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Khari Khari, Drisht Kavi and other Posts of 4 to 7 May 2026

वोट चोरी, राज्य चोरी, चुनावी घालमेल, और भयानक हिंसा के हल्ले के बाद इन सारी घटनाओ को छुपाने, जनता और देश दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए भाजपा क्या कर सकती है इसकी कल्पना अब बहुत मुश्किल नहीं है , ये लोग सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ, सत्ता और धन से जुड़े है और इसके लिए कुछ भी कर सकते है
जिस अंदाज में इस तरह की कार्यवाहियों का विरोध, और पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे है, विपक्ष से लेकर नामी वकील चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट के SIR वाली प्रक्रिया पर सुस्ती दिखाने या अगली बार वोट कर देना जैसे बयान पर लोग कमेंट कर रहे है वह चिंतनीय है
आखिर में प बंगाल में चुनावों की आड़ में कब्जा करके जिस तरह से हिंसा और बाकी सब किया वह शर्मनाक है, जो थोड़ी बहुत आस्था थी वह भी खत्म हो गई है
पिछले तेरह साल में शुभेंदु के चौथे पीए की हत्या मतलब बहुत बड़ा लोचा है, क्या जांच इस दिशा में भी होगी, इन चारों मृतक पीए के बारे में विस्तृत जानकारियां ली जाए कि आखिर इनमें क्या समानता थी और ये असमय क्यों मारे गए, शुभेंदु जब टीएमसी में थे तब दो और भाजपा में आने के बाद दो यानी क्या सवाल नहीं है, यह राजनैतिक ना होकर कुछ व्यक्तिगत या कोई और मुद्दा नहीं लगता
सबसे ज्यादा अफ़सोस संविधानिक संस्थाओं पर हो रही है प्रधानमंत्री, गृह मंत्री तो खैर सत्ता के लालची और स्वार्थी है ही और हर चुनाव में इनकी भाषा, इनके तेवर, इरादे और षडयंत्र सामने आते ही रहते है पर केंद्रीय सुरक्षा बल, चुनाव आयोग, ब्यूरोक्रेसी, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, स्थानीय प्रशासन और ब्रोथल बन गई राष्ट्रीय मीडिया पर भी अब न आस्था है और ना विश्वास
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देश हिंसा से झुलस रहा है, लोकतंत्र बुरी तरह से खतरे में है और हमारे हिंदी के साहित्यकार भयानक आत्ममुग्ध होकर पुरस्कार बटोरने, फ़िज़ूल की यात्राओं, अश्लील आयोजनों और नीचतम कर्मों में लगे है और पूरी बेशर्मी से उजबक और मूर्ख की तरह से अपना स्वयं का प्रचार - प्रसार कर रहें है, हिन्दी के संपादक, प्राध्यापक, शोधार्थी और साहित्यकारों से बड़ा घटिया, कुत्सित और पाखंडी इस समय कोई नहीं जो सिर्फ अपनी नौकरी बचाते हुए सत्ता के चाटुकार बने हुए है
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कितना बारीक, सुंदर, गहरा और विवेचनात्मक आलेख है अनुराग, निश्चित ही ये सारी बातें गहन अनुभव, जमीनी पड़ताल, विविध किस्म के लोगों से मिलने के बाद और अपना निज झोंककर ही समझ आती है, बहुत प्रभावी और संप्रेषणीय बातें सहज ढंग से लिखी है भाई Anurag Dwary ने
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" ईश्वर होने का भ्रम अंततः आदमी को अकेला कर देता है, मनुष्य होने की विनम्रता उसे संसार से जोड़ती है "
