Sunday, May 12, 2013

तुम्हारे लिए.........सुन रहे हो ...........कहाँ हो तुम.........डफरीन

आखिर कौन है यह शख्स जो मेरे भीतर पाँव पसारे रह रहा है गत पांच माह से .......? आज तक तो मै नहीं समझ पाया.............पर मामला कुछ गंभीर है और अब जवाब देना ही होगा अपने आपको भी .........!!!!!
जिस दिन यह सोच लूंगा कि अपने होने और ना होने से जीवन मे कोई फर्क नहीं पडने वाला उस दिन यह नैराश्य, आसक्ति और त्याग सब खत्म हो जाएगा और वह धुंध जो तुम्हारे होने से मेरे होने को ढक लेती थी, वह भी समेट लूंगा......और फ़िर इस सपाट बियाबान मे से लंबी होती जीवन डोर को समेट कर कही दूर चला जाउंगा देखना फ़िर कभी दौरे नहीं पड़ेंगे इस तरह साँसों के और नहीं होगा उद्दाम भावनाओं का ज्वर....सुन रहे हो..... कहाँ हो तुम........ आज फ़िर याद आ गया वो सब कुछ- जो सिर्फ तुम्हारे होने से ही घटित होता था और आज जब मेरे पास नहीं हो तुम यहाँ सम्पूर्ण भौतिक रूप से तो मै पथरा गया हूँ.......क्या निराश हुआ जाये......?
अब जबकि कुछ बचा ही नहीं है और छठे चौमासे बात करना मानो एक बार फ़िर से अपने आपको भ्रम मे रखना है कि जीवन का शाश्वत रुदन जारी है साँसों के बीच से जीवन की रूठी हुई गाड़ी को ढोते हुए श्मशान तक खींचते हुए ले ही जाना है तो, डफरीन लगता है तुम यही हो कही मेरे आसपास.......एकदम से मेरी मौत की स्तुति गाते हुए और बाट जोहते हुए एक कातर निगाहो से देख रही हो कि मौत के साये मे मै कैसे क्रंदन करूँगा और फ़िर एक काला आसमान छुपा लेगा मेरे भीतर के स्व को जो कभी तुम्हारे होने से बन ही नहीं पाया, घटित ही नहीं हुआ वो सब जो ख़्वाबों मे से छलक छलक जाता था और मै मदहोश होकर बार-बार पी लेता कि इसमे तुम्हारी ही दी हुई मिठास है जो मेरे भीतर की कड़वाहट को निगल गई हो मानो....आज यह क्षण आ गया है और बस...करुणा का विस्तार अपने होने मे सम्पूर्णता चाहता है और मै दूर जा रहा हूँ कही ....तुम हो ना यही मुस्कुराते हुए मेरी ओर ...................इस देह धरे के दंड का भेद जानकार चली जाना कही और, कही दूर....... उन नक्षत्रों के पार जो कही से सनातनी परम्परा का निर्वाह कर सके......जिस दिन मैं अपने अकेलेपन का सामना कर पाऊँगा – बिना किसी आशा के- ठीक तब मेरे लिए आशा होगी, कि मैं अकेलेपन में जी सकूँ............

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