटमैलापन उनके आसपास ना छलकता हो, उन सभी लोगों से दूर रहना होगा जो कही से अपने होने का दम भरते है, उस माहौल से दूर जाना होगा जो आपको एक फेंटेसी की दुनिया में वास्तविकता का बोध कराये चाहे वो टमाटर उत्सव जैसा गल्प या बैलो की दौड़ हो या अपने अतीत की काली परछाईयों से मुक्ति की कामना.

Epitaph  28th May 2013


कौन ठगवा नगरिया लूटल हो
चंदन काठ के बनल खटोलाता पर दुलहिन सूतल हो
उठो सखी री माँग संवारो दुलहा मो से रूठल हो आये
जम राजा पलंग चढ़ि बैठा नैनन अंसुवा टूटल हो
चार जाने मिल खाट उठाइन चहुँ दिसि धूं धूं उठल हो
कहत कबीर सुनो भाई साधो जग से नाता छूटल...
 

Monday, May 27, 2013

प्यार तभी हो सकता है जब आप गहरी घृणा को अपनाने के लिए तैयार हो……

हम   सब अंदर से कितने खोखले है और दिखावा ऐसा करते है मानो सृष्टि के रचयिता हम स्वयं हो ..........

भूलना   चाहते हो सब कुछ तो पहले उस सबको याद करो जिसमे तुम हताहत हुए थे, तार-तार हो गई थी इज्जत तुम्हारी, छलनी कर दिए गये थे तुम्हारे स्वप्न उनींदे से, रौंद दिया गया था सारे दिवास्वप्नों को भर दोपहरी में और फ़िर लादकर अपना वजूद तुम पर कहा गया था कि लो तुम्हें अब आजाद किया जाओ.... विचरों संसार में और मत भूलना कि सब नश्वर है, माया है और यही चुकाना पडता है लिए-दिए का.........बस याद रखो...... यह सब चुकता करो एक-एक हिसाब और निकल पडो.... उस अंतहीन यात्रा पर जो हर पल खत्म हो रही है तुम्हारे भीतर बगैर किसी का संज्ञान लिए.........

बचना   चाहते हो तो इन्हें मारना होगा पहले जो बचाने का स्वांग धरकर तुम्हारे भीतर पैठ करके बैठे है

जीवन   की सार्थकता अपनी मौत के आईने में ही देखी जा सकती है जब तक मौत को आप अपने समक्ष नहीं देखते तब तक जीवन को ढोते और खींचते चले जाने का कोई और अर्थ तो नहीं है

प्यार   तभी हो सकता है जब आप गहरी घृणा को अपनाने के लिए तैयार हो……

लड़ना   है तो अपने लिजलिजेपन को छोड़ना होगा………

अगर   तालाब में मछली पकड़ना हो तो तालाब खाली करो और आसमान में उड़ना है तो जमीन से पाँव उठाने ही होंगे

किसी   का विश्वास जीतना है तो उसे गहरा सदमा देना होगा और एक बड़ा धोखा, तभी किसी को अपना सर्वस्व देकर विश्वास जीत पाओगे.

हिसाब   करने से पहले उन जख्मों को तसल्ली से याद करना जरुरी है जिन्होंने नासूर दिए थे गहरे और रिसते हुए, उस सबको संजीदगी से याद  किये बिना हिसाब करने का कोई  अर्थ नहीं है जीवन में। चुन चुनकर हिसाब लो उन सबसे जो हाथों में सिर्फ नमक लिए खड़े थे, जिन्होंने रिश्तो, दोस्ती की आड़ में भावनाओं के पुल बनाकर तुम्हे मथ डाला इतना कि  निकले जहर को तुम्हे ही पीना पडा और जाहिर है अमृत पान वो डकार कर चले गए और आज उसी बुनियाद पर तुम्हारी राह का काँटा बनाकर खड़े है, ले लो पूरा हिसाब ले लो, बस मत भूलो उन जख्मों को जो नासूर बनकर अभी भी सड-गल रहे है जगह-जगह…… 

जब  सामने थाली आती तो सर शर्म से झुक जाता था और एक एक कौर कहता था की इज्जत नहीं की ना खाने की तो यह भुगतना ही पडे गा……. अब सब कुछ ख़त्म होने को है तो यह थाली, यह पानी, यह हवा और ना जाने ऐसी कितनी चीजें है जो हिसाब में ही नहीं है उनका हिसाब कैसे कब कहाँ होगा……?


प्रबल आशावाद में जीना है तो निराशा के गहरे कूएँ में उतरकर देखना होगा की जीवन कहाँ छूट गया और फिर उन सभी निराशाओं को इकठ्ठा करके संजोना होगा की चुन चुनकर बदला लिया जा सके तभी हम एक प्रबल आशावाद की झलक जीवन में देख सकेंगे

रास्ते कभी ख़त्म नही होंगे, चलना तो हर हाल में पडेगा चाहे कुत्ते की माफिक सोच लो कि गाडी मेरे भरोसे चल रही है या कि एक शेर की माफिक सोच लो कि आने जाने वाले रास्ता दे दे

नए सम्बन्ध बनाना हो तो पुराने रिसते हुए घावों को जड़ से उखाड़कर फेंकना होगा तभी नयी कोपलें फूटेंगी और फिर पल्लवित करना होंगे नए वो रिश्ते जिन्हें एक लम्बे समय तक अपने बनाए रिश्तों की भाँती निभाना हो, ना कि थोए गए , हाँ ध्यान यह रहें कि इन अपने बनाए रिश्तों के लिए खून की जरुरत होगी ना कि पानी की, क्योकि रिश्ते निभाने के लिए खून देना पड़ता है ना कि पानी …



Friday, May 17, 2013

स्वास्थय की दुर्गति और माधुरी बहन की नाजायज गिरफ्तारी.