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भास्कर में आज एक लेख पढ़ा। बात बड़ी लुभावनी थी ... बढ़ती उम्र के साथ थोड़ा अजीब हो जाइए। दुनिया के सांचों से बाहर निकलिए। अपने भीतर लौटिए। अपने असली रूप के करीब पहुंचिए। बात में मिठास भी थी और राहत भी। जैसे किसी ने उम्र की झुर्रियों में स्वतंत्रता का गुलाब रख दिया हो।
लेख में अंतरात्मा पर शोध करने वाली प्रोफेसर रेबेका श्लेगल का हवाला था कि उम्र बढ़ने के साथ लोग अपने असली स्वरूप के करीब पहुंचते जाते हैं। हर दशक उन्हें थोड़ा और प्रामाणिक बना देता है। लेखिका डियान शिफर कहती हैं कि अपने अजीबपन को स्वीकार करना जोखिम भरा है, क्योंकि दुनिया आपकी हर पसंद पर ताली नहीं बजाएगी। जेंसी डन तो अजीब होने को सुपरपावर कहती हैं। डॉ. स्कॉट काफमैन के मुताबिक वियर्डनेस अनुभवों के प्रति खुलापन है, और यही रचनात्मकता की पहली शर्त है।
इन बातों से कौन असहमत होगा? सचमुच, थोड़ा अजीब होना चाहिए। थोड़ा दुनिया के हिसाब से न चलना चाहिए। थोड़ा बचकाना, थोड़ा सनकी, थोड़ा अनुपयोगी, थोड़ा असुविधाजनक होना चाहिए। आदमी अगर पूरी तरह व्यवस्थित हो जाए तो अलमारी बन जाता है, मनुष्य नहीं।
लेकिन यहीं एक पतली-सी रेखा है। इसी रेखा के उस पार अजीबपन नहीं, उन्माद शुरू होता है। आत्मस्वीकृति नहीं, अहंकार शुरू होता है। मौलिकता नहीं, मनुष्य के भीतर बैठा छोटा-सा तानाशाह जागता है। और हमारे समाज में यह तानाशाह बहुत जल्दी जाग जाता है खासकर तब, जब उसे कुर्सी, पद, माइक, लाल बत्ती, फाइल, सुरक्षा-कर्मचारी, या किसी और की नियति पर हस्ताक्षर करने का अधिकार मिल जाए।
हमारे यहां कई लोग अजीब नहीं होते, वे बस अपने को ईश्वर समझने लगते हैं।
नेता हो, अधिकारी हो, अफसर हो, संपादक हो, मालिक हो, प्रधान हो, ठेकेदार हो, संस्था का प्रमुख हो कई जगहों पर एक ही रोग दिखता है। आदमी जैसे ही कुर्सी पर बैठता है, उसे लगता है कि संसार उसके फन पर टिका है। वह शेषनाग है। उसने जरा करवट बदली तो धरती डगमगा जाएगी। वह जिसे चाहे उठा देगा, जिसे चाहे गिरा देगा। जिसकी नौकरी चाहे बचा देगा, जिसकी फाइल चाहे दबा देगा। जिसकी तकदीर चाहे लिख देगा, जिसकी सांस चाहे रोक देगा।
कुर्सी पर बैठे हुए उनके चेहरे देखिए। बोलने का ढंग देखिए। गर्दन का कोण देखिए। आंखों की ऊंचाई देखिए। वे सामने वाले आदमी को आदमी नहीं, आवेदनपत्र समझते हैं। उनकी मेज पर रखा पेपरवेट भी उनसे ज्यादा मानवीय लगता है।
और फिर समय का कमाल देखिए। वही लोग जब कुर्सी से उतरते हैं, तो कितने निरीह लगते हैं। वही फोन जिन्हें कभी वे उठाते नहीं थे, अब वे खुद मिलाते हैं। वही दरवाजे जिन पर लोग इंतज़ार करते थे, अब वे खुद इंतज़ार करते हैं। वही चेहरा, जो कभी निर्णय था, अब अनुरोध बन जाता है। वही आवाज, जो कभी आदेश थी, अब सफाई देती है।
यहीं जीवन का असली व्यंग्य है। कुर्सी पर बैठा आदमी सोचता है कि वह स्थायी है। कुर्सी चुप रहती है। उसे मालूम होता है कि आदमी अस्थायी है।
