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Man Ko Chithti and Khari Khari - End of Communism in India the Black day 4th May 2026

सबसे ज्यादा सतर्क, चौकन्ना और सावधान रहने की जरूरत अपने और बेहद निजी लोगों से है - क्योंकि यही वे लोग है जो आपका क, ख, ग और घ जानते है और समय आने पर आपको पलटकर डूबो देंगे, यही वे लोग साबित होंगे - जो आपको जीवन में सबसे ज्यादा चुनौती भी देंगे और आपकी बाजी भी पलटेंगे, ये ही वो लोग है - जो आपका विश्वास जीतकर आपका सर्वनाश करेंगे - इसलिए मैं आजकल बहुत ज्यादा डरता हूँ तो अपने आसपास के लोगों से - जो मुझे निराशा, मंथन और मुश्किलों में घेरे रहते है, संबल बंधाते हैं, दिलासा देकर प्रचंड आशावाद की नैया में तैराने का जोख़िम उठाते है और अंत में मेरे हर तरह के सद्कर्म और कुकर्म में शामिल रहते है, यह सीख रहा हूँ कैसे और कितनी जल्दी इनसे निजात पाई जाएं और अपना एकांत बचाते हुए अपनी गरिमा और अपने स्व को जिंदा रख सकूं

सबसे पहले अपने-आपको बंद कर लिया है और अपने सुख-दुख अपने तक सीमित कर लिए हैं, मेरी जीत, खुशी, बीमारी या अपने नितांत निज पलों को अपने तक रख लिया है, अपनी आय-व्यय या अपने फायदे-नुकसान का लेखा अपनी ही कुंजियों से खुलने वाली संदूकों में बंद कर लिया है, किसी के पूछने पर बस इतना कहता हूँ कि सब ठीक है और मस्त हूँ