A file picture of Gandhian activist Madhuri Krishnaswami who was arrested for fighting against the injustice meted out to adviasis in Madhya Pradesh.
माधुरी बहन को मप्र शासन के नुमाइंदों ने गिरफ्तार किया. बडवानी मे मनरेगा का बदला लेने के लिए बेताब जिलाधीश और शासन को आखिरकार एक ऐसा मौका मिल ही गया कि वे माधुरी बहन को गिरफ्तार कर लें. एक झूठे मामले मे उन्हें गिरफ्तार करके डरा हुआ प्रशासन क्या साबित करना चाहता है. जननी सुरक्षा के इतने बुरे हाल है कि सडकों पर प्रसुतियाँ रोज हो रही है और सरकारी अस्पताल कुछ नहीं कर रहें. हाल ही मै मैंने एक अध्ययन समाप्त किया तो पाया कि नगद राशि के प्रलोभनों की स्थिति बहुत खराब है खासकरके स्वास्थय विभाग मे. मेरे अध्ययन के दौरान ही सागर के जच्चा वार्ड मे दो नवजातों की मृत्यु हो गई थी, दोनों सद्य प्रसूताओं ने बताया था कि अस्पताल मे डाक्टर ड्यूटी पर होते हुए भी नहीं पहुंचे थे वार्ड मे, जब मैंने सम्बंधित अधिकारी और ड्यूटी डाक्टर से कहा और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थय मिशन के नियमों का हवाला देते हुए "डेथ आडिट" का पूछा तो बताया गया कि जब वो नवजात बीमार था तो सम्बंधित महिला डाक्टर आपरेशन वार्ड मे तीन महिलाओं के आपरेशन कर रही थी और शिशु रोग विशेषग्य अपनी सीट पर नहीं थे. बाकि जच्चा वार्डों की हालत बहुत खराब है, आपरेशन टेबल पर एक साथ दो दो महिलायें मुँह उलटाकर लेटी रहती है और डिलेवरी करवा रही है जिला स्तर के अस्पतालों मे जहाँ तीन डेढ़ सौ से लेकर दो सौ पचास तक की डिलेवरी रोज हो रही है जिसमे से पचास साठ आपरेशन होते है सीजेरियन के, वहाँ क्या हालत है यह सोचना ही भयानक है. एड्स, सेप्टिक, एक्स्क्लेमाशियाया मिर्गी की  महिला पेशेंट भी सामान्य महिला वार्ड मे रह रही है, अलग से व्यवस्थाएं नहीं है, आपरेशन थियेटर मे मूल सुविधाएँ मसलन डिस्पोसेबल चीजें नहीं है, आटोक्लेव,  गर्म पानी की सुविधा, वजन मशीन, स्वच्छ चादरें, एम्ब्यु बेग, डस्टबीन, जनरेटर, पीने का पानी, सफाई, आक्सीजन सिलेंडर या ऐसी अन्य जरूरी जैसी सुविधाएँ भी हमें खरीदने के लिए विदेशी एजेंसियों का मुँह ताकना पड़ रहा है, बावजूद इसके कि एनआरएचएम मे मे इफरात रूपया है. इन्दौर का एमवाय हो या देवास, सीहोर, सागर, सतना, मंडला हो या डिंडौरी सभी जगह की एक ही कहानी है. आये दिन ड्यूटी डाक्टरों द्वारा नाजायज रूपयों की मांग करना एक आम बात है, हाल ही मे देवास मे ऐसा मामला पकड़ मे आया है. डाक्टरों की कमी से जूझता प्रदेश जहाँ महिला डाक्टर नहीं के बराबर है सिर्फ एक - दो या तीन महिलायें अस्पताल चला रही है. डिंडौरी मे एक ही महिला डाक्टर सब काम करती है और इसमे भी यदि जिला कलेक्टर की बीबी डाक्टर हो तो वो आती भी नहीं है और घर बैठे तनख्वाह लेती है, तो क्या हालत होगी. जननी वाहन का जितना प्रचार किया जाता है वह भी शोचनीय है कॉल सेंटर पर बैठे संविदा के कर्मचारी बेचारे डाक्टरों और स्टाफ को घर से लाते ले जाते है जननी वाहन से, और फर्जी इंट्री करते है कि प्रसूता को लाया गया. ऐसे मे मूल सवालों पर ध्यान देने के बजाय प्रशासन की यह एक तरफा कार्यवाही कई प्रकार के शक पैदा करती है. बडवानी जिले मे प्रशासन वैसे भी जागृत आदिवासी मुक्ति संगठन से नाराज है और यहाँ के शेखीखोर अफसर पहले भी माधुरी बहन को जिला बदर की कार्यवाही मे फंसा चुके है जिसमे उन्हें मुँह की खानी पडी थी. अब यह एक प्रकार का बदला है जो प्रशासन बहुत ही घृणित तरीके से लेना चाह रहा है. सरकार को चाहिए कि इस जिले मे काम कर रही एजेंसियों को सख्ती से पहले पूछे कि उनका क्या योगदान है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर से मोटा रूपया उगाकर यहाँ पसारा फैलाकर बैठे है और बडवानी की गरीबी बेचकर अपना भला कर रहे है, दूसरा जिले मे सड़क पर हुई डिलेवरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को घेरे मे लेकर उन्हें निलंबित करें फ़िर अपने तंत्र को मजबूत करें और अविलम्ब माधुरी बहन को छोड़े, वरना जिले मे आदिवासियों के लिए और उनके भले के लिए काम करने वाला कोई नहीं रहेगा. उल्लेखनीय है यह वही माधुरी बहन है जिन्होंने इसी जिले के पाटी ब्लाक मे सरकारी पीएचसी की काली कमाई की परतें खोली थी और स्वास्थय विभाग के ढीलपोल की रपट सार्वजनिक की थी संगठन ने जब अध्ययन करना शुरू किया तो पता चला कि अस्पताल और डाक्टर मरीजों को वह दवाएं नहीं देते थे और हैं, जो बीमारी के मुताबिक़ हों; सबको अस्पताल में उपलब्ध दवाओं के हिसाब से वितरण होता था....लगभग ७० प्रतिशत मामलों में बीमारी के मुताबिक दवाएं नहीं दी गयी हैं...इसीलिए लोग ठीक नहीं होते हैं और फिर सरकारी अस्पताल में जाना छोडकर निजी डाक्टर के पास जाते हैं.और इसके अलावा बडवानी देश का पहला जिला बना था जहाँ मनरेगा मे माधुरी बहन की पहल पर और आंदोलन के बाद आदिवासियों मे बेरोजगारी भत्ता बंटा था क्योकि प्रशासन ने लोगों को काम नहीं दिया था. मनरेगा के काले कारनामों की आड़ मे कई अफसरों को पिछले दिनों यहाँ निलंबित किया गया है और करोड़ों का घपला पकड़ा गया है. यह सब मुद्दे है जिनके चलते माधुरी  बहन को सुनियोजित तरीके से गिरफ्तार किया गया है इसमे स्पष्ट साजिश है सन 2008-09 का प्रकरण मात्र एक बहाना है असली उद्देश्य जागृत आदिवासी मुक्ति संगठन की गतिविधियों को ठप्प करना है क्योकि आदिवासियों मे अब चेतना आ रही है. हाल ही मे एम्स दिल्ली के  ड़ा हीरा अलावा और उनके मित्रों ने आदिवासी युवाओं को 16 मई को इकठ्ठा किया था पर प्रशासन ने उन्हें भी बहुत परेशान किया कि वे की युवाओं का सम्मलेन कर रहे है. चुनावों के करीब आते ही यह सब होना लाजिमी है क्योकि कोई भी पार्टी जन चेतना नहीं चाहती और हर इस तरह की गतिविधि को खत्म कर अपना 'सुशासन' लागू करना चाहती है.