अजीब होना अगर मुक्ति है, तो ईश्वर होने का भ्रम कैद है। अजीब आदमी दुनिया के सांचे तोड़ता है, लेकिन दूसरों की गरिमा नहीं तोड़ता। अहंकारी आदमी अपनी सुविधा को सिद्धांत, अपनी सनक को नीति और अपनी क्रूरता को व्यवस्था कहने लगता है। वह दूसरों के जीवन में ऐसे प्रवेश करता है जैसे कोई कसाई बाड़े में उतरता है ... मापता है, तौलता है, काटता है, और फिर कहता है ... यह सब नियम के अनुसार हुआ है।
हमारे समय का सबसे बड़ा अवसाद यही है कि मनुष्य अपनी मनुष्यता से थक गया है, लेकिन ईश्वर बनने को उतावला है।
कुछ लोग सचमुच अवसाद की काली रात से गुजरते हैं। उनके सामने हार का भय होता है। चुनौतियां मुंह बाए खड़ी होती हैं। भीतर अंधेरा होता है। बाहर दरवाजे बंद होते हैं। जीवन पूछता है अब? और वे जवाब देते हैं ... अभी नहीं, अभी हारना नहीं है।
ऐसे लोग टूटते नहीं, तपते हैं। वे खुद को बड़ा नहीं घोषित करते, जीवन उन्हें धीरे-धीरे बड़ा बना देता है। उनकी महानता की कोई घोषणा नहीं होती। वह उनके श्रम की धूल, आंखों की नींद, अस्वीकृतियों के ढेर, उधार की रोटियों, कटे हुए दिनों और लहूलुहान आत्मसम्मान से बनती है।
हेनरी फोर्ड को लोग पागल समझते थे। रात-रात भर मशीनों पर ठक-ठक करता आदमी किसे समझ आता? पिता नाखुश, पड़ोसी परेशान, जेब खाली, भविष्य संदिग्ध। लेकिन उसके भीतर जो अजीबपन था, वह सृजनशील था। वह दुनिया पर शासन करने नहीं निकला था, वह मशीन से बातचीत कर रहा था। उसका पागलपन दूसरों को छोटा साबित करने का पागलपन नहीं था। वह कुछ बना देने की बेचैनी थी।
गार्सिया मार्केज़ जब अपना उपन्यास लिख रहे थे, घर में पैसे नहीं थे, किराया उधार था, राशन उधार था, सब्जी उधार थी। पत्नी लोगों से कहती थीं ... उपन्यास छपेगा तो पैसे लौटा देंगे। लोग हंसते होंगे। कौन लेखक इतना पैसा कमाता है? लेकिन वह लिखते रहे। अपनी गरीबी की गंध को उन्होंने अपनी भाषा पर हावी नहीं होने दिया। उनकी रचना ने उन्हें बचाया, और उन्होंने अपनी रचना को।
आइंस्टाइन को धीमा कहा गया। बेवकूफ कहा गया। क्लर्क की नौकरी करनी पड़ी। लेकिन वे दुनिया से बदला लेने नहीं बैठे। उन्होंने ब्रह्मांड से प्रश्न पूछे। एडीसन सुन नहीं सकते थे, गरीब थे, पर रोशनी की कल्पना करते रहे।
इन सबमें एक बात समान है ... इनमें अजीबपन था, पर ईश्वर होने का भ्रम नहीं था। ये लोग अपने संघर्ष से बड़े हुए, दूसरों को कुचलकर नहीं। इन्होंने कठिनाई को किला बनाया, पर भीतर सिंहासन नहीं रखा। इनके भीतर जिजीविषा थी, दर्प नहीं।
और हमारे आसपास? यहां कई लोग एक छोटी-सी कुर्सी पाते ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों हो जाते हैं। नियुक्ति वही करेंगे, विनाश वही करेंगे, पालन वही करेंगे। उनकी भाषा में करुणा नहीं, करुणा की घोषणा होती है। उनके निर्णयों में न्याय नहीं, न्याय का अभिनय होता है। उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं, नियंत्रण की चिकनाई होती है।
वो कहते हैं .... मैंने उसे बनाया।
वो कहते हैं ... मैं चाहूं तो उसका करियर खत्म।
वो कहते हैं ... मेरे बिना कुछ नहीं।
और यह कहते हुए उन्हें कभी याद नहीं आता कि उनका अपना जीवन भी कितने अदृश्य हाथों, कितनी अनकही मददों, कितनी संयोगों और कितनी कृपाओं से बना है। मनुष्य जब अपनी सफलता में दूसरों की भूमिका भूल जाता है, तभी उसके भीतर ईश्वर का कीड़ा जन्म लेता है।
