आरती, अजान, गुरुबाणी का पाठ या चर्च में कैरोल गाने वालों की आवाज ठीक हो तो बढ़िया नहीं तो धर्म को जिस तरह से बड़े - बड़े भोंपू लगाकर अपनी जाति, वर्ग या समुदाय या सबको जो पुण्य बांटने का कार्य है ना उसके बजाय इन सभी बेसुरों को भयानक पाप लगेगा, मतलब रोज - रोज एक ही तरह की किताब से वही - वही चीखते - चिल्लाते है और कर्कश स्वरों से पूरे माहौल का कबाड़ा कर देते है, कितनी कमजोर याददाश्त है कि सदियों से वही गा - बजा रहे हो फिर भी जीवन में अमल नहीं करते आखिर कब तक वही सब दोहराते रहेंगे, नया क्यों नहीं रचते, ऐसे ही भागवत सुनाने वाले लोग भी कितने वर्षों से एक ही तरह की कहानी कर्कश आवाज में सुनाकर धर्म का नुकसान कर रहें है, कितने अज्ञानी है ये लोग कि अपनी ही भौंडी आवाज को पहचानते नहीं और अपनी आवाज के साथ ढोल मंजीरे और संवादिनी की आवाज भी इतनी बढ़ा देते है कि पूछो मत हर आरती, अजान या अन्य में आखिर में आते आते ये लोग माइक के सामने लगभग विक्षिप्त हो जाते है और एक ही बात, स्लोगन या नारे को इतना दोहराते है कि लगता है उन्माद और पागलपन का दौरा पड़ा है, इनके साथ वाली भीड़, बच्चे भी अपना दिमाग गिरवी रखकर प...
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