बदलना ही होगा वह सब जो सिर्फ और सिर्फ बदलने से ही बदलेगा.........

उसने कहा तो था कि कि वो जंग जीत लेगा - पर धीरे धीरे शाम ढलने लगी, सूरज मद्धम होता गया........कही दूर सडकों पर परछाईयाँ लंबी होती गई और फ़िर वो थक हार कर एक जगह बैठ गया, बहुत सोचा बिचारा, अपने दोस्तों को याद किया, सारे पाप-पुण्यों को याद करता हुआ चुपचाप बैठा रहा और फ़िर उसने अपने चारों ओर एक बार घूम कर देखा, बहुत बारीकी से आने वाली हर आवाज को सुना- महसूसा और फ़िर पाया कि यही समय है एक निर्णय लेने का....अचानक उसे याद आया कि कई कागजात है उसके पास यहाँ-वहाँ और फ़िर त्वरित गति से भागता हुआ अपने दडबे मे गया और खोल दी उसने पोटली और बिखेर दिए वो सब कागज़ जो उसके होने को परिभाषित करते थे और उसकी अस्मिता को इतने सालों से सहेजकर रख रहे थे............बस अब मोह खत्म हो गया था.......हाथों मे एक खाली झोला रखा और चल दिया अपने लक्ष्य की ओर.... और आज उसे किसी की पर्वाह नहीं है, आज उसे किसी का डर नहीं है, आज उसे किसी की नहीं सुननी है, आज उसे किसी माकूल फैसलें पर पहुँचना ही है, ताकि आने वाले समय मे फ़िर कोई इस तरह से हैरान ना हो............ इस तरह से ज़िंदा रहने का कोई मतलब नहीं है कब तक ढोया जाये........बस अब यह खत्म करके एक नई उजास की भोर मे उठना ही होगा, और बदलना ही होगा वह सब जो सिर्फ और सिर्फ बदलने से ही बदलेगा.........

Wednesday, May 15, 2013

The Harsh reality.......

The Harsh reality.......


नैहरवा हम का न भावै - कबीर........


तुम्हारे लिए ..............सुन रहे हो ................कहाँ हो तुम.............

और यह नैहरवा अब ज्यादा सताता है...... जीवन से लगाव और भटकाव अब खामोश होने को है, रंग-रंगीली गाड़ी चलाकर बहुत भटक लिए, अब इस पार से उस पार देखने का समय आ गया है जो कबीर कहते है, वही खुसरो कहते है कि कि गोरी सोई सेज पर, सर पर डारे केश, चल खुसरों घर आपणे, रैन भई चहूँदेस...........यह चलाचली की बेला है, यह समय तपते सूरज के बीच से गुजर जाने का समय है, यह निस्तब्ध रात मे पुरे चन्द्रमा के सानिध्य मे से हलके से गुजर जाने का समय है. पूरी धरती एक सन्नाटे मे है और बेचैन.... जिस तरह से कही से दूर आवाजों के घेरे पास आ रहे है, कोलाहल भयभीत कर रहा है, कही दूर गहरे पानी मे से सुबकियों का दर्द पानी की सतह को अपने निर्वात से भर दे रहा है, क्योकि मन पूरी तैयारी से एक निर्विघ्न यात्रा पर निकल पड़ा है, उसमे लगता है कि अब बस यही निर्वाण है क्योकि प्रारब्ध भी यही था था ........वो कहते है कि "सुपने में प्रीतम आवै, तपन यह जिय की बुझावै" तो अब क्या बचा है यहाँ.........

और पं कुमार गन्धर्व जी ने जो इसे गाया तो मन के सारे द्वंद भी खत्म हो गये, कुछ समझने को शेष नहीं रहा............