शायद यही वो समय है - जब हमें भीतर की ओर चलना है - बनिस्बत बाहर के शिखरों की ओर

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वामपंथ को श्रद्धांजलि - ताबूत की आखिरी कील
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नर हो, ना कर निराश मन को क्योंकि जब नाश मनुज पर छाता है तो विवेक पहले मर जाता है
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रूस से लेनिन की मूर्ति उखड़ने के बाद वैश्वीकरण और बाजारीकरण ने आज भारत से वामपंथ को उखाड़कर दफना दिया है, उत्सव का दिन है, चारु मजूमदार, नक्सलबाड़ी से लेकर मजदूर आंदोलन, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, समता, भ्रातृत्व, समानता, जेंडर, आदि मुद्दों के साथ नर्मदा आंदोलन या परमाणु हथियारों के खिलाफ होने वाले सभी प्रकार के आंदोलनों का आज खात्मा हो गया, आतंकवाद, नक्सलवाद, गुरिल्ला, बोडोलैंड, आसाम का आंदोलन, केरला के सारे विकास के दावे और वो सब खत्म हो गया जिसमें थोड़ी बहुत संभावनाएं बची थी
मार्क्स, चे ग्वेरा से लेकर लेनिन या किसी और प्रगतिशील व्यक्तित्व के दिल्ली से लेकर इंदौर, लखनऊ या पटना के फुटपाथों पर बिकने वाले टी शर्ट्स आज से बिकना बंद हो जाएंगे, शादी ब्याह में लाईट उठाने वाली अश्लील किस्म की महिलाएं जो कंधों पर बच्चे उठाकर और गर्भवती होने का ढोंग कर गरीब होने के भौंडे प्रदर्शन करती है - वह बंद हो जायेगा, किसानों को दस साल से सम्मान निधि इतनी मिल चुकी है कि वे अब सिर्फ नोबल के हकदार है, पूरा देश इतना शिक्षित और दीक्षित हो गया है कि सरकारी स्कूल बंद करना पड़ रहे है, बच्चे डीपीएस, अरविंदो या चिन्मय मिशन में पढ़कर सीधे विदेश जा रहे और लौटकर स्वदेश के शाहरुख की तरह से उन्नत टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर देश बना रहें है, सुगंधित और चकाचौंध से भरे अस्पतालों में प्रतिबद्ध डॉक्टर्स और स्टाफ गरीबों की सेवा में व्यस्त है - जिसका सपना बच्चों से देखा था
गरीबी खत्म हो गई, कुपोषण से लेकर शिशु और मातृ मृत्यु दर के आंकड़ों में हमने अमेरिका को पछाड़ दिया है, पांच किलो निशुल्क राशन से लेकर लाड़ली बहना और सभी जगह फ्री बीज की वजह से SRS, NFHS, या बाकी सब सर्वेक्षणों की आवश्यकता खत्म हो गई है EPW, Down to Earth तत्काल प्रभाव से बंद कर दी जाए, और यह बात अभी हो रही जनगणना से सिद्ध हो जाएगी, अब सिर्फ एक समस्या है कि वामपंथ का भूत कुछ लोगों के जेहन में अभी भी है, नेहरू, गांधी, सुभाष, जेपी, लोहिया, अटल बिहारी, इंदिरा को भूल जाइए ; अशफाक, भगत सिंह को तो भूल ही गए है हम
ऐसे ही कुछ बुद्धिजीवी, जेएनयू और मीडिया के हरकतों को तो मुंह से लेकर शरीर के तमाम छिद्रों में रूपया भरकर खरीद लिया, पर कुछ लातों के भूत बातों से नहीं मानेंगे तो उनके लिए एक कुशल, दक्ष और लठैत किस्म की सेना तैयार कर की गई है जो अदालतों का नही मौके पर जाकर पिटाई करके या हत्या या लिंचिंग करके इलाज कर देती है,आज अंजना ओम या चित्रा की जरूरत है मेघा पाटकर की नहीं
"भूतों ना भविष्यति" किस्म की धर्म ध्वजा हर जगह फहरा कर हमने ईसाइयत, इस्लाम के बाद आखिर सनातन को विश्व के कोने - कोने में पहुंचा दिया है और इसके लिए अपनी पीठ ठोकना तो बनता है, दक्षिण में फिल्मों का प्रभाव आजादी के आठ दशक बाद भी इतना है कि कोई एमजीआर, एनटीआर, जय ललिता, भांड कमला हसन या विजय आकर जनता के बीच जनता को बरगला कर और जनता का ही नेतृत्व करने वाला बन जाता है
सिर्फ आशा की किरण इस सारे प्रसंग में यह नजर आती है कि केरला स्टोरी भाग एक और दो के बाद या कश्मीर फाईल्स के बाद भी कुछ अहमक किस्म के लोग बिगड़ते नहीं और व्यवस्था के खिलाफ जाकर वोट करते है, इन्हें ईश्वर सद्बुद्धि दें नए वाम मुक्त भारत में और झालमुडी खरीदकर खाने की शक्ति प्रदान करें, अब से राष्ट्रीय पर्वों पर आंगनवाड़ी में और स्कूलों में झालमुडी बंटेगी ताकि राष्ट्रीयता अमर रहें और स्थानीय व्यवसाय को जगह मिलें Think Global and Act Local जैसे नारे वाली सरकार अगले 2050 तक काबिज रहेगी
भारत में वामपंथ की मौत पर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, पूरी ब्यूरोक्रेसी - जो मात्र तीन से चार हजार है और एक सौ पचास करोड़ लोगों के भाग्य विधाता है, को सलाम करता हूँ , पूरी रीढ़विहीन मीडिया, लोकल दलाल और ठेकेदार किस्म के दल्ले पत्रकार जो सेव - परमल पर बिक जाते है या इंजीनियर, डाक्टर, वकील, ज्यूडिशियरी और औद्योगिक घरानों के सारे लोग पुण्य के अधिकारी है - जो अपनी रीढ़ बेचकर, सही या गलत ना समझते हुए सिर्फ और सिर्फ रुपए की हवस में अपना जमीर बेच देते है
उन घटिया साहित्यकारों को जो जातिवाद, किसान, अलित, दलित, प्रगतिशील, जनवादी के चोले पहनकर हिंदू होने के मतलब बताते हुए जुनैद को मार डालो की पैरवी करते हुए क्रूरता के आने का स्वागत कर कविताओं से इतिहास भर देते है, उन एनजीओ को भी सलाम जो अपना पंजीयन, FCRA, और विदेशी अनुदान बचाने के लिए सरकार और अधिकारियों के सामने पूरी मख्खी बेशर्मी से निगल जाते है और लाल गमछा ओढ़कर विश्व विद्यालयों के नाम पर दो हजार एकड़ जमीन के मालिक बनकर साहित्य सेवा से लेकर लड़कियां सप्लाई करने के ठेके ले लेते है, उन गांधीवादियों को भी सलाम जो घर में तीन या चार होने के बाद भी बड़ी जमीन और कल कारखानों के मालिक बनकर सूती कपड़े के व्यवसाय में लगे रहते है, और घरों में चार - पांच महंगी गाड़ियां रखकर देश सेवा करते हुए गांधी का चरखा बेचने की होड़ में रहते है, उन आदिवासी फर्जी नेताओं को भी सलाम जो गाहे - बगाहे गांव जाकर ताजी महुआ ले आते है और खजूर से ताड़ी अपने सामने उतारकर उत्थान का दम भरते है फेसबुक पर
संविधान से "समाजवाद को विस्थापित कर हम सनातनी" लोग करने का समय आ गया है, पूरी प्रस्तावना बदलने का समय आ गया है बाकी अन्दर का कोई अर्थ नहीं अनुच्छेद और बाकी कानूनों का
पुनः श्रद्धांजलि वामपंथ और प्रगतिशीलता को, क्या कहते है वो अंग्रेजी में RIP
बकौल दुष्यंत कुमार
"हम पराजित हैं, मगर लज्जित नहीं,
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आओ सब अंधेरे में सिमट आओ
हम यहां से रोशनी की राह खोजेंगे"
[ सुखद पल वाला बेहतरीन दिन है आज ]
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