Wednesday, May 1, 2013

मैने कितनी मूल्यवान चीजो को गंवा दिया -निर्मल वर्मा [अंतिम अरण्य]

निर्मल जी यह उपन्यास नहीं लिखते तो शायद जीवन अधूरा रह जाता ना सिर्फ मेरा बल्कि और कई ऐसे लोगों का जो जीवन को बहुत ही अपनेपन से जीना चाहते है और समझना भी...


मेरे हाथ राख राख में खाली भटकते रहते.और तब मुझे अपने पुराने दिन याद हो आए, जब ख़ाक छानते हुए मैने कितनी मूल्यवान चीजो को गंवा दिया था और अब --राख में उन्हें टटोल रहा था...'



'कभी कभी मै सोचता हूँ कि जिसे हम अपनी जिन्दगी, अपना विगत और अपना अतीत कहते है, वह चाहे कितना यातनापूर्ण क्यों न रहा हो, उस से हमे शान्ति मिलती है. वह चाहे कितना ऊबड़-खाबड़ क्यों न रहा हो, हम उसमे एक संगति देखते है. जीवन के तमाम अनुभव एक महीन धागे में बिंधे जान पड़ते है. यह धागा न हो, तो कही कोइ सिलसिला नही दिखाई देता, सारी जमापूंजी इसी धागे की गाँठ से बंधी होती है, जिसके टूटने पर सब कुछ धूल में मिल जाता है. उस फोटो अलबम की तरह, जहाँ एक फोटो भले ही दूसरी फोटो के आगे या पीछे आती हो, किन्तु उनके बीच जो खाली जगह बची रह जाती, उसे भरने वाला 'मै' कब का गुजर चुका होता है.'

---निर्मल वर्मा [अंतिम अरण्य]

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