नैहरवा हम का न भावै

सांई की नगरी परम अति सुंदर, जहं कोई जा ना आवै,
चांद सूरज जहं, पवन न पानी, कौ संदेश पहुंचावै,
दरद यह सांई को सुनावै ... नैहरवा

आगे चलुं पंथ नहीं सूझै, पीछे दोष लगावै,
केहि बिधि ससुरे जाउं मोरी सजनी, बिरहा जोर जरावै,
विषय रस नाच नचावै.... नैहरवा

बिन सतगुरु अपनो नहीं कोई, जो यह राह बतावै,
कहत कबीरा सुनो भाई साधो, सुपने में प्रीतम आवै,
तपन यह जिय की बुझावै ... नैहरवा।

Sunday, May 12, 2013

तुम्हारे लिए.........सुन रहे हो ...........कहाँ हो तुम.........डफरीन

आखिर कौन है यह शख्स जो मेरे भीतर पाँव पसारे रह रहा है गत पांच माह से .......? आज तक तो मै नहीं समझ पाया.............पर मामला कुछ गंभीर है और अब जवाब देना ही होगा अपने आपको भी .........!!!!!
जिस दिन यह सोच लूंगा कि अपने होने और ना होने से जीवन मे कोई फर्क नहीं पडने वाला उस दिन यह नैराश्य, आसक्ति और त्याग सब खत्म हो जाएगा और वह धुंध जो तुम्हारे होने से मेरे होने को ढक लेती थी, वह भी समेट लूंगा......और फ़िर इस सपाट बियाबान मे से लंबी होती जीवन डोर को समेट कर कही दूर चला जाउंगा देखना फ़िर कभी दौरे नहीं पड़ेंगे इस तरह साँसों के और नहीं होगा उद्दाम भावनाओं का ज्वर....सुन रहे हो..... कहाँ हो तुम........ आज फ़िर याद आ गया वो सब कुछ- जो सिर्फ तुम्हारे होने से ही घटित होता था और आज जब मेरे पास नहीं हो तुम यहाँ सम्पूर्ण भौतिक रूप से तो मै पथरा गया हूँ.......क्या निराश हुआ जाये......?
अब जबकि कुछ बचा ही नहीं है और छठे चौमासे बात करना मानो एक बार फ़िर से अपने आपको भ्रम मे रखना है कि जीवन का शाश्वत रुदन जारी है साँसों के बीच से जीवन की रूठी हुई गाड़ी को ढोते हुए श्मशान तक खींचते हुए ले ही जाना है तो, डफरीन लगता है तुम यही हो कही मेरे आसपास.......एकदम से मेरी मौत की स्तुति गाते हुए और बाट जोहते हुए एक कातर निगाहो से देख रही हो कि मौत के साये मे मै कैसे क्रंदन करूँगा और फ़िर एक काला आसमान छुपा लेगा मेरे भीतर के स्व को जो कभी तुम्हारे होने से बन ही नहीं पाया, घटित ही नहीं हुआ वो सब जो ख़्वाबों मे से छलक छलक जाता था और मै मदहोश होकर बार-बार पी लेता कि इसमे तुम्हारी ही दी हुई मिठास है जो मेरे भीतर की कड़वाहट को निगल गई हो मानो....आज यह क्षण आ गया है और बस...करुणा का विस्तार अपने होने मे सम्पूर्णता चाहता है और मै दूर जा रहा हूँ कही ....तुम हो ना यही मुस्कुराते हुए मेरी ओर ...................इस देह धरे के दंड का भेद जानकार चली जाना कही और, कही दूर....... उन नक्षत्रों के पार जो कही से सनातनी परम्परा का निर्वाह कर सके......जिस दिन मैं अपने अकेलेपन का सामना कर पाऊँगा – बिना किसी आशा के- ठीक तब मेरे लिए आशा होगी, कि मैं अकेलेपन में जी सकूँ............

on Mother's Day 12 May 2013


सैयद सिब्ते अली सबा

                                                         सैयद सिब्ते अली सबा

सिब्ते-अली ’सबा’ रावलपिण्डी के क़रीब एक फ़ैक्टरी में मामूली मुलाज़िम थे और वहीं 41 साल की उम्र में उनकी वफ़ात (मृत्यु) हुई। सिब्ते अली सबा की किताब ’तश्ते-मुराद’ (1986) उनके मृत्यु के बाद छपी ।

ये कह के उसने शज़र को तने से काट दिया
कि इस दरख़्त में कुछ टहनियाँ पुरानी है

हम इसलिए भी नए हमसफ़र तलाश करें
हमारे हाथ में बैसाखियाँ पुरानी है

अजीब सोच है इस शहर के मकीनों का
मकाँ नए है मगर खिड़कियाँ पुरानी है

पलट के गावँ में, मैं इसलिए नहीं आया
मिरे बदन पे अभी धज्जियाँ पुरानी है
 

नरेश सक्सेना दीर्घायु हो सृजनशील रहे

हिन्दी के वरिष्ठ कवि श्री नरेश सक्सेना का आज लखनऊ मे सम्मान है.

नरेश जी दीर्घायु हो सृजनशील रहे, इन्ही मंगल कामनाओं के साथ......हम देवास के साथी प्रयासरत है कि उन्हें यहाँ बुलाये और ओटले पर उनकी कवितायें सुनें देखे कब मौका आता है.? .

I
मुझे एक सीढ़ी की तलाश है
सीढ़ी दीवार पर
चढ़ने के लिए नहीं
बल्कि नींव में उतरने के लिए
मैं किले को जीतना नहीं
उसे ध्वस्त कर देना चाहता हूँ ....!

II
दुनिया के नमक और लोहे में हमारा भी हिस्सा है
तो फिर दुनिया भर में बहते हुए खून और पसीने में
हमारा भी हिस्सा होना चाहिए
- नरेश सक्सेना

"माई तोरा ख़ातिर" - मजरूह सुल्तानपुरी

एक नायाब गीत और शब्द मजरूह सुल्तानपुरी के : साभार Adnan Kafeel

"माई तोरा ख़ातिर"

माई री
हाँ
माई री मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की
माई री

ओस नयन की उनके मेरी लगी को बुझाये ना
तन मन भीगो दे आके ऐसी घटा कोई छाये ना
मोहे बहा ले जाये ऐसी लहर कोइ आये ना
ओस नयन की उनके मेरी लगी को बुझाये ना
पड़ी नदिया के किनारे मैं प्यासी

पी की डगर में बैठा मैला हुआ री मोरा आंचरा
मुखडा है फीका फीका नैनों में सोहे नहीं काजरा
कोई जो देखे मैया प्रीत का वासे कहूं माजरा
पी की डगर में बैठा मैला हुआ री मोरा आंचरा
लट में पड़ी कैसी बिरहा की माटी
माई री ...