असल में यह भी एक तरह का अवसाद है ... शक्ति का अवसाद। बाहर से वह उन्माद दिखता है, भीतर से वह भय है। जो आदमी हर समय अपनी सत्ता दिखाता है, वह भीतर से जानता है कि उसकी सत्ता उधार की है। इसलिए वह हर आवाज से डरता है। हर असहमति उसे विद्रोह लगती है। हर स्वतंत्र मनुष्य उसे खतरा लगता है। हर प्रतिभा उसे अपनी कुर्सी पर चींटी चलती हुई दिखाई देती है।
कितनी विडंबना है ... हम उम्र के साथ अजीब होने की सलाह देते हैं, पर विनम्र होने की सलाह भूल जाते हैं। हम प्रामाणिक होने की बात करते हैं, पर यह नहीं पूछते कि प्रामाणिकता अगर क्रूरता बन जाए तो? कोई कहे ... मैं तो ऐसा ही हूं, मुंहफट, कठोर, सीधा। लेकिन भाई, सीधा होना और किसी की आत्मा पर जूता रख देना दो अलग बातें हैं। अपने स्वभाव के नाम पर दूसरों को घायल करना प्रामाणिकता नहीं, असभ्यता है।
सच्चा अजीबपन आदमी को मुलायम बनाता है। वह उसे दूसरों की विचित्रताओं के प्रति उदार करता है। वह कहता है ... तुम अपने ढंग से रहो, मैं अपने ढंग से। पर झूठा अजीबपन कहता है ... मैं अलग हूं, इसलिए महान हूं। तुम साधारण हो, इसलिए मेरे नीचे हो।
यही फर्क है कलाकार और अफसरशाही वाले आत्ममुग्ध आदमी में। कलाकार अजीब होता है तो दुनिया में नई खिड़की खोलता है। अहंकारी अजीब होता है तो कमरे की सारी खिड़कियां बंद कर देता है और घोषणा करता है ... हवा मैंने रोक रखी है।
जीवन सचमुच कहानियों जैसा है। इसमें फीके और गाढ़े रंग हैं। उदासी है, उत्साह है, कुंठा है, रोशनी है। कई बार लगता है कि अब भोर नहीं होगी। लेकिन भोर होती है। वह उन्हीं लोगों के लिए होती है जो रात में खुद को ईश्वर घोषित नहीं करते, बल्कि चुपचाप दीपक जलाए रखते हैं।
जो लोग कठिन समय में भी दूसरों की गरिमा बचा लेते हैं, वही सचमुच बड़े होते हैं। जो अपने संघर्ष का इस्तेमाल दूसरों को अपमानित करने में नहीं करते, वही मनुष्य कहलाने लायक हैं। जो यह जानते हैं कि आज मेरे पास अधिकार है, कल नहीं भी होगा ... वही अधिकार के योग्य हैं।
बाकी तो सब तमाशा है। कुर्सी का तमाशा। पद का तमाशा। अहंकार का तमाशा। आदमी के भीतर बैठे उस छोटे, डरपोक, लेकिन बहुत शोर मचाने वाले ईश्वर का तमाशा।
अंत में बात वहीं लौटती है ... बढ़ती उम्र के साथ अजीब होना बुरा नहीं। बल्कि जरूरी है। लेकिन ऐसा अजीब होना चाहिए जिसमें मनुष्य बचे। ऐसा अजीब होना चाहिए जिसमें रचनात्मकता हो, करुणा हो, असहमति का सम्मान हो, अपनी सीमाओं की समझ हो। ऐसा अजीब होना चाहिए जो जीवन को थोड़ा और खुला करे, किसी और का जीवन छोटा नहीं।
क्योंकि दुनिया को ईश्वर बनने वाले लोगों ने नहीं बचाया। दुनिया को उन लोगों ने बचाया है, जिन्होंने अंधेरे में भी मनुष्य बने रहने की जिद रखी। जिन्होंने अपमान को श्रम बनाया। अस्वीकृति को लेखन बनाया। गरीबी को कल्पना बनाया। हार को अभ्यास बनाया। और सत्ता मिली तो उसे सिर पर नहीं, कंधे पर रखा।
ईश्वर होने का भ्रम अंततः आदमी को अकेला कर देता है। मनुष्य होने की विनम्रता उसे संसार से जोड़ती है।
