Sunday, August 4, 2013

Impressive Logic and Rationale by Manoj Kumar... A Must read



अपूर्वानंद जी के इस लेख पर दो-चार बातें मेरी ओर से भी:
1. वरवर राव ने समारोह में नहीं शामिल होकर शिष्टाचार के सामान्य नियम का पालन नहीं किया है। शायद उन्हें ज्यादा सजग होना चाहिए था और आने के पहले तसल्ली कर लेनी चाहिए थी कि उनके साथ मंच साझा करने वाले वक्ताओं में कोई ऐसा तो नहीं है जिसके साथ वे मंच साझा नहीं करना चाहते।

2. शिष्टाचार के सामान्य नियम के पालन को मैं इतना बड़ा अपराध नहीं मानता। किसी समारोह, व्यक्ति, समूह, देश आदि के बहिष्कार को हम सहसा अनुदारवाद के साथ जोड़ कर नहीं देख सकते। अनेक देशों के वैज्ञानिकों ने इजरायल का बहिष्कार किया था। इन वैज्ञनिकों में स्टीफन हाकिंस भी शामिल रहें हैं। दक्षिण अफ्रीका के रंगभेदी सरकार का बहिष्कार भारत सहित अनेक देशों ने किया। इसलिए अरुंधती और वरवर राव को यह अधिकार है कि वे हंस के मंच पर किसी कारण नहीं आएं।


3. अशोक वाजपेयी के कॉरपोरेट सेक्टर से जुड़ाव की बात करना अतिकथन है और निराधार है। यह एक भावुक कथन है और इतिहास की रोमांटिक समझ का नतीजा है। मैं इसे moral और intellectual stamina की कमी और बौध्दिक स्खलन कहूँगा। कामरेड वरवर राव ! कॉरपोरेट से सीधे-सीधे जुड़ाव तो मिस्टर कार्ल मार्क्स का था। ऐंगल्स उनके दोस्त थे और उन्हें फंड भी करते थे ! एंगेल्स के विचार क्या थे, उन्होंने अपनी फैक्टरी में क्या किया यह अलग मसला है, लेकिन थे तो उद्योगपति ही। इसलिए अशोक वाजपेयी का अगर कॉरपोरेट से कोई संबंध है तो उसकी व्याख्या करनी पड़ेगी। संबंध बड़ा vague शब्द है। टाटा नमक तो गरीब लोग भी खाते हैं इसलिए कॉरपोरेट से संबंध तो उनका भी है।

4. वरवर अगर अशोक वाजपेयी के साथ सहज नहीं हैं तो उन्हें अपनी सहजता को ठीक से समझना समझाना पड़ेगा। बावजूद इसके कि अशोक जी ने गुजरात दंगे के खिलाफ लेखकों-कलाकारों के अभियान का नेतृत्व किया, किसी को इस बात से परेशानी हो सकती है कि अशोक वाजपेयी हाल में एम. एन. एस. के किसी आयोजन में शामिल हुए। अगर यह सच है तो कम से कम मुझको तो इस बात से परेशानी है।


5. उदारवाद और माओवाद/मार्क्सवाद की बहस अपेक्षाकृत ज्यादा उलझी हुई बहस है। जैसे मार्क्सवाद के अनेक रंग और शेडस हैं वैसे ही उदारवाद के भी हैं। जगदीश भगवती और अमर्त्य सेन दोनों ही उदारवादी हैं। सभी उदारवादी मानवाधिकारों की वैसी चिंता नहीं करते जैसी चिंता करने की बात इस लेख में कही गई है। वैसे माओवादियों से सहमति-असहमति के बावजूद यह कहना अतिकथन है कि वे अपना प्रतिरोध उदारवादी मानवधिकार कार्यकर्ताओं के भरोसे चला रहे हैं। यह लगभग यह कहना हुआ कि माओवादी और और अन्य समूह जो प्रतिरोध कर रहे हैं वे भारत के soft state का फायदा उठा रहे हैं। वरवर राव भी आखिरकार intelligentsia के पार्ट हैं, इसलिए हो सकता है कि उनके case में राज्य और उसका बौध्दिक तंत्र कुछ सॉफ्ट हो जाए, लेकिन प्रतिरोध करने वाले समूहों के लिए राज्य का क्रूरतम चेहरा ही सामने आया है और इस क्रूरतम चेहरे को moderate करने में उदारवादी बौध्दिकों की जो भूमिका है उस पर गालिब के दो शेर अर्ज है:

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक

हमने माना कि तगाफूल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे, हम तुम को ख़बर होने तक


6. तमाम सीमाओं के बावजूद उदारवादी मानवधिकार वादी जो कर रहे हैं उसकी एक प्रगतिशील ऐतिहासिक भूमिका है, लेकिन अनेक प्रतिरोधों को उदारवादी फ्रेमवर्क का अतिक्रमण करना ही होता है।
7. अंत में John Holloway की ये पँक्तियाँ:

“In the beginning is the scream. We scream.

When we write or when we read, it is easy to forget that the beginning is not the word, but the scream. Faced with the mutilation of human lives by capitalism, a scream of sadness, a scream of horror, a scream of anger, a scream of refusal: NO.

The starting point of theoretical reflection is opposition, negativity, struggle. It is from rage that thought is born, not from the pose of reason, not from the reasoned-sitting-back-and-reflecting-on-the-mysteries-of-existence that is the conventional image of ‘the thinker’.

We start from negation, from dissonance. The dissonance can take many shapes. An inarticulate mumble of discontent, tears of frustration, a scream of rage, a confident roar. An unease, a confusion, a longing, a critical vibration.”

[http://www.revalvaatio.org/wp/wp-content/uploads/holloway-change-the-world-without-taking-power.pdf]

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