आँखों में चलते फिरते रोज़ मिले पिया बावरे
बैंया की छैंया आके मिलते नहीं कभी साँवरे
दुःख ये मिलन का लेकर काह कारूँ कहाँ जाउँ रे
आँखों में चलते फिरते रोज़ मिले पिया बावरे
पाकर भी नहीं उनको मैं पाती
माई री ...

- मजरूह सुल्तानपुरी

कब से खोज रहा था इन शब्दों को जो बहुत करीब है दिल और दिमाग के ......धन्यवाद अदनान

Saturday, May 11, 2013

पांच वर्षीय परीक्षा

पांच वर्षीय परीक्षा 
                               (सभी प्रश्न अनिवार्य है केवल अंत मे से किसी एक को हल करिये)

प्रश्न 1 -  2 /3 जी के प्रकार और इसमे सम्मिलित भागीदारों के नाम और उनके कार्यों पर प्रकाश डालिए

प्रश्न 2-  कोयले का हमारे जीवन मे क्या महत्व है इसकी राजनैतिक व्याख्या करते हुए देश मे कोल समस्या पर प्रकाश डालिए.

प्रश्न 3-  राजनीती  मे महिलाओं के योगदान पर प्रकाश डालते हुए तानाशाही और सत्ता के सन्दर्भ मे भारत मे नारी पूजा के विभिन्न रूपों  को प्रस्तुत कीजिये.

प्रश्न 4-  भारतीय प्रशासन सेवा के सन्दर्भ मे इस कथन की व्याख्या करें कि "भारतीय प्रशासन सेवा इस देश के पतन के लिए एकमात्र जिम्मेदार व्यवस्था है"

प्रश्न 5- राजनीती मे तोते की परिभाषा को समझाते हुए इसके कार्यों पर विस्तृत रूप से टिप्पणी करें
या
राजनीती मे बकरे की ऊपादेयता पर व्याख्या करें और इसके महत्व पर सारगर्भित टिप्पणी करें.


(सभी प्रश्नों के अंक समान है, कृपया रफ कार्य और भडास हेतु फेसबुक जैसे विकल्प मौजूद है यहाँ उत्तर पुस्तिका पर अपनी भड़ास निकाल कर सफाई के अंक व्यर्थ ना जाने दे)

जंगल प्रांत मे बिल्लियाँ

I
जंगल के सोलह प्रांतरों मे नयी व्यवस्था बनाई गई थी सिर्फ दो बिल्लियाँ थी जो यह तय कर रही थी कि किन चूहों और लोमड़ियों को सूबेदार बनाया जाये और इसमे एक बड़ा जो शेर जैसा दिखता होगा उस सियार को सरदार बनाया जाये ...........बस काम शुरू हो गया बाहरी माल था और शिकार भी वही थे पुराने पापी और पुराने गठिया के रोगी........जंगल प्रांत मे बिल्लियाँ आपस मे लड़ मरी एक जवाँ बिल्ली ने बूढ़ी बिल्ली से तंग आकर जंगल छोड़ दिया आजकल वो बूढ़ी बरलाई की बिल्ली गरियाती फिरती है और पूरी मलाई खा रही है. जंगल के सोलह प्रांतरों मे हालात कोई सुधरे तो नहीं है पर नए लोगों के आने से स्थानीय कुत्ते, सुअर, खरगोश और मधुमख्खियाँ सतर्क हो गई है कि मलाई साफ़ करने वालों मे बँटवारा लेने वाले बढ़ गये है.........

II

यह एक ऐसी बिल्ली की कहानी है जो एक सीधे सादे तोते को और उसके सलाहकार बगुले को सिर्फ अपने महिला जेंडर होने के नाते घटिया राजनीती करके सत्ता हडपने की है. यह मोटी काली घाघ बिल्ली बहुत शराबी थी और जंगल मे हर जगह से हकाल दी गई थी, बिल्ली ने एक जगह ऐसी देखी जहाँ तीन जानवर बैठकर कुछ ठोस सार्थक काम कर रहे थे, घर परिवार का रोना धोना करके यह घुस बैठी, फ़िर रोज बहाने मारती कि इस बिल्ली का बाप गुम गया या बिल्ली की माँ बीमार या भाई भाग गया किसी छिपकली के साथ. रोज बिल्लों की तलाश मे निकलती शिकार करके लौटती तो आँखों मे शराब के डोरे डले रहते और ये तीनों मूक जानवर टुकुर टुकुर देखा करते. एक दिन बिल्ली की हरकतों से तंग आकर दो जानवर भाग गये क्योकि जंगल मे इस बिल्ली की बड़ी विचित्र खबरें थी. बाद मे बिल्ली ने सिंहासन पर कब्जा कर लिया एक और दूर देश की बिल्ली जो खुद आत्महत्या करने के घाट से लौट आई थी जिंदगी मे, से दोस्ती गाँठ ली. अब ये दोनों बिल्लियाँ उत्पात मचा रही थी जंगल मे, हफ्ता वसूल करके नित नए वाहनों मे घूमना, होटलबाजी करना, दारु पीना और मौज उड़ाना. दूर की बिल्ली तो फ़िर भी ठीक थी पर इस बिल्ली ने एक अघोरी जानवर के साथ एक दिन घर बसा लिया एक दिन और पुरे जंगल मे बात फ़ैल गई तो मुँह छुपाकर बैठ गई घर मे कि अब पंजे का दर्द सहा नहीं जाता......उम्र मे आधा वह चूहा इस बिल्ली को ढो रहा है अब.......जय हो इन ऐयाश बिल्ली प्रजाति की. 