और शायद उम्र का असली अर्थ यही है ... अजीब जरूर हो जाइए, पर इतने भी नहीं कि अपने ही बनाए सिंहासन पर बैठकर यह भूल जाएं कि अंत में सबको जमीन पर ही लौटना है।
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प बंगाल के संभावित और भावी मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के पीए चंद्रनाथ रथ की हत्या दुखद है, और यह भयानक गलत परिपाटी है
इस तरह की घटनाएं भारतीय लोकतंत्र के नाम पर धब्बा है, ज्ञानेश कुमार ने कहा था कि अबकी बार चुनाव बगैर हिंसा और हत्या के हुए है परंतु चुनाव परिणामों के बाद इस तरह की हिंसा और हत्या तक हो जाने को कतई बर्दाश्त नहीं की जा सकती, भाजपा के जीते हुए सभी विधायकों की सुरक्षा बढ़ाई जाए ताकि नई सरकार के गठन होने तक निर्वाचित विधायक और उनके स्टाफ सुरक्षित रहें
हत्यारों को तुरंत ढूंढ़ा जाए और उन्हें फास्ट ट्रैक कोर्ट से ऐसी सजा दी जाए कि आगे कोई इस तरह की जुर्रत ना करें, समय आ गया है कि देश के गृह मंत्री और प्रधानमंत्री बंगाल में हिंसा को नियंत्रित करने के लिए ठोस पहल करें और अपने कार्यकर्ताओं को निर्देशित करें कि हिंसा बर्दाश्त नहीं है, पुराना इतिहास जो भी रहा हो परन्तु आंख के बदले आंख वाले न्याय का समय एक बर्बर युग था और बंगाल की जनता ने आपको इसलिए चुना है कि हालात बदले जाएं
और आखिर में सवाल कि चंद्रनाथ रथ की हत्या किसने की और इससे किसका फायदा होगा, क्योंकि निजी सचिव का अर्थ होता है कि वह आपके आगे-पीछे और तमाम चालों के बारे में जानता है और वह कभी भी किसी भी पार्टी और प्रशासन के लिए खतरा बन सकता है
श्री चंद्रनाथ रथ को श्रद्धांजलि और सादर नमन
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Generalism / Generalist
Junear / Bhery Senere
Judisheere
Intenshan
Memorendem
Cheef / Kiros
Apiile
Rijondear
Efidebit
ये शब्द आपने पढ़े या सुने है कही , और अभी हिंदी तो छोड़ ही दीजिए, हमारे हिंदी जगत और साहित्य के धुरंधर इन्हें इस्तेमाल करते है, अपन इनके अर्थ "हीन्दी में बिता दीजिए बस्स"
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बंगाल में चुनाव उपरांत हो रही हिंसा, दुकानदारों और रेहड़ी वालों का सामान जलाना और उनपर खुले आम पूरी बेशर्मी से पेशाब करना (अनुज Ranvijay Jha की पोस्ट देखिए) , किस सनातन संस्कृति का द्योतक है, कोलकाता के मित्रों, प्राध्यापकों, एनजीओ कर्मियों और वरिष्ठ अधिकारियों से बातें करके यह बात लिख रहा हूँ और बेहद दुखी हूँ
अफसोस हो रहा है कि भाजपा के कार्यकर्ता जिस तरह का हुड़दंग मचा रहे है, आम आदमी भयभीत है और इसका असर आम जनता और गरीब लोगों पर हो रहा है, यह कोई स्वस्थ परंपरा नहीं है, चुनावों में हार जीत लगी रहती है मतभेद अपनी जगह, मनभेद ना हो और हिंसा तो कतई भी स्वीकार्य नहीं है
ममता को भी हार को स्वीकार कर अपने उदार मन का परिचय देना चाहिए साथ ही अपने लोगों को कहें कि हिंसा ना करें और शांति एवं सद्भाव बनाएं रखें
कृपया राष्ट्रीय स्तर पर आकर राष्ट्र को संबोधित करते हुए इस अनर्गल हिंसा और गुंडागर्दी को रोकने के लिए निर्देशित कीजिए
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