जंगल के बीचोबीच पशु साक्षरता सदन

जंगल मे कमोबेश सब साक्षर हो चुके है पर जो ठीक जंगल के बीचोबीच पशु साक्षरता सदन बनाया गया था वहाँ अब बकरियां रमती है, गधे बिचरते है और सांड मद मस्त होकर भांग घोटे मे पड़े रहते है, परिसर मे कबूतर की गुटर गूं सुनाई देती है और कुत्ते बिल्लियों और बकरियों की लेंडीयाँ स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है. सारा दिन कुछ शाने कौवे, लोमड़ी और तीतर-बटेर सारे जंगल मे शिकार खोजते रहते है कि कही से कोई मुर्गा आ जाये और फ़िर ये लोग उसे नोच लें. बहुत सभ्य तरीका है नोचने का कि वे बाकायदा लिखकर, प्रवचन देकर और अनुसंधान करके रूपया ऐंठते है इससे दो फायदे होते है- एक तो नाम की भूख खत्म होती है दूसरा रूपया कमा लेते है. बस दुखी है तो सांड जो पहले भी किसी काम का नहीं था और ना अब है. बस सारा दिन पानी मे पड़े-पड़े सड गया है उसके वंश मे एकाध ही होगा जो शायद उसके नाम का रोना रो लेगा पर जंगल मे सारे छोटे-मोटे जीव जंतु उससे बेहद घृणा करते है. सांड जो किसी काम का नहीं बचा है पता नहीं किस गुरुर मे अभी तक टिका है पर अब जंगल छोडने का मतलब भी नहीं है ना- क्योकि जो भांग यहाँ मिल रही है उसे प्राप्त करने के लिए तो उठना पडेगा और चमड़ी घिसना पड़ेगी, बेहतर है कि यही मरा जाये, काहे खोपडा खराब किया जाये. पिछले दिनों एक छरहरी लोमड़ी चली गई दूर देश के जंगल मे, जाने के पहले उसने बाकायदा अपना जुलूस निकलवाया और बैंड बाजा बरात की तर्ज पर निकली धूम मचाने, पर अफसोस पहुँच गई वो एक वृद्धाश्रम मे, जहाँ उसे एक बाबू बनाकर रख दिया गया सुना है वो वहाँ नरभक्षी हो गई है. इस बुद्धिहीन सांड ने एक बारगी सोचा तो सही कि निकले इस जंगल से फ़िर बाहर का डर लगा, पर फ़िर उसने सोचा कि यही ठीक है मुफ्त की भांग और शरीर भी घिस नहीं रहा और दिमाग तो अपने पास पहले भी नहीं था तभी तो ज्ञान दान करते करते पुरे जंगल मे शिक्षा का कबाडा करने के लिए उसे नोबल पुरस्कार से नवाजा गया. यह जंगल बड़ा अजीब है मधुमख्खी की कहानी सुनी है ना आपने....रानी और प्रजा बस वैसे ही है- ठीक, पर अब जंगल उजड रहा है और जीव जंतु चिंता मे है कि क्या होगा कैसे होगा और सबसे ज्यादा बौराया है सांड ..........आईये सांड वदना करें..........सांड के लिए प्रार्थना करें.
जब तक कुछ जगहों पर बूढी बिल्लियाँ बैठी है तब तक शेर और चीते अपना शिकार नहीं कर सकते, ये बिल्लियाँ अपने चूहों को हर जगह सेट करने मे लगी है और इन्हें शर्म भी नहीं आती कि इससे जंगल की व्यवस्था खराब हो रही है इसलिए शेरों ने और चीतों ने इन बिल्लियों को सबक सीखाने का फैसला ले लिया है अब जंगल मे भी सूचना का अधिकार क़ानून आ गया है. दुर्भाग्य से ये खिसियानी बिल्लियाँ लोमड़ियों और गधों के सहारे से अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहती है. जंगल के अस्पताल और इससे जुडी व्यवस्था मे ऐसी ही बिल्लियाँ जगह जगह अपने पंजे और नाखूनों से गधों के पर क़तर रही है और सब जगह विराजमान है अब क्या करें ............क्यों

Friday, May 10, 2013

Welcome to Social Work Field TISS Graduates......



















a nice and wonderful pair of SRD, TISS Mumbai , They really did hard work and when I was there they would always discuss with me on social problems of Jharkhand and always tried to learn more and more.today when they both are Post Graduated and Graduated, I see a spark in them and also look forward for their dazzling Future.

I am really proud of you.......and happy to see you after convocation Khudi Ram Mahto & Kranti Kumari - You are really Pride Students of TISS.....
Our tenure in SRD Tuljapur bought me close to all this young budding social workers especially Akshat KrishnaVarun KumarShailja Nand Sandeep Chaurasia Ashish Borade. Lal Tlaite Lal Satyajit Kale Vishnu GovindwadLh Lallen Khongsai Nikita Mishra, Pragyan Behara and all were so nice and enthusiastic students that we also learnt so many things from them. Above all Pushpendra Kumar was the team leader........wow what are the sweet memories......

Wish you all the Best in all walks of Life.

Monday, May 6, 2013

यश मालवीय की तीन कविताएं


कहो सदाशिव
कहो सदाशिव कैसे हो!
कितने बदल गये कुछ दिन में
तनिक न पहले जैसे हो
खेत और खलिहान बताओ
कुछ दिल के अरमान बताओ
ऊंची उठती दीवारों के
कितने कच्चे कान बताओ
चुरा रहे मुंह अपने से भी
समझ न आता ऐसे हो
झुर्री–झुर्री गाल हो गये
जैसे बीता साल हो गये
भरी तिजोरी सरपंचों की
तुम कैसे कंगाल हो गये
चुप रहने में अब भी लेकिन
तुम वैसे के वैसे हो
मां तो झुलसी फसल हो गयी
कैसी अपनी नसल हो गयी
फूल गए मुंह दरवाजों के
देहरी से भी ‘टसल’ हो गयी
धंसी आंख सा आंगन दिखता
तुम अब खोटे पैसे हो
भूले गांव गली के किस्से
याद रहे बस अपने हिस्से
धुआं भर गया उस खिड़की से
हवा चली आती थी जिससे
अब भविष्य की भी सोचों क्या
थके हुए निश्चय से हो
घर–आंगन चौपाल सो गये
मीठे जल के कुएं खो गये
टूटे खपरैलों से मिलकर
बादल भी बिन बात रो गये
तुमने युद्ध लड़े हैं केवल
हार गये अपने से हो
चिड़िया जैसी खुशी उड़ गयी
जब अकाल की फांस गड़ गयी
आते–आते पगडंडी पर
उम्मीदों की नहर मुड़ गयी
अब तो तुम अपनी खातिर भी
टूट गये सपने से हो
सुख का ऐसा उठा फेन था
घर का सूरज लालटेन था
लोकगीत घुट गये गले में
अपना स्वर ही तानसेन था
अब दहशत की व्यथा–कथा हो
मन में उगते भय से हो
हम तो सिर्फ नमस्ते हैं
हम भी कितने सस्ते हैं
जब देखो तब हंसते हैं
बात बात पर जी हां जी
उल्टा पढ़ें पहाड़ा भी
पूंछ ध्वजा सी फहराना
बस विनती विनती विनती
सधा सधाया अभिनय है
रटे रटाये रस्ते हैं
हम तो इमला लिखते हैं
जैसा चाहो दिखते हैं
रोज खरीदे जाते हैं
रोज मुफ्त में बिकते हैं
यों जब जब पर्बत होते
हम दलदल में धंसते हैं
मुद्राएं त्योरी वाली
एक सांस-सी सी गाली
हमको तो आदत इसकी
पेट बजायें या ताली
इनके या उनके आगे
हम तो सिर्फ नमस्ते हैं
आश्वासन भूखे को न्यौते
पग पग पर आहत समझौते
दादी मां का पान सुपारी
पिछली पहरी हुआ उधारी
अब घर में हैं सिर्फ सरौते
जीवन किसी मुकदमे जैसा
तारीखों पर हैं तारीखें
चीर गया मन का सन्नाटा
बधिक कहां सुनता है चीखें
काठ मारते बड़े कठौते
घाव हुआ तलवार दुधारी
जनमत सत्ता और जुवारी
आश्वासन भूखे को न्यौते
मरा एक रोटी को कोई
पर तेरही पर महाभोज है
उत्सवजीवी इस समाज का
यह कैसा त्योहार रोज है
कैसी पूजा मान मनौते
उंगली पर गिनता त्योहारी
ले जाएगा धूर्त पुजारी
भक्तजनों के चढ़े चढ़ौते!

न मैं जीवित हूँ, न मनुष्य हूँ- - निर्मल वर्मा





"अगर मै दुःख के बगैर रह सकूं, तो यह सुख नही होगा; यह दूसरे सुख की तलाश होगी; और इस तलाश के लिए मुझे बहुत दूर जाना होगा; वह स्वंय मेरे कमरे की देहरी पर खड़ा होगा, कमरे की खाली जगह को भरने....

...किंतु जिस दिन कोई ऐसा क्षण आएगा, जब मैं यह सोच सकूँगा - कि न यह मैं हूँ, न यह क्षण मेरा है, न मेरी अपनी कोई जगह है, न मैं जीवित हूँ, न मनुष्य हूँ... इसलिए जो नहीं हूँ, उसे कौन मुझसे छीन कर ले जा सकता है? जिस दिन मैं यह सोचूँगा, उस दिन मैं मुक्त हो जाऊँगा, अपनी स्वतंत्रता से मुक्त, जो अंतिम गुलामी है... "

- निर्मल वर्मा

Sunday, May 5, 2013

भारतीय शास्त्रीय संगीत और गायिकाएं - एक नए अध्याय की तैयारी.और जन से जुड़ाव का जोश

अभी जब शमशाद बेगम का इन्तेकाल हुआ तो बहुत कुछ पढ़ा उनके बारे मे कल युनुस भाई ने भी भास्कर मे उन्हें शिद्दत से याद किया. मैंने इस बीच महिला गायिकाओं के बारे मे थोड़ा टटोला, तो पाया कि हमारे यहाँ बड़ी महान गायिकाएं हुई है फ़िल्मी दुनिया से लेकर कच्चा और पक्का गाने वाली. ऐसी ही परम्परा मे भारतीय शास्त्रीय संगीत मे भी इधर  कई गायिकाएं पिछले तीन दशकों से बेहद सक्रीय नजर आती है परन्तु उनका काम बहुत ज्यादा दिखता नहीं है. अधिकांश गायिकाओं की समस्या है कि वे या तो अपने गुरु के साथ लगाकर गाती रही और खत्म हो गई या किसी महान संगीतकार गायक के परिवार मे होने से संगीत सीखा और फ़िर पति, पिता, भाई या पुत्र का साथ देते देते गाने लगी और फ़िर कुछ अपने स्तर पर छोटे-मोटे काम करके या रचकर धीमे धीमे खत्म होती गई. कुछ अपवाद जरुर है पर व्यापक तौर पर यह लगा कि शास्त्रीय संगीत मे अपनी पहचान बनाने के लिए जिस स्तर पर काम करना था - वो नहीं किया गया या हो सकता हो उन्हें अवसर नहीं मिला. फिल्मों की बात अलग है नूरजहां, सुरैया, लता, आशा, उषा, वाणी जयराम, सुलक्षणा पंडित, सलमा आगा, अलका, कविता, सुनिधि, रुना लैला, उषा उत्थप या ऐसी अन्य कलाकारों के लिए कोई उस तरह का ना तो संघर्ष था, ना जद्दोजहद, पर हाँ, उनमे आपस मे ज्यादा खींचतान थी और आज भी है. खैर शास्त्रीय संगीत मे परवीन सुल्ताना, गंगू बाई हंगल से लेकर शुभा मुदगल या अश्विनी भिडे देशपांडे या देवकी पंडित तक एक लंबा संघर्ष है. पर ये ही वो चार छह महिला गायिकाएं है जो आज भी याद की जाती है अपनी  ठेठ गायकी के लिए और इन्होने आडम्बर नहीं रचा, ना ही कोई छद्म व्युतपत्तियाँ की है जो इन्हें विशिष्ट बनाए पर जो इनका श्रम साध्य कार्य  है वही इन्हें संगीत की दुनिया मे एक अलग सम्मान और कीर्ति देता है.इनके साथ सबसे अच्छी बात यह थी कि इन्होने अपनी दुनिया खुद बनाई ना कि एक समृद्ध विरासत के भरोसे अपनी नैया पार लगाई. 

शुभा मुदगल शायद भारतीय शास्त्रीय संगीत मे अपने तरह की अनूठी कलाकार है. जब वे एक ठसके से गाती है तो सारा जगत छोड़कर दिल करता है कि उन्हें सुना जाये. शुरुआत तो ठीक थी, जो सीखा- वो ही गाया या परम्परा निभाई, पर इधर जो वो गा रही है, नए प्रयोग कर रही है और जिस तान से सुर साधती है वो शायद ही कोई गा पाए अपने यहाँ. बहुत विलक्षण और स्वनामधन्य विदुषी कलाकार है जो भारतीयता मे रची बसी है और निश्चित ही एक दिन भारतीय संगीत को वे बेहद ऊँचा ले जायेगी. शुभा जी ने संगीत मे लोक शैली, पारंपरिक गीतों और दिलकश धुनों का जो खजाना तैयार किया है वह अपने आप मे बेमिसाल है. ऐसी ही कलाकार अश्विनी भिडे देशपांडे है, जिन्हें सुनकर रूहानी सुकून मिलता है और यह आश्वस्ति होती है कि महिलायें इतनी तल्लीनता से जो गा रही है, प्रयोग कर रही है, बेहद बारीकी से अकादमिक संगीत, शास्त्रीयता और लोक शैली के बीच महीन सा ताना-बाना बुनकर जो कुछ भी सार्थक रच रही है वह आने वाले इतिहास मे स्वर्णाक्षरों मे लिखा जाएगा.

अच्छी बात है कि काल से परे होकर मंच पर जब ये विदुषीयाँ  मंच पर सप्तसुर  छेडती है तो संगीत और पूरा समष्टि का माहौल अपने आरोह अवरोह के बीच से एकाकार होकर श्रोताओं को चकित कर देता है यहाँ शब्दों का साफ़ उच्चारण ही नहीं, बल्कि गायकी, आलाप, स्वर की शुद्धता, लचक, और सुरों के उतार-चढ़ाव के संस्कार साफ़ दिखाई देते है. कोई बनावटीपन या आडम्बर और दिखावा नहीं होता. ना ही हमें कही यह गूँज सुनाई देती है कि संगीत के बहाने किसी दर्प मे कोई सुर सुर की शुद्धता को प्रभावित कर रहा है. मंच के चारों कोनों और आठ दिशाओं मे स्वर लहरियाँ मंद मंद गूंजती रहती है और श्रोताओं को यह महसूस होता है कि संगीत जो मुश्किल भले ही हो पर उनकी समझ मे आ रहा है और वे इसे सुन और समझ सकते है क्योकि राग की जटिलताएं खत्म हो जाती है और सिर्फ कर्ण प्रिय संगीत ही रहता है वहाँ घुल जाता है तो इगो, आडम्बर या सदियों से ढोते  आ रहे घरानों का बोझ और रह जाती है तो मिश्री  सी आवाज और यह शायद गायकी का अपना एक अंदाज है जिसे सुनकर- देखकर रंजकता और पुरजोर सुकून महसूस होता है. अफसोस यह है कि संगीत की इस महान परम्परा मे बहुत कम महिला गायिकाएं है जो भारतीयता को एक सहज संगीत से अवगत करा रही है, नया रच रही है और नित नूतन परम्पराओं का अध्याय लिख रही है, बजाय किसी घराने और थोपी गई संस्कृति को निभाते हुए कालजयी संगीत को आम लोगों मे "पापुलर" कर रही है. मै ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि अंततः हर ललित कला जो मनुष्य को सुख और शांति दें उसे लोक के अनुरूप और सहज सरल होना ही चाहिए और जो इस बात से इनकार करता है वह सिर्फ किताबों के सुनहरे हर्फों मे ही बंद होकर रह जाता है. ऐसी सभी महिला संगीतज्ञों को बधाई और शुभकामनाएं............

Wednesday, May 1, 2013

मैने कितनी मूल्यवान चीजो को गंवा दिया -निर्मल वर्मा [अंतिम अरण्य]

निर्मल जी यह उपन्यास नहीं लिखते तो शायद जीवन अधूरा रह जाता ना सिर्फ मेरा बल्कि और कई ऐसे लोगों का जो जीवन को बहुत ही अपनेपन से जीना चाहते है और समझना भी...


मेरे हाथ राख राख में खाली भटकते रहते.और तब मुझे अपने पुराने दिन याद हो आए, जब ख़ाक छानते हुए मैने कितनी मूल्यवान चीजो को गंवा दिया था और अब --राख में उन्हें टटोल रहा था...'



'कभी कभी मै सोचता हूँ कि जिसे हम अपनी जिन्दगी, अपना विगत और अपना अतीत कहते है, वह चाहे कितना यातनापूर्ण क्यों न रहा हो, उस से हमे शान्ति मिलती है. वह चाहे कितना ऊबड़-खाबड़ क्यों न रहा हो, हम उसमे एक संगति देखते है. जीवन के तमाम अनुभव एक महीन धागे में बिंधे जान पड़ते है. यह धागा न हो, तो कही कोइ सिलसिला नही दिखाई देता, सारी जमापूंजी इसी धागे की गाँठ से बंधी होती है, जिसके टूटने पर सब कुछ धूल में मिल जाता है. उस फोटो अलबम की तरह, जहाँ एक फोटो भले ही दूसरी फोटो के आगे या पीछे आती हो, किन्तु उनके बीच जो खाली जगह बची रह जाती, उसे भरने वाला 'मै' कब का गुजर चुका होता है.'

---निर्मल वर्मा [अंतिम अरण्य]